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सोमवार, 23 मार्च 2020

अकेलेपन का सुख








पिछले एक सप्ताह के एकांतवास में ,छत पर अपनी बगिया में सत्तर अस्सी पौधे लगा चुका हूँ | फूल पत्तों के अलावा फिलहाल तोरी ,भिंडी ,घीया ,पालक ,धनिया ,नीम्बू मिर्च सब उगाई लगाई जा रही है |



दिन का  अधिक समय छत पर बनी इस बगिया नुमा आँगन में ही बीत रहा है | सुबह शाम झाड़ू   लगा कर पत्तों ,फूलों की पंखुड़ियों को समेटना , नथुने भीनी  भीनी गमक से भर जाते हैं |  लगता है जैसे गाँव पहुँच गया हूँ | 
फुर्सत ही फुर्सत है सो ढेर सारी किताबें ,डायरी ,कोरे कागज़ और चाय या कॉफ़ी से भरा हुआ मग ,छत पर बनी हुई इस पत्थर की मेज़ पर विराजमान मिलेंगे अक्सर | पास वाली पत्त्थर की बेंच पर बुलबुल अपने तमाम खिलौने और कॉमिक्स की फ़ौज के साथ पूरे दिन अपने स्कूल और मैडम की कमाल की बातें बताती रहती है |

आसपास पूरी शान्ति है सो छत पर चिड़िया ,गिलहरी ,मैना , तितली ,भौरें और जाने कितने प्राणी अपना अपना एकांतवास हमारे साथ मानने आ रहे हैं | सब मानो यही कह रहे हैं , क्यों भाई ,आ गए न बुद्धू ,लौट के अपने घर 


मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

अनलिखी डायरी का एक पन्ना

दीवाली की अगली सुबह

सोचता हूं सिर्फ़ एक दिन या कहा जाए कि सिर्फ़ एक रात मनाए जाने वाले इस पर्व के लिये साल भर इंतजार, फ़िर महीने पहले से तैयारी ,उसकी योजना, खरीददारी और न जाने कितने ही काम। फ़िर एक रात रोशनी , धुएं, और खूब शोर शराबे के बीच सब कुछ रात के आगोश में समा कर खत्म। कमाल का त्योहार है दिवाली भी। वैसे भारत जैसे देश में रहने के बहुत सारे फ़ायदों में से एक ये भी है कि साल भर आपको अपनी खुशियां, अपना स्नेह, अपना अपनापन सब कुछ बांटने के लिये पर्व त्योहार के रूप में लगातार बहाने मिलते ही रहते हैं। शायद ही कोई महीना जाता हो जब त्योहार मनाने के लिये नहीं मिलते हों । मुझे दीपावली और छठ के बाद नव वर्ष के शुभ आगमन तक जो एक समय आता है वो इस वजह से भी अखरता है कि पर्व रहित समय होता है।

पिछले दो दिनों से ब्लोगजगत इतना दीवालीमय था कि बस लग रहा था कि रंग बिरंगी फ़ुलझडियां सारा प्रकाश यहीं बिखेर रही हैं। हम भी ब्लोग्गंग में अपने दो साल पूरे करने की खुशी को डबल करते हुए घर पर दीवाली की भी धूमधाम से तैयार चल रही थी। बचपन से शौक रहा कि कुछ न कुछ प्रयोग करते ही रहते हैं । इस बार श्रीमती जी और उनकी कुछ सहेलियों के सामने उस दिन बाजार में खरीददारी करते समय हमने हांक दी कि रंगोली बनाना कोई कठिन काम नहीं है, बस जी हुक्म हो गया कि फ़िर साबित किजीये..लिजीये हमने कुछ यूं साबित किया...देखिये ठीक बन गई न.....?



इसके बाद घर की सजावट का काम,जिसे करने में न जाने बहुत पहले से ही खुद ही एक अजब सी खुशी होती है मुझे, तो जाहिर है कि वो सब मैंने अपने हाथों से ही किया ।हां दीवाली के पटाखों की तस्वीर नहीं है..क्योंकि अव्वल तो हमने वो चलाए नहीं बच्चों ने अपने हम उम्रों के साथ मामा मामी की निगरानी में खूब चलाए।और मन गई दिवाली ।
कल रात को दो बजे तक दीपावली की रात के उत्सव और उमंग में शामिल होने के बाद स्वाभाविक था कि आज देर से उठा जाए। बाहर उठ कर आए तो लगा कि दीवाली की सुबह पर कभी गौर किया ही नहीं कि दीवाली अगली सुबह कैसी होती है..आम दिनों
की सुबह से बिल्कुल अलग। बहुत ही कम ठंडी सी सुबह में बारूद की गंध अभी भी फ़ैली हुई है। चारों तरफ़ फ़ूटे हुए पटाखों के चीथडे उडे हुए कागज । उनके बीच अलग से चमकते ..बिना फ़ूटे हुए पटाखे ...एक दम खामोश....दोहरा दुख और उदासी ओढे हुए । दोहरा इसलिये कि जब उनके भीतर झांक कर सुना तो जैसे कह रहे थे , कि कल तक अपने कुनबे , अपने कारवें के साथ बिल्कुल तैयार थे...तपे हुए..फ़टने के लिये...और आज सब चले गए छोड के..दूसरा दुख ये कि जिन बच्चों को खुशी देने आए थे वो भी नहीं दे पाए। कमाल है खुद के जीवन के बच जाने का इतना दुख तो और कहीं नहीं देखा। पटाखा कहता है मेरे जीवन का उद्देश्य तो यही था कि मेरे

वजूद का धमाके के साथ खात्मे से बच्चे की मुस्कान बढ जाए। जब यही हो न पाया तो ...पटाखा उदास हो ही रहा था कि इतने में छोटा सा शुभम आ जाता है। बडी ही खोजी नज़र से ..एक एक पटाखे को परख रहा है । गुंजाईश और संभावना तलाशी जा रही है....कितने हैं जिन्हें आज दोबारा ....।वो पटाखा भी शुभम के हाथों में पहुंच कर चमक उठता है।

छत पर पडी हुई बेतरतीब सी जली अधजली फ़ुलझडियां....काली खुरदुरी ..कल कितना चिडचिड चुडचुड करते हुए रोशनी फ़ैला रही थीं। रात को दिन बना रही थीं आज दिन में खुद ही रात जैसे काली होकर पडी हुई हैं। हवाई पटाखे ..रौकेट...और अनार के बचे हुए खोल और डंडियां..कुछ लुढके हुए.कुछ सीधे खडे,,फ़ुंके हुए..ऐसे जैसे ..कोई ज्वालामुखी अभी अभी अपना लावा उगल कर ..चुप हो गया है.....। और शायद वो लावा ही तो है जो कल रात सारे पटाखों ने उगला था। इसके बाद दीयों के पास पहुंचा.....बाती/ज्योति...कहने लगे..देखो हमने तो पूरी कोशिश की थी कि रौशनी फ़ैलाते रहें...मगर इस दीये का पेट देखो न ..कितना खाली है..सारा तेल ही सूख गया हम क्या करते। मैं सोचने लगा कि ..ये शायद ये कहने की कोशिश कर रहा है कि मैं भी इस देश के किसान की तरह हूं अभी ..बिल्कुल खाली पेट ...देखना एक दिन इसी खाली बुझे हुए दीये की तरह हो जाओगे तुम सब ....यदि इस ज्योति को भर पेट तेल नहीं मिला तो..तुम्हारा प्रकाश छिन जाएगा।

मंदिर के आगे रखा बचा हुआ प्रसाद, फ़ुल्लियां, चीनी के खिलौने, मिठाई, फ़ल और उसमें पडे हुए गेंदे के फ़ूल की पत्तियां जो न सिर्फ़ देखने में प्रसाद को बहुत सुंदर बना रही थी..बल्कि उनकी खुशबू से प्रसाद की पवित्रता भी भीनी भीनी महक रही थी।और उनके पास ही रखे हुए मिठाई के ढेर सारे डब्बे, और बहुत सारे उपहार। अजी माफ़ किजीयेगा ये मुझे भी नहीं पता कि उनमे क्या क्या आया है और अभे तो ये खुलेंगे भी नहीं। अरे भूल गये क्या अभी तो कल भैयादूज है जी ..तो उनके उपहार भी तो आने हैं....तो सब एक साथ ही खोले जाएंगे न। दीवाली की अगली सुबह कितनी अलग रही न...कुछ आम दिनों की अपेक्षा।
आप बताईये कि आपका क्या हाल रहा जी.....................................?



ये पोस्ट दीवाली के अगले दिन लगाने के लिये तैयार की थी.....मगर जाने नेट वालों को क्या दुश्मनी थी...अब जो है सो आपके सामने है....हमने भी ठान ही लिया था कि चाहे होली से दीवाली आ जाये हम तो ये पोस्ट लगा कर रहेंगे....अजी कमाल है इत्ती मेहनत से तो हमने रंगोली बनाई, मंदिर सजाया, घर सजाया और फ़िर भी...


















मंगलवार, 8 सितंबर 2009

मिलिये मेरी बुलबुल से....



बहुत पहले से सोच रहा था.....कि आपको अपने परिवार से मिलवाया जाये.....मगर कुछ तो अपना आलस.....और कुछ तस्वीरों की अनुपलब्धता के कारण ऐसा संभव ही नहीं हो पा रहा था....


फ़िर इसके लिये खास तौर पर आधुनिक सुविधा से युक्त मोबाईल फ़ोन खरीदा गया...फ़्लाई...ई १०५...बस इसके बाद इससे तस्वीरों को खींचने का सिलसिला...जब शुरूआत करने का फ़ैसला किया तो ...निर्णय हुआ कि ..हमारे घर के सबसे कमाल के सदस्य से ही शुरूआत की जाये...और निर्विवाद रूप से वो है ..हमारी बिटिया रानी...बुलबुल ...यानि ..अदिति ...

जब हमारे घर में .....पुत्र आयुष के बाद .. दूसरी बार खुशी आने वाली थी......तो जैसा कि महिलाओं में ही अधिक जिज्ञासा रहती है...यही चलता था ....कि अबकी बार गोलू जी (मेरे पुत्र आयुष का घर का नाम ) का भाई आयेगा या बहन .....मगर मुझे अपने घर में ...दीदी के बाद यही ..इच्छा थी कि ...एक छोटी सी ...दीदी का रूप आ जाये...मगर प्रत्यक्षतः मैं आज के माहौल को देख कर ..थोडा सशंकित था...श्रीमती जी से यही बात कही ..तो आप भी सुनिये कि उन्होंने क्या कहा....बेटियां आदमी को इंसान बनाती हैं...और मकान को घर ....

और उनके इसी विशवास ने ...मुझे एक आत्मविशवास से भर दिया...जब हमारी ये बुलबुल जी घर में आयीं...तो बस जैसे सारा घर चहक उठा ...कहते हैं छोटी संतान चंचल होती है...जो कहते हैं बिल्कुल ठीक कहते हैं....अब ये बुलबुल जी हमारे पूरे घर को अपनी किलकारियों से गुंजायमान रखती हैं...जब भी लैपटौप पर काम करने बैठता हूं...बस जी हमारी गोद में इनकी सीट रिज़र्व हो जाती है...और तो और ...ये बुलबुल जी सोती भी हमारे पेट पर ही हैं..सुबह की सैर हो ...या रात की घुमाई...और कोइ जाये न जाये इनका जाना पक्क होता है...तो सोचा कि आपको भी मिलवा ही दूं अपनी इस बुलबुल से ..जो मुझे आदमी से इंसान बनना सिखा रही है...

अगली पोस्टों में हम आपको अपने ..गोलू जी और श्रीमती जी से भी मुलाकात करवायेंगे..फ़िर उनको दिखायेंगे..शायद इसी बहाने हमें भी ...डाक्टर साहब की तरह ज्यादा टाईम सैंक्शन हो जाये...

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