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सोमवार, 1 नवंबर 2010

होशियारपुर का दशहरा मेला , वो जाएंट व्हील , वो छल्ले फ़ेंक कर ईनाम वाले ,बॉल फ़ेंक कर ग्लास गिराने वाले , गुब्बारों को फ़ोडने का सुख ....और जाने कितनी ही बातें ,,कितनी ही यादें



तो उस दिन दिन का सारा समय होशियारपुर को भांपते, जानते ही बीता । शाम हुई तो साढू साहब के साहबजादे जॉनी ..उर्फ़ शिवांस जी हमें कहा कि मौसा जी आईये चलिए मैं कहीं से घुमा लाऊं ..मुझे उसकी मोटरसायकिल पर उससे ज्यादा भरोसा था कि चाहे एक बार को ये साहबजादे हमें सडकाधीन कर भी दें ...ये मोटरसायकिल कुछ तो लिहाज कर ही लेगी गिराने से पहले ...कि दिल्ली वाले हैं ..ई कौन होशियारपुर के होशियारी हैं जो इनका माथा ठंडा करें ..। चलो यार , मैं भी चल दिया ...रास्ते में उसने बडी ही जिज्ञासा से पूछा कि यदि अपने एक दोस्त को भी बैठा लिया जाए ...और ट्रैफ़िक वाले मिंले तो ...क्या मैं उसे बचा लूंगा । ..मैंने कहा भईया तो मुझे उतार और दोस्त ही घुमा ला । पर जाने उसने क्या सोच कर यात्रा जारी रखने की ही सोची और ले चला हमें । जिस स्थान पर मैं उतरा वहां उतरते ही ये नज़ारा था .....





आंखें और मन दोनों ही एक साथ चकाचौंध से भर गए थे ...उफ़्फ़ मेला ....जाने कितने बरसों बाद ..इस खुशी का एहसास उसी एहसास जैसा था जब सुना था कि कोई सरकस दिल्ली में आ रहा है जो पुराने दिनों जैसा ही है .....ओह ये तो अनमोल से भी ज्यादा अनमोल खजाना था । इसके बाद कब उसने अपनी बाइक पार्क की , कब उसने मुझे और भी कुछ बताया ...और जो भी कुछ अगले कुछ क्षणों में हुआ ..मैं बिल्कुल अंजान रहा क्योंकि आंखों की सक्रियता ने जैसे कानों की शक्ति भी अपनी तरफ़ ही खींच ली थी । मैं आगे बढा , बिना ये देखे कि मेरे जूते मिट्टी बालू के उस गद्देदार रास्ते पर धंसते जा रहे हैं ..मैंने अपने मोबाइल कैमरे का मुंह खोल दिया था और एक साथ जैसे क्लिक क्लिक क्लिक क्लिक ....उंगलियां सब कुछ समेटने को आतुर थीं ..और मैं बार बार उस सारे नज़ारे को सहेज लेना चाह रहा था । मैंने सोचा पहले खूब सारी तस्वीरें उतार लूं और फ़िर उसके बाद ..इस अगले कुछ पलों को उसी शिद्दत से जीऊंगा जिस शिद्दत से कैस ने बरसों बाद लैला के दीदार होने पर जीआ था ...क्लिक क्लिक क्लिक क्लिक ..न हाथ रुक रहे थे न ही दृश्य ..














लगभग एक सौ बीस पच्चीस फ़ोटो खींच लेने के बाद मैं उसे लेकर आगे बढा , एक एक झूले की तरह , एक एक खेल तमाशे , मौत का कुंआं, जादू जादूगर , और जाने क्या क्या । मगर मुझे हमेशा की तरह अपनी तरफ़ सबसे पहले खींचा , बॉल से गिलास गिराने वाले खेल ने । मैं स्कूल के दिनों से ही एक अच्छा निशानेबाज रहा हूं ..गुलेल हो या बंदूक , आम को ढेले से गिराना हो या कंचे उडाना ..एक दम ठां निशाना रहा था मेरा । मैं लपक लिया तीन बॉल में छ: ग्लास मेज के नीचे गिराने वाले खेल की तरफ़ । वहां मौजूद लोगों ने पहले ही मुझे , इतनी ताबडतोड फ़ोटो खींचने के कारण किसी अजायबघर से छूटा हुआ समझ लिया था और अबकि बार उस खेल के लिए पहुंचने पर तो बस सब उधर ही ताकने लगे । मैं तो निश्चिंत था कि बस बॉल आएं और धडाम ..निशाना अब भी पक्का था और कोई खाली नहीं जा रहा था ..फ़िर भी हर बार एक दो ग्लास बच रहे थे ..मगर जल्दी ही पता चल गया कि , चालाकी से काम लिया गया है । ग्लास खूब भारी हैं जो कि गिरने के बावजूद भी मेज के नीचे नहीं जाते थे सो तीस रुपए बर्बाद हुए । मगर उसके बाद के दस रुपए में मैंने काम तमाम कर ही दिया । पहले में ही चार उडा दिए , दूसरे में एक और अंतिंम में बचे हुए एक में तो जैसे अन्य खेल के दर्शक भी दम साधे खडे थे ...मैं भी जाने किस झोंक में था इतनी ज़ोर से ग्लास पर मारा कि ग्लास उछल कर टैंट के पास जा गिरा । इतना जोर का शोर मचा कि बस .....हा हा हा मैं खुश था कि चलो उडा ही दिए न सारे .लडके इतने खुश थे कि बस ....





हम आगे बढ कर जादू वाले के पास पहुंचे , और फ़िर सब झूलों की ओर । घर से फ़ोन आने शुरू हो गए थे ..कहां हो ? हमने कहा कि बचपन में ...अभी लौटना मुनासिब नहीं ..बाद में मिलते हैं ..कहा गया , तुम तो बचपन में हो और जो बच्चे यहां शोर मचा रहे हैं वो कब बचपन में जाएंगे । ओह ! मुझे तो जैसे ख्याल ही नहीं रहा , कोई बात नहीं कल है न कल की सैर बच्चों के नाम । मगर मैं तो जैसे बावला ही हो गया था ।
मैंने एक भी झूला , एक भी तमाशा नहीं छोडा, और वापसी में नकली सींग , मूछें, तीर धनुष , गदा , मुखौटे , मिट्टी के खिलौने , गुल्लक ..सब खरीद लाया ........काफ़ी देर बाद.....वापसी की तैयारी हो गई ....

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ताम झाम है भाई इस मेले मे.... वो गाना याद आ गया

    ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम न होंगे
    अफ़सोस हम न होंगे :(

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  2. होशियार पुर वाले ओस्ताज जी से मिल के आना !आजकल यहाँ उस्तादों का जोर है भैया !

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  3. are wah ..मजे कर रहे हैं झा जी आप तो :)

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  4. ऐसा मेला लगा हो तो हम भी मौका नहीं छोड़ते हैं, एक बार तो नौचंदी का मेला देखने स्पेशली मेरठ चले गये थे।

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  5. लगे रहिये अजय भाई ..... बहुत सही रिपोर्ट दिए है मेले की !

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  6. वाह जनाब हमारे जन्म स्थान का मेला भी घुम आये, सभी चित्र बहुत सुंदर लगे, धन्यवाद

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  7. अगली बार रहिये पटना में....दुर्गा पूजा साथ घूमेंगे हो :)

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  8. अजय भाई यह तो बड़ा ही जबर्दंग मेला लगा

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  9. .

    क्लिक क्लिक क्लिक क्लिक ॥न हाथ रुक रहे थे न ही दृश्य ..

    सुन्दर तस्वीरें !!

    .

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  10. Mela...bachpan k din yaad aa gaye..faluda,budhuya k baal, gubbare aur hamari mele ki shopping ka sabse aham hissa KITCHEN SET..sab yaad aa gaya..mele se pehle hi sab bhai beheno me dosti ho jati thi k mil k khelne se khilaune zyada ho jayenge..thnk u..thnku very much for shrin these lovely memories n pictures.. m really obliged.. :)

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  11. ताबडतोड फ़ोटो खींचने के कारण किसी अजायबघर से छूटा हुआ समझ लिया था

    हा हा हा
    अईसे ही देखते हैं लोग भई!

    पुरानी कई धुंधली सी यादें सामने आ गईं

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  12. मैंने आपके पास इन्हें भेजा है.... इन लोगों का अपने घर पर दीवाली ( 5 Nov 2010) शुक्रवार को स्वागत करें.
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  13. भाई मौत के कुएँ वाला भी एक फोटो लगा देते ।

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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