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शुक्रवार, 1 मई 2020

कलम के धनी






उस दिन जब मैंने बात बात में लिख दिया था तो भाई पद्म सिंह जी ने हैरानी से पूछा था इतने पेन।  मैंने मुस्कुरा कर उन्हें कहा था की पेन के किस्से फिर कभी सुनाऊंगा।  लिखने पढ़ने वाले और नहीं लिखने पढ़ने वालों के लिए भी पेन का साथ हमेशा से रहता आया है।  मुझे बचपन से पेन से लिखना ,उन्हें संभाल कर सहेज कर रखना , कमीज की ऊपरी जेब में लगाए रखना उतना ही भाता था जितना कलाई घड़ी और ये आदत आज भी बदस्तूर जारी है।

उन दिनों भी पेन से लिखने की शुरुआत कक्षा छः से ही हुआ करती थी ,किन्तु पढ़ाई में बहुत ज्यादा भुसकोल होने के कारण लिखने का शौक तो तब तक नहीं हुआ था अलबत्ता कक्षा 7 से ही नीले और काले रंग के पेन जरूर रखने लगा था और चूँकि वो समय निब वाले पेन का हुआ करता था सो बड़ी कंजूसी से और बड़ी सावधानी से उसका उपयोग किया जाता था।  जेब में रखने के कारण लीक होकर कमीज का कल्याण कर देने के महान काम को  कई बार अंजाम देने का परिणाम माँ की झिकड़ी जरूर होती थी।


कक्षा आठ तक आते आते एक दिन एक शिक्षक ने मेरी कॉपी में देख कर ,उन दिनों हम भुसकोल विद्यार्थियों की कॉपियां देखने दिखाने लायक नहीं होती थीं , अचानक ही मेरी लिखावट को साफ़ बता दिया।  बस वहीँ से हाथ से लिखने का जो जुनून जगा वो आज तक ख़त्म नहीं हुआ।  आज भी मैं सुबह से शाम तक साथ आठ पेज लिख डालता हूँ , जब तक कुछ लिखता नहीं चैन नहीं आता।

लिखने की इस आदत से  मेरी पेन से दोस्ती भी बढ़ती गयी और हम उस दौर के साक्षी रहे हैं जब रेनॉल्ड्स ,मोंटेक्स ,लिंक ,रोटोमैक आदि के बॉल पेनों ने धूम मचा दी थी।  उन पेनों को खरीदना इस्तेमाल करना एक अलग ही आनंद देता था।  धीरे धीर बॉल पेन की सुलभता ने इंक वाले पेन को आउट डेटेड कर दिया।  मुझे याद है की अपने इंटर के दिनों में और उसके बाद बहुत समय तक परिक्षा के लिए मैं विशेष रूप से युनिबॉल का एक बॉल पेन इस्तेमाल करता था।

इसके बाद  दौर आया जेल पेन का जिनमे एड जेल ने आते ही धूम मचा दी थी।  इंक पेन वाली नज़ाकत और बॉल पेन वाली तेज़ी दोनों से युक्त ये पेन अपने अलग अलग कई रूपों मसलन रोलर पेन और इनके जैसे ही अन्य पेनों ने बहुत हद तक बॉल पेन के बाज़ार की बादशाहत खत्म कर दी । नए बच्चे तो आज भी जेल पेन रॉलर पेन के दीवाने हैं ।

नौकरी भी लिखने वाली मिल गई जहाँ लिखते लिखते सुबह से शाम हो जाती है मगर लिखने का काम खत्म नहीं होता । बस फिर क्या था पेनों का शौक जुनून बन गया ।

जिस भी शहर में जाऊँ वहाँ से पेन खरीदना , उपहार में पेन मिलना , पेन देना , पहचान के दुकानदारों द्वारा मुझे नए नए पेन जानबूझकर दिखाना , मेरे लिए विशेष पेन मँगवाना , कुल मिलाकर ये सिलसिला बढ़ता गया ।

आज भी पूरे अदालत परिसर में किसी अधिकारी कर्मचारी , को किसी विशेष पेन की जरूरत पड़ती है तो बेहिचक बेझिझक ले जाता है । मैं अदालत में अपने सहकर्मियों को भी ढेर ढेर पेन बाँटता हूँ । हाँ बहुत महँगे पेन मुझे उपहार में ही मिले । अपने पैसों से मैंने एक बार 1200 का पेन खरीदा था , वैसे मेरे पास दो रुपए से लेकर दो हज़ार तक के पेन हैं जिनकी संख्या हज़ारों , हाँ हज़ारों में है । आप मिलेंगे तो आपको भी स्नेह स्वरूप मिलेंगे ये पेन ।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

ये उन दिनों की बात थी





#येउनदिनोंकीबातथी 

​वो वर्ष शायद 96 -97 के आसपास का रहा होगा।  मुझे ये तो याद नहीं कि अपनी किस प्रतियोगी परीक्षा को देने के दौरान मैं कोलकाता अपने चचेरे भैया चुन्नू भईया के यहां पर ठहरा हुआ था।  उन दिनों जैसा कि अक्सर सफर में ​आते जाते रुकते चलते हो जाया करता था हम टूथ ब्रश ,शेविंग किट आदि भूल जाया करते थे और फिर हर नई जगह पर पहुँच कर उन्हें खरीद कर फिर वहीं भूल कर आगे निकल जाते थे।  

अब तो लगातार सफर करने के अनुभव ने जाने क्या क्या सिखा समझा दिया तो सफर के सामना में टॉर्च ,रस्सी ,दवाई के साथ साथ सब कुछ वाईन्ड अप करने के बाद सामानों को क्रॉस चैक करने की आदत बाय डिफ़ॉल्ट सी हो गयी है। 

तो उन दिनों कोलकता में परीक्षा देने के बाद कोलकाता से मेरी वापसी हो गयी। थोड़े दिनों बाद भाभी का फोन आया तो उन्होंने इस बीच वहां घटा बड़ा ही मजेदार वाकया सुनाया। हुआ ये की चुन्नू भईया के बड़े साले साहब किशुन जी भी उन्हीं दिनों किसी काम से कोलकाता गए हुए थे। उन्होंने एक दिन अचानक जल्दबाजी में या बिना देखे हुए भूलवश जब ब्रश करके बाहर निकले तो हमारे भाभी यानी अपनी बहन श्री से कहा ये भोला अपना जो टूथपेस्ट भूल गया था उसमे झाग तो बहुत बढ़िया आता है मगर स्वाद एकदम बकवास है इसका। भाभी ने जोरदार ठहाका लगा कर उन्हें कहा कि अपने ध्यान से नहीं देखा वो शेविंग पेस्ट था टूथ पेस्ट नहीं।  जब वो ये बात मुझे फोन पर बता रहीं थीं तो मैं ये दृश्य कल्पना करके ही पेट पकड़ कर हँसते हँसते लोट पोट हो गया था। 

ऐसे ही एक बार ,नौकरी लगने के कुछ दिनों बाद मेरा गाँव जाना हुआ ,वो शायद काली पूजा का समय था और गाँव में बहुत सारे मेहमान रिश्तेदार आदि भी हमेशा की तरह आए हुए थे।  मैं स्नान के लिए लिरिल साबुन का प्रयोग किया करता था जिसकी नीम्बू युक्त मादक गंध बहुत समय तक न सिर्फ देह को बल्कि चापाकल के आसपास के स्थान को भी गमकाए रखती थी।  मेरे एक काकाजी अक्सर नहाने के बाद पूछते थे भोला ये तेरा साबुन बहुत खुशबू मारता है। मैं मुस्कुरा कर रह जाता था। 


  एक दिन मेरे स्नान करने के तुरंत बाद वे स्नान करने उसी चापाकल पर आए।  थोड़ी देर बाद स्नान करके मुझे साबुन दानी पकड़ाते हुए कहा कि भोला आज तेरे साबुन से मैं भी नया लिया। खुशबू  तो अलग थी मगर झाग से पूरा बदन भर गया। स्नान का तो आनंद आ गया। 

अब हैरान होने की बारी मेरी थी क्यूंकि मुझे याद था कि स्नान वाला साबुन तो मैं अपने तौलिये और लोटे के साथ ही उठा लाया था अपने कमरे में। मैंने साबुन दानी खोल कर देखी। उसमें उन दिनों नया नया चला वो खुशबू और झाग से कपड़ों को भर देने वाला एरियल या रिन जैसा कोई नीला साबुन था।  अब मैं समझ गया था कि उसमें से झाग और खुशबू इतनी भरपूर क्यों आई।  मगर मैंने काका जी की चेहरे की ख़ुशी और मासूमियत के कारण बिना उन्हें कुछ कहे बस मुस्कुरा कर रह गया।  

आह वो दिन ,और उन दिनों के वो मासूम किस्से 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

जयपुर भ्रमण , दूसरा दिन ..किलों और कानन के नाम (जयपुर यात्रा संस्मरण -III)

इन पिछली दो पोस्टों पोस्ट नंबर एक , और पोस्ट नंबर दो , में आप पढ चुके हैं कि अनुज द्वारा अचानक ही तय किए गय कार्यक्रम के अनुसार हम जयपुर प्रवास पर थे । पहले दिन की सैर में , बिडला मंदिर , मोती डूंगरी वाले गणेश मंदिर , राजमंदिर सिनेमा हॉल , अलबर्ट म्युज़ियम तथा अक्षरधाम मंदिर देख घूम कर सबका मन आनंदित था ।

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अगले दिन कार्यक्रम बना सभी महलों की ओर कूच करने का , गर्मी के तेवर देखते हुए निर्णय हुआ कि तडके छ; बजे ही घर से निकला जाए ताकि चढाई चढते हुए बच्चे परेशान न हों , मगर अनुज के मित्र और हमें  जयपुर घुमाने की जिम्मेदारी उठाने वाले मित्र मिंटू जी जे बताया कि कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि किले में प्रवेश का समय ही दस बजे का है । खैर अगली सुबह सबसे पहले जयपुर के हवामहल के पास सवारी पहुंची ।सडक के दूसरी ओर भाग कर हवामहल को कैमरे में कैद करने के अतिरिक्त थोडी देर उसे निहार कर आगे बढ लिया गया ।

हवामहल , जयपुर
इसके बाद जयपुर से बाहर निकलते ही आमेर जाने की ओर वाले रास्ते पर दाईं ओर बहुत बडी सी झील और उसमें स्थित जलमहल दिखाई दिया । बहुत ही मनोरम दृश्य लग रहा था । मिंटू जी ने सूचित किया कि , पिछली सरकार ने इस टूरिस्ट स्पॉट के रूप में अपेक्षित रखरखाव आदि का समुचित ध्यान नहीं रखा और प्रशासनिक लापरवाही और उदासीनता के कारण इसकी रौनक क्षीण पड गई । अब नई सरकार ने आते ही काम शुरू कर दिया है ।
जलमहल को देखने जाने के लिए सडक के किनारे बनी हुई हरित पट्टी


पार्श्व में जलमहल और इससे पहले का ये भवन , छत पर बैठे कबूतर , मनोरम छटा बिखेर रहे थे

जलमहल

परंपरा के अनुसार वहां उपस्थित पर्यटकों द्वारा आटे की लोई , ब्रेड के टुकडे आदि को उस जल में उछाल कर छोडने के बाद मछलियों के झुंड का उस खाने पर झपटना और छप छप ..बच्चे उसी को निभाते हुए
लगभग एक घंटे तक यहां उधम मचाने के बाद , सब निकल पडे आमेर के किले की ओर ।

आमेर का किला , शिलापट्ट

बेहद खूबसूरती और शिल्प से बना हुआ आमेर का किला इसमें स्थित दिलाराम बाघ , माता शिला देवी का मंदिर , था विशाल प्रांगण कुल मिलाकर एक गौरवपूर्ण स्थान का एहसास कराता है । किले और उससे जुडे अनेकों किस्से हमें मिंटू जी रास्ते भर सुनाते रहे

दिलाराम बाघ , आमेर का किला


बाग का सुंदर दृश्य



किले के साथ ही मौजूद झील

ऊपर दिखता आमेर का किला

ऊपर दिखता आमेर का महल या किला

बाग के घासों की देखभाल करता स्थानीय कर्मचारी

किले की चढाई शुरू कर दी गई

ऊपर से दिखता नीचे का दृश्य

खूबसूरत नज़ारा

रास्ते में हाथी पर बैठे हुए विदेशी पर्यटक भी मिले

ओह बहुत चढाई हो गई , मुख्य द्वार पर रखे तोप के पास ही सुस्ताया जाए

पत्थरों के फ़र्श वाला विशाल प्रांगण

अंदर की चहल पहल

आमेर का किला , भीतर का दृश्य

शिला माता का मंदिर , ऊपर की ओर जाती सीढियां

किले की बुर्ज़ से ली गई एक फ़ोटो



किले के पार्श्व से ली गई एक फ़ोटो ..देखिए क्या सौंदर्य है ...


अरे रुकिए रुकिए , आज ही इसी पोस्ट में ही सब घूम फ़िर लेंगे तो सब भागमभाग और गडबडझाला हो जाएगी , आमेर का किला , शिला माता का मंदिर और बुर्ज तथा बाग देखते देखते दो घंटे और बीत चुके थे और धूप काफ़ी तेज़ हो चली थी , अनुज संजय अपनी मोटर साइकिल पर अपनी धर्मपत्नी के साथ हमसे किले के नीचे आ मिले थे और हम सब चल पडे थे अब विश्व की सबसे बडी तोप और जयगढ नाहरगढ के किले को करीब से देखने जानने के लिए ...





रविवार, 22 जुलाई 2012

एक रविवार हुआ करता था ...







एक वक्त हुआ करता था , सच उस वक्त तो वक्त के सरकने का एहसास हुआ करता था , वक्त के गुजरने का आभास हुआ करता था और वक्त के आने का इंतज़ार भी हुआ करता था । हमें तो वो वक्त भी याद है जब साल के शुरूआती दिनों में ही दीपावली के सर्द उजली टिमटिमाती रातों के घनघोर इंतज़ार में हिंदी की कविता " आई दीवाली रे " पढ पढ के ही खुश हो लिया करते थे , और उन्हीं दिनों में एक दिन हुआ करता था रविवार ।


आप कहेंगे , लो रविवार तो अब भी होता है , अरे धत , ये तो संडे है जी संडे , संडे यानि फ़न डे और फ़न के नाम पर आज जो कुछ मैं कम से कम इस शहर की भोर दुपहरी और शाम को देखता हूं अपने आसपास वो मुझे किसी भी लिहाज़ से सांप के फ़न से कम खतरनाक नहीं लगता । खैर तो बात हो रही थी रविवार की । सप्ताह भर के बाद मिली छुट्टी और उस छुट्टी के आने का इंतज़ार , मानो सब कुछ एक कमाल का अनुभव हुआ करता था । रविवार के जाने से लेकर अगले रविवार के आने तक का कुल सिलेबस मानो यही था बस , कि बीते रविवार को दिखाई गई पिक्चर कितनी अच्छी थी , और आने वाले रविवार की तो क्या कहने ।


सुबह सुबह ही नहा धो कर चकाचक हो जाना , और फ़िर उन दिनों के क्रिकेट मैच । चट से मैच का फ़ैसला और पट से मैच शुरू । अजी काहे का पैड , और काहे का गल्वस । बस टीम में एक या दो बैट वाले दोस्तों का होना जरूरी होता था , सबसे एक एक रुपया इकट्ठा करके बॉल का जुगाड । पास के किसी पेड की टहनियों को काट छील कर विकेट तैयार और वो भी नहीं हुआ तो फ़टाक से नौ दस ईंटों को इकट्ठा करके करीने से एक के ऊपर एक रख कर उसे ही विकेट का रुप दे दिया जाता था । बस हो गया मैच शुरू और नियम भी तभी के तभी मैच दर मैच बना लिए जाते थे । जैसे प्रमोद अंपायरिंग करेगा , तो नॉ बॉल और एलबीडब्लयू नहीं रखा जाएगा मैच में , क्योंको प्रमोद को ही नहीं पता , विकास खाली है तो उसे लेग अंपायर बना दिया जा सकता है । बस उसके बाद कुल पंद्रह बीस ओवरों का मैच और क्या खाक मुकाबला करेंगे आज के फ़िक्स्ड सट्टेबाजी वाले मैच उस मैच के रोमांच का । लेकिन उससे पहले सात साढे सात बजे वाले टीवी कार्यक्रम को देख निपटा लिया जाता था ।



मुझे याद है कि उन दिनों शो थीम , स्टार ट्रैक ,विक्रम और बेताल , बेताल पच्चीसी , और सबसे अधिक सप्ताह में दिखाई जाने वाली पिक्चर हमारे मुख्य आकर्षण हुआ करते थे रविवार को मनाने के । टीवी और क्रिकेट ही क्यों , गर्मी के दिनों या उन दिनों जब घर पर ही रहने की बाध्यता होती थी तब , लूडो और कैरम की धमाधम मची होती थी , इतनी कि कभी कभी तो अलग अलग गुट बनाकर सब बैठ जाते थे खेलने के लिए और न कुछ हुआ तो अंताक्षरी ही सही । कॉमिक्स और बाल पत्रिकाओं में और नंदन , चंपक ,बालहंस , के अलावा  बेताल , मेंड्रेक , चाचा चौधरी , बिल्लू , पिंकी ,लंबू मोटू ,  नागराज जैसे सैकडों किरदार उन दिनों बच्चों के साथी हुआ करते थे ।



कुल मिलाकर समां कुछ इस तरह बंधता था कि आसपास के सभी बच्चे इकट्ठे होकर एक साथ ही पूरा रविवार बिता दिया करते थे । मम्मीओं के लिए जहां ये दिन सप्ताह भर के छूटे छोडे कामों को पूरा करने और कुछ विशेष बनाने का होता था तो पापाओं के लिए दोस्तों के यहां जाकर जरूरी काम निपटाने का , बाज़ार से सामान राशन लाने का , या फ़िर घर के आंगन में या पीछे लगी बगीची क्यारियों की निडाई गुडाई का । और सब मज़े मज़े में अपने काम को निपटाते थे ।



उस रविवार को खोए हुए इतना समय बीत चुका है कि न तो अब उसे वापस लाया जा सकता है न ही उसे भुलाया जा सकता है । अब तो बस हम अपने बच्चों को उस रविवार के किस्से सुना सुना कर ललचाते रहते हैं । कॉमिक्स और पत्रिकाओं का स्थान ले लिया है उनके कार्टून चैनलों ने और लूडो शतरंज और कैरमबोर्ड को रिप्लेस कर दिया है वीडियो कंप्यूटर ने । हम भी कहां वो रहे हैं अब , कहां तो अपने युवापन में रविवार को सभी दोस्तों के पते  ढूंढ ढूंढ कर उनके पत्रों को पढा करते थे ,उनका जवाब दिया करते थे और अब यहां बैठे कंप्यूटर पर खिटपिट कर रहे हैं उन दिनों की याद बिसूरते बैठे हैं । ऊपर से पानी की बिजली की और अब तो बारिश और मौसम की फ़िक्र अलग से ।


सनडे को फ़नडे में बदलते देख लिया अब जाने आने वाले समय में इसे रन डे (भागते दौडते दिन ) के रूप में भी परिवर्तित होते देख ही लेंगे शायद , तभी तो अक्सर ये मन गुनगुना उठता है ...

दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

अनटचेबल ...........






आमिर खान के सत्यमेव जयते से बेशक बहुत सारे लोगों को बहुत सारी शिकायतें हों , और इसके पक्ष विपक्ष , नफ़े नुकसान के गणित-गुणाभाग का आकलन विश्लेषण किया जा रहा हो , लेकिन मेरे लिए सिर्फ़ इतना ही काफ़ी है कि आज की तारीख में बुद्दू बक्से से बेकार बक्से तक की स्थिति में पहुंचने वाली टीवी पर सप्ताह में एक डेढ घंटे किसी मुद्दे को प्रभावी तरीके से उछाल कर उसे समाज में बहस करने के लिए छोड दिया जाता है तो यही बडी बात है । इसके एक आध एपिसोड को छोडकर मुझे सब विषयों और मुद्दों , उनकी प्रस्तुति और उसके बाद उनका पडने वाला प्रभाव स्पष्ट महसूस हुआ , जैसा कि आमिर खुद बार बार कह रहे हैं कि बात दिल पे लगनी चाहिए और दिल पे लगेगी तो बनेगी भी ।


पिछले बहुत सारे एपिसोड कहीं न कहीं , किसी न किसी रूप में महिलाओं के मुद्दों और उनसे जुडी समस्याओं के आसपास ही घूमते रहे , इसके बावजूद भी कल एक टीवी   समाचार में देखा कि गोहाटी में सरेआम , एक युवती के साथ पूरी भीड ने  वहशियाना हरकत की , उसने जता और बता दिया है कि अभी कुछ नहीं बदला है बल्कि कहा जाए कि बहुत कुछ बिगड गया है । और मुझे तो लगता है कि समाज को अब इससे भी ज्यादा घृणित , अमानवीय , कुकृत्यों और अपराधों को देखने सुनने और भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए , आखिर इस रास्ते को हमने ही तो हाइवे बनाया है ,और सबसे जरूरी बात ये थी कि जहां गति और दिशा का नियंत्रण होना चाहिए था वहां कोई इन्हें संभालने मोडने वाला नहीं था ।


हालिया एपिसोड में आमिर ने भारतीय समाज में जाति प्रथा के एक साइड इफ़्फ़ेक्ट और बुरे इफ़्फ़ेक्ट के रूप में मिली छुआछूत की बीमारी को उठाया । हमेशा की तरह , आमंत्रित मेहमानों और विशेषज्ञों ने ,अपने अनुभव , आंकडों और विमर्श से ये दिखा दिया कि अब भी बहुत कुछ नहीं बदला है । कम से कम उन समाजों में तो जरूर ही जहां ये व्याप्त थीं । यानि कि ग्रामीण परिवेश में । भारतीय समाज में जाति प्रथा की शुरूआत , जातियों का निर्धारण , उनके कार्यों का निर्धारण , उनके जीवन स्तर , उनके अधिकार आदि पर बहस तो सालों से चली आ रही है और सच कहा जाए तो जाति वर्गीकरण के कई वैज्ञानिक और सामाजिक तर्कों के बावजूद कभी कभी तो लगता है कि अब समय आ गया है जब इंसानी समाज से जाति और धर्म जैसे विषयों को बिल्कुल ही विलुप्त कर देना चाहिए । वैसे भी किसी आम खास जाति को उच्च और निम्न का प्रमाणपत्र देने की हैसियत और औकात कम से कम किसी इंसान की तो कतई नहीं होनी चाहिए ।


सरकार ने अपनी नीतियों और अपने नुमाइंदों के अनुसार बहुत सारे काम और बहुत सारी योजनाओं , कुछ कानूनों को लाद कर भी ये जताने का प्रयास तो किया ही है कि उन जातियों , जिन्हें निम्न या छोटा कहा समझा समझाया जाता रहा था सदियों से , के लिए बहुत बडा उद्धारकर्मी उपाय दिया । हालांकि बहुत सारे बदलाव और परिवर्तन जरूर हुए भी , लेकिन कमोबेश वो घाव अब भी कहीं न कहीं मवाद बहाता दिख मिल जाता है । खुद सरकारी आंकडों पर यकीन करें तो आज भी देश में हाथ से मैला ( मैला यानि मल मूत्र भी ) ढोने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है । आज़ादी के साठ साल बाद भी ।


शहर से निकलकर ग्रामीण परिवेश की तरफ़ बढने पर ही मुझे एहसास हुआ कि ऐसी कोई बीमारी भी इस समाज में है । शहरी जीवन में पहले और अब भी मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि जाति प्रथा या छुआछूत की किसी बडी घटना ने मेरा ध्यान उस ओर खींचा था सिवाय कुछ के जब एक आध सहकर्मियों ने कभी कभी किसी दूसरे सहकर्मी के साथ बैठ कर लंच करने में  असर्मथता जताई थी , बाद में पता चला कि वो छोटी जाति के उस सहकर्मी के साथ भोजन साझा नहीं करना चाहते थे । पिताजी फ़ौज में थे सो शुरू से ही परिवेश ऐसा रहा कि जाति धर्म भाषा आदि ने कभी मुझे अपने दायरे बनाने बढाने में कोई खास भूमिका नहीं निभाई । गांव में रहने के दौरान जरूर बहुत कुछ अनुभव हुआ ।इत्तेफ़ाक ये रहा कि उन्हीं दिनों अपनी स्नातक की पढाई के दौरान अंग्रेजी साहित्य (प्रतिष्ठा ) के पाठ्यक्रम में मुल्कराज़ आनंद की "अनटचेबल" पढने को मिली , जिसे मैंने अब तक सहेज़ कर रखा हुआ है ।








गांव में बस्तियों की बसावट और फ़ैलाव , जरूर उनके गोत्र मूल , पेशे, आदि के अनुसार था और अब भी है जो मुझे बहुत अलग सा नहीं लगा । लेकिन जैसे जैसे मुझे ये जानने को मिला कि उन्हें चापाकल , पोखर तालाब मंदिर और सामूहिक भोज तक में साथ बैठाना शामिल करना तो दूर उनके लिए वो सब वर्जित है , मुझे हैरानी भी हुई और कोफ़्त भी । मुझे अब तक याद है एक बार क्रिकेट खेल के मैदान से वापसी में बहुत जोर की प्यास लगने के कारण ,मैं स्वाभाविक रूप से जो भी चापाकल (हैंडपंप) दिखा उसमें से पानी पीने लगा । साथ के सभी लडके मुझे इस तरह छोडकर भागे मानो दिन में ही भूत देख लिया हो ।


अर्सा हो गया गांव छोडे और उसे महसूसते हुए , लेकिन मुझे पता है कि अब भी , जबकि सच में ही बहुत कुछ बदल गया है , उन बस्तियों में पक्के मकान हैं , और उनमें उनके पढते लिखते बच्चे हैं , विकास की , आगे बढने की एक ललक और झलक दिखाई देती है , लेकिन आज भी और अब भी वहां बहुत सी वर्जनाएं हैं जिन्हें तोडने टूटने में जाने कितने युग और लगेंगे ।

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