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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

हां ! तो कौन कहता है हिंदी ब्लॉगिंग से कमाई नहीं होती बे........




जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी , तब वो ब्लैक एंड व्हाईट पिक्चर की तरह नहीं भी तो भी थ्री डी डायमेंशन वाली भी नहीं थी । हालांकि तब हमें खुद इस बात की सुध नहीं थी कि ब्लॉगिंग में घुस कर हम कोई तीर मारने जा रहे हैं .......बस ये कुछ इस तरह था मानो जो कलम घिसाई करते थे वो कुछ कुछ लोहा कुटाई में परिवर्तित हो रहा था ...। मगर प्रतिक्रियाओं ने जरूर एक रोमांच सा बढा दिया था .....और आज जो नए बैट्समैन ..अरे नए ब्लॉगर यार ... एक पोस्ट लिखने के बाद ..टिप्पणी की हाफ़ सेंचुरी की उम्मीद बांध बैठते हैं ..उनके लिए बताते चलें कि उस वक्त तो स्कोर कुछ इस तरह का हुआ करता था कि पच्चीस पोस्टें ....पढी गईं ....दस बार .....टिप्पणी .....अबे चलो दस के दस यूं ही निकल जाया करते थे ....। और हमारी बहादुरी देखिए ..कि हम डटे रहते थे मैदान में ....आखिर बाद में लंबी पारी जो खेलनी थी ।

मगर फ़िर भी पहले के एक डेढ सालों तक बस कैफ़े वाले का पिछले जन्म का कोई कर्जा लिया था ...ससुरे का वही उतारते से रहे । बाद में श्रीमती जी ने जाने किस डर से ( हालांकि ये अभी तक एक राज बना हुआ है कि उन्हें हमारे एक डेढ घंटे की आजादी से दुशमनी के कारण , या फ़िर कैफ़े में होने वाले "लव आजकल "टाईप के फ़्लू से हमें बचने बचाने की खातिर , ) हमें लैपटॉप गिफ़्ट कर दिया । हा हा हा ......वो दिन और आज का दिन ...आज तक उस घडी को कोसती हैं .........मुई ब्लॉगिंग न हो गई सौतन हो गई ....। अब हमारा क्या है ..हमारा तो दोनों पर ही जोर नहीं चलता ......ने ये छोडी जाती है ...न वो हमें छोडती है ..खैर ये तो घर घर की कहानी है । मारिए गोली इसे ।

तो मैं कह रहा था कि जब घर पर ही कंप्यूटर ले लिया तो ये बिल्कुल उसी तरह से हो गया जैसे किसी अघोरी को शमशान में ही फ़्लैट मिल गया हो ...अब दिन रात धूनी जमी रहती थी । मगर कसम इस लैपटॉप की जो कभी ये ख्याल मन में आया हो कि ........एक धेला भी किसी दिन इस ब्लॉगिंग के नाम पर ....मुझे मिलेगा । अलबत्ता जिन एक आध मित्रों को मैंने जबरन इस ब्लॉगिंग में उतारा .....उन्हें जरूर ये कहा कि बस एक बार आप ब्लॉगिंग शुरू करो ...कुछ दिनों में ही नौकरी से भी मन उकताने लगेगा ...इतना नांवा कूटोगे ....इश्वर खैर करे ...आज यदि वे सब ये पोस्ट पढें तो .जरूर ही मुझे कोस कर माफ़ कर दें .....क्योंकि थोडे दिनों बाद नौकरी से मन तो उकताने लगा उनका ......मगर नांवें के चक्कर में नहीं ...टिप्पणी के चक्कर में ......ये तो होना ही था । मुझे पता था इस गूगल बाबा को कौन सा हम हिंदी के ब्लॉगर .....नोबेल पुरस्कार जितवा देंगे ..जो हमारे खाते कुछ बांधे ।


अचानक एक दिन श्री रवि रतलामी जी की एक पोस्ट के माध्यम से ( शायद उनकी रविवारीय चिट्ठाचर्चा वाली पोस्ट थी ) में उन्होंने दैनिक जागरण के नए ब्लॉगिंग मंच जागरण जंक्शन से परिचय करवाया ।


हमने भी आव देखा न ताव ..दन्न से "ब्लॉग बकबक " के नाम से खाता खोल दिया । वर्डप्रैस के प्लेटफ़ार्म पर होने के कारण ये जितना सुस्त था उतना ही उबाऊ भी । मगर इसकी जिस खासियत ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो ये थी कि जितने भी लोग इस मंच से जुडे हुए थे वे सब के सब ...हिंदी के अनियमित , दूर दराज़ के क्षेत्र से , और बहुरंगी ब्लॉगर थे । अपने लिए तो ये एक वैकल्पिक मंच की तरह था । सो ब्लॉगर पर जो भी लिखते ..उसे वहां चेप आते ।

कुछ दिनों बाद पता चला कि जागरण जंक्शन पर एक प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है "ब्लॉग स्टार कॉंटेस्ट " । इसमें विजेताओं को , प्रथम तीन को तो लैपटॉप , एक डिजिटल कैमरा , और एक मोबाईल मिलने की घोषणा की गई । अन्य सात लोगों को 1100 की राशि दिए जाने की योजना थी । मगर हाय री किस्मत , जब हमें ये पता चला , तब तक उस ब्लॉग का यूजर नेम और पासवर्ड ही हम भूल गए । सो टालमटाल वाली बात हो गई । मगर फ़िर पाबला जी के सहयोग से उसे फ़िर से ढूंढ निकाला गया , उन्होंने बताया कि किस तरह से नया पासवर्ड बनाया जा सकता है ।
खैर गाडी चलती रही , इसके बाद एक दिन अचानक , एक मेल मिली कि आपको प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ बीस ब्लॉगों की सूची में स्थान दिया गया है । आयं , हम चौंके , अबे जब पासवर्ड भूल कर ब्लॉगिंग कर रहे तो तो टॉप ट्वेंटी में , यदि याद रहता तो ...। खैर उसके बाद अपना भी थोडा बहुत मन लगने लगा ,घुस जाते थे जब तब वहां , और अपने "झा जी कहिन " की चर्चाओं में भी उस मंच की पोस्टों का जिक्र किया मैंने कई बार । अंतत: एक दिन एक और मेल आई कि आपके ब्लॉग को सर्वश्रेष्ट दस ब्लॉगकी सूची में स्थान दिया गया है ।

बस ....उसके बाद तो जैसे ......हो गई अपनी बल्ले बल्ले......हो गई रे बल्ले बल्ले..। प्रतियोगिता के अंतिम परिणाम में शायद सांतवां स्थान दिया गया मुझे ....और वही ग्यारह नोट पक्के हो गए । तो बताईये ...कहानी की हैप्पी एंडिंग ..किसे नहीं अच्छी लगती भला ?
अब सुना है कि जागरण जंक्शन पर ये प्रतियोगिता दोबारा भी और शायद उसके बाद भी आयोजित होती रहेगी । फ़िलहाल उसमें , सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर जैसा नया फ़ीचर भी जोडा गया है ...........तो देर किस बात की है ....शुरू हो जाईये .......और हां अब ये मत कहना कि हिंदी ब्लॉगिंग में पैसे नहीं मिलते .........मैं नहीं मानूंगा .....

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

ब्लोग्गिंग के स्वरूप को लेकर मेरी दुविधा


पिछली पोस्ट के समय मन की स्थिति कैसी थी , शायद बताने की जरूरत नहीं है, इसलिए तब जो भी पहली बात मन में आई वो जस की तस सामने रख दी । बिना किसी बात की परवाह किए । पिछली पोस्ट में आई प्रवीण शाह जी की टिप्पणी ,"
ब्लॉगिंग एक ऐसा माध्यम है जिसमें हर वो बात देर-सबेर लिखी जायेगी... जो आदमी के दिमाग में चलती है...यही ब्लॉगिंग की ताकत भी है... इन सब बातो से इतना परेशान या ऑफेंडेड होने की आवश्यकता नहीं... आभिजात्य सौन्दर्यबोध रखने वालों के लिये तो नहीं ही है ब्लॉगिंग "

ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया , और मैं बार बार यही सोच रहा था कि , आखिर क्यों , ये अपेक्षा क्यों । क्या इसलिए कि मैं खुद हिंदी ब्लोग्गिंग से जुडा हुआ हूं । क्या इसलिए कि जब मैं दूसरे लोगों को सीना फ़ुला कर ये कहता हूं कि हां मैं भी ब्लोग्गिंग करता हूं हिंदी में तो उस वक्त मुझे ये अपेक्षा रहती है कि सामने वाला कहेगा वाह । और जब पाता हूं यहां की स्थिति तो खुद ही अपने मुंह से निकलता है आह ।

अपनी खुद की टिप्पणी में मैंने लिखा ,"कल मन विक्षुब्ध था और उत्तेजित भी , इसलिए जो दिल ने सोचा कहा वो जस का तस आपके सामने रख दिया , और उस पर आपने जो सोचा जाना वो मेरे साथ और पूरी ब्लोगजगत के साथ बांटा । अक्सर बिना मोडरेशन वाले मेरे जैसे ब्लोग्स उन ब्लोग्गर्स के लिए अखाडे की तरह बन जाते हैं , और वो खुल कर अपने जौहर दिखाते हैं , खैर ये तो .....और यही तो ब्लोग्गिंग है । संकंलकों का अपनी नीति है अपना फ़ैसला है , मेरे मन में जो था वो मैंने कह दिया , और भविष्य में भी ऐसा नहीं करूंगा इस बात की कोई गारंटी भी खुद को नहीं दे सकता हूं । बस इतना चाहता था और आगे भी चाहता रहूंगा कि , सिर्फ़ चंद लोग मिलकर पूरे ब्लोग जगत का माहौल बिगाड सकने की क्षमता रखते हैं तो ऐसे में किंकर्तव्यविमूढ होकर चुप बैठे रहना ऐसे लगता है जैसे अचानक फ़ालिज़ का दौरा पडने पर तन मन सब शिथिल हो गया हो हो । आज इससे ज्यादा कुछ कहने का मन नहीं है"

अब सवाल ये कुरेद रहा था मन को कि प्रवीण जी की बात तो सही है सौ आने खरी भी , आखिर ब्लोग्गर तो मैं तब भी था न जब टिप्पणी तो टिप्पणी पोस्ट भी रोमन में ही लिख डाली थी , शुरुआत की पोस्टें गवाह हैं । उसे आज कोई पढ ले तो यही कहेगा , लो ये हैं हिंदी के ब्लोग्गर । और आज भी जब कोई कहता है कि हिंदी ब्लोग्गिंग में जाने कितना कचरा भरा पडा हुआ है , तो क्या जाने उसका आशय , पोस्टों से होता है , उसका आशय बेतरतीब ढंग से एक ही ब्लोग में कविता, कहानी, कार्टून, समीक्षा , सब कुछ परोसे जाने को लेकर होता है , या शायद उस सबसे बढकर कभी धर्मवादियों के लगातार चल रही रेस को लेकर तो कभी बात बेबात दो नियमित लेखकों के बीच होने वाले वैचारिक मतभेद से शुरू होकर मनभेद और कभी कभी अपमानजनक स्थिति तक पहुंचने वाले हालातों को लेकर होता है ।ये सच है कि इन सबके बावजूद भी अब भी जब कोई हिंदी ब्लोग्गिंग को अपने निशाने पर रखता है तो मुझे कष्ट होता है , शायद नहीं होना चाहिए , मगर होता है , और ये सच है । और ये कष्ट तब और बढ जाता है या कहूं कि क्रोध में बदल जाता है , जब कोई बाहर का ये सारी बातें करता है ।

मैं कभी कभी दुविधा में पड जाता हूं ब्लोग्गिंग के स्वरूप को लेकर । ये जो भी होता दिखता है , मतभेद , मनभेद , एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड ( फ़िर चाहे वो शब्दों की कलाकारी के सहारे हो या सीधे सीधे अपमानित करने के अंदाज़ में ), बेनामी बनकर /रहकर मन की भडास निकालने की बढती प्रवृत्ति आदि तमाम तरह की बातें तो लगता है कि चाहे कितनी भी रफ़ू की जाए मगर ब्लोग्गिंग का ये कच्चा रूप ही सबसे शुद्ध रूप है blogging is pure ,only when it is raw ,  हम इसे किसी भी तरह से सजाते संवारते हैं , सुधारते हैं तो उसमें ब्लोग्गिंग का जो मौलिक चरित्र है उसमें कमी लाने की कोशिश की तरह होता है । हिंदी ब्लोग्गिंग में ये और भी ज्यादा हो पाता है क्योंकि जाने अनजाने सब एक दूसरे को पाठक के तौर पर लेखक के तौर पर जानने के अलावा भी जानने समझने लगते हैं ।सामुदायिक ब्लोग्स में सहयोग देने वाले ब्लोग्गर्स किस तरह कितने दिनों तक अपरिचित बने रह सकते हैं ये देखना दिलचस्प होता है ।


दूसरी तरफ़ जब पाता हूं कि हिंदी ब्लोग्गर्स एक दूसरे का सुख दुख बांट रहे हैं , बिना ये जाने कि वो किस शहर , किस कस्बे , किस धर्म , किस जाति का है । एक दूसरे की मुश्किलों में साथ आ जाते हैं , बेशक बहुत बार आभासी और बहुत बार वास्तविक भी , मौके बेमौके आपस में मिल बैठते हैं कभी मीट के बहाने ,तो कभी बैठक के बहाने , एक दूसरे को जानते हैं समझते हैं । एक दूसरे के मान अपमान को अपना समझते हैं , तो क्या इससे ब्लोग्गिंग का चरित्र बदल जाता है । क्या इससे गुट बन रहे हैं , या बन जाते हैं , क्या मैं भी उन गुटों का हिस्सा बन जाता हूं , अगर हां तो मुझे क्यों नहीं दिखता उस गुट का कोई भी । क्या इससे सचमुच ही कोई फ़र्क पड रहा है ब्लोग्स को पढने में , उन्हें समझने में , उन पर खुल कर टिप्पणी करने में ?? बहुत से प्रश्न उमड घुमड रहे हैं मन में , अगले कुछ समय तक उनके उत्तर तलाशूंगा ।और हां ये सच है कि हिंदी ब्लोग्गिंग पर लिखना मुझे पसंद है फ़िर चाहे इसके लिए मेरे ब्लोग को हिंदी ब्लोग्गिंग के नाम पर हमेशा रोने धोने वाले ब्लोग की श्रेणी में ही क्यों न रखा जाए ।

रविवार, 7 मार्च 2010

ब्लॉग दुर्बुद्धि जमात का कूड़ा-कचरा है...




जी हां ये उदगार होली से ठीक पहले नई दुनिया दिल्ली के संपादक श्री आलोक मेहता जी ने अपने एक आलेख में लिखे थे । हालांकि इसे उन्होंने बुरा न मानो होली है के बुलेट प्रूफ़ आवरण ओढा कर लिखा था । और बेशक किसी को लगा हो न हो मगर मुझे यदि बुरा न कहूं तो अच्छा भी कतई नहीं लगा । इसलिए अपने इस आलेख पर मैंने अपनी बात कह दी थी । मगर फ़िर इधर देखा तो पाया कि कुछ मित्रों ने उस आलेख पर अपने विचार दिए । कईयों ने इसे मात्र व्यंग्य मानना उचित समझा तो कईयों ने परोक्ष प्रत्यक्ष रूप से कहा कि हिंदी ब्लोगजगत की वाकई ऐसी ही स्थिति है जैसा कि श्री आलोक मेहता जी ने अपने आलेख में फ़रमाया था , यानि कि वे सच ही कह रहे थे । पोस्टों को पढने के दौरान एक ब्लोग्गर ने टिप्पणी में शायद मेर उस पहले लिखे गए आलेख का ईशारा करते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग यहां आलोक मेहता के आलेख का विरोध करते हैं और फ़िर वही लोग कुछ समय बाद अपने आलेख छपने की बात या अपने किसी ब्लोग पोस्ट के छपने की बात कहते हैं । जब ये सब पढा देखा तो लगा कि शायद अभी और लिखना चाहिए इस पर । मुझे आलोक जी का ये व्यंग्य कम से कम स्वस्थ व्यंग्य की श्रेणी का तो कतई नहीं लिखा । इसकी दो वजह हैं मेरे पास । पहली ये कि यदि वे सचमुच ही ब्लोग्गिंग पर लिखना चाहते थे तो यही व्यंग्य वो अपने ब्लोग पर भी लिख सकते थे मगर बाद में तो पता चला कि इस आलेख के बाद उनकी ब्लोग पोस्ट भी गायब हो चुकी थीं । खैर , दूसरी वजह ये कि क्या ऐसा ही व्यंग्य वे अपने कार्यक्षेत्र के लिए भी लिखने की हिम्मत कर सकते हैं । ओह ! नहीं , मगर शायद उनकी नज़र में तो ये सारी खासियतें सिर्फ़ हिंदी ब्लोग्गिंग में ही हैं । मुझे नहीं पता कि जिन मित्रों ने इसे सही ठहराया वे इस निम्न बातों पर अपनी कैसी राय रखते हैं ..मगर जो मैं सोचता हूं ..वो तो बताता ही चलूं ।

ब्लॉग दुर्बुद्धि जमात का कूड़ा-कचरा है...

दुर्बुद्धि जमात ...आलोक जी , आप जिस जमात की बात कर रहे हैं , मुझे ठीक ठीक नहीं पता कि कोई गुंडा, मवाली, मजनू, सडकछाप , उठाईगीरा ,अपराधी भी ब्लोग्गिंग कर रहा है कि नहीं मगर अब तक मैंने , समाज का कोई ऐसा वर्ग , कोई ऐसा क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसके प्रतिनिधि आज ब्लोग्गिंग न कर रहे हों , और हां हिंदी में भी । अरे आगे तो सुनिए ..ये जो आपकी जमात है ...पत्रकारों वाली , हमारे बहुत से ब्लोग्गर मित्र आपही की जमात से हैं श्रीमान ...हां मगर शायद .....छोडिए .....आपके कारण अन्य मित्र पत्रकार ब्लोग्गरों को क्यों कटघरे में खडा करूं ?

हरेक ने ब्लॉग की अपनी दुकान खोल रखी है...

आलोक जी दुकान तो आप लोगों ने भी खोल रखी है , और अपने अपने हिसाब से उसमें माल भी बेच रहे हैं । जैसे हिंदुस्तान ..कांग्रेस का माल बेच रहा है ..तो दैनिक जागरण ..बीजेपी का ..राष्ट्रीय सहारा समाजवादी पार्टी का ..इसी तरह आप सबके प्रोपराईटर्स तो अलग अलग हैं और आप तो सेल्स मैन हैं जी । ब्लोग की दुकान कम से कम किसी के लिए आयोजित प्रायोजित / नफ़े नुकसान जैसी अखबारी नीतियों से तो ऊपर हैं ही ॥
ब्लॉग में कोई कितनी ही भद्दी-गंदी बकवास-सी गालियां उलच दे, कोई सरकार, कोई मालिक, कोई पुलिस या सेनातक कुछ नहीं बिगाड़ सकती...

आलोक जी आपसे किसने कह दिया ऐसा ...आप भी शायद मुगालते में हैं , और यहां तो मैं कई बार ये बता चुका हूं आपको भी बताता चलूं कि अभी बहुत समय नहीं बीता है जब मात्र एक टिप्पणी को अपने यहां पर लगे रहने देने के कारण एक ब्लोग्गर को सर्वोच्च न्यायाल से भी राहत नहीं मिली । और हां आप देकर देखि न किसी को गाली ..सरकार म सेना ,पुलिस तो दूर .....ब्लोग्गर ही ....????

ब्लॉग पर लिखने वाला नाली साफ करने वाली स्टाइल में बदबूदार सामग्री दुनिया-जहां में फैला दे, कोई बाल बांकानहीं कर सकता...

मुझे ये तो नहीं पता ...कसम से आपने अपने उस ब्लोग पर ..किस स्टाइल में ...कितना सुंगधित या बदबूदार ....क्या क्या फ़ैलाया ....मगर हिंदी ब्लोग्गिंग में तो अभी चाहे ...खींचतान की पराकाष्ठा पहुंच चुकी हो, चाहे वैचारिक मतभेद व्यक्तिगत आक्षेप तक पहुंच चुका हो , कुंठा हो , पूर्वाग्रह हो , और भी मानवीय दुर्गुण भी हों ., मगर आपके टेस्ट वाली सामग्री नहीं पहुंची है ।

ब्लॉग प्रभुओं का एक शब्द, अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तक, नहीं कटवा सकता है...खासकरहिंदी ब्लॉग पर उनका बस ही नहीं चल सकता...

कटवा तो आपसे भी कोई कुछ नहीं सकता आलोक जी , क्योंकि आखिर उसके लिए इन महान लोगों को हमारा ब्लोग और ऐसे ही आपकी नई दुनिया पढना भी तो जरूरी है । हमारा तो फ़िर भी अमेरिकी, चीनी या ब्रिटिश प्रधानमंत्री न सही वहां के लोग तो पढते ही हैं । मगर नई दुनिया का क्या कहूं ..दिल्ली में हूं सो जानता हूं कि , दैनिक जागरण , नवभारत टाईम्स, हिंदुस्तान, अमर उजाला के बाद भी कोई किसी अखबार की मांग करता है तो वो राष्ट्रीय सहारा , पंजाब केसरी या और कोई होता है , सब पुरानी दुनिया में ही खुश हैं ....हां हमारे जैसे ..कुछ सनकी पाठक जो आज भी आठ दस अखबार चाट जाते हैं वे जरूर झांकते हैं आपकी नई दुनिया में .....

ऋषि-मुनियों की परंपरा में हिंदी के ब्लॉग बाबाओं को मुदित, क्रोधित, आनंदित होने का अधिकार सुरक्षित...

अधिकारों का क्या कहें वो भी बाबाओं के । मगर फ़िर भी लगता है कि और देखा भी है कि यहां हमारे ब्लोग बाबा , कुछ हल्के फ़ुल्के हास्य , हंसी मजाक , कुछ खुशी ही बांटते हैं । आपकी बाहरी दुनिया के बाबाओं के चमत्कार तो आजकल आपका समाचार पत्रों के पेज भर रहे हैं , अपने कारनामों से ,....अब ये भी बताना पडेगा कि कौन से कारनामों से

वे कुपित होकर ब्लॉग में बड़े से बड़ा शाप दे सकते हैं...
महाभारत के चरित्रों की तरह कोई भी झूठ फैला सकते हैं...
इसके लिए तो पहले आपको साबित करना पडेगा कि महाभारत ही झूठा था , उसके चरित्र भी काल्पनिक थे , और उनका काम सिर्फ़ झूठ फ़ैलाना ही था ....मगर क्या करूं दिल्ली से बाहर निकलते ही एक शहर पडता है ....जिसका नाम है कुरूक्षेत्र .....महाभारत के लिए कहा जाता है कि वह कुरुक्षेत्र में ही हुआ था ....अब क्या करूंगा ज्यादा प्रमाण जुटा के ।आप भी निकलिए न कभी दिल्ली से बाहर ....और हां महाभारत ही क्यों आप भारत को ही झूठ साबित कर डालिए न .....

अपना ब्लॉग बना भद्दी गाली का जवाब भद्दी गाली से दे सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि उसे कोई पढ़े…
ब्लॉग की बकवास का जवाब बकवास से क्यों नहीं दे सकते हैं?

हां सो तो है जी बिल्कुल , मगर आलोक जी अब इसका क्या किया जाए कि इतने बडे बडे संपादक भी जब अपनी बकवास ब्लोग जगत पर अपना ब्लोग रहते हुए अपने अखबारों में कर जाते हैं , तो उनका जवाब देने के लिए अब ब्लोग्गर अखबार कहां से निकाले और निकाल कर उस पर आपही को जवाब क्यों देता फ़िरे ..इसलिए यहीं पर हाजिर हैं ,,,,,ठीक है न

आकाश लोक के रास्ते आ रहे ब्लॉग पढ़कर अपनी आंखें खराब क्यों करते हैं
इस लेख में बताया गया है कि
इनके स्तर का आनंद लीजिए, जानिए-पहचानिए और फिर भूल जाइए
संभव है, यहां उनकी सामग्री छपने के बाद वे अपने ब्लॉग से यह सामग्री गायब ही कर दें

लो कल्लो बात ये क्या खुद ही लिखा और फ़टाक से खुद ही इंप्लीमेंटेशन भी कर डाला , कमाल है प्रभु । चलिए अब ज्यादा क्या कहें जो बात कहनी थी वो कह दी ।मैं नहीं जानता कि इस बात से कितने लोग इत्तेफ़ाक रखते होंगे और कितने लोग मेरे जैसा ही सोचते होंगे या ऐसा ही अनुभव किया होगा , बस इसलिए लिख दिया है ...बांकी तो ब्लोग्गर्स खुद तय कर देंगे । हां चलते चलते एक बात और मैंने कहीं भी प्रिंट मीडिया उससे जुडे पत्रकारों , विभिन्न समाचार पत्रों द्वारा ब्लोग पोस्ट्स को पढने छापने का विरोध नहीं किया है ..मैं खुद आज भी जाने कितने आलेख लिख और छप रहा हूं । हां , मगर उस मानसिकता का कि हिंदी ब्लोगजगत कूडा कचरा है , उस मानसिकता का ,,,चाहे वो नई दुनिया के संपादक हों या , कोई बलोग्गर खुद हों , उसका विरोध किया है और करता रहूंगा ।


सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

तो आप ही बताईये कि आखिर ब्लोग्गिंग है क्या ???




लगभग ढाई साल होने को आए इस मुंए ब्लोग्गिंग के अंतरजाल में फ़ंसे हुए । जब शुरू शुरू में आए थे तो सच कहें तो कुछ भी नहीं सोचा था ...अजी सोचते क्या खाक ..जब पता ही नहीं था कि ये ब्लोग्गिंग आखिर है क्या बला ? बस ब्लोग बना जैसे तैसे घुस लिए , कुछ दिनों बाद दोस्तों को पकड के फ़ोटो शोटो भी लगा ली , डेढ साल तक नगरी नगरी टाईप ....कैफ़े कैफ़े भटक कर ब्लोग्गिंग करते रहे ....पता नहीं .....मगर लगा कि ब्लोग्गिंग करते रहे , पिछले साल जब से कंप्यूटर लिया बस जैसे इसी के होकर रह गए । इतने कि सोच भी ब्लोगनुमा होकर रह गई । अब तो लगता है कि चार पन्नों का आलेख या दो पन्नों का हास्य लिखने के नए सिरे से सब शुरू करना होगा । मगर इस बीच एक खुशफ़हमी तो हो ही गई कि चलो सब छूटा तो छूटा ..ब्लोग्गिंग तो कर ही रहे हैं .......मगर हाय रे ...ये क्या ...अब तो ये कहा जाने लगा है कि नहीं ये ब्लोग्गिंग नहीं है ????

ओह अच्छा अच्छा तो ये भी ब्लोग्गिंग नहीं है , पोस्टें लिखी , पोस्टों में क्या लिखा ....अरे ये कहिए कि क्या नहीं लिखा ...आलेख लिखे, कविता लिखी , कहानी लिखी , व्यंग्य लिखा ....चर्चा न सही ..ब्लोग के लिंक्स लगा के दू लाईना भी खूब ठेली , इसके लिए पहले एक दो ...फ़िर जाने कितने और कहां कहां ब्लोग बना लिए । कुछ गंभीर और संजीदा लिखने के लिए भी । इसके बढ कर न सिर्फ़ लिखा बल्कि इसके बाद दूसरों को पढने की आदत डाल ली और जब से ये आदत डली , उंगलियों ने टिप्पणी करना जाने कैसे सीख लिया । बेशक रफ़्तार कभी कम कभी ज्यादा होती है मगर टिप्पणियां तो चलती रहती है ।कभी सबने लाख कहा कि ये आभासी दुनिया यहां दूर से ही शाबासी लिए जाओ और पास आकर मिलने मिलाने लगोगे तो सबको उबासी आने लगेगी , हमने कहा आती है तो आती रहे , हम लगे मिलने मिलाने , बैठने बैठाने , और जाने क्या क्या सपने सजाने लगे । एक दिन हिंदी ब्लोग्गिंग की भी चर्चा होगी , लोग जानना चाहेंगे कि हिंदी ब्लोग्गर्स इन दिनों किस दिशा में सोच रहे हैं क्या लिख रहे हैं । पूरा मीडिया , समाज , प्रशासन , और देश भी (क्योंकि आखिर ब्लोग्गिंग की दुनिया इन्हीं से तो बसी हुई है ) एकटक न सही मगर इस बात की प्रतीक्षा करते मिलेंगे कि .....देखें इस मुद्दे पर हिंदी ब्लोग्गर्स का स्टैंड क्या है ??? और ऐसा होगा यकीनन होगा एक न एक दिन ...

मगर मुझे तो फ़िलहाल यही समझ में नहीं आ रहा है कि यदि जो सब ऊपर मैंने कहा है यदि वो सब ब्लोग्गिंग नहीं है तो फ़िर भईया आखिर है क्या ब्लोग्गिंग , हमे कोई ठीक ठीक बताए कि ब्लोग्गिंग क्या है ....हिंदी की सेवा तो कर नहीं रहे , लोगों से मिलने मिलाने के पीछे भी हमारा कोई छुपा एजेंडा है ..जरूर कोई गुप्त गुट बना रहे हैं हम ....हो सकता है हमारे गुट का उपयोग अगले साल हम राहुल गांधी को हराने के लिए कर दें .....बार बार दूसरे पाठकों की पोस्टों को पढ के आपत्ति दर्ज़ नहीं कराते ......साफ़गोई नहीं है न हमारे भीतर ..सिर्फ़ अच्छा अच्छा सुनने का मन करता है हमारा ....यही चाहते हैं कि सभी बडाई करते रहें हमारी .....तभी तो जब मन होता है सभी मित्रों को बुला बैठा लेते हैं गपिया लेते हैं ...मन की कह और सुन लेते हैं...........ये भी मुई ब्लोग्गिंग नहीं है ??????किसी के नाम से नकारात्मक पोस्ट नहीं लिखते ...किसी को भर भर के नहीं कोसते ....साफ़ साफ़ कहने से बचते हैं न हमेशा ...वही न्यूट्रल गीयर .....मगर फ़िर भी तो सब कह ही जाते हैं कि न ये भी ब्लोग्गिं नहीं है ???????उफ़्फ़ उफ़्फ़ ...ढूंढ रहा हूं .........तो आखिर है क्या ब्लोग्गिंग .....और कैसी होती है ...यदि हिंदी में ब्लोग्गिंग नहीं हो रही है ..तो बताईये न कहां पर हो रही है ......चल के वहीं से सीखा जाए ....और फ़िर की जाए ब्लोग्गिंग ...??? अभी चिंतन मनन में फ़िर वही .....एक पोस्ट लिख मारी है ....जब तक ब्लोग्गिंग न आ जाए तब तक काम चलाईये ....



सोमवार, 11 जनवरी 2010

फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग बनाम गंभीर लेखकिंग



पिछले साल का अंत हिंदी ब्लोग्गिंग में जितना उठापटक वाला रहा था ,उससे ये तो अंदाजा था कि नये साल मेंबहुत कुछ और बहुत सारा होने वाला है, मगर ये गुमान कतई नहीं था कि समुद्र मंथन की तरह ब्लोग्गिंग मंथन भीशुरू हो ही जाएगा और आजकल तो खूब मजा रहा है, जब ब्लोग्गिंग में ब्लोग्गिंग की बात हो तो उससेमजेदार कुछ भी नहीं लगता , फ़िर बात जब मजे से ज्यादा गंभीरता/विश्लेषण/तर्क चिंता तक पहुंच जाए तो समझजाना चाहिए कि अब वास्तव में परिवर्तन की चाहत दिख रही है सबसे ज्यादा खुशी मुझे इस बात की हुई कि , इस बहस में, हालांकि ये कोई आयोजित/ प्रायोजित बहस नहीं थी , नये पुराने, बडे छोटे, नवोदित , नियमित/अनियमित ...कहने का मतलब कि सभी ब्लोग्गर्स ने अपने अपने विचार एक दम ठां करके रख दिए और यही तो खासियत है इस ब्लोग्गिंग की इसी संदर्भ में कहीं पढा कि फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग से ब्लोग्गिंग का स्तर गिर रहा है और अच्छा होगा, बल्कि कहें कि कहा तो ये गया कि ब्लोग्गिंग की बेहतरी इसी में है कि सिर्फ़ गंभीर लेखकिंग की जाए देखिए अब ये मत कहिएगा कि ये क्या लेखकिंग ..अजी गंभीरता आएगी तो शोध तो होंगे ही नवशब्दावेषण नहीं हुए तो काहे कि गंभीरता जी

तो फ़िर वही चिर प्रश्न सामने आके खडा हो गया , यक्ष प्रश्न की तरह , कि आखिर तय कौन करेगा अब तो स्थापित और मान्य स्तंभ भी अपनी जडें बचाने में लगे हैं जाने किन निरे तूफ़ानों ने उनकी जडों को हिला कररख दिया या शायद इसलिए भी कि बरगद सरीखे उन वृक्षों को नई पौध की लंबाई से भय का एहसास होने लगा था जबकि उन्हें तो अपने ऊपर ये भरोसा रखना चाहिए था कि वे वट वृक्ष हैं खैर ये तो वैसे भी क्षरण का दौर है , प्रकृति के लिए भी और शायद साहित्य के लिए भी मगर इस क्षरण के लिए हिंदी ब्लोग्गिंग को ही जिम्मेदार ठहराने का कोई वाजिब कारण अभी तो मुझे नहीं मिला है इसलिए यदि आज ब्लोग्गिंग में सक्रिय और असक्रिय हजारों ब्लोग्स में से किसी एक को भी फ़ूंफ़ां ब्लोगर नहीं कहा जा सकता तब भी नहीं जब खुद प्रेमचंद आकार ब्लोग लिखने लगें हालांकि मुझे लगता है कि यदि प्रेमचंद ब्लोग लिखते तो वे भी बहुत सफ़ल नहीं होते ...उतनेतो कतई नहीं जितने कि सफ़ल वे साहित्य में हुए और ये भी हो सकता था कि कोई फ़ूंफ़ां ब्लोग्गर उन्हें कई मायनों में पीछे छोड जाता मगर इसके बावजूद प्रेमचंद तो वे रहते ही क्योंकि असली प्रेमचंदत्व तो उनमें इसलिए नहीं निकल जाता कि वे ब्लोग्गिंग कर रहे हैं

वैसे भी ब्लोग्गिंग का एक सबसे शक्तिशाली पहलू जिसे अक्सर इस बहस में दरकिनार कर दिया जाता है वो है ब्लोग्गिंग का निरंकुश होना हां निरंकुश ही तो है ब्लोग्गिंग , तभी तो कभी कोई मनोज वाजपेयी , या रवीशकुमार को कंमेंटियाते वक्त ये नहीं सोचता कि वो सीधा उनसे रूबरू है जिनसे यथार्थत: अपने जीवन में शायद ही वोसब कह पाए इस निरंकुशता की कोई हद भी नहीं है , हालांकि अभी गनीमत ये तो है ही कि हमारे संकलक उनबहुत से बेकार /अश्लील /अधकचरे ब्लोग्स ( जो कि बदकिस्मती से हिंदी में भी हैं ) को हम तक पहुंचने देकरएक छन्नी का काम तो कर ही रहा है मगर इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि इस निरंकुशता की ताकत को पाकरकई बंधु ब्लोग्गर ठीक उसी तरह उन्मादित हो जाते हैं जिस तरह से कोई रिपोर्टर उस समय हो जाता है जब उसेकिसी एक्सक्लुसिव खबर लाने को कहा जाता है जिस पर शायद उसका स्थाईकरण या इंसेंटिव टिका होता है औरफ़िर सिलसिला शुरू होता है खबर लाने के बदले खबर बनाने का ठीक इसी तरह कभी किसी का नाम लेकर / तोकभी किसी की टिप्पणी को मुद्दा बना कर/ कभी किसी की पोस्ट को ही मुद्दा बना कर धूम धडाम लिखने कीकोशिश की जाने लगती है मुझे लगता है कि निरंकुशता में भी ये गलत परंपरा तो है ही

मुझे लगता है कि एक ही ब्लोग्गर में फ़ूंफ़ां और गंभीर टाईप के लेखन दोनों के स्वाभाविक जीवाणु होते हैं और जबजो हावी होता है , उसका प्रतिफ़ल पोस्ट के रूप में हमारे सामने आता है हां मेरे जैसे लिखने पढने और सच कहूंतो इसे गीजने की हद तक घुसने वाले के लिए जब एक साथ कई मूडों और एक साथ ही कई बातों को अलग अलगअंदाज, और अलग अलग सवरूप में कहना हो तो फ़िर वो ढेरों ब्लोग बना के उन्हें उडेलता रह सकता है मुझे तोकभी कभी लगता है कि आखिर कर क्या रहा हूं मैं , जाने कितने ब्लोग बनाता जा रहा हूं , अलग अलग विषय औरअलग अलग फ़्लेवर के लिए , मगर हर लिहाज से वो हैं तो ब्लोग्गिंग के दायरे में ही और फ़िर मैं क्यों बांटूं उन्हेंफ़ूंफ़ां कैटेगरी या कि गंभीरनेस वाले चोले में ????, फ़िर रिटायरमेंट के बाद जब असली ब्लोग्गिंग शुरू होगी वो फ़ुल टाईम जौब वाली तब तो इतने भी कम पडेंगे ।


कभी कभी ....कुछ यूं भी कहने लिखने का मन करता है सो कह दिया ......ठीक किया न ???
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