बेबाक , बिंदास , बेलौस ,बेसाख्ता सी कुछ बातें ......
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बिखरे आखर
ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,
उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार
मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये ...
1 सप्ताह पहले















इन सवालों का उत्तर हमारी नौकरशाही के पास हैं। यदि जनता को यह सब पता लगे तो फिर वे क्या करेंगे। वे वास्तविक गरीबों के स्थान पर आभासी गरीब निर्मित करते हैं। इसी से मुटियाते भी हैं।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
3 अप्रैल 2010 9:21 पूर्वाह्न
"यदि ग्रामीण क्षेत्र , और ग्रामीण क्षेत्र ही क्यों शहरी गरीब आबादी को भी उनके लिए चलाई जा रही एक एक योजना, उसका लाभ उठाने का उपाय, काम नहीं हो सकने की स्थिति में उसकी शिकायत , आदि जैसी तमाम जानकारियां उपलब्ध कराई जाएं , तो भी क्या इन योजनाओं के नाम पर ये सारा गोलमाल किया जा सकेगा ?"
Ye sarkaari Bhrshth log apne pair par khud kulhaadi kyon maarenge ?
पी.सी.गोदियाल ने कहा…
3 अप्रैल 2010 9:23 पूर्वाह्न
भैयाजी, खुद का घर थोदे ही जलाया जाता है? इनका कुछ नही किया जा सकता. ये तो और मुटियायेगे और फ़िर जब कभी अति हो जायेगी तब फ़ूटेंगे.
रामराम.
ताऊ रामपुरिया ने कहा…
3 अप्रैल 2010 9:51 पूर्वाह्न
निश्चय ही आपके द्वारा उठाया गया प्रश्न काबिले तारीफ है
यहाँ मेरे विचार से इन योजनाओं के लिए ग्रामवासियों
का ऐसा संगठन हो जो निःस्वार्थ इन योजनाओं के क्रियान्वयन
के लिए जुट जाएँ कहाँ गड़बड़ी हो रही है इससे शासन को अवगत
कराये. फिर देखें कैसे नहीं होती ये योजनायें फलीभूत. पर शिष्टाचार (........) रुपी नासूर तो ग्राम पंचायत तक, ग्रामपंचायत क्या रग रग में घर कर गया है
क्या किया जाय.
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
3 अप्रैल 2010 9:53 पूर्वाह्न
झा साब आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं कागज़ों पर और तो और सरकार भी आपको सिर्फ़ कागज़ो पर ही नज़र आयेगी।एक नेताजी कह गये कि सरकारी योजनाओं के लिये दिये गये एक रुपये मे से शायद,सोलह पैसे जनता के पास पंहुच पाते हैं।ये सालों पहले की बात है पता नही आजकल उतना भी पंहुच पाता है या नही।सरकारी सेवाओं के सामने निजी सेवायें न केवल खड़ी रहती है बल्कि सरकारी सेवाओं से ज्यादा सफ़ल हैं आखिर क्यों?
Anil Pusadkar ने कहा…
3 अप्रैल 2010 9:55 पूर्वाह्न
विचारणीय विषय....हर काम केवल कागज़ पर हो कर रह जाता है...योजनाओं कि जानकारी उन तक पहुँच ही नहीं पाती जिनके लिए योजनाएं बनायीं जाती हैं...
sangeeta swarup ने कहा…
3 अप्रैल 2010 11:47 पूर्वाह्न
झा जी ,
कुछ भ्रष्टाचार ऐसे है समाज में जो ऐसे रच बस गए हो मनो समाज का हिस्सा हो..मैंने N . G O के लिए काम किया है ..पूरा का पूरा भ्रष्ट .
आरम्भ में मन उद्वेल्लित हुआ ,क्रोध भी आया और विरोध भी किया ...पर जब जाना की आरम्भ से अंत तक सब लिप्त है तो शांत होना पड़ा
अच्छा विषय
Sonal Rastogi ने कहा…
3 अप्रैल 2010 12:14 अपराह्न
आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं
संजय भास्कर ने कहा…
3 अप्रैल 2010 12:19 अपराह्न
आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं
संजय भास्कर ने कहा…
3 अप्रैल 2010 12:19 अपराह्न
हमारी सरकार में सभी मुखौटे लगाकर बैठे हैं। जनता के दुख-दर्द से उन्हें हकीकत में कुछ भी लेना-देना नहीं। हो सका तो कल मैं आप सभी को लोकसभाध्यक्ष की सांसद निधि से निर्मित सड़क का हाल बताउंगा।
Ashok Pandey ने कहा…
3 अप्रैल 2010 1:31 अपराह्न
मुझे तो लगता है कि ये अपने मीडिया वाले महान सेनानी लोग ..यदि सानिया मिर्जा का निकाहनामा पढने से फ़ुर्सत मिले तो कभी इन सबकी भी सुध लें तो शायद दो काम एक साथ हो जाएंगे । एक तो डर के ही सही कुछ तो काम होगा ही ...दूसरा शायद तभी पत्रकारिता के असली मकसद तक पहुंचा जा सके और इसका उन्हें संतोष भी हो ...खैर ये दूर की कौडी है अभी तो ...
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
3 अप्रैल 2010 2:08 अपराह्न
कहावत है कि" अंधा बांटे रेवड़ी मुड-मुड अपने को डे....."
सरकारी नौकरी में अंधा के साथ गूंगा-बहरा भी होना पड़ता है.....
कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…
3 अप्रैल 2010 2:55 अपराह्न
कृषि प्रधान देश में,ये जो नौबत आई है
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।
अन्न के भरे पड़े हैं भण्डार
फिर भी देश में भुखमरी छाई है।
अब और क्या कहें । दुःख तो होता है।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
3 अप्रैल 2010 5:11 अपराह्न
अजय जी सच कहुं तो भारत जेसा अमीर देश दुनिया मै कोई दुसरा नही, लेकिन हमारे देश को हमारे ही इन नेताओ ओर नॊकर शाही ने अंदर ही अंदर इतना घुन लगा दिया कि, लगता ह्ज़ै अब गिरा अब गिरा... अगर हमारे देश की जनता जागरुक हो जाये ओर बेकार के झंजटो मै अपना समय ना खराब करे तो भारत देश मै कोई भुखा ना सोये, सच मै फ़िर से यह सोने की चिडिया बन जाये, आप ने बहुत सुंदर लिखा काश आप जेसे लोग हर गांव मै हर देहात मै हर शहर मै हो जाये तो.... इस देश का नक्शा बदल जाये
राज भाटिय़ा ने कहा…
3 अप्रैल 2010 6:51 अपराह्न
जब तक जनता जागरूक होकर सक्रिय नहीं होती कोई कुछ नहीं हो सकता ।आओ मिलकर जनता को जागरूक करें
HINDU TIGERS ने कहा…
6 अप्रैल 2010 9:14 अपराह्न