
जब राज भाटिया जी ने अपने स्वदेश प्रवास का मन बनाया तो मुझसे संपर्क करके कहा कि अजय भाई क्या ये संभव है कि मेरे भारत प्रवास और दिल्ली में रुकने के दौरान सभी ब्लोग्गर्स मित्रों से मिल बैठ हो जाए । पिछले ब्लोग्गर सम्मेलन के बाद से सभी स्थानीय मित्र ब्लोग्गर्स भी इसी बात का आग्रह कर रहे थे । हमने सोचा कि गोया ये तो डबल आग्रह हो गया । पहले निर्णय किया किया गया कि दो ब्लोग बैठक किए जाएं एक नए साल के शुरूआत के उपलक्ष्य में और दूसरा राज भाई के सम्मान में । मगर कहते हैं न जो होना होता है वही होता है । दिल्ली की बढती ठंड ने और जल्दी जल्दी दो बैठकों में मौजूद रह पाने में असमर्थता जाहिर करने जैसे कारणों ने ये तय कर दिया कि सिर्फ़ एक ही ब्लोग बैठक होगी । अब अगली बात तय हुई कि ब्लोग बैठकी का दिन रविवार होना चाहिए , और राज भाई जी के पूरे प्रवास के दिनों में से जो इक्लौता रविवार मिल रहा था वो था .....७ फ़रवरी २०१० । बस तो बन गया ये दिन एक इतिहास , एक सुंदर पल , एक ऐसा दिन जो ताउम्र मेरे जीवन के कुछ बहुत सुनहरे दिवसों में से एक ।
इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ सबको बताने का ,और याद दिलाने का कि राज भाई जी से मिलने जरूर पहुंचना है । दिल्ली और आसपास के सभी मित्र तो पहले ही आने का वादा कर चुके थे । मगर खुशी की बात ये थी कि , लखनऊ से महफ़ूज़ अली जी , राजस्थान से दिनेश राय द्विवेदी जी , छत्तीसगढ से अनिल पुसदकर जी, बी एस पाब्ला जी, ललित शर्मा जी , निर्मला कपिला जी तथा और भी बहुत से ब्लोग्गर्स साथियों ने आने की संभावना जताई । बस पिछली बार की तरह मैं लग गया काम पर । अब इस सरकारी ड्यूटी में मुझ जैसे कर्मचारी के लिए , जिसने अभी तक नौकरी में बंक मारना नहीं सीखा थोडा मुश्किल था मगर फ़िर पिछली बार वाली जगह ही काम आई । हमारे निवास स्थान के करीब था , देखा भाला था तो वही तय हो गया ।मगर समय के साथ साथ सबकी असुविधा कठिनाई और कुछ कारण सामने आए जिससे बहुत से साथियों का तो ब्लोग बैठक के तय दिवस से पहले ही नहीं पहुंच पाने की सूचना मिल गई थी । मगर शनिवार शाम तक महफ़ूज़ भाई का आना तय था । मगर इस बीच एक अप्रत्याशित खुशखबरी ये मिल गई थी कि कविता वाचक्नवी जी भी दिल्ली में ही हैं और वे भी हमारी बैठकी में चार चांद लगाने आएंगी ।
फ़िर आई ब्लोग बैठक की सुबह , पता नहीं क्या सोच कर शायद अपने मोबाईल के कैमरे को देखने परखने के लिए , मैंने ये सुबह का नजारा कैद कर लिया । तभी फ़ोन बजा देखा तो महफ़ूज़ भाई लाईन पर थे , मैंने पूछा कि कहां पहुंचे ....जवाब मिला बिस्तर पर ही । आयं ....ये क्या हुआ । उधर से महफ़ूज़ भाई ने बताया कि रात को तबियत खराब सी थी दवाई ले ली ...सुबह उठे तो शताब्दी निकल चुकी थी । बस एक और ब्लोग्गर छूट गया कुंवारा बेचारा ....श्रीमती होती तो शायद ये नौबत न आती (ऐसा खुशदीप भाई का मानना था , जो उन्होंने बाद में बैठक के दौरान बताया भी )
बैठक में सबसे पहले पहुंचने वालों में थे श्री मोईन शम्सी जी , फ़िर विनीत उत्पल जी , इसके बाद आए श्री राज भाटिया जी , श्री सरवत जमाल जी ,श्री राजीव तनेजा जी , श्रीमती संजू तनेजा जी और इन सबको हमने स्थान ग्रहण करने का आग्रह किया ही था कि अविनाश भाई की कौल आ गई , पूछा कहां हैं , उन्होंने जगह बताई , हम फ़ौरन निकल लिए उन्हें लाने । अविनाश भाई के साथ कविता वाचक्नवी जी भी थीं । जब अंदर पहुंचे तो इस बीच श्री अंतर सोहिल और सबको चौंकाते हुए मसीजीवी भी विराजमान हो चुके थे । फ़िर सबसे पहला दौर परिचय का चला ।हमारे टकले सर के बावजूद ताऊ की पहेली के गोल घर की तरह सब हमें पहचान चुके थे सो हमने सोचा परिचय करने करवाने का काम हम शुरू करें । पहली ही बौल पे क्लीन बोल्ड ...ये हैं कविता वाक्चनवी जी ....उधर से सुधारा गया ....नहीं जी कविता वाचक्नवी ....। बस हमने कहा झाजी अब चुप होके बैठ ही लो इससे पहले कि ऐसे ही परिचय करवाओ ...। यार हम भी क्या करते पहला ही परिचय इत्ते कठिन नाम से हुआ । ...
अब कल पढिएगा ....हमें यकीन है कि रपट पढ के आपको मायूसी नहीं होगी और आनंद भी आएगा
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बढ़िया रिपोर्ट...अगली कड़ी का इंतज़ार है
राजीव तनेजा ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:05 अपराह्न
भाई आगे का इन्तेज़ार रहेगा
HARI SHARMA ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:20 अपराह्न
बढ़िया मस्त रिपोर्टिंग.. पढ़ रहे हैं..
Vivek Rastogi ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:21 अपराह्न
अब ठीक है !
सतीश सक्सेना ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:23 अपराह्न
बहुत बढिया विवरण.....आगे की पोस्ट का इतंजार
यशवन्त मेहता "सन्नी" ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:24 अपराह्न
जनाब झा जी ,
यक़ीनन मै खुद को इतना खुशनसीब नहीं कहूंगा की इसी दिल्ली शहर में होकर भी आप मुअज्जिजो से मिलना ना हो सका अलबता पंडित श्री वत्स जी ने 07 -02 -2010 को सुबह फोन कॉल भी किया था / परन्तु मसरूफियत ये पाल रखी थी की प्रगति मैदान में पुस्तक मेले में व्यवसायिक तौर पर बचन बद्ध था लिहाजा मनमसोस कर गुजारा करना पडा वरना हम भी पींगे भर रहे होते /
जैसी मुझे पहले पहल श्री वत्स जी ने जानकारी दी थी उसके अनुसार ये महफ़िल 29 -01-2010 को होनी थी, खैर आईंदा उपरवाले की मेहरवानी रही तो दूसरी महफ़िल में ये खादिम भी हाजिर रहे गा, ये पक्का वादा है /
बांकी आपकी तफ्शील से परोसी जारही रिपोर्ट उस खामी को भरपाई करने के साथ साथ में काफी तसली भी दे रही है /
थैंक्स/
S B Tamare ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:35 अपराह्न
बहुत बहुत बधाई........दिल्ली वालो !
AlbelaKhatri.com ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:46 अपराह्न
क्या बात है..इन्तजार लगवा कर चल दिये अगले दिन का. खैर, बैठे है इन्तजार में. :) बढ़िया लग रहा है.
Udan Tashtari ने कहा…
8 फरवरी 2010 10:53 अपराह्न
दिल्ली ब्लोगर मिलन की धूम मची हुई है झा जी।
बस हाल बयाँ करते रहो।
अच्छा उदाहरण पेश किया है हम सब ने मिलकर।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
8 फरवरी 2010 11:02 अपराह्न
अजय जी,
अगली बार एक नजर लेट लतीफों पर भी मार लेना.
नीरज जाट ने कहा…
8 फरवरी 2010 11:04 अपराह्न
अब सार्थक लेखन की शुरूआत हो चुकी है। एक बहुत सुंदर पोस्ट खुशदीप भाई की ब्लॉगरों के लिए खुशी के दीप जलाकर लाई है। अजय कुमार झा ने भी टिप्पणी दी है और खुशदीप जी की पोस्ट पढ़कर काफी राहत महसूस की है परन्तु अजय जी आपको अपने किश्तें तो पूरी करनी ही होंगी। सब इंतजार कर रहे हैं।
अविनाश वाचस्पति ने कहा…
8 फरवरी 2010 11:44 अपराह्न
बहुत बढ़िया भैया सबकी शिकायत दूर कर दिया आपने सब यही कह रहे थे फोटो में सबसे परिचय करने को आपने वो भी करा दिया..
विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
8 फरवरी 2010 11:52 अपराह्न
एक दुकानदार किस्तों में सायकिल बेच रहा था। हमने उस से सौदा कर लिया। बस दस रुपया हफ्ता चुकाना था। हमने पहली किस्त के दस रुपए दिए। और कहा सायकिल कस दो। उस ने दस रुपए लेकर रसीद पकड़ाई और दुकान के अंदर से सायकिल का एक पैडल लाकर बोला। हर किस्त में एक आइटम दूंगा किस्तें पूरी होने पर पूरी सायकिल कस दूंगा।
अजय भाई अब लगता है कि किस्तें पूरी हो जाने पर रिपोर्टे को पूरी कस के एक बार और पढ़ना पड़ेगा।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
8 फरवरी 2010 11:54 अपराह्न
अविनाश भाई पूरी किस्तें आएंगी और जरूर आएंगी , मैंने सब अपने दिमाग में सेव किया हुआ है यदि ये कह दूं कि सब लिखा हुआ है तो आप लोग डंडा लेकर मेरे पीछे पड जाएंगे , मगर धीरे धीरे पढेंगे तो स्वाद आएगा ।
द्विवेदी जी ...सर , आप पहले ही आकर चले गए न अब इतना जुर्माना तो भरना ही पडेगा , और हां हैंडल सबसे बाद में मिलेगा सायकल का ...हा हा हा
अजय कुमार झा
अजय कुमार झा ने कहा…
9 फरवरी 2010 12:03 पूर्वाह्न
mast reporting, wating for next
Sanjeet Tripathi ने कहा…
9 फरवरी 2010 1:13 पूर्वाह्न
waaah waaaah !!
bahut badhiya reporting..
bas ab agli kisht ka intezaar hain..!!
'अदा' ने कहा…
9 फरवरी 2010 4:09 पूर्वाह्न
सिलसिलेवार रिपोर्ट बहुत सुन्दर
M VERMA ने कहा…
9 फरवरी 2010 4:54 पूर्वाह्न
मेहनत की है पोस्ट पे ... अच्छी लगी. आगे की कड़ी का इंतज़ार !!
अमिताभ मीत ने कहा…
9 फरवरी 2010 7:42 पूर्वाह्न
काश ...
बी एस पाबला ने कहा…
9 फरवरी 2010 9:39 पूर्वाह्न
Jha ji, aatithya ke liye aabhari hoon.
sabhi se prapt chitron ki ek copy mujhe mil sake to ghar laut kar parivar ke saath yadein sajhi kar sakoon va unhein sada ke liye sanjo bhi sakoon.
vivaran jandaar va shaandar hain.
punah dhnyavad.
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…
9 फरवरी 2010 10:47 पूर्वाह्न
बहुत शानदार विवरण है, बस अगले भाग का इंतजार है.
रामराम.
ताऊ रामपुरिया ने कहा…
9 फरवरी 2010 11:24 पूर्वाह्न
अच्छी लग रही है...ये सिलसिलेवार रिपोर्ट
rashmi ravija ने कहा…
9 फरवरी 2010 4:10 अपराह्न