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अभी पिछले वर्ष ही गांव गया था तो बहुत कुछ नया और सुखद देखने को मिला जिसमें से एक थी सोलर लाईट से युक्त खंबे । शाम होते ही उनकी दूधिया रौशनी गांव की स्वाभाविक शीतलता में घुल कर गजब की ठंडक दे रहे थे आंखों को । गांव में बिजली के खंबे तो शायद मेरे पैदा होने से पहले से ही लगे हुए हैं और ऐसा नहीं है कि उनमें रोशनी नहीं देखी ..मगर होली दिवाली कौन सा रोज रोज होती है । खैर , शहर में रहने वाले हमलोगों जैसों को आदतन चारों तरफ़ तब तक रोशनी देखने की लत सी पड जाती है जब तक आंखें न मूंद लें । ऐसे में शाम होते ही अंधेरे की चादर असहज न सही मगर सीमित तो कर ही देती है । मुझे खुशी हुई कि चलो कुछ तो अच्छा और बढिया देखने को मिला इस बार , तो लोग सच ही कह रहे हैं कि बिहार बदल रहा है । मगर कहते हैं न खुशी क्षणिक ही होती है अक्सर । थोडी देर बाद पता चला कि गांव में कुल चार ही लगे हैं ..इतने बडे गांव में कुल चार । मैं थोडा हैरान हुआ । जब थोडी और जानकारी ली तो पता चला कि जितने आवंटित किए गए थे सब कहां गए कुछ पता नहीं । ये पहली बार नहीं हुआ था इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हां क्रोध जरूर आया ।


          इसी सब के दौरान मुझे याद आया कि अभी कुछ समय पहले ही सरकार ने गैर परंपरागत उर्जा मंत्रालय ने ऐसी ही एक योजना के तहत छोटे छोटे सोलर लैंप दिए थे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वो भी ढेर सारी सब्सिडी देकर रियायती दाम पर ताकि लोग उसका उपयोग कर सकें । अगले दिन प्रखंड कार्यालय जाने का निर्णय लिया । वहां जाकर मालूम किया तो पता चला कि जितने भी सोलर लैंप पहली किस्त में आए थे , उनमें से एक भी बेचे नहीं गए सब के सब कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों ने इधर उधर कर दिए और कुछ रखरखाव के अभाव में बेकार होकर स्टोर रूम में पडे थे । वहां खूब सारे लोगों से बातचीत ,और वाद विवाद के बाद घर आ गया । उसी शाम को पास में ही रहने वाला एक नवयुवक साथी आया और कहा कि वो दिल्ली मुंबई नहीं जाना चाहता । घर में माता पिता बुजुर्ग हैं और जमीन भी है इसलिए सोच रहा था कि यदि कुछ पैसों का जुगाड हो जाए तो कोई धंधा शुरू कर सके । मैंने कहा कि अचानक इतने पैसे का इंतज़ाम तो कठिन होगा , फ़िर अचानक ही मेरे मन में एक बात सूझी और मैंने उसे बताया , कि क्यों नहीं बैंक से ऋण ले लें । आजकल सरकार ने बहुत सारी योजनाएं चलाई हुई हैं , उसमें से किसी के लिए भी प्रयास किया जा सकता है । अगले दिन उसने फ़िर थोडी मायूसी से बताया कि बैंक वाले कह रहे हैं कि लोन तो मिल जाएगा मगर बीस प्रतिशत वे पहले ही रख लेंगे । मेरा दिमाग भन्ना गया था । उसका लोन तो मैंने बिना प्रतिशत के ही पास करवा लिया । मगर इन सबने दिमाग में बहुत सी बातें उठा दीं ।


सरकार हर साल बहुत सी योजनाएं शुरू करती है, गरीबों, पिछडों, मजदूरों के कल्याण के नाम पर । उनमें से अधिकांश पैसा सरकारी कोष से निकाला भी जाता है इस नाम पर । लेकिन उसका कितना लाभ मिलता है गरीबों को सरकार इसपर कभी ध्यान नहीं देती क्यों ।

यदि ग्रामीण क्षेत्र , और ग्रामीण क्षेत्र ही क्यों शहरी गरीब आबादी को भी उनके लिए चलाई जा रही एक एक योजना, उसका लाभ उठाने का उपाय, काम नहीं हो सकने की स्थिति में उसकी शिकायत , आदि जैसी तमाम जानकारियां उपलब्ध कराई जाएं , तो भी क्या इन योजनाओं के नाम पर ये सारा गोलमाल किया जा सकेगा ?

जितनी योजनाएं सरकार चलाती है , हर साल, यदि उनका लाभ सच में ही आम जनता को मिलने लगे तो उनकी स्थिति में सुधार नहीं आएगा और स्थितियां नहीं बदलेंगी ?

यदि सरकार प्रशासन ये काम नहीं करते , तो स्थानीय लोगों के साथ मिल कर कोई छोटी सी स्वंय सेवी संस्था या समूह बना कर इस कार्य को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है ?


और ऐसे ढेरों सवाल हैं , जिन पर आज रुक कर सोचे जाने की जरूरत है । आप सिर्फ़ चांद पर पहुंचने की सफ़लता का सेहरा बांध कर महाशक्ति बनने का सपना पूरा नहीं कर सकते ।फ़िर तो जब भी सरकार इन योजनाओं  को बनाए , इन योजनाओं को ही कहा जाए ..कि हे योजनाओं ..जाओ गरीबों के पास खुद चल कर जाओ ..नहीं तो तुम तो चलती रहोगी ..जिनके लिए तुम्हें चलाया जा रहा है ..वे वहीं के वहीं खडे रह जाएंगे ॥

15 टिप्पणियाँ:

इन सवालों का उत्तर हमारी नौकरशाही के पास हैं। यदि जनता को यह सब पता लगे तो फिर वे क्या करेंगे। वे वास्तविक गरीबों के स्थान पर आभासी गरीब निर्मित करते हैं। इसी से मुटियाते भी हैं।

3 अप्रैल 2010 9:21 पूर्वाह्न  

"यदि ग्रामीण क्षेत्र , और ग्रामीण क्षेत्र ही क्यों शहरी गरीब आबादी को भी उनके लिए चलाई जा रही एक एक योजना, उसका लाभ उठाने का उपाय, काम नहीं हो सकने की स्थिति में उसकी शिकायत , आदि जैसी तमाम जानकारियां उपलब्ध कराई जाएं , तो भी क्या इन योजनाओं के नाम पर ये सारा गोलमाल किया जा सकेगा ?"

Ye sarkaari Bhrshth log apne pair par khud kulhaadi kyon maarenge ?

3 अप्रैल 2010 9:23 पूर्वाह्न  

भैयाजी, खुद का घर थोदे ही जलाया जाता है? इनका कुछ नही किया जा सकता. ये तो और मुटियायेगे और फ़िर जब कभी अति हो जायेगी तब फ़ूटेंगे.

रामराम.

3 अप्रैल 2010 9:51 पूर्वाह्न  

निश्चय ही आपके द्वारा उठाया गया प्रश्न काबिले तारीफ है
यहाँ मेरे विचार से इन योजनाओं के लिए ग्रामवासियों
का ऐसा संगठन हो जो निःस्वार्थ इन योजनाओं के क्रियान्वयन
के लिए जुट जाएँ कहाँ गड़बड़ी हो रही है इससे शासन को अवगत
कराये. फिर देखें कैसे नहीं होती ये योजनायें फलीभूत. पर शिष्टाचार (........) रुपी नासूर तो ग्राम पंचायत तक, ग्रामपंचायत क्या रग रग में घर कर गया है
क्या किया जाय.

3 अप्रैल 2010 9:53 पूर्वाह्न  

झा साब आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं कागज़ों पर और तो और सरकार भी आपको सिर्फ़ कागज़ो पर ही नज़र आयेगी।एक नेताजी कह गये कि सरकारी योजनाओं के लिये दिये गये एक रुपये मे से शायद,सोलह पैसे जनता के पास पंहुच पाते हैं।ये सालों पहले की बात है पता नही आजकल उतना भी पंहुच पाता है या नही।सरकारी सेवाओं के सामने निजी सेवायें न केवल खड़ी रहती है बल्कि सरकारी सेवाओं से ज्यादा सफ़ल हैं आखिर क्यों?

3 अप्रैल 2010 9:55 पूर्वाह्न  

विचारणीय विषय....हर काम केवल कागज़ पर हो कर रह जाता है...योजनाओं कि जानकारी उन तक पहुँच ही नहीं पाती जिनके लिए योजनाएं बनायीं जाती हैं...

3 अप्रैल 2010 11:47 पूर्वाह्न  

झा जी ,
कुछ भ्रष्टाचार ऐसे है समाज में जो ऐसे रच बस गए हो मनो समाज का हिस्सा हो..मैंने N . G O के लिए काम किया है ..पूरा का पूरा भ्रष्ट .
आरम्भ में मन उद्वेल्लित हुआ ,क्रोध भी आया और विरोध भी किया ...पर जब जाना की आरम्भ से अंत तक सब लिप्त है तो शांत होना पड़ा
अच्छा विषय

3 अप्रैल 2010 12:14 अपराह्न  

आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं

3 अप्रैल 2010 12:19 अपराह्न  

आपका सवाल जायज है।लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आज तक़ जो कुछ होता आया है और जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ़ कागज़ों पर है।योजनायें सरकारी और कागज़ों पर जिन के लिये बनाई गई वो गरीब भी सरकारी और रहते हैं

3 अप्रैल 2010 12:19 अपराह्न  

हमारी सरकार में सभी मुखौटे लगाकर बैठे हैं। जनता के दुख-दर्द से उन्‍हें हकीकत में कुछ भी लेना-देना नहीं। हो सका तो कल मैं आप सभी को लोकसभाध्‍यक्ष की सांसद निधि से निर्मित सड़क का हाल बताउंगा।

3 अप्रैल 2010 1:31 अपराह्न  

मुझे तो लगता है कि ये अपने मीडिया वाले महान सेनानी लोग ..यदि सानिया मिर्जा का निकाहनामा पढने से फ़ुर्सत मिले तो कभी इन सबकी भी सुध लें तो शायद दो काम एक साथ हो जाएंगे । एक तो डर के ही सही कुछ तो काम होगा ही ...दूसरा शायद तभी पत्रकारिता के असली मकसद तक पहुंचा जा सके और इसका उन्हें संतोष भी हो ...खैर ये दूर की कौडी है अभी तो ...
अजय कुमार झा

3 अप्रैल 2010 2:08 अपराह्न  

कहावत है कि" अंधा बांटे रेवड़ी मुड-मुड अपने को डे....."
सरकारी नौकरी में अंधा के साथ गूंगा-बहरा भी होना पड़ता है.....

3 अप्रैल 2010 2:55 अपराह्न  

कृषि प्रधान देश में,ये जो नौबत आई है
हमने अपने ही हाथों बनाई है ।
अन्न के भरे पड़े हैं भण्डार
फिर भी देश में भुखमरी छाई है।

अब और क्या कहें । दुःख तो होता है।

3 अप्रैल 2010 5:11 अपराह्न  

अजय जी सच कहुं तो भारत जेसा अमीर देश दुनिया मै कोई दुसरा नही, लेकिन हमारे देश को हमारे ही इन नेताओ ओर नॊकर शाही ने अंदर ही अंदर इतना घुन लगा दिया कि, लगता ह्ज़ै अब गिरा अब गिरा... अगर हमारे देश की जनता जागरुक हो जाये ओर बेकार के झंजटो मै अपना समय ना खराब करे तो भारत देश मै कोई भुखा ना सोये, सच मै फ़िर से यह सोने की चिडिया बन जाये, आप ने बहुत सुंदर लिखा काश आप जेसे लोग हर गांव मै हर देहात मै हर शहर मै हो जाये तो.... इस देश का नक्शा बदल जाये

3 अप्रैल 2010 6:51 अपराह्न  

जब तक जनता जागरूक होकर सक्रिय नहीं होती कोई कुछ नहीं हो सकता ।आओ मिलकर जनता को जागरूक करें

6 अप्रैल 2010 9:14 अपराह्न  

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