बुधवार, 29 अगस्त 2018

जयपुर , उदयपुर , माउंटआबू वाया रोड (यात्रा संस्मरण -भाग 1 )





मैं आदतन घूमने का शैकीन रहा हूँ | करूँ भी क्या पिताजी फ़ौजी थे सो उनके साथ लगभग आधा भारत घूम लिया और फिर जब अपनी बारी आई तो प्रयोगी परीक्षाओं के कारण जो बाक़ी रही सही कसर थी वो भी पूरी हो गई | बीच में नौकरी की वयस्तता और उसके बाद बच्चों के छोटे होने के कारण यात्राओं में होने वाली कठिनाइयों ने थोड़े दिनों के लिए इस रफ़्तार को कम कर दिया | मगर पिछले कुछ वर्षों से हमने तय कर लिया की चाहे जो भी हो समय निकाल कर हम निश्चित रूप ने प्रति वर्ष कम से कम दो नए स्थानों पर तो घूम कर आएंगे ही | 

अंतर्जाल पर सक्रियता और उन्नत तकनीक की सहायता से पिछले एक दशक से देखा सुना सब कुछ सहेज लिया गया है | मेरी एक दूसरी आदत ये है कि , सफर में यात्रा छोटी से छोटी करने की मित्रों की आदत से विपरीत मैं यात्रा को लंबा (संभव हो तो सिर्फ और सिर्फ सड़क मार्ग से ) करने में यकीन रखता हूँ | मुझे नए रास्ते , नए गाँव , नए कस्बे  , नए शहर , लोग , संस्कृति ,भाषा ,खानपान को जानने समझने में बहुत आनंद आता है | 

इस बार हमने रुख किया जयपुर (जहाँ मेरा  सहोदर अनुज रहता है व मेरा भी एक दूसरा आवास है , के कारण मेरा आना जाना लगा रहता है ) और उसेक बाद उदयपुर और माउंटआबू का सात दिन का भ्रमण | गाड़ी व उदयपुर माउन्ट आबू में ठहरने का प्रबंध पहले ही कर लिया गया था | 

सो हम तड़के ही निकलने को तैयार थे ,मगर हमारे चालक साथी दुर्गेश जब हमें लेने पहुंचे तो रात को सर्विस कराई गयी गाड़ी निवास पर आते ही दिक्कत करने लगी | खैर जैसे तैसे हम लगभग १० बजे दिल्ली की सीमा से बाहर हरियाणा में प्रवेश कर चुके थे | गुड़गांव के आधुनिक शहर और उसमे तेज़ी से विकसित कंक्रीट के चमकदार जंगलों से बाहर निकले तो हवा ने सुकून और ताज़गी का एहसास कराया | अब आदतन मेरा मोबाइल और उसका कैमरा अपनी हरकत में आ चुके थे | दुर्गेश द्वारा यात्रा के लिए सहेजी गयी गानों की पूरी बरात में से कुछ सफर पर हमारे सफर के लिए चल चुके थे | 


जयपुर से पहले मिले टोल नाके पर दिखी ये प्यारी सी मैना जो दिल्ली और आसपास की मैना से काफी अलग दिख रही थी | ट्रकों बसों के नीचे मज़े से सड़क पर चहलकदमी बता रही थी कि ,ये इसका रोज़ का काम था 



चाहे जो भी राष्ट्रीय राजमार्गों की स्थति पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से सुधरी है | कभी सिर्फ एक सड़क होने के कारण लगते घंटों के ट्रैफिक जाम से निजात दिलाती दो तरफ़ा लेन वो भी काफी चौड़ी और एकदम सपाट | 




सेल्फी के भयंकरतम जमाने में भी हमें आज तक सेल्फी लेना नहीं आया मगर बिटिया बुलबुल की फरमाइश पर ये भी चलता रहा साथ साथ | 



लगभग तीन बजे के आसपास हम अपने जयपुर के सिर्फ रात भर के इस ठिकाने होटल रॉयल व्यू (जो जलमहल के काफी पास है ) पर पहुँच चुके थे | यहाँ रात्रि विश्राम के बाद सुबह उदयपुर के लिए निकलना था | शाम को अनुज से मिलना भी था जो अभी अपने कार्य में व्यस्त थे और दूर थे | 



जयपुर की यात्रा के संस्मरण आप यहां , यहाँ , यहाँ ,यहाँ पढ़ सकते हैं | समय बिताने के लिए हवामहल और उसके आसपास की सैर हो गयी | यहां पार्किंग की समस्या है सो हमारे चालक दुर्गेश हमें यहाँ घूमने की हिदायत दे वहीं पास ही गाडी पार्क करने चल दिए 




हवामहल परिसर में स्थित एक विद्यालय में लगी भारत माता की तस्वीर 


हम वहाँ से निकलने को हुए तो दुर्गेश भाई ने बताया की सर गाड़ी फिर खराब हो गयी है | सफर का पहला ही दिन और गाड़ी का दूसरी बार खराब होना जहां मुझे एक पल को चिंता में डाल गया वहीं श्रीमती जी का क्रोध अब सातवें आसमान पर था | मैं मन ही मन उस गरीब की खैर मनाने लगा क्यूंकि मुझे पता था की अब आसमान उसके सर पर ही फटना है | लगभग एक घंटे तक प्रतीक्षा के बाद हम ऑटो से ही आगे को निकल लिए | 


जलमहल थोड़ी दूर ही था सो वहीं चल कर थोड़ी देर और बिताने का कार्यक्रम बना , अनुज शहर से दूर थे और हम मजबूर थे सो वापसी में ही रुक कर सबसे मिलने की हिदायत अनुज द्वारा मिली 



जलमहल के आसपास बहुत ही गंदगी फ़ैली हुई रहती है सरोवर भी दूषित पानी का ढेर 


निर्जन और सूना पड़ा जलमहल सांझ को जगमगा उठा 
बिटिया बुलबुल 


वापस लेने पहुंचे दुर्गेश जी की अच्छी मलामत हुई और इस आश्वासन के बाद की सुबह तक दूसरी गाड़ी आ जाएगी और उसी से आगे का सफर जारी होगा | भुनभुनाते हुए श्रीमती जी ने उसे जीवनदान दे दिया | 


रात को जगमगाता जलमहल 



होटल का सारा इंतज़ाम , कमरे , खाना पीना व सहायक मित्र स्टाफ सब बहुत ही आरामदायक था | अपने मित्र ,साथी व घूमने फिरने के सभी लोगों को हम निश्चित रूप से इस होटल के लिए अनुशंसित करेंगे



सुबह नाश्ते के बाद उदयपुर के लिए निकलना था जो पूरे दिन का सफर था 

साथ चलने वाले

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