बेबाक , बिंदास , बेलौस ,बेसाख्ता सी कुछ बातें ......
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बिखरे आखर
ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,
उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार
मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये ...
1 सप्ताह पहले
















बहुत सुंदर लगा आप की यादो का यह बक्सा, धन्यवाद
राज भाटिय़ा ने कहा…
19 अप्रैल 2010 12:27 पूर्वाह्न
बदलती दुनिया के बदलते रंग..पुरानी गठरी में खोना कितना अच्छा लगता है.
विल्स कार्ड नहीं निकले?? :)
Udan Tashtari ने कहा…
19 अप्रैल 2010 1:02 पूर्वाह्न
सच मे ये यादे भी बडी अनमोल होती है।बडा सकून मिलता है इन सब से...
anjana ने कहा…
19 अप्रैल 2010 1:11 पूर्वाह्न
पुराने ख़त फिर उसी बीते पल में ले जाते हैं ...उन्ही एहसासों के साथ ...
अच्छे ख़त लिखने का कॉम्प्लीमेंट तो मुझे भी कई बार मिल चुका ....
वाणी गीत ने कहा…
19 अप्रैल 2010 5:37 पूर्वाह्न
ख़त लिखना तो जैसे इतिहास हो गया है...इधर मेरे बेटे ने जान बूझ कर एक ख़त लिखा ..कह रहा था कि यूँ तो आपलोगों से स्काइप पर बात हो जाती है लेकिन ख़त लिख कर मैं ये बताना चाहता हूँ की मैं आपलोगों से कितना प्यार करता हूँ...और सचमुच जब वो ख़त पहुंचा हमारे पास...हम ऐसे लूझ पड़े उसपर जैसे कारू का खज़ाना हो....सचमुच जितना अपनापन खतों के अक्षरों में है शायद ही उतना संवाद में हो...बोलते वक्त हम अक्सर झिझक जाया करते हैं लेकिन लिखते वक्त..एक किस्म कि बेबाकी तारी होती है...
बहुत अच्छी लगी आपकी प्रस्तुति...
आभार...
'अदा' ने कहा…
19 अप्रैल 2010 5:59 पूर्वाह्न
nice
Suman ने कहा…
19 अप्रैल 2010 6:06 पूर्वाह्न
यह अंदाज भी बहुत बढ़िया रहा!
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
19 अप्रैल 2010 6:20 पूर्वाह्न
इन सब से सकून मिलता है...
महेन्द्र मिश्र ने कहा…
19 अप्रैल 2010 8:48 पूर्वाह्न
क्से से मानों यादों की बरात ही निकल आयी हो ! पुराने रखे खतों की याद दिला दी अजय भाई
सतीश सक्सेना ने कहा…
19 अप्रैल 2010 9:05 पूर्वाह्न
पुराने बक्से ऐसे ही चुम्बकीय पिटारे होते हैं। एक बार खोल कर बैठ जाओं तो बस जैसे मक्खी मकड़ी के जाल में उलझ जाती है वैस ही हम भी। सच है चिठ्ठियों का जमाना अब गया। लेकिन शायद यह ब्लागिंग उसी का दूसरा रूप है।
ajit gupta ने कहा…
19 अप्रैल 2010 9:35 पूर्वाह्न
आजकल कुछ नौस्टेल्जिया फीवर सा चल पड़ा है...और बहुत contagious भी है एक को लगा नहीं कि दस लोग और ग्रसित हो जाते हैं, आपकी इस पोस्ट ने भी कितनो को क्या क्या ना याद दिला दिया होगा..
कितनी कवितायें कितने गीत इस ख़त और चिट्ठी शब्द पर बने हैं...अब नयी पीढ़ी तो मरहूम ही रहेगी इन सबसे...पहले पोस्टमैन को देखकर कितनी ख़ुशी होती थी...अब तो बस यही ख़याल आता है,कोई ना कोई बिल लाया होगा...हाल ही में,एक फ्रेंड और उसके मंगेतर ने एंगेजमेंट से शादी के बीच ढेर सारे ख़त लिखे एक दूसरे को...इस सेल फोन के जमाने में, इस प्रयोग ने उन्हें कितना कुछ दिया होगा संजोने को.
rashmi ravija ने कहा…
19 अप्रैल 2010 11:38 पूर्वाह्न
रश्मि जी सच कह रही हैं सचमुच नोस्टालजिक कर दिया आपने -मेरे लिए भी तो वही मरहले हैं ,हैं वही जलन ..जो आग तुम गए लगा वो जली हुयी है बुझी नहीं ...वही कुकरैल ..वही प्रकाश कुल्फी ...वही मेफेयर ..वही लीला ..वही मलीहाबाद के बगीचे से सीधे आये आम ....
Arvind Mishra ने कहा…
19 अप्रैल 2010 12:27 अपराह्न
हाथों से कागज पर अपने अंदाज़ में कलम घसीटी का जो मजा है वो इस कंप्यूटर में कहां नसीब होती है
बात बिल्कुल सही है। वो फाऊँटेन पेन से लिखते हुए नज़र आती स्याही और रोशनी में गुम होती उसकी चमक क्या आनंद देती थी!
अब तो हस्ताक्षर करते के अलावा हाथ कहीं हिलता ही नहीं कागज़ पर
अज़ीब यादें होती हैं इन पुराने से बक्सों में
लेकिन यह दिल्ली में चक्कर वाला मामला कुछ दबा ही गए आप :-)
हा हा
बी एस पाबला ने कहा…
19 अप्रैल 2010 3:06 अपराह्न
यादों की ऐसी सजीव गठरी खोलना हमेशा बहुत सुखद होता है.
वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
19 अप्रैल 2010 6:17 अपराह्न
सच मे ये यादे भी बडी अनमोल होती है।बडा सकून मिलता है इन सब से...
संजय भास्कर ने कहा…
19 अप्रैल 2010 6:24 अपराह्न
चिठियों का एक पुलिंदा तो हमने भी संभाल कर रखा है । बस कभी खोलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती ।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
19 अप्रैल 2010 8:46 अपराह्न
"कल से चिट्ठी भी लिखना दोबारा शुरू करना है..."
ज़रूर करो, लेकिन उन्हें न लिखना जिन्हें आपका ई-मेल पता मालूम है.
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
19 अप्रैल 2010 8:57 अपराह्न
भाई हमने तो अभी भी चिठ्ठियाँ लिखना और उन्हे सहेजकर रखना बन्द नही किया है । मैने अपने पिता के पत्रो की एक किताब भी प्रकाशित की है । अगला प्लान दोस्तो की चिठ्ठियाँ प्रकाशित करने का है ।
शरद कोकास ने कहा…
20 अप्रैल 2010 10:43 अपराह्न
very well written...........
soni ने कहा…
21 अप्रैल 2010 5:09 अपराह्न