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गुरुवार, 10 जुलाई 2025

बारिश आ गई है , अपनी अपनी छतरियां निकाल लो







छतरी कथा 🌂🌂🌂☂️☂️☂️

भैया जी उवाच 

ओ हैलो 



बारिश आ गई है , अपनी अपनी छतरियां निकाल लो 
🌂🌂☂️☂️
लेकिन बारिश ही क्यों यहां तो धूप में भी छतरियां निकल जाती हैं 

उसी खूबसूरती से जैसे म्यान से तलवार निकलती है ,

लीजिए आप कहेंगे ये क्या बात हुई कहां छतरी कहां तलवार ।

अजी हां फिर आप भी हमारी ही तरह मासूम हैं छतरी ☂️ और उसका पति वो बड़े वाला काला छाता , वही जिसे हमेशा लिए हुए सिर्फ दादाजी को ही दिखाया जाता था , पीछे से छड़ी की तरह गोल और आगे से एकदम नुकीला ,भोंक के मार देने जैसा घनघोर । 

और उसके अंदर होती थी कमानियों की पूरी कसावट बनावट , अक्सर वर्षा ऋतु से पहले बाकायदा याद करके छतरियों की मरम्मत करवाई जाती थी उन दिनों और आज जो जिप ठीक करने वाले घूमते हैं न गलियों में वैसे पहले छाते छतरियों की मरम्मत करने वाले चक्कर लगाया करते थे । 




और हां उस समय ये दिन घंटे वाली बारिश नहीं हुआ करती थी , सावन और भादो की झड़ी लगती थी , कपड़े तक नहीं सूखते थे कई कई दिनों तक । 

शुरू में या पहले हमने वही काले वाले बड़े छाते देखे थे पिताजी ,काका ,मामा सबके हाथ में बच्चों के बस का नहीं होता था उसे बारिश में संभालना । 

धीरे धीरे दुनिया में जैसे जैसे बारिश भी नफासत से आने लगी तब इस बड़े छाते ने घर बसाया और रंग बिरंगी छतरियां भी दुनिया में आईं और आते ही दुनिया में इंद्रधनुष के सारे रंग भर दिए 

छाते भी इठला शरमा कर थोड़े हल्के और स्टाइलिश हुए फिर आए नन्हें मुन्नों के लिए उनके मिनी साइज की ख्वाब जैसी छतरियां । 

हमारे घर में इतनी सारी छतरियां हैं कि एक साथ चार पांच मेहमान मित्रों को जरूरत पड़ जाए और देना पड़ जाए तो भी हमारे लिए भी कहीं न कहीं से निकल आएगी 




मां और बिटिया ,दोनों को ही छतरियां खूब पसंद हैं , धूप में भी चाहिए और बारिश में भी इसलिए सफर के दौरान भी ये सामान के साथ रहता है । दिल्ली की गर्मी में ये जरूरी भी रहता है ।

छतरियों छातों का उपयोग इंसानों द्वारा कबसे किया जा रहा है ये बात इतनी पुरानी है कि ठीक ठीक कोई साक्ष्य ही नहीं है , और ये दुनिया भर की सभ्यताओं में पत्ते और बांस की पत्तियों के बने छातों से लेकर हीरे जवाहरात जड़े छत्रों तक अलग अलग साज स्वरूप में उपस्थित रहे । 

कहते हैं दुनिया में पहली छतरी मेसोपोटामिया की सभ्यता के दौरान ताड़ के बड़े बड़े पत्तों से वहां की तेज धूप और बारिश के कारण ही बनाए और उपयोग किए गए , कहीं कहीं चीन में छतरियों के प्रथम बार उपयोग करने की बात भी सामने आती हो , जो भी हो ये खोज रोचक तो थी ही 

हां इसे बनाने वाले ने इससे पहले कभी कुकुरमुत्ते (छतरी नुमा बनावट वाला जंगली मशरूम ) को देखा था या नहीं मगर इसे देख कर खुश तो जरूर हो गया होगा पक्का 

सिनेमा , साहित्य , राजनीति जैसे सभी क्षेत्रों में भी छतरियों और इनसे जुड़ी मान्यताओं , कहानियों , किरदारों की भरमार है जैसे अंब्रेला गर्ल , और जाने क्या क्या 

जापान में तो छातों और छतरियों का अपना एक इतिहास और संस्कृति रही है और उनके द्वारा छाते छतरियों का प्रयोग और उसके अनोखे तरीके तो किसी को भी विस्मित कर देते हैं 

अपने यहां सूरजकुंड मेले में आकाश में लटकी हुई इन छतरियों के कारण पूरा आसमान ही ऐसा लग रहा था मानो ऊपर उलट पलट होकर कोई बारात चली जा रही हो और सारे बारातियों ने आसमान में पैर करके इधर धरती की तरफ अपनी छतरियां तान दी हैं , आइडिया खूबसूरत लगा ,,पहले भी और बाद में भी कई जगह छतरियों को यूं ही सजे टंगे देखा ,अच्छा लगा 

आपका कैसा रिश्ता है अपनी छतरियों के साथ

शुक्रवार, 1 मई 2020

कलम के धनी






उस दिन जब मैंने बात बात में लिख दिया था तो भाई पद्म सिंह जी ने हैरानी से पूछा था इतने पेन।  मैंने मुस्कुरा कर उन्हें कहा था की पेन के किस्से फिर कभी सुनाऊंगा।  लिखने पढ़ने वाले और नहीं लिखने पढ़ने वालों के लिए भी पेन का साथ हमेशा से रहता आया है।  मुझे बचपन से पेन से लिखना ,उन्हें संभाल कर सहेज कर रखना , कमीज की ऊपरी जेब में लगाए रखना उतना ही भाता था जितना कलाई घड़ी और ये आदत आज भी बदस्तूर जारी है।

उन दिनों भी पेन से लिखने की शुरुआत कक्षा छः से ही हुआ करती थी ,किन्तु पढ़ाई में बहुत ज्यादा भुसकोल होने के कारण लिखने का शौक तो तब तक नहीं हुआ था अलबत्ता कक्षा 7 से ही नीले और काले रंग के पेन जरूर रखने लगा था और चूँकि वो समय निब वाले पेन का हुआ करता था सो बड़ी कंजूसी से और बड़ी सावधानी से उसका उपयोग किया जाता था।  जेब में रखने के कारण लीक होकर कमीज का कल्याण कर देने के महान काम को  कई बार अंजाम देने का परिणाम माँ की झिकड़ी जरूर होती थी।


कक्षा आठ तक आते आते एक दिन एक शिक्षक ने मेरी कॉपी में देख कर ,उन दिनों हम भुसकोल विद्यार्थियों की कॉपियां देखने दिखाने लायक नहीं होती थीं , अचानक ही मेरी लिखावट को साफ़ बता दिया।  बस वहीँ से हाथ से लिखने का जो जुनून जगा वो आज तक ख़त्म नहीं हुआ।  आज भी मैं सुबह से शाम तक साथ आठ पेज लिख डालता हूँ , जब तक कुछ लिखता नहीं चैन नहीं आता।

लिखने की इस आदत से  मेरी पेन से दोस्ती भी बढ़ती गयी और हम उस दौर के साक्षी रहे हैं जब रेनॉल्ड्स ,मोंटेक्स ,लिंक ,रोटोमैक आदि के बॉल पेनों ने धूम मचा दी थी।  उन पेनों को खरीदना इस्तेमाल करना एक अलग ही आनंद देता था।  धीरे धीर बॉल पेन की सुलभता ने इंक वाले पेन को आउट डेटेड कर दिया।  मुझे याद है की अपने इंटर के दिनों में और उसके बाद बहुत समय तक परिक्षा के लिए मैं विशेष रूप से युनिबॉल का एक बॉल पेन इस्तेमाल करता था।

इसके बाद  दौर आया जेल पेन का जिनमे एड जेल ने आते ही धूम मचा दी थी।  इंक पेन वाली नज़ाकत और बॉल पेन वाली तेज़ी दोनों से युक्त ये पेन अपने अलग अलग कई रूपों मसलन रोलर पेन और इनके जैसे ही अन्य पेनों ने बहुत हद तक बॉल पेन के बाज़ार की बादशाहत खत्म कर दी । नए बच्चे तो आज भी जेल पेन रॉलर पेन के दीवाने हैं ।

नौकरी भी लिखने वाली मिल गई जहाँ लिखते लिखते सुबह से शाम हो जाती है मगर लिखने का काम खत्म नहीं होता । बस फिर क्या था पेनों का शौक जुनून बन गया ।

जिस भी शहर में जाऊँ वहाँ से पेन खरीदना , उपहार में पेन मिलना , पेन देना , पहचान के दुकानदारों द्वारा मुझे नए नए पेन जानबूझकर दिखाना , मेरे लिए विशेष पेन मँगवाना , कुल मिलाकर ये सिलसिला बढ़ता गया ।

आज भी पूरे अदालत परिसर में किसी अधिकारी कर्मचारी , को किसी विशेष पेन की जरूरत पड़ती है तो बेहिचक बेझिझक ले जाता है । मैं अदालत में अपने सहकर्मियों को भी ढेर ढेर पेन बाँटता हूँ । हाँ बहुत महँगे पेन मुझे उपहार में ही मिले । अपने पैसों से मैंने एक बार 1200 का पेन खरीदा था , वैसे मेरे पास दो रुपए से लेकर दो हज़ार तक के पेन हैं जिनकी संख्या हज़ारों , हाँ हज़ारों में है । आप मिलेंगे तो आपको भी स्नेह स्वरूप मिलेंगे ये पेन ।

शनिवार, 11 नवंबर 2017

ये उन दिनों की बात थी ..







आजकल जो दीवानापन युवाओं का मोटरसाईकिल और युवतियों का स्कूटियों के प्रति और बच्चों की ललक भी स्कूटी दौडाने की और दिखाई देती है , ठीक वैसी ही और वैसी ही क्यूँ , बल्कि उससे कहीं ज्यादा (ये भी मैं बताउंगा कि उससे ज्यादा कैसे और क्यूँ ) उन दिनों में हमें और हमारी उम्र के बच्चों में सायकल के प्रति हुआ करती थी | अरे नहीं , उन दिनों बच्चों की सायकल के नाम पर सिर्फ बहुत छोटे बच्चों वाली ट्राय सायकल का ही चलन था सो , घर में पिताजी की सायकल, जिसकी सीट से बस थोड़ा सा ऊपर हमारी मुंडी पहुंचा करती थी , उसके प्रति हमारा दीवानापन था | और फुर्सत के समय जब कभी वो सायकल बिना ताले के मिल जाती थी समझिये कि वो पल , वो समय यादगार बन जाता था |

उन दिनों सायकल भी अन्य सबकी तरह चुनिन्दा ब्रांड में ही उपलब्ध हुआ करता था , तो वो हुआ करता था एवन , एटलस और हरक्यूलस | और सायकल ही क्यूँ उसके बेकार हो चुके टायर को भी नहीं छोड़ा जाता था , वो हमारा सबसे पसंदीदा दोस्त हुआ करता था , हाथ में छडी लेकर या फिर सीधा हाथ से ही , उस टायर को सडकों गलियों में उसकी पीठ पर शाबासी के अंदाज़ में थपकाते हुए दूर दूर तक दौड़ना और ये इक्का दुक्का नहीं बल्कि पूरी टोली निकला करती थी अपने अपने इकलौते टायर को लेकर | और इस नायाब खेल से हमारा परिचय भी लखनऊ के कैंट एरिया (तोपखाना के आसपास ) वाले फ़ौजी कालोनी में ही हुआ था | पिताजी की पोस्टिंग उन दिनों लखनऊ सेन्ट्रल कमांड के रिक्रूटमेंट सेंटर में हुआ करती थी | मौक़ा मिला और हम सायकल को स्टैंड (बड़ा ही कठिन हुआ करता था उसे स्टैंड से उतारना खासकर वो बीच वाले स्टैंड से ) से उतार कर फुर्र ...|

ऊँचाई और वजन के हिसाब से , वो भी अपनी औकात से बाहर था सो सीट के ऊपर दाहिना कंधे को टिका कर , बीच में पैर घुसा कर विशेष आसन में (जिन्हें उन दिनों हम कैंची स्टाईल कहा करते थे ) उसे पैडल मार कर चलाने की भरपूर कोशिश करते थे और जब सायकल पूरी स्पीड से चल देती थी तो बस कयामत आ जाती थी क्यूँकी ब्रेक मार कर रोकने जैसी उत्तम ड्राईविंग कतई नहीं आती थी सो आजकल जैसे हमारी महिला ब्रिगेड दोनों तरफ अपने पैर फैला कर स्कूटी रोकती हैं , उससे भी कहीं अधिक छितरा के अपनी दोनों टाँगे खोल के सड़क पर घिसटा कर सायकल को रोकने की कोशिश होती थी | और इस बीच यदि सामने से कोई आ गया तो फिर उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर इस रोमांचक सायकल ट्रेनिंग का अस्थाई अंत हो जाता था | वापसी में छिले हुए घुटने और कुहनियाँ इस बात का पूरा सबूत होती थीं कि कितनी शिद्दत से मेहनत की जा रही है |

थोड़े और बड़े हुए तो सायकल के कैरियर पर गेंहू की बोरी बाँध कर उसे पिसवाने के लिए आटे चक्की तक ले जाने का कार्यक्रम भी किसी स्टंट से कम नहीं होता था ,जहां से पच्चीस पैसे की वो गुड में मूंगफली के दाने चिपके वाली पट्टी खाते हुई घर वापसी होती थी |थोड़े और वीर हुए तो गैस का सिलेंडर भी पुराने सायकल की ट्यूब से बाँध कर रिफिल कराने का फीयर फैक्टर वाला स्टंट भी बखूबी अंजाम दिया गया | मुझे पूरी तरह सायकल चलाने के लिए दसवीं पास करने के बाद ही मिली थी | और उसके बाद ग्राम जीवन में खेतों की मेड पगडंडी कच्ची सड़कों पर चलाते हुए हम उसके चैम्पियन होते गए |


घर से मधुबनी कुल 14 किलोमीटर आना व् जाना , वो भी पूरे कालेज की पढ़ाई के दौरान , ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सुकून भरे सफ़र जैसे रहे | गाँव की स्वच्छ हवा में हम खुद कब उस सायकल पर हवा से बातें करने लगते थे हमें पता नहीं चलता था | मुझे याद है कि एक मित्र के कहने पर हम सिर्फ 35 मिनट में ये दूरी नाप कर मधुबनी के मिथिला टाकीज में फिल्म "लैला मजनू " देखने जा पहुंचे थे | उन दिनों सायकल का टैक्स भी लगता था जो दो रुपये हुआ करता था और एक लोहे का पत्तडनुमा टुकड़ा सायकल के टायरों में फंसा कर टैक्स भुगतान प्रमाण चिन्ह लगा दिया जाता था ...|


सायकल से मेरी मुहब्बत के साक्षी न सिर्फ मेरे परिवारवाले बल्कि गाँव के संगी साथी भी रहे और मैं अब भी शायद ही कभी ग्राम प्रवास के दौरान सायकल से गाँव से मधुबनी आने जाने का लोभ छोड़ पाता हूँ और सबके लाख मना करने के बावजूद कम से कम एक बार तो सायकल से पूरे शहर का चक्कर लगा आता हूँ ....
ये उन दिनों की बात थी .....हाँ ये उन्हीं दिनों की बात थी ..

रविवार, 23 जुलाई 2017

ज़रा बता कितने दिनों से मिट्टी को नहीं छुआ




रे मिटटी के मानुस आखिर ये तुझे क्या हुआ ,
ज़रा बता कितने दिनों से मिट्टी को नहीं छुआ ...

आज शाम अचानक पैर की एक उंगली हल्की से चोटिल हो गयी , पास पड़े गमले में से मेरे डाक्टर साहब को निकाल कर मैंने वहां लगा लिया ,सो बरबस ही मुझे ये किससे याद आ गए | वैसे मेरा बहुत सारा समय मिट्टी के साथ ही गुजरता है , मैं मिट्टी मिट्टी होता रहता हूँ और पूरी तरह मिट्टी ही हो जाना चाहता हूँ ......


यकीन जानिये मैं गंभीर होकर पूछ रहा हूँ और खासकर हमारे जैसे उन तमाम दोस्तों से जो अपनी जड़ो से दूर , खानाबदोश बंजारे हो कर , इस पत्थर , सीमेंट की धरती वाले जड़(बंज़र) में कहीं आकर आ बसे , सच बताइये आपको कितने दिन हुए , कितने महीने या शायद बरस भी , मिट्टी को छुए महसूसे , मिट्टी में खेले कूदे और मिट्टी की सौंधी सुगंध को अपने भीतर समेटे हुए ......


चलिए जितनी देर आप सोचते हैं उतनी देर तक कुछ पुरानी बातें हों जाएँ , जैसा कि मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि , बचपन से ही बहुत सारे दूसरे बच्चों की तरह हम भी पूरे दिन घर से बाहर ही उधम मचाते थे और हर वो शरारत और खेल में शामिल पाए जाते थे जो उन दिनों खेले जाते थे और ज़ाहिर था कि खूब चोट भी खाते थे , बचपन में ही एक नहीं दो दो बार बायें कोहनी में हुआ फ्रेक्चर भी , खेल खेलते ही हुआ था |


मगर मैदान में खेलते हुए जितनी भी बार गिरे , चोटी चोट खाई , छिलन हुई ...उसका तुरंत वाला फर्स्टएड ईलाज और बेहद कारगर था ......धरती की मिट्टी | कोइ बैंडएड कोइ पट्टी कोइ मरहम जब तक आता तब तक तो मिट्टी लगा के मिट्टी के बच्चे फिर मिट्टी में लोट रहे थे | आज के बच्चों के तो कपड़ों पर भी मिट्टी लग जाए तो न सिर्फ बच्चा बल्कि उसके अभिभावक भी एकदम से चिंतित हो जाते हैं , जबकि वैज्ञानिक तथ्य ये कहते हैं कि मिट्टी में कम से कम बयालीस से अधिक तत्व पाए जाते हैं जो मिट्टी के बने इस मनुष्य के लिए निश्चित रूप से लाभकारी होते हैं |



यहाँ देखता हूँ तो पाता हूँ कि शहरों में मानो होड़ सी लगी है ज़मीन को छोड़ कर आसमान की ओर लपकने की , हमारा फैलाव ज़मीन से जुड़ कर नहीं , जमीं से ऊपर उठ कर हो रहा है , गगन चुम्बी अपार्टमेंट अब एक आम बात हो गयी है , यहाँ हम ये भयंकर भूल कर रहे हैं कि जिन पश्चिमी देशों से ये ऊंची ऊंची इमारतों में निवास बनाने की परिकल्पना आयातित की गयी है वे इस देश और इस देश की धरती से सर्वथा भिन्न हैं | इन्सान बार बार ये भूल जाता है कि बेशक जितना ऊपर उड़ ले , आखिर उसे आना इसी मिट्टी में ही और उसे क्या उसके पहले के सभी कुछ को सदियों और युगों या शायद उससे भी पहले से भी यही और सिर्फ यही होता आया है |




रविवार, 11 जनवरी 2015

पीके ...अब क्यों बैठे हो मुंह सीके


पिछले साल से इस नए साल तक यदि कोई विवाद घिसटता चला आ रहा है तो उसमें से नि:संदेह एक हाल ही में प्रदर्शित सिनेमा पीके भी है । हालांकि इस सिनेमा के विषय या इसके प्रदर्शन से पहले भी इसके साथ विवाद तो तभी शुरू हो गया था जब इसका पहला पोस्टर जारी किया गया था जिसमें अभिनेता आमिर खान रेल की पटरी पर बिल्कुल नग्न खडे थे । हमेशा की तरह अपने नए प्रयोगों और नई सोच को सामने लाने के लिए विख्यात अभिनेता आमिर खान के इस पोस्टर के बाद सब अंदाज़ा लगाने लगे थे कि कुछ न कुछ नया ही परोसा जाने वाला है किंतु कहीं से भी किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि एक बार फ़िर से धर्म या कहा जाए कि धर्म के भीतर फ़ैले पाखंड और आडंबर को निशाने पे लिया जाएगा । किंतु हमेशा की तरह से फ़िर से आसान टार्गेट चुनते हुए बडी ही चतुराई से पूरी फ़िल्म में अधिकांशतया हिंदू धर्म , धर्म स्थल , हिंदू ईश एवं हिंदू धर्मगुरू को ही विषय बना कर उसके इर्द गिर्द सारा फ़िल्मी मसाला बुन कर परोस दिया गया , परिणाम ये कि आशा के अनुरूप फ़िल्म के कथानक , दृश्यांकन , डायलॉग आदि विवादित हुए और फ़िल्म ने सिने इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली , लगभग सवा तीन सौ करोड , फ़िल्म का रिकार्ड बना लिया ।

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इस पोस्ट के लिखे जाने तक यूं तो इस फ़िल्म से जुडे सारे विवाद पार्श्व में जा चुके हैं और इसी बीच बदले हुए घटनाक्रम पर पूरे विश्व और भारत सहित पूरे समाज की नज़रें जा चुकी हैं , आस्ट्रेलिया से लेकर फ़्रांस तक पर मज़हब , इस्लामिक राज़्य और ज़िहाद के नाम आतंक का नंगा नाच किया जा रहा है । निर्दोष मगर निर्भीक लोगों , पत्रकारों , संपादकों तक की हत्या करके दशहत फ़ैलाने और अंजाम भुगतने का संदेश दिया जा रहा है अलग अलग आतंकी गुटों द्वारा , और स्थिति ये है कि कहीं भी किसी के मुंह से इसकी भर्त्सना तो दूर उलटे खुल्लम खुल्ला ऐसे आतंकियों को ईनाम देने और उन्हें इस घिनौनी करतूत के लिए शाबासी तक देने को आतुर हैं । खैर , दोबारा लौटते हैं फ़िल्म पीके की ओर ..
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सवाल ये नहीं है कि धर्म और धर्म के नाम पर फ़ैले पाखंड और आडंबर को यदि सिने कलाकार अपने निशाने पर नहीं लेंगे उनपर चोट नहीं करेंगे तो फ़िर क्या आम आदमी करेगा , तो नि:संदेह ये उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी । और  ये किया भी जाता रहा है ,कुछ समय पूर्व एक ऐसी ही फ़िल्म ओ माय गॉड भी प्रदर्शित की गई थी जिसमें बडे ही तर्कपूर्ण तरीके से धर्म के नाम पर धर्मगुरूओं द्वारा फ़ैलाए गए माया जाल को निशाने पर लिया गया था । किंतु एक दर्शक के रूप में जो बातें इस फ़िल्म में किसी भी दर्शक इत्तेफ़ाकन अगर वो हिंदू धर्म का अनुयायी हो और संयोगवश आस्तिक भी है तो उसे जो नागवार गुज़री होंगी वो नि:संदेह यही रही होंगी ।
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पहला , सिनेमा का ठीक ऐसे समय में प्रदर्शन जब भारतीय जनमानस धीरे धीरे संगठित होकर हिंदुस्तानी मर्म और हिंदू धर्म पर केंद्रित हो रहा था/है । इसका प्रमाण बहुत समय बाद भारतीय जनता पार्टी का इतने बडे बहुमत से शासन में आना , देश से लेकर प्रदेश तक लोगों की सामाजिक , राजनीतिक और धार्मिक सोच प्रबल रूप से हिंदुत्व के पुरातन गौरव के प्रति रुझान , ऐसे समय में यदि अनावश्यक रूप से उनके ईश और मान्यताओं का ऐसा उपहास सिर्फ़ व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाएगा तो ये आमंत्रित विवाद की तरह था । केंद्र में अभिनेता आमिर खान , इत्तेफ़ाकन मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित थे , कथानक में प्रेमी जोडे में युवक पाकिस्तान का और युवती भारत की , क्या मुसलमान धोखेबाज होते हैं , लोग मूते नहीं इसलिए भगवान की फ़ोटो लगा देते हैं जैसे संवाद आदि इतने सारे तथ्यों को यदि संयोग भी मान लिया जाए तो फ़िर ये निंसंदेह घातक संयोग था । आखिरी और सबसे अहम बात जिसका ज़िक्र बार बार इस विवाद में हुआ कि क्या जितनी आसानी से हिंदू धर्म , धार्मिक स्थलों , हिंदू ईश , और हिंदू धर्म गुरुओं को निशाने पर लिया जाता है क्या वही हिम्मत किसी अन्य धर्म विशेषकर मुस्लिम मज़हब के लिए दिखाई जा सकती है ...विश्व आज इस्लामिक कट्टरपंथ से उपजे आतंकवाद का दंश झेल रहा है और इन सारे प्रश्नों का उत्तर पा रहा है ।


अंत में सिर्फ़ यही कहने का मन है कि ,



सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे अब कहां हो बे पीके ,
दडबों से निकलो न ,बनाओ कुछ कठमुल्लों पे सिनेमा फ़िर दिखाओ जी के ..
सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे, अब कहां हो बे पीके ,
धर्म नहीं मज़हब के नाम पर जब हुआ नंगा नाच , बैठ गए न मुंह सी के ..
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