Blogger Template by Blogcrowds.

समर्थक

पसंद करने वाले फ़ेसबुकिए



पिछले कुछ दिनों से हिंदी ब्लोगजगत में कुछ अजीब तरह का माहौल बनाया जा रहा था । अब ये किस उद्देश्य को लेकर किया जा रहा था क्यों या किनके द्वारा किया जा रहा था और अब भी बदस्तूर जारी है अब उन बातों का जिक्र करने का कोई औचित्य नहीं है , क्योंकि सब कुछ खुली किताब की तरह स्पष्ट है । हालांकि मैं पहले दिन से ही कह रहा हूं कि ये सब एक एजेंडे के तहत ही किया जा रहा है । ब्लोगजगत को इस अंधे भटकाव से बचाने का सबसे अच्छा उपाय तो यही था कि सबसे पहले तो ऐसे ब्लोग्स को संकंलकों द्वारा अपने यहां जगह ही नहीं देनी चाहिए थी , और शायद पहले था भी ऐसा ही, कम से कम ब्लोगवाणी पर तो था ही । मगर ब्लोगवाणी के दोबारा सक्रिय होने के बाद जिन किन बदली हुई नीतियों के तहत उन्हें प्रवेश मिला । शायद तब संकंलकों को ये अंदाज़ा ही नहीं था इस बात का । खैर , मगर अब जबकि वैसा कुछ नहीं हो पाया तो जिस दिन से ये सारा खेल शुरू हुआ उसी दिन से इस बात के उपाय करने चाहिए थे । मसलन कुछ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए थी कि जो भी पोस्टें इस मंतव्य से लिखी जा रही थीं या उन पोस्टों की प्रतिक्रिया , स्वरूप भी लिखी जा रही थीं , उन्हें भी सीधा बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए था । मगर जाने ये भी संकंलकों के हाथ में है नहीं । मगर अब स्थिति विकट होती जा रही है । पूरा माहौल दूषित होता जा रहा है , और इसकी सडांध अब फ़ैल रही है । कहीं ऐसा न हो कि हिंदी ब्लोग्गिंग को जी भर के कोसने वालों को इस नायाब से भुनाने वाले मुद्दे का पता चल जाए और वे फ़िर इसी बहाने से अपनी राय जाहिर करें ।


आज मैं ब्लोगवाणी, और चिट्ठाजगत , (चूंकि ये दोनों ही आज हिंदी ब्लोग्गिंग के सबसे लोकप्रिय संकंलक हैं ) से इस पोस्ट के माध्यम से सिर्फ़ एक गुजारिश कर रहा हूं कि आप अब फ़ैसला लें कि आपको किस तरह के ब्लोग्गर्स चाहिए । जैसा आजकल खूब हंगामा मचाए हुए हैं वो या उनके अलावा जो बचे हुए ब्लोग्गर्स हैं वो । नहीं मैं ये दलील कतई मानने को तैयार नहीं हूं कि ऐसा संभव नहीं है । क्योंकि बहुत बार ये किया जा चुका है ।और उनके लिए भी जो ये कह रहे हैं कि इनकी उपेक्षा से इसका हल निकल सकता है , उनके लिए सिर्फ़ इतना कि ये उतना भी आसान नहीं है , जब बेवजह किसी का नाम लेले कर उसे गालियां दी जा रही हैं । किसी के मजहब , धर्म को निशाना बना बना कर उसे चोट पहुंचाने का काम किया जा रहा हो । इसलिए मैं संकंलकों से अभी आग्रह कर रहा हूं कि वे इस दिशा में अब कोई ठोस कदम उठाएं , अन्यथा एक निश्चित समय बाद मैं उनसे अपने ब्लोग्स को हटाने का आग्रह करूंगा । निर्णय जो भी होगा मुझे मान्य होगा ।और इस निर्णय के बाद जो करना होगा वो हम खुद ही कर लेंगे , जिसकी घोषणा मैं पहले भी कर चुका हूं और शायद अब समय आ गया है वो करने का ॥



दूसरा फ़ैसला ये कि अब आगे से "झा जी कहिन "ब्लोग पर या किसी और भी ब्लोग पर चर्चा वाली , लिंक्स वाली या कोई भी इस तरह की पोस्टें मेरे द्वारा नहीं आएगी । मन तो कर रहा है कि झा जी कहिन ब्लोग को सिरे से ही मिटा दूं । मगर ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि इसके साथ बहुत सारे लोगों की टिप्पणियां , उनका स्नेह जुडा हुआ है । हां जो चर्चा पोस्टों को ध्यान में रख कर उसके अनुसरणकर्ता बने हैं उनके लिए अग्रिम क्षमा चाहता हूं । ये फ़ैसला भी कई कारणों से लेना पडा है । सुना है कि चर्चा ही सारे फ़साद (जो कि ब्लोगजगत में धर्म विषयक पोस्टों के इतर चल रहे हैं ) की जड है । तो कम से कम मैं नहीं चाहता कि मेरी पोस्टें किसी भी तरह के मनमुटाव, पक्षपाती होने का कारण बनें । खुशी की बात है कि आजकल बहुत सी चर्चाएं हो रही हैं तो ऐसे में एकाध के नहीं होने से बहुत फ़र्क नहीं पडेगा ।उम्मीद है कि आप मुझे समझ सकेंगे ॥

19 टिप्पणियाँ:

आईये... दो कदम हमारे साथ भी चलिए. आपको भी अच्छा लगेगा. तो चलिए न....

21 अप्रैल 2010 10:43 अपराह्न  

क्या हमें थोडा इंतज़ार नहीं करना चाहिए अजय भाई , घर बाहर करना बेहद आसान है उसके बाद घर में बुला पाना शायद बहुत मुश्किल ! आशा है आप पुनर्विचार करेंगे !

21 अप्रैल 2010 10:55 अपराह्न  

आदरणीय सतीश जी , मैं अब तक चुपचाप ही सब देख सुन रहा था क्योंकि मेरे विचार से तो आज के समय में धर्म जाति, मज़हब और भाषा के नाम पर जो देख सुन पढ रहा हूं उससे तो मुझे यही महसूस होता है कि इन शब्दों को पाताल में गाड देना चाहिए , मगर अब तो ये सब बढ कर किसी महिला की मान मर्यादा के साथ खिलवाड करने तक पहुंच गया है , इसलिए मैं अपने निर्णय पर अडिग हूं और यही करूंगा जो कहा है ॥ अजय कुमार झा

21 अप्रैल 2010 10:59 अपराह्न  

अजय जी सादर वन्दे !
आपने एकदम सही कहा है! फिर भी हमें कोई रास्ता निकालने की जरुरत है यूँ हटना उन्हें और बढ़ावा देगा!
रत्नेश त्रिपाठी

21 अप्रैल 2010 11:10 अपराह्न  

ये क्या, भाई वकील साहब, जिन्हें जाना चाहिये वे जमे रहें और जिन्हें जमे रहना चाहिये, वे हट जायेंगे?

21 अप्रैल 2010 11:35 अपराह्न  

झा जी,
जो कुछ हो रहा है वह अच्छा नहीं है। मैं भी बहुत बुरा महसूस कर रहा हूँ। निश्चित रूप से धर्म का इस्तेमाल पिछली सदी में लोगों के बीच की एकता को तोड़ने के लिए हुआ है। लेकिन जो लोग सामने होते हैं वे सिर्फ मोहरे होते हैं। जरूरत तो इन के पीछे की शक्तियों को बेनकाब करने की है।

21 अप्रैल 2010 11:48 अपराह्न  

सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि इस बार ईलाज एकदम पक्का होगा इस बीमारी का यानि जड से ही सब खत्म किया जाएगा । ये तो बस अल्टीमेटम है , वर्ना सभी जानते ही हैं कि कानून के हाथ ..........हा हा हा हा हा ...अक्सर ऐसे मौकों पर एक क्रूर हंसी सुनाई देती है कानों में मुझे
अजय कुमार झा

21 अप्रैल 2010 11:50 अपराह्न  

आप चर्चा बंद करने कि बात कर रहे हैं और पहला कमेन्ट ही एक नए चर्चा करने वाले भाई साहब दे गए हैं.. :)

22 अप्रैल 2010 12:35 पूर्वाह्न  

हमें तो यहाँ ब्लागजगत के लोगों की मानसिकता ही नहीं समझ पा रहे...कुछ लोग जहाँ एक ओर तो इन धर्मान्ध लम्पटों का विरोध करने में लगे हुए हैं..वहीं दूसरी ओर उन लोगों के फालोवर बने बैठे हैं...कमाल है! क्या जरूरी है कि हर ऎरे गैरे का अनुसरणकर्ता बनकर उसके चिट्ठे पर अपना फोटो की नुमाईश की जाए.....

22 अप्रैल 2010 1:07 पूर्वाह्न  

पूरा घटनाक्रम अफसोसजनक चल रहा है. जाने क्यूँ अब स्व विवेक की बातें करने को भी मन नहीं करता. मैं फिर भी हिन्दी ब्लॉगजगत के प्रति आशांवित हूँ कि रास्ता निकलेगा.

22 अप्रैल 2010 4:27 पूर्वाह्न  

कुछ तो नियंत्रण ज़रूरी है।
आपका इस तरह सोचना वाजिब है।
लेकिन ये क्षणिक समस्याएँ होती हैं । समय के साथ स्वयं समाप्त हो जाएँगी ।

22 अप्रैल 2010 8:11 पूर्वाह्न  

कल चमन था, आज सेहरा हुआ,
देखते ही देखते, ये क्या हुआ...

जय हिंद...

22 अप्रैल 2010 9:57 पूर्वाह्न  

अफ़्सोसजनक.

रामराम.

22 अप्रैल 2010 10:03 पूर्वाह्न  

अच्छा नही लगा जी आपके इस फैसले को सुनकर


प्रणाम

22 अप्रैल 2010 12:08 अपराह्न  

@पंO डी के शर्मा "वत्स" जी
आदरणीय
जब कोई गूगल रीडर में किसी चिट्ठे को फालो करता है और बाद में अनसबस्क्राईब कर देता है, तब भी फालोवर में से हट नही पाता। शायद वहां से हटाने के लिये दूसरा कोई तरीका हो।
एक बात और है कि जो फालोवर नही हैं, वो भी तो वहां जा ही रहे हैं।

प्रणाम स्वीकार करें

22 अप्रैल 2010 12:15 अपराह्न  

Aapke vichar suljhe hue hain..aur kya kahun?

22 अप्रैल 2010 12:18 अपराह्न  

अरे! नाराज़गी छोड़ दीजिये....अब...

22 अप्रैल 2010 12:38 अपराह्न  

मान जाओ झा बाबु ..................नहीं तो दिल्ली आ कर समझाना पड़ेगा .......... और गर्मी तो आप देख ही रहे हो..... बहुत है ! इस लिए गुस्सा थूको और चर्चा चालू करो !
अगर आप ना माने तो सच में इस से ज्यादा दुःख कि बात कोई और ना होगी कि जिन लोगो कों जाना चाहिए वह तो है और बाकी चले जा रहे है नाराज़ हो कर !

22 अप्रैल 2010 1:20 अपराह्न  

झा जी ..चुपचाप आपको बहुते दिन से पढ रहे हैं ..लेकिन एतना गुस्सा ठीक नहीं है...हिंदी ब्लॉग पर तो बहुत सा अस्लील बात भी लोग लिखता है..लेकिन जाने दीजिए आप त कानून जानने वाले आदमी हैं... केतना लोग को मना किजिएगा... आदमी अपने समझदार है इहाँ पर... अब आपके दोस्त कह दिहिन की गोबर से बचकर निकल जाइए.. अजीब बात करते हैं.. गोबर से घर नीपता है और गोबर गनेस का पूजा होता है... आप ही बताइए नाक बंद करके रोड पार करना ठीक है कि रोड का गंदगी सफाई करना..ऊ भी एगो असलियत है और ई जो आप बोल रहे हैं ऊ हो सचाई है..सक्सेना जी ठीके कहते हैं कि तनी देखिये..जल्दियाने से का फायदा...

23 अप्रैल 2010 12:30 पूर्वाह्न  

नई पोस्ट पुरानी पोस्ट मुखपृष्ठ

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails

इन गलियों में झांके

लोड हो रहा है...
गैजेट प्रदाता ब्लॉग बुखार.
इसके बारे में अधिक जानिए: http://blogbukhar.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html