
आज पहले बात उन मुद्दों की जो पिछले दिनों छाए रहे , जिनमें सबसे पहला रहा ब्लोग्गर्स को पुरस्कार दिए जाने को लेकर उठा विवाद । विवाद इस बात के लिए नहीं था कि ब्लोग्गर्स को पुरस्कार दिया जा रहा है बल्कि किन्हें और किस आधार पर दिया जा रहा है । हालांकि यही बात पहले भी उठी थी जब श्री अलबेला खत्री जी ने ऐसी ही एक कोशिश की थी और थक हार कर उन्हें भी ये योजना टालनी पडी ।अब जो कुछ लखनऊ ब्लोग्गर्स ऐसोसिएशन और जाकिर भाई के विशेष प्रयासों द्वारा वर्ष २००९ के लिए पुरस्कार दिए जाने के लिए घोषणाएं की जा रही हैं , उन्हें भी विवाद में घिरता देख रहा हूं । यहां पोस्ट के माध्यम से इस बात को उठाने के दो अहम कारण तो थे ही मेरे पास , पहला ये कि जब जाकिर भाई ने सबसे पहले पुरस्कारों की घोषणा की तो उसमें उठे विवाद में कुछ पाठकों ने अपना मत रखते हुए वहां टिप्पणी करके बधाई करने वालों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया कि क्या सिर्फ़ चुपचाप बधाई दे कर निकल जाने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है । किसी भी बात में बहस विमर्श में कूद पडने वाले हम सभी ब्लोगगर्स की क्या ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि इस मुद्दे पर खुल कर सभी अपना मत विमत रखते ? दूसरा और ज्यादा जरूरी कारण ये रहा कि यदि इस तरह से ही हर प्रोत्साहन /पुरस्कार ..जैसी योजनाओं और पहल को हम कटघरे में खडा करते रहेंगे तो फ़िर तो इस लिहाज़ से तो हम सबको ये घोषित कर देना चाहिए कि जो भी ब्लोग्गर्स को प्रोत्साहित करन के लिए ऐसी किसी नई योजना को मूर्त रूप देने की सोच रहे हैं , वे ऐसा सिर्फ़ अपने रिस्क पर करें ।
इस मुद्दे पर मेरी समझ से दो बातें मुख्य रूप से उठ कर सामने आई हैं । पहली ये कि ब्लोग्गिंग जगत में पुरस्कारों को लेने देने का औचित्य क्या है ? दूसरा ये कि जिस तरह से भाई खुशदीप सहगल ने दोनों ही बार पुरस्कार लेने से मना कर दिया , उसके निहितार्थ क्या हैं ?? इस विषय पर जो मेरा सोचना है वो आपके सामने रख रहा हूं ताकि इसी बहाने आपकी राय जान सकूं । ब्लोग्गिंग में पुरस्कार देने के औचित्य की जहां तक बात है तो मेरा मानना है कि क्षेत्र चाहे कोई भी हो प्रोत्साहन ..जरूरी भी है और प्रशंसनीय है । मगर जहां तक इन पुरस्कारों के वितरण , उनके चयन , निर्धारण की बात है तो उसमें बहस की पर्याप्त गुंजाईश है । मेरे विचार से इन पुरस्कारों को देने वाले कोई एक ब्लोग्गर या ब्लोग्गर्स की संस्था , खुद उनकी छवि , नामित ब्लोग्गर्स की सूची और उनके चयन में पूर्ण पारदर्शिता का ख्याल , विशेषकर किसी भी अपेक्षित विवाद को भांपते हुए उसे यथासंभव उपेक्षित रखने का प्रयास आदि जैसी बातों पर बहुत ध्यान रखा जाना बहुत आवश्यक था । अब यदि उदाहरण के लिए जिस पुरस्कार को सबसे पहले घोषित किया गया यदि उस पुरस्कार को कुछ अन्य कैटेगरी के पुरस्कारों के बाद घोषित किया जाता , या फ़िर सबसे बाद में किया जाता तो हंगामा उतना नहीं होता जितना इन पुरस्कारों की ओपनिंग में ही हो गया । क्योंकि सलीम खान जी के नाम पर विवाद का होना .शायद संभावित तो था ही । मगर आज फ़िर जो विवाद उठता हुआ देख रहा हूं उसने तो फ़िर से मुझे काफ़ी कुछ सोचने पर विवश कर दिया है । जहां तक बात है खुशदीप भाई द्वारा अनुग्रहपूर्वक इसे लेने से मना किए जाने की । तो इसमें कोई शक नहीं कि यहां मिलने वाले नियमित पाठक और उनकी सराहना/अलोचना ही सबसे बडा पुरस्कार है , मगर चूंकि ये पुरस्कार पिछले वर्ष किए गए लेखन के लिए था तो नि:संदेह इसके लिए उनसे बढिया दूसरा कोई और नाम नहीं हो सकता था । और एक पल को मान भी लूं कि उन्हें पुरस्कार से कोई रुचि नहीं थी तो आखिर था ही कौन सा परमवीर चक्र , एक ई प्रमाण पत्र और एक हजार नकद, यहां एक बात कहनी जरूरी लगी कि यदि इन पुरस्कारों से नकद भुगतान वाला प्रावधान हटा दिया जाए तो शायद इन पुरस्कारों पर उठता विवाद का साया थोडा सा हट तो जाएगा ही ,तो उन्हें पुरस्कार को लेने से यूं मना नहीं करना चाहिए था , हालांकि इसके लिए उनके पास अपने अकाट्य तर्क हैं जिनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता , मगर अपने हीरो को हर कोई जीतना देखना चाहता है और हम तो पब्लिक हैं जी , खैर खुशदीप भाई खुशदीप भाई हैं , और हमेशा ही खुशदीप भाई रहेंगे , देखते हैं कब तक हमारे प्यार और पुरस्कार को मना करेंगे । और हां चयन प्रणाली को भी विस्तार से बताते , जैसा कि पिछले वर्ष के अंत में श्री रविन्द्र प्रभात जी ने सफ़लता पूर्वक ब्लोग्गिंग के बहुत से श्रेणियों में बहुत से नाम सामने रखे , मगर कहीं कोई विवाद नहीं रहा ।
जो भी हो , इन पुरस्कारों के नाम पर उठते सवालों ने ब्लोग्गिंग का एक और विरोधाभासी रूप सामने रख दिया है । अभी तो ये एक शुरूआत है और यदि इन मसलों पर अभी ही खूब मंथन न किया गया तो भविष्य में ये ज्यादा कष्टकारी होंगी । मुझे उम्मीद है कि आप अपनी राय से अवगत कराएंगे बिना किसी पूर्वाग्रह के .....
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असल में इस ब्लॉग जगत के बारे में मैं जो समझ रहा हूँ-- यहाँ --कर्म किये जा फल की चिंता मत कर रे इंसान-- वाली बात नहीं है,यहाँ सभी केवल और केवल वाह-वाह के अभिलाषी हैं,जहाँ कामना होगी निश्चित वहाँ कष्ट होगा ही.
डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:03 अपराह्न
अजय भाई सौ फीसदी सहमत -
Arvind Mishra ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:22 अपराह्न
nice
Suman ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:25 अपराह्न
आपने विस्तार से और बारीकी से काम कर दिया है ,,,,,,इस पर मेरी टिप्पणी वैसे तो कोई मायने नहीं रखती लेकिन मैं यह प्रकटाने के लिए टिपिया रहा हूँकि मुझे आपका आलेख पसन्द आया ........
AlbelaKhatri.com ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:26 अपराह्न
अभी ऐसे सम्मान आयोजित करने के लिए उपयुक्त समय नहीं आया है । न ही प्रयाप्त साधन जुटाए गए हैं।
अत : बचा जाये तो बेहतर है।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:48 अपराह्न
इस ब्लागिंग की दुनिया में जो भी हैं - लेखन-कर्म से जुड़े हैं। प्रायः अपनी वैयक्तिक अनूभूति की निर्वैयक्तिक प्रस्तुति के लिए। बिना विवाद में गए, लेखन-कर्म के अतिरिक्त और पवित्र उद्येश्य क्या हो सकता? जो अच्छा लिखते हैं, प्रशंसा - सम्मान के स्वतः भागीदार बन जाते हैं। उन्हें प्रोत्साहन मिलना भी चाहिए।
यदि किसी संस्था - समूह या व्यक्तिगत तौर पर किसी को किसी क्षेत्र में लेखन के लिए बिना "प्रयास" के सम्मान या प्रोत्साहन, किसी भी रूप में मिलता है, तो उसका स्वागत है।
किसी अच्छी और नयी परम्परा का स्वागत किया भी जाना चाहिए। अन्त में कहना चाहता हूँ कि-
रोज मैं गीत नया गाता हूँ
सोने वालों को जगाता हूँ
आँधियाँ आतीं जातीं रहतीं हैं
दीप को दीप से जलाता हूँ।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
श्यामल सुमन ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:55 अपराह्न
मैं अपने खुशदीप भैया को हमेशा जीतते ही देखना चाहता हूँ.....
आपसे सहमत हूँ .......
महफूज़ अली ने कहा…
15 फरवरी 2010 9:57 अपराह्न
विवाद खड़े होने का एकमात्र कारण,
जो मुझे नज़र आया -
आयोजन और चयन प्रणाली का त्रुटिपूर्ण होना!
--
कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "वसंत फिर आता है - मेरे लिए,
नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
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संपादक : सरस पायस
रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…
15 फरवरी 2010 10:27 अपराह्न
डॉ. दराल की टिप्पणी एकदम सटीक है!
रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…
15 फरवरी 2010 10:28 अपराह्न
मेरे हिसाब से तो कोई भी पुरस्कार चाहे वो छोटा हो या बड़ा हो...उसके मिलने से या हमारे काम की तारीफ़ होने से हम में और अच्छा करने के लिए हौंसला और हिम्मत दोनों बढती हैं...इसलिए पुरस्कार दिए और लिए जाते रहने चाहिए...
हाँ!...लेकिन पुरस्कार पाने वालों को चुनने और उन्हें देने वालों की नीयत में पारदर्शिता ज़रूर होनी चाहिए
राजीव तनेजा ने कहा…
15 फरवरी 2010 11:10 अपराह्न
भाई अजय जी ब्लोग जगत इतना बहु आयामी है कि इस तरीके से जो भी पुरुस्कार क्वे लायक चुना जायेगा विवादित होने की पूरी सम्भावना है और ऐसा हर प्रयास नयी गुटवाजी को जन्म देगा. अच्छा तो ये है कि जो लोग यहा इनाम देना ही चाह्ते है वो तथ्य परक लेखन के लिये बिषय दे अपनी पसन्द के और फिर उसमे जो भी उन्हे अच्छा लगे उसे इनाम दे, वोटिन्ग या निर्णायक मन्डल वाली बात चलेगी नही.
जोधपुर मे हुए ब्लोगर मिलन की सिलसिलेवार रिपोर्ट हाजिर है --------
http://hariprasadsharma.blogspot.com/2010/02/blog-post_14.html
HARI SHARMA ने कहा…
15 फरवरी 2010 11:30 अपराह्न
पुरुस्कार, सम्मान, प्रोत्साहन का ही स्वरुप हैं और उसके लेने देन पर आपत्ति नहीं होना चाहिये और जहाँ तक समय का प्रश्न है तो हिन्दी ब्लॉगिंग अभी भी शैशव अवस्था में ही है, अतः अभी ही इसकी दरकार ज्यादा है.
थोड़ी पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया की आम सूचना, एवं स्पष्ट मापदण्ड होना जरुरी है किन्तु विवादों का तो होना रोका नहीं जा सकता और उनसे मात्र सीख लेने की आवश्यक्ता है, विचलित होने की नहीं.
पहले भी सम्मान हुए हैं, विवाद भी हुए. क्या फरक पड़ता है. क्या इस वजह से प्रोत्साहन देना बन्द कर दिया जाना चाहिये.
मेरे मत में, इसे जारी रखना चाहिये और तनिक सजगता के साथ चयन करें.
शायद जाकिर जी पूरी ही लिस्ट एक साथ घोषित कर देते तो जो कुछ होना जाना था, एक ही बार में धाँय धाँय होकर रोज रोज का टंटा न रहता और कहीं कमी, कही की बेहतरी से बराबर होने की गुंजाईश भी बढ़ जाती.
Udan Tashtari ने कहा…
15 फरवरी 2010 11:52 अपराह्न
इस विशेष 'पुरस्कार वितरण' के लिए प्रश्न उठाना आवश्यक इसलिए हुआ कि ...(खुशदीप जी निर्विवाद रूप से विजयी हैं) दूसरे प्रतिभागी को विजेता घोषित करना तर्कसंगत नहीं लगा...
'हृदय परिवर्तन' जैसी खोखली दलील ..बेमाने है...यह हिंदी साहित्य का पुरस्कार है...तो हिंदी साहित्य में योगदान की बात होनी चाहिए...वो भी ऐसा साहित्य जो सही मायने में सामजिक समस्याओं को दर्शाता हो...जो ठोस बातेंकरता हो...न कि हवा-हवाई बातें करता हो....इसे पढ़ कर बदल जाने को दिल करता हो...ये मैं सोचती हूँ...ज़रूरी नहीं कि दूसरे भी ऐसा ही सोचें...
दाराल साहब ने सही कहा है...अभी हम उतने परिपक्व नहीं है इस तरह के पुरस्कारों के लिए...सोच समझ कर कदम उठाना चाहिए...वर्ना एक नियम बन जाएगा और तोड़ना कठिन होगा...
अच्छा आलेख...
'अदा' ने कहा…
15 फरवरी 2010 11:56 अपराह्न
हम भी डॉ टी एस दराल जी की बात से सहमत है १००%
nice nice nice
राज भाटिय़ा ने कहा…
16 फरवरी 2010 12:11 पूर्वाह्न
अजय भाई, खुशदीप जी को अवार्ड मिलने पर शायद ही किसी ब्लागर ने आपत्ति दिखाई हो। जिस तरह अवार्ड देने वाली संस्था-समूह को निर्णय लेने का हक है, उसी तरह दूसरों को अपनी राय रखने का भी हक है, और किसी की राय से इत्तफ़ाक रखना या न रखना एक व्यक्तिगत मुद्दा है यह बात हमें समझनी चाहिये। Let us agree to disagree.
मो सम कौन ? ने कहा…
16 फरवरी 2010 12:45 पूर्वाह्न
झा जी,
पहली बात तो मैंने कोई तीर नहीं मारा...और जानते हैं कि मुझे दो बार मुझे पुरस्कार भी मिल चुका है...उससे बड़ा पुरस्कार मैं किसी और चीज़ को नहीं मानता...और उस पुरस्कार के सूत्रधार भी झा जी आप रहे हैं...15 नवंबर 2009 और 7 फरवरी 2010 को सभी ब्लॉगर साथियों के साथ ठहाके लगाते हुए दिन गुज़ारना...एक दूसरे को गले लगाना...झा जी आप खुद ही बताइए कि उस पुरस्कार की बराबरी कुछ और कर सकता है...अगर कर सकता है तो जो कहेंगे मैं वो पुरस्कार लेने के लिए तैयार हूं...
जय हिंद...
खुशदीप सहगल ने कहा…
16 फरवरी 2010 1:03 पूर्वाह्न
ham yaha blog likhne aayen hain ya in sab muddopar ulajhne ke liye, ye mujhe samajh me nahi aata...
Sanjeet Tripathi ने कहा…
16 फरवरी 2010 1:25 पूर्वाह्न
जब तक पेड शैशवास्था मे होता है उसे माली और खाद पानी (प्रोत्साहन) की जरुरत होती है. पेड जब खुद के बूते खडा होजाता है तब वो दूसरो को आश्रय दे सकता है.
पर ब्लागर नाम का पेड...क्या छोटा क्या बडा? सब घोटमघोट...लगाये जावो.
रामराम.
ताऊ रामपुरिया ने कहा…
16 फरवरी 2010 9:51 पूर्वाह्न
अजय जी अब तो कहीं टिप्पणी करते हुये भी डर लगता है।किसी चिट्ठा चर्चा पर टिप्पणी कर बैठी तो लोग लठ ले कर ही पीछे पड गये अब हम ने भी नाईस कहना सीख लिया है। बस बखेदा खदा करने से अच्छा है चुप लगा लो। शुभकामनायें
निर्मला कपिला ने कहा…
16 फरवरी 2010 11:08 पूर्वाह्न
अपनी टिप्पणी में यह कहना चाहता हूँ कि जाकिर अली रजनीश ने पुरस्कार के स्थान पर प्रमाणपत्र देकर अच्छा काम किया है। लेकिन टिप्पणी में जिन्होंने इनसे कुछ जानना चाहा है। उनको उत्तर इन्होंने बहुत ही बेरुखी से दिये हें।
हम तो अपेक्षा कर रहे थे कि कोमल शब्दों से खेलने वाला बालसाहित्यकार कोमलता, विनम्रता और सरलता से पाठकों की शंकाओं का समाधान करेगा!
बाकी हमें क्या?
उन्ही के पुरस्कार हैं और बाँटने वाले भी वे सर्वे लर्वा है। जिसे उनक् मन करे दें या न दें!
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
16 फरवरी 2010 11:15 पूर्वाह्न
हमें तो यह देख प्रसन्नता (?) हुई की जो लोग सलीम खान के ब्लॉग को पढ़ना ही सही नहीं समझते थे वे ही वहाँ बधाई दे रहे थे. धन्य है ब्लॉग जगत. इसकी महिमा अपार.
संजय बेंगाणी ने कहा…
16 फरवरी 2010 11:34 पूर्वाह्न
जब बच्चा उंगली पकड़ कर चलना सीखता है, तभी उसे प्रोत्साहन की जरूरत होती है। मेरी समझ से हिन्दी ब्लॉगिंग भी अभी उसी अवस्था में है। पता नहीं किन क्षणों में यह विचार मन में आया। साथियों से बात की और बढता चला गया। कारण, सभी ने इसे प्रोत्साहित किया। प्रारम्भ में सिर्फ ई-प्रमाण पत्र का विचार था, फिर सम्मान राशि का भी प्राविधान हो गया और प्रायोजक भी मिल गये। सच कहूं, सब कुछ अपने आप होता चला गया।
चूंकि यह विचार मेरे मन में जन्मा था, इसलिए मैंने हर सम्भव कोशिश करके, इसे यथासम्भव और यथाशक्ति पारदर्शी बनाने की कोशिश की है। पिछले दो महीनों से इसके लिए कितना श्रम किया गया है, यह बताया नहीं जा सकता। दिन का चैन और रातों की नींद भी इसमें लगी है। यहां तक कि मेरी पी0एच0डी0, जोकि चौथे साल में चल रही है और आगे समय बढ़ना भी मुकिश्ल है, को भी मैंने पीछे छोड़ दिया है। लेकिन इसके बावजूद लोग आते हैं और 'धिक्कार' कर निकल जाते हैं। ऐसे में खीझ का उठना स्वाभाविक है। (अगर शास्त्री जी या अन्य किसी को ऐसे में कोई बात बुरी लगी हो, तो उसके लिए माफी चहूंगा)
एक बार तो मुझे भी लगा कि अलबेला जी की तरह इसे भी भाड़ में झोंक दिया जाए, लेकिन फिर मन में ख्याल आया कि नहीं, जब शुरू हुआ है, तो इसे समापन तक भी ले जाना है। लोगों का क्या है, वे तो कुछ न कुछ कहेंगें। क्योंकि दुनिया में सभी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। और जहाँ तक पूर्वाग्रहों की बात है, वह कौन छोड़ पाया है? इसके चक्कर में लोग पत्नि, पति, बच्चे, माँ-बाप तक को छोड देते हैं, फिर ये तो ब्लॉग जगत है। ऐसे में विवाद के छींटे तो उठते ही रहेंगे।
और हाँ, कुछ करने की तुलना में किसी चीज में कमियां निकालना बेहद आसान होता है।
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…
16 फरवरी 2010 11:51 पूर्वाह्न
अजय जी के विचार सुन्दर और सारगर्भित है ,विस्तार से और बारीकी से अपनी बात रखी है, अच्छा लगा . वैसे जो समीर जी ने कहा है,कि"थोड़ी पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया की आम सूचना, एवं स्पष्ट मापदण्ड होना जरुरी है किन्तु विवादों का तो होना रोका नहीं जा सकता और उनसे मात्र सीख लेने की आवश्यक्ता है, विचलित होने की नहीं."इस पर भी हिन्दी ब्लोगर्स को गौर करना चाहिए !
रवीन्द्र प्रभात ने कहा…
16 फरवरी 2010 4:27 अपराह्न
इतना कहूँगा कि ब्लागजगत में पुरस्कार के स्थान पर सम्मान की परंपरा आरंभ की जाए।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
16 फरवरी 2010 7:38 अपराह्न
आप सबने अपनी अपनी बेबाक राय इस मुद्दे पर रख कर ब्लोगजगत को बहुत कुछ संदेश दे दिया है , आशा है कि भविष्य में हम इन बातों को ध्यान में रखते हुए और ऐसी बातों से सबक सीखते हुए हिंदी ब्लोग्गिंग को आगे की तरफ़ ले जाएंगे ।आपके विचारों के लिए बहुत बहुत आभारी हूं ।
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
16 फरवरी 2010 10:56 अपराह्न
तो यहां भी गंध मचना शुरु हो गया।..हद है।..इसे तो कम से कम हिन्दी समाज की लीद न बनाए प्रभु।..
विनीत कुमार ने कहा…
16 फरवरी 2010 11:26 अपराह्न
क्या रखा है पुरूस्कारों की मनाही में, लो, खाओ-पिओ और आगे चलो (शर्त ये है कि कैश मिले)
:)
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
17 फरवरी 2010 8:44 पूर्वाह्न
अजय जी नमस्कार... माया तू महाठगिनी मैं जानूं..फिर भी ठगा जाउं अभी ऐसे सम्मान आयोजित करने के लिए उपयुक्त समय नहीं आया है इन सबसे बचा जाये तो बेहतर है
ajay saxena ने कहा…
18 फरवरी 2010 12:24 अपराह्न