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बुधवार, 11 मार्च 2020

सनसेट प्वाइंट देख कर न निकलें माउण्ट आबू से





यात्रा के पिछले भागों को आप यहां यहां और यहॉँ पढ़ सकते हैं

          ये तो मैं आप सबको पिछली पोस्टों में बता ही चुका हूँ कि बहन और बहनोई जिनका निवास पिछले दो दशकों से उदयपुर में ही है और उन्होंने जैसे निर्देश हमें दिए उसने हमें बहुत ही सहूलियत दी कैसे हम कम समय में अपनी इस पहली ट्रिप में ज्यादा से ज्यादा स्थान घूम सकें | ऐसे ही माउंट आबू के लिए  निकलते समय हमसे उन्होंने कहा था की माउंट आबू से अपनी वापसी आप लोग शाम होने से पहले पहले की ही रखियेगा यानि आबू जाने के पहले दिन ही वहां का एक मुख्य आकर्षण "सनसेट पॉइंट " देख लें ताकि फिर उस रात्रि वहां विश्राम करने के बाद अगले दिन माउंट आबू के अन्य स्थल देख कर हम शाम ढलने से पहले ही आबू पर्वत के रास्ते की हद से बाहर निकल जाएँ | आबू जाते हुए और वापस आते हुए दोनों ओर घने जंगल और उनमें विचरते जंगली जीवों को देख कर समझ आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था | 





उदयपुर से निकलते हुए हमें सुबह के आठ से ज्यादा हो चुके थे ,गुनगुनी धूप ,साफ़ सुथरे रास्ते और दोनों तरफ पहाड़ियों का सिलसिला ,बीच में ढाबे पर रुक कर पराठा और चाय का नाश्ता करते निपटते हम लगभग 11 बजे के आसपास माउंट आबू में दाखिल हो गए | अपने होटल "बंजारा" (जो कि बिलकुल अपने नाम के अनुरूप बंजारा आवारा सा ही निकला ) में हाथ मुँह धोकर तरोताज़ा होकर हमारा पहला ठिकाना बना नक्की झील |

नक्की  झील माउंटआबू के सबसे खूबसूरत और लोकप्रिय दर्शनीय स्थल में से एक है | कहते हैं कि एक तरफ मैदान और एक तरफ पहाड़ी से घिरे इस खूबसूरत झील का निर्माण "नाखूनों से खोद या खुदवा कर हुआ था " इसलिए भी इसका नक्की झील पड़ा | झील के दूसरी तारफ भारत माता का एक छोटा सा खूबसूरत सा मंदिर भी बना हुआ है | नक्की झील अपनी बोटिंग सुविधाओं और राइड्स के लिए तो मशहूर है इसके साथ ही यहां माउंट आबू के पचास से अधिक दक्ष फोटोग्राफर भी पर्यटकों को झील के किनारे ,बोटिंग करते हुए ,राजस्थानी परिधान में और पास ही स्थित हनीमून पॉइन्ट पर विभिन्न्न भाव भंगिमाओं में फोटो खींचते देखे जा सकते हैं | सर्दियों के दिनों में भी धूप काफी तीखी और गर्म थी सो बोटिंग करते करते ही सबको तेज़ भूख लगने लगी | झील क्षेत्र में ही बने छोटे बाजार में किसी रेस्त्रां में दोपहर का भोजन किया गया जो कुल मिला कर संतोषजनक था |




नक्की झील में मनोरम बोटिंग 

तेज़ धूप में गरमी लगने लगी थी 


भोजन और भ्रमण के तुरंत बाद हम वहां से पास में ही स्थित सनसेट प्वाइंट के लिए निकल पड़े जो नक्की झील से बमुश्किल दो किलोमीटर की दूरी पर एक निर्जन और बियाबान सा स्थल है | वहां बने अलग अलग चबूतरेनुमा प्लेटफॉर्म पर शाम चार बजे के बाद से ही पर्यटक पहुँचने   लगते हैं और देर शाम तक सूरज को पहाड़ों के बीच धीरे धीरे गुम होते  देखना कैसी नैसर्गिक करिश्मे को महसूस करने जैसा है | 

आजकल मोबाइल ने हमारे जीवन सहित ऐसी तमाम जगहों पर  अपने उपयोग की सबसे अधिक गुंजाइश बना ली है | नतीजतन ,यहाँ भी हमारे अलावा भी लगभग सब आसपास के नज़ारों को ,और उनके बीच खुद को कैद करना चाह रहे थे | इन शब्दों को लिखते समय भी मैं पहाड़ों के बीच की वो उष्मा स्पष्ट महसूस कर पा रहा हूँ | शाम के गहराने से पहले ही हम वापसी का रुख कर चुके थे | चूँकि बियाबान जंगल होने के कारण वहाँ तेंदुए भालू आदि जैसे जानवरों के आ जाने की चेतावनी भी जगह जगह लगी हुई थी जिसे नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं लगा | 



अपने हिस्से की धूप समेटते  हुए 



 अगला दिन हमारा माउंट आबू में आखरी दिन था सो एक सिरे से सब कुछ देखने का कार्यक्रम पहले से ही तय था , हम तड़के नाश्ता करके माउंट आबू और संभवतः राजस्थान की सबसे ऊँची पर्वत चोटी "गुरु शिखर " की और निकल पड़े। ..

शेष। .............इस यात्रा  का आखरी पड़ाव और आखिरी पोस्ट पढ़ेंगे आप अगले भाग में | 

दूर चोटियों पर दिखता गुरु शिखर 


गुरुवार, 14 जुलाई 2011

अब या तो निपटाइए , या निपट ही जाइए ..झा जी कहिन






कल के मुंबई बम धमाकों के बाद सिर्फ़ दो बातें दिमाग में घूम रही हैं , पहली ये कि , तो क्या अब दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले हमारे जैसों को ऐसे ही किसी आतंकी हमले में मरने या किसी अपने के मर जाने की खबर सुनने की आदत डाल लेनी चाहिए ..और दूसरा ये कि ....सरकार की सारी बकवास , आतंकवादी घटनाओं से परे जाकर बस इतना कहने का मन है ...या तो निपटाइए ....या अब खुद ही निपट जाइए ..बस अब बहुत हुआ।


मैंने अभी अपनी इस पोस्ट में ये संभावना जताई थी कि अभी जिस तरह के हालात हैं और आसपास यानि पाकिस्तान , बांग्लादेश , और चीन जैसे देशों की जो मंशा भारत के प्रति है उसमें ये बहुत कुछ अपेक्षित सा ही था कि देर सवेर भारत को ये दंश झेलना ही था , बल्कि कहा जाए कि ये तो एक शुरूआत भर है तो शायद ये गलत नहीं होगा । ये भी अब देश के महानगरों की एक नियति सी बनती जा रही है कि उन्हें , देश के सबसे विकसित शहरों में रहने का खामियाजा ऐसे भुगतने के लिए अभिशप्त होना पड रहा है । इन बम धमाकों से पहले और इसके बाद कुछ भी ऐसा अलग या अनोखा नहीं होगा जो कि अब तक न हुआ हो । सरकार द्वारा इसकी भर्तस्ना , अपने तमाम आका टाईप के दोस्त देशों के आगे जा जाकर बताना कि , देखो हमें तो फ़िर मारा । कुछ अलग करना हो तो सामने ही अमेरिका का उदाहरण है , जिसने बिना किसी कानून , बिना किसी सीमा की परवाह करते हुए आतंकी ओसामा बिन लादेन को उसीके बिल में जा कर मारा । न सिर्फ़ उसे मारा बल्कि अब ऐसे समाचार आ रहे हैं कि पाकिस्तान की आर्थिक सहायता में भी भारी कटौती की गई है ।


पडोसी देश पाकिस्तान , आज विश्व में आतंकियों , स्मगलरों , अंतरराष्ट्रीय अपराधों का गढ माना जाता है । और बार बार इसके पुख्ता प्रमाण मिलते रहने के कारण इसमें कोई संदेह भी नहीं है । तो ऐसे में जब भारत एक ऐसे देश का पडोसी है , न सिर्फ़ पडोसी बल्कि उसका दुश्मन नंबर एक है ( लाख क्रिकेट की कूटनीति हो या संगीत, सिनेमा के जुडे हुए तार , और चाहे भारत माने न माने लेकिन ये हकीकत है कि आज भी पाकिस्तान भारत को इसी रूप में देखता है) ,तो क्या ये स्वाभाविक नहीं है कि आने वाले समय में इन आतंकी घटनाओं के और भी बढने के आसार हैं । देश की तमाम सुरक्षा संस्थाएं , एजेसियां और पुलिस को अब अगले बहुत समय तक अपने उच्चतम सुरक्षा मोड में रहना चाहिए , लेकिन अफ़सोस कि आज देश के राजनीतिज्ञों को घपलों घोटालों में पैसा बटोरने से ही फ़ुर्सत नहीं है । जिस तरह से कसाब , अफ़ज़ल जैसे आतंकियों को पाल पोस कर न्याय दिलवाने के नाम पर रखा जा रहा है और पिछले तमाम आतंकी घटनाओं में एक भी नेता और और उनके नाते रिश्तेदारों के बाल भी बांका नहीं होने के कारण मन में संदेह होता है कि कहीं ये आपसी सांठगांठ तो नहीं कि , तुम हमें बचा के रखो, हम तुम्हें बचाए रखेंगे ।


इन घटनाओं पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने कहा कि , बहुत बडी गलती हुई थी उस दिन संसद पर हमले को नाकाम करने में हमारे सैनिकों ने अपनी जान देकर इन राजनीतिज्ञों को बचाया जो ऐसे आतंकी हमलों पर ओछे बयान की राजनीति करते हैं । काश कि उस दिन एक आध भी निपट लिया होता तो जरूर ये नौबत शायद उतनी जल्दी जल्दी नहीं आती जितनी कि आ रही है । आने वाला समय इस लिहाज़ से बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और नाज़ुक होगा , क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता जहां बढने के आसार हैं वहीं आने वाले कुछ महीने भारत में त्यौहारों और पर्व का मौसम होता है , ज़ाहिर है कि आतंकियों के लिए ये एक और मौका होगा । सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर कब तक ? 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जनांदोलन और आम आदमी....झा जी कहिन



ये आम आदमी की तस्वीर है , बस जरा पास पास खडा है एक दूसरे से



देश अभी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनशीलता के दौर से गुजर रहा है  । ऐसा नहीं है कि कहीं को अस्थिरता या असंतोष प्रकटत: दिखाई नहीं दे रहा है बल्कि अब जिस तरह से चौबीस घंटों में हुई बहुत सी घटनाओं , दुर्घटनाओं , अदालती कार्यवाहियों , समाचार संकलनों और तो और राजनीतिक बयानों तक पर आम आदमी अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है वो बहुत कुछ प्रमाणित करने के लिए काफ़ी है । पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार और उसमें सरकार की दुखद भागीदारी ने महंगाई का एक ऐसा आसमान खडा कर दिया है कि जिसमें से थोडे थोडे अंतराल पर आम आदमी पर बिजली टूट टूट के गिरती रहती है । अब तो वो जमाना आ गया है कि लोगों को खाना पीना पहनना और रहना जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी भारी पडने लगी हैं ।

आज सरकार , पुलिस , प्रशासन , अधिकारी , कर्मचारी , मीडिया , अदालत और तमाम छोटे बडे कारक अपने अपने हिस्से के काम बखूबी कर रहे हैं । बखूबी कहने का तात्पर्य ये नहीं कि दुरूस्त कर रहे हैं , बस ये है कि जैसा वे कर सकते हैं , और जैसी करने की उनकी मानसिकता और नियति है वे कर रहे हैं । हालात पिछले कुछ समय से लगातार बिगडते चले जा रहे हैं और बात अब उस स्तर तक पहुंच गई है जहां पर कई विद्वान लोग भ्रष्टाचार , घूसखोरी के वैधानिकीकरण यानि उसे बिल्कुल कानूनी और ज़ायस बनाने की बातें तक करने लगे हैं । एक बहुत बडी जमात उन लोगों की भी है , जिन्हें न तो सरकार की अकर्मठता , उसके धूर्त चरित्र और उसके द्वारा की जा रही बेइमानी से कोई सरोकार न है न ही इसके खिलाफ़ या फ़िर सरकार के ही समर्थन या विरोध में खडे लोगों में कोई दिलचस्पी । वे मस्त हैं ये मान कर कि अब कुछ नहीं हो सकता और इस देश को और इन हालातों को कोई भी कभी भी नहीं बदल सकता । मेरा मानना ये है कि आम आदमी जब अपनी सोच और अपने नज़रिए से सरकार और सत्ता को अपना गुस्सा दिखाने लगता है तो सरकारें भी भीतर से कांप रही होती हैं ,तो इसलिए बेशक जो खुल कर इस लडाई में आगे नहीं आ सकते , वे चुप ही रहें इससे बेहतर कि वे रूदालियों की तरह यही कहते फ़िरें कि ऐसा अब नहीं हो सकता वैसा अब संभव नहीं है । और सरकार को भी भलीभांति ये समझना चाहिए कि आज ये सवाल नहीं है कि मुद्दों को उठाने वाले कौन हैं , असली बात ये है कि जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं , उनके बारे में सरकार का क्या सोचना है । आज अगर आम लोग अलग अलग रूप और जनसंगठनों के सहारे सरकार के सामने सीना तान के खडे हो गए हैं और सिर्फ़ चंद सवालों के जवाब , लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए कुछ अधिकार और जनांदोलनों का रास्ता अख्तियार करके उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दृढबद्ध हो गए हैं तो इसमें अनैतिक , गैरकानूनी और असंवैधानिक क्या है , ये सरकार को जरूर बताना चाहिए ।

बेशक कुछ व्यक्तियों ने कुछ बहुत से वाजिब सवालों को उठाकर और बनने वाले कुछ प्रस्तावित कानूनों में कुछ बुनियादी बदलाव की मांग करके न सिर्फ़ सरकार के थिंक टैंक की चूलें हिला दीं बल्कि आम आदमी के विचारों को , उसके गुस्से को , उसकी लाचारी को एक हवा सी दे दी है । आज जो इस स्थिति से जरा भी रूबरू है वो जानता है कि आने वाले समय में उसे दो में से एक रास्ता ही चुनना होगा । या तो आप बदलाव के साथ हैं या बदलाव के साथ नहीं है । और समाजशास्त्री ये बात बखूबी समझते हैं कि जब समाज में फ़ासला इतना बडा हो कि नब्बे प्रतिशत की किस्मत दस प्रतिशत की मुट्ठी में जबरन कैद हो तो फ़िर संभावना इसी बात की ज्यादा रहती है कि नब्बे प्रतिशत उस दस प्रतिशत को उखाड फ़ेंकने की योजना में ही शामिल होता है । और ऐसा भी नहीं है कि आज आम आदमी तटस्थ है , चुपचाप सब होता ,देख रहा है । नहीं कतई नहीं है , बल्कि असल में तो आज हर दफ़्तर , हर महकमें , हर संस्थान में उन मुट्ठीभर ईमानदार लोगों के चेहरे की चमक और आत्मविश्वास दोगुना सा दिख रहा है । लोग अब आरटीआई और कंज्यूमर कोर्ट की भभकी से बडे बडों की हवा टाईट करने में लगे हैं । सीएम पीएम भी अदालतों के चक्कर यूं काटते दिख रहे हैं मानो चोर गिरहकट और जेबकतरे हों ,लेकिन  इसके बावजूद सिर्फ़ दो बातों की अकड , पहली ये कि जनता के चुने हुए नुमाइंदे हैं , वो भी उस अंदाज़ में कि अब तो आ गए चुन कर , अब पांच सालों तक कुछ भी न बिगाड सकोगे किसी भी सूरत में , दूसरी ये कि आज भी भारतीय जनता ने लोकतंत्र पर विश्वास करना नहीं छोडा है और वो अब भी आमतौर पर उतनी हिंसक नहीं होती जितने कि आज विश्व के अन्य देशों की आम जनता हो जाया करती है , नहीं तो किसी की भी समझ में ये बात आ सकती है कि कसाब जैसे मुलजिम भारत जैसे देशों में ही इतने दिनों तक जीवित रह सकते हैं ।



ऐसे में भी अगर आम लोग अभी ये तय कर लें कि उन्हें आज नहीं , बल्कि अपना कल कैसा चाहिए तो ये माना जा सकता है कि , आने वाले कुछ दिनों में उबलता हुआ जनस्मूह कोई बहुत कारगर उपाय न भी तलाश पाए तो ऐसा एक माहौल जरूर बना दे लगे कि हां वाकई सब कुछ बदलने के दौर में है । तय तो खुद लोगों को करना है , समाज को करना है क्योंकि कोई भी पेशा हो या कोई भी पद हो , आता और बनता तो हमारे बीच से ही है न आखिर । लेकिन उस बदलाव की शुरूआत के लिए यही उपयुक्त समय है और यही उपयुक्त माहौल भी । सबसे जरूरी बात तो ये कि सबको अपनी अपनी स्थिति जरूर मजबूत रखनी चाहिए , यानि कि आप जहां है , वहां से खुद की बेहतरी के लिए सोचते रहें , जरूर सोचें , क्योंकि आप बढेंगे तो देश बढेगा , लेकिन हां रास्ते वही चुनिए , जिस पर आप चाहते हैं कि आपकी अगली पीढी को किसी इससे भी बदतर स्थिति से गुजरना न पडे । इसलिए ये बहुत जरूरी है कि आज एक कदम तो जरूर ही उठाया जाए । इसलिए आज के युवाओं को अपनी ताकत का अपनी धमक का और अपनी सोच ,जिम्मेदारी के एहसास को भलीभांति इस सरकार को सुनाना चाहिए । आसपास के हर दफ़्तर , हर संस्था में गलत बातों का विरोध , खुदबखुद कतारबद्ध होकर काम करने करवाने की प्रवृत्ति , ट्रैफ़िक  और नागरिक नियमों का सम्मान और उनका पालन , आसपास के समाज के साथ पारस्परिक सहभागिता निभाते हुए एक दूसरे की सहायता की भावना का विकास , लालच और विकास की अंधी दौड में भागते रहने से बेहतर है कि बेहतर इंसान बनने के मायने सीखें और सिखाएं जाएं , लेकिन इसके लिए एक बेहतर राजनीतिक नेतृत्व और जनसंगठन की जरूरत होगी । पिछले दिनों से तयशुदा मानकों को तोडना होगा और जंग फ़ंफ़ूद लगे अनुच्छेदों को कांट छांट के इस समय के अनुकूल करना होगा ।



इसलिए आज देश के न सिर्फ़ युवाओं , बल्कि महिलाओं , मजदूरों , छात्रों , खिलाडियों , सबको देश के लिए , लोकतंत्र के लिए , और नागरिकों की मानसिक शारीरिक आजादी की रक्षा के लिए अपने अपने हिस्से की लडाई लडनी ही होगी । हो सकता है कि कहीं कहीं पर अगुआ और लडाई का तरीका थोडा बहुत अलग हो लेकिन उद्देश्य वही होना चाहिए । छोटे छोटे जनसंगठनों का निर्माण , आम लोगों में सभी नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता और गरीब वंचित तबके के लिए यथा संभव सहायता के बहुत सारे छोटे छोटे ऐसे काम हैं जिनके लिए किसी तहरीर चौक और किसी आंदोलन की जद में आए इसे किया जा सकता है । लेकिन हां इसके साथ ही ये बहुत जरूरी हो जाता है कि ऐसा हर वर्ग , हर तबका , हर समूह , हर संगठन , हर जनतांत्रिक मुहिम में अपनी सक्रियता का परिचय जरूर कराए , पक्ष या विपक्ष में ये दीगर बात है । धार्मिक विद्वेष , सामाजिक कुरीतियों और पश्चिमी विकृतियों से निपटने के लिए और उनमें बदलाव लाने के लिए किसी कानून से ज्यादा मानसिकता बदलने की जरूरत है और ये मुहिम अभी से शुरू कर दी जाए तो बेहतर होगा और शायद एक दिन जाकर वो स्थिति भी आए जब आज के ये दिन और स्थिति एक दु: स्वप्न की तरह याद किया जाए ।

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