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बुधवार, 30 दिसंबर 2009

माता जी की बरसी , सामूहिक भोज .....ग्राम प्रवास (भाग दों )

कहते हैं कि समय पंख लगा के उडता है , पता नहीं सच है कि झूठ मगर मां के देहांत को एक साल पूरा भी हो गया , अभी तो लगता है जैसे कि अभी किसी दिन अचानक फ़ोन आएगा, बेटा कितने दिन हो गए तूने फ़ोन नहीं किया ,बेटा पापा की दवाई खत्म हो रही है या फ़िर कोई और बात । मगर नहीं सब खामोश , मां के देहांत के बाद तो ऐसा लगा कि जिंदगी की असली परिभाषा ही सामने आ गई । बहुत करीब से किसी अपने की मौत ने बहुत कुछ सिखा समझा दिया था । पिताजी की मानसिक हालत पहले से ही बहुत ठीक न होने के कारण हमारी अभिभावक की भूमिका में मां रही थीं । अपनी शादी के लायक और सबसे काबिल संतान( मेरी दीदी) को खोने के बहुत समय बाद तक तो जैसे मां एक दम टूट सी गई थी ।मगर फ़िर हम दोनों के लिए उन्होंने खुद को संभाल लिया और हमसे ज्यादा पिताजी के लिए । मां का जाना हमारे लिए ऐसा ही था जैसे अपने घोंसले का उजड जाना । खैर नियति के आगे कब किसकी चली है जो हमारी चलती ।

सबसे पहले हम सभी पारिवारिक लोगों ने बाल कटाने/नाखून कटाने ,और महिलाओं के लिए निर्धारित कुछ विशेष कार्यों को पूरा किया गया । इसके बाद श्राद्ध और बरसी जैसे कर्मों को करवाने वाले विशेष पंडितों जिन्हें हमारे यहां "महापात्र " कहा जाता है उन्हें बुलावा भिजवाया गया । उन्होंने आकर सारा पूजा कर्म संपन्न करवाया । बदकिस्मती से उसकी कोई भी फ़ोटो कई कारणों से उपलब्ध नहीं हो पाई जिसमें से एक था मेरे खुद का पूजा पर बैठा होना ॥

बरसी में हमारे यहां मुख्य रूप से ये कार्य होते हैं एक तो बरसी पर माता जी की आत्मा की शांति के लिए मिथिलांचल के अनुसार निर्धारित पूजा , कर्म ,इत्यादि और उसके बाद सामूहिक भोज । इस भोज का हमारे मिथिलांचल के किसी भी शुभ और अशुभ अवसर के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही खास महत्व है । और शायद ये सदियों से रहा है । आपको जानकर ये बहुत आश्चर्य हो कि कुछ खास संस्कारो/समारोहों/अवसरों के लिए तो इन भोजों में खाने परोसने के लिए भी अलग अलग व्यवस्था और प्रकार निर्धारित हैं । इस सामूहिक भोजन की कहानी भी बहुत ही रोचक और शायद आज शहरी समाज को एक बहुत बडी सीख देने वाली साबित हो । सबसे पहले ग्रामीण आपस में ये तय करते हैं कि मेजबान किस तरह का कैसा भोजन सबको कराना चाहते हैं । उसी के अनुरूप सभी खरीददारी की जाती है । और यहां ये बता दूं कि अभी भी जबकि इतनी ज्यादा खेती बाडी रही नहीं तब भी अभी भी दाल चावल, सब्जी, दूध दही आदि सब कुछ गांव के अपने लोगों द्वारा ही एक दूसरे को उपलब्ध कराया जाता है ।

सारी सामग्री इकट्ठी होने के बाद गांव की महिलाओं का काम शुरू होता है । सभी सब्जियों को धो कर अच्छी तरह साफ़ करने के बाद उन्हें बहुत ही बढिया तरीके से अलग अलग करके काटना । काटने के लिए जरूरी सामान , चाकू, हंसिया, या और भी कुछ वे सब अपने अपने घरों से ही ले कर आती हैं । इसके बाद बांकी का सारा काम , यानि उस सामान को पकाना और शाम के भोज के लिए उसे सलीके से रखना । सुबह से ये काम शुरू होता है और सबसे अधिक कमाल की बात ये होती है कि समय की सीमितता का पूरा ख्याल रखते हुए वे इतने कमाल के तरीके से सारा काम निपटा लेते हैं कि कुछ पता ही नहीं चलता । इसके बाद सामूहिक भोज ( रात्रि हो जाने के कारण सामूहिक भोज के चित्र बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं आ सके ) में परोसने से खाने और खाने के बाद झूठन की सफ़ाई तक का सारा काम सब आपस में ही करते हैं । और एक बात और इन सामूहिक भोजों में उपयोग में आने वाली सभी वस्तुएं, मसलन , बडी दरियां, बरतन, पेट्रोमेक्स लाईटें आदि भी आपसी सहभागिता से हो जाती हैं ।







मैं सोचता हूं कि क्या कभी ये आपसी सहभागिता/ ये सामाजिक गठबंधन की भावना / या आप इसे और जो भी नाम देना चाहें ........आज के नगरीय जीवन में संभव है .......??






मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

रेल यात्रा ,, कुछ चित्र और ,ग्राम प्रवास (एक )



आखिरकार लगभग एक सप्ताह के ग्राम प्रवासके बाद वापसी हो ही गई आज ही दोपहर कोवापसी हुई है अभी तो उंगलियों में गांव कीमीठी मीठी ठंड का स्वाद भी नहीं उतरा हैइसलिए ज्यादा तो शायद नहीं लिखा जाएगा मगर एक ब्लोग्गर के सामने कंप्यूटर हो औरवो पोस्ट लिख मारे तो फ़िर काहे का ब्लोगरजी और हम तो घोषित ब्लोग्गर हैं जी ...अबये मत पूछियेगा कि घोषित अपराधी की तर्ज़ पेहमें घोषित ब्लोग्गर किसने बना दिया ।मगर येसब बातें तो फ़िर कभी फ़िलहाल तो इस यात्रा और मेरे ग्राम प्रवास की पहली किस्त आपके सामने रख रहा हूं जाहिर सी बात है कि आज मेरे शब्दों से ज्यादा आपसे मेरे मोबाईल के खींचे हुए चित्र ही रूबरू होंगे, हां उनके पूरकके रूप में कुछ पंक्तियां भी हैं

भारतीय रेल से मेरी एक शिकायत हमेशा हीरही है कि चाहे भारतीय रेल , भले ही करोंडों कामुनाफ़ा करके रिकार्ड स्थापित कर रहा हो, बेशक नित नई नई योजानाओं /परियोजनाओं पर काम कर रहा हो और बेशक ही बहुत सारे रेल मंत्रियों में से अधिकांश खुद बिहार से ही हुए हैं इसके बावजूद , सुरक्षा, खानपान, स्वच्छता, और रेल परिचालन व्यवस्था ......ये चार वो मुख्य बिंदु हैं जिनपर कभी भी गंभीरता से काम नहीं हुआ है और एक बार फ़िर से इस रेलयात्रा ने मेरी इस राय को पुख्ता ही किया उस दिन भी हमारी रवानगी के समय दो प्लेटफ़ार्म पर ही चार चार रेलों के चलने की घोषणा, और चार चार रेल के यात्रियों का हुजूम , गरीब रथ के समय पर दुरंतो का आगमन और प्रस्थान, यात्रियों की अफ़रातफ़री ....से सफ़र काआगाज़ हुआ चित्र में आप खुद ही देखिए









इसके बाद गरीब रथ में डिब्बे के अंदर एकमधुबनी चित्रकला का नमूना देखिए

















रेल के अंदर से हमारी खूबसूरत धरती से एक मुलाकात ॥
















बिहार में रेल की पटरियों के साथ ही लगे हुए एक साप्ताहिक हाट का चित्र










रेल यात्रा के दौरान मिले बहुत से रेलवे स्टेशनों में से एक पर बैठा हुआ ये मैंनों का झुंड, जिन्हें न जाने कितने वर्षों के बाद देखा , मेरी हिम्मत तो बहुत हुई कि उनसे शिकायत करूं, उलाहना दूं कि आखिर क्यों नहीं आते वहां चाहे परदेसी बन के ही सही । मगर उन्होंने अपनी चहचहाट में ही इतना कुछ कह दिया कि मेरी हिम्मत ही नहीं हुई आगे कुछ कहने की । आप खुद ही देखिए






















तो आज बस इतना ही, कल से सिलसिलेवार बहुत कुछ बातें बतानी हैं आपको , माता जी की बरसी, सामूहिक भोज, ग्राम का प्राथमिक विद्यालय, बिहार का विकास, सच और झूठ, एक मुलाकात गांव के पेड पौधों से , और इस यात्रा के दौरान मिली दो बालिकाएं, ....पूजा और अर्चना ....सच मानिये ...अभी इस कहानी के कई पात्रों से मिलना और मिलाना है आपको ...........................मिलेंगे न.................???????

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

लौटूंगा तो ले के यादों के मेले, और अगली ब्लोग बैठक की घोषणा के साथ



जी हां, चाहे अनचाहे अब तो जब भी ऐसा लगता है कि कुछ दिनों के लिए ब्लोग्गिंग से दूर जाना होगा तो अनायास ही एक उदासी सी छा जाती है मन में । कारण तो पता नहीं मगर मुझे लगता है कि हर उस ब्लोग्गर के साथ जो नियमित है या शायद अनियमित भी , ऐसा ही होता है । तो अपनी तो तैयारी हो चुकी है एक बार फ़िर आप सबसे एक सप्ताह तक दूर रहने की । आप कहेंगे लो एक सप्ताह कौन बडी बात है जी ,,,,,,,अजी जिसके लिए आठ घंटे औफ़िस में काटना मुश्किल होता है ब्लोग्गिंग के बारे में सोच के ..उसके लिए आठ दिन कितने भारी होंगे ..इसका तो अंदाजा आप ही लगाईये । आप कहेंगे कि मैं तो एकदम सेंटी हो गया हूं ब्लोग्गिंग को ले के । अब हो गया हूं तो हो गया हूं ।

दरअसल ,कल से अपना एक सप्ताह का ग्राम प्रवास प्रस्तावित है । यानि कल की रवानगी है , माता जी की पहली बरसी ही मुख्य काम है जिसके लिए मैं जा रहा हूं । वापसी एक सप्ताह बाद होगी । लेकिन जब भी गांव जाता हूं तो जिस एक काम के लिए मुख्य रूप से यात्रा का संयोग बनता है उसके अलावा बहुत से ऐसे काम भी हो जाते हैं जो दिल को सुकून पहुंचाते हैं ।पहला तो होता है महानगरीय जीवन की भागमभाग से दूर गांव की शांति में जाना ऐसा होता है जैसे सुबह सुबह किसी पहाडी के ऊपर बने किसी सुंदर मंदिर में शांति से आप आंख मूंद के बैठे हों और मन तक शांति ही शांति । अपने लगाए पौधों /पेडों से बातचीत होगी । गांव के पुस्तकालय में रखी किताबों से पूछूंगा कि उन्हें कौन कौन निहारने /पढने आता है । मा साब को जो चिट्ठी लिखी थी उसकी भी अंतिम रूपरेखा तय करनी है । और इसके बाद जो समय बचेगा उसमें हमेशा की तरह आपसी मनमुटाव/झगडों /और छोटे छोटेइ मतभेदों को निपटाने की कोशिशें, जिसके लिए हमेशा ही मेरी प्रतीक्षा की जाती है ......यानि कुल मिला के बहुत कुछ॥

जब वापस लौटूंगा तो यादों का ऐसा खजाना होगा साथ में कि बस .....मेरी यादों के मेले में.....फ़ोटो वाला मोबाईल साथ रहेगा ......तो चित्र कहानियां भी मिलेंगी ......और साल का अंत कुछ इन्हीं यादों से किया जाएगा ॥ ये तो हुई यादों की बात ......अब अगली बात भी हो जाए साथ साथ ....।
बहुत से मित्र ब्लोग्गर ......फ़िर से एक नई बैठकी की तैयारी में हैं......हालांकि इसकी रूपरेखा अभी नहीं बनी है मगर इतना तय है कि ....जनवरी का कोई रविवार होगा ।और हां इस बैठकी में हम करने क्या वाले हैं इसकी एक बानगी बताए दे रहा हूं :- पहली और जरूरी कोशिश ये होगी कि हमारी महिला ब्लोग्गर मित्र इसमें अपनी भागीदारी दें , ताकि बहुत सी बातें आमने सामने हो सकें , वैसे भी अब उनकी उपस्थिति के बिना कोई मुहिम/ कोई योजना अधूरी सी ही रहेगी...॥ दूसरी बात ये कि हमारी कोशिश होगी कि हम एक ऐसी टीम तैयार करें जो कुछ खास योजनाओं पर काम करे ......जैसे ...ब्लोग पर इनामी प्रतियोगिता का आयोजन ,,,जिसके ईनाम स्वरूप जीतने वाले ब्लोग्गर को हम किसी भी खास शहर भेजेंगे ......उस शहर के ब्लोग्गर्स से मुलाकात के लिए ॥।एक ऐसी मुहिम चलाए जाने की योजना है जिसके तहत अलग अलग माध्यमों द्वारा गूगल बाबा तक ये बात पहुंचाई जाएगी ........कि बाबा अब हिंदी में एड सेंस सेवा शुरू की जाए । विचार इस बात पर भी होगा कि क्या अब समय आ गया है हम इस दिन पर दिन ताकतवर हो रहे मंच का कुछ बहुत सार्थक/ कुछ संजीदा / कुछ बहुत गंभीर ... उपयोग कर सकें ......? मसलन हर ब्लोग्गर कम से कम सप्ताह में एक पोस्ट ऐसी लिखेगा जो .......सच में सोचने पर मजबूर कर सके ।

और भी बहुत सी बातें हैं जो हम प्रयास करेंगे कि आपस में बांट सकें ।ये सब अभी इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अगले एक सप्ताह तक ..........................................................तो बस फ़िलहाल इतना ही ।अपना ख्याल रखियेगा और .......अपने इस ब्लोग परिवार का भी


रविवार, 20 दिसंबर 2009

मैं ब्लोग पोस्ट ऐसे पढता हूं .....और आप !



हां आज जाने किन पोस्टों को पढते पढते ये विचार अचानक ही मन में आया कि मैं ब्लोग पोस्ट को कैसे पढता हूं ....क्या सभी मेरी तरह ही पढते हैं ...या कोई और भी तरीका होता है ..इससे अलग इससे अनोखा । तो सोचा आज आप सभी से अपनी बात को बांटते हुए जाना जाए कि ....क्या कहां कैसे होता है । मेरा पहला काम होता है एक साथ कम से कम पांच एग्रीगेटर्स को खोल लेना । जाहिर कि इसमें ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत, रफ़्तार, और हिंदी ब्लोगस के अलावा एक आध और भी । और ये खुले ही रहते हैं ..जब तक कि मेरा पठन चलता रहता है ।

इसके बाद मेरा सबसे पहला काम होता है .पोस्ट का शीर्षक .....। जी हां ये वो पहली बात होती है जो मुझे खींचती है किसी भी पोस्ट की तरफ़ ....कई बार तो शीर्षक ही इतने दिलचस्प होते हैं कि जब तक पन्ना खुलता है ...उत्सुकता चरम पर पहुंच चुकी होती है । फ़िर जब से चर्चा करनी शुरू की है तब से तो मेरे लिए शीर्षक का महत्व बहुत ही बढ जाता है .....क्योंकि उसे मुझे चर्चा में उपयोग करना पडता है । यहां मैं अपने नए साथियों को बता दूं कि मेरा अनुभव ये कहता है कि .....यदि किसी पोस्ट का शीर्षक आपने बहुत सटीक और बढिया लगा दिया तो समझिए कि आपकी पैकिंग बहुत अच्छी है और माल देखने लोग आएंगे ही ॥

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ शीर्षक देख कर ही पोस्टों को खंगालता हूं । अब जबकि इतना समय हो गया है तो सभी की लेखनी/ उनके विषय/ उनका अंदाज देख के अनुमान लगा लेता हूं कि किस लेखक/लेखिका ने क्या लिखा होगा ....और फ़िर उनकी पोस्ट का अवलोकन होता है । कभी कभी उम्मीद के अनुसार ही सब मिलता है तो कभी कभी ....बिल्कुल उलट । मगर दोनों ही परिस्थितियों में मुझे आनंद खूब आता है । सच कहूं तो जब पोस्ट पढने का आनंद ....का स्वाद आपको लग जाएगा तो फ़िर कुछ नहीं सूझता । और मुझे तो न सिर्फ़ पढने बल्कि अपनी राय/ अपने विचार/ अपनी बात कहने की आदत भी लग चुकी है ॥हालांकि अब मुझे इसका खामियाजा भी भुगतना पडता है ....मगर हर चीज़ के दो पहलू होते हैं सो ये भी सही ॥

आगे बढने से पहले कुछ बातों का जिक्र करना चाहूंगा । मैं देख रहा हूं कि आजकल जो भी पोस्टें किसी भी विषय को मुद्दा बना के लिखी जा रही हैं उसे पाठक /पाठिका किसी भी रूप में लेते हों और उस बिंदु पर उनकी चाहे जो भी सहमति या असहमति हो .......मगर आजकल एक चलन सा जोरों पर है कि पोस्ट में वर्णित मुद्दा तो वहीं छूट जाता है और बात शुरू हो जाती है व्यक्तिगत टिप्पणियों की । इसके बाद तो यहां लोगों को ये निर्धारित करते भी देर नहीं लगती कि ....अमुक व्यक्ति ने ये कहा तो वो फ़लानी मानसिकता वाला हो गया ।अमुक ने ये पोस्ट लिखी है तो जरूर ही वो उसी मानसिकता वाला होगा ।यदि कोई निरंतर ही उसी शैली में उसी बात को रख रहा है तो एक मिनट के लिए माना भी जा सकता है मगर किसी एक पोस्ट या किसी पोस्ट की जवाबी पोस्ट से ही निर्धारण कर देना कि अमुक की मानसिकता ही ऐसी है ...कुछ अतिशयोक्ति सी लगती है । और अब तो माशा अल्लाह ! लोग भाषा भी खूब इस्तेमाल कर रहे हैं .....और नाम भी बखूबी लिया जा रहा है । चलिए छोडिए ................

इसके बाद मैं अपनी रुचि के अनुसार ...विधा के हिसाब से पोस्टों को पढने का प्रयास करता हूं ......जैसे कविता /कहानी/व्यंग्य /लेख /नए चिट्ठे आदि के अनुसार । चूंकि ऐग्रीगेटर्स अलग अलग खोले रहता हूं इसलिए अक्सर उनपे कोई अनछुआ अनदेखा सा ब्लोग मिलता है तो खुशी दोगुनी हो जाती है । और किसी ब्लोग का पहला फ़ौलोवर बनने का तो आनंद ही अनुपम होता है । मैं जो पढता हूं ...मतलब बिल्कुल नहीं छोडता ....वो है चिट्ठियों की चर्चाएं .....और जो बिल्कुल नहीं पढता वो धर्म के नाम पर या एक दूसरे के नाम पर भडास निकालने वाली पोस्टों को कभी भी नहीं पढता ॥

तो ऐसे पढता हूं मैं ....और आप ..........?????????

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

तो कब शुरू कर रहे हो ब्लोग्गिंग ...???



"और झा जी , ब्लोग्गिंग कब शुरू कर रहे हैं भाई ....???," चिट्ठासिंग जी ने आते ही डायनामाईट टाईप प्रश्न दाग दिया ॥

मैं थोडा हैरान परेशान , और ज्यादा झुंझलाते हुए पूरी तरह से बौखला गया ," आपका दिमाग तो ठीक है चिट्ठासिंग जी ,या, आज सुबह से कोई मिला नहीं आपको बतकुटौव्वल के लिए तो आ गए मेरा माथा चाटने । आपको तो बखूबी पता है कि मैं पहले से ही ब्लोग्गिंग कर रहा हूं । न सिर्फ़ कर रहा हूं बल्कि कहूं कि सिर्फ़ ब्लोग्गिंग ही कर रहा हूं ...इसके कारण तो पता नहीं कौन कौन सी आदतें भी छूट गईं । आप फ़िर भी पूछ रहे हो कि ब्लोग्गिंग कब शुरू करूंगा ??? "

"अच्छा अच्छा , वो जो आप कर रहे हो उसे कह रहे हो ब्लोग्गिंग ....अच्छा ये बताओ क्या करते हो ..चलो आप खुद ही बताओ पहले मैं फ़िर बोलूंगा कुछ भी " चिट्ठासिंग पूरी द्रढता से बोले ।

अब मैं हत्थे से उखड चुका था ," अरे छोडो यार बेकार की बकवास बात कर रहे हो....क्या करता हूं मतलब । दिन भर में आने वाली एक भी पोस्ट मेरी नज़र ने नहीं बचती ..लगभग हर पोस्ट को पढता भी हूं और अपनी समझ के अनुसार उस पर टिप्पणी भी करता हूं .....इसके साथ ही अपनी रद्दी की टोकरी में ....खबरों की खबर बना के कुछ भी कभी भी इस तरह डालता हूं कि वो आज का मुद्दा बन जाती है मगर ध्यान रखता हूं कि कोर्ट कचहरी की नौबत न आए और सब कहें वाह कुछ तो झा जी कहिन ॥ समझे कि नहीं और कुछ बतलाएं । तो और सुनिए ...हम लोग पूरी तैयारी में हैं कि आने वाले समय में हिंदी ब्लोग्गिंग को बहुत आगे तक ले जाएं , इसलिए मिलन/संगोष्ठी/ सम्मेलन और बैठकों का दौर भी जारी है । बताईये अब क्या कसर रह गई है ...? आप अब भी कहेंगे कि मैं ब्लोग्गिंग कब शुरू कर रहा हूं ॥"
चिट्ठासिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे एक कुटिल मुस्कान के साथ बोले , " चलो हो गया कह लिया अब मेरी कुछ बातों का जवाब दो ,

"तुम्हारी किसी पोस्ट से ऐसा हुआ है कि सरकार को , शासन को, किसी अधिकारी को , किसी मंत्री को ..इतनी परेशानी हुई हो कि उसे जवाब देना मुश्किल हो गया हो, उसे मुंह छुपाना पडा हो ,या वो बौखला गया हो ?" "

अच्छा चलो एक बात बताओ क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हारी पोस्टों में समाचार माध्यमों/समाचार पत्रों को ऐसा कुछ मिला हो जो उन्हें लगा हो कि ये तो खबर है ...एक ऐसी खबर जो अब तक अनछुई मगर बहुत ही महत्वपूर्ण है ? उन्हें इस बात पर शर्म आ गई हो कि जो काम उन्हें करना चाहिए वे ब्लोग्स कर रहे हैं"


"चलो इसको भी छोडो, क्या तुमने अपनी संस्था में चल रहे भ्रष्टाचार को/बेइमानी को/गलत परंपराओं को बाहर दिखाने के लिए , आम लोगों को बताने के लिए ...कोई पोस्ट लिखी है .....?


"कभी किसी गरीब की , लाचार की , किसी मजबूर की कोई कहानी ऐसी सबके सामने रखी है जिससे कि उसका कुछ भला हुआ हो , और तुम्हें लगा हो कि लिखना सार्थक हुआ "



इससे पहले कि चिट्ठा सिंग और भी गोले दागते , मैं खुद ही बोल पडा, " मैं मानता हूं कि मैं इनमें से कुछ नहीं कर पाता , मगर यार ये सब करने के बाद क्या मेरे घर परिवार को तुम खिलाओगे पिलाओगे ।रही बात सरकार, मीडिया,शासन को प्रभावित करने की तो वो तो हो ही रहा है ,चाहे धीरे धीरे ही सही ।हां ,जिस दिन मुझे लग गया कि अब बस बहुत हो गया उस दिन आप यकीन मानो मैं ब्लोग्गिंग का वो अध्याय शुरू करूंगा कि तब आपको कहने की जरूरत नहीं रहेगी कि ...कब शुरू कर रहे हो ब्लोग्गिंग ..?"

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

अमा हम तो पिछले जनम में भी ब्लागर ही थे ....


अभी कुछ समय पहले जब सच का सामना ….पूरा देश कर रहा था …अजी वे नहीं जो सिर्फ़ टीवी पर बैठे थे …असली सच का सामना तो वे कर रहे थे जो उसे देख रहे थे ….हरेक आदमी अपनी बीवी को और हरेक बीवी अपने पति को यूं घूर रही थी मानो आंखों ही आंखों में कह रही हो कि ….तभी तक बचे हुए हो जब तक उस सीट पर उस मशीन के सामने नहीं गए वर्ना तो जाने कब के बेवफ़ा हो चुके थे तुम ॥ हम इतने खतरों के बाद भी सोच रहे थे कि …एक ब्लागर के तौर पर शायद हमारा नंबर लग ही जाए…….मगर न जी ..उन्होंने ऐसे ऐसे क्रेटेरिये रखे ….मसलन ….अनाम बनके टीपते/गलियाते हो कभी …..बिना पोस्ट पढे ही टीप दे मारी हो कभी …….अपने ही पोस्ट का खूबे तारीफ़ बजाए हो ……हम न में मुंडी हिलाते रहे और अपने नंबर कटवाते रहे …॥ अबे तुम हमसे ऐसे प्रश्न क्यों करोगे …..वो वाले क्यूं नहीं करते ……..उधर से जवाब मिला….चुप बे एक तो ब्लागर ..ऊपर से हिंदी का ….तुम्हारा क्या खाक चक्कर होगा ॥अपनी बीवी से छुप छुप कर तो ब्लोग्गिंग करते हो तुम …..? हमने सोचा यार इत्ती बेइज्जती खराब तो आज तक ब्लोग्गिंग में भी नहीं हुई ….॥ जाओ हम नहीं करते तुम्हारा बेकार सा शो .......


मगर कहते हैं न जहां चाह वहां ...टीवी शो की कौन कमी है ......एक खत्म तो दूसरा शुरू होईये जाता है ......फ़टाक से बिग बास का बुलावा आ गया .....हमने कहा यार जब वहां पर कमाल खान और राखी सावंत की मम्मी जैसी सुपर स्टार सब लोगन आएंगे तो ...ऊ शो तो ओएसे ही बास मारने लगेगा ...फ़िर बिग बास का और छोटा बास का ....न ई अपने लेवल का नहीं लगा । अचानके रवि भैय्या का बुलावा आ गया ....कहे लगे का कहें यार ...ऊ रखिया का स्वयंवर करा करा के तो हम एकदम से पक गए थे ...सो एक ठो डाकटरनी को ले के आ रहे हैं ....उ मार लिटा के तुम्हरा पिछले जन्म का सब राज जान जाएंगी और बता देंगी । हम कहे आयं ...ई कौन मेथड है ...लिटा के राज खोल देंगी ....ई काम तो पुलिस भी करती है ......मार मार के लिटा देती है ...बकिया पिछला का सात जनम का राज ( और राज क्या सिमरनी भी हो तो वो भी ) खुलते चले जाता है ।


अरे यार वो वाला राज नहीं .....वो भूत प्रेत टाईप वाला राज ॥चलो तैय्यार रहो ......जब बुलाएंगे तो आ जाना ....और हां एकाध ठो ...बढियां भावुक टाईप लोगों को भी लेते आना ....शो के लिए जरूरी होता है । हम भी तैयार हो गए ... ऊ का कहते हैं समय रथ पर बैठने के लिए ..........। पहुंचे .....आवाज आई ....चलिए देखा जाए कि आखिर क्या राज है आपके पिछले जन्म का .......हम भी धुकधुकाते दिल को ले के लंबलेट हो लिए ।


जाईये पीछे जाईये .....हम कहे जा रहे हैं ...लेटे लेटे ही जाएं न कि ...उठ के चल दें । कहा गया अरे नहीं नहीं ....लेटे लेटे ही चलते जाईये ...एक दम फ़्लैश बैक में ......आप तो खाली सोचते जाईये ,बकिया टीवी के लिए शूटिंग तो बाद में करवा लिया जाएगा ......। अच्छा बताईये आपको खुद का शक्ल दिख रहा है .......कैसा दिख रहा है ॥


हम कहे .....जी ई तो हम कौनो मंत्री आ शायद प्रधानमंत्री जैसा लग रहे हैं जी ।



आयं डा साहिबा चौंक कर अपना शीशा मॆं देखीं .........अरे धत तेरे कि ......ई सब कौन भर दिया इनके दिमाग में जी .......ई कौन बनाया है .....चलो बताओ ....हम कहे जी ई काम तो सदियों से एके कलाकार कर रहे हैं लियानार्डो दा तनेजा ....माने श्री राजीव तनेजा जी ॥


चलो लेटो चुपचाप और कंसेन्ट्रेट करो न जी ...एके घंटा में सब राज जानना होता है ......अरे ए रवि किशन किसको पकड के ले आया है रे .......अच्छा अब बताओ का दिख रहा है ........?



जी हम और एश्वर्वया ......एक ठो बढिया क्वालिटी का गधा पे बैठ के ..........सिर पे हैलमेट लगा के .........ओह रुको रुको ....तुम्हारा तो सारा नेटवर्क ही गडबड है .......ये भी लियानार्डो दा तनेजा ........जी जी ...सब उन्हीं की कलाकारी है ।


चुप एक दम चुप अब सीधे सीधे पंद्रह मिनट में बता दो ......कि क्या क्या दिख रहा है ...वर्ना शो का तो बेडा गर्क किया ही है तुमने ........तुम्हारा हम कर देंगे ........समझे ॥ जी दिख रहा है कि हम झोला लिए एक डाकखाने के पास खडे हैं ....खूब अंतरदेशीय पत्र, ढेर सारा लिफ़ाफ़ा , पोस्ट कार्ड खरीद रहे हैं , घर आ के पता नहीं किन किन को ढेर सारा बात लिख रहे हैं ....बस लिखे जा रहे हैं ....और शाम को डाक बाबू के इंतजार में बैठे हैं ॥नजरें बिछाए ......बार बार उनको पूछ रहे हैं ....आया डाक बाबू कौनो चिट्ठी का जवाब , कोई कुछ लिखा है का हमारे लिए .....बस बार बार यही कैसेट ,रिप्ले हो हो के चल रहा है ॥ई का क्या मतबल हुआ डा साहिबा .........?

अरे धत बुडबक तुम तो यार पिछले जनम में भी ब्लागरे था जी ......बस फ़र्क एतना था कि तुम्हरे पास ...तुम्हरे का किसी के पास भी कंप्यूटर नहीं था न ...इसलिए जो हरकत आज तुम ई डिब्बा पर बैठ कर करते हो न ....वही तुम पहले ....वहां ओईसे करते थे ....। जाओ जाओ खाली पीली इतना टाईम खराब किए ।

हम खुशी से दमकता चेहरा लिए निकल पडे ॥श्रीमती जी को बताने कि देखो ...जिसको तुम अपनी सौतन कहती हो न ....उसका रिश्ता तो हमारे साथ पता नहीं कितने जन्म जन्म से है ........?



सोमवार, 14 दिसंबर 2009

साप्ताहिक संन्यास,बाबा झाउआनन्द,और बोध कथा

आते ही किसी ने लपक के पूछा कि ....अरे कहां थे भई .इतने दिनों तक .. न कोई खोज न खबर ..न ही कोई हलचल ........आखिर माजरा क्या है .......? इससे पहले कि वे अपनी नौन स्टौप प्रश्न श्रंखला को आगे बढाते हमने उन्हें ईशारा किया चुप होने का और फ़िर खुद शुरू हो गए ॥


कुछ खास नहीं जी ...हम संन्यास मोड में चले गए थे ,.....अरे वो परमानेंट वाला नहीं यार .....वो तो कोमाटिकल संन्यास होता है ...हम तो मौडर्न वाले ......वो होता है न बाबा बूबा बनने वाला .....हां उस टाईप के सन्यास को निकल लिए थे ....हां हां ....वहीं हिमालय की गोद में ॥ नहीं नहीं यार कोई खास वजह नहीं थी ....देखो तुम्हें तो पता ही होगा कि आजकल में अपने समाज के एक बाबा जी की स्थिति काफ़ी नाजुक होने के कारण उनके फ़्यूचर ......और उससे ज्यादा उनके ...सक्सेसर को लेकर बाजार में तरह तरह की अटकलें तेज हो गई थीं ......फ़िर हो भी क्यों न आखिर हमारा समाज अब "बाडिक्ट "(वो जिस तरह से एडिक्ट होता है न तो उसी तरह समाज को बाबाओं की जो आदत लगी है ..उसे बाडिक्ट कहते हैं ) जो हो गया है ....तो हमारा भी एक ब्लोग्गर होने के नाते फ़र्ज है कि हम भी इस समाज के लिए बाबा ट्रेनिंग को निकल पडते । सो हमने भी वही किया ॥

हम भी हिमालय की गोद की ओर अग्रसर हो गए थे । दरअसल और कोई चारा भी नहीं था ....श्रीमती जी के ...मौसेरे भाई जी की लुटिया डूबने जा रही थी (यानि उनका जुलूस निकलना था ...वैसे भी मेरा तो हमेशा से यही मानना रहा है कि बारात तो दुल्हन की निकलती है दुल्हे का तो जुलूस निकलता है ) सो हम भी उस लुटिया डूब का सुंदर चित्रण देखने को पहुंच गए ॥ रास्ते में ही सोच लिया था कि जाते ही विश्राम करेंगे और सारी थकान दूर करेंगे ...सो जाते ही ...सारी खुदाई एक तरफ़ .......से पूछा ...बच्चे सुना था तुम्हारे पास भी कोई यंत्र हमारे समान ही है ..मगर उससे तुम पढाई लिखाई जैसा कोई फ़ालतू के प्रयोजन हेतु उपयोग में लाते हो ...लाओ बच्चा उसे हमारे हवाले कर दो ..॥ अगले कुछ दिनों तक हम उस पर ठीक उसी प्रकार से जमने वाले हैं जैसे तथागत ...पीपल के नीचे जमे थे ...॥ उसने भी शायद इस चाह में हमें अपना कंप्यूटर थमा दिया कि कल को उसके यंत्र को भी हमारे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद पीपल वाला नेम फ़ेम मिल जाए ॥ मगर हाय री हमारी किस्मत ,,,,,,वो यंत्र तो यंत्र , खुद का हमारा डेढ पाव का संचार यंत्र भी मरणासन्ना हो गया ॥ पता चला कि सरकार की कुछ नीति ही ऐसी है ॥

सत्यानाशी सरकार यहां भी पीछा न छोडा । हम कहां मानने वाले थी .....बाबा समीरानंद, बाबा ताउआनंद के बाद .......बाबा झाउआनंद बनने की फ़ुल तैयारी हो ली थी ......। रही सही कसर वहां पड रही ठंड ने पूरी कर दी ...मरी ने ऐसा जकडा कि हम ....भीष्म शैय्या पर लंबलेट हो लिए .....। मौन मोड और कमोड ( बुखार के बीच में जिसे लूज मोशन कहते हैं न वो भी हमसे लिपट बैठा था ) के बीच हमें बहुत से दिव्य ज्ञान प्राप्त हुए ..जिनका खुलासा हम तुम्हें धीरे धीरे बताएंगे वत्स ।

मित्र बडे धैर्यपूर्वक सुन रहे थे .......कहने लगे कैसे मानें ...आपने कोई बोध कथा तो सुनाई नहीं .....

लो तो ये कौन बडी बात है सुनो ,

"एक बाग में एक गुलाब का पौधा था उसके रूप को देख , उसके फ़ूलों के सुंगध , आदि से सारा बाग महका और चहका रहता था गुलाब का पौधा भी अपने फ़ूल के सुर्ख चटख रंग से सबको मोहित करने पर मन ही मन बडा खुश रहता था ..एक दम मौन मौज में सबकी खुशी में ही अपनी खुशी ढूंढता और बांटता था पूरी बगिया भी अपने पौधे को बहुत स्नेह और मान देती थी एक दिन अचानक पौधे के मन में जाने क्या आया कि उसने सोचा कि अब तक तो मैंने फ़ूलों से ही काम लिया है मगर मेरे पास तो कांटे भी हैं उनका तो अभी तक मैंने कोई उपयोग ही नहीं किया अगले दिन से उसने अपने फ़ूलों के साथ साथ कभी कभी कांटों का प्रयोग करना भी शुरू किया बगिया के अन्य पौधे जानते थे कि पौधा मनमौजी है मगर दिल का साफ़ है शायद जानबूझ कर ऐसा नहीं किया होगा ..सो थोडी बहुत चुभन को वे झेल जाते मगर पौधे को फ़ूल और कांटे को मिला कर पैदा की गई मौज में अब मजा आने लगा था उसने धीरे धीरे फ़ूलों की खुशबू कम की और कांटो और धारदार बना के नुकीला करना शुरू किया सबसे पहले उस पौधे के अन्य गुलाबों को भी छिलन सी महसूस हुई , उन्होंने उसे समझाया कि कांटों का उपयोग शत्रुओं के लिए किया जाना चाहिए मित्रों के लिए नहीं मगर अब वो भला कहां मानने वाला था ......................

फ़िर आगे क्या हुआ मित्र ने पूछा ...........

चुप बे ......अभी आगे क्या हुआ से क्या मतलब ..ये बोध कथा है ....जैसे जैसे बोध होता जाएगा कथा आगे बढती जाएगी समझा ...अभी तो इतना ही बोध हुआ है ..............
तो बाबा अभी अंडर ट्रेनिंग हैं ....वहां तो कोर्स कंप्लीट हुआ नहीं ..वैसे भी सारी थ्योरी की क्लासें तो यहां लगनी थीं ...सो हम अपना कमंडल उठा के चले आए हैं ......आगे की पढाई पूरी करने के लिए ॥

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

मौज बनाम फ़ौज ,: ब्लॉगर चिंतन , ब्लास्ट नहीं सुतली बम

बडका :- तब छोटका .....खूबे मौज चल रही है आजकल .......देखिये रहे हैं ...आ रहे हो .....जा रहे हो ..

छोटका :- प्रभु ...प्रभु .....ई मौज का नाम मत लो .....आज कल ई शबद पर बहुते ....शनि ग्रह का प्रभाव चल रहा है .....अजित भाई को कहे हैं कि ई ...शब्द से संबंधित जतना जानकारी ....उपलब्ध हो ...(अरे हमको मालूम है कि ....एक ठो लाईब्रेरी मा .....ई शब्द से रिलेटेड ....सांईस, भूगोल, इतिहास, गणित ....सब का पूरा थीसिस जमा है ) ...तनिक ...शब्दों का सफ़र में ऊ पर प्रकाश डाला जाए.....ताकि ई शब्द को लेकर ...लोगन को सफ़र (suffer ) नहीं करना पडे ॥..प्रभु अब तो सुने हैं कि .....मौज के खिलाफ़ ....पता नहीं कौन कौन फ़ौज ....और ब्रिगेड ....सब भी खडा हो गया है जी .....अब ई मौज को मौजा....और फ़िर जुत्ता बनते देर नहीं लगेगी ..॥ हमको तो माफ़े करिये.......

बडका :- अरे काहे घबराते हो ...भाई......मस्तिया के ब्लागिंग करो एक दम ..तुम तो अंग्रेजी साहित्य पढे हो न ......ऊ जूलियस सीजर ...ब्रूटस ...का कहनियां सब ॥

छोटका :- अरे का बताएं ....महाराज ...हम तो अपने ग्रेजुएशने में ...अंग्रेजी एतना ढेर पढे न ..कि बाद में मने औकिया गया .....जैसे जैसे अकल आया ......आगे होते ही ...प्रेमचंदिया गए ....मुदा आप ई क्वालिफ़िकेशन (कु औल फ़ेक शन ) के बारे में काहे पूछे जी ..॥

बडका :- अरे हम कहां पूछ रहे हैं भाई .....लोग बाग पूछ लेता है कभी कभी ....काहे से ब्लागिंग में ..पैसा और समय दुनु ...एक साथ बर्बाद होता न है ....तो ई देख रहे थे कि ..का ..क्वालीफ़ाईड लोग भी करता है समय और पैसा बर्बाद ..।

छोटका :- लीजिए ई कौन ढेर मुश्किल सवाल है ...हम तो सुने हैं कि ढेर अफ़सरान/हाकिम लोग भी ब्लागिंग में हईये है.....अब बर्बाद का कर रहा है ई नहीं पता ...पैसा/समय ...कि ब्लोगजगते को बर्बाद किए दे रहा है लोग ......का मालूम ......असलियत का है ....?????तो आप कुछ सोच रहे हैं का ई बारे में .....मतलब एतना "रेस्टिव " माने आराम से ......माने .....अरे छोडिये ....कहे का मतलब.....कौनो काम कर रहे हैं कि नहीं ......काहे से कि ....खाली तो नईंये बैठ सकते हैं न आप ...कुछ नाम नूम कमाने के लिए हैं कुछ ........खुर्फ़तिया आईडिया .....॥

बडका :- हा हा हा ...केतना हुसियार हो गये हो तुम जी ....अरे कुछ खास नहीं ...एक ठो कैरेक्टर खडा किये हैं ....दद्दा जईसन ...आउर जानते ..उसके माध्यम से अईसन दुधरिया चला रहे हैं ..कि केधरो चले ....कुछ काटिये के आएगा ....हा हा हा ..॥ और इससे भी आगे जा के ....एतना बौखला दिए हैं न ...लोग बाग हम पे सीधे मोकदमा ठोंक डाले ......

छोटका :- अरे ....भकलोल जी महाराज .....मुदा ई सब से तो आपका भी किरकिरी नहीं होगा ....ई मोकदमा कचहरी .....ई छद्म कैरेक्टर ......आउर ..

बडका :- अरे सुनो सुनो .....एतना "उद्वेलित " काहे होते हो बात बात में ......यार जब तक कौनो पर मोकदमा नहीं न चल जाएगा सब एकदम नार्मले चलेगा .....और ई तो हमरे रहते हो नहीं सकता ...फ़िर हमरे खुर्फ़तिया ...दिमाग का काहे कोई दाद देगा ....अईसे नहीं न देता है॥ फ़िर घबराते हो काहे ...हमरे पास पच्चासी हज़ार वाला ..रिवाल्वर तो हईये है न...?

छोटका :- अरे रे रे का सोच कर रहे हैं आप ...।बोल लिए न ....अब ई छोटका ब्लागर का बात सुना जाए ........नवाब साहिब .....अब तो सुने हैं कि लखनऊ बाले ...नवाब अली भी ...उधरे बिर्गेड के तरफ़ हैं.....एक तरफ़ छत्तीस (तो खाली कहता है लोग जी ..असल में त एक एक ...इक्ल्ले ही पचास के बराबर है ) धुरंधर पहिले ही कह दिया है ....कि अईसन ब्लास्ट करेंगे ........कि सब....भरभरा जाएगा....॥और जाते जाते ई भी सुनते जाईये....कि सुने हैं कौनो ..दिल्ली में भी चक्कू पिजा रहा है ......और........

बडका :- अरे ओ ....रे का तो नाम है तुम्हरा जी .........कौफ़ी पिलाओ ...ई तो हडका रहा है छोटका......
अरे कहां गया जी .......रे महाराज ....चल कुछ ...खर्चा किया जाए......रे नाम का महाराज है कि ...कुछ खिलईबो पिलईबो करेगा ......



शनिवार, 5 दिसंबर 2009

अमा यार ! जाने तो देते......वापस भी आ जाता ..

बस बहुत हुआ ........अब और नहीं ....अब ज्यादा चुप्पी रही तो जाने क्या क्या अफ़साने बन जाएं, जाने कितनी मौजें ली जाएं और जाने कितनी ....छोडिये ये सब.....

पिछले दिनों चाहे अनचाहे जो हुआ सब आपके सामने आया और अलग अलग रूपों में आया ...सोचा तो ये था कि चलो इसी बहाने से अब थोडी आरामपरस्ती भी हो जाएगी ..और देर सवेर हमारी ब्लागगिंग से हमें दूर करने वालों को घडी दो घडी की खुशी भी मिल जाएगी ....सो चादर तान के सोने की फ़ुल तैयारी कर ली ॥ मगर हाय रे किस्मत .....किसी ने हमारी चादर पर भर भर के बाल्टी भर पानी उलट दिया तो किसी ने .....चादर में ही पलीता लगा दिया ....सेंक मारने को ......अब क्या खाक सोते ....वैसे भी ये भी हाल ही में पता चल गया कि किसी ब्लागर का यूं बीच में सोना .....गुनाह है जी सरासर पाप ....जब तक कि वो परमानेंन्टली न सो जाए....सो भावार्थ ये कि आप सबके स्नेह और दिन प्रतिदिन के हिसाब से ली जा रही हमारी रपट ने कुल मिला कर हमें ...बिल्कुल भी अलग नहीं होने दिया ॥ मगर यहां मैं उन लोगों को ये बताता चलूं कि ...ये जरूरी नहीं कि जब ब्लोग्गिंग छोडनी पडेगी तो चुपके से निकल जाया जाए......कम से कम मैं तो ऐसा नहीं करूंगा .....और विश्वास रखिए .....जिस दिन मैंने अपने ब्लोग पर खुद ये कह दिया वो दिन ...मेरी ब्लोग्गिंग का आखिरी दिन होगा .....और हां यहां उन्हें ये भी याद दिला दूं कि जरूरी नहीं कि हर जाने वाला वापस लौट के आ जाए.......। कारण , तर्क वितर्क सब अपनी जगह धरे रह जाते हैं ......सब इंसान के साथ जुडे होते हैं और इंसान जुडा होता है भावनाओं के साथ ॥खैर मेरे लिए इतने समय में ब्लोग्गिंग क्या हो कर रह गई है .....पता नहीं .....

ब्लोग्गिंग मेरे लिए अब एक परिवार है ...जिसमें सब हैं, हर रिश्ता, सुख दुख, सम्मान, अपमान, लाड दुलार, तिरस्कार ...सब कुछ ..अब ये मेरी खुद की फ़ितरत और चरित्र पर निर्भर करता है कि ....मुझे अपने परिवार से क्या मिल रहा है ....(और ये शायद बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि मैं अपने परिवार को क्या दे पा रहा हूं )..पिछले कुछ दिनों में आप सबके स्नेह और चिंता ने मुझे बता और जता दिया है कि ....यदि हिंदी ब्लोग्गिंग के प्रति मेरी चाहत दीवानगी के स्तर तक है तो उसके लिए मेरे पास वाजिब कारण भी फ़ख्र करने के लिए ॥

ब्लोग्गिंग मेरे लिए अब वो दायरा है .....जहां मैं सोचता हूं, घूमता हूं, ओढता हूं पहनता हूं .....और शायद यही वजह है कि अपने संपर्क सूत्रों (फ़ोन मेल पते ) का उपयोग/सदुपयोग मुझे सीधे या प्यार वाली धमकियों के लिए किए जाने के बावजूद भी मैं उसे हर जगह सार्वजनिक करता हूं ....क्योंकि मैं तो आप में से ही एक हूं ......हूं ...न॥


अब चलते चलते मौज की बात ....भाई मिथिलेश दूबे जी, खुशदीप भाई, पाबला जी , और आज राजकुमार ग्वालानी भाई ने अपनी पोस्टों के माध्यम से अपने अपने स्नेह की मुझ पर खूब बौछार की .॥...जिन्होने मौज लेनी थी ॥उनके पास भी पर्याप्त कारण और बहाने थे मौज लेने के .....सो ली भी गई ...हालांकि जब उन्हें मैं ये कहने या मानने से नहीं रोक सका कि ....मैं टिप्पू चच्चा नहीं हूं ...(।हालांकि मैंने इसके लिए गंगाजी में उतर के कसम खाने जैसा कोई संकल्प टाईप कार्यक्रम भी आयोजित नहीं किया ) तो फ़िर उन्हें मौज लेने से मिलने वाली खुशी से कैसे रोकता ॥ मगर अफ़सोस कि बात का बतंगड बना .....और ये तो अब रीत बन चुकी है ॥सो मुझे आश्चर्य भी नहीं हुआ .....हां इतना जरूर हुआ कि पुन: कष्ट हुआ ....खैर ....ये कोई बडी बात नहीं होनी चाहिए .....। मौज मौज में बात मौजे से निकल कर हर बार पहले जूते तक और फ़िर जूतम पैजार तक निकल आती है ..ये अजीब लगता है ...और इसमें लगे हाथ वे ..जर्नैल भी अपना कैरियर चमकाने लगते हैं ....जो जैदी बनने की चाह रखते हैं ......उन्हें भी समझना चाहिए कि जैदी बनने के लिए सिर्फ़ जूते की नहीं ....अमरीकी राष्ट्रपति की भी जरूरत होती है । मगर हिंदी ब्लोग्गिंग और ब्लोग्गर्स को कोसने वालों से .....क्या शिकवा ..और कैसी शिकायत ....वे तो बेचारे परजीवी समान हो चुके हैं ॥

अब रही बात वापसी कि......तो हुजूरे आला ....आप पहले यदि मुझे जाने देते तो आ भी जाता ....वापस और कहता भी कि ..लो जी मैं फ़िर से वापस आ गया .......।खैर अब तो पहले की तरह ही आपके बीच हूं ....हां चलते चलते आने वाले समय के लिए कुछ बताता चलूं तो शायद बात दूर तलक पहुंचे

....भई हमारा घर तो सभी ब्लोग्गर्स मित्रों के लिए खुला है ...जब जो चाहें आएं , गले लगाएं , अब इससे ब्लोग्गिंग पर क्या फ़र्क पडता है .....ये तो वे ही जानें ....जो मुझ जैसे मेरी ही मानें ॥

कुछ लोगों ने मकसद की बात की है ...तो क्या अब ये भी बताने की जरूरत है कि ..हिंदी ब्लोग्गिंग में हमारे घुसे रहने का मकसद क्या है ...ये तो आने वाला समय खुद बता देगा जी ...और लगे हाथ आप भी देखना ...हां अभी सफ़ाई अभियान का जो मकसद है ..वो अलहदा अलहदा ..ही पूरा किया जा रहा है ....सोचता हूं जिस दिन सब एक साथ ही ............

अब बात सक्रियता की ....तो देखिये अगले साल तक क्या क्या होता है ...सुना है ब्लोग्गिंग में ...भी दुरंतो ट्रेन .....अरे वही सबसे फ़ास्ट वाली ....शुरू होने जा रही है .....हां हां जी मैं खुद चलाऊंगा .....आप बैठेंगे न मेरे साथ .....तेज हवा में तो हलके फ़ुल्के अपने आप ही झड/उड जाएंगे .....अब तो दिल्ली ..से जम्मू, फ़िर हरिद्वार, फ़िर बिहार, फ़िर छतीसगढ ..लखनऊ........उफ़्फ़ कहां कहां का नाम गिनाऊं ....बस इतना ही कि ...इन सब जगहों से ब्लोग्गिंग जारी रहेगी .....और ये सफ़र भी ..

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

दिल्ली ब्लॉग बैठकी का सिलसिला आगे बढ़ा , एक और बैठक हुई

अभी तो दिल्ली ब्लोग बैठकी की खुमारी तो पूरी तरह उतरी भी नहीं थी कि ये सिलसिला और आगे बढता सा जान पडा .....। आप सोच रहे होंगे यार ये झाजी तो अपनी ब्लोग्गर मिलन की अमर चित्र कथा पढा -दिखा कर ॥बिल्कुल पका देने पर तुले हुए हैं ...अब क्या करें जी जब हम बिलागर्स आपस में मिल बैठ के बतियाएंगे .....और जाहिर है कि ब्लोग्गिंग पर ही बतियाएंगे ....तो फ़िर उसे आप तक पहुंचाना भी तो हमारी ड्यूटी बन ही जाती है ...तो लिजीये हाजिर हैं ..।

दरअसल हुआ ये भाई दीपक मशाल ने सूचित किया कि उनकी स्वदेश वापसी हो रही है ...और उनका हवाई जहाज दिल्ली में ही उतरेगा सो सबसे मुलाकात हो जाए.....।तय कार्यक्रम के अनुसार वे पहुंचे और सबसे पहले खुशदीप भाई से उनकी मुलाकात हुई ॥वहीं से फ़ोनियाते हुए ये तय करने का प्रयास हुआ कि मुलाकात कहां हो ...।अपने राजीव भाई जैसे पहले ही ताक में बैठे थे ....फ़ट से न्योता दे डाला कि कल यानि ..२६/११/०९ को दोपहर का भोजन उनके यहां पर किया जाए...। हमने भी हामी भर दी .....एक और बैठकी का बहाना ...भला हम कहां छोडने वाले थे ॥ मगर छब्बीस की सुबह जब राजीव भाई (श्री राजीव तनेजा जी , हंसते रहो वाले) का फ़ोन आया तो ...बुलबुल की तबियत और कुछ कार्यालयीय मजबूरियों के कारण मैं थोडी अनिश्चितता दिखाई .......मगर उन्होंने अगले ही पल भाभी जी यानि श्रीमती संजू तनेजा जी से रिक्वेस्ट डबल करा दी । धर्म संकट बढ गया था ॥


हमने भी बचपन में स्कूल बंक करके पिक्चर देखने के लिए अपनाई जाने वाली सफ़ल तकनीक का अचूक उपयोग किया ...किसी बहाने से निकले...रास्ते में स्कूटर में वर्दी उतार कर रखे कपडे पहने और ...चल दिये तनेजा निवास । रास्ते में ही सूचना मिल गई कि छोटे मियां भाई दीपक मशाल पहले ही पहुंच चुके हैं । उनके घर पहुंचे और दीपक को देखने के बाद मेरे मन में जो पहला ख्याल आया वो ये था कि ...यार यदि अपने ब्लोग्गर्स को लेकर एक फ़ैशन परेड कराई जाए तो हिट रहेगा ...महफ़ूज़ अली, दीपक मशाल, खुशदीप सहगल....एक से एक स्मार्ट छोरों की लाईन है अपने पास ........। शो स्टौपर के रूप में उडन जी को लपेट लेंगे .....। वहां पहुंचे तो राजीव भाई के पडोस में रहने वाली विख्यात हास्य कवि ...बागी चाचा भी पधारे ...और कुछ ही देर में श्री एम एल वर्मा जी भी पहुंच गये ॥बाद में पता चला कि वे भी हमारी तरह ही बीच से निकल आए हैं॥ बस फ़िर तो कवियों और हास्य की धारा ऐसी बही कि पता ही नहीं चला कि कब समय बीत गया ...चाय, नाश्ते ,पकौडे , भोजन, फ़िर चाय कौफ़ी का दौर खूब लंबा चला ...और क्यों न चलता ,श्री राजीव भाई जितनी लंबी पोस्ट लिखते हैं उतना ही लंबा आयोजन भाभी जी ने खाने पीने का बना दिया । इसी बीच फ़ोटो शूट हुई ॥सबको एक साथ एक ही फ़ोटो में समेट लेने की हमारी दुविधा को हल किया ...राजीव भाई के सुपुत्र ने ...जिसने हम सबके मोबाईल से सबकी फ़ोटो बारी बारी खींची ....देखिये न


( बैठे हुए बाएं श्री एम एल वर्मा , और बागी चाचा ,
बाएं से राजीव भाई, दीपक मशाल, अजय कुमार झा और श्रीमती संजू तनेजा )




बात ही बात में हम लोगों ने बागी चाचा , श्री एम एल वर्मा जी , राजीव भाई , और दीपक मशाल की रचनाओं के पाठ का आनंद भी लिया । हमारे आग्रह पर कि ,बागी चाचा जैसे साह्त्यकारों को भी हिंदी ब्लोग्गिंग में लाया जाए...और बागी चाचा तथा ,श्री एम एल वर्मा और खुद हमारी कई तकनीकी शंकाओं के निवारण हेतु राजीव भाई ने एक इंस्टेंट कंप्यूटर क्लास लगाई ....बांकी विद्यार्थी तो क्लास ले रहे थे ॥हम पोस्ट बनाने के चक्कर में फ़ोटिया रहे थे....ठीक कर रहे थे न ....।

लेकिन इन सब बातों के बीच एक बात और तय हुई कि अब हम लोगों को कोई एक निश्चित स्थान ...तय करना चाहिये जहां समय समय पर सबसे मुलाकात और बात की जा सके ....तो आप तैयार हैं न .....उस समय और स्थान पर हमें गले लगाने और गले लगने को ॥

दिल्ली ब्लोग बैठकी का सिलसिला आगे बढा ...

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

दिल्ली ब्लोग बैठक में हुआ फ़ोटो शूट (आखिरी रपट)

आप लोग सोच रहे होंगे कि दिल्ली ब्लोग बैठकी में खाली खूब गंभीर बातें, विचार-विमर्श,और यही सब कुछ हुआहोगा नहीं जी ...जब राजीव तनेजा जी , कार्टूनिस्ट इरफ़ान भाई ...और स्लौग ओवर स्पेशलिस्ट खुशदीप जी एकसाथ मौजूद हों और ऊपर से साथ में हम खुद ,भरी हुई बस में कंडक्टर की तरह लटके हुए हों तो ...और हम सबकेऊपर श्री बी एस पाबला जी और वकील साहब भी मार्गनिर्देशन हो तो फ़िर चुहल हो ....ऐसा तो संभव तो नहीं थाअब ज्यादा क्या कहूं ॥पाबला जी तो हमेशा की तरह अपने अचूक हथियार...अपने कैमरे से पहले ही लैस थेहम सब भी कौन कम थे .....अपनी अपनी गुलेल (अजी उनके कैमरे जो किसी भी रूप में के छप्पन से कमनहीं था ॥उसके सामने तो हमारा मोबाईल गुलेल ही था ) को तान कर जो निशाने लिये ....देखिये आपके सामने हीहै

... ... (ये पाबला जी सारी फ़ोटुएं खींच ले रहे हैं मैं भी अपने मोबाईल से खींच लूं खुशदीप भाई ....यार पोस्ट ठेलने के काम आएंगी ........?)











(
यार एक कार्टूनिस्ट भी फ़ोटो खेंच सकता है......अरे आप नहीं मानते लिजीये देखिये ...सबका ऐसा कार्टून बना दूंगा कि.....कि असली चेहरा सामने जाएगा )














{अरे नहीं नहीं इरफ़ान जी .....देखिये आप जो फ़ोटो खींच रहे हैं ......उसमें ये वाला लीगल ऐंगल डालिये ....फ़िर
चाहे ......फ़िर मजे से वो बवाल टाईप....(बवाल टाईप वाला कार्टून याद है ) ........भी बनाईयेगा तो कोई आपका खंबा नहीं हिला सकता .....अरे ये तीसरा खंबा की गारंटी है जी }













(हाय राम ......ये सब तो अपने अपने एंगल से फ़ोटो खींच रहे हैं ....मेरा राजू (राजीव भाई ) कहीं पीछे रह
जाए...जल्दी से मैं भी खेंच लूं ......आखिर अपने ब्लोग में भी तो कुछ लगा लूंगी .....)














" अमा, छोडो ये फ़ोटो शोटो हम तो टीवी वाले हैं भाई .....बडे कैमरे वाले....यार ये सब फ़ोटो में लगे हैं फ़टाफ़ट नोटस
बना लेता हूं ....जाते ही सबसे पहली पोस्ट मैं ही ठेल दूंगा ......खुशियों के ऐसे दीप जलेंगे....लोग ये फ़ोटो शोटो सब भूल जाएंगे.......साथ में एक स्लौग ओवर

सोमवार, 23 नवंबर 2009

ब्लौग बैठक में हुई सकारात्मक और नकारात्मक लेखन पर चर्चा


हां तो पिछली पोस्ट और उससे पिछली में अधिकांश बातें , जो ब्लोग बैठकी में हुई वो आपको बता ही चुका हूं ....अब जो कुछ बचा रह गया है ॥उसे भी बताए देता हूं ....हा हा हा ....मुझे मालूम है ॥आप सोच रहे हैं ...यार कित्ता बतिया लिए इतने में ही मुआं रिपोर्ट खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही ॥दुम पे दुम जोडे चले जा रहे हैं झा जी .....नहीं जी आप बिल्कुल मत घबराईये .....बस ये कुल आखिरी ......अरे नहीं नहीं आखिरी से पहले वाली पोस्ट है .....चलिये आप तो ये सुनिये कि अगली बात क्या हुई ॥

हमारे बीच बहस का अगला मुद्दा या कहूं कि जिस बिंदु पर चर्चा हुई वो था इन दिनों ब्लोग्गिंग में जारी धर्म विषयक लेखन ॥ हालांकि अभी ये सब थोडा शांत है ,मगर चूंकि अभी कुछ समय पहले ही धर्म आधारित पोस्टो और आरोप -प्रत्यारोप , छीछालेदारी का जो दौर चला था उसने तो जैसे कुछ समय के लिये हिंदी ब्लोग्गिंग को एक जगह केंद्रित सा कर दिया था । सभी बडे छोटे ( यहां, अनुभव , लेखन, उम्र सब के हिसाब से कह रहा हूं ) ब्लोग्गर्स पोस्ट और पोस्ट नहीं तो टिप्पणियों या प्रति टिप्पनियों के माध्यम से चाहे अनचाहे उस में पड रहे थे ......मगर ये सब ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता है सो इश्वर की क्रपा से सब जल्दी ही शांत हो गया ॥ इस मुद्दे पर बात रखते हुए सबने जो बातें अलग अलग रूप में कहीं उसका निहितार्थ था .....कि धर्म एक ऐसा विषय जो नितांत निजि है और उसे वैसे ही माना और रखा जाना चाहिये । बात हुई कि तो फ़िर ऐसे में क्या किया जाए जब कुछ लोग जानबूझ कर ॥ऐसी बातों को उभारते हैं जो आक्रामक माहौल बनाती हैं ...और फ़िर वो सब बोला और बुलवाया जाता है जो शायद वो कतई नहीं चाहता ....इसके लिये भी सबके अलग अलग मत थे ॥मसलन वही उनकी उपेक्षा की जाए....उन पर ध्यान ही न दिया जाए....,,आदि आदि॥मगर मुझे लगता है कि एक बार या दो बार पोस्ट आने के बाद ऐसी मंशा वाले लेखकों से निपटने के लिए ऐग्रीगेटर्स को ही कुछ न कुछ सोचना और करना चाहिये .....प्रतिबंधित न सही तो कम से कम से ब्लैक लिस्ट तो कर ही देना चाहिये .......॥




इसी क्रम में चर्चा के दौरान मैंने भाई खुशदीप और मुख्य रूप से द्विवेदी जी से प्रश्न किया कि आखिर ऐसा क्यों लगता है कि अक्सर नकारात्मक लेखन .....सकारत्मक लेखन पर हावी हो जाता है । सबका मानना था कि ऐसा नहीं है ॥क्योंकि विवाद को जितना भी खींचा जाए ,बढाया जाए, मगर सर्वकालिक लेखन ही हमेशा याद रखा जाता है .....और उसीका लेखक भी । और फ़िर नकारात्मकता की ओर सुलभता से आकर्षित हो जाना तो मानव का स्वाभाविक चरित्र है । यहां मुझे एक किस्सा याद आ रहा है जो शायद इस बात को ज्यादा बेहतर तरीके से सामने रख सके । एक बार एक विद्यालय के सामने एक छोटी सी बच्ची अपनी कोई बात एक पैंफ़लेट के माध्यम से सबको पढाने की कोशिश कर रही थी । वो विद्यालय के सामने से गुजरने वाले हरेक पैदल, गाडी वाले को रोक कर वो पैंफ़लेट पकडाती ...पकडने वाला एक उचटती सी निगाह उस पर डालता और थोडा सा आगे बढते ही उसे फ़ेंक कर आगे चल जाता ॥ इसी बीच एक मोटर सायकिल सवार ने बच्ची के पास आके कुछ कहा ...। बच्ची ने अगले व्यक्ति को वो पैंफ़लेट मोड तोड कर पकडाया ,......उस व्यक्ति ने कौतूहलवश उसे लेकर पूरा पढा ...और आने जाने वाले दूसरों को भी उत्सुकता हो गई ॥


कहने का मतलब ये कि ये तो मानव का स्वभाव है तो फ़िर जाहिर कि लेखनी में कैसे इस स्वभाव से अलग रहने की अपेक्षा की जा सकती है ॥। बस इस सबके अलावा हो बातें हुई वो आपसी स्नेह और हमारी आपसी चुटकियां थी ....जी हां और उन सबके बारे में आपको बताऊंगा अपनी अगली और आखिरी रिपोर्ट में ॥


शनिवार, 21 नवंबर 2009

दिल्ली ब्लॉग बैठक में हिन्दी ब्लॉग्गिंग और मीडिया पर चर्चा


पिछली दोनों पोस्टों में दिल्ली ब्लोग बैठकी और पाबला जी , तथा द्विवेदी जी केदिल्ली प्रवास के दौरान हुई चर्चाओं पर मैं काफ़ी कुछ लिख चुका हूं .. आजउसी को आगे बढाते हुए फ़िर कुछ उन मुद्दों पर लिखने जा रहा हूं जो हमारीबातचीत के दौरान निकल कर सामने आई ॥इनमें से पहला मुद्दा था ..हिंदीब्लोग्गिंग और मीडिया ...इससे जुडी दो बातें मुख्य रूप से हमारे बीच चर्चा केलिये आईं पहली ये कि क्या सचमुच ही हिंदी मीडिया ..यहां मीडिया से मेरा तातपर्य प्रिंट मीडिया का है ...हिंदीब्लोग्गिंग और ब्लोगर्स को महत्व देने लगा है ....और क्या देर सवेर ये महत्व बढने वाला है

बात जब निकली तो जिक्र हुआ ..विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं द्वारा नियमित अनियमित रूप् से स्तंभों केमाध्यम से ब्लोग पोस्ट्स को स्थान दिये जाने के बढते हुए चलन की चूंकि पाबला जी का अनोखा ब्लोग ब्लोगऔन प्रिंट इसी विशेषता को लिये हुए है और हमारी भी भागीदारी उसमें होती है सो जाहिर था कि इस विषय परखुल कर बातें हुई बैठक के दौरान खुशदीप भाई ने वही बात उठा दी जो कुछ दिनों पहले अविनाश वाचस्पति जीने उठाई थी ...यानि जो भी समाचार पत्र ब्लोग पोस्ट्स को उठा कर छाप रहे हैं उन्हें इसके एवज में कुछ पारिश्रमिकके रूप में ही सही उस पोस्ट के लेखक को भी देना चाहिये यहां विमर्श के दौरान मैंने अपना वही मत रखा जो मैंपहले भी कहता रहा हूं इस विचार से अलग मेरा मानना ये था , जिसे मैंने कहा भी कि ....आज यदि ब्लोग पोस्टसका जिक्र हिंदी के समाचार पत्रों में किया जा रहा है तो हर लिहाज से सिर्फ़ महत्वपूर्ण है बल्कि हिंदी ब्लोग्गिंग केलिये फ़ायदेमंद भी है आज ब्लोग पोस्ट्स को वही लोग पढ पा रहे हैं जो नेट के माध्यम से जुडे हुए हैं मगर जब येपोस्ट किसी समाचार पत्र या पत्रिका में जाती हैं तो इसका दोहरा लाभ होता है पहला ये कि आपकी कही गयीबात को विस्तार मिल जाता है ..यानि पत्र-पत्रिका के माध्यम से वो लाखों लोगों की पहुंच में जाती है ..दूसरा येकि चूंकि उनमें ब्लोग्स का जिक्र भी होता है इसलिये स्वाभाविक रूप से पढने वाले के मन में ब्लोग्स के प्रति , ब्लोग्गिंग के प्रति जो जिज्ञासा पैदा करती है ....वो कालांतर में एक नया ब्लोगर के रूप में सामने आती है

रही बात पारिश्रमिक के रूप में कुछ देने की तो जो पत्र नियमित रूप से ब्लोग पोस्ट्स लगा रहे हैं वे उसे संपादकों केनाम पत्र , या पाठकों की राय ....जैसे स्तंभों के विकल्प के रूप में स्थान दे रहे हैं जिसके लिये जाहिर है कि कोईपारिश्रमिक नहीं दिया जाता हां जो पत्र पूरी पोस्ट को आलेख के रूप में छाप लेते हैं उन्हें जरूर इस विषय मेंसोचने के लिये कहा जाना चाहिये क्योंकि आखिर उस पोस्ट की जगह छपने वाले आलेख के लेखक को भी तो वेभुगतान करते ही होंगे हालांकि पाबला जी , और हम सबके बीच इस बात की भी चर्चा हुई कि अधिकांश पत्र ..बारबार एक ही जैसी पोस्टों, बल्कि ब्लोगों , को स्थान देते हैं जिससे उसकी उपयोगिता थोडी कम सी हो गई है वैसेइसका एक कारण जो मेरी समझ में आया वो ये कि जिस तरह प्रिंट मीडिया में एक बीट से जुडे सभी लोग ..चाहे वोफ़ील्ड में हों या डेस्क पर आपस में तालमेल बनाए रखते हैं ..उसी तरह इन पत्रों में ब्लोग पोस्ट्स को स्थान देनेवाले भी तो आपस में संवाद करते ही होंगे तो सभी पत्रों में एक ही तरह की पोस्टों को स्थान मिलने पर कोई आश्चर्यनहीं होना चाहिये॥

हिंदी ब्लोग्गिंग और मीडिया के संदर्भ में मेरा दूसरा प्रश्न था पाबला जी से किजैसा कि कहा जा रहा कि ...हिंदी ब्लोग्गिंग वैकल्पिक मीडिया का रूप लेता जारहा है ..तो क्या ये सच में हो रहा है मेरे पूछने का मंतव्य था कि ....पाबला जीमैंने जब ब्लोग्गिंग की ताकत के बारे में सुना था तो ..इराक युद्ध के दौरान चर्चामें आया ब्लोग सलाम पैक्स के बारे में पढा था ..सुना था कि इस ब्लोग कीपोस्ट इतनी प्रभावी थी कि बीबीसी जैसी संस्था तक उस पर आधारित होकररिपोर्टिंग कर रही थी ...तो क्या ये कभी संभव है कि ये हिंदी ब्लोग्गिंग में कुछ ऐसा हो सके ...पाबला जी ने मेरीआशा के अनुरूप दोनों संभावनाएं व्यक्त कीं....ऐसा नहीं है अभी हिंदी ब्लोग्गिंग में कुछ साहसिक नहीं हो रहा हैमगर उस स्तर का नि:संदेह नहीं हो पा रहा है और इसके बहुत से कारण हैं निकट भविष्य में ऐसा हो पाएगाइसकी उम्मीद भी नहीं है ..मगर ये असंभव जैसा भी नहीं है जब ब्लोग्गर्स विकल्प और बदलाव को परखने कोऔर खुद को उसके लिए झोंकने के लिये परस्तुत करेंगे तो हिंदी ब्लोग्गिंग भी अपने नये आयाम स्थापित करेगी


देखिये आज फ़िर बात एक ही मुद्दे पर कितनी लंबी हो गई ..और हां मेरे से फ़ोटुएं किसी तरह रो पीट के एक आधही लोड हो पाती हैं सो पाबला जी से निवेदन कर दिया है ...पोस्ट मैं ठेले जा रहा हूं और भर भर के फ़ोटुएं वे दिखाएंगेऔर विश्वास रखिये ..वो कमाल की होंगी .....॥आगे बात करेंगे ....चलिये जब करेंगे ..तभी करेंगे ........................
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साथ चलने वाले

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