मैंने to सोचा था की , अपनी एक ही पोस्ट में आप सबको ब्लॉग्गिंग के बारे में जो भी बातें जानी समझी हैं बता दूंगा, मगर फ़िर लगा की ये थोडा लंबा हो जायेगा और शायद बोरिंग भी सो दो भागों में बाँट दिया, लीजिये कल से आगे
लेखन का विषय :- वैसे तो यहाँ पर सभी ने अपने अपने पसंद और महारत के हिसाब से अपनी लेखनी का विषय चुना हुआ है और कईयों ने तो अपने चिट्ठों को नाम भी उसी के अनुरूप दिया हुआ है। ये ठीक भी है, चिट्ठे के नाम से ही पता चल जाता है की अमुक विषय पर आधारित ही होगा। मगर चूँकि अभी हिन्दी ब्लोग्जगर संख्या के हिसाब से इतना ज्यादा बड़ा नहीं है इसलिए स्वाभाविक रूप से किसी न किसी ट्रेंड में ढल कर उसी के अनुसार ही चलता चला जाता है। सबसे प्रचलित प्रवृत्ति होती है किसी भी सामयिक विषय पर लिखना, सबसे अच्छी बात ये है की देखने में ये आया है की किसी भी ज्वलंत विषय पर ब्लॉग्गिंग में सामयिक लेखन , जो कि अक्सर बहस में बदल जाता है वो मडिया में उससे सम्बंधित किसी भी तर्क वितर्क से ज्यादा निष्पक्ष और ज्यादा स्तरहीन होता है और ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि ब्लॉगजगत में विचारों की स्वतन्त्रता है । मेरे ख्याल से किसी भी नए ब्लॉगर के लिए ये एक आसान विकल्प होता है कि उस सामयिक विषय पर चल रही बहस का हिस्सा बन जाए, अपने विचार और तर्क रखे। इनसे अलग जो लोग विशिष्ट विषयों, संगीत, क़ानून, स्वास्थय , आदि पर लिख रहे हैं उनका तो कहना ही क्या, मैं तो लवली जी के सापों वाले ब्लॉग को देख कर हैरान रह गया, ये तो बिल्कुल पश्चिमी देशों की खोजी जानकारी वाले चैनेल जैसी थी।
तिप्प्न्नियाँ : - ये तो एक ऐसा विषय है कि जिस पर न जाने कितने ब्लॉगर कितनी ही बार क्या क्या कह और लिख चुके हैं, ख़ुद में भी कई बार काफी कुछ लिख चुका हूँ। पिछले दिनों भी शास्त्री जी से किसी ने तिप्प्न्नियों को लेकर ही कुछ सवाल किए थे जिसका उत्तर उन्होंने बड़े ही वैज्ञानिक और तार्किक रूप से दिया था। दरअसल हर ब्लॉगर चाहता है कि जब वो कुछ लिखे तो सब उसे पढ़ें और बताएं कि कैसा लगा, खासकर नया नया कोई यहाँ आया तो तरसता रहता है तिप्प्न्नियों के लिए, मैंने पहले भी सुझाव दिया था कि कुछ लोगों कि ऐसी टीम बनाए जाए जो कि नए ब्लोग्गेर्स को न सिर्फ़ प्रोत्साहित करने के लिए टिप्पणियाँ करें बल्कि उनका मार्ग दर्शन भी करें, वैसे ये व्यवस्था यदि संकलकों की तरफ़ से हो पाती तो क्या बात थी। यहाँ यदि उड़नतश्तरी जी, महेंद्र भाई, पी दी जी, ममता जी, शास्त्री जी, अलोक भाई आदि की चर्चा न करूँ तो ग़लत होगा , सच तो ये है कि ब्लॉगजगत के नए ब्लॉगर और पुराने भी इनकी तिप्प्न्नियों के बगैर तो अधूरे हैं। एक बात तिप्प्न्नियों के बारे में हमेशा उठती है कि क्या ये ठीक है कि हम किसी को टिप्प्न्नी करें तो बदले में वो टिप्प्न्नी करे, बल्कि जिसे जो अच्छा लगा वो ख़ुद ही टिप्प्न्नी करे, मेरे ख्याल से तो ये एक परिवार है , जहाँ सब कुछ परस्पर ही होता है । ये ठीक है कि जब आप उस स्थान पर पहुँच जायेंगे जब लोग आपकी लेखनी का इंतज़ार करेंगे तो शायद आप कभी कभी टिप्प्न्नी न भी करें तो चलेगा, मगर महाराज कसम खा लेना कि टिप्प्न्नी नहीं ही करनी है तो फ़िर तो ये शायद ग़लत हा। एक बात और कई लोगों कि या बहुतों कि ये आदत होती है कि टिप्प्न्नी पढ़ कर उसके बाद कोई प्रतिक्रया नहीं देते, ऐसा ना करें। हो सकता कि कोई दोबारा जाकर अपनी बात पर आपकी बात पढ़ना चाहता हो। और हाँ अनाम जी की टिप्प्न्नी का कभी बुरा न माने वे तो बेचारे शायद मनसे ( अजी वही मुंबई वाली ) के सदस्य लगते हैं।
पसंद सूची :- अपने ब्लॉग पर अपने पसंद के ब्लोग्गेर्स की उनके चिट्ठे की सूची जरूर बनाएं , जरूरी नहीं कि ये संख्या में कितनी हो या कि एक बार बना दी तो बना दी, उसे अपनी पसंद के हिसाब से बदल सकते हैं। मेरे कहने का मतलब ये है कि ये एक नेट वर्क की तरह का काम करता है, हो सकता है कि किसी को आपका ब्लॉग भी पसंद आ जाए और वो उसे अपनी पसंद सूची में दाल दे ।
विभिन्न विषयों में लेखन :- ये हिन्दी ब्लॉग जगत के लिए अच्छी बात है कि इसमें न सिर्फ़ हिन्दी में बल्कि लोग अपनी मातरि भाषा में भी लिख रहे हैं, विशेह्स्कर भोजपुरी और मैथिलि के तो कई सारे चिट्ठे लिखे जा रहे हैं, मगर न जाने क्यों उनमें भी आपस में कोई संपर्क नहीं है, या शायद किसी वजह से रखना नहीं चाहते, यदि ऐसा है तो ग़लत है, मैं पहले भी कह रहा हूँ कि दायारा बनाने से आपका और इस ब्लॉगजगत का दोनों का ही फायदा है, और हाँ एक चिटठा कम से कम हिन्दी में जरूर ही बन्याएं, आख़िर जिस लिपि और भाषा का प्रयोग आप कर रहे हैं उसके प्रति आपका भी तो कुछ फ़र्ज़ बँटा है ।
सामूहिक ब्लॉग का न्योता झट से स्वीकार करें : - वैसे तो ये कम ही होता है, कम से कम मुझे तो आज तक किसी ने ये मौका नहीं दिया, लेकिन यदि आपको कोई देता है तो जरूर स्वीकार करें, यकीन मानिए इससे आपका मंच और मजबूत होगा।
तो फ़िर अभी के लिए इतना ही, आशा है कि आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे .
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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
ब्लॉग्गिंग के कुछ आजमाए नुस्खे
कुछ भी लिखने से पहले इतना बता दूँ की ये जो कुछ भी मैं आपको बताने जा रहा हूँ इसलिए नहीं की मैं ब्लॉगजगत का कोई पहुंचा हुआ पंडित हूँ न ही ये की इन नुस्खों के परिणाम का कोई प्रमाण है मेरे पास। बस यूँ समझिये की पिछले एक साल के अनुभवों पर जो सीखा समझा है उसे बांटने की कोशिश कर रहा हूँ। देखें की आपको कितना सही ग़लत लगता है।
शीर्षक :- मेरे ख्याल से किस भी विधा और विषय में लेखन के लिए आवश्यक होता है एक बढिया शीर्षक। आप किस भी पोस्ट को सबसे पहले क्या देखते हैं, चिट्ठे का नाम, चिट्ठाकार का नाम , विषय, शायद नहीं। आप पहले उसका शीर्षक पढ़ते हैं , फ़िर उसीके अनुसार अपने स्वाद के हिसाब से पूरी पोस्ट का मजा लेते हैं। इसलिए कविता, ग़ज़ल, फोटो, कहानी, लेख, संस्मरण,कुछ भी लिखें तो अच्छी तरह सोच विचार के लिखें। यहाँ एक दिलचस्प बात बताता चलूँ। अभी कुछ दिन पहले ही एक ब्लॉगर भाई ने शीर्षक दिया, बकवास है इसे तो बिल्कुल न पढ़ें, यदि अमरीका, इंग्लैंड होता तो शिश्तार्चार्वश कोई नहीं पढता , मगर हम तो हैं ही उल्टे लोग, सो नतीजा ये निकला की सबने खूब पढ़ा, और यकीनन वो जो भी था, बकवास तो कतई नहीं था । मैं ये नहीं कह रहा की उल्टे पुलट शीर्षक लिख कर ही आप अपनी तरफ़ सबका ध्यान आकर्षित करें। मगर कोशिश ये जरूर होनी चाहिए की शीर्षक रोचक हो और प्रस्तुत सामग्री से सीधा सम्बंधित हो। और हाँ ये भी की शीर्षक बहुत ज्यादा लंबा न हो तो ही अच्छा।
लेखन शैली :- कहते हैं की हर इंसान का कुछ भी कहने , लिखने का अंदाजे बयां अपना अलग ही होता है और बिल्कुल जुदा भी, वो कितनी भी कोशिश करे कहीं न कहीं वो अपने रवानगी में उस अंदाज में पहुँच ही जाता है। और सच पूछें तो तो ये होना भी चाहिए। अब देखिये न अशोक जी की चकल्लस में, अलोक जी के पुराण में और अपने उड़नतस्तरी जी की चुटकियों में हास्य व्यंग्य होता है मगर ये उनकी शैली ही है जो उनकी पहचान बन गयी है और हमारे मुंह का स्वाद भी। हालाँकि ऐसा स्वाभाविक रूप से ही होता है, मगर कुछ लोग बिल्कुल ऐसा लिखते हैं जैसे बेमन से लिख रहे हों या फ़िर ऐसा की की कहीं से बिल्कुल नकल मार कर टीप दिया हमारे झेलने के लिए , जानते हैं इसका नतीजा क्या होता है, बिल्कुल तत्वहीन और नीरस लगता है वो सब कुछ। नहीं जरूरी तो बिल्कुल भी नहीं है की आप भी दूसरों की देखा देखी कुछ नया और बदला हुआ करने की चाहत में अपने स्तर और शैली के साथ कोई नया प्रयोग या खिलवाड़ करें।
ब्लॉग का स्वरुप/ साज सज्जा :- इसका सीधा सा मतलब है ,की जो आँखों को सुंदर लगता है, वो मन को भी भाता है । यानि जो ब्लॉगर अपने ब्लॉग को सजाना संवारना जानते हैं , उन्हें निश्चित रूप से ये कोशिश करनी चाहिए की चाहे थोड़ी मेहनत ज्यादा करनी पड़े , मगर ये जरूरी है, यहाँ दो बातें और कहना चाहता हूँ। एक तो ये की जो भी महानुभाव या गुरूजी लोग ये कला जानते हैं वे हम जैसे लोगों को भी सिखाएं, और जो मेरी तरह अनाडी हैं वे एक काम तो कर ही सकते हैं की कम से कम तम्प्लेट अच्छा सा चुनें, कई लोगों तो ऐसा तम्प्लेट चुन रखा है की ब्लॉग खुलते ही सिर्फ़ धुंधला और काला दिखता है.और हाँ यदि आसान हो और मन करे तो थोड़ा बहुत परिवर्तन भी करते रहे, अजी अपनी नयी नयी फोटो ही लगा दें, अचा लगेगा ये बदलाव आपको भी।
पोस्ट करने का समय :- जानते हैं, ये ब्लॉग्गिंग का सबसे महत्वपूर्ण नुस्खा है। मैं सोच रहा था की इस पोस्ट को यहं भारत में रहते हुए में किसी रविवार की सुबह पोस्ट करूंगा। सीधा सा कारण है, मेरे अनुभव के हिसाब से ये सबसे उपयुक्त दिन और समय है किसी पोस्ट के लिए , खासकर यदि आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो। दरअसल होता ये है की , सुबह या दिन के प्रारम्भिक समय में जब बी एपी कुछ पोस्ट करेंगे तो तो ज्यादा समय तक लोगों पाठकों की नज़र में रहेगा, क्योंकि अग्ग्रीगातोर्स, या संकलकों की एक सीमितता है पोस्ट्स को दिखने की और स्वाभाविक रूप से जितना ज्यादा समय तक पोस्ट दिखती रहेगी उतने ज्यादा लोगों के पढने की सम्भावना बनी रहती है, वैसे तो जब आपको पढने वाले नियमित पाठक मिल जायेंगे तो ये सब बात मायने नहीं रखती हैं, किंतु नए ब्लोग्गेर्स को चाहिए की वे निश्चित रूप से दिन के या सुबह अपनी पोस्ट को प्रकाशित करें।
चलिए फिलहाल इतना ही आगे की बातें भविष्य में, यदि कुछ कहना , बताना चाहे तो स्वागत है .
शीर्षक :- मेरे ख्याल से किस भी विधा और विषय में लेखन के लिए आवश्यक होता है एक बढिया शीर्षक। आप किस भी पोस्ट को सबसे पहले क्या देखते हैं, चिट्ठे का नाम, चिट्ठाकार का नाम , विषय, शायद नहीं। आप पहले उसका शीर्षक पढ़ते हैं , फ़िर उसीके अनुसार अपने स्वाद के हिसाब से पूरी पोस्ट का मजा लेते हैं। इसलिए कविता, ग़ज़ल, फोटो, कहानी, लेख, संस्मरण,कुछ भी लिखें तो अच्छी तरह सोच विचार के लिखें। यहाँ एक दिलचस्प बात बताता चलूँ। अभी कुछ दिन पहले ही एक ब्लॉगर भाई ने शीर्षक दिया, बकवास है इसे तो बिल्कुल न पढ़ें, यदि अमरीका, इंग्लैंड होता तो शिश्तार्चार्वश कोई नहीं पढता , मगर हम तो हैं ही उल्टे लोग, सो नतीजा ये निकला की सबने खूब पढ़ा, और यकीनन वो जो भी था, बकवास तो कतई नहीं था । मैं ये नहीं कह रहा की उल्टे पुलट शीर्षक लिख कर ही आप अपनी तरफ़ सबका ध्यान आकर्षित करें। मगर कोशिश ये जरूर होनी चाहिए की शीर्षक रोचक हो और प्रस्तुत सामग्री से सीधा सम्बंधित हो। और हाँ ये भी की शीर्षक बहुत ज्यादा लंबा न हो तो ही अच्छा।
लेखन शैली :- कहते हैं की हर इंसान का कुछ भी कहने , लिखने का अंदाजे बयां अपना अलग ही होता है और बिल्कुल जुदा भी, वो कितनी भी कोशिश करे कहीं न कहीं वो अपने रवानगी में उस अंदाज में पहुँच ही जाता है। और सच पूछें तो तो ये होना भी चाहिए। अब देखिये न अशोक जी की चकल्लस में, अलोक जी के पुराण में और अपने उड़नतस्तरी जी की चुटकियों में हास्य व्यंग्य होता है मगर ये उनकी शैली ही है जो उनकी पहचान बन गयी है और हमारे मुंह का स्वाद भी। हालाँकि ऐसा स्वाभाविक रूप से ही होता है, मगर कुछ लोग बिल्कुल ऐसा लिखते हैं जैसे बेमन से लिख रहे हों या फ़िर ऐसा की की कहीं से बिल्कुल नकल मार कर टीप दिया हमारे झेलने के लिए , जानते हैं इसका नतीजा क्या होता है, बिल्कुल तत्वहीन और नीरस लगता है वो सब कुछ। नहीं जरूरी तो बिल्कुल भी नहीं है की आप भी दूसरों की देखा देखी कुछ नया और बदला हुआ करने की चाहत में अपने स्तर और शैली के साथ कोई नया प्रयोग या खिलवाड़ करें।
ब्लॉग का स्वरुप/ साज सज्जा :- इसका सीधा सा मतलब है ,की जो आँखों को सुंदर लगता है, वो मन को भी भाता है । यानि जो ब्लॉगर अपने ब्लॉग को सजाना संवारना जानते हैं , उन्हें निश्चित रूप से ये कोशिश करनी चाहिए की चाहे थोड़ी मेहनत ज्यादा करनी पड़े , मगर ये जरूरी है, यहाँ दो बातें और कहना चाहता हूँ। एक तो ये की जो भी महानुभाव या गुरूजी लोग ये कला जानते हैं वे हम जैसे लोगों को भी सिखाएं, और जो मेरी तरह अनाडी हैं वे एक काम तो कर ही सकते हैं की कम से कम तम्प्लेट अच्छा सा चुनें, कई लोगों तो ऐसा तम्प्लेट चुन रखा है की ब्लॉग खुलते ही सिर्फ़ धुंधला और काला दिखता है.और हाँ यदि आसान हो और मन करे तो थोड़ा बहुत परिवर्तन भी करते रहे, अजी अपनी नयी नयी फोटो ही लगा दें, अचा लगेगा ये बदलाव आपको भी।
पोस्ट करने का समय :- जानते हैं, ये ब्लॉग्गिंग का सबसे महत्वपूर्ण नुस्खा है। मैं सोच रहा था की इस पोस्ट को यहं भारत में रहते हुए में किसी रविवार की सुबह पोस्ट करूंगा। सीधा सा कारण है, मेरे अनुभव के हिसाब से ये सबसे उपयुक्त दिन और समय है किसी पोस्ट के लिए , खासकर यदि आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो। दरअसल होता ये है की , सुबह या दिन के प्रारम्भिक समय में जब बी एपी कुछ पोस्ट करेंगे तो तो ज्यादा समय तक लोगों पाठकों की नज़र में रहेगा, क्योंकि अग्ग्रीगातोर्स, या संकलकों की एक सीमितता है पोस्ट्स को दिखने की और स्वाभाविक रूप से जितना ज्यादा समय तक पोस्ट दिखती रहेगी उतने ज्यादा लोगों के पढने की सम्भावना बनी रहती है, वैसे तो जब आपको पढने वाले नियमित पाठक मिल जायेंगे तो ये सब बात मायने नहीं रखती हैं, किंतु नए ब्लोग्गेर्स को चाहिए की वे निश्चित रूप से दिन के या सुबह अपनी पोस्ट को प्रकाशित करें।
चलिए फिलहाल इतना ही आगे की बातें भविष्य में, यदि कुछ कहना , बताना चाहे तो स्वागत है .
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