बेबाक , बिंदास , बेलौस ,बेसाख्ता सी कुछ बातें ......
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बिखरे आखर
ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,
उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार
मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये ...
1 सप्ताह पहले















आईये... दो कदम हमारे साथ भी चलिए. आपको भी अच्छा लगेगा. तो चलिए न....
चिट्ठाचर्चा ने कहा…
21 अप्रैल 2010 10:43 अपराह्न
क्या हमें थोडा इंतज़ार नहीं करना चाहिए अजय भाई , घर बाहर करना बेहद आसान है उसके बाद घर में बुला पाना शायद बहुत मुश्किल ! आशा है आप पुनर्विचार करेंगे !
सतीश सक्सेना ने कहा…
21 अप्रैल 2010 10:55 अपराह्न
आदरणीय सतीश जी , मैं अब तक चुपचाप ही सब देख सुन रहा था क्योंकि मेरे विचार से तो आज के समय में धर्म जाति, मज़हब और भाषा के नाम पर जो देख सुन पढ रहा हूं उससे तो मुझे यही महसूस होता है कि इन शब्दों को पाताल में गाड देना चाहिए , मगर अब तो ये सब बढ कर किसी महिला की मान मर्यादा के साथ खिलवाड करने तक पहुंच गया है , इसलिए मैं अपने निर्णय पर अडिग हूं और यही करूंगा जो कहा है ॥ अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
21 अप्रैल 2010 10:59 अपराह्न
अजय जी सादर वन्दे !
आपने एकदम सही कहा है! फिर भी हमें कोई रास्ता निकालने की जरुरत है यूँ हटना उन्हें और बढ़ावा देगा!
रत्नेश त्रिपाठी
aarya ने कहा…
21 अप्रैल 2010 11:10 अपराह्न
ये क्या, भाई वकील साहब, जिन्हें जाना चाहिये वे जमे रहें और जिन्हें जमे रहना चाहिये, वे हट जायेंगे?
मो सम कौन ? ने कहा…
21 अप्रैल 2010 11:35 अपराह्न
झा जी,
जो कुछ हो रहा है वह अच्छा नहीं है। मैं भी बहुत बुरा महसूस कर रहा हूँ। निश्चित रूप से धर्म का इस्तेमाल पिछली सदी में लोगों के बीच की एकता को तोड़ने के लिए हुआ है। लेकिन जो लोग सामने होते हैं वे सिर्फ मोहरे होते हैं। जरूरत तो इन के पीछे की शक्तियों को बेनकाब करने की है।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
21 अप्रैल 2010 11:48 अपराह्न
सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि इस बार ईलाज एकदम पक्का होगा इस बीमारी का यानि जड से ही सब खत्म किया जाएगा । ये तो बस अल्टीमेटम है , वर्ना सभी जानते ही हैं कि कानून के हाथ ..........हा हा हा हा हा ...अक्सर ऐसे मौकों पर एक क्रूर हंसी सुनाई देती है कानों में मुझे
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
21 अप्रैल 2010 11:50 अपराह्न
आप चर्चा बंद करने कि बात कर रहे हैं और पहला कमेन्ट ही एक नए चर्चा करने वाले भाई साहब दे गए हैं.. :)
PD ने कहा…
22 अप्रैल 2010 12:35 पूर्वाह्न
हमें तो यहाँ ब्लागजगत के लोगों की मानसिकता ही नहीं समझ पा रहे...कुछ लोग जहाँ एक ओर तो इन धर्मान्ध लम्पटों का विरोध करने में लगे हुए हैं..वहीं दूसरी ओर उन लोगों के फालोवर बने बैठे हैं...कमाल है! क्या जरूरी है कि हर ऎरे गैरे का अनुसरणकर्ता बनकर उसके चिट्ठे पर अपना फोटो की नुमाईश की जाए.....
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…
22 अप्रैल 2010 1:07 पूर्वाह्न
पूरा घटनाक्रम अफसोसजनक चल रहा है. जाने क्यूँ अब स्व विवेक की बातें करने को भी मन नहीं करता. मैं फिर भी हिन्दी ब्लॉगजगत के प्रति आशांवित हूँ कि रास्ता निकलेगा.
Udan Tashtari ने कहा…
22 अप्रैल 2010 4:27 पूर्वाह्न
कुछ तो नियंत्रण ज़रूरी है।
आपका इस तरह सोचना वाजिब है।
लेकिन ये क्षणिक समस्याएँ होती हैं । समय के साथ स्वयं समाप्त हो जाएँगी ।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
22 अप्रैल 2010 8:11 पूर्वाह्न
कल चमन था, आज सेहरा हुआ,
देखते ही देखते, ये क्या हुआ...
जय हिंद...
खुशदीप सहगल ने कहा…
22 अप्रैल 2010 9:57 पूर्वाह्न
अफ़्सोसजनक.
रामराम.
ताऊ रामपुरिया ने कहा…
22 अप्रैल 2010 10:03 पूर्वाह्न
अच्छा नही लगा जी आपके इस फैसले को सुनकर
प्रणाम
अन्तर सोहिल ने कहा…
22 अप्रैल 2010 12:08 अपराह्न
@पंO डी के शर्मा "वत्स" जी
आदरणीय
जब कोई गूगल रीडर में किसी चिट्ठे को फालो करता है और बाद में अनसबस्क्राईब कर देता है, तब भी फालोवर में से हट नही पाता। शायद वहां से हटाने के लिये दूसरा कोई तरीका हो।
एक बात और है कि जो फालोवर नही हैं, वो भी तो वहां जा ही रहे हैं।
प्रणाम स्वीकार करें
अन्तर सोहिल ने कहा…
22 अप्रैल 2010 12:15 अपराह्न
Aapke vichar suljhe hue hain..aur kya kahun?
kshama ने कहा…
22 अप्रैल 2010 12:18 अपराह्न
अरे! नाराज़गी छोड़ दीजिये....अब...
महफूज़ अली ने कहा…
22 अप्रैल 2010 12:38 अपराह्न
मान जाओ झा बाबु ..................नहीं तो दिल्ली आ कर समझाना पड़ेगा .......... और गर्मी तो आप देख ही रहे हो..... बहुत है ! इस लिए गुस्सा थूको और चर्चा चालू करो !
अगर आप ना माने तो सच में इस से ज्यादा दुःख कि बात कोई और ना होगी कि जिन लोगो कों जाना चाहिए वह तो है और बाकी चले जा रहे है नाराज़ हो कर !
शिवम् मिश्रा ने कहा…
22 अप्रैल 2010 1:20 अपराह्न
झा जी ..चुपचाप आपको बहुते दिन से पढ रहे हैं ..लेकिन एतना गुस्सा ठीक नहीं है...हिंदी ब्लॉग पर तो बहुत सा अस्लील बात भी लोग लिखता है..लेकिन जाने दीजिए आप त कानून जानने वाले आदमी हैं... केतना लोग को मना किजिएगा... आदमी अपने समझदार है इहाँ पर... अब आपके दोस्त कह दिहिन की गोबर से बचकर निकल जाइए.. अजीब बात करते हैं.. गोबर से घर नीपता है और गोबर गनेस का पूजा होता है... आप ही बताइए नाक बंद करके रोड पार करना ठीक है कि रोड का गंदगी सफाई करना..ऊ भी एगो असलियत है और ई जो आप बोल रहे हैं ऊ हो सचाई है..सक्सेना जी ठीके कहते हैं कि तनी देखिये..जल्दियाने से का फायदा...
चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…
23 अप्रैल 2010 12:30 पूर्वाह्न