बेबाक , बिंदास , बेलौस ,बेसाख्ता सी कुछ बातें ......
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बिखरे आखर
ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,
उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार
मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये ...
1 सप्ताह पहले

















DESH MAIN LOKTNTR KARAH RAHA HAI TO GAON MAIN LOKTNTR POORI TARAH MAR CHUKA HAI .AB JROORAT HAI EKJUT AUR NIDAR HOKAR IS DESH AUR ISKI WYWSTHA KO MILKAR BACHANE KE ANTIM PRYAS KI ?
honesty project democracy ने कहा…
17 अप्रैल 2010 8:34 अपराह्न
Gramin bhagon ki shikshan tatha medical aid ke kshtron me peechhehaat ho gayi hai...iska chahe jobhi karan ho,wahan ki janta mauqa milne par wahan se nikalna chahti hai..mai khud ek sudoor gaan me pali badhi...isliye wahanke shuddh watawaran ke alawa baaqee museebaton ka kaafee samna kiya hai..
kshama ने कहा…
17 अप्रैल 2010 8:41 अपराह्न
में गाँव अभी भी याद आता है
Yugal Mehra ने कहा…
17 अप्रैल 2010 8:43 अपराह्न
आज कल गावों की बात करना आउट ऑफ़ फैसन हो गया है
लवली कुमारी/Lovely kumari ने कहा…
17 अप्रैल 2010 8:44 अपराह्न
सत्यता को उजागर किया ।
vinay ने कहा…
17 अप्रैल 2010 9:06 अपराह्न
गांव में रहना अभी भी बहुत आनंददायक होता .. यदि सरकार की ओर से सुख सुविधाओं की ओर थोडा भी ध्यान दिया जाता .. गांव वालों को स्वावलंबी बनाने की योजनाएं बनायी जाती !!
संगीता पुरी ने कहा…
17 अप्रैल 2010 9:13 अपराह्न
nice
Suman ने कहा…
17 अप्रैल 2010 9:26 अपराह्न
अब वे पुरातन गांव कहाँ,उसकी तो केवल स्मृतियाँ ही शेष हैं.
डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…
17 अप्रैल 2010 10:07 अपराह्न
भईया हम तो आज भी गांव मै ही रहते है, ओर मुझे शहरो से अच्छे गांव ही लगते है, जहां दिखावा नही होता.... ओर मुझे कभी फ़िक्र नही होती कोई मुझे चाहे तो गंवार ही कहे..... ओर लोग तरसते है गांव मै आने को, आप का लेख मन को बहुत ही अच्छा लगा. धन्यवाद
राज भाटिय़ा ने कहा…
17 अप्रैल 2010 10:33 अपराह्न
असली भारत तो गाँवों में ही बसती है...शहर तो विदेशी नकल में डूबता जा रहा है..बढ़िया प्रसंग..धन्यवाद अजय भैया
विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
17 अप्रैल 2010 10:44 अपराह्न
बेहतरीन पोस्ट लिखी है अजय भाई !
गाँव के बारे में सोचने की याद, ग्राम शिल्प और गाँव की शक्लोसूरत वाले रेस्टोरेंट में जाकर, ५ स्टार भोजन करने तक ही सीमित रह गया है ! कोई नहीं सोचता पसीना बहाते उस किसान के बारे में अथवा बे मौसम बादल देख उस गरीब के घर में होता मातम !
आपकी संवेदनशीलता को शुभकामनायें !
सतीश सक्सेना ने कहा…
17 अप्रैल 2010 11:09 अपराह्न
सार्थक पोस्ट....ग्रामीण परिवेश के लिए सच में सोचना बहुत ज़रूरी है.....विचारणीय बात कही है आपने...
sangeeta swarup ने कहा…
17 अप्रैल 2010 11:21 अपराह्न
उदयपुर के आसपास के गाँव जनजातीय बहुल हैं। प्रकृति वहाँ मेहरबान है। यह सत्य है कि अभी भी वे स्कूल और चिकित्सा से अपेक्षाकृत वंचित हैं लेकिन अब इतनी भी बुरी स्थिति नहीं है। कभी इधर आइए तो वास्तविक आनन्द की प्राप्ति होगी। मेरा तो मन है कि मैं वहीं बस जाऊँ, लेकिन जमीन ही नहीं मिलती है। बेहद मंहगी हो गयी है।
ajit gupta ने कहा…
18 अप्रैल 2010 8:49 पूर्वाह्न
हम शहर के बाशिंदे हैं... लेकिन जब भी किसी स्टोरी के लिए गांव जाते हैं... तो वहीं बस जाने को मन करता है... दिल्ली के शोर-शराबे से दूर... गांव के सुकून के क्या कहने...
फ़िरदौस ख़ान ने कहा…
18 अप्रैल 2010 4:03 अपराह्न
गांव में लगातार रहने को तो कभी नहीं मिला, लेकिन बचपन में छुट्टियों में अपने पुश्तैनी गांव जाया करते थे, आज भी वो दिन भुलाये नहीं भूलते.
वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
18 अप्रैल 2010 7:06 अपराह्न
@ अजय जी
भारत की असली उपलब्धि तो यही होगी कि सवा अरब की जनसंख्या को खिलाने पिलाने लायक अन्न जल उसके पास मौजूद है ।
यह तो ठीक है अजय जी, पर सरकार की अनदेखी का नतीजा देखिये कि अनाज गोदामों में पड़ा सड़ रहा है। हरियाणा आैर राजस्थान की ताजा जानकारी उदाहरण है। आैर कमाल तो यह है कि यह अनदेखी एेसे समय में भी है जबकि देश के विभिन्न कोनों से लगातार भूख से हुई मौतों की ख़बरें आ रही हैं।
रही बात गांवों की बदहाल स्थिति की तो जो आपने कहा वह सच है कि गांवों से शहर आकर बसे लोग भी अपने गांवों की हकीकत से मुंह छुपाते हैं। वहज इसके सिवा क्या होगी कि बाज़ार का ख़ून मुंह लग गया है, उन सुविधाआें के आदी हो गए हैं जो शहर में आकर ही नसीब हुईं। एसी की हवा के एवज में खुली हवा अब शायद उनसे बर्दाश्त नहीं होती।
गांवों की स्थिति में सुधार के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय तमाम योजनाएं तो चलाती है पर वह भी गांवों में बस बाज़ारवाद के रूप में ही पहुंचती हैं। दुखद पहलू यह है कि लोगों को गांवों की अहमियत समझ तो आएगी पर कहीं तब न आए जब गांव भी शहरों की तरह बाज़ार में बदल जाएं।
साहिल ने कहा…
20 अप्रैल 2010 2:29 अपराह्न
शहरों की ओर देख कर गाँव सोचते हिअं कि वे शहर क्यों न हुए ..जिस दिन शहर यह सोचेंगे कि काश वे गाँव होते उस दिन ही गाँवों की सुध ली जायेगी ।
शरद कोकास ने कहा…
27 अप्रैल 2010 9:58 अपराह्न