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शुक्रवार, 1 मई 2020

कलम के धनी






उस दिन जब मैंने बात बात में लिख दिया था तो भाई पद्म सिंह जी ने हैरानी से पूछा था इतने पेन।  मैंने मुस्कुरा कर उन्हें कहा था की पेन के किस्से फिर कभी सुनाऊंगा।  लिखने पढ़ने वाले और नहीं लिखने पढ़ने वालों के लिए भी पेन का साथ हमेशा से रहता आया है।  मुझे बचपन से पेन से लिखना ,उन्हें संभाल कर सहेज कर रखना , कमीज की ऊपरी जेब में लगाए रखना उतना ही भाता था जितना कलाई घड़ी और ये आदत आज भी बदस्तूर जारी है।

उन दिनों भी पेन से लिखने की शुरुआत कक्षा छः से ही हुआ करती थी ,किन्तु पढ़ाई में बहुत ज्यादा भुसकोल होने के कारण लिखने का शौक तो तब तक नहीं हुआ था अलबत्ता कक्षा 7 से ही नीले और काले रंग के पेन जरूर रखने लगा था और चूँकि वो समय निब वाले पेन का हुआ करता था सो बड़ी कंजूसी से और बड़ी सावधानी से उसका उपयोग किया जाता था।  जेब में रखने के कारण लीक होकर कमीज का कल्याण कर देने के महान काम को  कई बार अंजाम देने का परिणाम माँ की झिकड़ी जरूर होती थी।


कक्षा आठ तक आते आते एक दिन एक शिक्षक ने मेरी कॉपी में देख कर ,उन दिनों हम भुसकोल विद्यार्थियों की कॉपियां देखने दिखाने लायक नहीं होती थीं , अचानक ही मेरी लिखावट को साफ़ बता दिया।  बस वहीँ से हाथ से लिखने का जो जुनून जगा वो आज तक ख़त्म नहीं हुआ।  आज भी मैं सुबह से शाम तक साथ आठ पेज लिख डालता हूँ , जब तक कुछ लिखता नहीं चैन नहीं आता।

लिखने की इस आदत से  मेरी पेन से दोस्ती भी बढ़ती गयी और हम उस दौर के साक्षी रहे हैं जब रेनॉल्ड्स ,मोंटेक्स ,लिंक ,रोटोमैक आदि के बॉल पेनों ने धूम मचा दी थी।  उन पेनों को खरीदना इस्तेमाल करना एक अलग ही आनंद देता था।  धीरे धीर बॉल पेन की सुलभता ने इंक वाले पेन को आउट डेटेड कर दिया।  मुझे याद है की अपने इंटर के दिनों में और उसके बाद बहुत समय तक परिक्षा के लिए मैं विशेष रूप से युनिबॉल का एक बॉल पेन इस्तेमाल करता था।

इसके बाद  दौर आया जेल पेन का जिनमे एड जेल ने आते ही धूम मचा दी थी।  इंक पेन वाली नज़ाकत और बॉल पेन वाली तेज़ी दोनों से युक्त ये पेन अपने अलग अलग कई रूपों मसलन रोलर पेन और इनके जैसे ही अन्य पेनों ने बहुत हद तक बॉल पेन के बाज़ार की बादशाहत खत्म कर दी । नए बच्चे तो आज भी जेल पेन रॉलर पेन के दीवाने हैं ।

नौकरी भी लिखने वाली मिल गई जहाँ लिखते लिखते सुबह से शाम हो जाती है मगर लिखने का काम खत्म नहीं होता । बस फिर क्या था पेनों का शौक जुनून बन गया ।

जिस भी शहर में जाऊँ वहाँ से पेन खरीदना , उपहार में पेन मिलना , पेन देना , पहचान के दुकानदारों द्वारा मुझे नए नए पेन जानबूझकर दिखाना , मेरे लिए विशेष पेन मँगवाना , कुल मिलाकर ये सिलसिला बढ़ता गया ।

आज भी पूरे अदालत परिसर में किसी अधिकारी कर्मचारी , को किसी विशेष पेन की जरूरत पड़ती है तो बेहिचक बेझिझक ले जाता है । मैं अदालत में अपने सहकर्मियों को भी ढेर ढेर पेन बाँटता हूँ । हाँ बहुत महँगे पेन मुझे उपहार में ही मिले । अपने पैसों से मैंने एक बार 1200 का पेन खरीदा था , वैसे मेरे पास दो रुपए से लेकर दो हज़ार तक के पेन हैं जिनकी संख्या हज़ारों , हाँ हज़ारों में है । आप मिलेंगे तो आपको भी स्नेह स्वरूप मिलेंगे ये पेन ।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

आप लिखते रहे , क्रांति अपने आप आयेगी......

ये बात मैं उन दिनों की कर रहा हूँ जब लड़कपन से निकल कर थोडा आगे की तरफ़ बढ़ा था, मुझे ये तो याद नहीं की लिखने का शौक ठीक ठीक कब शुरू हुआ था मगर शायद ये बीज मुझ में पनपने बहुत पहले ही जन्म ले चुके थे। शुरुआत बिल्कुल वैसे ही हुई थी जैसे आम तौर पर हम में से सभी की हुई होगी, स्कूल कॉलेज के दिनों में जो भी दिल सोचता था , और यदि वो कलम के अनुरूप होता था तो कुछ न कुछ कागजों पर निकल ही आता था। मगर जहाँ तक मुझे याद है, जब बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ तो मुझे ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ की वहां कभी बिजली नहीं आती जबकि खंभे सालों से लगे हुए थे, मुझे तब पता नहीं था की इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए। वापस लौटा तो मन में एक कसमसाहट सी थी, अपने पड़ोस में रहने वाले वकील अंकल ने सुझाव दिया की क्यूँ न मैं एक पत्र सम्पादक के नाम लिखूं, मुझे तब ये नहीं पता था की ये सम्पादक के नाम पत्र क्या होता है.और वो शायद मेरा पहला आधिकारिक कुछ ऐसा था समाचार पत्र में छपा था । हालाँकि उसका असर सिर्फ़ ये हुआ की वहां के स्थानीय बिजली ऑफिस से कुछ लोग मेरे बारे में पूछते हुए घर (गाँव वाले) पर पहुंचे , किंतु ये बात भी मुझे रोमांचित कर गयी।
इसके बाद तो एक ऐसा अनथक सिलसिला शुरू हुआ की क्या कहूँ, समाचार पत्रों में, विभिन्न रेडियो प्रसारणों में, परिचितों, सम्बन्धियों को और यहाँ तक की बहुत से अपरिचितों को भी ढेरों पत्र लिखे मैंने। जो बीबीसी सुनते होंगे उन्होंने अक्सर एक नाम सुना होगा, अजय कुमार झा, दिलशाद गार्डेन से , वो मैं ही था। एक दिन एक मित्र की सलाह पर मैंने मदर टेरेसा को उनके , थोड़े दिनों बाद उनके आश्रम से धन्यवाद संदेश आया, इसने मेरे लिए एक और रास्ता खोल दिया। इसके बाद तो मैंने वोया हिन्दी सेवा के बंद होने पर अक्रीकी राष्ट्रपति से लेकर किरायेदार वेरीफिकेशन मुहीम के लिए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को , ढेरों पत्र विभिन्न मंत्रालयों को, भारतीय राष्ट्रपति को, और पता नहीं किन्हें किन्हें लिखता रहा हूँ या कहूँ की अब भी लिख ही रहा हूँ। ।
मुझसे मेरे शुरुआती दिनों में किस ने पूछा था की भाई आप जो इतना लिखते हैं उसका असर भी होता है कुछ, मुझे तो नहीं लगता की ऐसे लिखने से कोई क्रांति आयेगी। मगर उन सज्जन को मैंने यकीन दिलाया और मुझे बा भी पूरा विश्वास है की क्रांति जरूर आयेगी और उसमें हमारी लेखनी का भी बड़ा महत्वपूर्ण योगदान होगा। जहाँ तक मुझे प्राप्त सफलताओं की बात है तो वो भी बहुत लम्बी है, अभी सिर्फ़ इतना भर की आज जो भी मैं सोच पाता लिख पाता हूँ सब उन्हें दिनों की बदौलत है और हाँ इतना यकीन तो सबको दिला सकता हूँ की लेखनी से काम हो सकता है की धीरे धीरे हो मगर जब होता है न तो बस दुनिया देखती है, तो आप भी तैयार हैं मेरे साथ दुनिया को दिखाने के लिए की कलम से ही क्रांति आती है .............
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