शनिवार, 18 सितंबर 2010

एक महीने में पांच बार पंजाब की यात्रा ...कभी कार, कभी रेल ..और कभी बस द्वारा ......मन में बसा वो महीना ...

पहले ही सोच लिया था कि अबकि बार यदि पंजाब जाना हुआ ......तो उस यात्रा को इन भविष्य के पन्नों पर जरूर अंकित कर दूंगा .........ताकि आज से पचास साल बाद .......जब फ़िर किसी ऐसी ही यात्रा पर निकलूंगा .....और एक ऐसी ही पोस्ट लिख रहा होंउगा ....तो खुद ही दोनों पोस्टों को पढ कर अलग अलग अनुभव ले सकूंगा और ...तब शायद ऐसी ही पोस्टें मुझे उस बुढापे में मुझे जवान करती रहें ................................... जैसा कि आप सबको इस पोस्ट में बताया था कि ...मुझे घूमने फ़िरने की इतनी आदत है कि ...ये भी नहीं कह सकता कि वो मेरा शौक है ......और साल में, एक दो नई जगहों पर मैं कैसे किन बहानों ..और कभी हादसों , तो कभी महफ़िलों के सहारे पहुंच जाता हूं ..........मगर ये खूबसूरत इत्तेफ़ाक मेरे साथ अक्सर ही होता है । इस बार जिंदगी के रूट मैप पर ........जिस जगह को माईल स्टोन के रूप में गाडा गया था वो था ..................पंजाब का जालंधर , होशियारपुर और अलावलपुर गांव.....हालांकि इन शहरों में मैं पिछले सालों जाता रहा हूं ....मगर इस बार का सफ़र ..कई मायनों में खास था .......॥


इस बार तय हुआ कि इस बार ये लगभग चार सौ किलोमीटर का सफ़र .....साले की नई नकोर खरीदी गए .....सैंट्रो कार द्वारा तय किया जाए .......बच्चे तो बच्चे ..बडे और बडियां ..भी इस विचार से इतने खुश दिखे कि......... उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये वही महिलाएं हैं जिनके लिए अपने नियमित सीरीयलों से थोडी सी भी दूरी बडी हा जानमारक साबित होती है ॥

साले
साहब भी हाईवे पर अपना हाथ आजमाने को बेकरार बैठे थे ....हां भई लंबी दूरी में एकदम चिल्ड एसी का मजा उठाने के साथ , गाडी की अन्य खूबियां .....भी आजमानी थी ।
तो तय ये हुआ कि सुबह तडके ही निकला जाए ताकि बाद में ....दिल्ली हरियाणा के सिंधु बार्डर पर लगने वाले जाम से बचा जा सके ......और रुकते टिकते भी ....दोपहर तक पहुंच जाया जा सके ।


अक्सर सुबह खासकर वो तडके सुबह वाली यात्रा से बहुत कोफ़्त सी रहती है ...नहीं खुद तो मैं खैर सुबह उठने वालों में से हूं ..मगर मुझे सबसे बुरा लगता है छोटे बच्चों को सुबह सुबह अधकचरी नींद में उठा उठा कर ...तैयार करना ......मगर इस बार बच्चे भी शायद कार से जाने के नाम पर खूब उत्साहित थे , पूरी गैंग तैयार थी । साले साहब गाडी बडी ही कुशलता से चला लेते हैं ...सो थोडी ही देर में हम उस चिल्ड कार मैं बैठे हुअ हवा से बातें करते हुअ ...कब सीमा पार निकले पता ही नहीं चला । दिल्ली की एक खासियत या बदखासियत कहिए , वो ये है कि , इसकी सीमा के पार निकलते ही ...आपको ऐसा लगेगा कि आपने ....एक सांसों का मिनरल घूंट भरा है ...........। इन दिनों भारत में यदि किसी निर्माण कार्य पर सरकार का ध्यान है तो वो सभी राजकीय , और राष्ट्रीय राजमार्ग को दुरूस्त करने पर जोरों पर ।


इन दिनों कोई सोमा इंट्ररप्राईजेज़ नाम की कंपनी ,,,दिल्ली से आगे पंजाब में कम से कम जालंधर या शायद अमृतसर तक सडक को छ: लेन में करने का काम कर रही है ....इसलिए पूरे रास्ते आपको डाईवर्जन मिलेंगे ,,।



मगर रास्ते के दोनों ओर फ़ैली लंबी हरी मखमली चादर न सिर्फ़ आखों को बल्कि मन की भीतर तक जो शीतलता पहुंचाती है , वो बिल्कुल उस फ़िल्टर की तरह काम करती है जब आप सिर्फ़ एक ही परत से, सब कुछ निर्मल स्वच्छ हो जाता है .......
ओह क्या पूरा सफ़र आज ही तय कर लेंगे .......एक दिन में इतना सफ़र ..........न ..कल चलते हैं न आगे


गुरुवार, 16 सितंबर 2010

दिल्ली ब्लॉगर्स करेंगे धमाल .........ब्लॉगर्स और मीडिया ...होंगे आमने सामने ...ब्लॉग मीडिया का विरोधी .....या ,कि बन सकता है ...पूरक मीडिया ..........


जी हां , मुझे जानने वाले अच्छी तरह समझ चुके होंगे कि मेरा ईशारा किस तरफ़ है ............और फ़िर जहां झा जी हों, वहां ब्लॉग बैठक की बात न हो ये हो नहीं सकता ......फ़िर चाहे इसके बदले में मुझे गुटबाज , घर से पैसे फ़ूंक कर तमाशा देखने वाला बेफ़कूफ़ , या कि बार बार ब्लॉगर बैठक करके उसकी रिपोर्टिंग कर कर के अपनी ब्लॉग पर रोते रहने वाला कहे .........या फ़िर एक और विवाद , एक और हंगामे , एक और मसाले को पैदा करने वाला .....या और भी कोई नाम देना चाहे ...खुशी से दे सकता है .....। ये ,मुझे जानने वाले बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि बेशक हिंदी ब्लॉगिंग ..बहुतों को फ़ूंफ़ां लगती हो...बहुतों को इससे अलग कुछ और लगती हो ....मगर मुझे पूरा यकीन है कि आने वाले कुछ वर्षों में इसकी ताकत का एहसास सभी को हो ही जाएगा ..फ़िर चाहे वो सरकार हो या मीडिया ....और अपने इसी विश्वास को बार बार मैं खुद ही आजमाता हूं । यही कारण है ब्लॉग की दुनिया को ..आम दुनिया के सामने लाने के लिए मेरा प्रयास चलता रहता है ...कभी किसी बहाने से तो कभी किसी और बहाने से ।


इस बार की योजना कुछ अलग है ...फ़िलहाल कोई भी रूप रेखा तय नहीं हुई है ...इसलिए अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी । मगर मोटे मोटे तौर पर ये जान लें कि इस बार ..ब्लॉगर कार्यशाला आयोजित करने की योजना बन रही है । इसके यूं तो कई पहलू होंगे मगर ..जो खास होंगे वे ये कि .....इस बार मीडिया के मित्रों को सक्रिय भागीदारी और विमर्श/बहस के लिए आमंत्रित किया जाएगा .....और विषय होगा "हिंदी ब्लॉगिंग : मीडिया की धुर विरोधी , या मीडिया की पूरक ....संभावनाओं की तलाश "। इसके अलावा ............ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स के लिए ...स्पॉंसर्स की तलाश .............। क्या हिंदी ब्लॉगिंग ...वाकई ....अंग्रेजी ब्लॉगिंग के अनुरूप नहीं हो सकती .....विभिन्न समाचार माध्यम और हिंदी ब्लॉगिंग ....आदि विषयों पर न सिर्फ़ चर्चा करने की योजना है बल्कि ...इस बात की पूरी कोशिश की जाएगी कि ..कुछ न कुछ ऐसा जरूर निकल कर आए जो ..सार्थक कहा जा सके ।

यहां मैं ये बताता चलूं ...कि यदि किसी आखिरी निष्कर्ष पर नहीं भी पहुंचा जा सका तो भी ...कम से इतना प्रयास तो किया ही जाएगा कि ..हिंदी ब्लॉगिंग .........से पूरी दुनिया को रुबरू करवाया जा सके ।
ये कब ..कैसे ..कहां (मेरा मतलब दिल्ली में ही किसी स्थान से है ) होगा .....फ़िलहाल सब कुछ लूप में है ।

आप सबसे यहां ये बात बांटने के पीछे सिर्फ़ दो मकसद है । पहला ये कि एक ब्लॉगर के रूप में , आप इसके लिए खुद को तैयार कर लें । दूसरी और जरूरी बात ये कि ....इस विषय पर आपकी जो भी राय हो / सलाह हो .....या कोई योजना हो तो ..अवश्य ही बताएं । अभी तो फ़िलहाल सिर्फ़ इतना तय हुआ है कि ये आयोजन शायद .....नवंबर में या वर्षांत के दिनों में हो .........मुझे प्रतीक्षा रहेगी आपके विचारों की .......................

शनिवार, 11 सितंबर 2010

गणेश चतुर्थी .....पुरुकिया , टिकिया , ...और मां की यादें ....






मेल में अचानक ..गणेश चतुर्थी का एक बधाई संदेश पाकर चौंका ..क्योंकि ..हर तरफ़ ईद की ही चर्चा था । वैसे भी सरकारी महकमे में अक्सर उन त्यौहारों पर ज्यादा कनसेन्ट्रेट करने की परंपरा रही है जिसका परोक्ष या प्रत्यक्ष संबंध ..सरकारी छुट्टियों से होता है । और ऐसे में यदि ईद मुबारक ही थी तो फ़िर इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए था । और मुझे आश्चर्य हुआ था गणेश चतुर्थी के आ जाने ने । वो भी इस तरह चुपके से आ जाने के कारण । गणेश जी अपने साइज़ के हिसाब से भी चुपचाप तो आ नहीं सकते थे , इसलिए उन्होंने न तो अपना रूट बदला होगा न रूटीन , ज़रूर मैं ही इन दिनों बेख्याली में रहा होउंगा । समाचार कभी उचटते निगाह से देखा भी तो उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ दिल्ली के बाढ के आने ...या न आने की ही चर्चा थी । सभी यमुना के पानी पर अपने चैनल का रंग दिखा दिखा कर उसे अपने तरीके से बहा दिखा रहे थे । और फ़िर मुझे पता भी कैसे चलता , इन और इन जैसे तमाम त्यौहारों को मनाने , मनवाने , उसकी तैयारी ,का सारा जिम्मा तो मां ने ही उठा रखा था ...........और मां के जाने के साथ ही .............।

गणेश चतुर्थी .......बोले तो , हमारे यहां इसे कहा जाता है ..चौठचंद्र ....यानि का चौथ का चांद । पहले तो नहीं पता था , मगर अब सोचता हूं कि अबे जब एक उसी चांद को देख कर ..ईद मनाई जाती है ..और उसी चांद को देखकर हम भी गणेश जी को पूज लेते हैं ...तो फ़िर बचा क्या ये बताने समझाने को ....अबे जिस तरह से हर मज़हब , हर भाषा ,और हर क्षेत्र का होने के बावजूद इंसान एक ही होता और रहता है ...उसी तरह ..भगवान यानि ईश्वर भी सिर्फ़ एक और एक ही है । खैर , छोडिए इसे ..तो मैं बता रहा था कि आज के दिन को हमारे यहां चौठचंद्र के नाम से मनाया जाता था , अब भी मनाया जाता है । बडा ही खूबसूरत सा त्यौहार ,उतनी ही सुंदर पूजा , और सबसे विशेष बात इस त्यौहार पर प्रसाद में बनने वाले विशिष्ट पकवान _ पुरुकिया और टिकिया । पुरुकिया ...जिसे आमतौर पर गुजिया के नाम से जाना जाता है ...और यहां दिल्ली में तो ये होली के अवसर पर मिलते बनते देखा है मैंने ...इसे घर मे ही बनाया जाता है ..सूजी और खोया भर के ...। और चावल के आटे , मैदा और गेंहू के आटे को फ़ेंट कर तैयार की मीठी टिकडियां ..जिसे टिकिया कहा जाता था । सबसे खास बात होती थी ......कि ये इतने सारे बनाए जाते थे कि अगले एक हफ़्ते तक स्नैक्स के रूप में यही चलता था । अरे काहे का स्नैक्स जी....हम लोग तो सुबह और शाम का नाश्ता बोलते थे ....।


मुझे अब भी याद है कि किस तरह से मां जाने कितने दिनों पहले से ही तैयारियों में लग जाती थी । बाद के दिनों में जब हम गांव में रहने लगे तो इस त्यौहार का आनंद और भी दूना हो गया था । कच्ची मिट्टी के आंगन में ...गाय के गोबर से लीप कर ....तैयार किया गया पवित्र स्थान ..उस पर अरिपन (जिसे रंगोली कहा जाता है , या शायद उससे थोडा सा अलग , इसमें पीसे हुए चावल के घोल से तैयार गाढे रस से सुंदर आकृति बना कर उसे बीच बीच में सिंदूर से सजाया जाता है ), उस पर कांसे का कलश, बीच में आम का पल्लव और ताजा ताजा गीली मिट्टी का बना हुआ दीया । बडे बडे केले के पत्तों पर सजा कर रखी गई प्रसाद सामग्री । चूडा, दही , चीनी, घी , शहद, केले , पुरुकिया , टिकिया । उसके बाद पूजा , घर के सभी पुरुष , महिलाएं और बच्चे तक , शाम को चांद को देख कर हाथों में फ़ल लेकर उन्हें प्रणाम करते थे । महिलाओं ने जिन्होंने अपना व्रत खोलना होता था वे भी ऐसा ही करके अपना व्रत खोलते थे ।इसके बाद सब बैठ कर वहीं खाना खाते थे ...।


ओह वे दिन और वो शामें .........।
वैसे तो जिस दिन इस शहर का रुख किया ..........समझ गया था कि अब ये सब सिर्फ़ यादों और यादों में सजे हुए पलों की तरह फ़्रेम में जडे रह जाएंगे ......मगर मां के अचानक चले जाने के बाद तो बस .........................

गणेश चतुर्थी .....पुरुकिया , टिकिया , ...और मां की यादें ....






मेल में अचानक ..गणेश चतुर्थी का एक बधाई संदेश पाकर चौंका ..क्योंकि ..हर तरफ़ ईद की ही चर्चा था । वैसे भी सरकारी महकमे में अक्सर उन त्यौहारों पर ज्यादा कनसेन्ट्रेट करने की परंपरा रही है जिसका परोक्ष या प्रत्यक्ष संबंध ..सरकारी छुट्टियों से होता है । और ऐसे में यदि ईद मुबारक ही थी तो फ़िर इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए था । और मुझे आश्चर्य हुआ था गणेश चतुर्थी के आ जाने ने । वो भी इस तरह चुपके से आ जाने के कारण । गणेश जी अपने साइज़ के हिसाब से भी चुपचाप तो आ नहीं सकते थे , इसलिए उन्होंने न तो अपना रूट बदला होगा न रूटीन , ज़रूर मैं ही इन दिनों बेख्याली में रहा होउंगा । समाचार कभी उचटते निगाह से देखा भी तो उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ दिल्ली के बाढ के आने ...या न आने की ही चर्चा थी । सभी यमुना के पानी पर अपने चैनल का रंग दिखा दिखा कर उसे अपने तरीके से बहा दिखा रहे थे । और फ़िर मुझे पता भी कैसे चलता , इन और इन जैसे तमाम त्यौहारों को मनाने , मनवाने , उसकी तैयारी ,का सारा जिम्मा तो मां ने ही उठा रखा था ...........और मां के जाने के साथ ही .............।

गणेश चतुर्थी .......बोले तो , हमारे यहां इसे कहा जाता है ..चौठचंद्र ....यानि का चौथ का चांद । पहले तो नहीं पता था , मगर अब सोचता हूं कि अबे जब एक उसी चांद को देख कर ..ईद मनाई जाती है ..और उसी चांद को देखकर हम भी गणेश जी को पूज लेते हैं ...तो फ़िर बचा क्या ये बताने समझाने को ....अबे जिस तरह से हर मज़हब , हर भाषा ,और हर क्षेत्र का होने के बावजूद इंसान एक ही होता और रहता है ...उसी तरह ..भगवान यानि ईश्वर भी सिर्फ़ एक और एक ही है । खैर , छोडिए इसे ..तो मैं बता रहा था कि आज के दिन को हमारे यहां चौठचंद्र के नाम से मनाया जाता था , अब भी मनाया जाता है । बडा ही खूबसूरत सा त्यौहार ,उतनी ही सुंदर पूजा , और सबसे विशेष बात इस त्यौहार पर प्रसाद में बनने वाले विशिष्ट पकवान _ पुरुकिया और टिकिया । पुरुकिया ...जिसे आमतौर पर गुजिया के नाम से जाना जाता है ...और यहां दिल्ली में तो ये होली के अवसर पर मिलते बनते देखा है मैंने ...इसे घर मे ही बनाया जाता है ..सूजी और खोया भर के ...। और चावल के आटे , मैदा और गेंहू के आटे को फ़ेंट कर तैयार की मीठी टिकडियां ..जिसे टिकिया कहा जाता था । सबसे खास बात होती थी ......कि ये इतने सारे बनाए जाते थे कि अगले एक हफ़्ते तक स्नैक्स के रूप में यही चलता था । अरे काहे का स्नैक्स जी....हम लोग तो सुबह और शाम का नाश्ता बोलते थे ....।


मुझे अब भी याद है कि किस तरह से मां जाने कितने दिनों पहले से ही तैयारियों में लग जाती थी । बाद के दिनों में जब हम गांव में रहने लगे तो इस त्यौहार का आनंद और भी दूना हो गया था । कच्ची मिट्टी के आंगन में ...गाय के गोबर से लीप कर ....तैयार किया गया पवित्र स्थान ..उस पर अरिपन (जिसे रंगोली कहा जाता है , या शायद उससे थोडा सा अलग , इसमें पीसे हुए चावल के घोल से तैयार गाढे रस से सुंदर आकृति बना कर उसे बीच बीच में सिंदूर से सजाया जाता है ), उस पर कांसे का कलश, बीच में आम का पल्लव और ताजा ताजा गीली मिट्टी का बना हुआ दीया । बडे बडे केले के पत्तों पर सजा कर रखी गई प्रसाद सामग्री । चूडा, दही , चीनी, घी , शहद, केले , पुरुकिया , टिकिया । उसके बाद पूजा , घर के सभी पुरुष , महिलाएं और बच्चे तक , शाम को चांद को देख कर हाथों में फ़ल लेकर उन्हें प्रणाम करते थे । महिलाओं ने जिन्होंने अपना व्रत खोलना होता था वे भी ऐसा ही करके अपना व्रत खोलते थे ।इसके बाद सब बैठ कर वहीं खाना खाते थे ...।


ओह वे दिन और वो शामें .........।
वैसे तो जिस दिन इस शहर का रुख किया ..........समझ गया था कि अब ये सब सिर्फ़ यादों और यादों में सजे हुए पलों की तरह फ़्रेम में जडे रह जाएंगे ......मगर मां के अचानक चले जाने के बाद तो बस .........................

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

ब्लॉग्गिंग से कुछ दिनों की चाही अनचाही दूरी ......नया कम्प्यूटर ......नेट की बेवफाई ...पंजाब का भ्रमण ......और चंद बातें |

ट्रेन में बैठे गोलू और बुलबुल



पिछले दिनों की लिखी हुई पोस्टों में ये जिक्र किया था कि ...जाने अनजाने लेखन और पठन से कुछ दूरियां सी बन गयी थी , इसका कारण तो ठीक ठीक मैं भी नहीं जानता , मगर शायद कुछ तो बात थी ही रही सही कसर, लैपटौप के बीमार होने ने पूरी कर दी .....काफी तीमारदारी के बाद भी ..जब कंप्यूटर के डॉक्टर भी उसे ठीक नहीं कर सके तो फिर नए बक्से के आने की योजना बनने लगी और इस बीच जो कुछ हुआ या पिछले दिनों तक होता रहा ..........उसने कुल मिला कर कुछ इस तरह की स्थिथि पैदा कर दी कि , बस ये दूरी निरंतर बढ़ती ही चली गयी यहाँ बताते चलूँ कि , इन पिछले पंद्रह दिनों में , कमोबेश , कुल पांच बार पंजाब का दौरा करना पड़ा कार से , रेल से , और बस से भी दास्ताँ लम्बी है , और फिर पिछले दिनों की कसर भी तो पूरी करनी है इसलिए , फ़िलहाल तो आप आने वाली पोस्टों का ये फोटो शूट ही देखिये , विस्तार से बहुत ही जल्दी .........किस्तों में हम आप तक पूरी दास्ताँ पंहुचाते हैं ....


जालंधर के अड्डा होशियारपुर चौक की रसमलाई


जालंधर का माता अन्नपूर्ण मंदिर



ट्रेन में मिले , करतब दिखाते चिंटू जी



ट्रेन से लिए गए पंजाब के कुछ चित्र


मन को मोहते हरे भरे खेत

तो आपने , चित्रों को देख कर अपनी तबियत हरी तो कर ही ली होगी , बस अब कल से हम दोबारा अपनी ड्यूटी पर लग जाते हैं ..........आखिर एक ब्लॉगर को इससे ज्यादा छुट्टी नहीं लेनी चाहिए .......क्यों है न ????





रविवार, 15 अगस्त 2010

नया सफ़र ........एक नए चेहरे के साथ

जैसा कि आप सबको बताया ही था पिछली पोस्ट में कि एक नए सफ़र पर निकलने वाला हूं । और यकीन जानिए बस कुछ देर पहले ही लौटा हूं । इससे पहले कि कुछ और भी बताऊं इस सफ़र के बारे में ....चलिए आपको अपने नए चेहरे से मिलवाया जाए । इसके पीछे कारण क्या रहे और इसके परिणाम क्या निकले ये तो बाद में बताऊंगा ...फ़िलहाल तो आप सिर्फ़ ये बताईये कि .........क्या नया चेहरा ठीक है सचमुच ........

ये मेरा पुराना चेहरा...........




और ये है नया चेहरा .....................

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

पहियों पर दौडती जिंदगी .............अजय कुमार झा


न न .........न तो मेरी टूर एंड ट्रेवेल्स टाईप की कोई नौकरी है...........और न ही मैं बस या ट्रक चलाता हूं ...आप्स सोच रहे होंगे कि तो आखिर फ़िर क्यों लिखा मैंने कि पहियों पर दौडती जिंदगी ......। जो कुछ चंद बातें मुझे बेहद पसंद हैं ......जैसे पढना , लिखना , मित्रता करना, रेडियो सुनना , खासकर समाचार ........और सबसे अलहदा .....खूब घूमना । अब ये तो नहीं पता कि घूमने का शौक पिताजी की हर तीन साल बाद ट्रांसफ़र वाली नौकरी के कारण दर्जनों शहर डोलते फ़िरते रहने के कारण हो गया ..या इसी कारण से हम खूब शहर दर शहर भटके । पिताजी की नौकरी ने , और उससे भी ज्यादा उनकी परिवार को साथ रखने की प्रतिबद्धता ने हमें बहुत से शहरों से मिलवाया । उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक । और पूर्व से लेकर पश्चिम भारत तक । बहुत सारे शहरों से , बल्कि कहूं कि उस क्षेत्र की सभ्यता से , संस्कृति से , वहां की भाषा से भीतर तक परिचय होता गया मेरा ।

इसके बाद शहरों को धांगने का अगला दौर शुरू हुआ , अपनी प्रतियोगिता परीक्षाओं के दौरान देश के अलग अलग भागों के छोटे बडे शहरों को करीब से देखने का मौका । उन्हें देखने का मौका भर ही कहना ठीक लगता है .......क्योंकि सिर्फ़ चंद घंटों से लेकर चंद दिनों तक में तो उन शहरों कस्बों से बस हाथ भर मिलाते से लगते थे । चाहे वो उडीसा का छोटा सा शहर बालेश्वर हो ...या फ़िर कि ..हैदराबाद-सिंकदराबाद के जुडवां भाईयों जैसे शहर .....चाहे वो उत्तर प्रदेश का छोटा सा कस्बा .........एटा-इटावा, हो या फ़िर नैनीताल और शिमला जैसे पर्वतीय नगर । हर सफ़र ने जिंदगी को एक नई कहानी दी । उस समय तो जैसे एक नियम सा बन गया था और मोटे मोटे तौर पर जोडता हूं तो यही पता चलता है कि औसतन प्रति वर्ष दस हज़ार किलोमीटर और कम से कम तीन शहरों से मुलाकात तो हो रही थी ।

मगर कहते हैं न कि नौकरी तो बेडी है जी बेडी । बस नौकरी में क्या बंधे .....बंध कर रह गए ।
इसके बाद तो बस बेडी के साथ हथकडी भी लग गए .........और फ़िर बाद में ताला भी जड ही दिया गया ...लो नहीं समझे ..मतलब कि शादीशुदा प्राणी के अनुरूप .पहले एक अदद घरवाली के साथ साथ बाद में दो नन्हें मुन्ने भी आ गए .....तो लग गया न पक्का ताला ।

मगर यहां एक सुखद संयोग रहा .........हमारी श्रीमती जी को भी घूमने फ़िरने का बेशक एडिक्शन न सही ....मगर थोडा बहुत शौक तो था ही । बस फ़ट्टे पर चढाने का काम करना होता है .........वो हम बखूबी कर ही लेते हैं । श्रीमती जी के साथ शादी की स्कीम में ,पंजाब भ्रमण की मुफ़्त स्कीम का पूरा लाभ उठाते हुए .....पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्र को ही अपनी भ्रमणस्थली बनाते हुए , पिछले कुछ सालों से दे दनादन छापे जा रहे हैं पंजाब को । पिछले साथ दौरा आगे बढ कर ....डलहौज़ी तक पहुंच गया था ( बदकिस्मती से उस यात्रा वृत्तांत के वादे के बावजूद अब तक उसे नहीं लिख पाया हूं ) और इस तरह से अब फ़िर से घूम फ़िर कर गाडी उसी पटरी पर आ गई है ।

और हर साल अब फ़िर एक दो शहर मेरे अपने मन के नक्शे में छपते जा रहे हैं ।
वैसे जिस तरह शादी से पहले दोस्तों के साथ , कभी काम बेकाम , शहरों की ओर उड चलना .........मंजिल मकसद से दूर ......सिर्फ़ और सिर्फ़ वहां जाने के लिए .....एक अलग ही अनुभव रहा उसी तरह अब बाल बच्चों को लेकर .....रोज की चकचक से , रोज की मशीनशुदा जिंदगी से .....रोज की उसी बंधी हुई दिनचर्या से ....और सुबह उठ कर रोज ही इस शहर का मुंह देखने की मजबूरी से दूर ......कहीं चल उडने का जब भी विचार बनता है तो ......तन मन रोमांचित हो उठता है । जब कार इस राजधानी की सीमा को अलविदा कह रही होती है .......हम मन ही मन सोच रहे होते हैं ....जब वापस तुमसे हैंड शेक करेंगे तो फ़िर से यादों के एलबम में जाने कितनी ही फ़ोटुएं , जाने कितने अच्छे बुरे पल , जाने कितनी ही बातें , कितने दिन कितनी रातें .......अनमोल बन चुकी होती हैं ।

श्रीमती जो हमारी भ्रमणकारी ट्रिप इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि .....उन दिनों में फ़ुल्लम फ़ुल बस उनके ही होकर रह जाते हैं । वैसे यहां बताते चलूं कि सबका मानना है कि मैं बडा केयरिंग हूं ..उनके लिए .....और शायद हूं ही ।
एक वक्त हआ करता था जब बेफ़िक्र और लापरवाह की तरफ़ सफ़र की तैयारी पर निकल जाते थे ....और फ़िर चाहे वो सफ़र ..हिंदी के सफ़र से शुरू होकर .....अंग्रेजी के सफ़र तक चलता जाए ....हम चल ही देते थे । मगर अब ऐसा नहीं है , अब तो बच्चों की जरूरी दवाई से लेकर , उस स्थान के संभावित मौसम के अनुसार कपडे लत्ते , कैमरा, या मोबाईल ,टॉर्च, एक डोरी ,कुछ मजबूत थैले , टेलिफ़ोन डायरी , और ऐसी ही जरूरी चीज़ें , कैश और उसका विकल्प भी ......सब कुछ बाकायदा तैयार करके ही निकलते हैं ।

सच पूछिए तो सफ़र से एक मुहब्बत सी हो गई है ...............और अब तो तमन्ना भी यही है कि जिंदगी का पहिया और सफ़र का पहिया यूं ही साथ साथ चलता रहे .......और ये जिंदगी यूं ही पहियों पर कटती रहे .....॥
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