गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008

भैया नहीं तो दूजा कौन ( सावधान इस पोस्ट का भैयादूज से कोई सम्बन्ध नहीं है )

भैया नहीं तो दूजा कौन :- आज निश्चय ही मनसे वालों के लिए गर्व का दिन रहा होगा, भाई एक एक कर वे भैया लोगों से निपटे, या कहूँ की निपटाते जा रहे हैं, पहले धनतेरस को एक को गिराया, फ़िर दिवाली की रात भी एक भैया को पर जम कर लात घूंसों के पटाखे बजाये , फ़िर अभी भैया दूज, उसके बाद छठ ,अभी तो न जाने कितने मौके और मिलने वाले हैं,मनसे तो सबकुछ मन और तन से करने के लिए, पता नहीं अभी तक भैया दूज का कोई सदुपयोग किया की नहीं उन्होंने। देर सवेर पता चल ही जायेगे, खैर।

जब बात किसी क्षेत्र विशेष की होता है तो बाआहार वालों पर जो आरोप लगता है या की पुरजोर तरीके से लगाया जाता है तो वो ये होता है की उनकी वजह से ही स्थानीय लोगों का हक़ मरता है, बिल्कुल एक दृष्टिकोण से देखें तो ये सही भी लगता है, मगर इस सन्दर्भ में मेरे सिर्फ़ दो तर्क हैं, क्या जो व्यवहार आज गरीब मजदूरों, क्षात्रों, के साथ खुलमखुल्ला किया जा रहा ही वो मनसे हो या उससे भी बिगड़ी हुई कोई संस्था, किस समर्थ व्यक्ति के साथ कर सकती है, केंद्रीय मंतीमंडल में बहुत से भैया जी लोग मंत्री हैं, अजी उन्हें भी कुछ गालियाँ, थप्पड़, का आशीर्वाद दीजिये न, आपके जितने भी सरकारी कारायालय हैं, वहां भी आपको थोक के भाव आपके भइया मिल जायेंगे, जरा उनके साथ भी ये हिम्मत दिखाइये न, ।
दूसरी बात कौन सा हक़ मर रहा है, रिक्शा चल्नाने का, सब्जी बेज्चने का, पान सुपाड़ी के खोखे लगाने का, मजदूरी करने का, क्या वे तमाम लोग जो अपने अधिकार और रोजगार के मरने की बात कर रहे हैं बता सकते हैं की कितने लोग ये ऊपर गिनाये गए प्रतिष्ठित काम और इन जैसे ही काम करने को तैयार हैं, मरे जा रहे हैं, और भैया लोगों की वजह से बेचारों को वो काम करने का मौका नहीं मिल रहा है, सोचने वाली बात है...
तो सवाल वही की भैया नहीं तो दूजा कौन ?

हड़ताल अच्छी भी हो सकती है :- मैंने जब से होश सम्भाला है , मेरी बदकिस्मती की जब भी किसी हड़ताल के बारे में पढा, सूना, देखा, भुगता , अनुभव बुरा ही रहा, कुल मिला कर जहाँ में एक ही बात आ गयी की , आम आदमी का नुक्सान। बिजली, पाने, वेतन। आरक्षण, नौकरी, पेंसन, पता नहीं किस किस बात के लिए हड़ताल, और बंद होते रहते हैं, और जाहिर सी बात है की हमें खूब परेशान भी करते हैं। लेकिन मुझे हाल ही में एक ऐसी हड़ताल के बारे में पता चल की मन खुश हो गया, हडताल और हड़तालियों के बारे में जान कर।

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में हड़ताल हुई, और पुरजोर हुई, मांग थी की वहां की सी टी स्कैन मशीन जो कई महीनों या शायद सालों से ख़राब थी को बदला जाए और नया लाया जाए, मगर हैरत की बात ये थी की इसके लिए हड़ताल पर जाने वाले वहां के रेजिडेंट डॉक्टर ही थे, जिन्होंने थक हार ख़ुद ही हड़ताल पर जाने का फैसला किए, परिणाम सकारात्मक निकला और त्वरित भी।

पुलिस , सिर्फ़ पुलिस होती है :- यूँ तो पुलिस से सम्बंधित बहुत सी बातें , रोज ही पढने , सुनने और देखने को मिल जाती हैं, कुछ तो प्रत्यक्ष भी , इसमें से अधिकांशतः कैसी होती हैं बताने की जरूरत नहीं हैं शायद। मगर जब भी मैं कुछ आगे सोचता हूँ, एक बात मेरे दिमाग में घूमती हैं , की पुलिस आपको वैसी ही मिलती है जैसे आप ख़ुद हैं, जैसा ये समाज है ,क्योंकि पुलिस भी उसी समाज में से आती है। पिछले दिनों दिल्ली पुलिस में भारती परिक्षा देने आए लगभग पचास हजार नव युवकों ने सरे आम दिन दहाड़े सड़कों पर भय और उदंडता का जो नंगा नाच किया उनसे तो साबित कर दिया की यदि इन्हइन में से हमारे रक्षक आयेंगे तो फ़िर तो भगवान् ही मालिक, दूसरे घटना मुंबई पुलिस की है ही, जिसने राज साहब के सआठ और बेचारे राज, रोहित राज के साथ क्या किया राज की बात है................

चलिए आज इतना ही, फ़िर मिलते हैं.............

मंजर , यही हर बार रहता है .

माहौल कुछ ऐसा है,
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए दाह्से का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,

घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........

हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....

मंजर , यही हर बार रहता है .

माहौल कुछ ऐसा है,
या कि, अपनी,
आदत बन गयी है ये,
अब तो,
हर घड़ी,
इक नए दाह्से का,
इन्तजार रहता है,
हकीकत है ये,
कि बेदिली की इंतहा,
देखते हैं, पहला,
दूसरा पहले से,
तैयार रहता है,

घटना- दुर्घटना ,
हादसे-धमाके,
प्रतिरोध-गतिरोध,
बिलखते लोग,
चीखता मीडिया,
बेबस सरकार,
आंखों में मंजर यही,
हर बार रहता है........

हाँ, शायद आज यही हमारी हकीकत बन चुकी है , कि एक के बाद एक नयी नयी घटनाएं, सामने आती जाती हैं, पिछली हम भूलते जाते हैं, और अगले का इंतज़ार करते हैं, यदि दूसरों पर बीती तो ख़बर, अपने पर बीती तो दर्द....

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

सावधान, विरोध प्रदर्शन वाले जलाने के लिए चंद्र यान को ढूंढ रहे हैं.

ये हमरे लोकतत्र की मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण है कि, हम किसी की भी कैसी भी चिंगारी को अपने फेफडों से फूंक फूंक कर एक बड़ी आग पैदा कर लेते हैं, और फ़िर उस मशाल को थाम कर जो भी सामने पड़ता है उसको स्वाहा कर देते हैं। और यकीन मानिए उनका ये आग लगाने का तरीका तो उन आदिमानवों के दो पत्थर से रगर कर आग जलने के तरीके से भी ज्यादा सफल और चमत्कारी सिद्ध हुआ है । सो जैसा कि पुरी तरह से अपेक्षित था कि राज ( नाम तो सुना होगा ), के राज पर जब भी जरा सी उंगली उठी अजी उंगली की कौन कहे, सिर्फ़ नजर भी उठी तो फ़िर तो बड़े अस्वमेध यज्ञ में पूरे देश की सम्पत्ती , रेल, बस, गाडियां, सरकारी ओफ्फिस सब कुछ बिना भेदभाव के जलाए जायेंगे। कोई राज के विरूद्ध सुपर फास्ट को आग लगा रहा है तो कोई राज के समर्थन में राजधानी और शताब्दी को , मगर खुसी इस बात की है कि जला दोनों ही ट्रेन को ही रहे हैं, क्यों, पता नहीं वैसे मुझे लगता है कि उन्हें लग रहा होगा कि लालू जी ने इतने अरब ख़राब का फायदा करवाया है तो फ़िर दस बारह ट्रेन जलाने से क्या नुक्सान हो जायेगा।,

मगर अब स्थिति सचमुच चिंताजनक होती जा रही है, ख़बर के अनुसार ( प्लीज, ये सूत्र के बारे में न पूछा करें, खासकर जब ख़बर एक्सक्लूसिव हो तो ), दोनों पक्षों के लोग अब चंद्र यान को ढूंढ रहे हैं ताकि उसे जला कर इस विरोध प्रदर्शन में थोड़ी और गंभीरता लाई जाए। वैसे इसके पीछे भी कारण है, दरअसल किसी ने दबे मुंह से बात फैला दी कि जब चंद्र यान जा ही रहा है और उसके लौटने की कोई ख़ास गारंटी नहीं है तो क्यों न ठाकरे , आजी वही राज फाश वाले , को भी उसमें बैठा कर ऊपर भेज दिया जाए, नीचे की सारी समस्या ही ख़त्म हो। दूसरी अफवाह ये है कि सभी बिहारी, मुझे सहित, ने मांग कर दी है कि जब दिल्ली, मुंबई, आसाम, सभी जगह हमारी वजह से ही मुश्किलें पैदा हो रही हैं तो फ़िर हमें , हम सबको चाँद पर भेज दो । मैंने तो सलाह दी थी कि यार ये जलने और जलाने का शुभ कार्यक्रम थोड़े दिनों के लिए टाल दिया जाए , तब तक उन बेचारों को उसमें बैठा कर घर पहुंचा दिया जाए जो बेचारे ट्रेन के जलने और उसके कैंसिल होने के कारण घर नहीं जा पा रहे हैं।

फिलहाल तो स्थिति गंभीर ही बनी हुई है , यदि चंद्र यान को छुपाने के लिए आप के पास कोई जगह हो तो बताएं ?

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

मनसे यानि, मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना

इन दिनों आ सी एल की ख़बरों की जितनी ही दुर्दशा हो रही है उतनी ही ज्यादा चर्चा अपने मनसे की हो रहे है और फ़िर हो भी क्यों न जितनी तेज़ गति से वे रोज कोई न कोई रोमांचक मैच खेल रहे हैं तो जाहिर है की उनकी ही चर्चा ज्यादा होनी चाहिए। हाल ही में इस खाकसार को उनका सामना करने का मौका मिला, (यहाँ ये स्पष्ट कर दूँ की ये साक्छात्कार उनके कारागार प्रवास से पहले का है, इसलिए शक न करें )

सर, आपकी ये जो मनसे नामक टीम है, इस पर कई गंभीर आरोप लग रहे हैं, पहला तो यही है कि, आप मनसे नहीं हैं आप लोग असल में तनसे हैं, मतलब आप लोग सारे काम तनसे, विशेष कर हाथ और लात से ही ज्यादा करते हैं, और मन की कौन कहे जो बोले बैगैर भी काम चल सकता है आप उसमें भी अपनी जुबान का काम लेते हैं तो कैसे हुए आप मनसे,
उन्होंने घूर कर देखा , और इशारा किया कि आगे बढो।
साडी कहा जा रहा है कि आपकी सेना का पूरा नाम तो मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना होना चाहिए, काम तो आपके उनके जैसे ही हैं, और फ़िर कहे का पुनर्निर्माण, क्या निर्माण ऐसे होता है ।
बिल्कुल, आपने इतिहास नहीं पढा , किसी भी निर्माण से पहले उसका विध्वंस होना जरूरी होता है । देखो दिल्ली सात बार बसने से पहले उतनी ही बार उजड़ी भी थी न , अबकी बार मैंने घूर कर देखा, नहीं शर्मा कर।

सर सुना है आप हमेशा ही धमकी देते रहते हैं कभी किसी को कभी किसी को, असर वासर तो होता नहीं है कुछ।
क्या कहा असर नहीं होता , किसने कहा आपसे , अजी हमने रातों रात मुंबई के सारे पोस्टर्स, दुकानों के नाम, होटलों के नाम सब कुछ मराठी में करवा दिया,और बोल्लीवुद के कौन कहे, अपने सरकार देखी थी, उसके बाद जो रामू ने सरकार राज बनायी थी, वो किसके लिए थी, और किसे खुश करने के लिए थे, आप सरकार में राज के बाद भी नहीं समझे ।

सर हाल में बिहार , यु पी , से बेचारे गरीब छात्र यहाँ परिक्षा देने आए थे, उनके साथ भी आप लोगों ने मारपीट की, कई तो उनमें से ऐसे थे जो मराठी जानते भी थे, फ़िर भी.....

क्या मराठी जानते थे, सब झूठ, जब सर पे डंडा पडा सारा झूठ निकल गया, वे चीख तो हिन्दी में रहे थे ।

सर , भविष्य के लिए आपकी और क्या क्रांतिकारी योजनायें हैं ?

पहले तो में सरकार से मांग करने जा रहा हूँ कि जब सबके लिए इस पे कमीसन में बात हुई, सेना के लिए तो अलग से हुई तो हमारी सेना के लिए कुछ क्यों नहीं सोचा गया, जल्दी ही राष्ट्र्यव्यपी, नहीं महाराष्ट्रव्यापी आन्दोलन होगा। हम फैसला लेने जा रहे हैं कि जितने भी बड़े बड़े कलाकार हैं सबको अपना सरनेम महाराष्ट्रियन ही लगाना होगा, जैसे, शाहरुख पाटिल, आमिर राणे, अमिताभ गायकवाड, सलमान पवार, कैटरीना मातोंडकर अदि , और भी कई योजनायें हैं, आप देखते रहे।
मगर सर सुना है कि आप दोनों परिवारों के बीच कुछ अनबन चल रहे है, जैसे उन्होंने कहा कि सब कुछ उनके
पिता महाराज का है .
अजी छोडो छोडो मजाक है क्या, उनके कहने से क्या होता है, उनका तो तभी पता चल गया था , वैसे तो कहते थे कि मैं ये हूँ वो हूँ और , जब माईकल जैकसन आया तो कहने लगे कि , मुझे फक्र है कि माईकल जैकसन जैसे कलाकार ने मेरा टॉयलेट उप्यूग किया, बताइए तो ये कोई बात हुई।
अच्छा आप अब जाईये मुझे मनसे के बारे में पूरे मन से सोचना है।
मैं भी मन ही मन सोचते चला गया.

मनसे यानि, मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना

इन दिनों आ सी एल की ख़बरों की जितनी ही दुर्दशा हो रही है उतनी ही ज्यादा चर्चा अपने मनसे की हो रहे है और फ़िर हो भी क्यों न जितनी तेज़ गति से वे रोज कोई न कोई रोमांचक मैच खेल रहे हैं तो जाहिर है की उनकी ही चर्चा ज्यादा होनी चाहिए। हाल ही में इस खाकसार को उनका सामना करने का मौका मिला, (यहाँ ये स्पष्ट कर दूँ की ये साक्छात्कार उनके कारागार प्रवास से पहले का है, इसलिए शक न करें )

सर, आपकी ये जो मनसे नामक टीम है, इस पर कई गंभीर आरोप लग रहे हैं, पहला तो यही है कि, आप मनसे नहीं हैं आप लोग असल में तनसे हैं, मतलब आप लोग सारे काम तनसे, विशेष कर हाथ और लात से ही ज्यादा करते हैं, और मन की कौन कहे जो बोले बैगैर भी काम चल सकता है आप उसमें भी अपनी जुबान का काम लेते हैं तो कैसे हुए आप मनसे,
उन्होंने घूर कर देखा , और इशारा किया कि आगे बढो।
साडी कहा जा रहा है कि आपकी सेना का पूरा नाम तो मनोरोगियों की नक्सलवादी सेना होना चाहिए, काम तो आपके उनके जैसे ही हैं, और फ़िर कहे का पुनर्निर्माण, क्या निर्माण ऐसे होता है ।
बिल्कुल, आपने इतिहास नहीं पढा , किसी भी निर्माण से पहले उसका विध्वंस होना जरूरी होता है । देखो दिल्ली सात बार बसने से पहले उतनी ही बार उजड़ी भी थी न , अबकी बार मैंने घूर कर देखा, नहीं शर्मा कर।

सर सुना है आप हमेशा ही धमकी देते रहते हैं कभी किसी को कभी किसी को, असर वासर तो होता नहीं है कुछ।
क्या कहा असर नहीं होता , किसने कहा आपसे , अजी हमने रातों रात मुंबई के सारे पोस्टर्स, दुकानों के नाम, होटलों के नाम सब कुछ मराठी में करवा दिया,और बोल्लीवुद के कौन कहे, अपने सरकार देखी थी, उसके बाद जो रामू ने सरकार राज बनायी थी, वो किसके लिए थी, और किसे खुश करने के लिए थे, आप सरकार में राज के बाद भी नहीं समझे ।

सर हाल में बिहार , यु पी , से बेचारे गरीब छात्र यहाँ परिक्षा देने आए थे, उनके साथ भी आप लोगों ने मारपीट की, कई तो उनमें से ऐसे थे जो मराठी जानते भी थे, फ़िर भी.....

क्या मराठी जानते थे, सब झूठ, जब सर पे डंडा पडा सारा झूठ निकल गया, वे चीख तो हिन्दी में रहे थे ।

सर , भविष्य के लिए आपकी और क्या क्रांतिकारी योजनायें हैं ?

पहले तो में सरकार से मांग करने जा रहा हूँ कि जब सबके लिए इस पे कमीसन में बात हुई, सेना के लिए तो अलग से हुई तो हमारी सेना के लिए कुछ क्यों नहीं सोचा गया, जल्दी ही राष्ट्र्यव्यपी, नहीं महाराष्ट्रव्यापी आन्दोलन होगा। हम फैसला लेने जा रहे हैं कि जितने भी बड़े बड़े कलाकार हैं सबको अपना सरनेम महाराष्ट्रियन ही लगाना होगा, जैसे, शाहरुख पाटिल, आमिर राणे, अमिताभ गायकवाड, सलमान पवार, कैटरीना मातोंडकर अदि , और भी कई योजनायें हैं, आप देखते रहे।
मगर सर सुना है कि आप दोनों परिवारों के बीच कुछ अनबन चल रहे है, जैसे उन्होंने कहा कि सब कुछ उनके
पिता महाराज का है .
अजी छोडो छोडो मजाक है क्या, उनके कहने से क्या होता है, उनका तो तभी पता चल गया था , वैसे तो कहते थे कि मैं ये हूँ वो हूँ और , जब माईकल जैकसन आया तो कहने लगे कि , मुझे फक्र है कि माईकल जैकसन जैसे कलाकार ने मेरा टॉयलेट उप्यूग किया, बताइए तो ये कोई बात हुई।
अच्छा आप अब जाईये मुझे मनसे के बारे में पूरे मन से सोचना है।
मैं भी मन ही मन सोचते चला गया.

ब्लॉग्गिंग के कुछ आजमाए नुस्खे - भाग दो

मैंने to सोचा था की , अपनी एक ही पोस्ट में आप सबको ब्लॉग्गिंग के बारे में जो भी बातें जानी समझी हैं बता दूंगा, मगर फ़िर लगा की ये थोडा लंबा हो जायेगा और शायद बोरिंग भी सो दो भागों में बाँट दिया, लीजिये कल से आगे

लेखन का विषय :- वैसे तो यहाँ पर सभी ने अपने अपने पसंद और महारत के हिसाब से अपनी लेखनी का विषय चुना हुआ है और कईयों ने तो अपने चिट्ठों को नाम भी उसी के अनुरूप दिया हुआ है। ये ठीक भी है, चिट्ठे के नाम से ही पता चल जाता है की अमुक विषय पर आधारित ही होगा। मगर चूँकि अभी हिन्दी ब्लोग्जगर संख्या के हिसाब से इतना ज्यादा बड़ा नहीं है इसलिए स्वाभाविक रूप से किसी न किसी ट्रेंड में ढल कर उसी के अनुसार ही चलता चला जाता है। सबसे प्रचलित प्रवृत्ति होती है किसी भी सामयिक विषय पर लिखना, सबसे अच्छी बात ये है की देखने में ये आया है की किसी भी ज्वलंत विषय पर ब्लॉग्गिंग में सामयिक लेखन , जो कि अक्सर बहस में बदल जाता है वो मडिया में उससे सम्बंधित किसी भी तर्क वितर्क से ज्यादा निष्पक्ष और ज्यादा स्तरहीन होता है और ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि ब्लॉगजगत में विचारों की स्वतन्त्रता है । मेरे ख्याल से किसी भी नए ब्लॉगर के लिए ये एक आसान विकल्प होता है कि उस सामयिक विषय पर चल रही बहस का हिस्सा बन जाए, अपने विचार और तर्क रखे। इनसे अलग जो लोग विशिष्ट विषयों, संगीत, क़ानून, स्वास्थय , आदि पर लिख रहे हैं उनका तो कहना ही क्या, मैं तो लवली जी के सापों वाले ब्लॉग को देख कर हैरान रह गया, ये तो बिल्कुल पश्चिमी देशों की खोजी जानकारी वाले चैनेल जैसी थी।

तिप्प्न्नियाँ : - ये तो एक ऐसा विषय है कि जिस पर न जाने कितने ब्लॉगर कितनी ही बार क्या क्या कह और लिख चुके हैं, ख़ुद में भी कई बार काफी कुछ लिख चुका हूँ। पिछले दिनों भी शास्त्री जी से किसी ने तिप्प्न्नियों को लेकर ही कुछ सवाल किए थे जिसका उत्तर उन्होंने बड़े ही वैज्ञानिक और तार्किक रूप से दिया था। दरअसल हर ब्लॉगर चाहता है कि जब वो कुछ लिखे तो सब उसे पढ़ें और बताएं कि कैसा लगा, खासकर नया नया कोई यहाँ आया तो तरसता रहता है तिप्प्न्नियों के लिए, मैंने पहले भी सुझाव दिया था कि कुछ लोगों कि ऐसी टीम बनाए जाए जो कि नए ब्लोग्गेर्स को न सिर्फ़ प्रोत्साहित करने के लिए टिप्पणियाँ करें बल्कि उनका मार्ग दर्शन भी करें, वैसे ये व्यवस्था यदि संकलकों की तरफ़ से हो पाती तो क्या बात थी। यहाँ यदि उड़नतश्तरी जी, महेंद्र भाई, पी दी जी, ममता जी, शास्त्री जी, अलोक भाई आदि की चर्चा न करूँ तो ग़लत होगा , सच तो ये है कि ब्लॉगजगत के नए ब्लॉगर और पुराने भी इनकी तिप्प्न्नियों के बगैर तो अधूरे हैं। एक बात तिप्प्न्नियों के बारे में हमेशा उठती है कि क्या ये ठीक है कि हम किसी को टिप्प्न्नी करें तो बदले में वो टिप्प्न्नी करे, बल्कि जिसे जो अच्छा लगा वो ख़ुद ही टिप्प्न्नी करे, मेरे ख्याल से तो ये एक परिवार है , जहाँ सब कुछ परस्पर ही होता है । ये ठीक है कि जब आप उस स्थान पर पहुँच जायेंगे जब लोग आपकी लेखनी का इंतज़ार करेंगे तो शायद आप कभी कभी टिप्प्न्नी न भी करें तो चलेगा, मगर महाराज कसम खा लेना कि टिप्प्न्नी नहीं ही करनी है तो फ़िर तो ये शायद ग़लत हा। एक बात और कई लोगों कि या बहुतों कि ये आदत होती है कि टिप्प्न्नी पढ़ कर उसके बाद कोई प्रतिक्रया नहीं देते, ऐसा ना करें। हो सकता कि कोई दोबारा जाकर अपनी बात पर आपकी बात पढ़ना चाहता हो। और हाँ अनाम जी की टिप्प्न्नी का कभी बुरा न माने वे तो बेचारे शायद मनसे ( अजी वही मुंबई वाली ) के सदस्य लगते हैं।

पसंद सूची :- अपने ब्लॉग पर अपने पसंद के ब्लोग्गेर्स की उनके चिट्ठे की सूची जरूर बनाएं , जरूरी नहीं कि ये संख्या में कितनी हो या कि एक बार बना दी तो बना दी, उसे अपनी पसंद के हिसाब से बदल सकते हैं। मेरे कहने का मतलब ये है कि ये एक नेट वर्क की तरह का काम करता है, हो सकता है कि किसी को आपका ब्लॉग भी पसंद आ जाए और वो उसे अपनी पसंद सूची में दाल दे ।

विभिन्न विषयों में लेखन :- ये हिन्दी ब्लॉग जगत के लिए अच्छी बात है कि इसमें न सिर्फ़ हिन्दी में बल्कि लोग अपनी मातरि भाषा में भी लिख रहे हैं, विशेह्स्कर भोजपुरी और मैथिलि के तो कई सारे चिट्ठे लिखे जा रहे हैं, मगर न जाने क्यों उनमें भी आपस में कोई संपर्क नहीं है, या शायद किसी वजह से रखना नहीं चाहते, यदि ऐसा है तो ग़लत है, मैं पहले भी कह रहा हूँ कि दायारा बनाने से आपका और इस ब्लॉगजगत का दोनों का ही फायदा है, और हाँ एक चिटठा कम से कम हिन्दी में जरूर ही बन्याएं, आख़िर जिस लिपि और भाषा का प्रयोग आप कर रहे हैं उसके प्रति आपका भी तो कुछ फ़र्ज़ बँटा है ।

सामूहिक ब्लॉग का न्योता झट से स्वीकार करें : - वैसे तो ये कम ही होता है, कम से कम मुझे तो आज तक किसी ने ये मौका नहीं दिया, लेकिन यदि आपको कोई देता है तो जरूर स्वीकार करें, यकीन मानिए इससे आपका मंच और मजबूत होगा।

तो फ़िर अभी के लिए इतना ही, आशा है कि आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे .
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