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आखिर किस शहर में है ये खूबसूरती और सकून


जब भी अपने आसपास की खबरों पर नज़र डालता हूं तो देखता और पाता हूं कि हमेशा ही जिस समाज की , उसमें हो रहे बदलावों की , वो अपनाए जा रहे चलनों की बात होती है तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ शहरी समाज तक ही सीमित होकर रह जाती है । सब कुछ जैसे शहरों में ही घट रहा हो , वहीं पर रह रहे लोगों मात्र का ही अस्तित्व हो जैसे इस देश में , इस समाज में इससे परे कहीं कुछ भी नहीं हो रहा है । और शहरों में भी त सब कुछ जैसे एक मशीनी ढर्रे पर ही चलता है ।वो चाहे किसी परिवार की दिनचर्या हो या किसी अपराध की बात हो या किसी दुर्घटना की , देख सुन कर तो यही लगता है , अरे ये तो अभी बस अभी कुछ देर पहले , कुछ दिन पहले ही तो घटा था । इतना ही नहीं कमोबेश यही हाल यहां मनाए जा रहे त्यौहारों , उत्सवों , और निजि दावतों का भी है । किसी भव्य स्थान पर बनावटी पंडालों और मसालेदार लजीज़ खानों के बीच सभी पुते हुए चेहरे , दुकान से कोई उपहार खरीद कर और उस पर जबरद्स्त सी एक कृत्रिम मुस्कुराहट की पैकिंग करके पकडाते हुए ऐसे लगते हैं , मानो जैसे आप सुबह उठ कर रोज नित्य क्रिया से निवृत्त हो रहे हों । यहां सब कुछ वही होते हुए भी वही नया है , वही खबर है , वही चलन है , वही फ़ैशन है । मगर क्या सचमुच ही ही बस यही है देश , यही है समाज है ।

मेरे मोबाईल से ,गांव में लगे हुए एक साप्ताहिक हाट की फ़ोटो


      बेशक आज ग्रामीण क्षेत्र की आधी से अधिक आबादी अनेक कारणों से शहर की ओर पलायन कर चुकी है । बेशक कभी सुदूर देहात कहलाने वाले गांव कस्बे भी अब बहुत से नए साधनों और संसाधनों से लैस होकर छोटे नगर का रूप धारण कर चुके हैं । इसके बावजूद भी अभी भी गावों में भारतीय परंपरा, संस्कार, अपनापन , आपसी सहभागिता का जो स्थायित्व बना हुआ है वो ही असली भारत की पहचान है । बेशक आज भारत इस बात पर इतराए कि उसने अपने दम पर चांद पर अपना कदम रख दिया है मगर भारत की असली उपलब्धि तो यही होगी कि सवा अरब की जनसंख्या को खिलाने पिलाने लायक अन्न जल उसके पास मौजूद है । और यदि ऐसा संभव है तो ये सिर्फ़ ग्रामीण समाज में रह रहे उन किसानों , उन श्रमिकों के कारण ही है जिन्हें आज के इस आधुनिक शहरी समाज ने अपने पीछे उपेक्षित छोडा हुआ है । इतना ही नहीं आज जिस प्रदूषण को बढते हुए चुपचाप शहरी समाज देख रहा है और इसके बाद भी उसमें वृद्धि के लिए जिम्मेदार बन रहा है , यदि वो अब तक पूरे शहरों को लील नहीं गई है तो वो सिर्फ़ इसलिए कि आज भी हर साल गावों में सैकडों पेड पौधे लगाए जाते हैं । आज जो भी हरी सब्जियां ,और  जो मौसमी फ़ल स्वाद ले ले शहर के लोग खा रहे हैं वो सब उसी ग्रामीण समाज की बदौलत है ।

डा. अनीता कुमार जी के ब्लोग से साभार

इस समाज की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है । किसी भी समाचार माध्यम , किसी भी स्वयंसेवी संस्था ,किसी बडे अधिकारी , मंत्री को आज फ़ुर्सत नहीं है कि वो इनके लिए कुछ सोचे करे भी । और तो और जरा इस तथ्य पर नज़र डालिए । पिछले दिनों जब कुछ चिकित्सकों से कहा गया कि उन्हें अपनी सेवा का थोडा सा कार्यकाल ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी देना होगा तो उन्होंने उससे बेहतर त्यागपत्र देना समझा ,और दे दिया । ग्रामीण क्षेत्र में आज जिस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है वो है , शिक्षा और चिकित्सा  की समुचित व्यवस्था । सबसे दुखद बात तो ये है कि आज उनकी उपेक्षा वो भी कर रहे हैं जो वहां से निकल कर यहां बडे बडे महानगरों की चकाचौंध में कहीं खोए इतराए फ़िर रहे हैं । आज तो हालत ये हो चुकी है कि अब तो उन्हें अपने परिचय के पार्श्व से उस स्थान, उस कस्बे, उस गांव का नाम जुडे होने में भी कोफ़्त होने लगती है जिसके बिना शायद उनका वजूद ही नहीं होता । ठीक है जी ठीक है , करो जो करना है , अभी तो जिस पानी की कमी , आटे दाल , दूध सबजी की महंगाई का रोना लेकर चीख पुकार मची हुई है , समय आने पर उन सबकी तलाश में ही सही उन गावों की , उन खेतों खलिहानों की सुध तो ली ही जाएगी ।


17 टिप्पणियाँ:

DESH MAIN LOKTNTR KARAH RAHA HAI TO GAON MAIN LOKTNTR POORI TARAH MAR CHUKA HAI .AB JROORAT HAI EKJUT AUR NIDAR HOKAR IS DESH AUR ISKI WYWSTHA KO MILKAR BACHANE KE ANTIM PRYAS KI ?

17 अप्रैल 2010 8:34 अपराह्न  

Gramin bhagon ki shikshan tatha medical aid ke kshtron me peechhehaat ho gayi hai...iska chahe jobhi karan ho,wahan ki janta mauqa milne par wahan se nikalna chahti hai..mai khud ek sudoor gaan me pali badhi...isliye wahanke shuddh watawaran ke alawa baaqee museebaton ka kaafee samna kiya hai..

17 अप्रैल 2010 8:41 अपराह्न  

में गाँव अभी भी याद आता है

17 अप्रैल 2010 8:43 अपराह्न  

आज कल गावों की बात करना आउट ऑफ़ फैसन हो गया है

17 अप्रैल 2010 8:44 अपराह्न  

सत्यता को उजागर किया ।

17 अप्रैल 2010 9:06 अपराह्न  

गांव में रहना अभी भी बहुत आनंददायक होता .. यदि सरकार की ओर से सुख सुविधाओं की ओर थोडा भी ध्‍यान दिया जाता .. गांव वालों को स्‍वावलंबी बनाने की योजनाएं बनायी जाती !!

17 अप्रैल 2010 9:13 अपराह्न  

nice

17 अप्रैल 2010 9:26 अपराह्न  

अब वे पुरातन गांव कहाँ,उसकी तो केवल स्मृतियाँ ही शेष हैं.

17 अप्रैल 2010 10:07 अपराह्न  

भईया हम तो आज भी गांव मै ही रहते है, ओर मुझे शहरो से अच्छे गांव ही लगते है, जहां दिखावा नही होता.... ओर मुझे कभी फ़िक्र नही होती कोई मुझे चाहे तो गंवार ही कहे..... ओर लोग तरसते है गांव मै आने को, आप का लेख मन को बहुत ही अच्छा लगा. धन्यवाद

17 अप्रैल 2010 10:33 अपराह्न  

असली भारत तो गाँवों में ही बसती है...शहर तो विदेशी नकल में डूबता जा रहा है..बढ़िया प्रसंग..धन्यवाद अजय भैया

17 अप्रैल 2010 10:44 अपराह्न  

बेहतरीन पोस्ट लिखी है अजय भाई !
गाँव के बारे में सोचने की याद, ग्राम शिल्प और गाँव की शक्लोसूरत वाले रेस्टोरेंट में जाकर, ५ स्टार भोजन करने तक ही सीमित रह गया है ! कोई नहीं सोचता पसीना बहाते उस किसान के बारे में अथवा बे मौसम बादल देख उस गरीब के घर में होता मातम !
आपकी संवेदनशीलता को शुभकामनायें !

17 अप्रैल 2010 11:09 अपराह्न  

सार्थक पोस्ट....ग्रामीण परिवेश के लिए सच में सोचना बहुत ज़रूरी है.....विचारणीय बात कही है आपने...

17 अप्रैल 2010 11:21 अपराह्न  

उदयपुर के आसपास के गाँव जनजातीय बहुल हैं। प्रकृति वहाँ मेहरबान है। यह सत्‍य है कि अभी भी वे स्‍कूल और चिकित्‍सा से अपेक्षाकृत वंचित हैं लेकिन अब इतनी भी बुरी स्थिति नहीं है। कभी इधर आइए तो वास्‍तविक आनन्‍द की प्राप्ति होगी। मेरा तो मन है कि मैं वहीं बस जाऊँ, लेकिन जमीन ही नहीं मिलती है। बेहद मंहगी हो गयी है।

18 अप्रैल 2010 8:49 पूर्वाह्न  

हम शहर के बाशिंदे हैं... लेकिन जब भी किसी स्टोरी के लिए गांव जाते हैं... तो वहीं बस जाने को मन करता है... दिल्ली के शोर-शराबे से दूर... गांव के सुकून के क्या कहने...

18 अप्रैल 2010 4:03 अपराह्न  

गांव में लगातार रहने को तो कभी नहीं मिला, लेकिन बचपन में छुट्टियों में अपने पुश्तैनी गांव जाया करते थे, आज भी वो दिन भुलाये नहीं भूलते.

18 अप्रैल 2010 7:06 अपराह्न  

@ अजय जी
भारत की असली उपलब्धि तो यही होगी कि सवा अरब की जनसंख्या को खिलाने पिलाने लायक अन्न जल उसके पास मौजूद है ।

यह तो ठीक है अजय जी, पर सरकार की अनदेखी का नतीजा देखिये कि अनाज गोदामों में पड़ा सड़ रहा है। हरियाणा आैर राजस्थान की ताजा जानकारी उदाहरण है। आैर कमाल तो यह है कि यह अनदेखी एेसे समय में भी है जबकि देश के विभिन्न कोनों से लगातार भूख से हुई मौतों की ख़बरें आ रही हैं।
रही बात गांवों की बदहाल स्थिति की तो जो आपने कहा वह सच है कि गांवों से शहर आकर बसे लोग भी अपने गांवों की हकीकत से मुंह छुपाते हैं। वहज इसके सिवा क्या होगी कि बाज़ार का ख़ून मुंह लग गया है, उन सुविधाआें के आदी हो गए हैं जो शहर में आकर ही नसीब हुईं। एसी की हवा के एवज में खुली हवा अब शायद उनसे बर्दाश्त नहीं होती।
गांवों की स्थिति में सुधार के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय तमाम योजनाएं तो चलाती है पर वह भी गांवों में बस बाज़ारवाद के रूप में ही पहुंचती हैं। दुखद पहलू यह है कि लोगों को गांवों की अहमियत समझ तो आएगी पर कहीं तब न आए जब गांव भी शहरों की तरह बाज़ार में बदल जाएं।

20 अप्रैल 2010 2:29 अपराह्न  

शहरों की ओर देख कर गाँव सोचते हिअं कि वे शहर क्यों न हुए ..जिस दिन शहर यह सोचेंगे कि काश वे गाँव होते उस दिन ही गाँवों की सुध ली जायेगी ।

27 अप्रैल 2010 9:58 अपराह्न  

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