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रविवार, 29 जून 2008

हर बार इक नयी तस्वीर

मैं सोचता हूँ,
जब,
ये कैमरा,
वही रहता है,
तो फ़िर कैसे,
हर बार,
इक नया रंग,
नया रूप ,
और ,
नया नाम लिए,
तुम्हारी,
इक नयी,
तस्वीर निकलती है॥

औरत, कौन हो तुम , मैं सचमुच नहीं जान पाया....

मेरा अगला पन्ना : ब्लॉगजगत में महिलाओं की धाक ।

रे माधो, तू देखना


रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,

न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥

माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?

रे माधो, तू देखना


रे माधो, तू देखना,
इक दिन ,
मैं इस चाँद का,
एक टुकडा तोड़ कर,
तेरे माटी के,
दिए में पिघ्लाउंगा॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,
इन तारों को,
बुहार कर एक साथ,
रग्दुन्गा , तेरे आँगन में,
आतिशबाजी , करवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तू नहीं जायेगा,
पंचायत में हाजिरी देने,
तेरे दालान पर,
संसद का सत्र बुल्वाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरे गेह्नु के बने ,
जो खाते हैं, रोटी,
ब्रैड-नॉन, भठूरे,
उन सबसे ,
तुझको मिलवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
इक दिन,

तेरी मुनिया को,
इस स्लेट-खड़ी के साथ ,
बड़े कोंवेंट में ,
पढवाउंगा मैं॥

रे माधो, तू देखना,
जो इस जनम,

न हो सका , ये सब,
तो जब तक,
हो न सकेगा, ये सब,
हर बार , इक नया जनम,
लेकर आउंगा मैं॥

माधो , तू देखना एक दिन ऐसा जरूर होगा, क्यों होगा न ?

शुक्रवार, 20 जून 2008

एक कविता या पता नहीं कुछ और

होगा कई,
शहरों -कस्बों ,
मैदानों-सड़कों,
का मालिक,
फ़िर भी,
चला वो,
सड़क किनारे,
नहीं बीच में,
चलते देखा॥

कहते होंगे,
उसे सभी , वो,
है बड़े,
दिल का मालिक,
पर वो तो,
हाथ मिलाता सबसे,
कभी किसी से,
नहीं गले मिलते देखा॥

मुझको लगता था,
मैं ऐसा हूँ,
दोस्तों से भी,
चिढ जाता हूँ,
पर उसको भी,
अक्सर,
यारों की,
कामयाबी पर,
जलते देखा॥

सूखी ही सही,
रोटी ही सही,
पर माँ , मुझको,
ख़ुद देती है,
उसके बच्चों ,
को तो ,
आया के हाथों,
पलते देखा॥

मुझको लगा की,
कमजोरी ने,
मुझको बूढा बना दिया,
देखा तो,
कुछ,
झुर्रियां ही,
थोड़ी कम थी,
उम्र के उस मोड़ पर,
उसको भी,
ढलते देखा॥

अमा, काहे के अमीर हो यार, ?

गुरुवार, 19 जून 2008

ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट

शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।

दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।

जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।

इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।

अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।

जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।

आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।

अजय
9871205767

ब्लॉगजगत के एलियन -श्री उड़नतश्तरी जी महाराज पर एक पोस्ट

शुरू-शुरू में जब मैंने अपने चिट्ठों पर लिखना शुरू किया था तो एक अदद टिपण्णी की दरकार रहती थी, इसका ये कतई मतलब नहीं की आजकल दरकार नहीं रहती, मगर उन दनी हम किसी कक्षा में आए नए बच्चे की तरह थे जो कक्षा में मौजूद हरेक सहपाठी से अपनी जान पहचान बढाना चाहता है। ऐसे में इस ब्लॉगजगत के लोग कब कितना टिपियाने आए ये तो याद नहीं मगर धरती, पातळ , आकाश को छोड़कर आसमान के ऊपर से एक अन्तरिक्ष के प्राणी- उड़नतश्तरी जी - हमारे चिट्ठे पर अक्सर अवतरित होने लगे। तब हमारे अल्पबुद्धि मस्तिष्क में दो ही बातें संचारित हुई। पहली ये की- यार, कमाल है हमें टिपियाने जादू के भी, बंधू, एलियन लोग आने लगे, इतने ऊपर लेवल की लेखनी हो गयी, हमारी कमाल है, झा बाबु।

दूसरी ये की यार, कहीं ऐसा तो नहीं की धरती- पातळ में कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा तो बेचारा कोई एलियन उसे अपनी कूट भाषा समझ कर टिपिया रहा हो, अजी लानत है झा जी। खैर हमारे बात पर झाडू मारिये।

जब हमने उस यु , आई, ओ , यानि अन आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त को आईदेंतीफाई किया तो आशा के अनुरूप आलूबुखारे, रसगुल्ले, गुलाबजामुन, की प्रजाती के गुलगुले -थुलथुले से एलियन महाशय निकले- उड़नतश्तरी जी। उनका असली नाम समीर सोनी है ये तो मुझे कुछ ही समय पहले पता चला। वैसे अपने मम्मी पापा से अच्छा तो ख़ुद ही उन्होंने अपना नामकरण किया है।

इनकी पोस्टों, इनकी, लेखन शैली, इनकी अनोखी सोच, अद्भुत विचारों के बारे में क्या कहूं। इन्हें पढ़ कर कोई भी समझ सकता है की ये इंसानी शरीर, रंग रूप मगर दिमागी तौर पर किसी एलियन का काम हो सकता है। चाहे गंभीर बात करें या किसी को जूता मारें ( ध्यान रहे की ये जूता मारने से पहले उसे अच्छी तरह भिगो देते हैं ) , बस हर बात में एक तरह का अन्त्रीक्ष्पना टपकता है।

अब टिप्पणियों की बात। जैसा की मैंने पहले ही बता दिया है की ये वो उड़नतश्तरी है जो बगैर किसी ट्रैफिक जाम ,रेड लाईट, में फंसे हर किसी के चिट्ठे पर लैंड करती है। (मेरे यहाँ तो इनकी पार्किंग का आजीवन पास बना हुआ है )। इनकी इस क्रिया की ऐसी प्रतिक्रया होती है की इनकी एक पोस्ट पर इतनी टिप्पणियाँ आती हैं, जितनी हम साल भर पोस्ट नहीं लिख पाते। खुदा खैर करे यदि गलती से भी किसी दिन मेरी रद्दी की टोकरी में इतनी तिप्प्न्नियाँ आ गयी तो यकीन मानिए खुशी के मरे मेरे चिट्ठे का हार्ट फ़ैल हो जायेगा।

जब भी ब्लॉगजगत पर किसी के योगद्दन की चर्चा होगी तो इस मोस्ट आईदेंतीफाईद ओब्जेक्त की टिप्पणियों और उनके साथ नए चिट्ठाकारों को आमंतरण और प्रोत्साहन के संदेश के लिए हमेशा ही याद किया जायेगा। मैंने भी ख़ुद इसी से प्रेरित होकर बहुत लोग को धकिया कर यहाँ इकठ्ठा कर लिया है। हाँ मेरी एक हसरत तो हमेशा से रहेगी की कभी मिले तो इस उड़नतश्तरी को छु कर सहला कर गुदगुदा कर महसूस करूंगा की यार इस बन्दे में के अन्दर क्या क्या भरा पडा है।

आदरणीय उड़नतश्तरी जी , यदि कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ़ कर दें, अपना छोटा समझ कर , और मैं आपसे छोटा हूँ ये तो मैं साबित भी कर सकता हूँ।

अजय
9871205767

सोमवार, 16 जून 2008

तुम औरतें, हर बार क्यों,

तुम औरतें,
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?

जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥

वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।

वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।

मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।

लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।

क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।

माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?

सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥

"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...

औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.

तुम औरतें, हर बार क्यों,

तुम औरतें,
हर बार, क्यों,
हम पुरुषों को ही,
कटघरे में,
खडा करती हो ?

जो मर्द,
बने फिरते हैं,
उन बेटों को,
बेटियों से ज्यादा,
लाड देकर , ख़ुद तुम्हीं तो ,
बड़ा करती हो॥

वो जो,
किसी कन्या के,
जन्म पर, सबसे ज्यादा,
छाती पीटती है,
और कोसटी है,
बेटी , बहू और बहिन को,
वो तो,
औरत ही होती है न।

वो जो,
शादी के बाद,
ताना देती,
और अक्सर,
आग लगाकर,
जला देती है,
अपनी बाहू और भाभी को,
वो भी,शायद,
औरत ही होती है न।

मैं मानता हूँ,
कि, इस मर्दाने,
समाज ने,
तुम से,
हमेशा ही,
अन्याय किया है।

लेकिन क्या,
तुम्हें नहीं लगता,
जाने -अनजाने,
ये अधिकार ,
भी ख़ुद,
तुमने ही दिया है।

क्या मर्दों के,
कपड़े पहनने से,
या उनकी,
तरह पनपने से,
औरत कोई,
मर्द सा बन जायेगी।

माना , गर ऐसा,
हो भी जाए,
तो फ़िर क्योंकर,
वो भी,
औरत ही कहलायेगी ?

सब सोच की,
लड़ाई है ,
नजरिये का फर्क है,
असंतुलन के ,
इस समीकरण में,
अज्ञानता की पर्त है॥

"नारी कभी,
कमजोर नहीं थी,
कमजोरी है,
उसका औरत्पन,
अपनी शक्ति,
ख़ुद पहचानो,
तौलो ख़ुद,
अपना अंतर्मन...

औरत आज भी कस्तूरी मृग की तरह अपनी शक्ति को ढूँढने के लिए भटक रही है, जबकि वो शक्ति ख़ुद उसके अन्दर मौजूद है.

रविवार, 15 जून 2008

दर्द हो या नंगापन ,अच्छी पैकिंग में सब बिकता है. (भाग दों)

कल इसी विषय पर मैंने अपने दूसरे चिट्ठे में (देखें मेरा दूसरा चिटठा , मेरा दूसरा ठिकाना ) कुछ पंक्तियाँ लिखी थी, मगर फ़िर लगा कि, अभी मन नहीं भरा और अभी और भी बहुत कुछ कहना बांकी है ।

अभी हाल फिलहाल में ख़बर पढी कि , ताजातरीन आरुशी काण्ड ने हिन्दी समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ा दी है। टी आर पी, यानि टेलीविजन रेटिंग पोंट्स , मतलब उन दिनों लोगों ने अधिकांश समय ये समाचार चैनल्स देखे। इसके साथ ही इस घटना से जुडी कुछ और खबरें भी आयी, जैसे कि एक प्रमुख महिला निर्मात्री (जिन्हें मेरे विचार से भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सादे गले मस्तिष्क और विचार वाली महिला और निर्मात्री कहा जाए टू ग़लत नहीं होगा ) ने अपनी आदत के अनुरूप इस व्हातना को भी अपने वाहियात सेरेयलों को ज्यादा वाहियात बनाने के लिए शामिल करने की सोची, मगर आयोग के डंडा फटकारते ही दुबक गए।

हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब मीडिया , और चित्रपट के लोगों द्वारा हादसे को, किसी के दर्द को भुनाने की कोशिश की गयी हो। बॉलीवुड में तो ये एक स्थापित चलन सा बन चुका है। आपको राजस्थान की दलित महिला भंवारी देवी के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बनी पिक्चर बवंडर शायद याद हो। जहाँ तक मुझे पता है कि इसके निर्माता निर्देशक (उनका नाम शायद जगमोहन मून्द्रा था ) ने आज तक कभी भंव्री देवी की शक्ल भी नहीं देके, उसका दर्द पूछना तो दूर की बात है। और ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें याद करने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पडेगा।

असल बात सिर्फ़ इतनी है कि ये जो हमारे बीच से निकलकर हमारे सामने खड़े हैं और जिनका दावा है कि वे जो दिखाते बताते हैं वो तो समाज का आईना है वो एक सौदागर हैं, विशुद्ध सौदागर , सबकुछ बेचने वाले। सपने मुस्कराहट, आतंक, मासूमियत, दर्द, प्यार, नफरत, हादसा, हकीकत, सबकुछ। माल चाहे जैसा भी हो, जो भी हो या कि सबके पास एक ही माल हो फर्क पैकिंग और प्रस्तुतीकरण का है।

और फ़िर हमारे समाचार चैनलों की इन्तहा टू ये है कि अभी कुछ समय पहले एक समाचार चैनल की प्रसारिका एक अपराध आधारिक कार्यक्रम की उद्घोषणा इतनी शिद्दत से करती थी कि लगता था कि वे अपराधियों का नाम नहीं बल्कि अपने प्रेमियों का नाम ले ले कर पुकार रही हों। तो फ़िर तो यही लगता है कि ये सब के सब उन गिद्धों के झुंड की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ़ लाशों से मतलब होता है, चाहे वो इंसान की लाशें हों या जानवरों की। वह रे हमारा चौथा स्तम्भ !

दर्द हो या नंगापन ,अच्छी पैकिंग में सब बिकता है. (भाग दों)

कल इसी विषय पर मैंने अपने दूसरे चिट्ठे में (देखें मेरा दूसरा चिटठा , मेरा दूसरा ठिकाना ) कुछ पंक्तियाँ लिखी थी, मगर फ़िर लगा कि, अभी मन नहीं भरा और अभी और भी बहुत कुछ कहना बांकी है ।

अभी हाल फिलहाल में ख़बर पढी कि , ताजातरीन आरुशी काण्ड ने हिन्दी समाचार चैनलों की टी आर पी बढ़ा दी है। टी आर पी, यानि टेलीविजन रेटिंग पोंट्स , मतलब उन दिनों लोगों ने अधिकांश समय ये समाचार चैनल्स देखे। इसके साथ ही इस घटना से जुडी कुछ और खबरें भी आयी, जैसे कि एक प्रमुख महिला निर्मात्री (जिन्हें मेरे विचार से भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे सादे गले मस्तिष्क और विचार वाली महिला और निर्मात्री कहा जाए टू ग़लत नहीं होगा ) ने अपनी आदत के अनुरूप इस व्हातना को भी अपने वाहियात सेरेयलों को ज्यादा वाहियात बनाने के लिए शामिल करने की सोची, मगर आयोग के डंडा फटकारते ही दुबक गए।

हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब मीडिया , और चित्रपट के लोगों द्वारा हादसे को, किसी के दर्द को भुनाने की कोशिश की गयी हो। बॉलीवुड में तो ये एक स्थापित चलन सा बन चुका है। आपको राजस्थान की दलित महिला भंवारी देवी के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बनी पिक्चर बवंडर शायद याद हो। जहाँ तक मुझे पता है कि इसके निर्माता निर्देशक (उनका नाम शायद जगमोहन मून्द्रा था ) ने आज तक कभी भंव्री देवी की शक्ल भी नहीं देके, उसका दर्द पूछना तो दूर की बात है। और ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें याद करने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पडेगा।

असल बात सिर्फ़ इतनी है कि ये जो हमारे बीच से निकलकर हमारे सामने खड़े हैं और जिनका दावा है कि वे जो दिखाते बताते हैं वो तो समाज का आईना है वो एक सौदागर हैं, विशुद्ध सौदागर , सबकुछ बेचने वाले। सपने मुस्कराहट, आतंक, मासूमियत, दर्द, प्यार, नफरत, हादसा, हकीकत, सबकुछ। माल चाहे जैसा भी हो, जो भी हो या कि सबके पास एक ही माल हो फर्क पैकिंग और प्रस्तुतीकरण का है।

और फ़िर हमारे समाचार चैनलों की इन्तहा टू ये है कि अभी कुछ समय पहले एक समाचार चैनल की प्रसारिका एक अपराध आधारिक कार्यक्रम की उद्घोषणा इतनी शिद्दत से करती थी कि लगता था कि वे अपराधियों का नाम नहीं बल्कि अपने प्रेमियों का नाम ले ले कर पुकार रही हों। तो फ़िर तो यही लगता है कि ये सब के सब उन गिद्धों के झुंड की तरह हो गए हैं जिन्हें सिर्फ़ लाशों से मतलब होता है, चाहे वो इंसान की लाशें हों या जानवरों की। वह रे हमारा चौथा स्तम्भ !

शनिवार, 14 जून 2008

दान (एक छोटी सी कहानी )

सुबह सुबह ही विद्या के फोन की घंटी कम ही बजा करती थी इसलिए जब उस दिन अचानक ही नींद खुलने से पहले ही घंटी बज उठी तो उसने बुरा सा मुंह बनाया, और मन ही मन उस फोन मिलाने वाले को कोसती हुई फोन उठा कर देखने लगी, नंबर देखते ही झुंझलाहट कम हो गयी, कविता दीदी का फोन था,

" हेलो, अरे विद्या तूने, कल मुझे ये तो बता दिया की आज निर्जला एकादशी है , परन्तु शायद तुझे ये नहीं पता कि इस दिन का बड़ा महत्त्व है, सिर्फ़ चावल नहीं खाने का मतलब नहीं है, आज लोग खूब दान पुण्य , करते हैं। मैं तुझे बताती हूँ , आज के दिन मन्दिर में खरबूजा, पंखाघडा, दूध चीनी आदि का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है। अरे हाँ , मुझे कौन सा मालूम था , वो तो माँ का फोन आया था , शायद तुझे भी करें।"

इसके बाद तो माँ , बड़ी दीदी, बाजी और जाने किस किस ने फोन करके पुण्य कमाने का सूत्र विद्या को बता दिया। दरअसल विद्या ने अभी अभी घर गिरहस्थी शुरू की थी, और फ़िर घर में सबसे छोटी होने के कारण भी सब उसे हर बात बताते और समझाते थे।

विद्या ने इसके बाद देर करना ठीक नहीं समझा और विनय को भी जबरदस्ती उत कर सारे सामानों की सूची पकडा दी, और ये भी बता दिया कि जब तक वो बाज़ार से ये सारी चीज़ें लाते हैं वो नहा धोकर तैयार हो जायेगी, ताकि मन्दिर जाकर वो सारी चीज़ें दान कर सके, बाद में बहुत भीड़ हो जाती है। विनय भी बेमन से उठ कर बाज़ार चल दिए और जाते जाते बोल गए , " भाई , तुम लोगों का कुछ नहीं हो सकता इस सबसे अच्छा तो ये होगा कि इन चीजों को किसी गरीब को देदो , भगवान् से तुम्हें क्या कब कैसे मिलेगा ये तो पता नहीं मगर गरीब की दुआ हाथोंहाथ मिल जायेगी।"


विद्या सारा समान लेकर फताफर मन्दिर की तरफ़ चल पडी। वहाँ देखा तो वहाँ पहले से ही बहुत सी औरतें , दान के लिए खादी थी, उसने सोचा कि शायद उसे थोडा और जल्दी आना चाहिए था, मगर वो क्या करती , सबने इसके बारे में आज ही तो बताया था। काफी इंतज़ार के बाद उसका नंबर भी आ ही गया , भगवान् को प्रणाम करने के बाद उसने दान की थाली पंडितजी के हाथ में पकडा दी। पंडित जी ने भी उसे खूब मन से आशीर्वाद दिया।

पूजा पाठ के बाद वो बाहर निकलने लगी , तो मन्दिर के गेट पर ही दो छोटी छोटी लडकियां फटी चिती फ्राक में उसके आगे हाथ पसारे आ गयी, अबी वो कुछ और सोचती इससे पहले ही उसे याद आया कि , अरे उसने तो मन्दिर की प्रदक्षिना की ही नहीं। वो तुरंत वापस घूम गयी। प्रदक्षिना करते करते जैसे ही मन्दिर के पीछे पहुँची तो उसे पंडित जी दिखाई दिए, पास में खड़े किसी लड़के को शायद कुछ कह रहे थे, " जा जल्दी से ये सब कुछ पीछे वाले लाला जी की दुकान पर दे आ, कभी कभार तो कमाने धामाने का मौका मिलता है, और हाँ मोहन से कह कि ये साले भूखे नंगे बच्चों को यहाँ से भगाए , सब साले मामला ख़राब करते हैं।"

विद्या ने उड़ती उड़ती निगाह डाली तो देखा कि पंडितजी सारा समान जो अभी अभी दान में लोग दे कर गए थे एक बड़े से पोलीथिन में दाल कर उस लड़के को पकडा रहे थे। विद्या पर निगाह पड़ते ही पंडित जी ने खिसयानी सी हंसी हंस दी।

विद्या, ने गेट पर खड़ी दोनों लड़कियों को दो दो रूपैये का सिक्का दिया। उसके मन को जो भी शांती मन्दिर में दान करते वक्त मिली थी वो सारी कब की उड़ गयी थी। उसे दान का मतलब समझ आ चुका था, और अब उसे अगली एकादशी का इंतज़ार है.

दान (एक छोटी सी कहानी )

सुबह सुबह ही विद्या के फोन की घंटी कम ही बजा करती थी इसलिए जब उस दिन अचानक ही नींद खुलने से पहले ही घंटी बज उठी तो उसने बुरा सा मुंह बनाया, और मन ही मन उस फोन मिलाने वाले को कोसती हुई फोन उठा कर देखने लगी, नंबर देखते ही झुंझलाहट कम हो गयी, कविता दीदी का फोन था,

" हेलो, अरे विद्या तूने, कल मुझे ये तो बता दिया की आज निर्जला एकादशी है , परन्तु शायद तुझे ये नहीं पता कि इस दिन का बड़ा महत्त्व है, सिर्फ़ चावल नहीं खाने का मतलब नहीं है, आज लोग खूब दान पुण्य , करते हैं। मैं तुझे बताती हूँ , आज के दिन मन्दिर में खरबूजा, पंखाघडा, दूध चीनी आदि का दान करने से बहुत पुण्य मिलता है। अरे हाँ , मुझे कौन सा मालूम था , वो तो माँ का फोन आया था , शायद तुझे भी करें।"

इसके बाद तो माँ , बड़ी दीदी, बाजी और जाने किस किस ने फोन करके पुण्य कमाने का सूत्र विद्या को बता दिया। दरअसल विद्या ने अभी अभी घर गिरहस्थी शुरू की थी, और फ़िर घर में सबसे छोटी होने के कारण भी सब उसे हर बात बताते और समझाते थे।

विद्या ने इसके बाद देर करना ठीक नहीं समझा और विनय को भी जबरदस्ती उत कर सारे सामानों की सूची पकडा दी, और ये भी बता दिया कि जब तक वो बाज़ार से ये सारी चीज़ें लाते हैं वो नहा धोकर तैयार हो जायेगी, ताकि मन्दिर जाकर वो सारी चीज़ें दान कर सके, बाद में बहुत भीड़ हो जाती है। विनय भी बेमन से उठ कर बाज़ार चल दिए और जाते जाते बोल गए , " भाई , तुम लोगों का कुछ नहीं हो सकता इस सबसे अच्छा तो ये होगा कि इन चीजों को किसी गरीब को देदो , भगवान् से तुम्हें क्या कब कैसे मिलेगा ये तो पता नहीं मगर गरीब की दुआ हाथोंहाथ मिल जायेगी।"


विद्या सारा समान लेकर फताफर मन्दिर की तरफ़ चल पडी। वहाँ देखा तो वहाँ पहले से ही बहुत सी औरतें , दान के लिए खादी थी, उसने सोचा कि शायद उसे थोडा और जल्दी आना चाहिए था, मगर वो क्या करती , सबने इसके बारे में आज ही तो बताया था। काफी इंतज़ार के बाद उसका नंबर भी आ ही गया , भगवान् को प्रणाम करने के बाद उसने दान की थाली पंडितजी के हाथ में पकडा दी। पंडित जी ने भी उसे खूब मन से आशीर्वाद दिया।

पूजा पाठ के बाद वो बाहर निकलने लगी , तो मन्दिर के गेट पर ही दो छोटी छोटी लडकियां फटी चिती फ्राक में उसके आगे हाथ पसारे आ गयी, अबी वो कुछ और सोचती इससे पहले ही उसे याद आया कि , अरे उसने तो मन्दिर की प्रदक्षिना की ही नहीं। वो तुरंत वापस घूम गयी। प्रदक्षिना करते करते जैसे ही मन्दिर के पीछे पहुँची तो उसे पंडित जी दिखाई दिए, पास में खड़े किसी लड़के को शायद कुछ कह रहे थे, " जा जल्दी से ये सब कुछ पीछे वाले लाला जी की दुकान पर दे आ, कभी कभार तो कमाने धामाने का मौका मिलता है, और हाँ मोहन से कह कि ये साले भूखे नंगे बच्चों को यहाँ से भगाए , सब साले मामला ख़राब करते हैं।"

विद्या ने उड़ती उड़ती निगाह डाली तो देखा कि पंडितजी सारा समान जो अभी अभी दान में लोग दे कर गए थे एक बड़े से पोलीथिन में दाल कर उस लड़के को पकडा रहे थे। विद्या पर निगाह पड़ते ही पंडित जी ने खिसयानी सी हंसी हंस दी।

विद्या, ने गेट पर खड़ी दोनों लड़कियों को दो दो रूपैये का सिक्का दिया। उसके मन को जो भी शांती मन्दिर में दान करते वक्त मिली थी वो सारी कब की उड़ गयी थी। उसे दान का मतलब समझ आ चुका था, और अब उसे अगली एकादशी का इंतज़ार है.

दर्द बेचो या नंगापन, अच्छी पैकिंग में सब बिकता है .


जो दिखता है, वो बिकता है, और,
जो बिकता है, वही दिखता है।
दर्द बेचो , या नंगापन,
अच्छी पैकिंग में सब बिकता है॥

मोहब्बत-नफरत, घटना-दुर्घटना,
हत्या-आत्महत्या, व्यापार ,व्याभिचार,
सब खबरें हैं इस मंडी की,
ये गर्म ख़बरों का है बाज़ार ..

नाबालिग़ की अस्मत लुटना, एक्सक्लूसिव है,
आन्तंक-अपराध, रोज़ के आकर्षण,
भूत-प्रेत , नाग-नागिन, डायन-चुडैल,
जाने किसे-किसे, है आमंत्रण॥

पत्रकारिता की ना जाने,
ये कौन सी मजबूरी है,
सब कुछ ख़बर बन ही जाए,
क्या ये बात जरूरी है ?

काश कि हमारा मीडिया ये बात समझ पाता !


शुक्रवार, 13 जून 2008

सफ़ेद चेहरे (एक कहानी या शायद हकीकत )

कांति और नुपुर , बिल्कुल उस तरह से थी जैसे कि, दो बहने हों । उनकी ये दोस्ती कितनी पुरानी थी इस बात से ज्यादा ये बात जानने में मज़ा आ सकता है कि उनकी दोस्ती कैसे हुई। दरअसल ये उनके कोल्लेज के दिनों की बात थी, दोनों एक ही बस में चढ़ कर एक ही कोल्लेज और एक ही क्लास में जाती थी, मगर उनमें शायद कभी भी ऐसी दोस्ती न होती यदि , उस दिन वो घटना ना हुई होती। जब वे अपना क्लास ख़त्म करके बस में चढी तो रोज की तरह बस ठसाठस भरी हुई थी। वे दोनों भी बिल्कुल आस पास खादी हो गयी थी। नुपुर जो कि हमेशा से बेहद संकोची और डरने वाली लडकी थी , उसे अचानक लगा कि किसी ने पीछे चिकोटी काटी है, वो हमेशा की तरह कस्मसाई और आगे बढ़ने की सोचने लगी। मगर आगे भी भीड़ थी, तभी अचानक इससे पहले कि वो कुछ और सोच या कर पाती, चटाक की एक तेज़ आवाज़ उसके कानो में गूंजी। उसने मुड़ कर देखा , साथ खड़ी लडकी ने बिल्कुल पास खड़े लड़के के कोल्लर पकड़ कर उसे भला बुरा कह रही थी। इसके बाद का काम भीड़ ने कर दिया, न किसी ने कुछ पूछा और न कहा। नुपुर की कांति से यहीं से दोस्ती की शुरूआत हुई थी। जब उसे कांति से पूछा था कि क्या ये सब करते हुए उसे डर नहीं लगा, उसने बताया था कि वो एक बड़े घर की लडकी है, और उसका माहौल बहुत अलग है जिसमें डर वर की कोई गुंजाईश नहीं है। वो तो कार में अपनी जिद्द की वजह से नहीं आती है। इसके बाद तो दोनों जैसे एक ही घर में पैदा हुई दो बेटियाँ हों।

आज नुपुर बेहद उदास थी, ऐसी ही उदासी उसके चेहरे पर तब भी थी , जब वो नौकरी के लिए भटक रही थी। कांति ने लाख कहा था कि वो अपने पापा के कहने पर उसे किसी अच्छी जगह पर काम दिलवा सकती है, या चाह तो उसे अपने पापा के यहाँ ही कोई अच्छी नौकरी दिलवा सकती है, मगर नुपुर अब भी उन्हें पुराने खालों की लडकी थी इसलिए बड़ी विनम्रता से उसे टाल गयी.मगर फ़िर उसे जब एक जगह रीसेप्स्निष्ट की नौकरी मिल गयी थी तो वो कितना खुश थी, फ़िर एक हफ्ते बाद ही तो उसने बताया था कि सर ने उसे अपना सेक्रतारी बनाने का को कहा है.मगर आज कुछ जरूर गड़बड़ थी। कांति उसका फक्क चेहरा देख कर ही समझ गयी थी। बहुत कुरेदने पर पता चला कि वही पुरानी बात उसके बॉस ने उससे बत्तमीजी करने की कोशिश की थी। बस कांति भड़क गयी, पहले तो उसने नुपुर को ही खूब भला बुरा कहा, फ़िर लाख न न करने के बाद भी उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि कल वो भी नुपुर के साथ जाकर उस बॉस की अक्ल ठिकाने लगा कर आयेगी।

अगले दिन नुपुर ने बहुत कोशिश की , कि उसकी तबियत ख़राब है , वो बात आगे नहीं बढाना चाहती , या वो और कहीं नौकरी कर लेगी। मगर कांति उसे सबक सिखाने पर आमादा थी। सो दोनों चल पड़े। तू, कुछ नहीं कहेगी, चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखना, आज मैं उसका कैसा बैंड बजाती हूँ, कांति ने उसे कहा।

गाडी जहाँ रोकने के लिए नुपुर ने कहा, पहले तो कांति थोडा चौंकी, फ़िर कुछ सोच कर चुप हो गयी। इसके बाद दोनों उस बिल्डिंग में दाखिल हुए, अब कांति के चेहरे पर एक अजीब सा खुरदुरा पं आ गया था मगर अन्दर ही अन्दर उसका दिल भी धाड़ धाड़ बज रहा था। नुपुर के साथ साथ वो भी सीधे बिना खात्खाताये बॉस के कमरे में दाखिल हो गए। नुपुर को ना जाने कांति के साथ ने कहाँ से हिम्मत दे दी, ' देख नुपुर याही है वो, उसे सामने खड़े व्यक्ति की तरफ़ इशारा किया।

"पापा , आप ," कांति के मुंह से निकला।

सबके चेहरे सफ़ेद पड़ चुके थे, कारण अलग थे , मगर सफेदी एक जैसी थी......

सफ़ेद चेहरे (एक कहानी या शायद हकीकत )

कांति और नुपुर , बिल्कुल उस तरह से थी जैसे कि, दो बहने हों । उनकी ये दोस्ती कितनी पुरानी थी इस बात से ज्यादा ये बात जानने में मज़ा आ सकता है कि उनकी दोस्ती कैसे हुई। दरअसल ये उनके कोल्लेज के दिनों की बात थी, दोनों एक ही बस में चढ़ कर एक ही कोल्लेज और एक ही क्लास में जाती थी, मगर उनमें शायद कभी भी ऐसी दोस्ती न होती यदि , उस दिन वो घटना ना हुई होती। जब वे अपना क्लास ख़त्म करके बस में चढी तो रोज की तरह बस ठसाठस भरी हुई थी। वे दोनों भी बिल्कुल आस पास खादी हो गयी थी। नुपुर जो कि हमेशा से बेहद संकोची और डरने वाली लडकी थी , उसे अचानक लगा कि किसी ने पीछे चिकोटी काटी है, वो हमेशा की तरह कस्मसाई और आगे बढ़ने की सोचने लगी। मगर आगे भी भीड़ थी, तभी अचानक इससे पहले कि वो कुछ और सोच या कर पाती, चटाक की एक तेज़ आवाज़ उसके कानो में गूंजी। उसने मुड़ कर देखा , साथ खड़ी लडकी ने बिल्कुल पास खड़े लड़के के कोल्लर पकड़ कर उसे भला बुरा कह रही थी। इसके बाद का काम भीड़ ने कर दिया, न किसी ने कुछ पूछा और न कहा। नुपुर की कांति से यहीं से दोस्ती की शुरूआत हुई थी। जब उसे कांति से पूछा था कि क्या ये सब करते हुए उसे डर नहीं लगा, उसने बताया था कि वो एक बड़े घर की लडकी है, और उसका माहौल बहुत अलग है जिसमें डर वर की कोई गुंजाईश नहीं है। वो तो कार में अपनी जिद्द की वजह से नहीं आती है। इसके बाद तो दोनों जैसे एक ही घर में पैदा हुई दो बेटियाँ हों।

आज नुपुर बेहद उदास थी, ऐसी ही उदासी उसके चेहरे पर तब भी थी , जब वो नौकरी के लिए भटक रही थी। कांति ने लाख कहा था कि वो अपने पापा के कहने पर उसे किसी अच्छी जगह पर काम दिलवा सकती है, या चाह तो उसे अपने पापा के यहाँ ही कोई अच्छी नौकरी दिलवा सकती है, मगर नुपुर अब भी उन्हें पुराने खालों की लडकी थी इसलिए बड़ी विनम्रता से उसे टाल गयी.मगर फ़िर उसे जब एक जगह रीसेप्स्निष्ट की नौकरी मिल गयी थी तो वो कितना खुश थी, फ़िर एक हफ्ते बाद ही तो उसने बताया था कि सर ने उसे अपना सेक्रतारी बनाने का को कहा है.मगर आज कुछ जरूर गड़बड़ थी। कांति उसका फक्क चेहरा देख कर ही समझ गयी थी। बहुत कुरेदने पर पता चला कि वही पुरानी बात उसके बॉस ने उससे बत्तमीजी करने की कोशिश की थी। बस कांति भड़क गयी, पहले तो उसने नुपुर को ही खूब भला बुरा कहा, फ़िर लाख न न करने के बाद भी उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि कल वो भी नुपुर के साथ जाकर उस बॉस की अक्ल ठिकाने लगा कर आयेगी।

अगले दिन नुपुर ने बहुत कोशिश की , कि उसकी तबियत ख़राब है , वो बात आगे नहीं बढाना चाहती , या वो और कहीं नौकरी कर लेगी। मगर कांति उसे सबक सिखाने पर आमादा थी। सो दोनों चल पड़े। तू, कुछ नहीं कहेगी, चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखना, आज मैं उसका कैसा बैंड बजाती हूँ, कांति ने उसे कहा।

गाडी जहाँ रोकने के लिए नुपुर ने कहा, पहले तो कांति थोडा चौंकी, फ़िर कुछ सोच कर चुप हो गयी। इसके बाद दोनों उस बिल्डिंग में दाखिल हुए, अब कांति के चेहरे पर एक अजीब सा खुरदुरा पं आ गया था मगर अन्दर ही अन्दर उसका दिल भी धाड़ धाड़ बज रहा था। नुपुर के साथ साथ वो भी सीधे बिना खात्खाताये बॉस के कमरे में दाखिल हो गए। नुपुर को ना जाने कांति के साथ ने कहाँ से हिम्मत दे दी, ' देख नुपुर याही है वो, उसे सामने खड़े व्यक्ति की तरफ़ इशारा किया।

"पापा , आप ," कांति के मुंह से निकला।

सबके चेहरे सफ़ेद पड़ चुके थे, कारण अलग थे , मगर सफेदी एक जैसी थी......

गुरुवार, 12 जून 2008

कुछ और अच्छी बातें

इस चिट्ठे पर अपनी पिछली पोस्ट मैंने कुछ अच्छे बातें जो कहीं पढने को मिली थी , उन्हें आपसे बांटा था, आज उसी सिलसिले को आगे बढाते हुए कुछ और अच्छी अच्छी बातें हो जाएँ :-

जीतने के लिए चीज़ है प्रेम
पीने के लिए चीज़ है क्रोध
खाने के लिए चीज़ है गम
देने के लिए चीज़ है दान
दिखाने के लिए चीज़ दया
लेने के लिए चीज़ है ज्ञान
कहने के लिए चीज़ है सत्य
रखने के लिए चीज़ है इज्ज़त
फेंकने के लिए चीज़ है ईर्ष्या
छोड़ने के लिए चीज़ है मोह

और धन के पीछे पीछे अंधों की तरह भागने वालों के लिए भी है

धन से पुस्तक मिल सकती है , मगर ज्ञान नहीं।
धन से आभूषण मिल सकता है , मगर रूप नहीं।
धन से सुख मिल सकता है, मगर आनंद नहीं।
धन से साथी मिल सकता है, मगर सच्चा दोस्त नहीं।
धन से भोजन मिल सकता है, मगर भूख नहीं।
धन से दवा मिल सकती है, मगर स्वास्थ्य नहीं।
धन से एकांत मिल सकता है, मगर शान्ति नहीं।
धन से बिस्तर मिल सकता है, मगर नींद नहीं.

ताज्जुब है ,


ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥

शहर की हर गली मैं, एक कोठी,
और इक झुग्गी मिलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


लख्ताकिया , फतफतिया, और सायकल,
लालबत्ती पर सारी रुकती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


घर के एक कमरे से कातिल,
दूसरे से लाश निकलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


प्रेम , दोस्ती, रिश्ते की परिभाषा,
हर रोज़ बदलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


गिरने के डर से ही, मैं नहीं दौडा,
वो रोज़ गिरती है, वो रोज़ संभलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मैं समझ नहीं पाता, कैसे मेरे अन्दर,
प्यार भी पलता है, नफरत भी पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मुझको क्या पता था, जितना जहर मैं पीता हूँ,
उससे ज्यादा जहर तो मेरी गाडी उगलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


बेटा जिस कोख में मारे किलकारी,
बेटी के लिए उसमें मौत ही पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


हाँ , और दुःख की बात है कि ये दुनिया तो फ़िर भी चलती ही रहेगी ............

ताज्जुब है ,


ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥

शहर की हर गली मैं, एक कोठी,
और इक झुग्गी मिलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


लख्ताकिया , फतफतिया, और सायकल,
लालबत्ती पर सारी रुकती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


घर के एक कमरे से कातिल,
दूसरे से लाश निकलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


प्रेम , दोस्ती, रिश्ते की परिभाषा,
हर रोज़ बदलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


गिरने के डर से ही, मैं नहीं दौडा,
वो रोज़ गिरती है, वो रोज़ संभलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मैं समझ नहीं पाता, कैसे मेरे अन्दर,
प्यार भी पलता है, नफरत भी पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


मुझको क्या पता था, जितना जहर मैं पीता हूँ,
उससे ज्यादा जहर तो मेरी गाडी उगलती है ।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


बेटा जिस कोख में मारे किलकारी,
बेटी के लिए उसमें मौत ही पलती है।
ताज्जुब है कि, ये ,
दुनिया फ़िर भी चलती है ॥


हाँ , और दुःख की बात है कि ये दुनिया तो फ़िर भी चलती ही रहेगी ............

बुधवार, 11 जून 2008

बेटी और माँ, दोनों का बलातकार , माँ की ह्त्या और बेटी ने खुद्खुशी की

यूं तो अब इस समाज में ऐसी ऐसी खबरें नित्य ही पढने को मिल जाती हैं की किसी भी बात पर आश्चर्य नहीं होता और न ही अब ऐसा लगता है की यार यहाँ , अपने देश में ऐसा कैसा हो सकता है। चाहे मैं निठारी काण्ड की चर्चा न भी करूं, चाहे मैं हाल फिलहाल चर्चित आरूशी काण्ड की भी न चर्चा करूं , मगर फ़िर भी ऐसी अनेकों घटनाएं इस देश , इस राज्य और इस समाज में घाट रही हैं की मन अवाक और दुखी होकर यही सोचता है की यार ये हो क्या रहा है।

कल ही पंजाब के एक शहर में घटी एक ऐसी ही घटना ने अन्दर तक हिला कर रख दिया है। एक महिला अपने पाती और दो बेटियों के साथ किसी बड़े अधिकारी के पास पहुँची और उसे बताया की वो घर से जहर पी कर आयी है, जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया वो मर चुकी थी। दरअसल हुआ ये था की , उस अभागन के पाती को पुलिस ने किसी भी झूठे या सच्चे अपराध के आरोप में थाने में बंद कर दिया था, जब वो महिला इस बारे में थाने में पता करने गयी तो वहाँ तैनात दो पुलिसकर्मियों ने उसे दारा धमका कर या शायद मार पीट कर उसके साथ बलात्कार किया। महिला वहाँ से बाहर जान बचा कर निकली और काफी भागदौड़ करने के बाद उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवा पायी। मगर मुकदमा दर्ज होने के बाद वही पुलिस वाले उसे और उसके पति को और भी धमकाने लगे। उनका किसी भी कानून ने कुछ नहीं बिगाडा और उस क़ानून पर विश्वास उत्थ जाने के बाद थक हार कर उस अभागन ने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उसके पिटा ने बताया की कुछ वर्षों पहले इस अभागी महिला की माँ की भी बलात्कार के बाद ह्त्या कर दी गयी थी। मैं पूरी घटना के बारे में जानकर सन् रह गया। मेरे दिमाग में बहुत सी बातें अभी भी कौंध रही हैं।

अब जो उसकी दो बेटियाँ हैं, उनके लिए इस दुनिया का क्या मतलब रह जायेगा। जब उन्हें पता चलेगा की उनकी पिछली दो पीधीयाँ इस बहुत सभ्य , आधुनिक , तेज़ , समाज के हवास का शिकार हो गया। क्या वे भी इस बात का इंतज़ार नहीं करेंगी की कल को कोई ऐसा ही इंसानी भेदिया उन्हें अपना शिकार बना कर उनका जन्म सार्थक नहीं करेगा। पता नहीं सोचता हूँ तो दिमाग फट जाता है।

दरअसल बलात्कार के मामलों में जितने अलग अलग पहलू और बातें मेरे सामने आती रही हैं, उसमें मैं ख़ुद भी समझ नहीं पा रहा हूँ की आख़िर गलती कहाँ और क्या हो रही है। किसे दोष दें, किसे अपराधी माने , और कौन कौन दोषी नहीं है। यहाँ तो आलम ये बन चुका है की हर इंसान कब हैवान बन जाए , वो भी अकल्पनीय स्तर तक, कहा नहीं जा सकता। मैं जिस अदालत में कार्यरत हूँ सिर उसमें ही दस से अधिक मुक़दमे ऐसे चल रहे हैं जिनमें नाबालिग़ पुत्रियों ने अपने पिटा पर ही बलात्कार का आरोप लगा रखा है। फ़िर मैं उन महिलाओं और औरतों के बारे मैं भी सोचता हूँ जो खुले आम ढिंढोरा पीट पीट कर कहती हैं की " मुझे तो आक्रामक मर्द ही पसंद हैं, उका हर अंदाज़ दीवाना बना देता है "। उनसे कौन पूछता है की उनके ये आक्रामक मर्द कितने आक्रामक हो गए हैं और समाज ही आक्रामक हो गया है। मुझे नफरत है उनसे भी जो महिला अधिकारों का ढिंढोरा पीट पीट कर अपना प्रचार , नाम और दाम बनाने में लगे रहते हैं और ऐसे किसी भी मासूम की रक्षा कर नहीं पाते।


असलियत तो ये है की हम सब उस सभ्य युग में जी रहे हैं जहाँ हम सब जानवरों से भी अधिक जंगली और हिंसक हो गए हैं.

बेटी और माँ, दोनों का बलातकार , माँ की ह्त्या और बेटी ने खुद्खुशी की

यूं तो अब इस समाज में ऐसी ऐसी खबरें नित्य ही पढने को मिल जाती हैं की किसी भी बात पर आश्चर्य नहीं होता और न ही अब ऐसा लगता है की यार यहाँ , अपने देश में ऐसा कैसा हो सकता है। चाहे मैं निठारी काण्ड की चर्चा न भी करूं, चाहे मैं हाल फिलहाल चर्चित आरूशी काण्ड की भी न चर्चा करूं , मगर फ़िर भी ऐसी अनेकों घटनाएं इस देश , इस राज्य और इस समाज में घाट रही हैं की मन अवाक और दुखी होकर यही सोचता है की यार ये हो क्या रहा है।

कल ही पंजाब के एक शहर में घटी एक ऐसी ही घटना ने अन्दर तक हिला कर रख दिया है। एक महिला अपने पाती और दो बेटियों के साथ किसी बड़े अधिकारी के पास पहुँची और उसे बताया की वो घर से जहर पी कर आयी है, जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया वो मर चुकी थी। दरअसल हुआ ये था की , उस अभागन के पाती को पुलिस ने किसी भी झूठे या सच्चे अपराध के आरोप में थाने में बंद कर दिया था, जब वो महिला इस बारे में थाने में पता करने गयी तो वहाँ तैनात दो पुलिसकर्मियों ने उसे दारा धमका कर या शायद मार पीट कर उसके साथ बलात्कार किया। महिला वहाँ से बाहर जान बचा कर निकली और काफी भागदौड़ करने के बाद उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करवा पायी। मगर मुकदमा दर्ज होने के बाद वही पुलिस वाले उसे और उसके पति को और भी धमकाने लगे। उनका किसी भी कानून ने कुछ नहीं बिगाडा और उस क़ानून पर विश्वास उत्थ जाने के बाद थक हार कर उस अभागन ने अपना जीवन समाप्त कर लिया। उसके पिटा ने बताया की कुछ वर्षों पहले इस अभागी महिला की माँ की भी बलात्कार के बाद ह्त्या कर दी गयी थी। मैं पूरी घटना के बारे में जानकर सन् रह गया। मेरे दिमाग में बहुत सी बातें अभी भी कौंध रही हैं।

अब जो उसकी दो बेटियाँ हैं, उनके लिए इस दुनिया का क्या मतलब रह जायेगा। जब उन्हें पता चलेगा की उनकी पिछली दो पीधीयाँ इस बहुत सभ्य , आधुनिक , तेज़ , समाज के हवास का शिकार हो गया। क्या वे भी इस बात का इंतज़ार नहीं करेंगी की कल को कोई ऐसा ही इंसानी भेदिया उन्हें अपना शिकार बना कर उनका जन्म सार्थक नहीं करेगा। पता नहीं सोचता हूँ तो दिमाग फट जाता है।

दरअसल बलात्कार के मामलों में जितने अलग अलग पहलू और बातें मेरे सामने आती रही हैं, उसमें मैं ख़ुद भी समझ नहीं पा रहा हूँ की आख़िर गलती कहाँ और क्या हो रही है। किसे दोष दें, किसे अपराधी माने , और कौन कौन दोषी नहीं है। यहाँ तो आलम ये बन चुका है की हर इंसान कब हैवान बन जाए , वो भी अकल्पनीय स्तर तक, कहा नहीं जा सकता। मैं जिस अदालत में कार्यरत हूँ सिर उसमें ही दस से अधिक मुक़दमे ऐसे चल रहे हैं जिनमें नाबालिग़ पुत्रियों ने अपने पिटा पर ही बलात्कार का आरोप लगा रखा है। फ़िर मैं उन महिलाओं और औरतों के बारे मैं भी सोचता हूँ जो खुले आम ढिंढोरा पीट पीट कर कहती हैं की " मुझे तो आक्रामक मर्द ही पसंद हैं, उका हर अंदाज़ दीवाना बना देता है "। उनसे कौन पूछता है की उनके ये आक्रामक मर्द कितने आक्रामक हो गए हैं और समाज ही आक्रामक हो गया है। मुझे नफरत है उनसे भी जो महिला अधिकारों का ढिंढोरा पीट पीट कर अपना प्रचार , नाम और दाम बनाने में लगे रहते हैं और ऐसे किसी भी मासूम की रक्षा कर नहीं पाते।


असलियत तो ये है की हम सब उस सभ्य युग में जी रहे हैं जहाँ हम सब जानवरों से भी अधिक जंगली और हिंसक हो गए हैं.

मंगलवार, 10 जून 2008

कुछ अच्छी बातें

जानते हैं हमारे आसपास , बचपन से ही कई अच्छी अच्छी बातें हमें सुनने को , पढने को , और सीखने को मिलती हैं। कुछ हमें पसंद आती हैं, कुछ बिल्कुल अजीब और कुछ सिर्फ़ बातें सी लगती हैं। कल अचानक मुझे भी ऐसा ही कुछ पढने को मिल गया । आपको भी पढ़वाता हूँ

क्या आपने कभी गौर किया है की हम सबकी आंखों में क्या दिखाई देता है, वैसे तो आपने शायद ये भी गौर नहीं किया हो की हम अपनी आखों से सब कुछ देख सकते हैं मगर ख़ुद अपनी आंखों से अपनी आंखें नहीं देख सकते , बिना आईने की मदद के ।, खैर,

पिता की आंखों में क्या दिखता फ़र्ज़

माता की आंखों में क्या दिखता है ममता

बहन की आंखों में क्या दिखता है स्नेह

भाई की आंखों में क्या दिखता है प्यार

पत्नी की आंखों में क्या दिखता है समर्पण

प्रेमिका की आंखों में क्या दिखता है शंशय

बालक की आंखों में क्या दिखता है जिज्ञासा

शिष्य की आंखों में क्या दिखता है आदर

मित्र की आंखों में क्या दिखता है सहयोग

दुश्मन की आंखों में क्या दिखता है बदला

अमीर की आंखों में क्या दिखता है घमंड

गरीब की आंखों में क्या दिखता है आशा

सज्जन की आंखों में क्या दिखता है दया

तो देखा आपने देखने के कितने रूप और नज़रिये हैं।


सोमवार, 9 जून 2008

जब उन्हें मैं दिल्ली का नहीं लगा.

यूं तो मेरा अधिकांश बचपन पिताजी के साथ कई राज्यों और बहुत से बड़े छोटे शहरों में बीता , मगर समय के उस चक्र में जब शायद मैं बचपने से थोडा बाहर निकल रहा था , तब अचानक बहुत से कारणों से हमें अपने गाँव जाना पडा , सच कहूं तो मुझे तो ज़रा भी अलग या बुरा नहीं लगा,हालांकि मैं शहर की चकाचौंध के बाद सीधी लालटेन की पीली रौशनी में पहुँच गया था। मगर मुझे लगता है की ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि मुझे शहर की नियमित दिनचर्या से अलग कुछ मिल गया था। मैंने गाँव में बिठाये पलों के बारे में बताना शुरू किया तो शायद सब कहें की उसके लिए तो एक अलग चिटठा ही बना लूँ तो बेहतर होगा। खैर , जब अपनी पढाई लिखाई के बाद मैंने दिल्ली आने का फैसला लिया था तो ये उन दिनों एक प्रचलित रिवाज़ सा बन गया था। और चूँकि अपने सारे फैसले मैं न जाने कब से ख़ुद ही करने लगा था इसलिए इस फैसले को भी सबने खुशी खुशी मान लिया।

गाँव की आबो हवा के बाद जब कुछ दिनों तक दिल्ली की बसों में और ट्रेफ्फिक की धूल धुएं को अपने फेफड़ों में महसूस करने लगा तो पता चला की यार ये दिल्ली कैसी है। आप तब भी मेरे अनुभव का अंदाजा चंद इन्हें बातों से लगा सकते हैं। मुझे पहली बार किसी दोस्त की पार्टी में खाने के लिए मिली चौउमीन को देख कर मैं बुरी तरह बिदक गया था, कि कमबख्त ने मुझे केंचुए क्यों दे दिए हैं, क्योंकि उससे पहले मैंने कभी चौउमीन नहीं देखा था। दोसोतोंके कहने पर बस में मुफ्त चलने के लिए मैंने जब staaff कहा तो बस वाले के पूछने पर मैंने हदबदा कर एक गर्ल्स कोल्लेज का नाम ले दिया था। तो आप समझ ही गए होंगे की उस वक्त शायद मैं दिल्ली में रहने वाला सबसे बड़ा गंवार था।

एक दिन ऐसी ही एक बस यात्रा के दौरान मैंने देखा की मेरे सीट के पास एक वृद्ध महिला आकर खड़ी हो गयी । बस अभी अभी चली थी और मैंने नज़र दौडाई तो कहीं भी जगह नहीं थी , इसलिए मन में सोचा की छोडो यार इतनी दूर जाना है, और फ़िर मैं कौन सा लडीस सीट पर बैठा हूँ। मगर न जाने किस भावना के वशीभूत मैं चुपचाप खडा हो गया और उन्हें बैठने का इशारा किया। वे कृतागाया भाव से देखते हुए बैठ गयीं। मैं थोडा आगे जाकर खडा हो गया। तकरीबन सवा घंटे के बाद जब वे महिला उतरने के लिए खड़ी हुई तो उन्होंने चौंक कर मुझे देखा, फ़िर कहा, "पुत्तर तुसी ओथी उतरे नहीं मैं समझी त्वानु ओत्थे ओतारना हैगा " मैंने कहा जी नहीं मुझे तो आगे उतरना है।
वे और चकित होते हुए मेरे पास आकर अपने हाथ मेरे सर पर फेरती बोली, पुत्तर तू मेनू दिल्ली दा नही लगदा। " कहकर वे चली गयीं। मैं आज भी उनके वे शब्द और वाक्य नहीं भूल पाया हूँ।

काश की मैं कभी भी दिल्ली का नहीं हो पाऊं

जब उन्हें मैं दिल्ली का नहीं लगा.

यूं तो मेरा अधिकांश बचपन पिताजी के साथ कई राज्यों और बहुत से बड़े छोटे शहरों में बीता , मगर समय के उस चक्र में जब शायद मैं बचपने से थोडा बाहर निकल रहा था , तब अचानक बहुत से कारणों से हमें अपने गाँव जाना पडा , सच कहूं तो मुझे तो ज़रा भी अलग या बुरा नहीं लगा,हालांकि मैं शहर की चकाचौंध के बाद सीधी लालटेन की पीली रौशनी में पहुँच गया था। मगर मुझे लगता है की ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि मुझे शहर की नियमित दिनचर्या से अलग कुछ मिल गया था। मैंने गाँव में बिठाये पलों के बारे में बताना शुरू किया तो शायद सब कहें की उसके लिए तो एक अलग चिटठा ही बना लूँ तो बेहतर होगा। खैर , जब अपनी पढाई लिखाई के बाद मैंने दिल्ली आने का फैसला लिया था तो ये उन दिनों एक प्रचलित रिवाज़ सा बन गया था। और चूँकि अपने सारे फैसले मैं न जाने कब से ख़ुद ही करने लगा था इसलिए इस फैसले को भी सबने खुशी खुशी मान लिया।

गाँव की आबो हवा के बाद जब कुछ दिनों तक दिल्ली की बसों में और ट्रेफ्फिक की धूल धुएं को अपने फेफड़ों में महसूस करने लगा तो पता चला की यार ये दिल्ली कैसी है। आप तब भी मेरे अनुभव का अंदाजा चंद इन्हें बातों से लगा सकते हैं। मुझे पहली बार किसी दोस्त की पार्टी में खाने के लिए मिली चौउमीन को देख कर मैं बुरी तरह बिदक गया था, कि कमबख्त ने मुझे केंचुए क्यों दे दिए हैं, क्योंकि उससे पहले मैंने कभी चौउमीन नहीं देखा था। दोसोतोंके कहने पर बस में मुफ्त चलने के लिए मैंने जब staaff कहा तो बस वाले के पूछने पर मैंने हदबदा कर एक गर्ल्स कोल्लेज का नाम ले दिया था। तो आप समझ ही गए होंगे की उस वक्त शायद मैं दिल्ली में रहने वाला सबसे बड़ा गंवार था।

एक दिन ऐसी ही एक बस यात्रा के दौरान मैंने देखा की मेरे सीट के पास एक वृद्ध महिला आकर खड़ी हो गयी । बस अभी अभी चली थी और मैंने नज़र दौडाई तो कहीं भी जगह नहीं थी , इसलिए मन में सोचा की छोडो यार इतनी दूर जाना है, और फ़िर मैं कौन सा लडीस सीट पर बैठा हूँ। मगर न जाने किस भावना के वशीभूत मैं चुपचाप खडा हो गया और उन्हें बैठने का इशारा किया। वे कृतागाया भाव से देखते हुए बैठ गयीं। मैं थोडा आगे जाकर खडा हो गया। तकरीबन सवा घंटे के बाद जब वे महिला उतरने के लिए खड़ी हुई तो उन्होंने चौंक कर मुझे देखा, फ़िर कहा, "पुत्तर तुसी ओथी उतरे नहीं मैं समझी त्वानु ओत्थे ओतारना हैगा " मैंने कहा जी नहीं मुझे तो आगे उतरना है।
वे और चकित होते हुए मेरे पास आकर अपने हाथ मेरे सर पर फेरती बोली, पुत्तर तू मेनू दिल्ली दा नही लगदा। " कहकर वे चली गयीं। मैं आज भी उनके वे शब्द और वाक्य नहीं भूल पाया हूँ।

काश की मैं कभी भी दिल्ली का नहीं हो पाऊं

रविवार, 8 जून 2008

स्त्री (एक कविता )


आज आपको वीरेन्द्र सारंग जी की एक कविता पढ्वाता हूँ जो मुझे बेहद पसंद है,

मैं चाहता हूँ स्त्री होना,
सुरेले स्वर के साथ कर्कश भी,
करुना के बाद थोडा क्रोध भी,
मैं स्त्री होकर चुपचाप जीवन नहीं चाहता॥

मैं उकठा पुराण में खूजूंगा अपने को,
आर्त्नादों में अर्थ,,
मुंह लगना और भैंस का जाना पानी में,
समझकर पंखा झेलूंगा उमस भरे दिन में,
स्त्री होकर॥

मैं स्त्री होकर वाद्य नहीं होना चाहता की बजता रहूँ....
बर्तन भी नहीं की मंजता रहूँ सुबह-शाम,
मैं जानता हूँ, स्त्री से जो हवा आती है, वह,
सहस्र होती... सहती हो जाती है, और भोगती रहती स्त्री,
सारे काम भरे हैं घट्ठों वाले हाथों में ,
फ़िर भी बवालेजान स्त्री, मेहेंदी रचने के बाद भी,
ओखल-जाँत, बाल-जूडे, श्रृंगार भावना से लबरेज स्त्री,

गंदे मुहावरों के लिए प्रसिद्ध स्त्री,
श्रम-सौंदर्य के स्वेद में एन वक्त पर खाती है डांट,
पुष्ट आत्मविश्वास और कमाया-धमाया मिल जाता पानी में,
स्त्री होकर मैं चाहता हूँ मुट्ठी भीचना॥

मैं जानना चाहता हूँ और स्त्री की यात्राएं,
जो सिर्फ़ वही करती है एक पुरूष के लिए,
मैं सरंक्षित करना चाहता हूँ,
स्त्री के भीतर दबे उन्चासों पवन,
मैं विशेष आत्मविश्वास के साथ स्त्री के सफर पर हूँ,
स्त्री होकर .... वाकई मैं चाहता हूँ स्त्री होना॥

स्त्री (एक कविता )


आज आपको वीरेन्द्र सारंग जी की एक कविता पढ्वाता हूँ जो मुझे बेहद पसंद है,

मैं चाहता हूँ स्त्री होना,
सुरेले स्वर के साथ कर्कश भी,
करुना के बाद थोडा क्रोध भी,
मैं स्त्री होकर चुपचाप जीवन नहीं चाहता॥

मैं उकठा पुराण में खूजूंगा अपने को,
आर्त्नादों में अर्थ,,
मुंह लगना और भैंस का जाना पानी में,
समझकर पंखा झेलूंगा उमस भरे दिन में,
स्त्री होकर॥

मैं स्त्री होकर वाद्य नहीं होना चाहता की बजता रहूँ....
बर्तन भी नहीं की मंजता रहूँ सुबह-शाम,
मैं जानता हूँ, स्त्री से जो हवा आती है, वह,
सहस्र होती... सहती हो जाती है, और भोगती रहती स्त्री,
सारे काम भरे हैं घट्ठों वाले हाथों में ,
फ़िर भी बवालेजान स्त्री, मेहेंदी रचने के बाद भी,
ओखल-जाँत, बाल-जूडे, श्रृंगार भावना से लबरेज स्त्री,

गंदे मुहावरों के लिए प्रसिद्ध स्त्री,
श्रम-सौंदर्य के स्वेद में एन वक्त पर खाती है डांट,
पुष्ट आत्मविश्वास और कमाया-धमाया मिल जाता पानी में,
स्त्री होकर मैं चाहता हूँ मुट्ठी भीचना॥

मैं जानना चाहता हूँ और स्त्री की यात्राएं,
जो सिर्फ़ वही करती है एक पुरूष के लिए,
मैं सरंक्षित करना चाहता हूँ,
स्त्री के भीतर दबे उन्चासों पवन,
मैं विशेष आत्मविश्वास के साथ स्त्री के सफर पर हूँ,
स्त्री होकर .... वाकई मैं चाहता हूँ स्त्री होना॥

शनिवार, 7 जून 2008

कुछ पंक्तियाँ या पता नहीं कुछ और

हुआ जो ,
हादसा,
मेरे साथ,
जमाने भर ,
के लिए,
वो बस,
एक ख़बर थी॥

मैं तो,
सतर्क था,
और ,
सचेत भी,
मगर जिसने ,
हमें रखा,
अपनी ठोकरों पर,
शायद उसकी ही,
कहीं और ,
नज़र थी॥

मैंने छोड़ दिए,
कई रास्ते,
और कई,
मंजिलें भी,
जिसके लिए,
वो तो,
पहले ही,
किसी और की,
हमसफर थी॥

मैं ढूँढ ,
रहा था,
अपनी किस्मत को,
आकाश की,
बुलंदियों पर,
पाया तो ,
गर्दिशों में,
दर बदर थी॥

इक छटपटाहट,
सी थी,
जीवन चक्र
को चूमने की,
जब छुआ ,
तो जाना,
ये झील ।
में घूमती,
भंवर थी...

एक कविता या पता नहीं और कुछ

इतने निष्ठुर,
इतने निर्मम,
ये बच्चे,
अपने से नहीं लगते,
फ़िर किसने ,
ये नस्लें ,
बोई हैं॥

किस किस के ,
दर्द का,
करें हिसाब,
लगता है,
पिछली रात,
शहर की,
हर आँख,
रोई है॥

सपनो का,
पता नहीं,
मगर नींद तो,
उन्हें भी,
आती है,
जो ओढ़ते हैं,
चीथरे, या ,
जिनके जिस्म पर
रेशम की,
लोई है॥

क्या क्या,
तलाशूं , इस,
शहर में अपना,
मेरी मासूमियत,
मेरी फुरसत,
मेरी आदतें,
सपने तो सपने,
मेरी नींद भी,
इसी शहर में,
खोई है॥

ये तो ,
अपना अपना,
मुकद्दर है, यारों,
उन्होंने , सम्भाला है,
हर खंजरअपना ,
हमने उनकी,
दी हुई,
हर चोट,
संजोई है..

एक कविता या पता नहीं और कुछ

इतने निष्ठुर,
इतने निर्मम,
ये बच्चे,
अपने से नहीं लगते,
फ़िर किसने ,
ये नस्लें ,
बोई हैं॥

किस किस के ,
दर्द का,
करें हिसाब,
लगता है,
पिछली रात,
शहर की,
हर आँख,
रोई है॥

सपनो का,
पता नहीं,
मगर नींद तो,
उन्हें भी,
आती है,
जो ओढ़ते हैं,
चीथरे, या ,
जिनके जिस्म पर
रेशम की,
लोई है॥

क्या क्या,
तलाशूं , इस,
शहर में अपना,
मेरी मासूमियत,
मेरी फुरसत,
मेरी आदतें,
सपने तो सपने,
मेरी नींद भी,
इसी शहर में,
खोई है॥

ये तो ,
अपना अपना,
मुकद्दर है, यारों,
उन्होंने , सम्भाला है,
हर खंजरअपना ,
हमने उनकी,
दी हुई,
हर चोट,
संजोई है..

शुक्रवार, 6 जून 2008

नकारात्मक चीज़ें ज्यादा आकर्षित करती हैं .

क्या आपको बहुत पहले दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन याद है। उस विज्ञापन में एक नन्ही से बच्ची , स्कूल की पास से आने जाने वालों को एक पम्फ्लेट पक्दाती है, जैसे कि अक्सर ही लाल बत्ती पर आपको हमें भी कोई न कोई पम्फ्लेट पकडा देता है, और जैसा कि अक्सर ही होता है कि हम सभी उस पर एक उड़ती हुई निगाह डालते हैं और फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह उस बच्ची द्वारा दिए गए कागज़ के टुकड़े को सभी आने जाने वाले हाथ में लेकर थोडा आगे जाने पर फेंक देते हैं। एक स्कूटर चालक जो ये सब देख रहा होता है , वो बच्ची के पास आता है और उसे बताता है कि अब उसे ये पम्फ्लेट किसी के भी हाथ में देने से पहले उसे अच्छे तरह मरोड़ कर देना है। वो नन्ही बच्ची ऐसा ही करती है, फ़िर जिस पहले आदमी को वो ये कागज़ तोड़ मडोदकर देती है , वो पहले उस बच्ची को गौर से देखता है फ़िर उसे कगाज़ के टुकड़े को खोल कर पढने लगता है।

मुझे लगता है कि इंसान का मनोविज्ञान , चाहे उत्सुकता के कारण या फ़िर कि खुराफाती कारणों से अक्सर या ज्यादातर नकारात्मक चीजों की तरफ़ आसानी से आकर्षित होता है। बल्कि ये कहूं कि कि सकारात्मक बातों , चीजों की तरफ़ चाहे एक बार को उसकी नज़र ना जाए या जाए भी तो वो उसे नज़र अंदाज़ कर दे मगर उल्टी भाषा , उल्टी बातों और उल्टी चीजों की तरफ़ उतनी ही जल्दी आकर्षित हो जाता है। किसी बच्चे को आप किसी बात के लिए मन कीजिये तो मैं ये तो नहीं कहता कि शत प्रतिशत , मगर आम तौर पर ज्यादा बच्चे वही काम करने में दिलचस्पी दिखाएँगे। एक और उदाहरण देता हूँ, किसी ने अपने चिट्ठे पर अपने पोस्ट का शीर्षक दिया, इसे बिल्कुल मत पढ़ना, आपन माने या ना मने , मगर उस दिन जितने लोगों ने उसे पढा था उससे पहले उसके पोस्ट को कभी भी इतने लोगों ने नहीं पढा था।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नकारात्मक बातें ही मन को और मस्तिष्क को आकर्षित करती हैं मगर कुछ तो कनेक्शन जरूर है इन बातों में, या पता नहीं कि ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ होता है..................

नकारात्मक चीज़ें ज्यादा आकर्षित करती हैं .

क्या आपको बहुत पहले दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन याद है। उस विज्ञापन में एक नन्ही से बच्ची , स्कूल की पास से आने जाने वालों को एक पम्फ्लेट पक्दाती है, जैसे कि अक्सर ही लाल बत्ती पर आपको हमें भी कोई न कोई पम्फ्लेट पकडा देता है, और जैसा कि अक्सर ही होता है कि हम सभी उस पर एक उड़ती हुई निगाह डालते हैं और फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह उस बच्ची द्वारा दिए गए कागज़ के टुकड़े को सभी आने जाने वाले हाथ में लेकर थोडा आगे जाने पर फेंक देते हैं। एक स्कूटर चालक जो ये सब देख रहा होता है , वो बच्ची के पास आता है और उसे बताता है कि अब उसे ये पम्फ्लेट किसी के भी हाथ में देने से पहले उसे अच्छे तरह मरोड़ कर देना है। वो नन्ही बच्ची ऐसा ही करती है, फ़िर जिस पहले आदमी को वो ये कागज़ तोड़ मडोदकर देती है , वो पहले उस बच्ची को गौर से देखता है फ़िर उसे कगाज़ के टुकड़े को खोल कर पढने लगता है।

मुझे लगता है कि इंसान का मनोविज्ञान , चाहे उत्सुकता के कारण या फ़िर कि खुराफाती कारणों से अक्सर या ज्यादातर नकारात्मक चीजों की तरफ़ आसानी से आकर्षित होता है। बल्कि ये कहूं कि कि सकारात्मक बातों , चीजों की तरफ़ चाहे एक बार को उसकी नज़र ना जाए या जाए भी तो वो उसे नज़र अंदाज़ कर दे मगर उल्टी भाषा , उल्टी बातों और उल्टी चीजों की तरफ़ उतनी ही जल्दी आकर्षित हो जाता है। किसी बच्चे को आप किसी बात के लिए मन कीजिये तो मैं ये तो नहीं कहता कि शत प्रतिशत , मगर आम तौर पर ज्यादा बच्चे वही काम करने में दिलचस्पी दिखाएँगे। एक और उदाहरण देता हूँ, किसी ने अपने चिट्ठे पर अपने पोस्ट का शीर्षक दिया, इसे बिल्कुल मत पढ़ना, आपन माने या ना मने , मगर उस दिन जितने लोगों ने उसे पढा था उससे पहले उसके पोस्ट को कभी भी इतने लोगों ने नहीं पढा था।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नकारात्मक बातें ही मन को और मस्तिष्क को आकर्षित करती हैं मगर कुछ तो कनेक्शन जरूर है इन बातों में, या पता नहीं कि ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ होता है..................

गुरुवार, 5 जून 2008

स्वीटी, तुम कहाँ हो ?

साल शायद १९८३ या १९८४ , जगह पूना , उस वक्त मेरी उम्र कितनी थी ये तो पता नहीं, मगर इतना बहुत अच्छी तरह याद है की मैं पूना के सेन्ट्रल स्कूल में सातवीं क्लास में पढता था। हमारा स्कूल घर से बहुत दूर था और फौजी बस हमें अपने घरों से लेकर रोज स्कूल लेकर जाती थी। मुझे ये भी याद नहीं की किस दिन अचानक मेरी नजर उस मासूम और बहार प्यारी लडकी स्वीटी, नहीं उसका असली नाम जागृति था , पर पडी। क्योंकि उन दिनों वैसा माहौल नहीं बना था ,कि जैसे अब बच्चे बहुत कुछ समय से पहले ही समझने लगे है और कई तो करने भी लगे हैं, शायद इसलिए भी मैंने उसे कभी देखा नहीं था और यदि देखा भी था तो पता नहीं। बस इतना और बता दूँ कि उस वक्त , यदि मुझे याद है तो ये स्वीटी जी कक्षा चार या पाँच में थी।

मेरा एक करीबी मित्र जो उसे शायद पहले से जानता था , उसने मेरी जान पहचान , स्वीटी से करवाई थी। इनता तो आप अंदाजा लगा ही चुके होंगे कि कुछ भी ऐसा नहीं था कि जिसे मैं कोई नाम दे सकूं मगर कुछ बातें जो अब तक मैं नहीं भूला हूँ वो ये थी। मैं हमेशा लड़ झगड़ के उसके लिए अपने साथ वाली सीट जरूर रख लेता था। उसका हूम्वार्क जरूर चेक कर लेता था और कभी नहीं किया होता था तो उसे बस में ही पूरा भी कर दिया करता था , फ़िर ये चाहे अलग बात है कि मेरा ख़ुद का होमवर्क अक्सर नहीं होने के कारण मेरी खूब मिजाजपुर्सी होती थी। मुझे ये भी याद हैं कि एक दिन रास्ते में बस के पीछे पीछे भागते हुए मेरा तिफ्फिन गिर गया , और न जाने उसे किसने बता दिया, उस दिन वो चुपचाप अपना तिफ्फिन मेरे बसते में डाल गयी थी।
मुझे ये भी याद है कि उस साल जब होली में मैंने उसकी छोटे छोटे गोरे गालों पर रंग लगा दिया था पहले वो कितना घबरा गयी थी फ़िर उसके बाद बच्चों की किलकारी मारते हुए मेरे साथ खूब होली खेली थी।

पिताजी फौज में थे , हमें पता भी नहीं चला कि किस दिन अचानक उसके पिताजी और हमारे बाबूजी का एक साथ ही तबादला हो गया। मुझे अब तक उसके चेहरे पर दर्द की , वो रोने सूरत की छाप , याद है , अब जबकि मेरे ख़ुद का बच्चा उतना बड़ा हो गया है जितना कि मैं ख़ुद था तो भी स्वीटी मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ। काश कि कभी तुम मुझे दोबारा मिलती..........

शुक्र है ,उन्हें हिन्दी नहीं आती

अभी तक जहाँ तहां ब्लॉग के बारे में जो भी अनाप शनाप पढ़ते आ रहे थे, अरे घबराइये नहीं हम लोगों के बारे में कौन कमबख्त अनाप शानाप लिख सकता है ख़ुद हम लोगों के अलावा, वो तो मैं उन फिल्मी अभिनेताओं के बारे में कह रहा था जो सब यकायक इस ब्लोग्गिंग के क्षेत्र, अरे नहीं, कारोबार में कूद पड़े हैं, और लिख भी क्या कमाल रहे हैं, कोई अपने जिगरी दोस्त को खुलेआम गलिया रहा है तो कोई इससे भी बढ़कर अपने कुत्ते बिल्ली का नाम अपने साथी कलाकारों के नाम पर रख कर उसे हमें बड़े ही आदर सत्कार से पढ़वा रहा है, जिसे इन दिनों मीडिया ब्लॉग वार का नाम दे रहा है , अजी हमारी समझ से तो ये सब छिछोरापन है । खैर , मैं तो आज उस बात को छेड़ ही नहीं रहा हूँ । दरअसल ख़बर तो असली ये है कि,

सावधान , ब्लॉगजगत वालों इस बार अभिनेता के साथ एक नेता जी भी ब्लॉग लेकर आ रहे हैं। जी हाँ नेताओं के नेता , श्री श्री लालू जी यादव महाराज अपनी ब्लॉग एक्सप्रेस लेकर जल्दी ही प्रकट होंगे। उन्होंने बताया है कि ई सब ओ अमेरीकी चुनाव के नेता बराक ओबामा से प्रेरित होकर कर रहे हैं। वैसे असली बात तो ये है कि उनका कहना है कि शायद इसी बहाने वे हिलारी क्लिंटन को अपनी पार्टी में आने के लिए मन लें। जाहिर है अमेरीकी राष्ट्रपती का चुनाव हारने के बाद ही। लेकिन, जी हाँ, लेकिन हमें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि, श्री अमिताभ बच्चन, आमिर खान, सलमान खान और सारे खान और हीरे मोत्तियों की तरह उन्हें भी हिन्दी नहीं आती। क्या कहा , उन्हें तो अंग्रेज़ी नहीं आती , अरे कौन कहता है , आने को तो इन सभी अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों को हिन्दी आती है , पर अपनी भाषा में लिख कर बोल कर , पढ़ कर आख़िर उन्होंने अपनी इज्ज़त का फालूदा थोड़ी बनवाना है।

वैसे तो अच्छा है कि इन सभी महान लोगों को हिन्दी से खुजली हो जाती है, वरना सोचिये यदि वे यहाँ पर आकर अपने चटखारे दार किस्से , मिर्च मसाले लगा कर आपको सुनाते तो क्या आप कभी इस रद्दी की टोकरी की तरफ़ अपने नज़रे इनायत करते, नहीं न...........

शुक्र है ,उन्हें हिन्दी नहीं आती

अभी तक जहाँ तहां ब्लॉग के बारे में जो भी अनाप शनाप पढ़ते आ रहे थे, अरे घबराइये नहीं हम लोगों के बारे में कौन कमबख्त अनाप शानाप लिख सकता है ख़ुद हम लोगों के अलावा, वो तो मैं उन फिल्मी अभिनेताओं के बारे में कह रहा था जो सब यकायक इस ब्लोग्गिंग के क्षेत्र, अरे नहीं, कारोबार में कूद पड़े हैं, और लिख भी क्या कमाल रहे हैं, कोई अपने जिगरी दोस्त को खुलेआम गलिया रहा है तो कोई इससे भी बढ़कर अपने कुत्ते बिल्ली का नाम अपने साथी कलाकारों के नाम पर रख कर उसे हमें बड़े ही आदर सत्कार से पढ़वा रहा है, जिसे इन दिनों मीडिया ब्लॉग वार का नाम दे रहा है , अजी हमारी समझ से तो ये सब छिछोरापन है । खैर , मैं तो आज उस बात को छेड़ ही नहीं रहा हूँ । दरअसल ख़बर तो असली ये है कि,

सावधान , ब्लॉगजगत वालों इस बार अभिनेता के साथ एक नेता जी भी ब्लॉग लेकर आ रहे हैं। जी हाँ नेताओं के नेता , श्री श्री लालू जी यादव महाराज अपनी ब्लॉग एक्सप्रेस लेकर जल्दी ही प्रकट होंगे। उन्होंने बताया है कि ई सब ओ अमेरीकी चुनाव के नेता बराक ओबामा से प्रेरित होकर कर रहे हैं। वैसे असली बात तो ये है कि उनका कहना है कि शायद इसी बहाने वे हिलारी क्लिंटन को अपनी पार्टी में आने के लिए मन लें। जाहिर है अमेरीकी राष्ट्रपती का चुनाव हारने के बाद ही। लेकिन, जी हाँ, लेकिन हमें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि, श्री अमिताभ बच्चन, आमिर खान, सलमान खान और सारे खान और हीरे मोत्तियों की तरह उन्हें भी हिन्दी नहीं आती। क्या कहा , उन्हें तो अंग्रेज़ी नहीं आती , अरे कौन कहता है , आने को तो इन सभी अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों को हिन्दी आती है , पर अपनी भाषा में लिख कर बोल कर , पढ़ कर आख़िर उन्होंने अपनी इज्ज़त का फालूदा थोड़ी बनवाना है।

वैसे तो अच्छा है कि इन सभी महान लोगों को हिन्दी से खुजली हो जाती है, वरना सोचिये यदि वे यहाँ पर आकर अपने चटखारे दार किस्से , मिर्च मसाले लगा कर आपको सुनाते तो क्या आप कभी इस रद्दी की टोकरी की तरफ़ अपने नज़रे इनायत करते, नहीं न...........

बुधवार, 4 जून 2008

मेरा कबाड़खाना , अब "रद्दी की टोकरी "

जी हाँ , आज और अभी से मेरा कबाड़खाना , यानि मेरा ये चिटठा, आपको कबाड़खाना के नाम से नहीं बल्कि " रद्दी की टोकरी " के नम से दिखेगा। दरअसल ये विचार तो मेरे मन में तभी से था जब इससे पहले ऐसी ही एक स्थिति में मेरा दूसरा चिटठा "बिहारी बाबू कहीं " को प्रियरंजन भाई के आदेश के बाद मैंने देहाती बाबू कहीं में बदल दिया था।

आज दैनिक हिन्दुस्तान के दिल्ली संस्करण में जब वरिष्ठ चिट्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अशोक पण्डे जी के चिट्ठे "कबाड़खाना " का विस्तृत जिक्र किया तो मुझे पता नहीं क्यों एक आत्मग्लानी सी हुई। हालांकि मुझे किसी ने भी कभी टोका नहीं और मेरा कबाड़खाना अंग्रेज़ी शीर्षक वाला था , न ही ये बात थी की मैंने अशोक जी के चिट्ठे के नाम से प्रेरित होकर ऐसा कोई नाम रखा था, मगर फ़िर भी आज मैंने निर्णय किया की किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति ख़त्म करने के लिए अब भविष्य में मेरे इस चिट्ठे का नाम होगा "रद्दी की टोकरी "।

अब ऐसा समझिए न कि, जैसे बच्चा घर में खेलते-कूदते एक नाम से जाना जाता है और फ़िर जब स्कूल जाने लायक हो जाता है तो उसे नया नाम मिल जाता है। मगर हां, इतना यकीन दिलाता हूँ कि ये बच्चा चाहे नाम बदल ले या शक्ल , रहे उतना ही खुराफाती और शरारती।

मुझे पुरी उम्मीद है कि जिस तरह आपने मेरे छोटे कबाड़खाने प्यार से सराहा उसी तरह आप मेरी इस रद्दी की टोकरी में भी अपनी नज़र और हाथ डाल कर जरूर गंदा करेंगे।

आपका छोटा कबाड़ी......

मेरा कबाड़खाना , अब "रद्दी की टोकरी "

जी हाँ , आज और अभी से मेरा कबाड़खाना , यानि मेरा ये चिटठा, आपको कबाड़खाना के नाम से नहीं बल्कि " रद्दी की टोकरी " के नम से दिखेगा। दरअसल ये विचार तो मेरे मन में तभी से था जब इससे पहले ऐसी ही एक स्थिति में मेरा दूसरा चिटठा "बिहारी बाबू कहीं " को प्रियरंजन भाई के आदेश के बाद मैंने देहाती बाबू कहीं में बदल दिया था।

आज दैनिक हिन्दुस्तान के दिल्ली संस्करण में जब वरिष्ठ चिट्ठाकार श्री रवीश कुमार जी ने अशोक पण्डे जी के चिट्ठे "कबाड़खाना " का विस्तृत जिक्र किया तो मुझे पता नहीं क्यों एक आत्मग्लानी सी हुई। हालांकि मुझे किसी ने भी कभी टोका नहीं और मेरा कबाड़खाना अंग्रेज़ी शीर्षक वाला था , न ही ये बात थी की मैंने अशोक जी के चिट्ठे के नाम से प्रेरित होकर ऐसा कोई नाम रखा था, मगर फ़िर भी आज मैंने निर्णय किया की किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति ख़त्म करने के लिए अब भविष्य में मेरे इस चिट्ठे का नाम होगा "रद्दी की टोकरी "।

अब ऐसा समझिए न कि, जैसे बच्चा घर में खेलते-कूदते एक नाम से जाना जाता है और फ़िर जब स्कूल जाने लायक हो जाता है तो उसे नया नाम मिल जाता है। मगर हां, इतना यकीन दिलाता हूँ कि ये बच्चा चाहे नाम बदल ले या शक्ल , रहे उतना ही खुराफाती और शरारती।

मुझे पुरी उम्मीद है कि जिस तरह आपने मेरे छोटे कबाड़खाने प्यार से सराहा उसी तरह आप मेरी इस रद्दी की टोकरी में भी अपनी नज़र और हाथ डाल कर जरूर गंदा करेंगे।

आपका छोटा कबाड़ी......

मंगलवार, 3 जून 2008

आरक्षण , ये आर एक्सन तो आता ही जा रहा है (भाग दो )

हाँ तो कल जैसा कि मैं आपको बता रहा था कि कैसे उखडी हुई पटरियों ने बिल्कुल उखड़े हुए अंदाज़ में मुझे अपना दुखडा सुनान्ने लगीं और उन्होंने बताया कि लोगों को दिल्ली मेट्रो की पटरियाँ उखाड़ने की हिम्मत दिखानी चाहिए , इसका बाद उन्होंने आगे कहना शुरू किया ," मेट्रो रेल की पटरियों के माध्यम से उन्हें (पटरी बनाने वाले जापानियों को ) बताना चाहिए कि यदि यहाँ पर कोई पटरी, रेलगाड़ी , बुल्लेट ट्रेन बनानी है तो उसे आन्दोलन प्रूफ़ बनाना आवश्यक है ।

अच्छा इसके बाद। चिट्ठासिंग उत्सुकता से पूछने लगे।

हमने कहा, " इसके बाद क्या हम पहुंचे गाय , भैसों के पास उनसे पूछा , भैया, अरे नहीं, गाय भैंस बहनों , ये दूध बंदी का क्या चक्कर है। उन्होंने भड़क कर बताया , " ये भाड़ में गया तुम्हारा ये आन्दोंलन -वान्दोलन , हमें क्या मतलब इस आरक्षण वारक्षण से। अम जब हम सबकी यानि गाय भैंस बकरी ऊँट आदि की शक्ल और सूरत अलग अलग होने के बावजूद हमरे अन्दर से एक जैसा ही दूध निकलता है , उसकी जो मर्जी बनाओ दही या पनीर , तो फ़िर तुम लोग तो एक जैसे ही हो तो कहे का आरक्षण भइया। हमें तो बक्शो भाई।

हमे सोचा यार चलो इंसानों के पास भी पहुँच कर पूछ ही लें। कुछ दूर जाने पर उदास लोगों की टोली मिली। पूछा तो उनमें से एक न कहा , " क्या बतायें बाबूजी , कल पुलिस फायरिंग में कुनबे के आठ लड़कों को गोली लग गयी, छ मारे गए। इतना लोग को आरक्षण मिलने के बाद नौकरी नहीं मिली जितना लोगों की जान चली गयी। एक बात और आरक्षण तो इस बात का होना चाहिए कि इस तरह के आन्दोलोनों में चार में से एक ही सही मगर एक गोली किसी नेता मंत्री लोगों को भी लगनी चाहिए।

मैं और मित्र चिट्ठासिंग जी पूरे घटनाक्रम पर मंथन कर रहे हैं आप भी कीजिये...........

सोमवार, 2 जून 2008

आरक्षण , ये आर एक्शन कुछ ज्यादा ही आता जा रहा है


मित्र चिटठा सिंग , फ़िर अचानक टकरा गए, पूछ बैठे, क्यों भाई आजकल तो तुम भी इसी गरमागरम हो रहे मुद्दे आरक्षण पर ही कुछ सोच और लिख रहे होगे। यार इस आरक्षण से याद आया , वो जो अपने ब्रिटिश मित्र हैं न, टॉम डिसूजा , कल उनका भे फोन आया था, पूछने लगे , क्या बात है भाई आप लोग तो बड़े अमन पसंद थे फ़िर ये आजकल कैसा आर एक्शन का शोर मचा हुआ है , और इतना एक्शन तो हमारे यहाँ भी नहीं होता सुना है कि, कुछ साहसी लोग सड़कों पर सीधे उतर आए हैं एक्शन के लिए। तब जाकर मैं समझा कि वो जिसे आर एक्शन कह रहे हैं दरअसल वो ताजा ताजा आरक्षण आन्दोलन की बात कह रहे थे। मैंने तो किसी तरह उन्हें समझाया कि दरअसल ये आर एक्शन कुछ रोतदू लोगों का तांता है जो हमेशा इसी बात को लेकर रोते धोते रहते हैं। ख़ुद रोते हैं और बाकियों को धोते हैं। वैसे आन्दोलन बड़ा जोरदार रहा, क्यों?

क्या ख़ाक जोरदार रहा, तुम तो सिर्फ़ एक पहलू ही देख रहे हो । मैं भी दौरे पर उधर ही निकल गया था । पहले रास्ते में कुछ जली हुई बसें मिली , सब की सब सरकारी थी और लोगों ने उन्हें सरकारी माल की तरह हे जला मारा था, सिसक सिसक कर खेने लगीं, यार ये बात ग़लत है हर बार तुम लोग हमें ही अपने बाप का माल समझ कर जला देते हो , इन देलाक्स बसों को हमेशा ही छोड़ देते हो । देखो भैया अब तो हमें भी ये आरक्षण चाहिए, कि जब ये तुम लोगों का आन्दोलन वाला ड्रामा होगा तो 50 परसेंट हमें और ५० परसेंट ये शानदार बोडी वाली ए सी बसों को जलाओगे।

उसके बाद आगे गया तो यही बात पटरियों ने कही , भैया हम तो न जाने कब से ढीले और कमजोर पड़े हुए हैं , उखाड़ना चाहते थे और हिम्मत थी तो मेट्रो की मजबूत पटरियों को उखाड़ कर दिखाते , ताकि जापानियों को भी तो पता चलता कि यहाँ पटरियों को कैसी कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।

क्रमश ........

हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )

जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥

हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥

कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥

बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥

कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥

लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥

एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥

अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥

अजय कुमार झा
9871205767

हमने चिट्ठों को अपनी संतान बना रखा है (कविता )

जाने कब से,
अपने आसपास,
एक छद्म,
संसार बसा रखा है॥

हरकतों से,
पकड़े जाते हैं,
हैवानों ने भी,
इंसान का,
नकाब लगा रखा है॥

कोई बेच रहा,
धर्म, तो कोई ,
शर्म, और इमान,
कईयों ने तो जीवन को ही,
दूकान बना रखा है॥

बेदिली की ये,
इंतहा है यारों,
माओं ने कोख को,
बेटियों का,
शमशान बना रखा है॥

कितनी बेकसी,
का दौर है ये,
न दिल में जगह है,
न घर में,
लोगों ने मान-बाप को भी,
मेहमान बना रखा है॥

लपटें सी ,
उठ रही हैं,
शहर के हर घर से,
हमने इसीलिए,
गाओं में भी एक,
मकान बना रखा है॥

एक हम हैं, जो,
चेहरे पे नाम लिखा है,
कई मशहूर हैं इतने की,
गुमनामी को ही,
पहचान बना रखा है॥

अभी तो उँगलियों ने,
रफ़्तार नहीं पकडी है,
घरवालों की तोहमत है,
हमने चिट्ठों को अपनी,
संतान बना रखा है॥

अजय कुमार झा
9871205767

रविवार, 1 जून 2008

भडास की सडास

अक्सर ही कई ऐसे मौकों पर जब मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा होता है न जाने कहाँ से अपने अज़ीज़ मित्र श्री चिटठा सिंह जी ,
कहीं न कहीं जरूर मिल जाते हैं और फ़िर कुछ ऐसी वैसी बात अवश्य ही निकल जाती है है की उसे यहाँ बताना लाजिमी हो जाता है। पिछले दिनों जैसे ही मिले कहने लगे , अमा सुना तुमने इन दिनों तो फ़िर से चिट्ठाजगत पर भडास ही भडास है अरे भडास क्या उसकी सडास ही फ़ैली हुई है , चारों तरफ़ उसकी बू आ रही है।

" क्या कह रहे हो मियां , एक बार फ़िर से, यार मुझे तो लगता है की ये सब इनकी टी आर पी का चक्कर होगा, वैसे भी मैं तो पहले ही इनका पंच लाइन पढ़ कर समझ गया था कि, सब उल्टे लोग हैं, बताओ लिखा है कि उगल दो , क्या उगल दो यार , कुछ भी अगर सलीके से निकालोगे तो ठीक है उग्लोगे तो उबकाई ही तो बाहर निकलेगी। और फ़िर इन्हें एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह दुश्मनों को ढूँढने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती , सब मजे में एक दूसरे को धकियाने में और गलियाने में लगे रहते हैं। और चिटठा जगत पर हर दूसरी पोस्ट में भडास निकली रहती है। अरे भाई , भडास और गुस्सा निकालने के लिए क्या बाहर कम जगर और गुंजाइश है कि यहाँ भी शुरू हो गए , यार यहाँ तो प्यार बांतों , कुछ अच्छी अच्छी बातें करो कि दिल को सुकून पहुंचे। "

चिटठा सिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे ( यहाँ मैं बता दूँ कि चिट्ठासिंग उन मासूम लोगों में से एक हैं जो बस तीली जला कर चुपचाप खड़े हो जाते हैं और फ़िर लगी हुई आग की लपटें चुपचाप तापते हैं ) , ने आगे कहा , " अरे भाई , इस बार मामला ज्यादा गंभीर है , सुना है कि किसी भडासी भाई ने बलात्कार की कोशिश की है और उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है । और बेशर्मी की हद देखो कि जिसका बलात्कार करने की कोशिश की हैवो उनके मित्र की पुत्री थी शायद। "

मैं अवाक और स्तब्ध हो गया, " क्या कह रहे हो , क्या ये सच है , हाँ यार टी आर पी के लिए कोई इस हद तक तो भडास नहीं निकाल सकता । वैसे ये तो ठीक है कि कोई इस चिट्ठाजगत पर चिकनी चुपडी बातें कर रहा है और दुनिया भर की शिक्षा बघाड रहा है इसका मतलब ये तो नहीं कि उसे gundagardee करने , लम्पती करने और सीधे कहूँ तो नीचे गिरने का कोई अधिकार नहीं है , मगर यार ये तो हद से भी हद हो गयी कि सीधा बलात्कार तक पहुँच गए । खैर वो भी क्या करते आजकल सबको पता है कि अपने क़ानून का जो हाल है उसमें तो बलात्कार और हत्या ही दो वे जुर्म बच गए हैं जिनमें अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । यार ये तो चिट्ठाजगत के लिए बुरी ख़बर है और जब इसकी चर्चा किसी और माध्यम में होगी तो सोचो इसका क्या असर पडेगा। वैसे इसके बाद क्या हुआ

यार उनकी खूब लानत मलामत हुई, और बहुत से लोगों ने तो उनसे अपने सम्बन्ध तक तोड़ लिए , सच कहूँ तो उनपर सबने जम कर भडास निकाली । अच्छा अब चलता हूँ , चिट्ठाजगत की और भी खबरें लेकर फ़िर मिलूंगा।

चिट्ठासिंग चले गए और मैं अब तक उस भडास की सडास महसूस कर रहा हूँ.

भडास की सडास

अक्सर ही कई ऐसे मौकों पर जब मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा होता है न जाने कहाँ से अपने अज़ीज़ मित्र श्री चिटठा सिंह जी ,
कहीं न कहीं जरूर मिल जाते हैं और फ़िर कुछ ऐसी वैसी बात अवश्य ही निकल जाती है है की उसे यहाँ बताना लाजिमी हो जाता है। पिछले दिनों जैसे ही मिले कहने लगे , अमा सुना तुमने इन दिनों तो फ़िर से चिट्ठाजगत पर भडास ही भडास है अरे भडास क्या उसकी सडास ही फ़ैली हुई है , चारों तरफ़ उसकी बू आ रही है।

" क्या कह रहे हो मियां , एक बार फ़िर से, यार मुझे तो लगता है की ये सब इनकी टी आर पी का चक्कर होगा, वैसे भी मैं तो पहले ही इनका पंच लाइन पढ़ कर समझ गया था कि, सब उल्टे लोग हैं, बताओ लिखा है कि उगल दो , क्या उगल दो यार , कुछ भी अगर सलीके से निकालोगे तो ठीक है उग्लोगे तो उबकाई ही तो बाहर निकलेगी। और फ़िर इन्हें एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह दुश्मनों को ढूँढने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती , सब मजे में एक दूसरे को धकियाने में और गलियाने में लगे रहते हैं। और चिटठा जगत पर हर दूसरी पोस्ट में भडास निकली रहती है। अरे भाई , भडास और गुस्सा निकालने के लिए क्या बाहर कम जगर और गुंजाइश है कि यहाँ भी शुरू हो गए , यार यहाँ तो प्यार बांतों , कुछ अच्छी अच्छी बातें करो कि दिल को सुकून पहुंचे। "

चिटठा सिंग जो अब तक धैर्यपूर्वक सुन रहे थे ( यहाँ मैं बता दूँ कि चिट्ठासिंग उन मासूम लोगों में से एक हैं जो बस तीली जला कर चुपचाप खड़े हो जाते हैं और फ़िर लगी हुई आग की लपटें चुपचाप तापते हैं ) , ने आगे कहा , " अरे भाई , इस बार मामला ज्यादा गंभीर है , सुना है कि किसी भडासी भाई ने बलात्कार की कोशिश की है और उनके ख़िलाफ़ कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है । और बेशर्मी की हद देखो कि जिसका बलात्कार करने की कोशिश की हैवो उनके मित्र की पुत्री थी शायद। "

मैं अवाक और स्तब्ध हो गया, " क्या कह रहे हो , क्या ये सच है , हाँ यार टी आर पी के लिए कोई इस हद तक तो भडास नहीं निकाल सकता । वैसे ये तो ठीक है कि कोई इस चिट्ठाजगत पर चिकनी चुपडी बातें कर रहा है और दुनिया भर की शिक्षा बघाड रहा है इसका मतलब ये तो नहीं कि उसे gundagardee करने , लम्पती करने और सीधे कहूँ तो नीचे गिरने का कोई अधिकार नहीं है , मगर यार ये तो हद से भी हद हो गयी कि सीधा बलात्कार तक पहुँच गए । खैर वो भी क्या करते आजकल सबको पता है कि अपने क़ानून का जो हाल है उसमें तो बलात्कार और हत्या ही दो वे जुर्म बच गए हैं जिनमें अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । यार ये तो चिट्ठाजगत के लिए बुरी ख़बर है और जब इसकी चर्चा किसी और माध्यम में होगी तो सोचो इसका क्या असर पडेगा। वैसे इसके बाद क्या हुआ

यार उनकी खूब लानत मलामत हुई, और बहुत से लोगों ने तो उनसे अपने सम्बन्ध तक तोड़ लिए , सच कहूँ तो उनपर सबने जम कर भडास निकाली । अच्छा अब चलता हूँ , चिट्ठाजगत की और भी खबरें लेकर फ़िर मिलूंगा।

चिट्ठासिंग चले गए और मैं अब तक उस भडास की सडास महसूस कर रहा हूँ.

साथ चलने वाले

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