हिंदी ब्लोग्गिंग में आज जो भी हो रहा है , और उसे देख कर जो भी ब्लोग्गर्स अपने दांतों तले उंगली दबा रहे हैं , या दुख और शायद खुशी भी जाहिर कर रहे हैं , उनकी जानकारी के लिए नहीं भी तो नए ब्लोग्गर्स के लिए यहां ये बताना जरूरी हो जाता है कि अभी जिस स्थिति में हिंदी ब्लोग्गिंग को आप देख रहे हैं वो अब भी जी हां अब भी पहले से घट चुके संक्रमणकाल से बेहतर है । जी हां बिल्कुल ठीक पढा आपने मैंने बेहतर ही लिखा है । कारण क्या दूं इसका , बस इतना समझिए न कि आज जो टूट फ़ूट , रूठना मनाना आप देख रहे हैं वो तो बस एक छोटी सी बानगी भर है । अजी इससे पहले हिंदी ब्लोगजगत अपने शुरूआती दौर में ही जैसे घिनौने माहौल और गलीज़ कुत्ताघसीटी से गुजर चुका है ,उसकी तो अब कल्पना करना भी दुष्कर है । पहले तो एक दूसरे को बलात्कारी और फ़िर बात घर तक और शायद एक दूसरे की मां बहन ..छोडिए पुरानी बातें ।
इन दिनों फ़िर से एक बार लग रहा है कि हिंदी ब्लोग्गिंग धीरे धीरे एक दुष्चक्र में फ़ंसती जा रही है । हालांकि अभी कुछ समय पहले भी धर्म की व्याख्या करने वाले पंडितों और मौलवियों ने अपने पूजा और नमाज का सारा वक्त भी शायद यहीं देना शुरू कर दिया । लेकिन थोडे समय बाद ही उसका प्रभाव कम हो गया था । सबसे लोकप्रिय संकलक ब्लोगवाणी के दोबारा शुरू होने पर अब ये पूरे उफ़ान पर है । एक से एक बढ कर डाक्टर , इंजिनीयर , वैद्य हकीम , सब कमाल कमाल के शोध और उसके नतीजे परोस रहे हैं । न तो पिछली बार ही इन सबका मकसद समझ आ रहा था , न इस बार ही । कम्बखत ये भी तो नहीं बताते कि ये सब पढ कर कितने मुसलमान हिंदू बन गए और कितने हिंदू मुसलमान । या शायद मेरा ही भ्रम हो ये सब कुछ और ही साबित करने के लिए किया लिखा जा रहा हो । वैसे सच कहूं तो मैंनें इतना उच्च कोटि का धर्मशास्त्र विद तर्कशास्त्र को कभी समझने की कोशिश की भी नहीं । पहले ही देख रहा था कि जो जो ऐसी कोशिश कर रहा था वो भी अपनी मूल ब्लोग्गिंग को छोड रोज इनकी बात का जवाब ढूंढने में ही लगा हुआ है । कभी कभी तो लगता है कि हिंदी ब्लोग्गिंग में हिंदुस्तान पाकिस्तान युद्ध लडा जा रहा है । शायद समय आ रहा है कि संकंलकों से ये गुजारिश करनी पडेगी कि ...प्रभु या तो हम जैसे आम इंसानों को ही अपनी शरण में रखो .....या फ़िर इन गुणी जनों को ही पर्याप्त सम्मान दो ।
मुझे याद नहीं कि ब्लोग्गिंग के शुरूआती दिनों में कभी किसी क्षेत्र विशेष को लेकर ऐसा कुछ कहा लिखा गया हो कि फ़लाना राज्य के ब्लोग्गर्स , या कि फ़लाना समूह के ब्लोग्गर्स । मगर पिछले कुछ समय में ही देखा और पाया कि बातें निकलनी शुरू हुईं , इलाहबादी ब्लोग्गर्स , छत्तीसगढ के ब्लोग्गर्स ,लखनऊ ब्लोग्गर्स ...और जाने ही कितने । हालांकि हिंदी ब्लोगजगत , का ये एक चरित्र रहा है कि ये आभासी होते हुए भी बहुत हद तक आभासी नहीं रह पाया । और फ़िर यदि एक ही स्थान से , एक ही शहर से , एक ही राज्य से , एक ही क्षेत्र से ब्लोग्गिंग करने वाले साथी आपस में एक दूसरे से मिल गए , जानपहचान हुई और इसके बाद जो नतीजे निकले , उसीका परिणाम था ये ब्लोग्गिंग में क्षेत्रविशेष का उल्लेख होना करना , जो शायद स्वाभाविक ही था । मगर दिक्कत वहां शुरू हुई जहां से सभी ब्लोग्गर्स के अलावा भी इसी समाज के फ़ितरत के अनुरूप ही व्यवहार करने लगे , ऐसा मेरा अंदाज़ा मात्र है । छोटा सा उदाहरण ये है कि अभी हाल में श्री अनिल पुसदकर जी और ललित शर्मा जी के बीच किसी गलतफ़हमी की बात कही जा रही है , ये गलतफ़हमी शायद इसीलिए हुई क्योंकि दोनों ब्लोग्गर्स मित्र एक दूसरे से परिचित थे , यदि न होते तो शायद इस गलतफ़हमी की कोई गुंजाईश भी नहीं होती । और अनिल जी की उस टिप्पणी के विरोध में आहत होकर , नाराज होकर या क्षुब्ध होकर ललित जी ब्लोग्गिंग छोडने का निर्णय करने की बजाय कोई ठसकदार पोस्ट लिख कर उसका जवाब देते ।खैर देर सवेर तो ये गलतफ़हमियां दूर होंगी ही । मगर यहां मुझे गिरिजेश राव जी की बात ही सामने रखनी पडेगी कि , यदि दूर से ही सुंदरता बरकरार रहती है और चेहरे के दाग नजदीक आने पर ही दिखते हैं तो फ़िर चेहरों को आमने सामने लाया ही क्यों जाए ।और आज यही सबसे बडा कारण है यहां चल रही किसी भी तरह की खींचातानी का ।
अब एक और मुद्दे की तरफ़ चलते हैं । ऐसी घटनाएं जब भी घटती है तो हिंदी ब्लोग्गिंग की दशा , दिशा और भविष्य पर भी खूब चर्चा होती है । और सबसे बडी बात तो ये है कि चर्चा में सब कूदते हैं , मैं , आप और हम सब ही । मगर उस समय ये भूल जाते हैं कि आखिर ये किया धरा भी तो हमारा आपका ही है न । कहने और गिनने को तो आज हिंदी ब्लोगजगत में पच्चीसों हज़ार ब्लोग्गर्स हैं , मगर यदि लिखने पढने और टिप्पणी करने में बार बार घूम फ़िर कर वही नाम सामने आते हैं तो उसका सिर्फ़ एक स्पष्ट कारण है कि ये सभी नियमित लेखक और पाठक हैं । और जिसे गुटबाजी कहा जाता है वो सिर्फ़ इन्हीं नियमित ब्लोग्गर्स में ही है । शुक्ल जी, पांडे जी, लाल जी, झा जी, शर्मा जी , शाह जी , दूबे जी , सहगल जी , मिश्रा जी, शास्त्री जी , आदि जितने भी जी लोग हैं , वो सब बदहजमी से पीडित लोग ही असल में इसकी वजह हैं । किसी ने ब्लोग्गिंग को हिंदी सेवा होना बताया , हमें हजम नहीं , किसी को कोई पुरस्कार मिला , चाहे वो ब्लोग जगत का ही कोई पुरस्कार क्यों न हो , हमें हजम नहीं होता , किसी को किसी की चर्चा हजम नहीं हो रही है किसी को ये हजम नहीं हो रहा कि उसकी चर्चा नहीं हो रही है । और हजम न हो तो न हो , उसके लिए दवाई हमें खुद को खिलानी चाहिए । मगर न जी हम तो उसे कारण बताते हैं कि वही है हमारी बदहजमी की वजह , जबकि मूलत: हम बदहज्म लोग ही हैं । जब देखते हैं कि बात आमने सामने कहने में झिझक हो रही है , झिझक इसलिए ही क्योंकि जानते हैं न एक दूसरे को , तो फ़िर लगते हैं एक दूसरे पर कटाक्ष करने , उससे भी बात नहीं बनी तो बेनामी बन लिया जाए । तब कौन रोक सकता है अपनी बदहजमी को अपनी बदनीयती के साथ परोसने से ।
मैं सोच रहा हूं कि इधर कुछ दिनों से हिंदी ब्लोगजगत पर सबकी नजरें टिक रही हैं , सभी जानने लगे हैं कि हिंदी ब्लोगजगत में लोग क्या पढ लिख रहे हैं , और कहां कैसे किस बात पर लड भिड रहे हैं तो बेशक ही विनीत कुमार अपनी पुस्तक में हिंदी ब्लोग्गर्स का बढिया बढिया नज़रिया छाप कर विद्यार्थियों को हिंदी ब्लोग्गिंग का उजला पक्ष दिखाने का प्रयास करें । मगर असलियत में जो चल रहा है उससे कभी आलोक मेहता जैसे संपादक को हिंदी ब्लोग्गिंग का उपहास उडाने तो कभी राजीव ओझा जी जैसे स्तंभकार जी को हिंदी ब्लोग्गिंग की टिप्पणियों के मनोविज्ञान पर एक nice चपत लगाने और उससे भी ज्यादा कुछ ब्लोग्गर्स को ये कहने का अवसर तो मिल ही जाएगा कि ...लुक दिस इज योर्स हिंदी ब्लोग्गिंग , फ़िल्थी एंड स्टिंकिंग ........। अब ये तो तय हमें खुद करना है कि हमें कौन सी कैसी ब्लोग्गिंग चाहिए । मुझे इसका कोई शौर्टकट उपाय नहीं पता , न ही कोई होगा शायद । हां कुछ कोशिशें जरूर की जा सकती हैं । मसलन बन जाईये एक दूसरे से अजनबी, भूल जाईये कि आप जानते हैं किसी , यदि किसी से स्नेह , प्रेम , और यहां तक कि नफ़रत का कारण उससे पहचान भर होना है तो फ़िर यही उचित है । दूसरा और बहुत जरूरी उपाय है कि इतना लिखो , इतना लिखो ...मगर सकारात्मक , ..इतना प्यार उडेलो , इतने मुद्दे उठाओ कि ये सब अतडे पतडे ...उस सैलाब में बह जाएं या उस तूफ़ान में उड जाएं तिनके की तरह । ब्लोग परिकल्पना उत्सव जैसे प्रयासों को भरपूर समर्थन मिलना चाहिए , और ऐसे ही नए नए प्रयास शुरू किए जाने चाहिए । मैं खुद बहुत जल्द ही एक योजना की शुरूआत करने जा रहा हूं जिसमें प्रति माह एक ब्लोग्गर को उसके लेखन कार्य के लिए नकद रूप से पुरुस्कृत किए जाने की योजना पर विचार हो रहा है । सप्ताह भर की पोस्टों पर आधारित स्तंभ ब्लोग बातें भी शुरू किया जा चुका है । तो अब तय हमें खुद करना है कि हिंदी ब्लोग्गिंग का भविष्य कैसा होना चाहिए .........??????????
इत्त्दाये इशक है रोता है क्या
आगे आगे देखिये होता है क्या
dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:22 पूर्वाह्न
समसामयिक और सार्थक पोस्ट!!!
"शायद समय आ रहा है कि संकंलकों से ये गुजारिश करनी पडेगी कि ...प्रभु या तो हम जैसे आम इंसानों को ही अपनी शरण में रखो .....या फ़िर इन गुणी जनों को ही पर्याप्त सम्मान दो।"
हमें भी लगता है कि संकलकों से अब निकल ही ले।
जी.के. अवधिया ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:33 पूर्वाह्न
दुरुस्त फरमाया है अजय भाई। इन फजीहतों से ही हिन्दी ब्लॉगिंग का स्वरूप निखरेगा। वो कहते हैं न कि मंथन यानी मन के थनों से दूध रूपी अमृत पाने के लिए मथना तो होगा ही, तो यही मथना प्रक्रिया चल रही है और इसका चलना श्रेयस्कर है। सभी उपायों को अपनाकर, अच्छा अच्छा गहि रहे, थोथा देय उड़ाय। तो थोथा तभी तो उड़ायेंगे जब उसका पता चलेगा और पता चलना बिना महसूसे तो चल नहीं सकता। इसलिए महसूसना जारी रहना चाहिए अपनी पूरी रफ्तार में और इससे अधिक रफ्तार में फिर सकारात्मक नतीजे सामने आयेंगे।
अविनाश वाचस्पति ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:36 पूर्वाह्न
SHI MAYNE MAIN YE CHINTA KA WISHY HAI KI BLOGGING KE JARIYE DESH AUR SAMAJ KO EK SAHI DISHA DENE KE WJAY KHUCHH LOG ISKO TV CHANNEL KI TARAH KHUCHH BHI LIKHKAR ISKE ASAL UDDESHYON KO GALAT DISHA MAIN LE JA RAHE HAIN.BLLOGGING KO SAHI DISHA AUR UPYOG KARKE DESH AUR SAMAJ MAIN ACHCHHA BADLAW LANE KE BARE MAIN LOGON KO SOCHNA CHAHIYE.
honesty project democracy ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:41 पूर्वाह्न
टिप्पणी का जवाब टिप्पणी से देना चाहिए, ये टिप्पणियों से व्यथित होने की जगह नहीं, हमें अपने ब्लॉग पर कमेंट्स को moderate करना चाहिए
Yugal Mehra ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:42 पूर्वाह्न
तब जाके सब ठीक होने लगेगा मगर कब तक करें इंतज़ार ?
गिरीश बिल्लोरे ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:47 पूर्वाह्न
यह सब तो चलता रहा है, और चलता रहेगा… हमारी कोशिश यह होनी चाहिये कि हिन्दी ब्लॉगरों की संख्या बढ़े। संख्या बढ़ेगी तो भले ही कचरा भी बढ़े, लेकिन अच्छे ब्लॉग्स की भी तो आवक होगी…।
बहरहाल, आप पोस्ट के अक्षरों को इटैलिक से हटाकर सामान्य रखें तो बेहतर रहेगा…
Suresh Chiplunkar ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:50 पूर्वाह्न
अजय भाई बाकी सब ठीक है पर इनाम से समस्याये ही पैदा होती है. लेखन मे बिबिधिता और टीप और चर्चा से परे निरन्तर लेखन ही ब्लोग जगत को सही दिशा दे सकता है. रैन्किन्ग, टीपो की सन्खया, वाह्वाही ये सब मायावी है और गुण्वत्ता से इनका कोई सीधा सरोकार नही है.
हरि शर्मा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:54 पूर्वाह्न
मुझे समझ नहीं आता कि ब्लोगिंग में धर्म , जाति या प्रदेश की बात क्यों आ जाती है । अरे आप किसी क्षेत्र में निपुण हैं , दूसरों को अपने ज्ञान से अवगत कराइए । कोई ज्ञानवर्धक लेख लिखिए । कोई हास्य या मनोरंजक बात कर सकते हैं , तो दूसरों को गुदगुदाइये । कविता लिखिए । अपने अनुभव बांटिये ।
नेट पर एक दूसरे को नीचा दिखाने की क्या बात है। जिससे आप मिले तक नहीं , कुछ जानते तक नहीं जिस के बारे में , उस पर कीचड उछालना कहाँ की बुद्धिमानी है।
ब्लोगिंग में गुटबाजी वाली कोई बात नहीं होती । बस किसी को किसी का लेखन पसंद आता है , वो उसका प्रसंशक बन जाता है। इसमें कहाँ कोई बुराई है।
ब्लोगिंग में नकद पुरूस्कार के बजाय , सार्वजानिक रूप से सम्मानीय घोषित करना ज्यादा शोभनीय लगेगा ।
बाकि तो जैसी सब की मर्ज़ी।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:58 पूर्वाह्न
सत्य वचन...
भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:01 पूर्वाह्न
विचारणीय विषय
HTF ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:01 पूर्वाह्न
सही लिखा है।
जगदीश्वर चतुर्वेदी ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:08 पूर्वाह्न
मैं समझ सकता हूं कि आप सबने नकद पुरस्कार की बात पर कुछ शंका जाहिर की है , मगर अभी पूरी योजना बताने से अच्छा है कि सिर्फ़ इतना बता दूं कि ये सिर्फ़ नए ब्लोग्गर्स को जो विद्यार्थी और बेरिजगार होंगे उन्हें दिया जाएगा और इसकी जानकारी कहीं भी नहीं दी जाएगी , सिर्फ़ उस ब्लोग्गर तक चुपचाप पहुंच जाएगी । कोई प्रतियोगिता नहीं कोई राय मशविरा नहीं , सिर्फ़ मेरा और मेरा निर्णय होगा ।
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:10 पूर्वाह्न
झा जी नमस्कार
यह सब अहम, पद,प्रतिष्ठा, प्रतिस्पर्धा, को ही पैमाना मान लेने के कारण हो रहा है। प्रतिस्पर्धा होनी चाहिये पर एक दूसरे की टांग खिचाई कर नही। ऐसा लेख, ऐसी रचना, जो पाठक को प्रभावित करे, स्वस्फ़ूर्त वह अपनी भावना टिप्पणी के माध्यम से प्रकट करने से नही चूकेगा।
मुझे अच्छा लगता है कम से कम प्रिथक रूप से आप अपने विचार रखते हैं और लोगों की प्रतिक्रियायें आमन्त्रित करते हैं।
जय जोहार्……॥
सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:14 पूर्वाह्न
ये सब देख कर दुःख होता है...विचारणीय मुद्दा है..
sangeeta swarup ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:16 पूर्वाह्न
nice
Suman ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:24 पूर्वाह्न
भैया, आप की पोस्ट पढ़ कर महसूस हुआ कि अपना हाजमा अच्छा है। लक्कड़ हजम, पत्थर हजम। बस फुरसत हुई कि पोस्ट लिखने बैठे। जैसे चाय की चुस्की के साथ रतलामी सेव टूंग रहे हों।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
11 अप्रैल 2010 11:36 पूर्वाह्न
काफी विस्तृत लेख और आपकी चिंता के लिए शुभकामनायें अजय भाई ! ईमानदारी के साथ बैठकर कुछ करने की आवश्यकता है, मैं आपके साथ हूँ !
ब्लाग्स का जनमानस पर बढ़ते प्रभाव के कारण यह और भी आवश्यक होगया है !
सतीश सक्सेना ने कहा…
11 अप्रैल 2010 12:01 अपराह्न
इस पूरे मसले में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि कुछ भी लिखते हुए मेरे भीतर एक सेल्फ एडीटर हमेशा सक्रिय होता है और मैं उसी से प्रभावित होकर लिखता हूं,बाकी जिसको जो कहना हैं कहते रहें।..
विनीत कुमार ने कहा…
11 अप्रैल 2010 12:10 अपराह्न
हालांकि हिंदी ब्लोगजगत , का ये एक चरित्र रहा है कि ये आभासी होते हुए भी बहुत हद तक आभासी नहीं रह पाया ।
this is the root cause . you were the one who was writing so many times against my views that free hindi bloging from parivaar and social networking GOOD at last you have realised that my blog posts were right although you will never agree the way you disagreed !!! publicly
रचना ने कहा…
11 अप्रैल 2010 12:23 अपराह्न
रचना जी आप अपने विचारों के अनुसार किसी भी बात का अर्थ या अनर्थ निकालने के लिए स्वतंत्र हैं । हां मैं हर उस विचारधारा का विरोध करता रहूंगा जो हिंदी ब्लोग्गिंग करते हुए उसे ही दोयम दर्ज़े का घोषित करने पर तुला हुआ है । हो सकता है कि आपको यही एक मूल कारण लगता हो , मगर हर बार सिर्फ़ यही कारण हो ऐसा कहना ठीक नहीं है । चलिए हर बार की तरह आप सिर्फ़ अपने मतलब और मकसद की बात तलाश ही लेती हैं । और हां सार्वजनिक रूप से मानने न मानने की बात मुझे जानने वाले सभी बेहतर जानते होंगे । आखिर सभी जानते हैं यहां अजय कुमार झा को भी और रचना जी को भी । आप अपनी राय हिंदी में रखतीं तो खुशी दोगुनी होती मेरी
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 12:41 अपराह्न
यह सब तो चलता रहा है, और चलता रहेगा… हमारी कोशिश यह होनी चाहिये कि हिन्दी ब्लॉगरों की संख्या बढ़े। संख्या बढ़ेगी तो भले ही कचरा भी बढ़े, लेकिन अच्छे ब्लॉग्स की भी तो आवक होगी…।
सुरेश जी के इन शब्दों से १००% सहमत !!
Ratan Singh Shekhawat ने कहा…
11 अप्रैल 2010 1:08 अपराह्न
अजयजी,
अब सोचता हूं कि चुपचाप अपनी मन की बात रख नमस्ते कर लेता था वही ठीक था। दिनेशजी की तरह।
पर पता नहीं कैसी घड़ी थी कि एक बैठक में शिरकत कर ली। अरे ऐसे ही क्या पचड़े कम हैं जो वहां भी टांग खिचाई का दर्शक बनना पड़ रहा है। ना कभी राजनीति में पड़ना अच्छा लगता है नही गुटबाज़ी सुहाती है। यदि ऐसा ही होना है तो अपन अकेले ही भले।
Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…
11 अप्रैल 2010 1:14 अपराह्न
अजय जी आपकी चिंता तो जायज है पर यह भी ध्रुव सत्य है कि यह सब चलता रहेगा.
आदरणीय दिनेश राय जी की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत, इसी धर्म वाक्य से ब्लॉगिंग करें नहीं तो चौबीस घंटे घर परिवार व समाज के दायित्वों को छोडकर ब्लॉगिंग में ही रमें रहें, कौन क्या पोस्ट किया, कौन क्या टिप्पणी कर रहा है, किसकी रैंकिंग क्या है, कौन किसको फोन करता है आदि का हिसाब किताब रखते रहें किसी ना किसी दिन नोबेल या ज्ञानपीठ तो मिल ही जायेगा.
वैसे गगन शर्मा जी की तरह ही एकला चलो रे, मन का लिखे रे भी सर्वोत्तम है.
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
11 अप्रैल 2010 1:43 अपराह्न
रात अभी बाकी है/ बात अभी बाकी है
बी एस पाबला ने कहा…
11 अप्रैल 2010 1:47 अपराह्न
"शुक्ल जी, पांडे जी, लाल जी, झा जी, शर्मा जी , शाह जी , दूबे जी , सहगल जी , मिश्रा जी, शास्त्री जी , आदि जितने भी जी लोग हैं , वो सब बदहजमी से पीडित लोग ही असल में इसकी वजह हैं ।"
यह बेबाक राय है -
Arvind Mishra ने कहा…
11 अप्रैल 2010 1:50 अपराह्न
ज्योत्सना जी वास्तविक नाम और परिचय के साथ टीपें नहीं मिटाई जाएंगी .......
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 2:20 अपराह्न
ब्लोगिंग का स्तर बहुत नीचे जा चुका है .कवितायों के नाम पर जो मन आये परोसा जा रहा है.जो कविता किसी ब्लोगेर द्वारा पोस्ट की जा रही हैवोही किसी और के द्वारा पेश करी जाती ,और पहले पोस्ट करने वाली को पढनी पड़ती ,तो पता पड़ता की दूसरे कैसे गले से नीचे उतारते है.टिप्पणियों में वाह वाह की जगह त्राहि त्राहि प्रयोग किया जाए तो बेहतर रहेगा
.कामच्छरों ने हाय ये क्या कांड कर डाला,
अच्छे भले आदमी को भांड कर डाला....
दफ्तर की उलझने क्या पहले ही कुछ कम थीं,
गृहस्थी के बोझ ने तो हमें सांड कर डाला....
देखा जो हमने दोस्तों को तितलियों के साथ,
अपने भी दिल ने फौरन डिमांड कर डाला.......
किस्मत थी लेकिन फूटी, बीवी की पड़ी जूती,
बैठे बिठाए हमने लचांड कर डाला।
उदहारण आपके सामने है .इस पर भी बहुत सुन्दर ,वाह वाह जैसे comments मिले हैं .ये सुन्दर रचना
"सस्ता शेर "की प्रस्तुति है .
दीपक गर्ग ने कहा…
11 अप्रैल 2010 2:36 अपराह्न
Jyotsna ने कहा…
11 अप्रैल 2010 3:31 अपराह्न
विनीत ने सौ बातों की एक बात कही है...बस हम अच्छे सेल्फ एडिटर बने रहे...दूसरों की फिक्र छोड़ बस खुद को ही हमेशा वॉच करें...ब्लॉगिंग में क्या हो रहा है...अर्श पर जा रही है या फर्श पर...इससे क्या लेना-देना...अगर हर ब्लॉगर अपने पर नियंत्रण रखेगा ब्लॉगिंग खुद ही बेहतर हो जाएगी...
एक बात और, हिंदी ब्लॉगिंग में अंग्रेज़ी का क्या काम है...ये क्या विद्वतता झाड़ने के लिए होता है...ये तो समझा जा सकता है कि आप हिंदी में अपनी बात को सुविधा अनुसार रोमन लिपि में तो लिख सकते हैं...लेकिन शुद्ध अंग्रेज़ी में अपनी बात हिंदी ब्लॉगिंग में कहना मेरी समझ से परे है...अरे भाई फिर आप के लिए अंग्रेज़ी ब्लॉग्स का रास्ता खुला है न, वहीं जाकर जी भर कर अपनी बात कहिए...शायद वहां आपकी बात लोगों को समझ आ जाए...
जय हिंद...
खुशदीप सहगल ने कहा…
11 अप्रैल 2010 3:42 अपराह्न
"मेरा कोई ब्लौग नहीं है इसलिए मैंने अपने ब्लौगर प्रोफाइल को सार्वजनिक नहीं किया हुआ है! "
ज्योत्सना जी आपने खुद माना है कि आप ब्लोग्गर नहीं हैं , बिना ब्लोग वाले ब्लोग्गर से हिंदी ब्लोग्गिंग के बारे में सुनना कहना , कुछ अलग ही अनुभव है ये तो । रही बात आलोचना की तो खुशी से करिए .मेरी कही बातों की ..मेरी नहीं । भाषा का मान रखिए और अपना भी ..और मेरे यहां टिप्पणी मोडरेट नहीं की जाती है . या रहने दी जाती है या मिटा दी जाती हैं । रही बात उंगली उठाने की ....तो वो दुनिया में सबसे आसान काम है ....हा हा हा ..इसके लिए इतने नकाब की जरूरत नहीं है ।आपने जो काम अपने जिम्मे लिया हुआ है जैसा कि आपके पिछले कुछ टिप्पणियों से जाहिर हो रहा है ..उसके लिए आपको ये ढकाव छुपाव करना ही पडता है मैं समझ सकता हूं । मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 3:45 अपराह्न
बस हम अच्छे सेल्फ एडिटर बने रहे...दूसरों की फिक्र छोड़ बस खुद को ही हमेशा वॉच करें...ब्लॉगिंग में क्या हो रहा है...अर्श पर जा रही है या फर्श पर...इससे क्या लेना-देना...अगर हर ब्लॉगर अपने पर नियंत्रण रखेगा ब्लॉगिंग खुद ही बेहतर हो जाएगी...
Jha ji namashkar.
Tarkeshwar Giri ने कहा…
11 अप्रैल 2010 4:06 अपराह्न
nice post ..........
soni ने कहा…
11 अप्रैल 2010 5:20 अपराह्न
.
.
.
Arvind Mishra ने कहा…
"शुक्ल जी, पांडे जी, लाल जी, झा जी, शर्मा जी , शाह जी , दूबे जी , सहगल जी , मिश्रा जी, शास्त्री जी , आदि जितने भी जी लोग हैं , वो सब बदहजमी से पीडित लोग ही असल में इसकी वजह हैं ।"
यह बेबाक राय है -
आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,
हमें काहे लपेटे हैं यहाँ ? सच बोल रहा हूँ... सर्वभक्षी हूँ और हाजमा दुरस्त है।. . . :)
प्रवीण शाह ने कहा…
11 अप्रैल 2010 5:32 अपराह्न
Jyotsna ने कहा…
11 अप्रैल 2010 5:39 अपराह्न
ज्योत्सना जी चाहता तो पुन: आपकी इस टिप्पणी को क्षण भर में मिटा देता , क्योंकि मुझे लग रहा है कि आप अपने आदत के अनुरूप पोस्ट को कहीं और ही खींच कर ले जाने के प्रयास में हैं । मुझे अपनी छोटी सोच के साथ ही रहने दें , टिप्पणी के लिए धन्यवाद आपका । मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि आप जैसे छद्मनामधारी सिर्फ़ हिंदी ब्लोग्गिंग और हिंदी ब्लोग्गर्स का attitude , उनकी मानसिकता जैसी बातों को ही कैसे इतनी "अच्छी तरह भांप लेते हैं । सब नकाब का प्रताप है शायद । चलिए कोई बात नहीं आपको यही करना है ..तो कोई क्यों रोकेगा भला । शुक्रिया आपका
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 5:55 अपराह्न
जो आज है, वही कल था और वही कल रहेगा. मात्रा बढ़ सकती है, गुणवत्ता का प्रतिशत इधर उधर हो सकता है मगर स्थितियों में यदि आपको लगता है कि कोई बदलाव आयेगा तो यह मात्र दिवा स्वपन है.
राम राज की स्थापना की घोषणा या आगमन की प्रतिक्षा, मात्र आज की परेशानियों को झेल जाने के तरीके और उपाय हैं और कुछ नहीं. क्या पता कभी ऐसा था भी कि नहीं या फिर राम राज भी एक कल्पना ही रही हो शुरु से इस उपाय बाबत.
समाज में हमेशा से अच्छे और बुरे लोग रहे हैं, उदासीन और तटस्थ लोगों को भी कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ माना गया है. आप चाहो तो जेलों में जाकर अपराधियों को देख कर उन्हें समाज मान लो, संसद में नेताओं को देखकर उन्हें समाज मान लो, फिल्मी कलाकारों/ उद्योगपतियों को देखकर, उनकी बाहरी चमक दमक को समाज मान लो या फिर हिमालय की कंदराओं में बसे ऋषि मुनियों को देख उन्हें समाज मान लो या रोज दो वक्त की रोजी रोटी के लिए मशक्कत करते लोगों को देख उन्हें समाज मान लो, जो इच्छा हो सो मानों, मगर हैं सभी इसी समाज के हिस्से. पहले भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे.
जो है, जैसा चल रहा है, सब वैसा ही चलेगा. अच्छा देखना चाहते हैं तो वो भी है. बुरा देखना चाहते हैं तो वो भी है. क्या आभासी और क्या वास्तविक-जब दोनों समाज के निर्माता वही लोग हैं तो फिर किस बदलाव की उम्मीद.
निश्चिंत रहिये, गतिमान रहिये और अपने हिसाब से समाज के उस हिस्से से साबका रखिये जिसे आप मान्यता देते हैं और जो आपको भाता है. सभी स्वतंत्र हैं. कब किसको रोक पाईयेगा. खुद पर ही जोर है, उसे बस चलाईये. वही व्यवहारिक है और उचित भी. बाकी तो समझाईश दी जा सकती है, निवेदन किये जा सकते हैं, प्रवचन किये जा सकते हैं मगर बदलता कुछ नहीं. बस, एक संतोष सा मिल जाता है वो भी क्षणिक!!
अच्छा आलेख समयोचित, अतः बधाई.
अनेक शुभकामनाएँ.
Udan Tashtari ने कहा…
11 अप्रैल 2010 6:22 अपराह्न
स्वभाव के विपरीत कुछ ज्यादा ही लम्बी टिप्पणी कर दी, क्षमाप्रार्थी.
Udan Tashtari ने कहा…
11 अप्रैल 2010 6:23 अपराह्न
grow up mr ajay and try to blog without the barriers of hindi english gender etc
no one in hindi bloging is capable of promoting hindi all are just using this platform to make socail connections so why not accept it
रचना ने कहा…
11 अप्रैल 2010 6:26 अपराह्न
ऐसा लगता है द्वैत का सिद्धांत झुठलाया नही जा सकता.
रामराम
ताऊ रामपुरिया ने कहा…
11 अप्रैल 2010 7:05 अपराह्न
बिलकुल ही निरर्थक पोस्ट है
कोई मतलब नहीं है इन बातों का
यह तो ठीक वैसा ही है जैसे मेरे परदादा और दादा कहते थे कि घोर कलियुग आ गया है ...फिर मेरे पिता जी कहने लगे- घोर कलियुग आ गया और मैं कहता हूँ कि घोर कलियुग आ गया है.
अपनी गिरहबान में कोई झांकना नहीं चाहता
जिस दिन झांकना शुरू कर देंगे, सारी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी.
shivendra sinha ने कहा…
11 अप्रैल 2010 7:11 अपराह्न
ब्लागजगत हमारे समाज का प्रतिबिम्ब है. यहाँ वही सब कुछ घटता है जो समाज में. विसंगतियाँ वहाँ भी हैं विसंगतियाँ वहाँ भी है. गाली-गलौज वहाँ भी है यहाँ भी. आतंकवाद वहाँ भी ----. तात्पर्य यह कि जिस तरह हम समाज में अपने कद के लिये संघर्षशील रहते है यहाँ भी रहना होगा. आप सरीखे लोग जो इसके लिये चिंतित है साधुवाद के पात्र हैं. हर कदम पर हम आपके साथ है. पर यह मुद्दा जारी रहेगा और हम इसका प्रतिकार करते हुए अपना रचनाक्रम जारी रखें यही श्रेयस्कर होगा.
M VERMA ने कहा…
11 अप्रैल 2010 7:14 अपराह्न
सुरेश चिपलूनकर जी, भाई अविनाश वाचस्पति, से सहमति मगर रचना जी के सिर्फ एक बात के साथ की ब्लॉग को पढना और उस पर टिपियाने के लिए ब्लोगर होना अनिवार्य नहीं. नि:संदेह यहाँ कोई भी सेवा भावना से नहीं आया. मगर सामाजिक चेतना में ब्लॉग अगर एक भूमिका में है तो स्वीकार्य होना चाहिए. अविनाश जी ने सही कहा कुछ तो अमृत आएगा ही, याद है हिन्दी युग्म में किस तरह से हिन्दी के प्रकांड (स्वयं भू) राजेन्द्र यादव ने हिन्दी को जलील किया था. वहीँ कुछ महिला भी महिला आयोग की तरह हिन्दी ब्लॉग को अपने निहित के लिए किस कदर अपनी महत्वाकांक्षा को परवान चढ़ाती हैं, इन सब से इतर क्या हिन्दी इन ब्लॉग और ब्लोगरों से समृद्ध हो रहा है?
उत्तर कुछ भी हो हिंदी लेखनी या कोई अन्य भाषा लाखों की तादाद में आये तो उन में से अमृत जरूर निकलता है. आज हिंदी ब्लॉग की ठेकेदारी कुछ चुनिन्दा ने ले रखी है की फलां ब्लॉग हो या फलां ब्लोग्गर सबसे बेहतर या शीर्ष पर है या बेहतर है मगर ये कहने वाले या देने वाले पत्रकारिता की मानसिकता वाले वो ही लोग हैं जहाँ बेहतर लेखनी के बावजूद एक प्रशिक्षु को एडिटर दुतकारता रहता है भले ही वो दो टेक का पत्रकार हो.
इन सारी भावना से इतर क्या ब्लॉग सिर्फ और सर एक सामाजिक चेतना नहीं हो सकता?
अनुत्तरित हूँ और इन भगदड़ से इतर अपने कार्य में लगा हुआ हूँ,
रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…
11 अप्रैल 2010 8:01 अपराह्न
रचना जी , मुझे जरूरी तो नहीं लगता कि आपके प्रश्नों का उत्तर हर बार आकर दूं मगर अब चूंकि आप मेरे ही ब्लोग पर आकर अपनी जिज्ञासा जाहिर कर बेफ़िक्र होकर चली जाती हैं , बेफ़िक्री इसलिए कि मैं आपकी तरह अपने ब्लोग पर आपकी टिप्पणी को छपने से नहीं रोकता हूं , किसी की भी नहीं रोकता , मगर जो प्रश्न यहां खुशदीप जी ने उठाए उसे भी आपने मेरी तरफ़ ही मोड दिया है ?
रही बात सामाजिक संबंधों को बनाने के लिए ब्लोग्गिंग करने की , तो जाहिर है कि जो समाज में रहेगा उसके संबंध भी बनेंगे ही फ़िर चाहे तो अंतर्जाल पर हो या बाहरी दुनिया में । इसमें आपत्ति कैसी हां सिर्फ़ और सिर्फ़ एक यही वजह है हिंदी ब्लोग्गिंग की मुझे कम से कम ऐसा नहीं लगता , वैसे भी इन संबंधों के बल पर किसने भारत का प्रधानमंत्री बन जाना है । खैर आप अपनी बात कहती रहें स्वागत है और हां वो छपेंगी भी ...
उडन जी , चलिए अच्छा है कि आपको अपनी राय खुल कर कहने के लिए ये पोस्ट कोई कारण बनी ।
सिन्हा जी , अपनी राय से अवगत कराने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया , आपको पोस्ट निरर्थक लगी , माफ़ी चाहता हूं । आप यकीनन इस बत को मुझ से बेहतर कह सकेंगे , इसका विश्वास है मुझे , साथ और स्नेह बनाए रखें । शुक्रिया ,
इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है कि इस पोस्ट को नापसंद करने वालों की संख्या पसंद करने वालों से अधिक है ..यानि कम से कम मैं अपनी बात बेबाकी से कह गया । चलिए आज इसी बात का संतोष रहेगा
अजय कुमार झा ने कहा…
11 अप्रैल 2010 8:12 अपराह्न
मैं तो इस बात की बिलकुल टेंशन नहीं लेता...
रंजन ने कहा…
11 अप्रैल 2010 8:29 अपराह्न
अरे अजय बिटवा, ई नापसंद करने वालों को नही जानते का? येही लोग तो नंगा नाच कर सब माहोल खराब किये हैं. अऊर ई ज्योत्सना को नाही जानते का? जरा फ़ुरसतिया को पूछो.
बहुत अच्छे लिख रहे हो. लिखते रहो. इन हलकटों कि परवाह मत करो.
-अम्माजी
अम्मा जी ने कहा…
11 अप्रैल 2010 8:40 अपराह्न
(1) छ्ल दम्भ द्वेष पाखंड झूठ अन्याय से निश दिन दूर रहें
जीवन हो सत्य सरल अपना नित प्रेम सुधारस बरसावें।
(2) हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें
दूसरों पर जय से पहले खुद पे जय करें।
देर से आया और ये प्रार्थनाएँ याद आने लगीं। मुझे प्रार्थनाएँ बहुत अच्छी लगती हैं भले ईश्वर को न मानूँ।
@ all are just using this platform to make socail connections - आइ स्ट्रॉंगली ऑब्जेक्ट टू दिस स्टेटमेंट योर ऑनर !
(देवनागरी में अंग्रेजी क्यूट लगती है ! Isn't?:))
आप ने यह लेख लिखा। शत शत साधुवाद। ठेंगे नीचे हों या ऊँचे - बाकी चार अंगुलियाँ हमेशा विपरीत दिशा में रहती हैं। इसलिए उनका टेंशन नहीं लेना का, क्या !
गिरिजेश राव ने कहा…
11 अप्रैल 2010 9:59 अपराह्न
संक्रमण बदल गया
आक्रमण में
और
पता नहीं लगा
वैसे लग भी जाता
तो क्या कर लेते
हम, आप दमदार हो
हमें स्वीकार है
चना कोई भी हो
अब भाड़ फोड़ सकता है
मंथन करें
तो दुग्ध प्राप्ति हो सके
या हो अमृत प्राप्ति
पर यहां पर तो
हो रही है टिप्पणी प्राप्ति
पर मंथन भी चल रहा है
साथ साथ
वाह, क्या है बात ।
सब सकारात्मक हैं
हम भी सकारात्मक हो जाएं
पब्लिकसिटी है यहां पर
तभी तो होती है पब्लिसिटी
इसलिए हम भी चले आए।
हमें पब्लिक बहुत भाती है
चाहे अंग्रेजी की हो
या हो हिंदी की
गुजराती की हो
या मराठी की
पर चालाकी की न हो
चालाकी हमको
छमछम कर जाती है।
चाहे हो आभासी
सबको सदा लुभाती है
जैसे गर्मियों में
आईसक्रीम ठंडा कर जाती है।
अविनाश वाचस्पति ने कहा…
11 अप्रैल 2010 10:15 अपराह्न
अजय जी, ब्लोगिंग पर इतनी गहराई से सोचता नहीं हूँ कभी पर आपकी बातों से काफी हद तक सहमत हूँ.
@रचना जी
"no one in hindi bloging is capable of promoting hindi all are just using this platform to make socail connections so why not accept it"
I strongly disagree with your statement. But at least it implies your acceptance that you are blogging with this purpose.
सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…
12 अप्रैल 2010 12:27 पूर्वाह्न
झा साब इस मामले में मैने सोच रखा था कि कुछ नही कहूंगा,मगर देख रहा हूं हर कोई लिखे जा रहा है बिना जाने के हुआ क्या और नही किसी ने जानने की कोशिश की।वैसे एक -दूसरे को आये दिन फ़ोन लगाते हैं लेकिन इस मामले मे किसी ने किसी से बात नही की।दो लोगों ने इस मामले मे फ़ोन किया बस्।और इस मामले से जिस्का लेना-देना नही वो लिखता चला गया,बस दो लोग खामोश रहे जिनके बीच का मामला है।लिखने को बहुत कुछ है और ज़रूरत पड़ी तो लिखूंगा भी ज़रूर्।
Anil Pusadkar ने कहा…
12 अप्रैल 2010 12:28 पूर्वाह्न
"शुक्ल जी, पांडे जी, लाल जी, झा जी, शर्मा जी , शाह जी , दूबे जी , सहगल जी , मिश्रा जी, शास्त्री जी , आदि जितने भी जी लोग हैं , वो सब बदहजमी से पीडित लोग ही असल में इसकी वजह हैं ।"
ही ही ......अबकी बार तो हम बच गए !
आगे क्या होगा कालिया ? ई लिस्टवा तो बहुते लम्बी होत जा रही है !
प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…
12 अप्रैल 2010 1:11 पूर्वाह्न
जो मैं देखूँ आपना..
हम अपन ढेढर त देखबै ने कईलि, बऊआ
तॅ रऊआ जानि के ईहाँ दोसर के ढेढर देखे काहाँ जाऊ ?
डा० अमर कुमार ने कहा…
12 अप्रैल 2010 2:28 पूर्वाह्न
झाजी, आपका हर अछरवा आपय की तरह गिरा हुआ काहे है !
अरे प्रभु सीधा लिखिए, वह पढने में अधिक सरल होता है, और यदि कलाकारी दिखानी ही थी तो शब्दों का रंग नीला या कोई और... परन्तु गहरा कर सकते थे, वैसे आप विद्वान हैं, हमारी तो बस सलाह थी.
लेख पढ़े आपका....[ अहसान मानिए हमारा :) ] अच्छा लिख लेते हैं, लिखते रहिये.
हा हा हा
अरे झा जी, बस अंखिया मूँद लीजिये उधर से... करने दीजिये उनको दन्द-फन्द.....हम अपनी तलेंगे......दुनिया तो देख ही रही है...... हम सब आपके साथ हैं.....उन पाखंडियों को पढ़ने भी कोई जरूरत नहीं है......क्यों उधर जाइए ही....कई बार हम गए...सोचे कि कुछ कह दें पर अपनी हिन्दुता (सहिष्णुता) की लाज रख चले आये...अब समझ चुके हैं उन्हें, इसलिए उधर जाते ही नहीं.
अब उन हरामखोरों को पढेंगे तो झा जी को कौन पढ़ेगा.
झा जी, हम सदैव आपके थे, हैं और रहेंगे..... पर कभी कह नहीं न पाए.....ल्यो आज कहे देते हैं, कौनो देर भई है का !!
ई-गुरु राजीव ने कहा…
12 अप्रैल 2010 4:36 अपराह्न
ई गुरू ....प्रणाम । न तो अक्षर गिर हुए हैं न हम ..दरअसल वे उतने ही टेढे हैं जितने हम भी असलियत में हैं । अब गिरने वाली विशेषता तो आप ही बेहतर जान सकते हैं ..आखिर आप ई गुरू हैं ...ऊ गुरू भी नहीं ..अ...और हम ठहरे चेले टाईप प्राणी ..न ई न ऊ ....अब केतनो कलाकारी करेंगे तो आप जित्ते बडे कलाकार थोडी कहलाएंगे गुरू जी । हा हा हा हा हा हा ..देखिए तो हंसी ठीक है न ...या इसमें भी सुधार की जरूरत है .....
आप सदैव साथ रहिए ...हमें विश्वास है कि आपकी कोशिश के बावजूद हम उतने गिर नहीं पाएंगे ..जितनी कि आपको अपेक्षा है ....आखिर कौन सा शिष्य आज तक गुरू की अपेक्षा पर पूरा उतर आया है ..फ़िर आप तो ई गुरू हैं ...वैसे आजकल गुरूओं और बाबाओं के ग्रह कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं प्रभु ....कुछ सुधार के उपाय बताएं ....यदि प्रतियोगिता परीक्षाओं से फ़ुर्सत मिल गई हो तो ..। साथ बनाए रखिएगा ....
अजय कुमार झा ने कहा…
12 अप्रैल 2010 7:31 अपराह्न
रचनात्मक लेखन जारी रखें इसी मे हिन्दी ब्लॉगिंग का भविष्य है ।
शरद कोकास ने कहा…
12 अप्रैल 2010 9:03 अपराह्न
किसी भी अग्रीगेटर पर जाकर पोस्ट पढ़ना बंद का दीजिए (जैसे मैंने कर दिया है), सब भला हो जाएगा.. :)
जो कोई नया ब्लॉग दिखे तो कुछ लेख पढ़िए और पसंद आने पर किसी फीड रीडर से जोड़ लीजिए.. कभी भविष्य में वह बकवास करने लगे तो बस वहीं से चलता कर दीजिए..
वैसे यहाँ कमेन्ट पढ़ कर उस बात पर खुशी हो रही है जिस पर आपको आपत्ती है.. किसी ऐसे का कमेन्ट आना जो ब्लोगर नहीं हैं..
PD ने कहा…
13 अप्रैल 2010 2:12 पूर्वाह्न
झा जी, आपने बहुत अच्छा और विस्तार से लिखा है लेकिन मेरी राय में हमें अपना ध्यान अपने रचनाकर्म पर केन्द्रित रखना चाहिए. जिन बातों की आप चर्चा कर रहें हैं उनका कोई स्पष्ट उपचार नहीं है.
और दूसरी बात, यदि आप यह चाहते हैं की केवल ब्लौगर और सनामी ही ब्लौग पर प्रतिक्रिया दें तो आपका आग्रह अनुचित है. आखिर आपने आदरणीय अम्माजी को भी तो कमेन्ट करने की आजादी दी है.
निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…
13 अप्रैल 2010 11:44 पूर्वाह्न
ajay ji aapne bahut accha lek likha hai .. jo kuch ho raha hai , use padhkar aur jaankar acha nahi laghta hai ... hum sirf itna soche ki , hum sab sirf ek hi dhaage se jude hue hai ..jiska naam hai hindi aur isi hindi ke sahare hamne dost banaye hai blogjagat me .... dushmani ke liye koi jagah hi nahi bachti hai ... isliye meri to namr vinanti hai sabhi bloggers se ki aao , haath milaye aur hindi ka kaarya aage badhaaye aur saath me dosti ka chaunk lagaaye aur ji bhar kar sirf aur sirf dost banaaye ............
ameen
aabhar
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
Vijay Kumar Sappatti ने कहा…
13 अप्रैल 2010 2:33 अपराह्न
प्रिय पीडी और प्रिय निशांत जी आप जिसे ब्लोग्गिंग के लिए अच्छा कह रहा हैं वो बात उतनी भी सीधी नहीं है जितनी दिख रही है । प्रिय निशांत जी आपने शायद गौर से देखा नहीं कि अम्मा जी का एक ब्लोग मौजूद है और ज्योत्सना का नहीं । और हां ये कतई न समझें कि ये कोई ऐसा पाठक पाठिका है जो ब्लोगजगत से दूर स्वतंत्र है .....यही तो बडी बात है कि ...ये उतना ही नकाबपोश है ...खैर छोडिए । अम्माजी की टिप्पणी भी सिर्फ़ इसलिए रहने दी गई है क्यों कि उस टिप्पणी ने अपनी सीमा रेखा को नहीं लांघा है । मेरे लिए दोनों ही एक जैसे हैं ...मगर फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि ..एक ब्लोग धारी ्नकाब पोश है ..दूसरा नकाबधारी ब्लोगग्गर ...
अजय कुमार झा ने कहा…
13 अप्रैल 2010 6:29 अपराह्न