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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

दिल्ली ब्लोग बैठक ( सिलसिलेवार रपट -४)



डा. टी.एस.दराल जी ने अपनी ब्लोग्गिंग की शुरूआत का किस्सा जो बताया वो उन्होंने आज अपनी पोस्ट में भी बता ही दिया है कि किस तरह प्रसिद्ध हास्य कवि अशोक चक्रधर जी के एक समारोह में अविनाश भाई और कुछ अन्य ब्लोग्गर्स के ब्लोग पाठ होने पर उन्होंने वहां सबसे हिंदी ब्लोग लिखने का आग्रह किया था । उन्होंने बताया कि सभी के मन में कुछ न कुछ मंथन चलता ही रहता है और मन के अंदर चल रहे मंथन को बाहर निकालने का माध्यम ब्लोग से बेहतर और क्या होता सो उनके ब्लोग का नाम है अंतर्मंथन । यहां एक दिलचस्प बात बताता चलूं कि डा. साहब ने कहा कि जब मैं झाजी के बिहारी शैली वाली पोस्टों को पढता तो मन में एक धारणा सी बनी हुई थी कि जब बात होगी तो शायद उसी लहज़े में मगर जब फ़ोन पर बात हुई तो कहीं से भी वो पुट न मिलने पर उन्हें आश्चर्य हुआ । इस बात पर खुशदीप भाई ने सारी पोल खोलते हुए कह दिया कि आप किसी मुगालते में न रहें झा जी न सिर्फ़ बहुत सी भाषाएं जानते हैं बल्कि बोलते समझते भी हैं । और मुझे भी बताना पडा कि पिताजी की फ़ौज में नौकरी होने के कारण मैं बहुत से राज्यों में रहा और घूमा हूं इसलिए ये स्वाभाविक ही है ।

इसके बाद सतीश सक्सेना जी ने अपना परिचय एक जानदार वाक्य से दिया कि मैं एक ईमानदार आम इंसान हूं जो हर जगह सिर्फ़ ईमानदार रहने की कोशिश करता है । और ऐसा ही लेखनी में भी रहने की कोशिश करता हूं । उन्होंने स्पष्ट बताया कि वे ब्लोग्गिंग में काफ़ी समय से रहने के बावजूद किसी ब्लोग बैठक में पहली बार शामिल हो रहे हैं और ये मेरे लिए तथा हम सभी ब्लोग्गर्स के लिए बहुत फ़ख्र की बात थी । सतीश जी ने भी मुझे लपेट ही लिया और ईशारे ईशारे में वो पूछ ही लिया कि आपके नाम के साथ पिछले दिनों एक अनाम कैरेक्टर का नाम जुडा था , तो असलियत क्या है । यही बात पिछली ब्लोग्गर्स बैठक में भी उठी थी । मुझे उन्हें विस्तार से सारा किस्सा बताना पडा ( जो मैं आपको इस रिपोर्ट की आखिरी किस्त , ब्लोग बैठक के कुछ रोचक पल , में बताऊंगा ) इसके बाद सतीश जी ने भी अपने ब्लोग्गिंग के अनुभव और कठिनाईयां सबके सामने रखीं । लखनऊ से चल कर दिल्ली पहुंचे श्री अनवर जमाल जी अपनी बात रखते हुए बताया कि किस तरह एक नए ब्लोग्गर को तकनीक संबंधी जानकारियों के अभाव में कैसी कैसी मुश्किलों का सामना करना पडता है । उन्होंने कहा कि उन्हें तो शुरू शुरू में टिप्पणी करने में भी बहुत कठिनाई होती थी और बहुत सी बातों का पता नहीं था । बस इसके बाद चर्चा सामूहिक हो चली और एक एक करके बहुत सारे बिंदुओं , जिनमें तकनीक की जानकारी , अनामी बेनामी , टिप्पणियों का मनोविज्ञान , ब्लोग्गिंग में चल रही तथाकथित गुटबाजी आदि जैसी और भी बहुत सी बातों पर जिन्हें मैं आपको विस्तार से अगली पोस्ट में बताऊंगा ।

आज कुछ और लिखने से पहले मैं आपको एक जरूरी बात बताता चलूं , वो है अनुज मिथिलेश की बात । ये एक दुखद संयोग था कि ब्लोग बैठक के सिर्फ़ एक या दो दिन पहले ही अनुज मिथिलेश दूबे की लिखी एक पोस्ट पर खूब हाय तौबा मची और जिससे आहत होकर मिथिलेश जी ने ब्लोग्गिंग को अलविदा कहने का मन बना लिया और बाकायदा इसकी घोषणा भी कर दी । जब ब्लोग बैठक में आने /पहुंचने वाले मित्रों की सूची में मैंने भाई मिथिलेश दूबे का नाम डाला तो मुझे अपनी पोस्ट पर कोई अनाम मित्र उन्हें निशाना बना कर टिपियाने लगे , जिसे मुझे दो दो बार मिटाना पडा । मिथिलेश जब बैठक में बैठे तो ऐसा लगा कोई मासूम सी सूरत वाल जिज्ञासु बालक अपनी नज़रों मे ढेर सारे प्रश्न लेके बैठा हो । साथ बैठे प्रवीण पथिक भीए कुछ व्यथित लग रहे थे । हमारे आग्रह के बावजूद उन्होंने सबके सामने शायद अपने मन की बात रखना ठीक नहीं समझा । हालांकि खुशदीप भाई ने मिथिलेश को और सबको समझाते हुए कहा कि ये जरूरी नहीं है कि आप पाठकों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए जबरन उसके शीर्षक को भडकाऊ या कोई अनावश्यक शब्द जोडे, उससे बेहतर तो ये है कि आप अपने शीर्षक के साथ अपना नाम लिख दें और उनकी इस सलाह का असर आपको इन दिनों आ रही पोस्टों में दिख ही रहा होगा । खैर ,मुझे अलग से जाकर उनसे पूछना ही पडा और पता चला कि वे सब जितने भी नवयुवा ब्लोग्गर्स हैं हमेशा ही इस बात से खफ़ा रहते हैं जब भी वे कोई पोस्ट जिसमें विरोध का स्वर उठता है तो उन्हें अपनी सीमा लांघने या वरिष्ठ ब्लोग्गर्स का सम्मान रखने आदि जैसी बातों का सामना करना पडता है । जबकि उन्होंने स्पष्ट महसूस किया है कि जब खुद वे वरिष्ठ ब्लोग्गर्स ऐसा करते हैं तब तो ये बात नहीं होती ।और यही बात उनकी पिछली पोस्ट को लेकर भी किया गया । ये दोहरा मापदंड क्यों ???

प्रश्न बडा ही विकट था मगर सच भी । मुझे उन्हें विस्तार से बताना पडा । सबसे पहली बात तो ये कि यहां कोई वरिष्ठ कनिष्ठ, बडा छोटा नहीं है । सभी ब्लोग्गर्स हैं ...सिर्फ़ ब्लोग्गर्स । और हां जिन्हें कोई मान सम्मान या स्थान मिला हुआ है तो वो है उनके विचारों के कारण , उनकी लिखी बातों के कारण , उनकी लिखी गई पोस्टों के कारण । और ऐसे ही लिखते लिखते पढते पढते और टिप्पणियों से भी उस ब्लोग्गर के बारे में एक अवधारणा बनती है । अब रही बात दोहरे मापदंड की ,तो मैंने स्पष्ट कह दिया कि अपने मिजाज़ में , रुख में उम्र के तकाज़े के हिसाब से तो तेवर हैं उसे बनाए रखें बिना ये परवाह किए कि कौन क्या सोच या लिख रहा है । मगर हां ...सबसे जरूरी बात है कि पोस्ट लिखने के लिए शब्दों का चयन और भाषा/ शैली जरूर ही संयमित रहनी ही चाहिए । ये बात मैंने और भी किसी वजह और संदर्भ में कही थी जिसे मैं आगे की पोस्टों में स्पष्ट करूंगा । मिथिलेश भाई ने मुझे विश्वास दिलाया कि भविष्य में वे इसका पूरा ख्याल रखेंगे । अब बात उनकी आखिरी पोस्ट के बारे में जिसमें उन्होंने एक महिला ब्लोग्गर के लिए या शायद उनकी किसी पोस्ट का जिक्र करने के लिए मोहतरमा शब्द का उपयोग किया था । इस बारे में मैंने उनसे दो बातें कहीं । पहली ये कि ये बात एक लेखक को अच्छी तरह समझनी चाहिए कि जब वो कोई बात लिख रहा है और खासकर किसी ऐसे विषय पर लिख रहा है तो बहुत जरूरी हो जाता है कि जब वो बात पाठक के सामने पहुंचे तो बिल्कुल उसी भावना के साथ और उसी संदेश के साथ पहुंचे । तो जैसे कि उस पोस्ट के साथ हुआ जहां तक मैं समझा कि मिथिलेश कहना ये चाह रहे कि हम पोस्ट/टिप्पणियों और इन जैसी तमाम बातों पर लिखने से अच्छा है कि कुछ सार्थक मुद्दों पर लिखें । लेकिन यहां हुआ ये कि उन्होंने इसके लिए जिस पोस्ट को और जिस ब्लोग्गर का उदाहरण सामने रखा , वो कभी कभार ही इस तरह का हल्का फ़ुल्का लिखती हैं जबकि अधिकांशत: वे गंभीर ही होती हैं । और जैसा कि मैंने मिथिलेश जी से भी पूछा भी कि क्या उन्होंने पहले उन्हें पढा था कभी ...,उनका जवाब था नहीं । इसके बाद दूसरी जरूरी बात ये थी कि मैंने उन्हें बताया कि कई बार कुछ टिप्पणियों पोस्ट को गलत दिशा में ले के चली जाती हैं या फ़िर जानबूझ कर ले जाई जाती हैं वो पूरी पोस्ट का बेडा गर्क कर देती हैं । उस पोस्ट के साथ भी यही हुआ ......आखिर मोहतरमा शब्द ..किसी भी लिहाज़ से अशिष्टता के दायरे में तो नहीं ही आता है । ऐसी स्थिति में पोस्ट के लेखक को पूरी दृढता से उन टिप्पणियों का जवाब देना चाहिए । तो ये थी उस दिन के पोस्ट की हकीकत और उस पर आई प्रतिक्रियाओं से मिथिलेश की नाराज़गी।

अब आज की लंबी रिपोर्ट को समाप्त कर रहा हूं , वैसे भी बहुत लंबी हो चुकी है , मिथिलेश जी से वादा किया था कि सब कुछ सबके सामने रखा जाएगा ....और मुझे उम्मीद है कि अब वे बहुत जल्द ही अपनी एक शानदार पोस्ट से वापसी करेंगे .....

आप बोर तो नहीं हो रहे न ...............????????????

18 टिप्‍पणियां:

  1. आप इतनी मेहनत कर इतनी अच्‍छी रिपोर्ट हमारे सामने पेश कर रहे हैं .. और हम ही बोर हों .. कैसी बाते करते हैं ??

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  2. अरे जब हमरी दुई किलोमीटर लंबी पोस्ट से आप बोर नहीं होते हैं तो हम आपकी इस छटांक बराबर पोस्ट से काहे को बोर होने लगे?...

    बढ़िया एवं विस्तृत रिपोर्ट

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  3. आज की रिपोर्ट में कुछ खास बात है। लगा है कि रिपोर्टिंग शुरु हुई है, अब तक केवल भूमिका थी।

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  4. एक यादगार पल था बहुत कुछ सीखने को मिले वैसे आप से पहले भी एक बार मिला था पर इस बार ज़्यादा करीब से मिला जो बहुत ही बढ़िया लगा....

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  5. नहीं जी बोर क्यों होगें
    और होते है तो होये
    जब तक अपना नाम नहीं आता
    तब तक बिना बोर हुये पढेगें
    ......आप पत्रकारिता की पढाई का सही उपयोग कर रहें है
    आज खबरों पर नजर वाले ब्लोग पर गया था, मस्त लगा

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  6. सही है अजय भाई अभी तक तो बोषय सूची और प्रस्तावना चल रहे थे. रेपोर्टिन्ग अब शुरू हुई है.

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  7. उम्मीद के मुताबिक पोस्ट. बहुत अच्छा लगा पढ़कर. मिथलेश की वापसी के विषय में जानकर अच्छा लगा. आप सबके बीच बैठकर स्थितियाँ स्पष्ट हो गई, यह खुशी की बात है. अनेक शुभकामनाएँ.

    आगे इन्तजार है.

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  8. रिपोर्टिंग का आपका अन्दाज चलचित्रनुमा है.
    सुन्दर

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  9. बहुत मेहनत और ईमानदारी से आपने सारा हाल अक्षरश : ब्यान किया है।
    सार्थक लेख और विवरण। ये सफ़र यूँ ही चलता रहे।

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  10. खबरे अभी जारी हैं

    तलवार दुधारी हैं

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  11. बहुत जानकरी बढ रही है इस क्रमिक रिपोर्टिंग को पढकर.

    रामराम.

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  12. आपका लेख पढ़ा। यदि आप नाराज होकर जाने का मन बनाने वाले ब्लॉगर के नाराजगी के कारण गिनाने वाली पोस्ट, जिस पोस्ट पर टिप्पणियों के कारण नाराज हुए व मोहतरमा की उक्त पोस्ट आदि का लिंक भी देते तो वे लोग भी ठीक से समझ लेते जिन्होंने ये पोस्ट्स पढ़ी नहीं थीं। उक्त पोस्ट में और भी लिंक दिए गए हैं जो टिप्पणियों, पसन्द नापसन्द व ब्लॉगवाणी पर दी इस सुविधा की कहानी भी सुनाती हैं। इस हल्की पोस्ट के हल्केपन से दबन व घुटन महसूस करने वाले लिंक देखते तो शायद कुछ राहत अनुभव करते या दबन घुटन का चरम!
    मैं स्वयं भी हर रोज़ ब्लॉग्स नहीं पढ़ पाती। कभी पढ़ लेती हूँ, कभी नहीं। यदि पुरानी बातें लिंक सहित बताई गईं होतीं हैं तो समझने में सुविधा होती है, अन्यथा या तो बहुत ढुँढवाई जैसा कठिन विकल्प अपनाना पड़ता है या फिर बिना बात समझे ही चलते बनना पड़ता है जो सुविधाजनक विकल्प तो है किन्तु सही विकल्प नहीं लगता।
    नाराजगी की बात पर एक बात कहना चाहूँगी। हजारों ब्लॉगर लिख रहे हैं। यहाँ किसी से नाराज होना अब तर्कसंगत नहीं रह गया। हम किसी की विचारधारा से सहमत या असहमत हो सकते हैं या किसी पोस्ट विशेष से सहमत या असहमत हो सकते हैं। व्यक्ति विशेष से नाराजगी हो तो सकती है परन्तु तर्कसंगत नहीं लगती। वैसे हम सदा तर्कसंगत बातें ही तो नहीं करते। हो सकता है( न हो तो बेहतर) कल या परसों मैं भी ऐसी ही अतार्किक बातें करती पाई जाऊँ।
    घुघूती बासूती

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  13. आदरणीय घुघुती जी ,
    आपकी बात सर माथे , मगर इसमें कुछ दुविधाएं थी , एक तो ये कि जरूरी नहीं कि मैं जिस पोस्ट के लिए ये सब समझ रहा था ये वही पोस्टें थीं और दूसरी सबसे बडी वजह ये कि जब बात समस्या सुलझाने की हो तो दोबारा उन्हीं बातों को कुरेद कर ...घूम घाम कर उसी जगह पर पहुंच जाना मुझे ठीक नहीं लगा आशा है आप मेरा मंतव्य समझ गई होंगी ।

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  14. महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें !

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  15. बहुत जानकरी बढ रही है इस क्रमिक रिपोर्टिंग को पढकर.

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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