मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान :उपेक्षित ,शोषित ,प्रताड़ित

 




वर्ष के 365 दिन और उस देश में एक दिवस , उस देश की राजभाषा , राष्ट्रभाषा को समर्पित -जी हाँ , आप बिलकुल ठीक समझ रहे हैं और आज सुबह से समाचार माध्यमों तथा सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर तरह तरह के बधाई और शुभकामना सन्देश फिर से हिन्दुस्तानियों को याद दिलाने के लिए आए हैं कि -आज यानि 14 सितम्बर को -भारत हिंदी दिवस के रूप में मनाता है। इस मनाने को ठीक वही मनाना है जैसे कोई रूठा हुआ हो और उसे मनाना है और हम पिछले सत्तर सालों से उसे मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हिंदी है कि मानती नहीं।

हिंदी को भारतीय गणराज्य और कामकाज की आधिकारिक भाषा -यानि राजभाषा घोषित करने के विषय में नहीं पढ़ा तो सिर्फ इतना जान लीजिए कि , इसका तब इतना भारी विरोध किया गया था कि यदि हिंदी के पक्ष में वो एक मत अधिक नहीं दिया गया होता तो आज शायद भारत हिंदी नामक भाषा को राजभाषा का जामा पहना कर ये झुनझुना भी नहीं बजा रहा होता जो बजाया जा रहा है। इसे झुनझुना , टुनटुना बजाना न कहें तो क्या कहा जाए। संविधान में जो व्यवस्था सिर्फ शुरुआत के 10 साल के लिए एक विकल्प के रूप में रखी गई थी और संकल्प लिया गया था कि -अंग्रेजी के स्थान पर सामाज्य काम काज से लेकर , व्यवस्था शासन पुलिस सबकी आधिकारिक भाषा हिंदी ही होगी।

आज 70 वर्षों के बाद भी हिंदी की दशा और दिशा , सिर्फ उतनी ही संतोषजनक और ठीक है जितने से कि एक गरीब आदमी दिल को तसल्ली दे सके कि जो वो बोलेगा उसे कम से कम सड़क पर , गली , मोहल्ले परिवार समाज में सब समझ तो जाएंगे ही। लेकिन सिर्फ इन्हीं जगहों पर -बड़े दफ्तरों , होटलों , शिक्षा संस्थानों से लेकर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक हिंदी की छाती पर बैठी अंग्रेजी लगातार मूँग दल कर करोड़ों हिन्दुस्तानियों को मानो मुँह चिढ़ाती रहती है कि , हूँह्ह। अपनी भाषा तक को बोली ,कही ,लिखी नहीं जाती चले हैं -हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान करने।

और देखा जाए तो हिंदी की हालत भी कुछ कुछ इस देश के हिन्दू की तरह ही हो गई है , जिसे न अदालतों में न्याय मिलता है न ही शासन राजनीति की तरफ से कोई मान्यता , दोनों ही इतने गए गुजरे होकर रह गए हैं कि सरे आम दोनों की लिंचिंग , नोच खसोट चलती रहती है और सब मूक दर्शक बने देख रहे हैं , देखते चले आ रहे हैं। हिंदी और हिन्दू , दोनों के नाम पर तरह तरह के करतब किए जा रहे हैं वो भी दशकों से , लोगों को एक सर्कस दिखाया जा रहा है और ये भी कि , समय के साथ दोनों को अपना मान और स्थान मिल जाएगा। लेकिन ये होगा कैसे , करेगा कौन , मानेगा कौन -इन सब पर सब चुप्पी साध लेते हैं।

अदालतें ,जिन्हें अपने ऊपर ये नाज़ है कि उन्हीं की न्याय व्यवस्था और सही गलत के संतुलन को बनाए रखने के कारण ही इस देश में सब कुछ ठीक है मगर अफ़सोस की बात ये है कि उन्हें भी अपने आदेशों , निर्देशों से लोगों के बीच ये विशवास बनाने के लिए -एक विदेशी भाषा यानि अंग्रेजी पर भी निर्भर रहना श्रेयस्कर लगता है तभी तो शीर्ष अदालत एक नहीं अनेकों बार – न्यायालीय काम काज की भाषा को राजभाषा हिंदी में किए जाने की याचिका को सिरे से ही ठुकरा चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार के आने के बाद से जरूर ही इस दिशा में बहुत से सकारात्मक रुख देखने को मिल रहे हैं जिनमे पहला है खुद बड़े राजनयिकों और मंत्री अधिकारियों द्वारा -राजभाषा हिंदी का प्रयोग। पहले की सरकारें और उनके करता धर्ता तो -अंग्रेजी में लिखे पुर्जे को पढ़ कर ही अपने आपको धन्य समझते रहे थे। इधर कुछ समय में मोबाइल , इंटरनेट में हिंदी लिखने पढ़ने की सुविधा ने भी अंतरजाल पर हिंदी को प्रसारित तो किया ही है।

लेकिन जिस देश में दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी को , अपनी बोलचाल की भाषा को मान्यता दिलाने , मान स्थान दिलाने के लिए एक विशेष दिन की जरूरत पड़ती रहेगी समझिए कि तब तक सब कुछ ठीक नहीं है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

खुद को प्रकृति के करीब रखने की कोशिश होती है -बागवानी

 

पिछले दो वर्षों ने इंसान को मिले सबक में से एक सबसे बड़ा सबक ये भी रहा कि इस दुनिया में जो कुछ भी जैसा भी है वो असल में , वास्तव में बेहद खूबसूरत और पवित्र है।  कहीं कोई दोष या खोट नहीं।  और जिस जिस में ज़रा सी भी जो भी परेशानी , कठनाई , अच्छे बुरे बदलाव आए हैं उसका एक बड़ा कारण खुद इंसान ही रहा है।  

ग्राम से शहरों की और पलायनकारी नीति ने जहाँ गाँवों को अकाल मरने के लिए छोड़ा तो वहीँ पूरी आबादी शहरों में चीटीयों की बिल की तरह शहर और नगर बना कर रहने लगे।  प्रवृत्ति , लालच , उपभोग , सुविधा ने धीरे धीरे शहरों को इंसानों के रहने लायक जगह बना और बता दी।  मगर जब नींव की कृत्रिम हो तो आगे का कहना ही क्या ??

आज शहर  , गाँव से ही नहीं , मिट्टी , पौधे , पानी , हवा , वनस्पति , नदियाँ , पोखर , जंगल सबसे निरंतर दूर होते चले गए , लेकिन हाय रे इंसान।  पैसे दिल्ली और मुंबई में कमाता है करोड़ों मगर उसे खर्च करने के लिए बार बार भागता है पहाड़ों , नदियों , जंगलों के बीच और यही सबसे बड़ा सत्य है।  






शहरों में अब धीरे धीरे इन पेड़ पत्तों के प्रति लोगों का बढ़ता मोह अच्छा लगता है।  असल में जिस तरह से आज शहरों की दिनचर्या में बड़े से लेकर छोटे बच्चे तक पर मानसिक दबाव की काली छाया पड़ी हुई है उसे दूर करने में बागवानी जैसी आदत एक करिश्मा साबित होती है।  पौधे फूल फल सब दोस्त की तरह हो जाते हैं जिनके पास जाते है उनके एहसास मात्र से सुकून और सुख सा एहसास होता है।  कहते हैं पौधों की सेवा यानि बागवानी इंसान के तनाव को दूर करने का सबसे बेहतर ज़रिया होता है।  









एक बात और , सेना के जवानों में मृदुलता और संवेदनाओं को संजोए रखने के लिए और खूंखार अपराधियों तक का हृदयपरिवर्तन के लिए -बागवानी  को ही सर्वोत्तम कार्य के रूप में विश्व भर में मान्यता मिली हुई है।  सच ही है कि फूल पत्तों के रंग और खुशबू किसका मन नहीं बदल सकते।  


आप भी बागवानी शुरू करें और देखें की कितने खूबसूरत बदलाव आप अपने अंदर ही महसूर कर सकेंगे ?? तब तक मेरी छत पर बनी छोटी सी बगिया में खिलते मिलते नन्हें मेहमानों से मिलिए 








रविवार, 14 फ़रवरी 2021

प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार :राजस्थान के पर्यटक स्थल

 

बहुत बार ये बात मैं पहले भी कह चुका हूँ क़ी ठीक तलवे के बीचों बीच काला तिल देख कर माँ अक्सर कह दिया करती थी कि इस लड़के के पाँव में चक्कर लगे हैं।  कारण था मेरा लगातार घूमते रहना और सड़क , सफर जैसे उन दिनों किताब ,रेडियो ,चिट्ठी की तरह बिलकुल करीब के साथी थे मेरे।   कॉलेज के पूरे पाँच साल रोज़ तीस किलोमीटर सायकल से नाप डालने का हुनर ज़िंदगी भर काम आता रहा।  बहुत घूमा , घूमता हूँ और घूमना चाहता हूँ।  

पिछले कुछ सालों में मेरा रुख पश्चिम की तरफ रहा है और कमोबेश आठ यात्राएं मैंने की हैं पिछले दो सालों में ही।  कार ,बस , रेल , डबल डेकर रेल हर साधन और हर मार्ग से सिवा हवाई मार्ग के।  सफर की जब भी बात होती है तो मुझे सड़क की याद आ जाती है और शायद यही वजह रही है कि , बिना सड़क वाला सफर यानी हवाई सफर से अब तक बचता ही रहा हूँ।  

जयपुर , अलवर , जोधपुर , उदयपुर , माउंट आबू , चित्तौड़गढ़ ,जैसलमेर , फिलहाल इन तमाम शहरों को देखने समझने की एक कोशिश हो चुकी है।  जयपुर में अनुज का निवास है और उदयपुर में अनुजा का , इन दोनों शहरों में बहुत बार जाना हुआ और इसके बावजूद भी बार बार जाने का मन हो आता है।  

राजस्थान की धरती से इतिहास की किताबों में हमारा परिचय "राजों रजवाड़ों वाला , राजपूती शान वाला , राणा प्रताप वाला विशाल भूभाग वाला सा ही दिलाया जाता रहा है मगर मेरी यात्राओं में मैंने जाना कि अलौकिक धर्म क्षेत्र है पूरा राजस्थान। पग पग पर भगवान् स्वयं अनेक नामों रूपों में आज भी आपको महसूस होंगे।  हिन्दू , जैन ,शैव सबकी आराध्य और पवित्र भूमि।  

हर यात्रा की तरह जोधपुर यात्रा को भी विस्तार से लिखूंगा , लेकिन इस पोस्ट में मैं एक बहुत जरूरी विषय रखना चाह रहा हूँ वो ये कि , देश से लेकर विदेशी पर्यटकों तक की ख़्वाबों की नगरी , गुलाबी नगरी , झीलों का शहर , बने राजस्थान के शहरों के बेहद खूबसूरत और स्वच्छ होने के बावजूद कुछ पर्यटन स्थलों को छोड़ कर अन्य सब में सरकारी उदासीनता के चिन्ह साफ़ दिखाई देते हैं।  

जल महल -के पास पर्यटकों द्वारा झील की मछलियों को आटा , दाना आदि खिलाने वाले स्थान पर मंडराता शूकरों का झुंड  पास फैली हुई बेशुमार गंदगी।  मुझे लगता है प्रशासन को उस ओर जल्द से जल्द ध्यान देना चाहिए , हैरानी होती है कि आज जब मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक का उपयोग करके लोग इन सब चीज़ों को ठीक कर रहे हैं तो फिर अब तक कैसे ??? खैर इस समस्या को तुरंत दूर किया जाना चाहिए। 

 




जलमहल क्षेत्र , झील का पानी भी संभवतः नियमति रूप से साफ़ नहीं किया जाता , यह दूषित पानी से ही पता चल रहा था 




हालांकि पर्यटन स्थलों और यहां तक कि सड़कों के बीच पड़ने वाले गोल चौराहों की खूबसूरती आपका मन मोहे बिना नहीं रहती है , विशेषकर मेरे पसंदीदा शहर उदयपुर और माउंट आबू में।  बाजार में पॉलीथिन ,प्लास्टिक पन्नियों के उपयोग की पाबंदी के आदेश का जैसा पालन मैंने माउंट आबू में देखा वो शायद ही किसी अन्य शहर में संभव हो पाता  हो। 

उदयपुर शहर , बला का खूबसूरत शहर है , हर तरफ झीलें और खूबसूरत स्थानों की भरमार , जिस कोने में निकल जाइये बोगनवेलिया बाहें फैलाए आपको बुला रहे होते हैं।  उदयपुर शीशे की तरह शफ्फाक शहर है।  बहुत स्वच्छ सुथरा , मगर बावजूद इसके कुछ पर्यटन स्थलों पर सिर्फ एक छोटी सी कलात्मक पहल से उन तमाम पर्यटन स्थलों का वो अनुमप रूप निकल कर आ सकता है कि उन्हें देखने वालों को ये उम्र भर के सौगात से कम नहीं लगे। 

वैसे करिश्मा , जादू , वरदान जैसा ही है राजस्थान भारत के लिए , एक अनमोल रत्न सरीखा।  रेत के कण कण से सूरज की तपिश की तरह ललकता राष्ट्रवाद का प्रकाश और तेज।  राजमहलों की इतनी बड़ी दुनिया और किसी देश के किसी भी प्रान्त स्थान में मिलना कठिन है।  विराट अट्टालिकाएं , एक से बढ़ कर एक अभेद्य किले और उन किलों को मस्तक पर धारे हुए माँ भारती के वो सपूत , वो बांके जिन्होंने समय के आसमान पर अपनी वीरता और पराक्रम की कहानी लिख दी।  





किलों के सम्मोहन में एक बात कहनी बहुत जरूरी है वो ये कि , इनसे जुड़ी दास्तानें , गौरवमयी क्षण , उस इतिहास से परिचय कराने की जो ललक राज्य ,प्रशासन और स्थानीय स्तर पर होनी चाहिए उसमें कहीं न कहीं बहुत कुछ किए जाने की गुंजाइश तो है ही।  

राजस्थान रंगीला है , भरपूर ऊर्जा और प्रेम से लबरेज़।  ...चलिए अगली पोस्ट में चलेंगे जोधपुर के सफर पर।  सड़क मार्ग से। ..


मंगलवार, 26 जनवरी 2021

जोधपुर -राजपूताना विरासत को संजोए एक शांत शहर :सफर की चित्रमय झाँकी

 वर्षांत पर आखिरकार पूरे दो वर्षों के बाद सपरिवार , सड़क के रास्ते फिर शहर शहर घूमने का कार्यक्रम बन गया और इस बार तय किया गया कि जयपुर से आगे इस बार सफर जोधपुर की तरफ किया जाए।  राजस्थान की नरम नरम गर्मी और खुला खुला आसमान जैसे आवाज़ दे देकर बुला रहा था।  और हम कार द्वारा जयपुर होते हुए जोधपुर की अपनी पाँच दिनों की यात्रा पर खूबसूरत यादें सहेजने के लिए निकल पड़े।  

इस सफर और इसके पड़ावों , घूमी गई छोटी बड़ी जगहें , जोधपुर का खानपान , मिटटी वनस्पति सबकी चर्चा धीरे धीरे अपनी पोस्टों में करूंगा।  फिलहाल मेरे साथ जोधपुर घूमने के सिलसिले में आप आज सहेजे गए १००० से अधिक चित्रों में से कुछ चुंनिंदा तस्वीरों का आनंद लें।  


राजस्थान की शान 

रास्ते भर साथ निभाते चलते ये पहाड़ 

और बीच बीच में मिलते प्रभु 

हिन्दुस्तान की खूबसूरत इसके शहरों से बाहर ही है 

जाने कितने ही खूबसूरत स्थान 

राजस्थान की प्रसिद्द कठपुतलियाँ 

जोधपुर में बनते नए पर्यटक स्थल 

हमारे होटल की दीवार पर राजस्थानी छोरी 

जोधपुर का विख्यात घण्टाघर 

बीच बाजार चलते गजराज 

प्राकृतिक प्रचुरता से भरपूर जोधपुर 

अलग तरह की शुष्क वनस्पति , घास फूस 

जोधपुर के खूबसूरत और बेहद शांत झील 

आँखों से लेकर मन तक को शीतल करता झील का पानी 

राजस्थानी रजवाड़ों के वैभव का प्रतीक स्थापत्य 

आज भी एकदम अजूबा से प्रतीत होते विराट किले 

और पूरे रास्ते सड़क शहर और गाँव के साथ उनके बिलकुल पास चलते हरे भरे खेत 






चलिए , फिलहाल आप इन चित्रों का आनंद लें।  हम इस यात्रा पर आगे की पोस्टों में जरूर चलेंगे।  




शुक्रवार, 22 मई 2020

सायकल और आदमी



उस दिन फेसबुक की एक पोस्ट पर अनुज भवेश ने टिप्पणी करते हुए कहा की भैया इस बार जब हम सब गांव चलेंगे तो सब लोग सायकल पर ही सारी जगह घूमने जायेंगे।  ऐसा कहते ही सायकल चलाने के प्रति मेरे भीतर छुपी ललक और स्नेह जैसे एक मीठी सी टीस जगा गया।  मुझे जानने समझने वाले तमाम दोस्त रिश्तेदार जानते हैं कि सायकल के प्रति मेरी दीवानगी कैसी है और मैं सायकल चलने का कोई भी मौक़ा कहीं भी मिलता है उसे मैं नहीं छोड़ता।  

सायकल से मेरी यादें बचपन के उस ,सायकल के टायर चलने वाले खेल से शुरू होती है जिसमें हम बच्चे पुराने बेकार हो चुके टायरों को लकड़ी या बेंत के सहारे मार मार कर लुढ़काते हुए बहुत दूर दूर तक ले जाया करते थे और कई बार तो उन टायरों की हालत इतनी ख़राब होती थी कि वे लचकते हुए टेढ़े मेढ़े चलते थे मगर मजाल है कि हम बच्चों का जोश ज़रा सा भी कम हो।  


इससे थोड़ा बड़े हुए तो सायकल चलाना सीखने का यत्न शुरू हुआ और उन दिनों ये बच्चों वाली साइकिलों  का दौर नहीं था यदि किसी के पास थी भी तो मध्यम वर्गीय परिवार से ऊपर की बात थी।  हम अपने पिताजी की सायकलों की सीट पर अपने कंधे टिका कर कैंची सायकल चलाना सीखा करते थे और तब तक उसी अंदाज़ में चलाते थे जब तक बड़े होकर सीट पर तशरीफ़ टिका कर पैर जमीन पर टिकाने लायक नहीं हो जाते थे।  

ये वो दौर था जब गेंहूं पिसाई से लेकर , गैस के सिलेंडर की ढुलाई , सब्जी सामन आदि लाना तक , का सारा काम हमारे जैसे बच्चे अपने घरों के लिए इन्हीं सायकलों पर वो भी कैंची चलाते हुए ही किया करते थे।  यहां ये भी ज़िक्र करना रोमांचक लग रहा है कि हमारा पूरा बचपन पिताजी के साथ सायकल के पीछे लगे कैरियर , आगे लगने वाली सीट और उससे भी आगे लगने वाली छोटी सी टोकरी में बैठ कर ही घूमने फिरने की यादों से जुड़ा हुआ है।  

मुझे अच्छी तरह याद है कि सीट पर बैठ कर सायकल चलाने लायक होते होते और सायकल सीखते हुए जाने कितने ही बार कुहनियों और घुटनों को छिलवा तुड़वा चुके थे।  मगर कॉलेज जाने से पहले पहले सायकल की सीट पर बैठ कर उसे चलने लायक हो चुके थे।  स्कूल के दिनों में हुई सायकल रेस में प्रथम आना उसी सायकल प्रेम का नतीज़ा था।  

पूरा कॉलेज जीवन सायकल भी किताबों की तरह साथ साथ रहा।  गांव से कॉलेज 14 किलोमीटर दूर गृह जिला मधुबनी में था और कॉलेज की कक्षाओं के लिए रोज़ कम से कम 30 किलोमीटर सायकल चलाना हमारी आदत में शुमार हो गया था। इतना ही नहीं आपसास के सभी गाँव में रह रहे बंधु बांधवों के यहां रिश्तेदारों के यहां भी आना जाना उसी सायकल पर ही होता था।  जरा सी छुट्टी पाते ही सायकल को धो पांच के चमकाना तेल ग्रीस आदि से उसकी पूरी मालिश मसाज [ओवर ऑयलिंग ] करना भी हमारे प्रिय कामों में से एक हुआ करता था।  

नौकरी वो भी दिल्ली जैसे महानगर में लगी तो सब छूट सा गया और बिलकुल छूटता चला गया।  लेकिन अब भी जब गांव जाना होता है तो सबसे पहला काम होता है सायकल हाथ में आते ही निकल पड़ना उसे लेकर कहीं भी। हालाँकि गांव देहात में भी अब चमचमाती सुंदर सड़कों ने सायकल को वहां भी आउट डेटेड कर दिया है और अब सायकल सिर्फ गाँव मोहल्ले में ही ज्यादा चलाई जाती हैं किन्तु फिर भी बहुत से लोगों को मोटर सायकिल स्कूटर और स्कूटी आदि नहीं चलाना आने के कारण अभी भी सायकल पूरी तरह से ग्राम्य जीवन से गायब नहीं हुए हैं।  


जहाँ तक  मेरा सवाल है तो मैं तो सायकल को लेकर जुनूनी सा हूँ इसलिए अब भी सारे विकल्पों के रहते हुए जहाँ भी सायकल  की सवारी का विकल्प दिखता मिलता है मैं उसे सहसा नहीं छोड़ पाता हूँ।  अभी कुछ वर्षों पूर्व ऐसे ही एक ग्राम प्रवास के दौरान मैं किसी को भी बिना बताए सायकल से अपने गाँव से तीस पैंतीस किलोमीटर दूर की सैर कर आया था। अभी दो वर्ष पूर्व ही छोटी बहन के यहां उदयपुर में अचानक ही भांजे  की सायकल लेकर पूरे उदयपुर की सैर कर आया और वहां जितने भी दिन रहा सायकल से ही अकेले खूब घूमता रहा।  


शनिवार, 9 मई 2020

ये उन दिनों की बात थी



स्कूल के दिन थे वो और मैं शायद आठवीं कक्षा में , दानापुर पटना के केन्द्रीय विद्यालय में पड़ता था | उन दिनों स्कूल की प्रार्थना के बाद बच्चों को सुन्दर वचन , समाचार शीर्षक , कविता ,बोधकथा कहने सुनाने का अवसर मिलता था | अवसर क्या था बहुत के लिए तो ये सज़ा की तरह होता था क्यूंकि चार लोगों के सामने खड़े होकर कुछ सार्थक बोलना यही सोच कर बहुत के पसीने छूट जाया करते थे |

किन्तु उन्हीं दिनों कमज़ोर और अंतर्मुखी बच्चों को प्रोत्साहित करने की नई योजना पर काम करते हुए अध्यापकों ने नए नए बच्चों को ये जिम्मेदारी सौंपनी शुरू की | मुझे याद है की ऐसे ही एक सहपाठी का जब बोलने सुनने का अवसर आया तो सब कुछ अचानक भूल जाने के बाद उसने खुद ही ये कहने के बाद कि कोई बात नहीं आप यही सुन लें कह आकर कोई संस्कृत का श्लोक सुना दिया | बाद में कक्षा में उसे संस्कृत के अध्यापक महोदय से डांट और स्नेह दोनों मिला | स्नेह इसलिए कि उसने संस्कृत का श्लोक सुनाया और डांट इसलिए कि सुनाने से पहले ये क्यूँ कहा कि कोई बात नहीं और कुछ न सही तो यही सुनिए |

मुझे अन्दाजा था कि देर सवेर मेरा नंबर भी आने वाला है | एक दिन तुकबंदी करते करते मैंने एक छोटी सी कविता लिख डाली जिसका शीर्षक था " बिल्लू का सपना " | इसे मैं बार बार पढ़ कर खुश होता और कुछ ही दिनों में मुझे ये याद हो गई | थोड़े दिनों बाद ही मेरी बारी आ गयी | पूरे स्कूल के सामने स्टेज पर खड़े होने की वो झिझक वो डर इस कदर हावी थी कि उसे शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल था | जैसे ही मैंने कहा मैं अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ आपको सुनाना चाहता हूँ अब पूरे विद्यालय सहित चौंकने की बारी मेरे शिक्षकों की थी |

खैर काँपती हुई टाँगे और बुरी तरह लडखडाते हुए स्वर से जब मैंने वो कविता समाप्त की पूरा स्कूल और अध्यापकों सहित तालियों की तड़तडाहट से गूंज रहा था | उसके बाद मेरा डर छू मंतर हो चुका था अगले चार सालों तक मैं स्कूल की किसी भी कविता , रचनात्मक प्रस्तुति प्रतियोगिता का निर्विवाद विजेता और लोकप्रिय विद्यार्थी हो चुका था |

बहुत से साथी मज़ाक में मुझे कवि जी कवि जी कह कर चुहल करते थे | ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक बार मैंने अति उत्साह में बिना हाथ में कविता अंश लिए ही उसका पाठ करने पहुँच गया और बिलकुल शून्य हो गया | मेरे से ज्यादा सब निराश हुए और प्रतियोगिता से बाहर होने के बावजूद भी सबने दोबारा मुझे स्टेज पर बुला कर मुझसे वो कविता सुनी | वो भी मेरे लिए एक बड़ा सबक था |

कविता पाठ का ये सिलसिला फिर शुरू हुआ मेरे सेवा में आने के बाद जहाँ अनेक कार्यक्रमों का संचालन करते हुए अधिकारियों को ये भान हो गया था कि मैं कविता ,शेर , ग़ज़लें आदि कह पढ़ लेता हूँ | आवाज़ भारी होने के कारण (बकौल उनके ) सुनने में भी अच्छी लगती है |

इसके बाद होने वाले तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में न सिर्फ मेरी उपस्थिति अपेक्षित और अनिवार्य सी हो गई बल्कि अक्सर शुरुआत ही मेरी बैटिंग से होती है , और बहुत सी राजनीतिक सभाओं , शाखा के बौद्धिक में , रेडियो टीवी में , सैकड़ों हज़ारों की भीड़ को भी मैं बहुत ही सहजता के साथ संबोधित और सम्मोहित कर पाता हूँ |

कविता पाठ ,भाषण कला के अतिरिक्त नाटक में अभिनय का अवसर भी मुझे जब जहां मिला मैंने उसे भरपूर जिया | स्कूल कालेज के दिनों में बहुत कम शिरकत करने के बावजूद गाँव में काली पूजा के दौरान खेले गए एक नाटक के इकलौते नारी किरदार "वनजा" को मैंने इस तरह निभाया था कि मुझे स्नेह स्वरूप गाँव के बहुत से सम्मानित व्यक्तियों से नकद राशि दी |

विधि की पढाई के दौरान लगने वाले विधिक साक्षरता शिविरों में खेले गए नुक्कड़ नाटकों की तो धुरी ही मैं होता था और इनमे ऐसा डूब जाता था कि साथी सहपाठी भी उफ्फ्फ उफ्फ्फ कर उठते थे | सेवा में आने के बहुत दिनों बाद एक भोजपुरी धारावाहिक में अभिनय के लिए आए प्रस्ताव को भी मुस्कुरा कर ठुकराना पडा था मुझे |

लेकिन आज भी वो स्टेज पर पहली बार कविता पाठ के दौरान अपनी टांगों का कांपना और आवाज़ की थरथराहट मैं बिलकुल नहीं भूला हूँ |

तो  उन दिनों की बात थी

शुक्रवार, 1 मई 2020

कलम के धनी






उस दिन जब मैंने बात बात में लिख दिया था तो भाई पद्म सिंह जी ने हैरानी से पूछा था इतने पेन।  मैंने मुस्कुरा कर उन्हें कहा था की पेन के किस्से फिर कभी सुनाऊंगा।  लिखने पढ़ने वाले और नहीं लिखने पढ़ने वालों के लिए भी पेन का साथ हमेशा से रहता आया है।  मुझे बचपन से पेन से लिखना ,उन्हें संभाल कर सहेज कर रखना , कमीज की ऊपरी जेब में लगाए रखना उतना ही भाता था जितना कलाई घड़ी और ये आदत आज भी बदस्तूर जारी है।

उन दिनों भी पेन से लिखने की शुरुआत कक्षा छः से ही हुआ करती थी ,किन्तु पढ़ाई में बहुत ज्यादा भुसकोल होने के कारण लिखने का शौक तो तब तक नहीं हुआ था अलबत्ता कक्षा 7 से ही नीले और काले रंग के पेन जरूर रखने लगा था और चूँकि वो समय निब वाले पेन का हुआ करता था सो बड़ी कंजूसी से और बड़ी सावधानी से उसका उपयोग किया जाता था।  जेब में रखने के कारण लीक होकर कमीज का कल्याण कर देने के महान काम को  कई बार अंजाम देने का परिणाम माँ की झिकड़ी जरूर होती थी।


कक्षा आठ तक आते आते एक दिन एक शिक्षक ने मेरी कॉपी में देख कर ,उन दिनों हम भुसकोल विद्यार्थियों की कॉपियां देखने दिखाने लायक नहीं होती थीं , अचानक ही मेरी लिखावट को साफ़ बता दिया।  बस वहीँ से हाथ से लिखने का जो जुनून जगा वो आज तक ख़त्म नहीं हुआ।  आज भी मैं सुबह से शाम तक साथ आठ पेज लिख डालता हूँ , जब तक कुछ लिखता नहीं चैन नहीं आता।

लिखने की इस आदत से  मेरी पेन से दोस्ती भी बढ़ती गयी और हम उस दौर के साक्षी रहे हैं जब रेनॉल्ड्स ,मोंटेक्स ,लिंक ,रोटोमैक आदि के बॉल पेनों ने धूम मचा दी थी।  उन पेनों को खरीदना इस्तेमाल करना एक अलग ही आनंद देता था।  धीरे धीर बॉल पेन की सुलभता ने इंक वाले पेन को आउट डेटेड कर दिया।  मुझे याद है की अपने इंटर के दिनों में और उसके बाद बहुत समय तक परिक्षा के लिए मैं विशेष रूप से युनिबॉल का एक बॉल पेन इस्तेमाल करता था।

इसके बाद  दौर आया जेल पेन का जिनमे एड जेल ने आते ही धूम मचा दी थी।  इंक पेन वाली नज़ाकत और बॉल पेन वाली तेज़ी दोनों से युक्त ये पेन अपने अलग अलग कई रूपों मसलन रोलर पेन और इनके जैसे ही अन्य पेनों ने बहुत हद तक बॉल पेन के बाज़ार की बादशाहत खत्म कर दी । नए बच्चे तो आज भी जेल पेन रॉलर पेन के दीवाने हैं ।

नौकरी भी लिखने वाली मिल गई जहाँ लिखते लिखते सुबह से शाम हो जाती है मगर लिखने का काम खत्म नहीं होता । बस फिर क्या था पेनों का शौक जुनून बन गया ।

जिस भी शहर में जाऊँ वहाँ से पेन खरीदना , उपहार में पेन मिलना , पेन देना , पहचान के दुकानदारों द्वारा मुझे नए नए पेन जानबूझकर दिखाना , मेरे लिए विशेष पेन मँगवाना , कुल मिलाकर ये सिलसिला बढ़ता गया ।

आज भी पूरे अदालत परिसर में किसी अधिकारी कर्मचारी , को किसी विशेष पेन की जरूरत पड़ती है तो बेहिचक बेझिझक ले जाता है । मैं अदालत में अपने सहकर्मियों को भी ढेर ढेर पेन बाँटता हूँ । हाँ बहुत महँगे पेन मुझे उपहार में ही मिले । अपने पैसों से मैंने एक बार 1200 का पेन खरीदा था , वैसे मेरे पास दो रुपए से लेकर दो हज़ार तक के पेन हैं जिनकी संख्या हज़ारों , हाँ हज़ारों में है । आप मिलेंगे तो आपको भी स्नेह स्वरूप मिलेंगे ये पेन ।

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