अथ जूतम जूता जुत्ते जुत्ते ....
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इन दिनों आधुनिक काल में ईराकी समाज से से निकली प्रथा ..पदम पादुका पदे पदे
..यानि कि जूता चलाइए ..अभियान ने धीरे धीरे भारत में भी दोबारा से अपना महत्व
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4 दिन पहले















सच में बचपन की यादों और बातों से अनमोल कुछ नहीं.......सुंदर संस्मरण
डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…
29 जून 2011 10:28 am
बचपन में सोचा करते थे कि यह भी कोई जीवन है? जब देखो कोई डांट देता है। कितने अभाव दिखायी देते थे लेकिन अब वे ही अभाव याद आते हैं। क्योंकि उस जीवन में कृतित्रमता नहीं थी। आपने लखनऊ, दिल्ली सभी घुमा दिया आभार।
ajit gupta ने कहा…
29 जून 2011 10:49 am
अरे तो आप नदी पहाड रेसटीप मार गेंदा ई सब नई खेले है का ..गिल्ली डंडा मे बडा दिक्कत हुआ था एक बार हमको, भाग दिए थे घर काहे लिए बडा दूर तक लंगडी का चांस था ..
याज्ञवल्क्य ने कहा…
29 जून 2011 10:54 am
अजय भाई, आपके बचपन की बातें पढकर मन रमण करने लगा उन चाहतों में जो बचपन में ही हुआ करती थीं.पतंग उड़ाना ,गिल्ली डंडा खेलना और न जाने कितने खिलौनों से असीम प्यार.पर बचपन बीत गया और चाहतें भी बदल गयीं.बस,यादें रह गईं हैं.
अब एक और चाहत को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ.मेरी नई पोस्ट 'सीता-जन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१'
पर आपका स्वागत है.जरा मदद कीजियेगा मेरी इस चाहत को और अच्छी तरह से समझने में.
Rakesh Kumar ने कहा…
29 जून 2011 10:58 am
सच में बचपन लौट कर नहीं आता।
आपके संस्मरन ने हमें भी बचपन की मीठी यादों तक पहुँचा दिया।
Mukesh Kumar Mishra ने कहा…
29 जून 2011 11:24 am
सुंदर संस्मरण
अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…
29 जून 2011 11:27 am
आपकी पोस्ट पढ़कर अपना बचपन भी याद आ गया, बहुत समानताएं हैं, शरारतों का जिक्र आपने गोल कर दिया है, जो कभी जानबूझकर की जाती थीं या अनजाने में हो जाती थीं. उसके बाद यथानुसार पिटाई भी होती थी.
Kamal Dubey ने कहा…
29 जून 2011 11:38 am
हा हा हा अरे लखनऊ तो पूरा घूमा दिए भैया हमको.लगा हम भी आपकी ऊ कटही गाडी में बैठे हैं आपके पास और बड़े हैं सो रुआब भी गाँठ रहे है 'अज्जू! जा आम तोड़ ला,लगा एक पत्थर की,धत्त !निशाना भी सही नही लगा सकते एक आँख बंद करके अब आम को देखो और.....घूमा कर मार,ले टपक पड़ा ना आम,हमसे सीख'
'दी ! पेड़ पर चढ़ कर ले औ?'
'नही.पापा मारेंगे,चुपचाप बैठ जा और आम मुझे दे के मेरा मुंह देख,खट्टा आम खाने पर कैसा मुंह बनाती हूँ न्?' हा हा हा
बाबु! बचपन की यादें हमारा खजाना है जो सुकून देता है.जिन बातों या घटनाओ से तब शर्मिंदा हो जाते थे उन्ही को आज याद करके बताते हुए कितना हँसते हैं हम? मैंने मामी के बिस्तर पर सु सु कर दी थी.चौथी में पढ़ती थी.मारे शर्म के उनके सामने नही गई कई दिन. और अब.............बिस्तर पर सू सु कर देने वाले हर बच्चे को बताती हूँ.पर...तुम्हे नही बताऊंगी तुम मेरी हँसी उड़ाओगे.हा हा हा बहुत प्यार लिखा है.
पर...छोटा लिखो.चाहे इसे दो भागों में लिखो.ओके?
अरे बहुत टिका टिप्पणी करती रे बाबु!
क्या करू?ऐसिच हूँ मैं तो.
इंदु पुरी ने कहा…
29 जून 2011 11:53 am
बचपन की यादों में डूबा सुंदर संस्मरण ...
Dr Varsha Singh ने कहा…
29 जून 2011 12:15 pm
" बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं, तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।" --- सौ फीसदी सच है...
मीनाक्षी ने कहा…
29 जून 2011 12:56 pm
ओह उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह औरपीछे बहुत ही बडा अहाता ..वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के ,गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहलापरिचय हुआ था .पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होतीथी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां ।
aisa hi shuddh mera bhi ek ghar tha
रश्मि प्रभा... ने कहा…
29 जून 2011 1:28 pm
बचपन की यादों के महासागर में आपके साथ हम भी उतरा लिये।
प्रवीण पाण्डेय ने कहा…
29 जून 2011 2:35 pm
सच में बचपन लौट कर नहीं आता। सुंदर संस्मरण|
Patali-The-Village ने कहा…
29 जून 2011 4:02 pm
bachapan ki yaadein sach me anmol hoti hain.....bahut accha sansmaran h
somali ने कहा…
29 जून 2011 6:54 pm
वाह जी आप ने तो हमे भी लोटा दिना उन दिनो की याद मे, वो दिन वो जगह कभी नही भुल सकते, बहुत सुंदर यादे याद दिला दी आप ने अपने संग हमे भी
राज भाटिय़ा ने कहा…
29 जून 2011 10:05 pm
आप ने लखनऊ की इतनी सुंदर तस्वीर खींची है कि अब लखनऊ देखना हमारे नये साल के ऐजेंडा में शामिल हो गया है।
anitakumar ने कहा…
29 जून 2011 10:08 pm
Aapne apnee yadon ka pitara khola to hamaree yadon ka pitara bhee saath,saath khulta gaya...bahut sundar sansmaran!
kshama ने कहा…
29 जून 2011 10:31 pm
बहुत अच्छा वर्णन करते हो यार ....
क्या क्या याद दिला दिया !
शुभकामनायें !!
सतीश सक्सेना ने कहा…
29 जून 2011 11:58 pm
ओह कितने दिनों बाद इतनी खूबसूरत पोस्ट पढ़ने को मिली...भैया काश मैं भी आपके जितना खूबसूरत लिख पाता..
ब्लॉग में बचपन पर इतनी खूबसूरत पोस्ट मैंने नहीं पढ़ी...बहुत लंबा था, लेकिन बस एक ही रिक्वेस्ट रहेगा आपको, इससे भी लंबा एक और पोस्ट की मांग है हमारी :) :)
abhi ने कहा…
30 जून 2011 8:45 am
oh behad khubsoorat bachpan ke din the ..... aapki baaton ko sunte huye main bhi apne bachpan me ja pahunchi.. kamovesh aisa hi hua akrta tha apna bachpan bhi. aur wo 2 mahine ki garmi ki chuttiyan ... bilkul waisa hi hum bhi aish akrte the.... ise aage aur likhiye..... padhkar bada sukoon sa lag raha hai...
वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…
30 जून 2011 11:53 am
संतोष त्रिवेदी ने कहा…
30 जून 2011 9:56 pm
बहुत कमाल के रोंदू थे भाई आप ! जेतना बचपने मा रोये हैं,ऊका एक-एक का बदला भरी जवानी मा ले रहे हैं हमरी सरकार से !झाजी आप बहुतै लकी हैं कि आपका बचपन राजा-महाराजा और नवाबों की राजधानी लखनऊ में बीता!प्राचीन भारत की जितनी झलक लखनऊ के माहौल में रची-बसी है,किसी गाँव या सल्तनत में नय होगी !
आपने बचपन की मस्ती को बहुत सहज और विस्तार से उकेर के धर दिया है.ई संस्मरण कई बड़ी पोस्टों पर भारी है !अब तो आप भी हमारे अवध के इलाके के हो,अब भजार के साथ-साथ लहुरवा भाई भी हो !
संतोष त्रिवेदी ने कहा…
30 जून 2011 9:58 pm
मजा आ गया संस्मरण पढ़कर...कमाल है.
Udan Tashtari ने कहा…
1 जुलाई 2011 3:04 pm
एक उम्र वालों का बचपन भी एक खास तरह से बीतता है ।
शरद कोकास ने कहा…
21 जुलाई 2011 10:29 pm
सुन्दर स्मृतियाँ...... सादर बधाई.....
पढ़ें बचपन के छंद
S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…
18 दिसम्बर 2011 2:26 pm