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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

माता हिडिम्बा देवी मंदिर , क्लब हाउस मनाली -हुस्न पहाड़ों का (शिमला यात्रा-III)




पिछली गर्मियों की छुट्टीयों में अचानक ही पहाड़ों की सैर का बना कार्यक्रम कैसे आगे बढ़ रहा था ये आप इन और इन पोस्टों में पहले ही पढ़ देख चुके हैं | शिमला , कुफरी आदि के बाद स्वाभाविक रूप से अगला पड़ाव था मनाली | बुलबुल की तबियत अब ठीक हो चुकी थी और श्रीमती जी के ऊपर घुमावदार रास्ते की घबराहट पूरी तरह हावी थी | खैर अभी तो हमें अगले तीन दिनों तक ऐसे ही या कहूं कि इससे भी अधिक दुरूह रास्तों और वाकयों से गुजरना था | मित्र अरविन्द जी के साठ अगली सीट पर बैठ कर उन घुमावदार रास्तों पर हम बहुत सी सीधी और घुमावदार बातें किये चले जा रहे थे | 


जैसा कि मैं अपनी पिछली पोस्टों में कई बार कह चुका हूँ कि पहाड़ों में घूमने का एक आनंद यह भी है कि जितनी खूबसूरत आपको अपनी मंजिल यानी कोइ पहाडी ,शहर , गाँव या कस्बा दिखाई देता है उससे कई गुना खूबसूरती उन तक पहुँचने वाले रास्तों के दोनों और और आसपास बिखरी रहती है | बस आप उसे अपने भीतर कितने भीतर तक बसा और समा पाते हैं ये देखने वाली बात होती है | रास्तों से मेरी दोस्ती वैसे भी बहुत पुरानी है सो मेरी नज़र सामने और आसपास के रास्तों पर थी और कान मित्र अरविन्द जी के बातों पर ....देखिये रास्तों की खूबसूरती की एक बानगी  






 पहाडी रास्तों पर चलते हुए जिस एक बात की आशंका सबसे ज्यादा रहती है वो है पास की पहाड़ियों से शिलाओं , चट्टानों और पथ्थरों के खिसक कर सड़क पर कभी भी आ जाने की संभावना और उस स्थिति में सड़क पर चलते वाहनों के लिए बचने की कोइ गुंजाईश नहीं रहती | हालांकि प्रदेश सरकार , स्थानीय एजेंसियों व् सभी सम्बंधित लोगों को शुक्रिया कहा जाना चाहिए क्योंकि अधिकांशत: सड़क अच्छी स्थति में मिली हमें अभी तक तो .......
सड़क किनारे बना हुआ छोटा सा शिव मंदिर 
 हम मनाली पहुँच चुके थे और मनाली पहुँचते ही जो दो बातें एक साथ पता चली वो ये कि एक तो यहां शिमला से कहीं अधिक भीड़ होने के कारण होटल मोटल आदि में बहुत मारा मारी वाली स्थिति थी ऐसे में हमारे मित्र अरविन्द जी द्वारा पहले ही किया गया इंतजाम बेहद काम आया | मगर दूसरी और सबसे बड़ी समस्या जो पूरे पहाड़ों में सभी जगह कम या ज्यादा मगर मिली सब जगह वो रही पार्किंग की समस्या ,उसे भी अरविन्द जी ने अपने स्तर पे निपटा ही दिया ...

मनाली में ठिकाना रहा यहाँ 

मैं घुमक्कड़ी करते हुए बहुत सारे स्थानों पर जा चूका हूँ और उनमें निश्चित रूप से बहुत से पहाडी स्थल भी थे , किन्तु अब चूंकि पूरी फुर्सत में पहाड़ों को जानने  और समझने ही गया था सो सब कुछ बहुत ध्यान से देख और समझ रहा था | लगभग एक सी जीवन शैली , एक ही जैसी दुकानें , एक ही जैसी जरूरतें और एक सी आदतें , कुछ कुछ को छोड़कर सबमें एक वही एक सी बात मगर वो एक सी बात का सम्मोहन भी अजब था और हमेशा से रहा होगा  , तभी पहाड़ शुरू से देव और मनुष्यों को अपनी ओर खींचते रहे थे | 



मनालीहाट की एक दूकान 

हिडिम्बा मंदिर की और मुड़ने वाले मार्ग पर आधुनिक सलून 

सूचना ,दिशा व् दूरी प्रदर्शक बोर्ड 
 मनाली में सबसे पहले पर्यटक हिडिम्बा मंदिर ही देखने जाते हैं मैंने भी बचपन से लेकर अब तक इसकी विशेष बनावट के कारण ध्यान में बस गए मंदिर के बारे में बहुत पढ़ा देखा सुना था |हिडिम्बा , दुसरे नंबर के पांडू पुत्र महाबलशाली भीम की पत्नी स्थानीय भील युवती थीं | पूरा मंदिर परिसर एक कमाल की शान्ति और सुकून की चादर ओढ़े हुए था | बहुत ही मनमोहक और आकर्षक 
हिडिम्बा मंदिर परिसर के खूबसूरत पेड़ों के बीच हम सब 

                   महाभारतकालीन प्राचीन हिडिम्बा मंदिर में कतारबद्ध श्रद्धालु                                                    
वहां खूबसूरत खरगोशों और मेमनों के साथ खेलने का आनंद 

मंदिर परिसर के अहाते में बैठा एक पेशेवर चित्रकार 

मंदर की बाईं और के नीचे रास्ते के पास लगा हुआ छोटा सा बाजार 
यहीं इस बाज़ार के साथ छोटे छोटे कई रेस्तरां मिल गए जिनमें और कुछ मिले न मिले मगर हम सबके सदाबहार पसंद आलू के पराठे मिल गए जिन्हें उदरस्थ किया गया वो भी लस्सी के बड़े ग्लास के साथ |

हिडिम्बा मंदिर से आगे निकले तो क्लब हाउस की तरफ बढ़ चले | एक छोटा सा सुन्दर सा पिकनिक व् खरीददारी स्पॉट , यहाँ बच्चों को बहलाए रखने के लिए बहुत सारे ताम झाम हैं , बोटिंग शोटिंग है सो अलग से | यहाँ बच्चों की मम्मी को अपने सबसे पसंदीदा काम की याद बहुत ज़ोरों से हो आई क्योंकि सामने ही इम्पोरियम से झांकती झिलमिलाती चमकदार वस्तुएं उन्हें बुलाने लगी थीं | सो वे चली उनकी ओर और हम बच्चों समेत उनके खेल कूद वाले क्षेत्र की तरफ 
मनाली क्लब हाउस 
अहाते में गोलू और बुलबुल 
 बहुत छोटे थे तब शायद लखनऊ में परिवार के साथ कभी बोटिंग का आनंद लिया था बस यही याद था थोडा थोडा | बुलबुल की मम्मी जी जितना पहाड़ों से डरती थीं उससे ज्यादा पानी से सो उनके होते हमें ये इजाज़त भी शायद ही मिलती मगर मौके का फायदा उठा हम गंगा नहा लिए , मतलब बोटिंग कर आये | बुलबुल को ये शिकायत रही कि उसके पाँव उन पैदलों तक क्यों नहीं पहुँचते 

बच्चों के साथ बोटिंग का आनंद 

दोपहर ढलने लगी थी और इससे पहले कि हम और थक कर चूर होते विश्राम का समय हो चला था | अब आगे हमें मनाली से मणिकरण साहिब की ओर निकलना था , जिसके बेहद खतरनाक और भयावह रास्तों का हमें लेश मात्र भी अंदाज़ा नहीं था और यदि होता तो बकौल श्रीमती कभी भी यहाँ नहीं फटकते ..मगर नहीं आते तो ताउम्र अफ़सोस ही रहता ....

मणिकरण के किस्से अगली पोस्ट में 


रविवार, 27 सितंबर 2015

हुस्न पहाड़ों का -----घुड़सवारी , कुफरी की कहानी



इस सफ़र की शुरुआत और पहले पड़ाव तक पहुंचे की कहानी आप पढ़ चुके हैं | वहां पहुँचते ही सबसे पहले जो बात सबके मुंह से निकली वो ये कि जोरों की भूख लगी है सो पहले पेट पूजा की जाए | शिमला में प्रवेश करते करते बारिश की फुहारों ने भी स्वागत करते हुए जता और बता दिया था कि अब अगले एक सप्ताह तक हमें इस भीगे भीगे मौसम का साथ मिलने वाला है |




फ़टाफ़ट ही गर्म पानी से स्नान करके सब थोड़े तरोताजा हुए और इसका दूसरा प्रभाव ये पड़ा कि भूख और ज्यादा तेज़ हो गयी , सुबह से हलके फुल्के नाश्ते और फल वैगेरह खाए होने के कारण अब भरपूर खाने की जरूरत महसूस हो रही थी | मित्र अरविन्द जी का साथ ऐसे समय पर काफी उपयुक्त रहा और श्रीमती जी के पंजाबी खाने के स्वाद को जानते हुए उन्होंने सामने ही दिख रहे इकलौते ढाबेनुमा छोटे से रेस्तरां की तरफ कूच किया | यहाँ ये बता दूं कि पहाड़ों में जाते समय आप अपनी जीभ और स्वाद को या तो वहां उपलब्ध होने वाले कम मसालेदार भोजन के लिए अभ्यस्त कर लें या फिर उन्हीं फास्ट फ़ूड पर निर्भर हो जाएँ जो शहरों में पेट और सेहत  का कचरा किये हुए हैं , क्योंकि यहाँ हर तीन रेस्तरां में से एक पर आपको पंजाबी ढाबा , पंजाबी होटल जैसा लिखा हुआ कुछ दिख जाएगा मगर बकौल श्रीमती जी , इनमें वो स्वाद कहाँ | खैर हमारा तो ये मानना है कि जब भूख लगे तो जो सामने मिले वही अमृत है ...और खाने पीने में हमारी कोइ विशेष आदत या परहेज़ भी नहीं है जैसा देश वैसा भेष |




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उसी ढाबे से लिया गया एक चित्र




अगली सुबह शिमला के एक सबसे पसंदीदा प्वाइंट कुफरी जाने का कार्यक्रम बना | बकौल अरविन्द जी वहां कुछ पल तो आनंदायक रूप से मनाये जा सकते थे | लेकिन तब ये अंदाजा नहीं था कि आनंददायक होने के अलावा वे पल ताउम्र के लिए यादगार भी बन जाने वाले थे | नियत स्थान पर पहुँच कर ज्ञात हुआ कि कुफरी के उस दर्शनीय प्वाईंट तक सिर्फ घोड़े बैठ कर जाया जा सकता था | हालांकि बाद में जब उस रास्ते पर चले तो हकीकत महसूस करते भी देर नहीं लगी | मैं चूंकि फ़ौजी परिवार में पला बढा हुआ था इसलिए , घुड़सवारी , तैराकी , आदि में सिद्धहस्त था किन्तु बच्चे और उनसे भी अधिक बच्चों की मम्मी ने वहीं सत्याग्रह ठान दिया कि चाहे जो भी हो वे घोड़े पर नहीं बैठेंगी | खैर जैसे तैसे मनाया गया , और सवारी चल दी कुफरी के उस टेलीस्कोप प्वाइंट की ओर|

 


रास्ते में जो मैंने स्पष्टतः महसूस किया कि कम सौ सवा सौ घोड़ों पालने पोसने वाले कुछ लोगों  ने  जानबूझकर  रास्ते को न सिर्फ  संकरा  बल्कि कहीं और लाई गयी कीचडनुमा मिट्टी से इतना अधिक दुर्गम और खतरनाक बना  दिया था कि  वे  जो कुछ  लोग  घोड़े  पर  बैठकर  जाने  को  तैयार  नहीं  हुए  और  जिन्होंने  ये  कोशिश की   भी   उनके  लिए  ये   ज्यादा  बड़ी  सिरदर्दी  साबित  हुई | मुझे  लगता  है  कि सरकार  व् प्रशाशन  को इस बात   की   पूरी  जानकारी भी होगी | पूछने पर इस  बात  से साफ़ इनकार करते हुए  राईस  थामे मदन जी ने  बताया  कि क्या  करें  बाबू साहब , आखिर  हमारी  कमाई का ज़रिया  और कोइ  है भी तो नहीं || श्रीमती जी और इनकी  पूरी बिरादरी   यानी ..महिला ब्रिगेड ...चीत्कार ..मारते हुए , कई बार इतनी जोर से ..खुद घोड़े भी हैरान परेशान होकर सोचने लगते थे कि आखिर हम कर तो कुछ भी नहीं रहे फिर ये महिलाएं हमें डरा क्यूँ रही हैं |

घोड़े पर सवारी गांठते गोलू और बुलबुल

श्रीमती जी की भाव भागिमा देख कर आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं 




आगे जो नज़ारा आखों के सामने था , वो आप भी देखिये ....




 


 फिलहाल के लिए इतना ही , पोस्ट लम्बी हो जायेगी और आप हो जायेंगे  बोर इसलिए ..आगे की यात्रा अगली पोस्ट में ....

शनिवार, 11 जुलाई 2015

हुस्न पहाड़ों का -----एक मैदानी सैलानी की नज़र से


चांदी की छत



बहुत समय से कहीं  बाहर निकल पाने का अवसर आते हुए भी कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसी वजह निकल ही आती थी की ठीक आखिरी वक्त पर भी वो स्थगित हो जाया करता था | पिताजी के फ़ौजी जीवन के कारण पहले ही पूरा बचपन यायावरी रहा सो देश के बहुत सारे भागों के बहुत सारे खूबसूरत शहरों ,नगरों को मैं अपने विद्यार्थी जीवन में ही देख चूका था | जो रही सही कसर थी वो अपनी प्रतियोगिता परीक्षाओं के दौर में पूरी हो गयी |वैसे जब भी घूमने फिरने की बात होती है मैं अक्सर एक बात मित्रों को कहता हूँ की इंसान की जितनी उम्र है कम से कम उतनी जगहों को देखने का अवसर तो उसे जरूर मिलना चाहिए और इंसान को भी उनका लाभग उठाना चाहिए |

लगभग सात वर्षों पूर्व जब सपरिवार डलहौजी और खजियार गए थे तो श्रीमती जी को गोल गोल चढ़ाई उतराई वाले पहाडी रास्तों ने  काफी डरा दिया था | इस बीच मित्र अरविन्द जी ने बताया कि उनका शिमला , मनाली , होते हुए मणिकरण साहिब की  तरफ जाने का कार्यक्रम बन रहा है और यदि हमारा भी निश्चित हो जाए तो वे अभी ही चलेंगे | बच्चों की जिद और ललक के आगे तो मम्मी जी भी बेबस सो तय हो गया की हम सब मित्र अरविन्द जी के साथ उनकी मारुती डिजायर में एक सप्ताह की यात्रा पर निकलेंगे | सभी स्थानों पर हमारे ठहरने आदि की व्यवस्था अरविन्द जी ने पहले ही कर दी |


सुबह पांच बजे तडके ही निकल जाने का लाभ ये रहा की हम ग्यारह बजे तक चंडीगढ़ से आगे निकल कर शिमला की और बढ़ चुके थे | बच्चे अपनी मम्मी के साथ पिछली सीट पर बैठ कर तेज़ी से आसपास से निकलते शहरों , सड़कों, दुकानों को देखते हुए चले जा रहे थे | आगे हम और मित्र अरविन्द जी जो हमारे साथ ही आगे चालक की सीट पर बैठे थे उनके साथ विमर्श  चलता रहा | कभी उनके टूर ट्रेवेल्स ले अनुभव तो कभी सामने आ रहा योग दिवस , कभी राजनीति , कभी धर्म , कभी बीत रहा शहर |कार का पहिया घूमता रहा और घड़ी की सुई भी .............हम अब फिर भीड़ भाड से बाहर थे ......श्रीमती जी एकदम साफ़ सुथरी सड़कें देख कर कम से कम दो बार टोल टैक्स दिए जाने की वकालत कर चुकी थीं ..वैसे अब तक सडकें वाकई अच्छी थीं ...


मैं अपने जीवन में इतनी बार और इतने विविध परिवहन माध्यमों से सफ़र करता  रहा हूँ की सफ़र , विशेषकर  यदि यात्रा सपरिवार करनी हो तो और ज्यादा आवश्यक हो जाता है , के लिए की जाने वाली तैयारी , आपात समय के लिए सामान दवाई आदि , मानचित्र , मयूर जग , और दो मोबाइल के संग  एक कैमरा और , डोरी , टार्च वैगेरह को मैं इस बीच सिलसिलेवार निपटा चूका था | वहां के मौसम और पिछले एक सप्ताह के मानसून का हाल भी देख चूका था |


कहते हैं पहाड़ों का सौन्दर्य सबसे ज्यादा पहाडी रास्तों पर ही देखने को मिलता है और यकीनन ये सच ही है | एक मैदानी सैलानी के रूप में अगले एक सप्ताह तक हम सब पहाड़ों से मुलाक़ात और जान पहचान करने वाले थे | बिटिया बुलबुल थोड़ी असहज सी होने लगी थी और बार बार उल्टियां करने लगी थी .................

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देखिए   कुछ फ़ोटोज़ .....................

शिमला के लिए प्रवेश मार्ग पर





रास्ते का दृश्य




गिरते टूटते पहाड़ और रास्ते



मनमोहक नज़ारा ..है न



फ़िल्मी से दृश्य



रास्ते हैं प्यार के


हरी भरी धरती और बाग़ बगीचे

बादलों को चूमते पहाड़




सफ़र के पहले ठिकाने पर


गुरुवार, 29 जनवरी 2015

अरविंद पहले हम आपके पीछे थे ...अब ....




समय घूम फ़िर कर वहीं आ खडा होता है और ऐसे समय में तो मुझे लगता है मानो हम सब किसी पार्क में एक दूसरे के पीछे भाग भाग कर गोल गोल घूम घूम कर रेलगाडी छुक छुक छुक छुक खेलने में लगे हैं  । दिल्ली विधानसभा चुनाव एक बार फ़िर से लडे जाने वाले हैं , अपने यहां इस देश में लोकतंत्र इतने हाहाकारी रूप से मज़बूत है कि लगभग हर कोई अपनी सरकार बना ही बैठा है , और अपने अपने तरीके से चला भी रहा है , नहीं चल रहा है तो गरीब और उससे भी अधिक मध्यम वर्ग वाले का घर , खैर ..
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यहां बात पोलिटिकली एक्सप्रैस करने की है तो पिछले सारे अनुभव यही बताते हैं कि आप चाहे जो मर्ज़ी करें , किसी के लिए भी भक्त हो जाएं या किसी के प्रति विरक्त हो जाएं , सार्वजनिक रूप से खुद को व्यक्त करने के दो नियमों का पालन किया जाना अपेक्षित होता है , पहला हर विचार , हर राजनैतिक सोच और हर राजनेता का चुनाव सबका अपना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना निजि मत और राय है इसलिए बेशक असहमति संभावित भी है और सराहनीय भी किंतु उससे ज्यादा उचित है कि अपने द्वारा निर्धारित किए गए राजनैतिक विचार , या उम्मीदवार अथवा राजनैतिक दल ही सही के सकारात्मक पक्षों को सार्थक रूप से आगे सरकाया जाए ।
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दूसरा नियम ये है कि , चाहे किसी के भी पक्ष में हों या किसी के भी धुर विरोधी हों , व्यक्त ही न करें , स्पष्टत: तो कतई नहीं , इससे सारे हाथों में लड्डू की संभावना बढ जाती है , फ़िर जिसे चाहें उसे  मर्ज़ी जी भर के कोसें , मगर फ़िर रिवर्स फ़ायरिंग की भी पूरी संभावना रहती है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता । दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले के परिदृश्य को याद करें तो कम से कम मुझ जैसे लाखों युवाओं को सिविल सोसायटी के रूप में यकायक ही हमारे बीच से निकल कर राष्ट्रीय फ़लक पर सियासत को सीधे सीधे चुनौती देकर उनसे बेहतर कर दिखाने की हुंकार भरते कुछ जननायकों ने एक अजीब ही फ़िज़ा बना दी । मैं स्वयं उन सारी उथलपुथल का गवाह रहा और बेहद नज़दीक से सारी स्थितियों को समझता रहा । अपने अनुभवों के आधार पर इतना तो स्पष्ट समझ में आ चुका था कि कुछ गैर राजनीतिक सोच और दांव पेंच से अनभिज्ञ जोशीले लोगों ने किसी बडे परिवर्तन का मन बना कर अपनी आर पार की लडाई छेड दी ।

देश परिवर्तन मोड में था , लोग मानो बिजली पानी के मुद्दों तक पर सडकों पर उतरने को आमादा हो चुके थे , आज़िज़ होने की स्थिति ने वो चमत्कार कर दिखाया जिसकी उम्मीद उन्हें भी नहीं थी जिनके साथ ये चमत्कार हो गया । मगर हाय रे भारतीय लोकतंत्र और हाय रे एक आम आदमी, की  पोलिटिकल इम्मैच्योरिटी यानि राजनैतिक अपरिपक्वता , इसका परिणाम आत्मघाती साबित हुआ , और मुट्ठी भर तने हुए लोग भी एक अनुशासन में नहीं रह सके । बिखराव को अगर रोकने की पुरज़ोर कोशिश की जाती तो शायद स्थिति कुछ और ही होती । 

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इस बीच लोकसभा के महाचुनाव में देश भर ने मानो राष्ट्रीय जनमानस का परिचय देते हुए अपना फ़ैसला सुनाया कि अब उसे अमुक व्यक्ति अमुक दल और अमुक विचार को ही समर्थन देने का मन बना लिया है । इस चुनाव के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में इस प्रभाव को देखा और महसूस किया गया जिसे लोगों ने मौज़ लेते हुए लहर का नाम दिया । दिल्ली विधानसभा चुनाव , उसका मिज़ाज़ और उसके विश्लेषण का आकलन या अंदाज़ा लगाना सहज़ नहीं है , कारण भी बहुत सारे हैं किंतु इस बीच हमारे जैसे बहुत सारे लोग अब अरविंद केजरीवाल से सीधे सीधे कहना चाह रहे हैं कि अरविंद ..पहले हम आपके पीछे थे ...नीयत पे अभी भी हमें कोई संदेह नहीं किंतु आपकी अपरिपक्वता का खामियाज़ा देश और समाज क्यों भुगते ....इसलिए अब ............

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कुछ तो चुनाव परिणामों के बाद के लिए भी छोड दिया जाना चाहिए कि नहीं ..........

रविवार, 11 जनवरी 2015

पीके ...अब क्यों बैठे हो मुंह सीके


पिछले साल से इस नए साल तक यदि कोई विवाद घिसटता चला आ रहा है तो उसमें से नि:संदेह एक हाल ही में प्रदर्शित सिनेमा पीके भी है । हालांकि इस सिनेमा के विषय या इसके प्रदर्शन से पहले भी इसके साथ विवाद तो तभी शुरू हो गया था जब इसका पहला पोस्टर जारी किया गया था जिसमें अभिनेता आमिर खान रेल की पटरी पर बिल्कुल नग्न खडे थे । हमेशा की तरह अपने नए प्रयोगों और नई सोच को सामने लाने के लिए विख्यात अभिनेता आमिर खान के इस पोस्टर के बाद सब अंदाज़ा लगाने लगे थे कि कुछ न कुछ नया ही परोसा जाने वाला है किंतु कहीं से भी किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि एक बार फ़िर से धर्म या कहा जाए कि धर्म के भीतर फ़ैले पाखंड और आडंबर को निशाने पे लिया जाएगा । किंतु हमेशा की तरह से फ़िर से आसान टार्गेट चुनते हुए बडी ही चतुराई से पूरी फ़िल्म में अधिकांशतया हिंदू धर्म , धर्म स्थल , हिंदू ईश एवं हिंदू धर्मगुरू को ही विषय बना कर उसके इर्द गिर्द सारा फ़िल्मी मसाला बुन कर परोस दिया गया , परिणाम ये कि आशा के अनुरूप फ़िल्म के कथानक , दृश्यांकन , डायलॉग आदि विवादित हुए और फ़िल्म ने सिने इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली , लगभग सवा तीन सौ करोड , फ़िल्म का रिकार्ड बना लिया ।

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इस पोस्ट के लिखे जाने तक यूं तो इस फ़िल्म से जुडे सारे विवाद पार्श्व में जा चुके हैं और इसी बीच बदले हुए घटनाक्रम पर पूरे विश्व और भारत सहित पूरे समाज की नज़रें जा चुकी हैं , आस्ट्रेलिया से लेकर फ़्रांस तक पर मज़हब , इस्लामिक राज़्य और ज़िहाद के नाम आतंक का नंगा नाच किया जा रहा है । निर्दोष मगर निर्भीक लोगों , पत्रकारों , संपादकों तक की हत्या करके दशहत फ़ैलाने और अंजाम भुगतने का संदेश दिया जा रहा है अलग अलग आतंकी गुटों द्वारा , और स्थिति ये है कि कहीं भी किसी के मुंह से इसकी भर्त्सना तो दूर उलटे खुल्लम खुल्ला ऐसे आतंकियों को ईनाम देने और उन्हें इस घिनौनी करतूत के लिए शाबासी तक देने को आतुर हैं । खैर , दोबारा लौटते हैं फ़िल्म पीके की ओर ..
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सवाल ये नहीं है कि धर्म और धर्म के नाम पर फ़ैले पाखंड और आडंबर को यदि सिने कलाकार अपने निशाने पर नहीं लेंगे उनपर चोट नहीं करेंगे तो फ़िर क्या आम आदमी करेगा , तो नि:संदेह ये उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी । और  ये किया भी जाता रहा है ,कुछ समय पूर्व एक ऐसी ही फ़िल्म ओ माय गॉड भी प्रदर्शित की गई थी जिसमें बडे ही तर्कपूर्ण तरीके से धर्म के नाम पर धर्मगुरूओं द्वारा फ़ैलाए गए माया जाल को निशाने पर लिया गया था । किंतु एक दर्शक के रूप में जो बातें इस फ़िल्म में किसी भी दर्शक इत्तेफ़ाकन अगर वो हिंदू धर्म का अनुयायी हो और संयोगवश आस्तिक भी है तो उसे जो नागवार गुज़री होंगी वो नि:संदेह यही रही होंगी ।
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पहला , सिनेमा का ठीक ऐसे समय में प्रदर्शन जब भारतीय जनमानस धीरे धीरे संगठित होकर हिंदुस्तानी मर्म और हिंदू धर्म पर केंद्रित हो रहा था/है । इसका प्रमाण बहुत समय बाद भारतीय जनता पार्टी का इतने बडे बहुमत से शासन में आना , देश से लेकर प्रदेश तक लोगों की सामाजिक , राजनीतिक और धार्मिक सोच प्रबल रूप से हिंदुत्व के पुरातन गौरव के प्रति रुझान , ऐसे समय में यदि अनावश्यक रूप से उनके ईश और मान्यताओं का ऐसा उपहास सिर्फ़ व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाएगा तो ये आमंत्रित विवाद की तरह था । केंद्र में अभिनेता आमिर खान , इत्तेफ़ाकन मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित थे , कथानक में प्रेमी जोडे में युवक पाकिस्तान का और युवती भारत की , क्या मुसलमान धोखेबाज होते हैं , लोग मूते नहीं इसलिए भगवान की फ़ोटो लगा देते हैं जैसे संवाद आदि इतने सारे तथ्यों को यदि संयोग भी मान लिया जाए तो फ़िर ये निंसंदेह घातक संयोग था । आखिरी और सबसे अहम बात जिसका ज़िक्र बार बार इस विवाद में हुआ कि क्या जितनी आसानी से हिंदू धर्म , धार्मिक स्थलों , हिंदू ईश , और हिंदू धर्म गुरुओं को निशाने पर लिया जाता है क्या वही हिम्मत किसी अन्य धर्म विशेषकर मुस्लिम मज़हब के लिए दिखाई जा सकती है ...विश्व आज इस्लामिक कट्टरपंथ से उपजे आतंकवाद का दंश झेल रहा है और इन सारे प्रश्नों का उत्तर पा रहा है ।


अंत में सिर्फ़ यही कहने का मन है कि ,



सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे अब कहां हो बे पीके ,
दडबों से निकलो न ,बनाओ कुछ कठमुल्लों पे सिनेमा फ़िर दिखाओ जी के ..
सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे, अब कहां हो बे पीके ,
धर्म नहीं मज़हब के नाम पर जब हुआ नंगा नाच , बैठ गए न मुंह सी के ..

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

पॉलिथीन में मूतते लोग .....................




समय लगभग साढे सात -आठ बजे शाम का वक्त । पिछले कई दिनों से बालों की कटाई का काम किसी न किसी अनचाही बाधा/व्यवधान के कारण स्थगित हो जाता था ।  अब अक्सर ही ऐसा होता है कि ऐसे कामों के लिए मैं और पुत्र एकसाथ ही निकल जाते हैं । मुख्य सडक पर स्थित सैलून के दरवाज़े पर पहुंचते ही भांप जाते हैं कि , रविवार के छूटे और मंगलवार को सैलूनों के बंद होने के कारण , लोग बाग जम कर रंगाई/घिसाई/पुताई करवाने के इरादे से वहां जमे हुए हैं । 

कोने में रखी बैंच पर बिखरे हुए अखबार के अलग अलग पन्नों को लगभग समेटते और उठाते हुए मैं और पुत्र वहीं बैठ जाते हैं । समाचार पत्र का नाम पढ कर हैरानी होती है , हैरानी इसलिए क्योंकि अब तक लगभग अधिकांश सलूनों में तो पंजाब केसरी ही देखते आए थे । यहां इस पंजाब केसरी समाचार पत्र से जुडा एक दिलचस्प किस्सा साझा करने का मन है । उन्नीस वर्ष पहले जब मैं दिल्ली आया था तो , एक दिन शायद वृहस्पतिवार का दिन रहा होगा , दिलशाद गार्डेन से अंतरराज्यीय बस अड्डे की ओर जाने वाली किसी बस के रास्ते में कहीं एक व्यक्ति जोर जोर से चिल्लाता हुआ बस में चढा ," पेपर पेपर , हिंदुस्तान ,दैनिक जागरण , नवभारत ..सैक्सी पेपर पंजाब केसरी .....मैं चौंक उठा था , मगर सिर्फ़ मैं ही चिहुंका था किसी दूसरे ने ध्यान भी नहीं दिया , हां पंजाब केसरी जरूर तीन चार लोगों ने खरीद लिए और फ़िर मुख्य समाचार पत्र को किनारे रख सीधे उसके वीरवारीय परिशिष्ट को खोल कर पूरी शिष्टता के साथ पढने लगे । खैर , इस पोस्ट का मुख्य विषय ये नहीं है । 

कैंची खच खच खच खच चलती जा रही है , मैं आदतन आंख मूंद लेता हूं ।

" क्या हुआ , आं ......क्या , बाथरूम जाना है " आवाज़ के साथ ही मैं आंखें खोलता हूं तो सामने लगे आइने में देखता हूं कि , मेरे बाल काट रहा वो लडका , बैंच पर बैठे एक थुलथुले लडके , जो कसमसा रहा था और माथे पर पसीने की चुहचुहाट भी दिखाई दे रही , की ओर देख कर उससे पूछ रहा था ।

" हां , बहुत तेज़ पेशाब आ रहा है , मुझे जाना है "

" लेकिन , यहां तो है ही नहीं कोई भी बना हुआ , दूर जाना पडेगा , मेरे बाल काटते काटते वो अब रुक चुका है और साथ खडे एक अन्य लडके जो दूसरे ग्राहक को निपटा रहा है उसकी ओर देख रहा है । मैं शीशे में देख रहा हूं कि लडके की कसमसाहट बढ रही है ।

यार ये तो रोज़ का झंझट हो गया है , ले जाकर बिठाकर स्कूटर पे इसको फ़टाफ़ट घर पे .लायलपुर............फ़ारिग करा के ले आ । "

मैं और हैरान हो उठता हूं , यहां से लायलपुर , स्कूटर पे , वो भी ....फ़ारिग होने ।

"असलम , तू ले जा,........ वो आतिफ़ भाई वाला स्कूटर ले जा , गल्ले में चाभी पडी होगी , सुन रिजर्व आन कर दियो , और कहीं टैम मत लगाइयो , धंधे का टैम है , जा जा ले जा इसको " मेरे सर पर कैंची चलाता लडका भुनभुनाते हुए एक सांस में बोल जाता है ।

कोने में कंघा फ़ेर रहा एक दुबला सा लडका , सुनते ही भाग खडा होता है , थुलथुला लडका पहले ही दुकान के बाहर जा चुका था ।


"वो राशिद के, बिजली बत्ती वाले कारीगर लौंडे क्या करते हैं ....... कै रिए थे पता है", अब मेरा पूरा ध्यान दोनों नाए मित्रों की होती इस बातचीत पर चला जाता है  ............साले , पॉलिथिन में करके गांठ मार के धर देते हैं , निकलते बडते फ़ैंकि आते हैं कहीं ............कह के वो अजीब नज़रों से आइने में देखता जहां मेरी नज़र उससे टकराते ही सकपका जाता है ।

"हां दिक्कत तो है ही , किया क्या जाए .....उधर से कसमसाहट भरी आवाज़ आती है ।


खच खच खच ...। मैं कुर्सी से उठकर खडा होता हूं , बजाय ये पूछने के कि , पैसे कितने हुए , बेसाख्ता पूछ बैठता हूं , क्या ये दिक्कत सबके साथ है , कब से है , आप लोग इसकी शिकायत क्यों नहीं करते ........

वो कहता है , बाबूजी साठ रुपए हो गए .....। मैं पैसे देता हूं और पुत्र का हाथ पकड कर सलून के बाहर हो जाता हूं । दिमाग में स्वच्छता अभियान , ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच के विरूद्ध मुहिम ...जाने क्या क्या ,,घूमने लगता है ।

गुनधुन में ही दवाई की दुकान पर पहुंचता हूं । वहां भी वही सवाल ............

हां , मैं भी घर जाता हूं , क्या करूं दवाई का दुकानदार हूं इसलिए ज्यादा देर रोक कर रखने का नुकसान जानता हूं ...............पहले था एक बना हुआ , खुला था , गंदा रहता था ,  आसपास के लोग बोलते थे , लडाई हो जाती थी , इसलिए तुडवा दिया किसी ने .......


स्थान .....जगतपुरी से चंदरनगर जाने वाली सडक , समय लगभग साढे सात से साढे आठ का ,तारीख...आज की तारीख से थोडा सा पहले ......मेरे पास एक नायाब हल है .............अगर प्रयोग सफ़ल रहा तो वो भी बताउंगा , फ़िलहाल काम शुरू हो चुका है ........

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