सोमवार, 15 जुलाई 2024

दिल्ली इंदौर दिल्ली -सड़क मार्ग यात्रा -प्रथम भाग

 





जब ये तय हुआ था कि पुत्र की एक प्रतियोगिता में उसे सहभागिता करने के लिए उसे इंदौर जाना होगा और वहां काम से कम तीन दिन रहना रुकना होगा तभी से ये खूबसूरत संयोग भी बन गया था या कहिये की जबरन बना लिया गया था कि साथ में और कोई जाए न जाए हम तो अपने राजा बेटा को लेकर वो भी बाकायदा कार में बैठा कर ले जाना है और इसके पीछे हमारी इंदौर , उज्जैन , ओम्कारेश्वर , महेश्वर , गुना जैसे सुन्दर शहरों नगरों को देखने घूमने की तमन्ना का जोर जोर से हिलोरें मारना असली कारण था , और बहुत सारी इधर उधर की गुंजाइश संभावनाओं के बाद ये तय हुआ कि बिटिया कर उसकी मम्मी साथ में नहीं जा पाएंगी , नहीं नहीं इसमें खुश होने वाली कौन सी बात जी 

इस यात्रा की पूरी योजना के अनुसार हमें सुबह चार से पांच बजे के बीच दिल्ली छोड़ देना था और हम रुकते चलते देर शाम रात तक इंदौर पहुँच कर अगले दिन यानि रविवार को आराम विश्राम के बाद सोमवार से पुत्र अपनी प्रतियोगिता में व्यस्त होने वाले थे और हम और हमारे सारथी साथी हमनाम अजय दोनों अगले तीन दिनों तक आसपास का सब कुछ देख लेने के विचार में थे।  अब पहला चक्कर तो ये हुआ कि सुबह पांच तो दूर शाम के पांच बजे भी हम दिल्ली में ही थे और जाने को तैयार बैठे थे , बच्चों की मम्मी की डाँट के साथ ही हम दो टाइम का खाना घर पर ही खा चुके थे और रात्रि भोजन के भी आसार यहीं के थे , कारण कुछ अपरिहार्य थे जो सो दस बजे रात को हम दिल्ली से विदा हुए। 

रात को सफर करने से मैं अधिकांशतः बचता हूँ और इसके बहुत से कारण हैं जो गिनाए जा सकते हैं लेकिन ये भी है कि चाहे अनचाहे दर्जनों बार रात और पूरी पूरी रात सफर किया है , तो जब रात का सफर हो तो फिर हाइवे पर जाते ही जो गाना सबसे पसंदीदा होता है वो अक्सर यही होता है , सो गया ये जहां सो गया आसमां , रात के हमसफ़र , ओ रात के मुसाफिर चंदा जरा बता दे , और जाने कितने ही गाने गजलें हमारे साथ हाइवे पर बहती चलती रहती हैं।  पहला पड़ाव रहा चाय का ठिकाना शिवा  ढाबा , ढाबे पर भीड़ देख कर मैंने बेटे से पूछा ये रात के ही एक बज रहे हैं न।  बेटे ने हां में सर हिलाया तो साथी अनुज अजय ने बताया कि यहाँ ये सामान्य बात है 

फिर मुझे याद आया कि इस शिवा ढाबे पर हम जनवरी में मथुरा वृन्दावन जाते हुए भी रुके थे और तब भी यही हाल था जबकि उस समय शायद वक्त तड़के सात बजे का था , यहाँ ब्रेड पकौड़े और चाय तो लगभग सभी को लेते और खाते पीते देखा ,हमने पकौड़े के बदले चाय ही डबल कर दी , चाय दिल्ली में नहीं पीते हुए काफी वक्त हो गया था मगर इस बार सोच के ही गया था की इस सफर में चाय का साथ तो जरूर निभाया जाएगा यूँ भी सालों पहले जबलपुर के स्टेशन पर पी गई चाय का स्वाद अब तक जेहन में वैसा ही था और ये साबित भी हो गया जब इस दौरान मैंने इंदौर उज्जैन और तमाम शहरों में छोटे छोटे कप में बहुत ही स्वादिष्ट चाय पी।  

चलिए रुकते हैं अभी इस शिवा ढाबे पर ही फिर आगे चलेंगे 

अगली पोस्ट में बढ़ेंगे इस सफर में ढाबे से आगे और देखेंगे कि आगे हमें क्या कैसा मिला ?? 


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

घुमक्क्ड़ी से नाता जोड़ा क्या

 







घुमक्कडी से नाता :

बचपन में सुना  हुआ एक गीत ,

धरती मेरी माता पिता आसमान
मुझको तो अपने जैसा लागे सारा जहां ,




 देखते हुए एकदम जोर से महसूस हुआ था की सच में ही शायद मैं रास्तों पर चलने और चलते जाने के लिए ही पैदा हुआ हूँ , उम्र के साथ साथ सरिता का पर्यटन विशेषांक और एक और पत्रिका शायद इलस्ट्रेटेड वीकली इनमें सिर्फ और सिर्फ पर्यटन वाले पन्नों को निकाल कर उनमें कभी गुलमर्ग तो कभी मेघालय कभी अमृतसर तो कभी दार्जलिंग , कई कई दिनों तक फोटो निहारने के बाद अगर मौक़ा मिले तो उसे काट कर एक डायरी में रख लेने की आदत को बहुत बाद तक रही। 

पिता जी थलसेना में थे , तो जन्म स्थान हुआ सैनिक अस्पताल जबलपुर , वैसे पैतृक स्थान है मधुबनी ,बिहार , फिर जहाँ जहाँ फौजी सर की पोस्टिंग वहां वहां बच्चे केंद्रीय विद्यालय में पढ़ते हुए विचरण करते रहे। ढाई तीन साल के बाद ही बोरिया बिस्तर गोल हो जाता था हमारा , बचपन बीता फिरोजपुर , लखनऊ , पूना , पटियाला , दानापुर , और आखिरी पोस्टिंग मुजफ्फरपुर ,   इस घुम्मकड़ वाली नौकरी से माँ और पिताजी को कितनी क्या कठिनाई आती थी ये तो हमें ठीक ठीक नहीं पता लेकिन हर बार दोस्तों को छोड़ कर नए क्लास में जाना और फिर वही सब , बाद में तो हमें भी बाकी के सभी बच्चों की तरह आदत ही हो गई , लेकिन जो बाद सबसे अच्छी थी वो ये कि बचपन भी हमारा देश के हर कोने के शहर और उसके सभ्यता संस्कृति से परिचय होते हुए ही बीता , युवक होने तक मैं अपनी मातृभाषा मैथिली और राजभाषा हिंदी के अलावा पंजाबी , मराठी और भोजपुरी भी काम चलाने लायक बोलने और समझने लगा था।  




इसके बाद अगला दौर मेरे जीवन का घुमक्क्ड़ी वाला रहा , मेरी प्रतियोगिता परीक्षाओं में शामिल होने वाला दौर , ये बहुत लंबा था शायद चार या पांच साल तक और आखरिकार चयन होने तक मैं अपनी परीक्षा देने के क्रम में बहुत  से शहरों में पहुंचा , कई बार मौक़ा मिलने पर घूमा भी देखा भी लेकिन उन दिनों लक्ष्य सेवा संधान का था तो न घुमक्क्ड़ी वाला सुख अनुभव हुआ न ही पर्यटन वाला सौंदर्य 

इसके बाद  तब तक जब तक सेवाकाल में नए रहे और  विभिन्न शिक्षण प्रशिक्षण में व्यस्त रहे तभी बस तभी तक थोड़ा रुके और सके बाद फिर शुरू हो गए ताबड़ तोड़ 

शुरू से गिनूँ तो 

फिरोजपुर , लखनऊ , पूना , मुंबई , पटियाला , दानापुर , मुजफ्फरपुर ,रांची , गया ,  भोपाल , सिल्लीगुड़ी , दार्जलिंग ,आसनसोल , कोलकाता , सिकंदराबाद , हैदराबाद ,बंगलौर  जालधंर , होशियारपुर ,  अमृतसर , चंडीगढ़ , लुधियाना , जम्मू , श्रीनगर , शिमला , मनाली , डलहौजी , खजियार , मणिकरण , कुल्लू , माउंट आबू , नैनीताल , कानाताल , टिहरी , धनोल्टी , बुरांशखण्डा , जयपुर , जोधपुर , उदयपुर , चितौड़गढ़ , राजसमंद , हल्दीघाटी , मथुरा , वृन्दावन , बरसाना , सालासर ,मेंहदिपुर ,  खाटू श्याम जी , वैद्यनाथ धाम , वैष्णो देवी , नैना देवी , बगुलामुखी , कांगड़ा माता , चामुंडा माता , ज्वाला देवी , जनकपुर , काठमांडू अभी तो इतना ही याद आ रहा है 





जितना घूमे हैं या घूम पाए हैं उसका दस गुना और घूमने देखने की इच्छा है और यही ख़्वाब है जिसे पूरा करने के लिए लिए सारे जुगत तलाशे जा रहे हैं , इस टेबल कुर्सी से प्रेम मुहब्बत करके आधी शताब्दी तो बीत गई ज़िन्दगी की अब पचास के बाद का सारा समय मेरा है और मेरा ही हो इसलिए फिलहाल तो सिर्फ और सिर्फ अपना देश देखना है और अभी तो कुछ भी नहीं देखा है असल में घूमना तो अब शुरू करना है ये तो ऊपर की सूची है , इतना घूमना है कि फिर कभी किसी भी सूची में पूरे नाम लिख ही न पाएं 

दक्षिण भारत से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक और रेल के सफर से मोटरसाइकिल की पीठ पर बैठ तक कर , जहाँ तक भी जा सके , 

अकेले भी दुकेले भी 
और जो साथ हो कारवां मेले भी , 

कोई दिक्कत नहीं कोई परहेज़ नहीं , घुमक्क्ड़ी के जाबांज किस्से  पढ़ते हुए अक्सर मैं लेखक के साथ उसके बिलकुल करीब चलने लगता हूँ और ये बार बार होता है , 

सफर में पहले किताबें पसंद थीं बहुत पढता भी था अब जबसे नज़र नज़ारों पर रहती है तो बस वहीँ अटक से जाते हैं हम भी और हमारा मोबाइल भी , अब फोटों खींचना भी बहुत अच्छा लगता है इसलिए ये भी इच्छा है कि सीख कर कुछ हुनरमंद बना जाए और देखा दिखाया जाए प्रकृति को भी उसके गजब के रूप में 

आप भी करते हैं क्या घुमक्क्ड़ी , कब कहाँ कैसे शुरू की , कहाँ तक पहुँची , अपना अनुभव भी साझा करें हमसे।  
 , 

मंगलवार, 3 जनवरी 2023

उठ मुसाफिर , देख जग सारा

 उठ मुसाफिर , देख जग सारा 



इन दिनों जब देख रहा हूँ कि दुनिया घूमने और घुमाने की एक गजब की जिजीविषा , एक उत्कट इच्छा , पग पग दुनिया नापने की , देखने की , जंगलों , नदियों पेड़ों को छूने महसूसने की ललक सी उठी हुई है अपने चारों तरफ , हर उम्र , हर क्षेत्र से और पारिवारिक व्यक्ति भी जीवन के सबसे असल यथार्थ को पाने का प्रयास कर रहा है तो लगता है कि चलो देर से ही सही लोग बाग़ इंसान का इस दुनिया में आने का या उसे लाए जाने का उद्देश्य समझ पा रहे हैं।  



असल में ईश्वर ने जब अपनी सारी कारीगरी और उसमें भी मास्टरी करते हुए ये धरती रच दी , और इसमें जाने कैसे कैसे करिश्मे भर दिए , ऊँचे पहाड़ , लम्बे रेगिस्तान , गहरे समुन्दर और खूबसूरत नदियाँ जंगल फिर आखिर में इंसान बनाया और कहा जा प्यारे देख जब  भगवान् गढ़ते हैं तो कैसे गढ़ते हैं।  


घूमना तो यूं भी इंसान की नियति है और इंसान ही क्यों हर चेतन , और जल पवन तक के जीवन में घूमना ही लिखा होता है।  इंसान बेचारा मजबूर , रहने को , छिपने को छिपाने , कमाने धमाने , और फिर इसके बाद कुछ समय बचे तो किसी न किसी बहाने से किसी अवसर से घूमने को भी।  घूमने के साथ एक और बात जो बहुत जरूरी है वो है इन यादों को संजोते जाना , हमारे बाप दादा इन यात्राओं को रोचक किस्से कहानियों में ज़िंदा रखते थे , हमारा समय याशिका कैमरा और एल्बम बीतते हुए अब तो मोबाइल और वैबकैम के बाद ड्रोन और जाने कैसे कैसे कहर बरपाने वाले हसीन इंतज़ाम किए जा रहे हैं।  

पचास साल की उम्र तक पहुंच चुका हूँ , पिताजी फौजी थे उससे पहले किसान सो ये दोनों पैदाइशी गुणों के अलावा रही सही कसर खेलों के प्रति मेरे झुकाव ने पूरी कर दी , ग्राम्य जीवन भरपूर जीये होने के कारण पेड़ पर चढ़ कर नदी में कूद मार तैरते हुए पार करने से लेकर , सायकल से रोज़ तीस किलोमीटर आते जाते हंसी खेल में कालेज की पढ़ाई , के अलावा कुश्ती कबड्डी से लेकर वॉलीबॉल बैडमिंटन और क्रिकेट तक में जबर खिलाड़ी रहे , जबर बोले तो जबर ,पसीना छुड़वाने वाले।  कुल मिला कर लब्बो लुआब ये कि , धरती से लेकर पानी तक पर खूब चलाई , दौड़ाई और तैराई के कारण अब बुढ़ैती में भी मन और हाड मांस कतई मानने को तैयार नहीं होते कि हाफ सेंचुरी हो ली , ऊपर से आठ घंटे की दफ्तरी वाली नौकरी।  




अब कार्यक्रम कुछ ऐसा बन रहा है कि पुत्तर लाल को घुमक्क्ड़ी की आदत लगाते लगाते ऎसी लगाई है कि अब छोटे झाजी ताबतोड़ नित नए सफर पर चलने को तैयार है।  अभी अभी हमारे साथ कूदते फांदते हनुमान बने कटरा  से भवन और भैरव बाबा तक उतराई कुल ३२ किलोमीटर की चढ़ाई उतराई ( बिना रुके बैठे पहुँच गए और वापसी में भी चले तो नीचे आकर ही रुके ) 9 घंटे में पूरी करवा दी। जय माता दी।  अब इस खूबसूरत से शुरू हुए इस किस्से को जल्दी ही अगले अफ़सानो तक ले जाने के ख़्वाब भी बुने जाने लगे हैं।  

अगले कुछ दिनों में राजस्थान , पंजाब और बिहार में  मिलेंगे और मिलवाएंगे आपको आपके अपने ही शहरों , गलियों , बाज़ारों को एक  घुमक्कड़ की नज़र से।  ज़रिया सड़क रेल और हवाई मार्ग तीनों ही रहेगा।  फोटो शोटो का शौक है शऊर नहीं सो ऊट पटांग से लेकर बहुत खराब तक फोटो खींचने में पारंगत हैं  लेकिन अच्छी भी आ जाती है और इनमे से कुछ हमारी भी होती है।  




रविवार, 26 दिसंबर 2021

ग्राम्य प्रकृति की अद्भुत तस्वीरें


भारत की आत्मा गाँव में ही बसती है।  आज से दशकों पहले ये बात महात्मा गाँधी ने तब कही थी जब वे अपनी पढ़ाई विदेश में करके भारत के स्वंतत्रता संघर्ष में हिन्दुस्तान के गाँव गाँव विचरे थे।  तब ही उन्हें ये एहसास हुआ था कि गाँव ही भारत की असली ताकत हैं , भारत के गाँव बदल गए तो देश बदल जाएगा।  मगर अफ़सोस की गाँधी के कांग्रेस और उनके कांग्रेसियों ने पचास सालों से अधिक तक शासन करने के बावजूद भी गाँव की वो सुध नहीं ली जिसकी अपेक्षा कभी खुद गाँधी जी ने की थी।  

ये नया भारत है और देखने वाले देख और समझ भी रहे हैं कि -ये देश असल में कभी भी गरीब नहीं था , शास्वत काल से ही पूरी दुनिया के अपनों बेगानों द्वारा लूटे नोचे जाने के बावजूद भी , जब जब किसी योग्य , कर्मठ , निष्ठावान प्रतिबद्ध नेतृत्व सम्भाला है भारत बार बार विश्व गुरु की तरह दुनिया के सामने उठ खड़ा हुआ है।  और यही सब एक बार फिर से देखने को मिल रहा है केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा भारत को एक नए भारत , एक नई शक्ति , एक विकास पुँज के रूप में संगठित , सामर्थ्यवान और संवर्धित करने के ध्येय पथ पर काम शुरू हुआ है , एक सुखद परिवर्तन सामने आया है।  

एक लम्बे समय के अंतराल के बाद , दीपावली और छठ पर्व पर बिहार के मधुबनी जिले स्थित अपने गाँव जाने का अवसर मिला और खुद पर यकीन नहीं हुआ कि , देश के सीमांत जिले पर स्थित मेरे गाँव में विकास की बयार इतने सुखद बदलाव ला चुकी है।  देखिये कुछ चुनिंदा तस्वीरें। ...........


पिताजी द्वारा निर्मित महादेव मंदिर और सूर्योदय 

मंदिर के साथ ही लगा हुआ पारिवारिक तालाब /पोखर 

मंदिर के साथ का बूढ़ा पीपल 

ताल तलैये 

धान की पैदावार से लहलहाते सोने से खेत 

जलकुम्भी 


फूल पत्तों वनस्पति 

महाराजाओं के किले और उनके अवशेष 







गाँव का मेला हाट बाजार 

और ये है गाँव गाँव कस्बे मोहल्ले की सड़कें 

चमचमाती सड़कें 

हर गाँव में आम के दर्जनों बाग़ बगीचे 




खूबसूरत और साफ़ सुथरे रेलवे स्टेशन 

चमचमाता जगमगाता रेलवे स्टेशन 




गाँव के भोज भात की तैयारी 

काली मंदिर 

पेठे /कुम्हर 


इस यात्रा के अनुभव , गाँव में अब निरंतर रहने वाली बिजली और उसके प्रभाव , मद्यनिषेध के बावजूद भी शराब और अन्य नशे का बढ़ता चलन , शिक्षित , ऊर्जा से भरपूर मगर बेरोजगार युवा वर्ग , सब पर धीरे धीरे शब्दों और तस्वीरों को साझा करूंगा।  


मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान :उपेक्षित ,शोषित ,प्रताड़ित

 




वर्ष के 365 दिन और उस देश में एक दिवस , उस देश की राजभाषा , राष्ट्रभाषा को समर्पित -जी हाँ , आप बिलकुल ठीक समझ रहे हैं और आज सुबह से समाचार माध्यमों तथा सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर तरह तरह के बधाई और शुभकामना सन्देश फिर से हिन्दुस्तानियों को याद दिलाने के लिए आए हैं कि -आज यानि 14 सितम्बर को -भारत हिंदी दिवस के रूप में मनाता है। इस मनाने को ठीक वही मनाना है जैसे कोई रूठा हुआ हो और उसे मनाना है और हम पिछले सत्तर सालों से उसे मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हिंदी है कि मानती नहीं।

हिंदी को भारतीय गणराज्य और कामकाज की आधिकारिक भाषा -यानि राजभाषा घोषित करने के विषय में नहीं पढ़ा तो सिर्फ इतना जान लीजिए कि , इसका तब इतना भारी विरोध किया गया था कि यदि हिंदी के पक्ष में वो एक मत अधिक नहीं दिया गया होता तो आज शायद भारत हिंदी नामक भाषा को राजभाषा का जामा पहना कर ये झुनझुना भी नहीं बजा रहा होता जो बजाया जा रहा है। इसे झुनझुना , टुनटुना बजाना न कहें तो क्या कहा जाए। संविधान में जो व्यवस्था सिर्फ शुरुआत के 10 साल के लिए एक विकल्प के रूप में रखी गई थी और संकल्प लिया गया था कि -अंग्रेजी के स्थान पर सामाज्य काम काज से लेकर , व्यवस्था शासन पुलिस सबकी आधिकारिक भाषा हिंदी ही होगी।

आज 70 वर्षों के बाद भी हिंदी की दशा और दिशा , सिर्फ उतनी ही संतोषजनक और ठीक है जितने से कि एक गरीब आदमी दिल को तसल्ली दे सके कि जो वो बोलेगा उसे कम से कम सड़क पर , गली , मोहल्ले परिवार समाज में सब समझ तो जाएंगे ही। लेकिन सिर्फ इन्हीं जगहों पर -बड़े दफ्तरों , होटलों , शिक्षा संस्थानों से लेकर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक हिंदी की छाती पर बैठी अंग्रेजी लगातार मूँग दल कर करोड़ों हिन्दुस्तानियों को मानो मुँह चिढ़ाती रहती है कि , हूँह्ह। अपनी भाषा तक को बोली ,कही ,लिखी नहीं जाती चले हैं -हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान करने।

और देखा जाए तो हिंदी की हालत भी कुछ कुछ इस देश के हिन्दू की तरह ही हो गई है , जिसे न अदालतों में न्याय मिलता है न ही शासन राजनीति की तरफ से कोई मान्यता , दोनों ही इतने गए गुजरे होकर रह गए हैं कि सरे आम दोनों की लिंचिंग , नोच खसोट चलती रहती है और सब मूक दर्शक बने देख रहे हैं , देखते चले आ रहे हैं। हिंदी और हिन्दू , दोनों के नाम पर तरह तरह के करतब किए जा रहे हैं वो भी दशकों से , लोगों को एक सर्कस दिखाया जा रहा है और ये भी कि , समय के साथ दोनों को अपना मान और स्थान मिल जाएगा। लेकिन ये होगा कैसे , करेगा कौन , मानेगा कौन -इन सब पर सब चुप्पी साध लेते हैं।

अदालतें ,जिन्हें अपने ऊपर ये नाज़ है कि उन्हीं की न्याय व्यवस्था और सही गलत के संतुलन को बनाए रखने के कारण ही इस देश में सब कुछ ठीक है मगर अफ़सोस की बात ये है कि उन्हें भी अपने आदेशों , निर्देशों से लोगों के बीच ये विशवास बनाने के लिए -एक विदेशी भाषा यानि अंग्रेजी पर भी निर्भर रहना श्रेयस्कर लगता है तभी तो शीर्ष अदालत एक नहीं अनेकों बार – न्यायालीय काम काज की भाषा को राजभाषा हिंदी में किए जाने की याचिका को सिरे से ही ठुकरा चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार के आने के बाद से जरूर ही इस दिशा में बहुत से सकारात्मक रुख देखने को मिल रहे हैं जिनमे पहला है खुद बड़े राजनयिकों और मंत्री अधिकारियों द्वारा -राजभाषा हिंदी का प्रयोग। पहले की सरकारें और उनके करता धर्ता तो -अंग्रेजी में लिखे पुर्जे को पढ़ कर ही अपने आपको धन्य समझते रहे थे। इधर कुछ समय में मोबाइल , इंटरनेट में हिंदी लिखने पढ़ने की सुविधा ने भी अंतरजाल पर हिंदी को प्रसारित तो किया ही है।

लेकिन जिस देश में दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी को , अपनी बोलचाल की भाषा को मान्यता दिलाने , मान स्थान दिलाने के लिए एक विशेष दिन की जरूरत पड़ती रहेगी समझिए कि तब तक सब कुछ ठीक नहीं है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

खुद को प्रकृति के करीब रखने की कोशिश होती है -बागवानी

 

पिछले दो वर्षों ने इंसान को मिले सबक में से एक सबसे बड़ा सबक ये भी रहा कि इस दुनिया में जो कुछ भी जैसा भी है वो असल में , वास्तव में बेहद खूबसूरत और पवित्र है।  कहीं कोई दोष या खोट नहीं।  और जिस जिस में ज़रा सी भी जो भी परेशानी , कठनाई , अच्छे बुरे बदलाव आए हैं उसका एक बड़ा कारण खुद इंसान ही रहा है।  

ग्राम से शहरों की और पलायनकारी नीति ने जहाँ गाँवों को अकाल मरने के लिए छोड़ा तो वहीँ पूरी आबादी शहरों में चीटीयों की बिल की तरह शहर और नगर बना कर रहने लगे।  प्रवृत्ति , लालच , उपभोग , सुविधा ने धीरे धीरे शहरों को इंसानों के रहने लायक जगह बना और बता दी।  मगर जब नींव की कृत्रिम हो तो आगे का कहना ही क्या ??

आज शहर  , गाँव से ही नहीं , मिट्टी , पौधे , पानी , हवा , वनस्पति , नदियाँ , पोखर , जंगल सबसे निरंतर दूर होते चले गए , लेकिन हाय रे इंसान।  पैसे दिल्ली और मुंबई में कमाता है करोड़ों मगर उसे खर्च करने के लिए बार बार भागता है पहाड़ों , नदियों , जंगलों के बीच और यही सबसे बड़ा सत्य है।  






शहरों में अब धीरे धीरे इन पेड़ पत्तों के प्रति लोगों का बढ़ता मोह अच्छा लगता है।  असल में जिस तरह से आज शहरों की दिनचर्या में बड़े से लेकर छोटे बच्चे तक पर मानसिक दबाव की काली छाया पड़ी हुई है उसे दूर करने में बागवानी जैसी आदत एक करिश्मा साबित होती है।  पौधे फूल फल सब दोस्त की तरह हो जाते हैं जिनके पास जाते है उनके एहसास मात्र से सुकून और सुख सा एहसास होता है।  कहते हैं पौधों की सेवा यानि बागवानी इंसान के तनाव को दूर करने का सबसे बेहतर ज़रिया होता है।  









एक बात और , सेना के जवानों में मृदुलता और संवेदनाओं को संजोए रखने के लिए और खूंखार अपराधियों तक का हृदयपरिवर्तन के लिए -बागवानी  को ही सर्वोत्तम कार्य के रूप में विश्व भर में मान्यता मिली हुई है।  सच ही है कि फूल पत्तों के रंग और खुशबू किसका मन नहीं बदल सकते।  


आप भी बागवानी शुरू करें और देखें की कितने खूबसूरत बदलाव आप अपने अंदर ही महसूर कर सकेंगे ?? तब तक मेरी छत पर बनी छोटी सी बगिया में खिलते मिलते नन्हें मेहमानों से मिलिए 








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