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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

उत्तर भारत और दक्षिण भारत ........कुछ भी कभी भी .....


आज अचानक एक दोस्त जो बहुत वर्षों पहले सुदूर दक्षिण प्रांत में जाकर बस गया । बस गया से मतलब वहां पहले नौकरी करने पहुंचा फ़िर धीरे धीरे सारी घर गृहस्थी भी जमा ली । मजे से कट रही है , हम दो हमारे दो की तर्ज पर । पिता माता जी रिटायरमेंट के बाद भी पटना में ही बस गए , अपना पुश्तैनी मकान है , बच्चे एक राज्य से बाहर तो दूसरा देश से बाहर सैटल हो चुका है इसलिए अब सारे काम करके निश्चिंत होकर आराम का जीवन बिता रहे हैं । एक फ़ोन काल से इतना कुछ मिनटों में ही पता चल गया । बात बात में उसने बताया कि अभी भी साल में एक बार तो घर का प्रोग्राम बन ही जाता है । मैंने कहां हां यार ये तो होना भी चाहिए , वैसे अब उत्तर भारत कौन सा दूर और अलग रहा है दक्षिण भारत से । सब कुछ तो एक जैसा ही हो गया है । बस चंद घंटों का रेल का और उससे भी कम दूरी का हवाई सफ़र ही तो है बीच में । उसने कहा नहीं यार अभी भी बहुत फ़र्क है , बहुत बडा अंतर है । तुझे साफ़ पता चल जाएगा कि तू उत्तर भारत से अलग है ।

उससे बात करने के बाद मन में उसकी कही हुई बातें ही बहुत देर तक उमड घुमड करती रहीं ।इतिहास में पढा था कि दक्षिण भारत भौगोलिक , सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से उत्तर भारत से सर्वथा भिन्न रहा है ।विंध्याचल की पहाडियों और सतपुडा के जंगलों ने प्राकृतिक रूप से उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक अघोषित सीमा रेखा का काम किया । और उस पार पनपती रही सभ्यता द्रविड सभ्यता के रूप में जानी गई । इस बात का अंदाज़ा सहज़ ही इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इतिहास में सिर्फ़ गिनेचुने शासक ही रहे जो दक्षिण भारतीय राज्यों में अपनी विजय पताका फ़हरा सके । उस समय शायद विश्व में बहुत कम ऐसी शासन प्रणालियां थीं जिनमें मातृसत्तात्मक शासन व्यवस्था की प्रथा थी । दक्षिण भारत इस मामले में भी उत्तर भारत से बहुत अलग था । न सिर्फ़ बोलचाल , पहनावे, त्यौहार , बल्कि रंगरूप में दक्षिण भारत उत्तर भारतीय सभ्यता से कई मायनों में अलग चलता रहा । दक्षिण भारत के प्राचीन धार्मिक संस्थान , संगम सभ्यता के अवशेष , अद्भुत शिल्प और कला के बेजोड नमूने के रूप में बनाए गए सैकडों मंदिर , और सबसे अधिक दक्षिण भारत के मसालों ने न सिर्फ़ उत्तर भारतीय शासकों बल्कि विश्व को भी बरबस ही अपनी ओर खींचा ॥दक्षिण भारत में बन रही फ़िल्मों का बाजार आज विश्व के सबसे बडे फ़िल्म बाजारों में से एक है । लेकिन इन सबके बावजूद अब भी दक्षिण भारत दक्षिण भारत से थोडा दूर ही दिखता है ॥

      आज उत्तर भारतीय शहरों में दक्षिण भारतीय लोगों की मौजूदगी बहुत अधिक नहीं है , यदि राजधानी और कुछ चुनिंदा शहरों की बात करें तो ऐसा ही दिखता है । न सिर्फ़ उनकी मौजूदगी बल्कि उनकी परंपराएं , उनका पहनावे का फ़ैशन , उनके मनोरंजन साधन , फ़िल्म आदि का चलन उत्तर भारत में अभी भी उस कदर नहीं जुड सका है । हां दक्षिण भारतीय भोजन और व्यंजन इडली डोसा , उत्पम , पायसम, केले चिप्स , आदि बहुत सारी खाद्य वस्तुएं आज उत्तर भारतीय प्रांतों में और उत्तर भारतीय लोगों में खासी लोकप्रिय हैं । बेशक आज भी हिंदी टीवी और सिनेमा में दक्षिण भारतीय झलक बहुत कम दिख रही है , मगर पिछले कुछ समय में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध फ़िल्मों का रिमेक और उनका हिंदी डब किया हुआ वर्जन लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है । किंतु दक्षिण भारतीय अभिनेता और अभिनेत्रियों को बौलीवुड में अभी वो पहचान बनाने में अभी काफ़ी समय लगेगा । जहां तक दक्षिण भारतीय पर्व त्यौहारों की बात है तो शायद ही कभी ये पाया हो कि कोई दक्षिण भारतीय त्यौहार बडे छोटे पैमाने पर उत्तर भारत में मनाया गया हो ।

भारत शुरू से ही विविधताओं से परिपूर्ण देश रहा है और इस देश की वैविध्यपूर्ण इतिहास जितना अधिक कौतुहल भरा रहा है उससे अधिक ये बात सबको आश्चर्य में डालती रही है कि इस विविधता के बावजूद एक सूत्र में कैसे सब कुछ पिरोया हुआ है । अब जबकि पूरा विश्व ही एक वैश्विक ग्राम के रूप में परिवर्तित हो गया है तो आने वाले समय में ये देखना भी दिलचस्प होगा कि दक्षिण भारत के किसी शहर में होली का कोई जोगीरा खूब जोर शोर से गाया जा रहा हो और ऐसे ही गुजरात के किसी शहर में पोंगल का उत्सव खूब उत्साह के साथ मनाया जा रहा हो । 

12 टिप्‍पणियां:

  1. अजय भाई , बढ़िया पोस्ट के लिए बधाइयाँ !
    घर बैठे बैठे ही देशाटन करवाने का मूड बनाये हो क्या ?

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  2. अपने देश में यह एकता बनी रहे यही दुआ है !
    वर्ना नेताओ ने तो देश के टुकडे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है !

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  3. अच्छी और सामायिक पोस्ट.......
    चूँकि मैं खुद उत्तर भारत के शहर लखनऊ की हूँ और मेरे पति केरलावासी विशुद्ध मलयाली और रहते हम चेन्नई में हैं। मैंने भारत के दोनों भूभागों के बीच के इस अंतर को बहुत करीब से देखा है..........अपने अनुभव से कह सकती हूँ कि प्रेम नेह धैर्य और स्वीकार्यता कि भावना ही वे कड़ियाँ हैं जिनसे इस अंतर को पाटा जा सकता है। आज जब मैं ससुराल जाती हूँ तो वहां सब खुश होते हैं कि अब आलू के पराठे या समोसे बनेंगे, और जब मायके जाती हूँ तो सब इडली दोसे की फरमाइश करते हैं। ससुराल में सब हिंदी बोलने की कोशिश करते हैं तो मायके में सब शब्दों के तमिल और मलयालम अर्थ पूछते हैं। और हमारे घर चेन्नई में जब तक जिक्र न आये याद ही नहीं रहता कि हम दोनों भिन्न भाषा संस्कृति से आये हैं। सब हमारी अपनी सोच पर निर्भर करता है.........आप दिल के दरवाजे जितने खुले रखेंगे आपको अपनापन भी उतना ही मिलेगा।

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  4. शिखा जी से सहमत..इस प्रकार से दो संस्कृतियों को आपस में इक दुसरे को समझने का मौका मिलता है!जब हम एक ही देश के निवासी है तो फिर आपस में मेलजोल में संकोच कैसा?"एक दूजे के लिए" फिल्म मुझे इसी लिए बहुत पसंद है...

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  5. बहुत सुंदर लिखा, मै भी शिखा जी ओर शिवन मिश्रा जी से सहमत हुं

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  6. मैं तो उस दिन की कल्पना करता हूँ जब हम भारतीय उत्तर दक्षिण की पहचान खो दें और भारतीय हो जाएँ।

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  7. अच्छी मानवीय रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई आपके इस प्रेरक और जानकारी आधारित रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद /

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  8. इतनी विविधता में भी एकता बनाये रखना --यही तो हमारे देश की खूबी है।

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  9. आप की पोस्ट पर आने का ये फ़ायदा हुआ कि शिखा जी के बारे में पता चला…।:)
    हम तो शिखा जी से सहमत होगें ही, हम खुद उत्तर भारत से हैं और पति मलयाली हैं। वैसे अगर आप आकड़ें निकाल कर देखें तो पायेगें कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत में कोई गुरुत्वाकर्षण है, वैसा आकर्षण पश्चिम और पूरब में नहीं, दक्षिण और पूरब में नहीं।
    मुझे तो लगता है हर घर में एक अंतर राज्य शादी होनी ही चाहिए किसी सुदूर प्रांत के प्राणी से। भारतीय को भारतीय बनाने के लिए जरूरी है

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  10. क्या वाकई ब्लॉगवानी से वास्ता तोड़ लिए??????

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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