पिछली पोस्ट में आप पढ चुके हैं कि कैसे हमने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की सैर और कुछ खरीददारी वैगेरह के बाद , वहीं पास में ही स्थित , जालियांवाला बाग की ओर बढ चले । जालियांवाला बाग के लिए मेरी धुंधली स्मृति में सिर्फ़ इतना था कि जब पिताजी के साथ गया था तो उस कुएं में झांक कर देखा था जिसे अब जाकर जाना कि शहीदी कुआं कहा जाता है । मुझे ये याद नहीं कि उस वक्त वो कुआं कैसा बना हुआ था , मगर अब जबकि उसे देखा तो पाया कि यकीनन ऐसा तो कतई नहीं था ।जालियांवाला बाग के गेट के सामने ही आपको ढेर सारे लोग मिल जाएंगे कुछ उनमें से वो होंगे जो जालियांवाला बाग की तस्वीरों की मिनि एलबम बेचते दिख जाएंगे और कुछ वे जो आपको वाघा बॉर्डर ले जाने को तत्पर होंगे । खैर हम अंदर की तरफ़ चल पडे । अंदर एक बहुत ही खूबसूरत बाग बना हुआ दिखा । पहली ही झलक में जालियांवाला बाग की खूबसूरती को आप भांप सकते हैं ।धूप तेज़ थी , इसलिए अंदर घुसते ही सब सुस्ताने बैठ गए । और मैं अपनी आदत से मजबूर उन्हें वहां छोड चल दिया आसपास का ज़ायज़ा लेने ।मैं महसूस करके देखना चाह रहा था कि आखिर उस दिन क्या कैसे हुआ होगा । वो बाग चारों तरफ़ आबादी से घिरा हुआ है पता नहीं तब था कि नहीं । मैं यही सोच रहा था कि जब जनरल डायर ने सिपाहियों को बदस्तूर गोली चलाने और जब तक कि एक भी खडा व्यक्ति दिखे तब तक चलाते रहने का आदेश दिया होगा तो क्या गोलियों की आवाज आसपास के लोगों को सुनाई नहीं दी होगी और जिस बाग के दरवाजे को बंद करके दस हज़ार से अधिक लोगों पर गोलियों चलवाई जा रही थीं उस भीड में क्या अमृतसर का कोई ऐसा भी घर था जहां से वहां उस समय कोई मौजूद नहीं होगा तो फ़िर उस दरवाजे के खुलने के बाद कैसा हाहाकार मचा होगा । मैं सोच रहा था और कदम इधर उधर चल रहे थे । गेट के साथ बने हुए छोटे से चित्र गलियारे में पहुंच कर मैंने जैसे ही क्लिक किया ..मुझे टोका गया कि फ़ोटो खींचना मना है । मैंने फ़ौरन ही माफ़ी मांगी और फ़िर अच्छी तरह से उस चित्र गैलरी को देखने लगा । मैं समझ नहीं पाया कि आखिर किस कारण से मुझे रोका गया ..वो इकलौता चित्र ये था जो गलती से मैं खींच चुका था ।साथ में बने एक और चित्रशाला में लगी विशाल पेंटिंगसाथ में ही अमर ज्योति , जिसकी लौ लगातार जलती रहती है । इसका निर्माण 1961 में कराया गया था ।पुत्र आयुष बडे ही गौर से इस बाग के ऐतिहासिक महत्व के बारे में पूछ रहा था और मैं और उसकी मम्मी उसे बताती जा रही थीं ।बीच बीच में साढू साहब के सुपुत्र जॉनी भी बहुत ही ध्यानपूर्वक सब सुन रहे थे । हम सब शहीदी कुएं की तरफ़ बढ चले ।शहीदी कुएं में बहुत ही तब्दीली आ गई थी । सब उसे गौर से देख रहे थे । श्रीमती जी ने जैसे ही कुएं में झांका और जब मैंने उन्हें बताया कि उस दिन ये कुआं लोगों के लाशों के ढेर और उनके रक्त से ही भर गया था ।उनका मन इतना तिक्त और विचलित हुआ कि वे ज्यादा देर तक खडी नहीं रह सकीं और आगे की ओर बढ चलीं । मैं थोडी देर तक और घूमता रहा ।यही है वो स्थान जहां से गोलियां चलाई गईं थींअब तक शाम के पांच बज चुके थे और अभी दुर्गयाना मंदिर भी जाना था ।जब तक हम दुर्गयाना मंदिर पहुंचे , वहां दुर्गा पूजा के कारण इतनी अधिक भीड हो चुकी थी कि , गेट के पास खडे पुलिसकर्मी ने हमें सलाह दी कि , हमें छोटे बच्चों के साथ अभी अंदर नहीं जाना चाहिए । और मैं मन मसोस कर जसदेव जी को वापसी का ईशारा कर चुका था ....।मगर हां अभी पंजाब से वापसी नहीं हुई थी । आगे की पोस्टों में मैं आपको मिलवाऊंगा होशियारपुर में एक अनोखे हनुमान जी की प्रथा से और फ़िर चलेंगे घूमने ...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के कॉलेज ...जहां उन्होंने पढाई की और बाद में पढाया भी ....
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गुरुवार, 11 नवंबर 2010
जालियांवाला बाग ,शहीदी कुआं ....और कुछ यादें ..पंजाब यात्रा -५
बुधवार, 10 नवंबर 2010
तीस साल के बाद अमृतसर की सैर ...स्वर्ण मंदिर , अमृतसरी पापड , जुत्तियां ...और कुछ बातें ..पंजाब यात्रा -४
जैसा कि आपको अपनी इस पोस्ट और इस पोस्ट में दिखा बता चुका हूं कि किस तरह से बरसों बाद दशहरे मेले का आनंद उठाया गया । अगले दिन तडके ही अमृतसर निकलने का कार्यक्रम तय था । हमारे लाख जल्दी जल्दी करो के शोर मचाने के और गाडी के ड्राइवर साहब के उधम मचाने के बावजूद निकलते निकलते नौ तो बज ही गए । होशियारपुर से बाहर निकलते ही ..वही पंजाब की खुली खुली सडकों ने स्वागत किया । और फ़िर हो भी क्यों न , आखिर हम पंजाब की शान , अमृतसर जा रहे थे । अमृतसर इससे पहले मैं लगभग तीस साल पहले गया था , शायद तब मेरी उम्र बमुश्किल छ: सात बरस की होगी मगर मेरी धुंधली स्मृति में अब तक स्वर्ण मंदिर के तरण ताल में लगाई गई डुबकी और जालियांवाला बाग का शहीदी कुआं अब तक था । मैं रोमांचित था , इस शहर को देखने जानने और इसलिए भी कि चलो कोई तो ऐसा शहर है जिसे अपने बचपन में देखने के बाद अब देखने का मौका मिलने वाला है । रास्ते में मोबाइल कैमरे का मुंह खुला रखा था और उसे आदेश था कि ..शूट एट साईट । लीजीए आप कुछ तस्वीरें देखिए ।तकरीबन पौने ग्यारह बजे तक हम स्वर्ण मंदिर के द्वार पर थे ।जसदेव जी ने , गाडी को पार्किंग में लगाने और वहीं रुकने की आज्ञा ली और हमें द्वार पर छोड कर आगे बढ चले । हम चमत्कृत थोडी देर वहीं रुकने के बाद अंदर प्रवेश कर गए ।नहीं उससे पहले हम सब अपने माथे को ढकने के लिए इंतज़ाम कर चुके थे । महिला विंग ने चुन्नी सर पे ली तो हम सबने पटका लिया , जिसे संभाल कर रख लिया गया है । पहले जोडा घर , जो कि स्वर्ण मंदिर के द्वार की बाईं ओर बना हुआ है , वहां पहुंचे और सभी चप्पल जूते उतार कर वहां रखवा दिए गए । अब पूरे गुरूद्वारे को अच्छी तरह से जी भर के देखने के लिए आराम से उसके चारों तरफ़ घूमते हुए , मुख्य दर्शन द्वार की ओर अग्रसर हुए । कैमरे का मुंह खुला ही हुआ था ..अरे देखिए न ।तरणताल में तैरती रंगीन मछलीअरे मत्था कैसे टेकते हैं , सीख लेंएक फ़ोटो हम छोटे बडे झाजी की एक साथकिसी भी धर्म के धार्मिक स्थानों में यदि मुझे निर्विवाद रूप से किसी एक का चयन करना होगा तो मैं अवश्य ही गुरूद्वारे को ही चुनुंगा । और मेरी ये धारणा , पटना साहिब , स्वर्ण मंदिर , बंग्ला साहिब और जाने कितने ही गुरूद्वारों को बचपन से देखते रहने , उनमें जाते रहने के बाद ही बनी है । गुरूद्वारे धार्मिक स्थान के रूप में अद्वितीय विशेषता लिए होते हैं । अपने अराध्य के प्रति , भक्ति , सेवा और समर्पण का भाव आपको गुरूद्वारे से बेहतर तो छोडिए , गुरूद्वारे जैसा भी नहीं मिल सकता कहीं । सफ़ाई स्वच्छता , रख रखाव , सहायता आदि के प्रबंधों के अलावा वो चंद बातें जिन्होंने मुझे आकर्षित किया वो ये थीं । हर कोने में श्रद्धालुओं की प्यास बुझाने के लिए प्याऊ की व्यवस्था । मगर जिस तरह से वहां श्रद्धा के साथ पानी पिलाया जा रहा था और वहीं बाजू में जमीन पर बैठी हुई कुछ महिलाएं राख से उन कटोरों को जिस तत्परता से धो रही थीं और जो नूर उनके चेहरे पर था वो मुझे आश्वर्य में डाल गया । ऐसा ही कुछ संतोष मैंने उनके चेहरे पर भी देखा जो , सबको पानी का कटोरा थमाए जा रहे थे ।इसके बाद प्रसाद के लिए भी एक सुनियोजित काऊंटर व्यवस्था । लाईन में लगिए , और अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद ले लीजिए ।इसके बाद हम मुख्य दर्शन के लिए कतारबद्ध हो गए । वहां लिखा हुआ था कि इससे आगे फ़ोटो खींचना मना है , कृपया मोबाइल बंद कर दें । हमने भी सोचा कि ये बेचारा मोबाइल भी थक गया होगा सो उसे सुस्ताने का मौका दे दिया गया । दर्शन के समय भाई शिवम मिश्रा जी , पाबला जी ,और तमाम ब्लॉगर बंधुओं जिनका नाम मुझे उस समय याद रहा , की तरफ़ से अरदास लगाई गई । दर्शन के उपरांत , बाहर निकल कर वहीं थोडा विश्राम किया गया । हम वहां बैठे हुए बातचीत कर ही रहे थे कि एक ,भक्त श्रद्धालु ने कहा कि आप वहां चल के लंगर ग्रहण करें । हम वहां से सार्वजनिक लंगर भवन की ओर चल दिए । यहीं पर बीच में पाबला जी बात हुई तो पता चला कि वे इस समय नांदेड के गुरूद्वारे में हैं ..मुझे याद आ गया ....ओह !आबला और पाबला ..यहां भी एक ही जगह ।ऐसा लग रहा था मानो महाभोज की तैयारी चल रही हो । ऐसा महाभोज जो दिन रात चल रहा हो । हम भी अपनी थाली प्लेट लिए भोजन करने वाले श्रद्धालुओं की पंक्ति में बैठ गए ।बैठते ही एक खास बात की तरफ़ साढू साहब के साहबजादे जॉनी जी ने हमारा ध्यान आकर्षित कराया । देखिएलंगर व्यवस्था के बारे में बात करते हुए जॉनी ने बडे ही उल्लास के साथ बताया कि मौसा जी , लंगर की व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि समाज के हर वर्ग , हर जाति , हर धर्म के भेदभाव के बिना यहां एक साथ , जमीन पर बैठ कर भोजन कर सकें । जूठन छोडना मना है क्योंकि जितनी भूख हो उतना ही खाएं और जो भी मिल जाए वो खा लें । भोजन के उपरांत जूठे बर्तनों को साफ़ करने के भी श्रद्धालुओं और भक्तों का बडा सा समूह तत्पर था ।अब तक हमें तीन बज चुके थे और अभी जालियांवाला बाग और माता का दुर्ग्याना मंदिर भी घूमना बांकी था । लिहाजा जल्दी से निकल चलने की बात हुई ।मगर साथ में महिला मंडली हो , सामने बाजार हो ....और आप अपने पर्स का मुंह बंद किए चले आएं ..अरे ऐसा नहीं होता है जी । रास्ते में पडने वाले बाजार को देखिएऔर अब देखिए पंजाबी जुत्तियों की खरीददारी .....जाते हुए भाई शिवम मिश्रा जी ने ताकीद कर दी थी कि उनके लिए अमृतसरी पापड भी लिए ही जाएं , सो आदेश का पालन किया गया देखिए ।इसके बाद जालियांवाला बाग ......अरे रे रे , सब कुछ एक ही पोस्ट में ..न बाबा न ...आप कल आईए न
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