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रविवार, 11 जनवरी 2015

पीके ...अब क्यों बैठे हो मुंह सीके


पिछले साल से इस नए साल तक यदि कोई विवाद घिसटता चला आ रहा है तो उसमें से नि:संदेह एक हाल ही में प्रदर्शित सिनेमा पीके भी है । हालांकि इस सिनेमा के विषय या इसके प्रदर्शन से पहले भी इसके साथ विवाद तो तभी शुरू हो गया था जब इसका पहला पोस्टर जारी किया गया था जिसमें अभिनेता आमिर खान रेल की पटरी पर बिल्कुल नग्न खडे थे । हमेशा की तरह अपने नए प्रयोगों और नई सोच को सामने लाने के लिए विख्यात अभिनेता आमिर खान के इस पोस्टर के बाद सब अंदाज़ा लगाने लगे थे कि कुछ न कुछ नया ही परोसा जाने वाला है किंतु कहीं से भी किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि एक बार फ़िर से धर्म या कहा जाए कि धर्म के भीतर फ़ैले पाखंड और आडंबर को निशाने पे लिया जाएगा । किंतु हमेशा की तरह से फ़िर से आसान टार्गेट चुनते हुए बडी ही चतुराई से पूरी फ़िल्म में अधिकांशतया हिंदू धर्म , धर्म स्थल , हिंदू ईश एवं हिंदू धर्मगुरू को ही विषय बना कर उसके इर्द गिर्द सारा फ़िल्मी मसाला बुन कर परोस दिया गया , परिणाम ये कि आशा के अनुरूप फ़िल्म के कथानक , दृश्यांकन , डायलॉग आदि विवादित हुए और फ़िल्म ने सिने इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली , लगभग सवा तीन सौ करोड , फ़िल्म का रिकार्ड बना लिया ।

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इस पोस्ट के लिखे जाने तक यूं तो इस फ़िल्म से जुडे सारे विवाद पार्श्व में जा चुके हैं और इसी बीच बदले हुए घटनाक्रम पर पूरे विश्व और भारत सहित पूरे समाज की नज़रें जा चुकी हैं , आस्ट्रेलिया से लेकर फ़्रांस तक पर मज़हब , इस्लामिक राज़्य और ज़िहाद के नाम आतंक का नंगा नाच किया जा रहा है । निर्दोष मगर निर्भीक लोगों , पत्रकारों , संपादकों तक की हत्या करके दशहत फ़ैलाने और अंजाम भुगतने का संदेश दिया जा रहा है अलग अलग आतंकी गुटों द्वारा , और स्थिति ये है कि कहीं भी किसी के मुंह से इसकी भर्त्सना तो दूर उलटे खुल्लम खुल्ला ऐसे आतंकियों को ईनाम देने और उन्हें इस घिनौनी करतूत के लिए शाबासी तक देने को आतुर हैं । खैर , दोबारा लौटते हैं फ़िल्म पीके की ओर ..
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सवाल ये नहीं है कि धर्म और धर्म के नाम पर फ़ैले पाखंड और आडंबर को यदि सिने कलाकार अपने निशाने पर नहीं लेंगे उनपर चोट नहीं करेंगे तो फ़िर क्या आम आदमी करेगा , तो नि:संदेह ये उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी । और  ये किया भी जाता रहा है ,कुछ समय पूर्व एक ऐसी ही फ़िल्म ओ माय गॉड भी प्रदर्शित की गई थी जिसमें बडे ही तर्कपूर्ण तरीके से धर्म के नाम पर धर्मगुरूओं द्वारा फ़ैलाए गए माया जाल को निशाने पर लिया गया था । किंतु एक दर्शक के रूप में जो बातें इस फ़िल्म में किसी भी दर्शक इत्तेफ़ाकन अगर वो हिंदू धर्म का अनुयायी हो और संयोगवश आस्तिक भी है तो उसे जो नागवार गुज़री होंगी वो नि:संदेह यही रही होंगी ।
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पहला , सिनेमा का ठीक ऐसे समय में प्रदर्शन जब भारतीय जनमानस धीरे धीरे संगठित होकर हिंदुस्तानी मर्म और हिंदू धर्म पर केंद्रित हो रहा था/है । इसका प्रमाण बहुत समय बाद भारतीय जनता पार्टी का इतने बडे बहुमत से शासन में आना , देश से लेकर प्रदेश तक लोगों की सामाजिक , राजनीतिक और धार्मिक सोच प्रबल रूप से हिंदुत्व के पुरातन गौरव के प्रति रुझान , ऐसे समय में यदि अनावश्यक रूप से उनके ईश और मान्यताओं का ऐसा उपहास सिर्फ़ व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाएगा तो ये आमंत्रित विवाद की तरह था । केंद्र में अभिनेता आमिर खान , इत्तेफ़ाकन मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित थे , कथानक में प्रेमी जोडे में युवक पाकिस्तान का और युवती भारत की , क्या मुसलमान धोखेबाज होते हैं , लोग मूते नहीं इसलिए भगवान की फ़ोटो लगा देते हैं जैसे संवाद आदि इतने सारे तथ्यों को यदि संयोग भी मान लिया जाए तो फ़िर ये निंसंदेह घातक संयोग था । आखिरी और सबसे अहम बात जिसका ज़िक्र बार बार इस विवाद में हुआ कि क्या जितनी आसानी से हिंदू धर्म , धार्मिक स्थलों , हिंदू ईश , और हिंदू धर्म गुरुओं को निशाने पर लिया जाता है क्या वही हिम्मत किसी अन्य धर्म विशेषकर मुस्लिम मज़हब के लिए दिखाई जा सकती है ...विश्व आज इस्लामिक कट्टरपंथ से उपजे आतंकवाद का दंश झेल रहा है और इन सारे प्रश्नों का उत्तर पा रहा है ।


अंत में सिर्फ़ यही कहने का मन है कि ,



सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे अब कहां हो बे पीके ,
दडबों से निकलो न ,बनाओ कुछ कठमुल्लों पे सिनेमा फ़िर दिखाओ जी के ..
सोच रहा हूं कि अब आवाज़ दूं जोर से और पूछूं , अबे, अब कहां हो बे पीके ,
धर्म नहीं मज़हब के नाम पर जब हुआ नंगा नाच , बैठ गए न मुंह सी के ..

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

अब या तो निपटाइए , या निपट ही जाइए ..झा जी कहिन






कल के मुंबई बम धमाकों के बाद सिर्फ़ दो बातें दिमाग में घूम रही हैं , पहली ये कि , तो क्या अब दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले हमारे जैसों को ऐसे ही किसी आतंकी हमले में मरने या किसी अपने के मर जाने की खबर सुनने की आदत डाल लेनी चाहिए ..और दूसरा ये कि ....सरकार की सारी बकवास , आतंकवादी घटनाओं से परे जाकर बस इतना कहने का मन है ...या तो निपटाइए ....या अब खुद ही निपट जाइए ..बस अब बहुत हुआ।


मैंने अभी अपनी इस पोस्ट में ये संभावना जताई थी कि अभी जिस तरह के हालात हैं और आसपास यानि पाकिस्तान , बांग्लादेश , और चीन जैसे देशों की जो मंशा भारत के प्रति है उसमें ये बहुत कुछ अपेक्षित सा ही था कि देर सवेर भारत को ये दंश झेलना ही था , बल्कि कहा जाए कि ये तो एक शुरूआत भर है तो शायद ये गलत नहीं होगा । ये भी अब देश के महानगरों की एक नियति सी बनती जा रही है कि उन्हें , देश के सबसे विकसित शहरों में रहने का खामियाजा ऐसे भुगतने के लिए अभिशप्त होना पड रहा है । इन बम धमाकों से पहले और इसके बाद कुछ भी ऐसा अलग या अनोखा नहीं होगा जो कि अब तक न हुआ हो । सरकार द्वारा इसकी भर्तस्ना , अपने तमाम आका टाईप के दोस्त देशों के आगे जा जाकर बताना कि , देखो हमें तो फ़िर मारा । कुछ अलग करना हो तो सामने ही अमेरिका का उदाहरण है , जिसने बिना किसी कानून , बिना किसी सीमा की परवाह करते हुए आतंकी ओसामा बिन लादेन को उसीके बिल में जा कर मारा । न सिर्फ़ उसे मारा बल्कि अब ऐसे समाचार आ रहे हैं कि पाकिस्तान की आर्थिक सहायता में भी भारी कटौती की गई है ।


पडोसी देश पाकिस्तान , आज विश्व में आतंकियों , स्मगलरों , अंतरराष्ट्रीय अपराधों का गढ माना जाता है । और बार बार इसके पुख्ता प्रमाण मिलते रहने के कारण इसमें कोई संदेह भी नहीं है । तो ऐसे में जब भारत एक ऐसे देश का पडोसी है , न सिर्फ़ पडोसी बल्कि उसका दुश्मन नंबर एक है ( लाख क्रिकेट की कूटनीति हो या संगीत, सिनेमा के जुडे हुए तार , और चाहे भारत माने न माने लेकिन ये हकीकत है कि आज भी पाकिस्तान भारत को इसी रूप में देखता है) ,तो क्या ये स्वाभाविक नहीं है कि आने वाले समय में इन आतंकी घटनाओं के और भी बढने के आसार हैं । देश की तमाम सुरक्षा संस्थाएं , एजेसियां और पुलिस को अब अगले बहुत समय तक अपने उच्चतम सुरक्षा मोड में रहना चाहिए , लेकिन अफ़सोस कि आज देश के राजनीतिज्ञों को घपलों घोटालों में पैसा बटोरने से ही फ़ुर्सत नहीं है । जिस तरह से कसाब , अफ़ज़ल जैसे आतंकियों को पाल पोस कर न्याय दिलवाने के नाम पर रखा जा रहा है और पिछले तमाम आतंकी घटनाओं में एक भी नेता और और उनके नाते रिश्तेदारों के बाल भी बांका नहीं होने के कारण मन में संदेह होता है कि कहीं ये आपसी सांठगांठ तो नहीं कि , तुम हमें बचा के रखो, हम तुम्हें बचाए रखेंगे ।


इन घटनाओं पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने कहा कि , बहुत बडी गलती हुई थी उस दिन संसद पर हमले को नाकाम करने में हमारे सैनिकों ने अपनी जान देकर इन राजनीतिज्ञों को बचाया जो ऐसे आतंकी हमलों पर ओछे बयान की राजनीति करते हैं । काश कि उस दिन एक आध भी निपट लिया होता तो जरूर ये नौबत शायद उतनी जल्दी जल्दी नहीं आती जितनी कि आ रही है । आने वाला समय इस लिहाज़ से बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और नाज़ुक होगा , क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता जहां बढने के आसार हैं वहीं आने वाले कुछ महीने भारत में त्यौहारों और पर्व का मौसम होता है , ज़ाहिर है कि आतंकियों के लिए ये एक और मौका होगा । सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर कब तक ? 
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