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बचपन , और उसकी यादें । सच कहूं तो बचपन खुद ही यादों का टोकरा होता है , कमाल की बात ये है कि बचपन न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि हमारे अपनों के लिए भी हमारा बचपन उनकी यादों का टोकरा ही होता है । एक ऐसा टोकरा , जो समय के साथ और भी भरता जाता है , नई यादें जुडती जाती हैं लेकिन फ़िर भी बचपन की यादों का तो जैसे एक अलग ही सैक्शन होता है । और बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं , तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।

मुझे अगर बचपन की सारी यादों में कुछ चुनिंदा यादें अलग करने को कहा जाए तो मैं यकीनन , ही गर्मियों की छुट्टियों के उन दिनों को याद करता हूं जो हम अक्सर नानी गांव में बिताया करते थे । पिताजी फ़ौजी थे और हम सेंट्रल स्कूल के बच्चे , हमारे दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां पापा के लिए दो महीने की एनुअल लीव में कंवर्ट हो जाती थी । उन दिनों रेल में सफ़र करने की जो यादें , वो पुराने स्टेशन , चारबाग लखनऊ का , तांगों से खचाखच भरा हुआ ,वहां से सफ़र शुरू होकर खत्म होता था बिहार के मधुबनी जंक्शन पर । आह क्या सफ़र होता था कमाल का , सुराही और छागल का जमाना था वो , स्टेशन पर गाडी रुकते ही पानी के लिए भागमभाग, सुराही में डाल कर उसके खिडकी के किनारे रख देना , सुना था कि जितनी हवा लगती है सुराही को पानी उतना ठंडा हो जाता है , और वाह क्या होता था ठंडा । उफ़्फ़ वो मिट्टी की सौंधी खुशबू , फ़िर पूरी जिंदगी मयस्सर नहीं हुआ वो अमृत । मधुबनी पहुंचते पहुंचते हालत ऐसी हो चुकी होती थी कि मानो दंगल लड के आ रहे हैं । 

स्टेशन पर पहला काम होता था , मां का , हमें प्लेटफ़ॉर्म पर लगे चापाकल पर जितना हो सके मांज के पहचाने जाने लायक करना , अगर पापा का मूड ठीक है और वे बक्से को दोबारा से खोल बंद करने में गुस्सा नहीं किए जाने जैसे दिख रहे हैं तो फ़िर आपको एक अदद जोडी हाफ़ पैंट और टीशर्ट भी प्रदान की जा सकती है । स्टेशन से आगे का सफ़र तय होता था कटही गाडी (हां ये बैलगाडी जैसा होता था लेकिन पीछे की बॉडी और यहां तक कि उसके पहिए भी सिर्फ़ लकडी का बना होता था ), समय लगता था तकरीबन चार या सवा चार घंटे । ओह क्या सफ़र होता था वो , नदिया के पार का कोन दिसा में ले के चला रे बटोहिया का गाना याद है आपको , बस वही सिनेमा चलता था समझिए , रेत वाले और मिट्टी वाले रास्तों में जब वो कटही गाडी फ़ंसती थी तो हमारे मौसेरे भाई जो उसके डरेवर हुआ करते थे , वे कूद के आगे से बैलों को आव आव आव आव आव आव करते थे और हम बच्चे , नीचे उतर के मस्ती करने लगते थे । रास्ते में लगे हुए आम के पेडों में वो लदे फ़दे आम । कई बार इतने लदे हुए कि नीचे से सोंगड (डाली को अबांस या लाठी का सहारा देना ) तक लगे रहते थे । हम ऐसे हुलस जाते थे कि कूद के तोड लिया जाए या कि मार जाए मिट्टी का ढेला और आम हाथ में । कई बार कर भी डालते थे , आम तो क्या खाक आना था , बगीचे वाले जरूर आ जाते थे फ़िर देखते तो कहते , अरे ई सहरूआ सब है , दे दो , आम दो , गोपी आम सब (गोपी आम वो जो उन दिनों सबसे पहले पेडों पर पकते थे ) , और बस रास्ते में ही पेट पूजा का जुगाड हो जाता था । रास्ते में पडने वाले जाने कितने ही कमल गाछी , बगीचे , ताल , तलैये , पोखरे , मंदिर , कुंएं , ढिहबाड स्थान , सब एक एक करके यादों का कोना पकड लेते थे , और जिन कोनों को हम शहर में जाकर हम टटोला करते थे ..........

हालांकि टटोलने को तो अब हम उन शहरों को भी टटोला करते हैं जो उन दिनों में शहर सरीखे लगते थे । शहर जिनमें कालोनियां हुआ करती थीं दूर दूर , मैदान हुआ करते थे , घर , घर जैसे लगते थे जिनके आगे पीछे इत्ती खुली जगह तो होती ही थी कि ठाट से घर की उगाई सब्जी आप खाने में इस्तेमाल कर सकते थे और जो जरा जोरदार मेहनती आदमी हुए तो पडोसियों की भी मौज थी , आखिर बेलों में थोक के भाव निकलने वाली तोरियों और खीरों पे उन्हें भी बराबर की राय्ल्टी मिलने वाली जो होती थी । बचपन का एक ऐसा ही शहर था लखनऊ ।
इमामबाडा 



ओह क्या बात थी उस शहर की वो भी उस समय जब लखनऊ की नफ़ासत पूरे शबाब पर थी , बडे और छोटे इमामबाडों के झूमरों की चमक दिन में बिना जले भी कयामत सरीखी हुआ करती थी , भुलभुलैय्या सच में खो जाने जैसा डरवना लगता था और वो बडे वाले रामलीला ग्राउंड में दशहरे का रावण दहन मेला , तोपखाना बाज़ार की रामलीला , दोस्त और सहपाठी संजय सुतार के पापा जी की लवली स्टुडियो , एक फ़ोटो या शायद ज्यादा भी अब तक मिलती हैं पुराने एलबमों में । लखनऊ बहुत से कारणों से याद रहा है हमेशा , तांगों का शहर , तांगे उन दिनों सडकों के राजे हुआ करते थे । पूरा लखनऊ , टकबक टकबक की गूंजों से ठहाके लगाया करता था । मीना बाज़ार की धूम से लेकर प्रकाश कुल्फ़ी , फ़ालूदे वाले के आलीशान रेस्तरां में एक फ़ुल प्लेट चौदह रुपए की , उम्माह क्या बात थी उन दिनों की भी । शोर फ़िल्म को देखकर , तोपखाना बाज़ार के पास भी आया था एक सायकल चलाने वाला बाजीगर ...। लखनऊ की दीवाली की चमक जब ईद की ठसक से मिलती थी तो यकीन मानिए कि समां ही कुछ और बंध जाता था । सच कहें तो देश की असल संसकृति वहीं देखी परखी थी । वो पतंगों की दुनिया और वो पेशेवर बदेबाज ।बदेबाज जानते हैं आप , अरे वही जो पतंगों पे नोट चिपका के उडाया करते थे , और टक्कर होती थी किसी और नोट चिपके पतंग से , उफ़्फ़ क्या कयामत की जंग हुआ करती थी डोरों की , मानों एक पतंग के उडने से लेकर उसके कटने तक एक पूरी जिंदगी जी जाया करती थी वो डोर और उसकी सखी मांझा । आसमान भरा होता था उन कागजी जंगी जहाज़ों से । 


गोमती उन दिनों उफ़नती खूब थी और बरसाती नाले भी । ऐसा लगता था मानो कैंट का पूरा वो हिस्सा , हरी चटक साफ़ धुली चादर ओढे बैठे हैं । लेकिन सिर्फ़ अच्छा अच्छा ही नहीं होता था , मुझे याद है कि दो बरसातों मे दो बच्चों के नाली में फ़िसल कर बह जाने के कारण मौत की घटना भी देखी सुनी थी । लेकिन फ़िर भी इन कडवी यादों को परे रखकर बरसात के वो दिन पुदीने के पकौडे , हरी खट्टी चटनी के साथ खाने के दिन हुआ करते थे और हां आज के बच्चे जो अपनी कविताओं में पढते हैं न कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी , उन दिनों हकीकत थी भाई लोगों , एक बडी ही प्यारी हकीकत । जब भी उस शहर की खिडकी में पर्दों को उठा कर झांकने की कोशिश करता हूं एक हूक सी उठ जाती है । लखनऊ की यादों में तुलसी सिनेमा हॉल का , कुकरैल वन यानि क्रोकोडाईल पार्क और बोटैनिकल गार्डन का ज़िक्र भी कैसे भूल सकता हूं । एक पार्क की याद नहीं आ रही है , उसके सामने अंग्रेजों की बनी हुई कोई कोठीनुमा हवेली सी थी , पता नहीं क्या नाम था उसका , वो छोटी वाली गोल ईंटों से निर्मित भवन स्कूल की तरफ़ से और माता पिता से मिली अनुमति के महान सहमति के बाद जाने मिला था वो मौका । स्कूल में लगे वो शहतूत के पेड , लंच में चीलों का स्कूल के मैदानों के ऊपर चक्कर काटना और हमारा रोटी के टुकडे उछालना । 

          लखनऊ की दास्तान तो शायद पहले भी आपसे कह चुका हूं ,लखनऊके सेंट्रल स्कूल में दूसरी कक्षा का वो पहला दिन ,आदत के अनुसार रोतेहुए ही स्कूल पहुंचा था ...और मैं उन बच्चों में से ही एक था .जो बहुत समयतक तुतलाते हैं। बस पहला दिन ही याद रह गया था बहुत दिनों तक ।रिसेस पीरीयड में तो ..अपना गर्दभ रुदन हमारी ,मैडम के इतना नाकाबिलेबर्दाश्त हुआ कि उन्होंने हमे चुप कराने की खातिर .अपना लंच बॉक्स उस दिनहमारे नाम कुर्बान कर दिया,.दीदी की सहेलियों ने बहुत समय तक हमारी तुतलाती बोली को ..अपने सब टीवी समझ कर उपयोग किया ..। 


सेन्ट्रल स्कूल , लखनऊ
खनऊ के दोस्तों में अनिल विनोद की जुडवां भाईयों की जोडी हम दोनों ,भाईयों की जोडी के साथ मिल कर बिल्कुल जहां चार यार मिल जाएं वाली गैंग सी बन गई थी और उस जमाने के खेल भी उफ़्फ़ ..क्या खेल थे वे भी स्कूल में , कागज के तरह तरह के खिलौने , कैमरा , नाव , डौगी...और जाने क्या क्या .सोचता हूं उस कागज के कैमरे को बना कर जो खुशीहमें मिलती थी वो आजकल के बच्चों को फ़ेसबुक पर कोई मैसेज भेज कर कहांआ पाता होगा ? 

वो कंचों की रंगबिरंगी और चंचल चटकीली दुनिया वो मिट्टी की गुच्चियों मेंकंचों को पिलाना .और फ़िर वो सर्फ़ के बडे वाले मजबूत गत्ते के गोल डब्बे में...सैकडों कंचे संभाल कर रखना .जब एक साथ देखो तो लगता था मानो हर कंचे में एक आकाश गंगा समाई होती थी फ़िर वो सर्फ़ का डिब्बासिर्फ़ कंचों के खजाने को ही तो नहीं समेटे रहता था .उसमें बाद में हमनेमाचिस की डिब्बियों के कवर भी हजारों की संख्या में भर के रख लिए थे.ओह और उसका वो ताश टाईप खेल । जाने कैसे कैसे खेल बनाएथे हमने .सायकल के पुराने टायर को डंडे से मार मार के .पूरी शाम दौडाते रहना .वो सडकों पर देखे दिखाए .सांप नेवले की लडाई..बंदर बंदरिया के खेल .और जादू भी। वो आकाश में उडती चील कीपरछाई के साथ साथ भागना .वो कोयल के साथ कू कू कू ..बोलतेजाने की आदत .और वो मैनों की संख्या को देख देख कर बोलना.वन फ़ॉर नथिंग , टू फ़ॉर गुड ..थ्री फ़ॉर ..लेटर और फ़ोर फ़ॉर ..गेस्ट ..और आगे भी ..।


लखनऊ में जिस एक बात ने हमेशा ही बांधे रखा .वो था ..जितनी धूम से होली मनती थी , उतनी ही रंगीन ईद हुआ करती थी , ..वो पीर बाबा की मजार और वहां के प्रसाद में मिलने वाले बताशे,...और उसी पीर बाबा की मजार के पासवो पापा का फ़ौजी थियेटर ...मुझे याद है कि फ़ौज में रहते हुए पापा की जहांजहां पोस्टिंग हुई वहां की और कुछ जिन बातों में समानता थी उनमें से एक थी ओपन थियेटर ..यानि फ़ौजी सिनेमा .क्या बात थी उस पिक्चर हॉल की...कई जगहों पर हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन सिनेमा दिखाया जाता था तो कई जगहों में हफ़्ता भर एक ही पिक्चर देखी जाती थी .हा हा हा ..पिक्चर के बीच में , वो झमाझम बारिश, का आना ....और सब के सब भीगते हुए पिक्चर देखते थे ......। 

ओह उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह औरपीछे बहुत ही बडा अहाता ..वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के ,गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहलापरिचय हुआ था .पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होतीथी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां ।सोचता हूं कि आज पिताजी की वो आदत , और वो अहातों और आंगनों वाला मकान हमें भी मिली होती तो टमाटर , आलू , गोभी के बढते दामों से हम खुदको तरकारी प्रूफ़ कर चुके होते ..। 

वहीं तो सायकल चलाना .सीखना शुरू किया था .वो कैंची स्टाईलकी सायकल चलाने की अदा ...वाह और क्या रोकते थे उसे.बिल्कुल दोनों पैर का घसीटा मार के .,और बहुत बार तो बहुत से लोगोंके दोनों टांगों के बीच जाकर भी रुकती थी धडाम से .। अजी तब ये टोबूकी सायकलें कहां  तब तो इंतज़ार होता था कि , कब पापा की आंख लगे और कब मौका मिले .सायकल पर हाथ आजमाने का न हेलमेट की टेंशन ना लायसेंस की कहीं ठोके ठुकाए तो भी घुटना और कोहनी का ही नुकसान का खतरा था बस ..और उसी कैंची स्टाईल से सायकल चलाने में भी रेस तो लगती ही थी । 

बरसात का मौसम ,वो सफ़ेद मोटी पन्नी की बरसाती ,आज तक दुकान में वैसी शक्ल तक का रेन कोट देखने को भी नहीं मिला जाने बापू ने ..कहां से उस मोटी पन्नी का जुगाड कर के ...दर्जी को पटा कर वो अनोखी सीबरसाती तैयार करवाई थी और उसकी वो टोपी .तो बस अपने लिएभी वो स्कूल बैग को बचाने के ही काम आती थी , बांकी का सारा कोर कसर तोहम पूरी तरह भीग कर पूरा कर लेते थे ..ओह वो बरसात ...और उससे उफ़नते नाले .नदियां ।इस कमब्खत दिल्ली की गलियों में जब नाली केबजबजाते हुए पानी को बारिश के अठखेलियां करते हुए पानी से मिलते देखता हूं, समझ ही नहीं आता कि नाली के पानी को खुशी ज्यादा होती होगी ,या बारिशके पानी को अपनी बदकिस्मती का गम ज्यादा होगा .॥ 

        और जाने ऐसे कितने ही शहर , और कितनी ही यादें , मन के एलबम में चुपचाप बैठी अपनी बारी का   इंतज़ार कर रही हैं ..अगली पोस्ट में आपको पूना लिए चलूंगा । 


  

25 टिप्पणियाँ:

सच में बचपन की यादों और बातों से अनमोल कुछ नहीं.......सुंदर संस्मरण

29 जून 2011 10:28 am  

बचपन में सोचा करते थे कि यह भी कोई जीवन है? जब देखो कोई डांट देता है। कितने अभाव दिखायी देते थे लेकिन अब वे ही अभाव याद आते हैं। क्‍योंकि उस जीवन में कृतित्रमता नहीं थी। आपने लखनऊ, दिल्‍ली सभी घुमा दिया आभार।

29 जून 2011 10:49 am  

अरे तो आप नदी पहाड रेसटीप मार गेंदा ई सब नई खेले है का ..गिल्‍ली डंडा मे बडा दिक्‍कत हुआ था एक बार हमको, भाग दिए थे घर काहे लिए बडा दूर तक लंगडी का चांस था ..

29 जून 2011 10:54 am  

अजय भाई, आपके बचपन की बातें पढकर मन रमण करने लगा उन चाहतों में जो बचपन में ही हुआ करती थीं.पतंग उड़ाना ,गिल्ली डंडा खेलना और न जाने कितने खिलौनों से असीम प्यार.पर बचपन बीत गया और चाहतें भी बदल गयीं.बस,यादें रह गईं हैं.
अब एक और चाहत को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ.मेरी नई पोस्ट 'सीता-जन्म-आध्यात्मिक चिंतन-१'
पर आपका स्वागत है.जरा मदद कीजियेगा मेरी इस चाहत को और अच्छी तरह से समझने में.

29 जून 2011 10:58 am  

सच में बचपन लौट कर नहीं आता।
आपके संस्मरन ने हमें भी बचपन की मीठी यादों तक पहुँचा दिया।

29 जून 2011 11:24 am  

सुंदर संस्मरण

29 जून 2011 11:27 am  

आपकी पोस्ट पढ़कर अपना बचपन भी याद आ गया, बहुत समानताएं हैं, शरारतों का जिक्र आपने गोल कर दिया है, जो कभी जानबूझकर की जाती थीं या अनजाने में हो जाती थीं. उसके बाद यथानुसार पिटाई भी होती थी.

29 जून 2011 11:38 am  

हा हा हा अरे लखनऊ तो पूरा घूमा दिए भैया हमको.लगा हम भी आपकी ऊ कटही गाडी में बैठे हैं आपके पास और बड़े हैं सो रुआब भी गाँठ रहे है 'अज्जू! जा आम तोड़ ला,लगा एक पत्थर की,धत्त !निशाना भी सही नही लगा सकते एक आँख बंद करके अब आम को देखो और.....घूमा कर मार,ले टपक पड़ा ना आम,हमसे सीख'
'दी ! पेड़ पर चढ़ कर ले औ?'
'नही.पापा मारेंगे,चुपचाप बैठ जा और आम मुझे दे के मेरा मुंह देख,खट्टा आम खाने पर कैसा मुंह बनाती हूँ न्?' हा हा हा
बाबु! बचपन की यादें हमारा खजाना है जो सुकून देता है.जिन बातों या घटनाओ से तब शर्मिंदा हो जाते थे उन्ही को आज याद करके बताते हुए कितना हँसते हैं हम? मैंने मामी के बिस्तर पर सु सु कर दी थी.चौथी में पढ़ती थी.मारे शर्म के उनके सामने नही गई कई दिन. और अब.............बिस्तर पर सू सु कर देने वाले हर बच्चे को बताती हूँ.पर...तुम्हे नही बताऊंगी तुम मेरी हँसी उड़ाओगे.हा हा हा बहुत प्यार लिखा है.
पर...छोटा लिखो.चाहे इसे दो भागों में लिखो.ओके?
अरे बहुत टिका टिप्पणी करती रे बाबु!
क्या करू?ऐसिच हूँ मैं तो.

29 जून 2011 11:53 am  

बचपन की यादों में डूबा सुंदर संस्मरण ...

29 जून 2011 12:15 pm  

" बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं, तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।" --- सौ फीसदी सच है...

29 जून 2011 12:56 pm  

ओह उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह औरपीछे बहुत ही बडा अहाता ..वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के ,गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहलापरिचय हुआ था .पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होतीथी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां ।
aisa hi shuddh mera bhi ek ghar tha

29 जून 2011 1:28 pm  

बचपन की यादों के महासागर में आपके साथ हम भी उतरा लिये।

29 जून 2011 2:35 pm  

सच में बचपन लौट कर नहीं आता। सुंदर संस्मरण|

29 जून 2011 4:02 pm  

bachapan ki yaadein sach me anmol hoti hain.....bahut accha sansmaran h

29 जून 2011 6:54 pm  

वाह जी आप ने तो हमे भी लोटा दिना उन दिनो की याद मे, वो दिन वो जगह कभी नही भुल सकते, बहुत सुंदर यादे याद दिला दी आप ने अपने संग हमे भी

29 जून 2011 10:05 pm  

आप ने लखनऊ की इतनी सुंदर तस्वीर खींची है कि अब लखनऊ देखना हमारे नये साल के ऐजेंडा में शामिल हो गया है।

29 जून 2011 10:08 pm  

Aapne apnee yadon ka pitara khola to hamaree yadon ka pitara bhee saath,saath khulta gaya...bahut sundar sansmaran!

29 जून 2011 10:31 pm  

बहुत अच्छा वर्णन करते हो यार ....
क्या क्या याद दिला दिया !
शुभकामनायें !!

29 जून 2011 11:58 pm  

ओह कितने दिनों बाद इतनी खूबसूरत पोस्ट पढ़ने को मिली...भैया काश मैं भी आपके जितना खूबसूरत लिख पाता..
ब्लॉग में बचपन पर इतनी खूबसूरत पोस्ट मैंने नहीं पढ़ी...बहुत लंबा था, लेकिन बस एक ही रिक्वेस्ट रहेगा आपको, इससे भी लंबा एक और पोस्ट की मांग है हमारी :) :)

30 जून 2011 8:45 am  

oh behad khubsoorat bachpan ke din the ..... aapki baaton ko sunte huye main bhi apne bachpan me ja pahunchi.. kamovesh aisa hi hua akrta tha apna bachpan bhi. aur wo 2 mahine ki garmi ki chuttiyan ... bilkul waisa hi hum bhi aish akrte the.... ise aage aur likhiye..... padhkar bada sukoon sa lag raha hai...

30 जून 2011 11:53 am  

इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

30 जून 2011 9:56 pm  

बहुत कमाल के रोंदू थे भाई आप ! जेतना बचपने मा रोये हैं,ऊका एक-एक का बदला भरी जवानी मा ले रहे हैं हमरी सरकार से !झाजी आप बहुतै लकी हैं कि आपका बचपन राजा-महाराजा और नवाबों की राजधानी लखनऊ में बीता!प्राचीन भारत की जितनी झलक लखनऊ के माहौल में रची-बसी है,किसी गाँव या सल्तनत में नय होगी !
आपने बचपन की मस्ती को बहुत सहज और विस्तार से उकेर के धर दिया है.ई संस्मरण कई बड़ी पोस्टों पर भारी है !अब तो आप भी हमारे अवध के इलाके के हो,अब भजार के साथ-साथ लहुरवा भाई भी हो !

30 जून 2011 9:58 pm  

मजा आ गया संस्मरण पढ़कर...कमाल है.

1 जुलाई 2011 3:04 pm  

एक उम्र वालों का बचपन भी एक खास तरह से बीतता है ।

21 जुलाई 2011 10:29 pm  

सुन्दर स्मृतियाँ...... सादर बधाई.....
पढ़ें बचपन के छंद

18 दिसम्बर 2011 2:26 pm  

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