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बुधवार, 10 नवंबर 2010

तीस साल के बाद अमृतसर की सैर ...स्वर्ण मंदिर , अमृतसरी पापड , जुत्तियां ...और कुछ बातें ..पंजाब यात्रा -४







जैसा कि आपको अपनी इस पोस्ट और इस पोस्ट में दिखा बता चुका हूं कि किस तरह से बरसों बाद दशहरे मेले का आनंद उठाया गया । अगले दिन तडके ही अमृतसर निकलने का कार्यक्रम तय था । हमारे लाख जल्दी जल्दी करो के शोर मचाने के और गाडी के ड्राइवर साहब के उधम मचाने के बावजूद निकलते निकलते नौ तो बज ही गए । होशियारपुर से बाहर निकलते ही ..वही पंजाब की खुली खुली सडकों ने स्वागत किया । और फ़िर हो भी क्यों न , आखिर हम पंजाब की शान , अमृतसर जा रहे थे । अमृतसर इससे पहले मैं लगभग तीस साल पहले गया था , शायद तब मेरी उम्र बमुश्किल छ: सात बरस की होगी मगर मेरी धुंधली स्मृति में अब तक स्वर्ण मंदिर के तरण ताल में लगाई गई डुबकी और जालियांवाला बाग का शहीदी कुआं अब तक था । मैं रोमांचित था , इस शहर को देखने जानने और इसलिए भी कि चलो कोई तो ऐसा शहर है जिसे अपने बचपन में देखने के बाद अब देखने का मौका मिलने वाला है । रास्ते में मोबाइल कैमरे का मुंह खुला रखा था और उसे आदेश था कि ..शूट एट साईट । लीजीए आप कुछ तस्वीरें देखिए ।





तकरीबन पौने ग्यारह बजे तक हम स्वर्ण मंदिर के द्वार पर थे ।

जसदेव जी ने , गाडी को पार्किंग में लगाने और वहीं रुकने की आज्ञा ली और हमें द्वार पर छोड कर आगे बढ चले । हम चमत्कृत थोडी देर वहीं रुकने के बाद अंदर प्रवेश कर गए ।नहीं उससे पहले हम सब अपने माथे को ढकने के लिए इंतज़ाम कर चुके थे । महिला विंग ने चुन्नी सर पे ली तो हम सबने पटका लिया , जिसे संभाल कर रख लिया गया है । पहले जोडा घर , जो कि स्वर्ण मंदिर के द्वार की बाईं ओर बना हुआ है , वहां पहुंचे और सभी चप्पल जूते उतार कर वहां रखवा दिए गए । अब पूरे गुरूद्वारे को अच्छी तरह से जी भर के देखने के लिए आराम से उसके चारों तरफ़ घूमते हुए , मुख्य दर्शन द्वार की ओर अग्रसर हुए । कैमरे का मुंह खुला ही हुआ था ..अरे देखिए न ।


तरणताल में तैरती रंगीन मछली

अरे मत्था कैसे टेकते हैं , सीख लें

एक फ़ोटो हम छोटे बडे झाजी की एक साथ

किसी भी धर्म के धार्मिक स्थानों में यदि मुझे निर्विवाद रूप से किसी एक का चयन करना होगा तो मैं अवश्य ही गुरूद्वारे को ही चुनुंगा । और मेरी ये धारणा , पटना साहिब , स्वर्ण मंदिर , बंग्ला साहिब और जाने कितने ही गुरूद्वारों को बचपन से देखते रहने , उनमें जाते रहने के बाद ही बनी है । गुरूद्वारे धार्मिक स्थान के रूप में अद्वितीय विशेषता लिए होते हैं । अपने अराध्य के प्रति , भक्ति , सेवा और समर्पण का भाव आपको गुरूद्वारे से बेहतर तो छोडिए , गुरूद्वारे जैसा भी नहीं मिल सकता कहीं । सफ़ाई स्वच्छता , रख रखाव , सहायता आदि के प्रबंधों के अलावा वो चंद बातें जिन्होंने मुझे आकर्षित किया वो ये थीं । हर कोने में श्रद्धालुओं की प्यास बुझाने के लिए प्याऊ की व्यवस्था । मगर जिस तरह से वहां श्रद्धा के साथ पानी पिलाया जा रहा था और वहीं बाजू में जमीन पर बैठी हुई कुछ महिलाएं राख से उन कटोरों को जिस तत्परता से धो रही थीं और जो नूर उनके चेहरे पर था वो मुझे आश्वर्य में डाल गया । ऐसा ही कुछ संतोष मैंने उनके चेहरे पर भी देखा जो , सबको पानी का कटोरा थमाए जा रहे थे ।



इसके बाद प्रसाद के लिए भी एक सुनियोजित काऊंटर व्यवस्था । लाईन में लगिए , और अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद ले लीजिए ।

इसके बाद हम मुख्य दर्शन के लिए कतारबद्ध हो गए । वहां लिखा हुआ था कि इससे आगे फ़ोटो खींचना मना है , कृपया मोबाइल बंद कर दें । हमने भी सोचा कि ये बेचारा मोबाइल भी थक गया होगा सो उसे सुस्ताने का मौका दे दिया गया । दर्शन के समय भाई शिवम मिश्रा जी , पाबला जी ,और तमाम ब्लॉगर बंधुओं जिनका नाम मुझे उस समय याद रहा , की तरफ़ से अरदास लगाई गई । दर्शन के उपरांत , बाहर निकल कर वहीं थोडा विश्राम किया गया । हम वहां बैठे हुए बातचीत कर ही रहे थे कि एक ,भक्त श्रद्धालु ने कहा कि आप वहां चल के लंगर ग्रहण करें । हम वहां से सार्वजनिक लंगर भवन की ओर चल दिए । यहीं पर बीच में पाबला जी बात हुई तो पता चला कि वे इस समय नांदेड के गुरूद्वारे में हैं ..मुझे याद आ गया ....ओह !आबला और पाबला ..यहां भी एक ही जगह ।

ऐसा लग रहा था मानो महाभोज की तैयारी चल रही हो । ऐसा महाभोज जो दिन रात चल रहा हो । हम भी अपनी थाली प्लेट लिए भोजन करने वाले श्रद्धालुओं की पंक्ति में बैठ गए ।
बैठते ही एक खास बात की तरफ़ साढू साहब के साहबजादे जॉनी जी ने हमारा ध्यान आकर्षित कराया । देखिए



लंगर व्यवस्था के बारे में बात करते हुए जॉनी ने बडे ही उल्लास के साथ बताया कि मौसा जी , लंगर की व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि समाज के हर वर्ग , हर जाति , हर धर्म के भेदभाव के बिना यहां एक साथ , जमीन पर बैठ कर भोजन कर सकें । जूठन छोडना मना है क्योंकि जितनी भूख हो उतना ही खाएं और जो भी मिल जाए वो खा लें । भोजन के उपरांत जूठे बर्तनों को साफ़ करने के भी श्रद्धालुओं और भक्तों का बडा सा समूह तत्पर था ।


अब तक हमें तीन बज चुके थे और अभी जालियांवाला बाग और माता का दुर्ग्याना मंदिर भी घूमना बांकी था । लिहाजा जल्दी से निकल चलने की बात हुई ।

मगर साथ में महिला मंडली हो , सामने बाजार हो ....और आप अपने पर्स का मुंह बंद किए चले आएं ..अरे ऐसा नहीं होता है जी । रास्ते में पडने वाले बाजार को देखिए



और अब देखिए पंजाबी जुत्तियों की खरीददारी ...


..जाते हुए भाई शिवम मिश्रा जी ने ताकीद कर दी थी कि उनके लिए अमृतसरी पापड भी लिए ही जाएं , सो आदेश का पालन किया गया देखिए ।



इसके बाद जालियांवाला बाग ......अरे रे रे , सब कुछ एक ही पोस्ट में ..न बाबा न ...आप कल आईए न

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गलत काम कर रहे हैं आप...कुछ दिन से देख रहे हैं हम आपको...हमेशा कहीं न कहीं घूमने का जिक्र कर देते हैं....क्या जी..सही में आपका दिल पत्थर का ही है...रहम कीजिये हो हमनी पे... :)

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  2. आपने हमें भी घुमा दिया और इतने सुन्दर चित्र बोनस में भी :) बेस्ट डील

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  3. प्रिय अभिषेक क्या करूं भाई , पिछले कुछ दिनों से मुझे भी लग रहा है कि पांव के नीचे पहिए लग गए हैं ..

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  4. अजय भाई आपके रूप में ही सही बाबा के दरबार में हम भी मत्था टेक आये !

    जो बोले सो निहाल ..........सत् श्री आकाल !!
    वाहे गुरु जी दा खालसा .... वाहे गुरु जी दी फ़तेह !

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  5. अब आ जाओ मैदान में ...... महाराज पोस्ट में भी लिख रहे है ..... फोटो भी दिखा रहे है .... पर हकीकत में पापड़ कब खिला रहे है ??

    कहाँ है हमारे पापड़ ???

    CWG घोटाले की तरह पापड़ घोटाला !!!

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  6. शूट एट साइट की कार्यक्षमता के आधार पर आपको ब्लॉग-कमाण्डो घोषित किया जाता है।

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  7. अरे शिवम भाई ,,आपके पापड रखे हुए हैं महाराज ..कोई घोटाला नहीं हुआ है जी

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  8. प्रवीण जी , आपने जब कह ही दिया है तो हम भी काला साफ़ा माथे पर बांध कर कमांडोगिरी कर ही लेते हैं .....हाहाहाहहा

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  9. दोनों पोस्ट एक साथ देखी ...
    बिहार और पंजाब भ्रमण एक साथ ...
    बहुत बढ़िया !

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  10. चलो अच्छा हुआ आपने समय रहते बता दिया कि हमारे पापड़ रखें है ......हम तो जा ही रहे थे डोली भाभी जी के पास ......वो ही आ कर मिलती आप से .... बिग बॉस के बाद ! भाई हमारा तो इतना बूता है नहीं कि आप से पंगा लें !

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  11. बिल्कुल आयेंगें जी कल भी

    प्रणाम

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  12. अजय जी बाकी सब तो ठीक है लेकिन आपने बृ्जवासी की चाट नही खाई क्या? और जामनों वाली सडक के कुलचे छोले? तब तो ये सफर अधूरा रहा। बहुत अच्छी प्रस्तुती बधाई।

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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