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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान :उपेक्षित ,शोषित ,प्रताड़ित

 




वर्ष के 365 दिन और उस देश में एक दिवस , उस देश की राजभाषा , राष्ट्रभाषा को समर्पित -जी हाँ , आप बिलकुल ठीक समझ रहे हैं और आज सुबह से समाचार माध्यमों तथा सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पर तरह तरह के बधाई और शुभकामना सन्देश फिर से हिन्दुस्तानियों को याद दिलाने के लिए आए हैं कि -आज यानि 14 सितम्बर को -भारत हिंदी दिवस के रूप में मनाता है। इस मनाने को ठीक वही मनाना है जैसे कोई रूठा हुआ हो और उसे मनाना है और हम पिछले सत्तर सालों से उसे मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हिंदी है कि मानती नहीं।

हिंदी को भारतीय गणराज्य और कामकाज की आधिकारिक भाषा -यानि राजभाषा घोषित करने के विषय में नहीं पढ़ा तो सिर्फ इतना जान लीजिए कि , इसका तब इतना भारी विरोध किया गया था कि यदि हिंदी के पक्ष में वो एक मत अधिक नहीं दिया गया होता तो आज शायद भारत हिंदी नामक भाषा को राजभाषा का जामा पहना कर ये झुनझुना भी नहीं बजा रहा होता जो बजाया जा रहा है। इसे झुनझुना , टुनटुना बजाना न कहें तो क्या कहा जाए। संविधान में जो व्यवस्था सिर्फ शुरुआत के 10 साल के लिए एक विकल्प के रूप में रखी गई थी और संकल्प लिया गया था कि -अंग्रेजी के स्थान पर सामाज्य काम काज से लेकर , व्यवस्था शासन पुलिस सबकी आधिकारिक भाषा हिंदी ही होगी।

आज 70 वर्षों के बाद भी हिंदी की दशा और दिशा , सिर्फ उतनी ही संतोषजनक और ठीक है जितने से कि एक गरीब आदमी दिल को तसल्ली दे सके कि जो वो बोलेगा उसे कम से कम सड़क पर , गली , मोहल्ले परिवार समाज में सब समझ तो जाएंगे ही। लेकिन सिर्फ इन्हीं जगहों पर -बड़े दफ्तरों , होटलों , शिक्षा संस्थानों से लेकर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक हिंदी की छाती पर बैठी अंग्रेजी लगातार मूँग दल कर करोड़ों हिन्दुस्तानियों को मानो मुँह चिढ़ाती रहती है कि , हूँह्ह। अपनी भाषा तक को बोली ,कही ,लिखी नहीं जाती चले हैं -हिंदी , हिन्दू , हिन्दुस्तान करने।

और देखा जाए तो हिंदी की हालत भी कुछ कुछ इस देश के हिन्दू की तरह ही हो गई है , जिसे न अदालतों में न्याय मिलता है न ही शासन राजनीति की तरफ से कोई मान्यता , दोनों ही इतने गए गुजरे होकर रह गए हैं कि सरे आम दोनों की लिंचिंग , नोच खसोट चलती रहती है और सब मूक दर्शक बने देख रहे हैं , देखते चले आ रहे हैं। हिंदी और हिन्दू , दोनों के नाम पर तरह तरह के करतब किए जा रहे हैं वो भी दशकों से , लोगों को एक सर्कस दिखाया जा रहा है और ये भी कि , समय के साथ दोनों को अपना मान और स्थान मिल जाएगा। लेकिन ये होगा कैसे , करेगा कौन , मानेगा कौन -इन सब पर सब चुप्पी साध लेते हैं।

अदालतें ,जिन्हें अपने ऊपर ये नाज़ है कि उन्हीं की न्याय व्यवस्था और सही गलत के संतुलन को बनाए रखने के कारण ही इस देश में सब कुछ ठीक है मगर अफ़सोस की बात ये है कि उन्हें भी अपने आदेशों , निर्देशों से लोगों के बीच ये विशवास बनाने के लिए -एक विदेशी भाषा यानि अंग्रेजी पर भी निर्भर रहना श्रेयस्कर लगता है तभी तो शीर्ष अदालत एक नहीं अनेकों बार – न्यायालीय काम काज की भाषा को राजभाषा हिंदी में किए जाने की याचिका को सिरे से ही ठुकरा चुका है।

पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार के आने के बाद से जरूर ही इस दिशा में बहुत से सकारात्मक रुख देखने को मिल रहे हैं जिनमे पहला है खुद बड़े राजनयिकों और मंत्री अधिकारियों द्वारा -राजभाषा हिंदी का प्रयोग। पहले की सरकारें और उनके करता धर्ता तो -अंग्रेजी में लिखे पुर्जे को पढ़ कर ही अपने आपको धन्य समझते रहे थे। इधर कुछ समय में मोबाइल , इंटरनेट में हिंदी लिखने पढ़ने की सुविधा ने भी अंतरजाल पर हिंदी को प्रसारित तो किया ही है।

लेकिन जिस देश में दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी को , अपनी बोलचाल की भाषा को मान्यता दिलाने , मान स्थान दिलाने के लिए एक विशेष दिन की जरूरत पड़ती रहेगी समझिए कि तब तक सब कुछ ठीक नहीं है।

सोमवार, 23 मार्च 2020

अकेलेपन का सुख








पिछले एक सप्ताह के एकांतवास में ,छत पर अपनी बगिया में सत्तर अस्सी पौधे लगा चुका हूँ | फूल पत्तों के अलावा फिलहाल तोरी ,भिंडी ,घीया ,पालक ,धनिया ,नीम्बू मिर्च सब उगाई लगाई जा रही है |



दिन का  अधिक समय छत पर बनी इस बगिया नुमा आँगन में ही बीत रहा है | सुबह शाम झाड़ू   लगा कर पत्तों ,फूलों की पंखुड़ियों को समेटना , नथुने भीनी  भीनी गमक से भर जाते हैं |  लगता है जैसे गाँव पहुँच गया हूँ | 
फुर्सत ही फुर्सत है सो ढेर सारी किताबें ,डायरी ,कोरे कागज़ और चाय या कॉफ़ी से भरा हुआ मग ,छत पर बनी हुई इस पत्थर की मेज़ पर विराजमान मिलेंगे अक्सर | पास वाली पत्त्थर की बेंच पर बुलबुल अपने तमाम खिलौने और कॉमिक्स की फ़ौज के साथ पूरे दिन अपने स्कूल और मैडम की कमाल की बातें बताती रहती है |

आसपास पूरी शान्ति है सो छत पर चिड़िया ,गिलहरी ,मैना , तितली ,भौरें और जाने कितने प्राणी अपना अपना एकांतवास हमारे साथ मानने आ रहे हैं | सब मानो यही कह रहे हैं , क्यों भाई ,आ गए न बुद्धू ,लौट के अपने घर 


गुरुवार, 29 जनवरी 2015

अरविंद पहले हम आपके पीछे थे ...अब ....




समय घूम फ़िर कर वहीं आ खडा होता है और ऐसे समय में तो मुझे लगता है मानो हम सब किसी पार्क में एक दूसरे के पीछे भाग भाग कर गोल गोल घूम घूम कर रेलगाडी छुक छुक छुक छुक खेलने में लगे हैं  । दिल्ली विधानसभा चुनाव एक बार फ़िर से लडे जाने वाले हैं , अपने यहां इस देश में लोकतंत्र इतने हाहाकारी रूप से मज़बूत है कि लगभग हर कोई अपनी सरकार बना ही बैठा है , और अपने अपने तरीके से चला भी रहा है , नहीं चल रहा है तो गरीब और उससे भी अधिक मध्यम वर्ग वाले का घर , खैर ..
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यहां बात पोलिटिकली एक्सप्रैस करने की है तो पिछले सारे अनुभव यही बताते हैं कि आप चाहे जो मर्ज़ी करें , किसी के लिए भी भक्त हो जाएं या किसी के प्रति विरक्त हो जाएं , सार्वजनिक रूप से खुद को व्यक्त करने के दो नियमों का पालन किया जाना अपेक्षित होता है , पहला हर विचार , हर राजनैतिक सोच और हर राजनेता का चुनाव सबका अपना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना निजि मत और राय है इसलिए बेशक असहमति संभावित भी है और सराहनीय भी किंतु उससे ज्यादा उचित है कि अपने द्वारा निर्धारित किए गए राजनैतिक विचार , या उम्मीदवार अथवा राजनैतिक दल ही सही के सकारात्मक पक्षों को सार्थक रूप से आगे सरकाया जाए ।
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दूसरा नियम ये है कि , चाहे किसी के भी पक्ष में हों या किसी के भी धुर विरोधी हों , व्यक्त ही न करें , स्पष्टत: तो कतई नहीं , इससे सारे हाथों में लड्डू की संभावना बढ जाती है , फ़िर जिसे चाहें उसे  मर्ज़ी जी भर के कोसें , मगर फ़िर रिवर्स फ़ायरिंग की भी पूरी संभावना रहती है जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता । दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले के परिदृश्य को याद करें तो कम से कम मुझ जैसे लाखों युवाओं को सिविल सोसायटी के रूप में यकायक ही हमारे बीच से निकल कर राष्ट्रीय फ़लक पर सियासत को सीधे सीधे चुनौती देकर उनसे बेहतर कर दिखाने की हुंकार भरते कुछ जननायकों ने एक अजीब ही फ़िज़ा बना दी । मैं स्वयं उन सारी उथलपुथल का गवाह रहा और बेहद नज़दीक से सारी स्थितियों को समझता रहा । अपने अनुभवों के आधार पर इतना तो स्पष्ट समझ में आ चुका था कि कुछ गैर राजनीतिक सोच और दांव पेंच से अनभिज्ञ जोशीले लोगों ने किसी बडे परिवर्तन का मन बना कर अपनी आर पार की लडाई छेड दी ।

देश परिवर्तन मोड में था , लोग मानो बिजली पानी के मुद्दों तक पर सडकों पर उतरने को आमादा हो चुके थे , आज़िज़ होने की स्थिति ने वो चमत्कार कर दिखाया जिसकी उम्मीद उन्हें भी नहीं थी जिनके साथ ये चमत्कार हो गया । मगर हाय रे भारतीय लोकतंत्र और हाय रे एक आम आदमी, की  पोलिटिकल इम्मैच्योरिटी यानि राजनैतिक अपरिपक्वता , इसका परिणाम आत्मघाती साबित हुआ , और मुट्ठी भर तने हुए लोग भी एक अनुशासन में नहीं रह सके । बिखराव को अगर रोकने की पुरज़ोर कोशिश की जाती तो शायद स्थिति कुछ और ही होती । 

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इस बीच लोकसभा के महाचुनाव में देश भर ने मानो राष्ट्रीय जनमानस का परिचय देते हुए अपना फ़ैसला सुनाया कि अब उसे अमुक व्यक्ति अमुक दल और अमुक विचार को ही समर्थन देने का मन बना लिया है । इस चुनाव के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में इस प्रभाव को देखा और महसूस किया गया जिसे लोगों ने मौज़ लेते हुए लहर का नाम दिया । दिल्ली विधानसभा चुनाव , उसका मिज़ाज़ और उसके विश्लेषण का आकलन या अंदाज़ा लगाना सहज़ नहीं है , कारण भी बहुत सारे हैं किंतु इस बीच हमारे जैसे बहुत सारे लोग अब अरविंद केजरीवाल से सीधे सीधे कहना चाह रहे हैं कि अरविंद ..पहले हम आपके पीछे थे ...नीयत पे अभी भी हमें कोई संदेह नहीं किंतु आपकी अपरिपक्वता का खामियाज़ा देश और समाज क्यों भुगते ....इसलिए अब ............

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कुछ तो चुनाव परिणामों के बाद के लिए भी छोड दिया जाना चाहिए कि नहीं ..........

शनिवार, 25 जनवरी 2014

समर्थन या घमरथन


http://economictimes.indiatimes.com/thumb/msid-29301195,width-310,resizemode-4/eye-on-2014-elections-how-stock-market-views-congress-bjp-and-aap.jpg


आजकल शाम को टीवी पर आने वाली बहसों में सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति दिल्ली कांग्रेस की दिखती है जो चीख चित्कार मचा सिर्फ़ तीस चालीस दिन की बालिग सरकार को भ्रष्टाचारी साबित करने का प्रमाण दे रहे होते हैं और ये पूछने पर कि फ़िर समर्थन काहे टिकाए हुए हैं पलट काहे नहीं देते गोरमिंट को , कि बस चिचियाहट रिरियाहट में बदलने लगती है ............

वैसे समर्थन से याद आया कि केंद्र सरकार ने इसे और जोरदार समर्थन भाव से उस व्यक्ति का तबादला कर दिया जिसे मुख्यमंत्री जी ने उस जांच की कमान देने के लिए उपयुक्त समझा जिसके पहले ही निशाने पर राष्ट्रमंडल खेल घोटाला केस होता ...उसका तबादला कर दिया गया ............सुना है कि पांडिचेरी अब इत्ती दूर से जित्ती जांच करनी हो कर डालें .....और शाम को ही फ़िर बडी बहस में घेर लिया जाएगा टोपी वालों को कि काम नहीं करते हो जबकि काम तो काम तो काम साला "जुकाम" तक की रिपोर्टिंग का आम चल रहा है ..............

समर्थन की बात पर ये भी याद आया कि जिस तरह से सरकार की मैय्यत निकालने के लिए दोनों बड्डे अपने अपने दांव चल रहे हैं एक बांस काट रहा है तो दूसरी डोरी तैयार करने को तत्पर है ,हर कोई मटका उलटा करके फ़ोडने को उद्धत मगर ये आदमी मुआं इत्ता खपा मरा लुटा हुआ है कि उअके जी को कोई रोग लगता दिख नहीं रहा है । लोगबाग भीतर ही भीतर ये सोच कर हैरान हो रहे हैं कि हर बार विलेन की तरह पेश एक खिदमत दिल्ली पुलिस अचानक ही इतनी चहेती बन गई कि मानो बताया जताया जा रहा हो कि हमारे पीठ पर अक्सर पडती आपकी लाठियां हमें तहे दिल से स्वीकार हैं दारोगा जी .................

मुझे लगता है पिछले कुछ वर्षों में नशे के कारोबार को पूरी योजना के साथ स्थापित किया गया है कि अवाम जितना अधिक होश खोकर जिएगी उतना ही अधिक जोश सरकार के अफ़सरी तेवरों में आएगा । तेवर बहुत बडी जिम्मेदार कडी है इस व्यवस्था के दोहरेपन की । सरकार अपने मुलाज़िमों के साथ काम करती हुई खुद भी मुलाज़िम की तरह पेश आनी चाहिए और बपौती तो कतई नहीं बननी चाहिए ......................फ़िलहाल तो सबको इस समर्थननुमा घमरथन में ने उलझा सा रखा है .......................
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