शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

अनटचेबल ...........






आमिर खान के सत्यमेव जयते से बेशक बहुत सारे लोगों को बहुत सारी शिकायतें हों , और इसके पक्ष विपक्ष , नफ़े नुकसान के गणित-गुणाभाग का आकलन विश्लेषण किया जा रहा हो , लेकिन मेरे लिए सिर्फ़ इतना ही काफ़ी है कि आज की तारीख में बुद्दू बक्से से बेकार बक्से तक की स्थिति में पहुंचने वाली टीवी पर सप्ताह में एक डेढ घंटे किसी मुद्दे को प्रभावी तरीके से उछाल कर उसे समाज में बहस करने के लिए छोड दिया जाता है तो यही बडी बात है । इसके एक आध एपिसोड को छोडकर मुझे सब विषयों और मुद्दों , उनकी प्रस्तुति और उसके बाद उनका पडने वाला प्रभाव स्पष्ट महसूस हुआ , जैसा कि आमिर खुद बार बार कह रहे हैं कि बात दिल पे लगनी चाहिए और दिल पे लगेगी तो बनेगी भी ।


पिछले बहुत सारे एपिसोड कहीं न कहीं , किसी न किसी रूप में महिलाओं के मुद्दों और उनसे जुडी समस्याओं के आसपास ही घूमते रहे , इसके बावजूद भी कल एक टीवी   समाचार में देखा कि गोहाटी में सरेआम , एक युवती के साथ पूरी भीड ने  वहशियाना हरकत की , उसने जता और बता दिया है कि अभी कुछ नहीं बदला है बल्कि कहा जाए कि बहुत कुछ बिगड गया है । और मुझे तो लगता है कि समाज को अब इससे भी ज्यादा घृणित , अमानवीय , कुकृत्यों और अपराधों को देखने सुनने और भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए , आखिर इस रास्ते को हमने ही तो हाइवे बनाया है ,और सबसे जरूरी बात ये थी कि जहां गति और दिशा का नियंत्रण होना चाहिए था वहां कोई इन्हें संभालने मोडने वाला नहीं था ।


हालिया एपिसोड में आमिर ने भारतीय समाज में जाति प्रथा के एक साइड इफ़्फ़ेक्ट और बुरे इफ़्फ़ेक्ट के रूप में मिली छुआछूत की बीमारी को उठाया । हमेशा की तरह , आमंत्रित मेहमानों और विशेषज्ञों ने ,अपने अनुभव , आंकडों और विमर्श से ये दिखा दिया कि अब भी बहुत कुछ नहीं बदला है । कम से कम उन समाजों में तो जरूर ही जहां ये व्याप्त थीं । यानि कि ग्रामीण परिवेश में । भारतीय समाज में जाति प्रथा की शुरूआत , जातियों का निर्धारण , उनके कार्यों का निर्धारण , उनके जीवन स्तर , उनके अधिकार आदि पर बहस तो सालों से चली आ रही है और सच कहा जाए तो जाति वर्गीकरण के कई वैज्ञानिक और सामाजिक तर्कों के बावजूद कभी कभी तो लगता है कि अब समय आ गया है जब इंसानी समाज से जाति और धर्म जैसे विषयों को बिल्कुल ही विलुप्त कर देना चाहिए । वैसे भी किसी आम खास जाति को उच्च और निम्न का प्रमाणपत्र देने की हैसियत और औकात कम से कम किसी इंसान की तो कतई नहीं होनी चाहिए ।


सरकार ने अपनी नीतियों और अपने नुमाइंदों के अनुसार बहुत सारे काम और बहुत सारी योजनाओं , कुछ कानूनों को लाद कर भी ये जताने का प्रयास तो किया ही है कि उन जातियों , जिन्हें निम्न या छोटा कहा समझा समझाया जाता रहा था सदियों से , के लिए बहुत बडा उद्धारकर्मी उपाय दिया । हालांकि बहुत सारे बदलाव और परिवर्तन जरूर हुए भी , लेकिन कमोबेश वो घाव अब भी कहीं न कहीं मवाद बहाता दिख मिल जाता है । खुद सरकारी आंकडों पर यकीन करें तो आज भी देश में हाथ से मैला ( मैला यानि मल मूत्र भी ) ढोने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है । आज़ादी के साठ साल बाद भी ।


शहर से निकलकर ग्रामीण परिवेश की तरफ़ बढने पर ही मुझे एहसास हुआ कि ऐसी कोई बीमारी भी इस समाज में है । शहरी जीवन में पहले और अब भी मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि जाति प्रथा या छुआछूत की किसी बडी घटना ने मेरा ध्यान उस ओर खींचा था सिवाय कुछ के जब एक आध सहकर्मियों ने कभी कभी किसी दूसरे सहकर्मी के साथ बैठ कर लंच करने में  असर्मथता जताई थी , बाद में पता चला कि वो छोटी जाति के उस सहकर्मी के साथ भोजन साझा नहीं करना चाहते थे । पिताजी फ़ौज में थे सो शुरू से ही परिवेश ऐसा रहा कि जाति धर्म भाषा आदि ने कभी मुझे अपने दायरे बनाने बढाने में कोई खास भूमिका नहीं निभाई । गांव में रहने के दौरान जरूर बहुत कुछ अनुभव हुआ ।इत्तेफ़ाक ये रहा कि उन्हीं दिनों अपनी स्नातक की पढाई के दौरान अंग्रेजी साहित्य (प्रतिष्ठा ) के पाठ्यक्रम में मुल्कराज़ आनंद की "अनटचेबल" पढने को मिली , जिसे मैंने अब तक सहेज़ कर रखा हुआ है ।








गांव में बस्तियों की बसावट और फ़ैलाव , जरूर उनके गोत्र मूल , पेशे, आदि के अनुसार था और अब भी है जो मुझे बहुत अलग सा नहीं लगा । लेकिन जैसे जैसे मुझे ये जानने को मिला कि उन्हें चापाकल , पोखर तालाब मंदिर और सामूहिक भोज तक में साथ बैठाना शामिल करना तो दूर उनके लिए वो सब वर्जित है , मुझे हैरानी भी हुई और कोफ़्त भी । मुझे अब तक याद है एक बार क्रिकेट खेल के मैदान से वापसी में बहुत जोर की प्यास लगने के कारण ,मैं स्वाभाविक रूप से जो भी चापाकल (हैंडपंप) दिखा उसमें से पानी पीने लगा । साथ के सभी लडके मुझे इस तरह छोडकर भागे मानो दिन में ही भूत देख लिया हो ।


अर्सा हो गया गांव छोडे और उसे महसूसते हुए , लेकिन मुझे पता है कि अब भी , जबकि सच में ही बहुत कुछ बदल गया है , उन बस्तियों में पक्के मकान हैं , और उनमें उनके पढते लिखते बच्चे हैं , विकास की , आगे बढने की एक ललक और झलक दिखाई देती है , लेकिन आज भी और अब भी वहां बहुत सी वर्जनाएं हैं जिन्हें तोडने टूटने में जाने कितने युग और लगेंगे ।

गुरुवार, 28 जून 2012

खुद अपने आप से आगे निकलिए ......





शायद नौकरी लगे हुए तीन साल हो गए थे तो ये उस वक्त की बात हुई यानि 2000-2001 या उसके आसपास की बात  थी । स्टेशन कौन सा था ये याद नहीं , मगर बक्सर था शायद , पानी भरने के लिए मैं भी स्टेशन पर लगे नल की लाईन में खडा था और एक नज़र इस बात पर थी कि गाडी कहीं खिसकना न शुरू कर दे ( ये आजकल की बिसलरी नस्ल शायद ही समझ सके कि उस समय स्टेशन पर रुक कर और उतने ही समय में , खाना और पानी या जरूरत की किसी भी चीज़ को लेकर आना जाना कितनी महत्वपूर्ण कला हुआ करती थी इस बात का अंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि वो काम सफ़र कर रहे परिवार के सबसे चुस्त और समझदार और फ़ुर्तीले तो जरूर ही , को दिया जाता था ) , तो वो स्वाभाविक सा काम हम तब कर रहे थे जब गांव से अकेले दिल्ली वापसी पर थे ।

पीछे से किसी ने कंधे पर थपका , " अबे झा तू ही है न "

मैं पलटा , अबे रंजन तू , मेरी ग्यारहवीं कक्षा का दोस्त था  रंजन । इत्तेफ़ाक ये कि वो भी अपनी ड्यूटी पर गुजरात जाने के रास्ते में थी चूंकि छोटा भाई दिल्ली में था इसलिए उसी ट्रेन से वो भी दिल्ली की ओर ही अग्रसर था । हमने पानी भरा और वापस चल दिए । उतनी देर हममें से कोई कुछ नहीं बोला । शायम हम दोनों , समय के उस अंतराल में एक दूसरे के चेहरे , हावभाव , चाल के बदलाव को भांप रहे थे । मैंने साथी दोस्तों को पानी की बोतल थमाई , दोस्त से परिचय कराया और फ़िर चल पडे दोस्त की सीट की तरफ़ ।

अकेले है या ..मैंने पूछा सबसे पहले

नहीं यार तेरी भाभी और भतीजी भी हैं साथ में ।

जियोह्ह तो तूने शादी कर ली , अबे उसका क्या हाल है जॉगिंग करे चलबू का ,

दोस्त उछल पडा , अबे धीरे बोल तेरी भाभी है साथ में पिटवाएगा क्या , वो कहानी तो तभी खत्म हो गई थी ।

हा हा हा हा मेरा ठहाका गूंज उठा था । सीट पर पहुंचे तो भाभी जी ,(जिसके लिए पट्ठे ने बाद में बताया कि ये भी सहपाठिन ही रही हैं हमारी लेकिन उस स्कूल में जहां ये बारहवीं में निकल लिए थे ) जो आज स्थानीय कालेज में लेक़्चरार हैं और प्यारी सी भतीजी से मुलाकात हुई । बहुत देर तक फ़िर हम अकेले में बैठ कर बतियाने बैठ गए । भाभी भतीजी खिडकी की सीट पर बैठ कर टिकट का असली महत्व वसूल रही थीं

और तू सुना , कहां क्या कर रहा है , शादी की या नहीं ,

अबे रुक यार , मैं दिल्ली में हूं , सरकारी नौकरी में , और फ़िर पूरी विस्तृत बात अपने कार्यालय और काम के बाबत । उसे बहुत हैरानी हुई । मैं समझ रहा था कि उसे और उस समय के मेरे सभी दोस्तों को ये जानकर बहुत हैरानी होती है कि मेरे जैसा थर्ड डिविजन पास लडका , कोई प्रतियोगिता पास करके नौकरी में कैसे आ गया , मतलब इत्ती बुद्धि वृद्धि ..ये कृपा कैसे किसकी हो गई ।

मैं खुद भी आंकता हूं खुद को तो यही पाता हूं कि दसवीं तक पढाई के बारे में मैं इतना ही होशियार था कि गली में सबके द्वारा पूछने पर , कि परीक्षाएं कैसी चल रही  हैं , मुझे लगा कि नहीं ये उन वार्षिक परीक्षाओं से ज्यादा जरूरी तो हैं ही । इन स्थितियों में यदि प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए सोच रहा था तो ...। मुझे अब लगता है कि मैंने खूब मेहनत की उस दौरान और उससे भी ज्यादा आश्वस्त था इस बात को लेकर कि आज नहीं तो कल आखिरी सफ़लता मिलेगी ही ॥


परीक्षाओं के उस दौर पर ,और ऐसी हर परीक्षा को यदि उकेर दिया जाए शब्दों में तो निश्चित रूप से दिलचस्प जरूर लगेगी आपको । खूब अवसर हुआ करते थे उन दिनों , और सभी क्षेत्रों में ,हम सभी दोस्तों ने ये ठान ही लिया था कि अब आर या पार । हमारे एक बहुत की कुशाग्र मित्र जो उन दिनों हमारे साथ ही प्रतियोगिता परीक्षाओं के समर में दौड रहे थे ने रिकार्ड 14 बार बैंक पी ओ कैडर की लिखित परीक्षा पास की मगर साक्षात्कार में कभी पास न हो सकने के बावजूद पंद्रहवीं बार बैंक पी ओ बन कर ही माने । उसी समय जाना था कि पढाई , लक्ष्य , उससे पाने की जिद और पाने के लिए अथक परिश्रम और प्रतिबद्धता क्या होती है ।

वैसे भी मेरा यही फ़लसफ़ा है कि जहां भी जो भी दे रहे हो , अपनी ओर से कोशिश होनी चाहिए कि अपना सौ प्रतिशत दें । बाद में ये अफ़सोस नहीं होना चाहिए कि  , काश ये और ज्यादा करके देखा होता । मैं क्रिकेट , बैडमिंटन , वॉलीबॉल , फ़ुटबॉल अच्छा खेलता था मगर स्कूल की टीम में आज तक सिर्फ़ खिलाडियों को पानी ही देता रहने वाला डेडिकेटेड प्लेयर रहा । हां कालोनी और उसके बाद ग्राम्य जीवन में जरूर खेलता और अच्छा खेलता रहा । राजनीति भी अछूती नहीं रही ,मगर शायद अनुभव इतने तल्ख मिल गए कि फ़िर तो एक बू सी हमेशा ही आती रही उधर से । काम , पढाई लिखाई , घुमाई किसी भी बात में मुझे अपनी पूरी उर्जा झोंकने में आनंद आता है ।


मुझे लगता है ये इस तरह की कोशिश है जिसमें आप खुद से आगे निकलने की कोशिश में रहते हैं , हर पल हर समय आपी सोच और क्रियाकलाप उसी दिशा में आगे बढती हैं । और आगे निकलने का मतलब मेरा सिर्फ़ विकास के रास्ते पर होना नहीं है , आगे मतलब अपने वजूद से अपने होने के एहसास की तरफ़ आगे । जिंदगी अपना चक्र पूरा करती ही है , आज तक किसी के रोके टोके नहीं रुकी है इसलिए तब तक हमें चलायमान रहना ही होगा , चलते रहना होगा निरंतर ..कभी अपने साथ ..कभी खुद अपने आप से आगे .....

मंगलवार, 26 जून 2012

हाय किताबों से इश्क कर बैठा ...........


"आप इस उम्र में भी इतना क्यों पढते हैं ? " ,

मैंने चौंक के सर उठा कर देखा तो एक सहकर्मी महिला मित्र मेरे हाथों में अटकी उस मोटी सी किताब को देखते हुए , मुझसे प्रश्न कर रही थीं । मेरे होठों पर एक मुस्कुराहट तैर गई , वही जो अक्सर ऐसे सवाल ( जो मुझे न सिर्फ़ दफ़्तर , घर ,बल्कि कई बार मेहमानों के यहां भी ) को सुनने के बाद तैर जाया करती थी । और घर पर तो ताने के रूप में मिलता है ये ,सो कई बार झुंझलाहट भी हो जाती है । क्या करूं , मुझे आदत है , मुझे इसके अलावा और कुछ नहीं आता , मुझे लिखना पढना पसंद है , जैसे जाने कितने ही रटे रटाए जुमले दोहराता हूं ।


वो मुट्टली किताब जो इन दिनों मेरे हत्थे चढी हुई है




"अगला प्रश्न होता है ,अच्छा कितना पढ लेते हैं आप , मतलब कितने घंटे लगभग ?" 

" जी मैंने कभी हिसाब नहीं रखा , लेकिन शायद छ; सात या आठ घंटे तो पढ ही लेता हूं , लेकिन सिर्फ़ किताबें नहीं , समाचार पत्र , पत्रिकाएं , और नेट पर भी पढता हूं बहुत कुछ " मैंने उन्हें थोडा सा उकताते हुए जवाब दिया ।

" हमारे तो बच्चे भी इतना नहीं पढते आजकल , कंपीटीशन इतना टफ़्फ़ होता जा रहा है , कहती हूं फ़िर भी नहीं पढते , क्या करें जब हमें ही पढता नहीं देखते । वो तो फ़िर भी समाचार पत्र पढ लेते हैं सुबह मैं तो वो भी नहीं देख पाती ..........और फ़िर जाने क्या क्या ??

उनके साथ मैं हूं हां करता रहा और उनके जाने के बाद बहुत समय तक मन में बहुत सी बातें उमड घुमड करती रहीं । क्या सच में ही मैं किताबी कीडा टाईप का हो चला हूं । मुझे लगा कि नहीं , बिल्कुल नहीं । अभी तो जाने कितना कुछ बांकी बचा है पढने को , समय ही कहां मिलता है । रोज़ की सरकारी नौकरी , वो भी अदालत जैसी जगह पर जहां सुबह से शाम तक , चेहरों , , न्यायिक प्रक्रियाओं , मुकदमों और फ़ैसलों को ही पढते फ़ुर्सत नहीं मिलती तो उसमें अपनी पसंद की किताबों की पढने की बात ही कहां । लेकिन पसंद की किताबें , मुझे तो सब कुछ पढना अच्छा लगता है । कानून की किताबों से लेकर काद्मबनी  तक , और समाचार पत्रों से लेकर विभिन्न वेबसाइट्स , ब्लॉगपोस्ट्स और दोस्तों के फ़ेसबुक अपडेट्स तक । अपनी पसंद की रेंज़ बहुत बडी है या कहा जाए कि कोई रेंज़ ही नहीं है । अजी छोडिए , बेकार की बात है ,इतना ही पढाकू होता तो दसवीं में थर्ड डिवीज़न न आई होती , और सच कहूं तो अब तक विश्वास नहीं होता कि बांकी सब तो ठीक था लेकिन गणित के पेपर में पास कैसे हो गया आखिर ?


जी हां , शुक्र मनाता हूं कि न तो वो जमाना आज की तरह का बच्चों के लिए मेट्रिक परीक्षाओं के समय और शायद उससे पहले भी कर्फ़्यूनुमा हुआ करता था और न ही कम नंबर आने पर उनका कोर्ट मार्शल हुआ करता था अलबत्ता तैंतीस प्रतिशत के लिए अभिभावक आश्वस्त हुआ करते थे सो हम भी फ़ैले पडे रहते थे कि अगर कुर्सी टेबल पास तो हम भी पास । शायद वो मैट्रिक के इम्तहान ही थे जिनके परिणाम ने बदल कर रख दिया । लगा कि नहीं , पढने का अपना ही आनंद है । न सिर्फ़ अकादमिक पढाई में बल्कि फ़िर प्रतियोगिता परीक्षाओं के दौर में और उसके बाद साहित्यिक रुचि जगने के बाद तो जैसे किताबों से इश्क सा हो गया । और किताबों से ही क्यों कहूं , पढने से मोहब्बत हो गई ये कहना चाहिए । हालांकि शुरू में तो पढाई इस वज़ह से शुरू हुई कि , अबे धत जब राकेश  , राजीव  , विजय  , सबको पढने में इतना मज़ा आता है तो कुछ तो आनंद होगा ही पढने में ।


एक वाकया याद आ रहा है बहुत पहले का । मेरी दीदी पढाई लिखाई में बहुत ज्यादा प्रखर और मेधावी  थीं और मैं उतना ही भयंकर भुसकोल इसलिए अक्सर मन में ये अरमान रहते थे कि जैसे मां बाबूजी दीदी को कहते थे , " क्या पूरे दिन किताब हाथ में लिए पढती रहती है , थोडी देर के लिए इसे छोड दे " , हाय कि वो कौन सा दिन होगा जब हमारे लिए भी मां बाबूजी यही कहेंगे । और सच में ही कहने लगे वे जब मैंने प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी शुरू की । अब तेज़ तर्रार तो थे नहीं , सो दे धमाधम , दे दनादन परीक्षा पे परीक्षा , मजाल है जो एक भी छोडी हो और मजाल है कि एक भी पास कर पाए हों । तब अंदाज़ा ही नहीं था शायद , न परीक्षाओं को पास करने के स्तर का और न ही अपनी काबलियत का । फ़िर वो दौर भी आया कि जहां जहां प्रयास किया सफ़लता मिली । और शायद इसी दौर ने पढाई में वो कशिश पैदा कर दी कि हम किताबों से , शब्दों से ही इश्क कर बैठे । अब तो बिना पढे रहा ही नहीं जाता । आदत इतनी खराब कि , सहकर्मियों को ( उनके बच्चों के लिए ) न सिर्फ़ नए आवेदनों के बारे में ही नहीं बताता रहता हूं बल्कि उन प्रतियोगिताओं के लिए मिलने वाली पत्रिकाओं , सामग्रियों के बारे में लगभग जबरन भी बता दिया करता हूं । क्या पता अगला चाहे परेशान ही हो जाता हो ।


हां साहित्य से लगाव स्नातक में अंग्रेजी ऑनर्स के दौरान ही हो गया लेकिन परवान चढा दिल्ली में रहने के दौरान और उन मित्रों के संपर्क में आने के बाद जिन्होंने मुझे गुनाहों का देवता , रतिनाथ की चाची , मुझे चांद चाहिए , का स्वाद लगा दिया । फ़िर तो ये लगी लगाए न लगे और बुझाए न बुझे वाली स्थिति हो गई । शायद ही कोई दिल्ली पुस्तक मेला हो जहां मैं जाकर ढेर सारी किताबें न खरीद लाया हूं । बेशक वो मेरे अलावा सबके लिए " रद्दी वाले का अच्छा खासा स्टॉक "हों लेकिन मेरे लिए किसी पूंजी से कम नहीं । एक दिन हुलस कर जोश में किताबों का कोना भी बना लिया , मगर किताब को पढ कर उनके लिए कुछ लिखने में अब तक आलसी ही निकला , जल्दी ही उस आदत को भी नियमित करता हूं । अब  तो ये इश्क ज़ारी रहेगा , माशूकाएं मिलती रहेंगी और मैं उन्हें पढता रहूंगा ..........................................

थोडी सी किताबों के लिए एक अस्थाई सा ठिकाना अपने कमरे में , बांकी सब बेचारों को संदूक की सज़ा सुनाई हुई है

रविवार, 20 मई 2012

ब्लॉगिंग में हुआ बवाल , ब्लॉगिंग को मिली उछाल










पिछले कितने समय , अब इसका लेखा जोखा भी क्या रखना , बस ये समझिए कि कम से कम एक बरस से तो जरूर ही , ब्लॉगिंग एकदम मुइतमईन सी हो गई थी । फ़ेसबुक , गूगल प्लस और ट्विट्टर ने मानो ब्लॉगिंग की रफ़्तार को पहले पकड फ़िर जकड के रख लिया । गोया जो यहां से जरा सा उधर की ओर गया मानो जैसे वहीं का हो कर रहा है । दूसरों की क्या कहें कमोबेश हम खुद भी उसी गाडी में सवार हो गए थे अलबत्ता कारण शायद थोडे बहुत अलग अलग हों । 


लाख कोशिश हुई , वैसे ऐसी कोई घनघोर कोशिश हुई हो इसकी जानकारी कम से कम अपने पास तो कतई नहीं है , लेकिन हुई होती तो घनघोर ही हुई होती न कि ब्लॉगिंग को दोबारा पटरी पर लाया जाए , बल्कि ब्लॉगिंग को क्यों कहें , कहा जाए कि ब्लॉगरों को दोबारा पटरी पर लाया जाए । हद है आखिर इत्ती घनघोर मनहूसियत , न कोई विरोध , न झंडे , न झंडाबरदार , पोस्टों पर टिप्पणियां तो छोडिए , पोस्टों के ही लाले पड गए । फ़िर पोस्टें लिखी भी जाती रही हों तो पाठक पढें कैसे । तेज़ और लोकप्रिय एग्रीगेटर्स तो कब के कोमा में चले गए और धत तेरे कि धाकड लिक्खाड से लेकर धुरंधर टिप्पाड तक , पोज़िटिव निगेटिव के चटके से लेकर चिट्ठाजगत सक्रिय निष्क्रिय , हवाले मतवाले आदि तमाम टाईप के एक्सक्लुसिव खोजी खबरी भी इनके साथ ही कोमा में चले गए । हा! रे ब्लॉगिंग का दुर्भाग्य ।


लेकिन ऐसा नहीं है जी बिल्कुल भी नहीं , बीच बीच में कभी ब्लॉगर मिलन /बैठक / संगोष्ठी के बहाने तो कभी ईश्वर , धर्म , मज़हब के बहाने दंड पेलने वालों ने रौनक बनाए रखी । भर भर के बाल्टियां , ऐसी कोसमकोस शुरू कि समझ ही नहीं सकता कोई कि यदि धर्म , मज़हब पर बातें करने वाले , विमर्श करने वाले इतने सहिष्णु और गंभीर  लोग हैं तो फ़िर तो इनकी समझ की और दूसरों को समझाने की इनकी कोशिशों की दाद ही नहीं दाद खाज और खुजली भी देनी चाहिए । मगर न जी , मामला कुछ जमा नहीं । इक्का दुक्का बार बीच बीच में चल रहे एक आध एग्रीगेटर में से हमारीवाणी को भी उसी तरह निशाने पर लिया गया जिस तरह से पहले ही ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत का शिकार हमारे तीस मार खां ब्लॉगर मित्र लोग कर चुके थे , लेकिन सब नाकाफ़ी रहा रफ़्तार बढी नहीं कुल मिला कर ।

देश और प्रदेश में बेशक हवाएं अब गर्म हुई हों और लू के साथ साथ धूप की तपिश ने सबको हलकान करना शुरू कर दिया हो लेकिन भला हो ब्लॉगजगत के लिक्खाडों का कि यहां मामला गर्मा गर्मी का पहले ही शुरू हो गया । अब ये न ही पूछिएगा कि हाऊ हू बिकम बोल्ड , एंड किसने किसको क्या किया फ़िर टोल्ड और आखिरकार मामला वो भी पड ही गया कोल्ड , हां इत्ता जरूर रहा कि इस विषय ने पिछले कुछ दिनों तक बनाए रखा होल्ड । लेकिन एक बार फ़िर से फ़ार्मूला हिट्टम हिट रहा कि नकारात्मकता उत्प्रेरक का काम करती है ।

इस बारे में जब सोचता हूं तो मुझे एक दिलचस्प किस्सा याद आता है जो शायद मैं आपसे पहले भी बांट चुका हूं । एक स्कूल में बच्चों ने एक चैरिटी कार्यक्रम रखा , योजना बनी कि इस कार्यक्रम के बारे में लोगों को बताया जाए और फ़िर जब लोग इस कार्यक्रम को देखने आएं तो टिकट खरीद कर उसे देखें , टिकट से जो पैसे आएं उससे स्कूल के बच्चों के लिए खेलने और संगीत के लिए कुछ सामान खरीदा जाए । सारी तैयारियां हो गईं , तय हुआ कि लोगों को जानकारी पैम्फ़लैट के माध्यम से दी जाए । अगले दिन कुछ स्कूली बच्चे स्कूल के सामने ही सडक पर हाथों में पैम्फ़्लैट लेकर खडे हो । जो भी वहां से गुजरता , उसके हाथ में पकडा देते , लोग , बाइक स्कूटर कारों में सवार , सब उसे पकडते और आदत के अनुसार एक निगाह डाल कर वहीं फ़ेंक कर चलते बनते । बच्चे बडे दुखी और मायूस हो गए । इतने में एक युवक जो ये सब थोडी देर से देख रहा था उसने उन बच्चों से कुछ कहा । बच्चों ने सामने से आ रहे एक बाइक सवार को रोका और पैम्फ़लेट देने लेगे , उसने जैसे ही आगे हाथ बढाया , बच्चों ने पैम्फ़्लेट को दोनों हाथों से मोड तरोड दिया । बाइक सवार ने हैरान परेशान होते हुए उस पैम्फ़लेट को पकड लिया , और फ़िर अचानक उसे खोल कर सीधा करके पढने लगा । बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आ गई । यानि फ़लसफ़ा ये कि मानव मन है ही ऐसा हमेशा उलटी बातें , उलटी चीज़ें ही ज्यादा आकर्षिंत करती हैं । फ़िर हम कौन से डायनासोर हैं , हम भी तो आखिर बाइक सवार ही हैं सो जैसे ही कागज़ मोड के पकडाया गया सब स्विच ऑन मोड में आ ही गए ।


वैसे ये फ़लसफ़ा एक लिहाज़ से ठीक भी है , जब कोई चर्चा न करे , जब कोई बात न करे तो खुद ही अपनी चर्चा करो , खुद ही अपनी बात करो । ब्लॉग जगत में आयोजन चाहे कैसा भी है , आयोजक चाहे कोई भी हो लेकिन जब तक उसका मीन मेख निकाल कर उसका पूरा पोस्टमार्टम न किया जाए तब तक आयोजन की पूर्णाहुति नहीं होती , पहले भी कभी नहीं हुई है । सो एक एक करके ऐसे वैसे सारे आयोजन के कर्ताधर्ताओं के कसबल ढीले पडते चले गए , जिनके बचे हुए हैं हमें पूरा यकीन है कि पोस्टों और टिप्पणियों की मिसाइलों से उनके मनोबल को भी नेस्तनाबूत कर ही दिया जाएगा । तो लब्बोलुआब ये कि रविंद्र प्रभात जी ने पिछले बार परिकल्पना सम्मान योजना और समारोह के खूबसूरत संचालन और उसके बाद हुए तमाम हंगामों के बावजूद हिम्मत न हारते हुए एक बार फ़िर से ब्लॉगरों को सम्मानित करने का मन बना लिया । जी हां सम्मानित को बोल्ड इसलिए किया है ताकि ठीक से बार बार ये ज़ेहन में आ सके कि सम्मानित ही करने की मंशा है । यहां एक साथ ही कई सारे प्रश्न उछले उछाले जा सकते हैं , उछल ही रहे हैं ।


सम्मानित ..क्यों भाई , हिंदी ब्लॉगरों को आखिर सम्मानित किया ही क्यों जा रहा है जब उन्हें अपमानित होने की आदत है तो ऐसी किरपा क्यों वो भी बिना दसबंद जमा किए कराए और फ़िर उससे भी जरूरी बात जब अपमानित करने कराने के लिए किसी को किसी की अनुमति सहमति की जरूरत नहीं होती तो फ़िर सम्मानित करने के लिए ही ये हिमाकत क्यों की जाए भला । वैसे भी देर सवेर कहा तो यही जाने वाला है ही कि हुंह्ह जिन्हें देने का मन था उन्हें दे ही दिया खामख्वाह इत्ता नाटक किया । लेकिन कमाल एक ये है कोई भी ये नहीं कहता कि फ़लां जी और चिल्लां जी को बिल्कुल भी कतई नहीं दिया जाना चाहिए ये सम्मान । अजी धेला भर नहीं जानते वे , कद्दू लिखते हैं और क्या खाक पता है उन्हें लेखन पठन के बारे में , मगर ना जी ये भला क्यों कहा जाए । इनको नहीं दिया जाए कहने से अच्छा है कि ये कहा जाए कि फ़िर इनको क्यों नहीं दिया गया , और जब इनको दिया गया तो उनको क्यों छोडा गया । किसी भी सूरत में आखिरकार सम्मान तो एक ब्लॉगर का ही होना है ।

परिकल्पना ही क्यों जी ..रविंद्र प्रभात ही क्यों ....लो ये कमाल है न । हां भई आखिरकार उन्हें ये हक दिया किसने कि वो यूं सरेआम सार्वजनिक रूप से सबको सम्मानित कर दें ..बताइए .तो ..सम्मानित । अजी जब ब्लॉगरों को घर दफ़्तर में कोई नहीं पूछता तो फ़िर ये इतने बडे हितैषी ..हैं कौन । ओहो ! जरूर परिकल्पना के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है जो ब्लॉगिंग की स्थापित परंपरा यानि " ब्लॉगिंग का ब्लॉगिंग में ब्लॉगरों द्वारा ही अपमान " के बिल्कुल ही विपरीत है इसलिए कतई मंज़ूर नहीं किया जाएगा । फ़िर ये क्या बात हुई भला , हमारी हरकतें , हमारी बतकुच्चियां टिप्पणियां देख के कौन कह सकता है कि ये हिंदी ब्लॉगिंग  बालक अपने जीवन के एक दशक को देख चुका है , गोया अभी तो बचपन चढा भी नहीं है ठीक से घुटने के बल ठेमहुनिया मार के चल रहा है ऐसे में इतना भारी सम्मान । न कदापि नहीं । चलिए जो भी हो , इतना तो है ही कि ब्लॉगिंग अब अगल कुछ समय तक अपने पूरे उछाल पर रहेगी । वो कहते हैं न शेयर मार्केट उछाल वाली , जी जी जी बिल्कुल वैसी ही ।


सौ बात की एक बात देखने के दो ही नज़रिए होते हैं एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक और ज़ाहिर है कि सबके अपना अपना नज़रिया ही होता है ।हिंदी ब्लॉगर के रूप में मैंने पिछले छ: वर्षों में मैंने हमेशा ही हिंदी को ,हिंदी ब्लॉगिंग को , हिंदी ब्लॉगस को  और हिंदी ब्लॉगर्स को आगे बढने , बढाने , प्रोत्साहित करने , सम्मानित करने वाले हर प्रयास , हर छोटी बडी कोशिश का साथ दिया है और आगे भी दूंगा । फ़िलहाल तो ब्लॉगपोस्टों की बढी रफ़्तार और उस पर आई प्रतिक्रियाओं के दौर ने एक बहाना तो तत्काल दे ही दिया है भाई रविंद्र प्रभात जी की इस कोशिश का धन्यवाद अदा करने के लिए । हैप्पी ब्लॉगिंग एंड कीप ब्लॉगिंग ।

गुरुवार, 3 मई 2012

कोल्ड-बोल्ड ब्लॉगिंग और फ़ास्ट फ़्युरियस फ़ेसबुक






 

हिंदी अंतर्जाल का चेहरा , अपने पैदा होने से अब तक लगातार इतना तेज़ी से बदलता रहा है कि , कभी तो उसको साहित्य अपने निशाने पर लेता है ,ये कह कर कि इस पर जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है वो स्तरहीन है , जबकि उन्हें भलीभांति मालूम होता है कि अब तो अंतर्जाल पर पूरा साहित्य इतिहास समग्र उपलब्धता की ओर अग्रसर है । कभी मीडिया , इसे अपने आपको न्यू मीडिया कहने कहलाने पर आडे हाथों लेता है । और सबसे कमाल की बात ये है कि इसके बावजूद भी सबको सबकी खबर रहती है और गाहे बेगाहे एक दूसरे की लाइन क्रॉस भी करते रहते हैं । इस बार मामला कुछ ज्यादा अलग इसलिए है क्योंकि इस बार तो एक नज़र सरकार ने भी अपनी टिका दी है और टेढी नज़र टिकाई है । लो जी जुम्मा जुम्मा अभी तो दस बरस भी नहीं हुए । अपने इतने से घंटों दिनों के सफ़र में हिंदी अंतर्जाल ने न सिर्फ़ माध्यम और मंच बदले बल्कि , अपना नज़रिया शैली और दिशा भी बदली । . 


बीच बीच में सेवा प्रदाता कंपनियों के परिवर्तन या ऐसे ही किसी कारणों के लोचा में फ़ंसकर झटके खाते इन मंचों के लिए विपदा पे आफ़त भी कुछ इस तरह की आई कि ,एक एक करके अलग अलग कई कारणों से एग्रीगेटर सेवा साइटें बंद हो गई या रुक गईं । दुनिया देश , फ़टाफ़ट जिंदगी की आदत को अपना रहा था , क्रिकेट भी टेस्ट मैच से लेकर ट्वेंटी ट्वेंटी मोड में पहुंच चुकी थी ऐसे में लोगों को त्वरित से भी तेज़ संवाद और संप्रेषण का हर नया उपाय ज्यादा लुभा रहा था । जिस ब्लॉगर ने अपनी मुफ़्त और अदभुत सेवा यानि ब्लॉग के माध्यम से विश्व अंतर्जाल पर धूम मचा दी और कभी बीबीसी समाचार सेवा की प्रमुख समाचार सूत्र के रूप में विख्यात हुई , उस सेवा को , ट्विट्टर , फ़ेसबुक और यू ट्यूब के बडे विस्तारित जाल ने कडी टक्कर दी । .
इन सब कारणों ने हिंदी ब्लॉगिंग में कोल्ड ब्लॉगिंग का दौर चला दिया । 


 कोल्ड क्या इसे तो चिल्ड ब्लॉगिंग कहिए , वर्तमान में लोकप्रिय एक एग्रीगेटर " हमारीवाणी " के पहले पन्ने की पोस्टें शाम तक भी एक पन्ने तक ही सीमित सी हो कर रह गई हों जैसे । सबके पास नियमित ब्लॉग नहीं लिखने , नहीं लिख पाने और यहां तक कि , नहीं पढ पाने और नहीं टिप्पणी करने या कर पाने के बहाने या कारण थे । लेकिन ट्विट्टर , फ़ेसबुक , प्लस ,और इन जैसे वैकल्पिक मंचों पर गहमागहमी चलती रही । इन सबके बावजूद एक कमाल की बात ये रही कि हिंदी ब्लॉगिंग में मज़हबी कटटरपंथ से जुडी पोस्टों ने गजब रफ़्तार पकड ली । अन्य भाषाओं का तो पता नहीं किंतु मेरा पिछले पांच वर्ष का अनुभव यही बताता है कि किसी भी विवाद के होते ही हिदी ब्लॉगिंग सक्रियता के अपने चरम मोड पर होती है । पिछ्ले दिनों सुना कि ऐसी ही एक पोस्ट से हिंदी ब्लॉगिग ने कोल्ड ब्लॉगिंग से बोल्ड ब्लॉगिंग की इमेज बना ली या बनी हुई घोषित कर करवा दी गई । अब ये तो इत्तेफ़ाक रहा कि एक संयोग भर कौन जाने लेकिन , बोल्ड ब्लॉगिंग ने आपनी अगली पारी के लिए आज के भारत "इंडिया टुडे " के मुख पृष्ठ को ही मुद्दा बना दिया । लेकिन इन सबका प्रभाव ये रहा कि बहुत दिनों बाद बहुत सी पोस्टों पर बहस और विमर्श की एक ऐसी महफ़िल जम गई कि समां बंध गया । .




अब रही बात ब्लॉगर मित्रों दोस्तों की तो , सब कहीं न कहीं लगे तो रहे , कोई प्रकाशन , तो कोई प्रकाशक से उलझे रहे , कई अपनी जिम्मेदारियों और पारिवारिक दायित्वों को संपन्न करने में लगे रहे , तो कई फ़ेसबुक और ट्विट्टर को धुनने में लगे रहे ,कईयों ने तो हार, प्रहार , लुहार तक पर पीएचडी कर डाली इस बीच , हम भी इन्हीं में से एक रहे । कहते हैं कि हिंदी ब्लॉगजगत में हमेशा ही गुटबाजी और समीकरणों की बात होती है , और कमाल ये है कि ये बदलते रहते हैं , खूब बदलते हैं । नाम ले ले के पोस्टें लिखने , एक दूसरे की टांग खींचने और और सभी भाषाई मर्यादाओं को तोड कर दंड पेलने की कवायद तो पहले से भी होती रही है , अलबत्ता इसकी रफ़्तार कम ज्यादा होती रही है । आने वाले दिनों में अंतर्जाल के बहुत सी बंदिशों और पाबंदियों के दायरे में आने की पूरी संभावना है ऐसे में यदि हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले किसी भी वजह से उदासीन होते हैं या अपनी उपस्थिति अपने विचारों से प्रशासन को कोई मौका देते हैं तो ये आत्मघाती कदम साबित होगा । सबसे जरूरी ये समझना है कि यहां विचारों का आना और बिल्कुल सीधे सीधे आना एक ताकत भी है और कमज़ोरी भी ।



रविवार, 15 जनवरी 2012

दिल्ली टू मधुबनी ..वाया मोबाइल






जब से जेब में मोबाइल आया है , और कुछ हो न हो , फ़ोटो खींचने की शौक एक आदत सी बन गई है , और जो फ़ोटुएं निकल कर आती हैं तो हम भी खुश हो लेते हैं कि चलो ससुरा नेगेटिव तो नहीं निकल के आया । आप शायद यकीन न करें मैं अपने मोबाइल से लगभग छ हज़ार फ़ोटो खींच चुका हूं और ....कहा न आदत से बाज़ नहीं आता । बहुत बार मुसीबत में फ़ंसने के बावजूद , फ़ोटो खींच कर सहेजना मुझे पसंद आता है । चलिए आज आपको अपने पिछले ग्राम प्रवास के दौरान की कुछ तस्वीरें दिखाता हूं



















































 









उम्मीद है आपको पसंद आई होंगी

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

हिंदी अंतर्जाल पर चार वर्ष पूरे ..ब्लॉगियाते , फ़ेसबुकियाते और ट्विट्टराते अनुभव






मुलाकातों का सिलसिला चल निकला



फ़िर तो यादें ही यादें


इस बीच हिंदी अंतर्जाल पर कब चार साल का सफ़र पूरा हो गया इसका अहसास ही नहीं हुआ । यूं तो ये सफ़र इतना बडा लंबा और विस्तृत नहीं है कि इसके लिए अभी कुछ लिखा कहा जाए ,किंतु पिछले चार सालों में अंतर्जाल पर बीते बिताए लम्हों को , उसके बहाने बने नए पुराने रिश्तों को , दिनचर्या में आए बदलाव को , और शायद सोच में आए परिवर्तन को थोडी देर ठहर कर टटोलने का मन हो तो फ़िर इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था भला । वर्ष २०११ अपने अंतिम पडाव पर है , बेशक दिन रात में कोई बडा फ़र्क न आता हो , या शायद ठंड के तेवर में भी रत्ती भर का फ़र्क पडता हो इससे ,किंतु ये तो होता ही है कि वर्ष की आखिरी संख्या बदल जाती है ।
और ढेर सारी सुनहरी यादें

शुरूआत में हिंदी अंतर्जाल से परिचय सिर्फ़ ब्लॉगर तक ही हुआ था वो भी एक खूबसूरत संयोग से । शायद सितम्बर अक्तूबर महीने की बात है जब कादम्बिनी ने अपने एक अंक को ब्लॉग और ब्लॉगर्स पर आधारित करके आठ पेज के एक लबें आलेख के साथ साथ बहुत कुछ बताया समझाया था ब्लॉग के बारे में । उस अंक और अपने एक सहकर्मी जो उस समय कंप्यूटर में और अब भी मुझसे दक्ष थे , उनकी मदद से ब्लॉग भी बन गया और ब्लॉगिंग भी शुरू हुई । हम दोनों के लिए ही ये एक नया अनुभव था । हालांकि उस वक्त हिंदी अंतर्जाल से सायबर कैफ़े में बैठ कर सिर्फ़ एक डेढ घंटे की नियमित जानपहचान से ज्यादा तक बात नहीं पहुंची थी । अंतर्जाल पर बिताए उन एक घंटों के दौरान ध्यान सिर्फ़ ब्लॉग लिखने और पढने तक ही सीमित रहता था । हमारे लिए एक इस नए फ़लक पर विचरने के अलावा हिंदी अंतर्जाल से जुडने का एक दिलचस्प कारण ये भी रहा कि जब भी सहकर्मियों और उस समय के मीडिया मित्रों को जैसे ही किसी ब्लॉग का पता थमाया ,पृष्ठ खुलने पर हिंदी में सामग्री को देख कर उनके हर्षमिश्रित चेहरे को देखने का मचा ही और होता था , और यकीन मानिए कि ऐसा अब भी कई बार हो जाता है ।कल्पना करिए कि उन्हें जब ब्लॉगवाणी ,चिट्ठाजगत ,हिंदी ब्लॉग्स , नारद , सारथि , रफ़्तार जैसे एग्रीगेटर्स की झलक दिखाई जाती तो क्या होता होगा ।
विमर्श ,बहस , बैठक


गूगल , वर्डप्रेस ,या किसी भी अन्य प्लेटफ़ार्म ने अब तक , हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले ब्लॉगर्स के लिए कहीं से भी धेले भर आर्थिक लाभ नहीं देने के बावजूद हिंदी ब्लॉग्स की संख्या बढती रही ।और तो और कई जुझारू साथियों ने अपने अपने समाचार पोर्टल और सामूहिक ब्लॉग्स की ऐसी धूम मचाई कि कहीं इसे न्यू मीडिया का नाम दिया जाने लगा तो कहीं भविष्य का साहित्य संसार ।  इसके साथ ही बढती रही हिंदी अंतर्जाल द्वारा उत्पन्न की जा रही चुनौती । मीडिया , साहित्य और सरकार तथा प्रशासन तक के लिए ये उनकी आंख की किरकिरी बन कर उभर आया । सबसे कमाल की बात ये रही कि , तुम मुझे चाहो या मुझसे नफ़रत करो ,मगर मुझे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते जैसे आज हिंदी अंतर्जाल को दरकिनार करना बहुत कठिन हो गया है ।
कभी तिलयार

हिंदी अंतर्जाल के प्रारंभिक दो वर्ष अनियमितता और बेतरतीबी से ही बीते , और इसके कारण भी कई थे । घर पर कंप्यूटर आने के बाद हमारे जैसे लिखन पठन के व्यसनी के लिए इससे बेहतर साथी और कौन हो सकता था । और फ़िर ऐसा भी नहीं था कि यहां सबकुछ आभासी ही है ,बल्कि कभी कभी तो यहां उससे ज्यादा देखने और महसूसने को मिला जो वास्तविक जीवन में शायद उतना तल्ख नहीं रहा है अब तक । मसलन ,कुछ दिनों तक एग्रीगेटर्स और उस समय के दो बेहतरीन संकलकों पर लगातार बमबारी , सक्रियता क्रम और पसंद नापसंद वाले बटन को लेकर , एक से एक , जी बिल्कुल एक से बढकर एक तहलकी (यूं तो ये तहलका का वर्जन है लेकिन जिसका अर्थ तल से हलकी ) रिपोर्टें आईं । पोस्टों में ही संकलंकों का नाम लेकर उन्हीं की छाती पर रोज़ क्विंटल क्विंटल भारी चार्ज़शीट लादी गई ।

अब इसका और इसके साथ ही अन्य बहुत सी कारगुजारियां का  कुल परिणाम ये रहा कि एक एक करके दोनों ही संकलक , ब्लॉगरों को गड्डम गड्ड छोड के चलते बने । हालांकि , चूंकि दोनों अभी मौजूद हैं तकनीक की भाषा में कहें तो सर्वर पर हैं तो कभी न कभी यदि वे वापसी करें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए । लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि हिंदी ब्लॉग के पाठकों ने फ़िर पढने के लिए अपने अपने विकल्प तलाशे । इस प्रयास में कई बेहतरीन संकलक ,जैसे हमारीवाणी , इंडली , ब्लॉगप्रहरी , ब्लॉगमंडली ,बलॉगगर्व , के अलावा दर्ज़नों फ़ीड क्ल्सटर प्लेटफ़ार्म , तथा बहुत सारे ब्लॉगस्पॉट संकलक ब्लॉग्स पाठकों के सामने निकल कर आए ।

कभी सांपला

बहुत सारी उथल पुथल , सम्मान , आरोप , बैठकों , के बीच पिछले कुछ महीनों में ये बदलाव दोस्तों ने महसूस किया कि , हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति रुझान कम हुआ है ,पोस्टों पर पाठकों की संख्या और टिप्पणियों की संख्या में भी बहुत कमी आ गई है । इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बढता प्रभाव भी एक कारण माना गया । लेकिन इससे अलग एक बहुत बडा कारण खुद गूगल की सेवाओं , विशेषकर जीमेल और ब्लॉगर में बहुत सारी गडबडियों का होते रहना भी जरूर रहा । आज भी हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर गूगल और वर्डप्रेस जैसी सेवा प्रदाता कोई भी कंपनी के पास कुछ भी आम या खास नहीं है । यहां तक कि ये गारंटी भी नहीं कि कल को आपका जीमेल खाता या ब्लॉगर खाता ही नदारद मिले । शायद इसलिए मुझ सहित बहुत सारे मित्र , इस ठिकाने को पुख्ता करने के लिए अपने पक्के ठिकानों की ओर बढ चले ।
नए ठिकाने का थंबनेल


हिंदी ब्लॉगिंग से जुडे दोस्तों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है ,नाम लूंगा तो मुझे यकीन है कि चाहे लाख कोशिश कर लूं ,किसी न किसी का नाम तो छोड बैठूंगा ही । फ़िर इस ब्लॉगजगत से लेकर , फ़ेसबुक , ट्विटटर और अन्य तमाम मंचों पर इतना स्नेह व मान मिला , अच्छे बुरे वक्त में , जो साथ और अपनापन मिला , और अब भी मिल रहा है ,उसे सिर्फ़ महसूसा जा सकता है ,लिखा नहीं ।ये एक कमाल का संयोग रहा कि , अपने लगभग दो दर्ज़न ब्लॉग्स में से चार ब्लॉग्स पर साथी अनुसरकों की शतकीय संख्या को पाना , लगभग एक हज़ार पोस्टों , और इतनी ही तस्वीरों की यादों समेत ,मेरी मौजूदगी को बेपनाह स्नेह मिलता रहा ।



ये जरूर है कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग एक मंच के रूप में , एक माध्यम और एक विधा के रूप में ,एक तकनीक के रूप में , एक वर्ग के रूप में , एक विचारधारा के रूप में स्थापित हो इसी दिशा में , मैं अंतर्जाल की अपनी इस यात्रा को आगे बढाऊंगा । बेशक इस साल बहुत सी कडवी यादों और घटनाओं में से एक , गुरूवर और मित्र स्व. डॉ. अमर कुमार  तथा फ़िर हिमांशु भाई का अचानक चले जाना रहा और कहीं न कहीं ये जता बता गया कि , जब तक साथ है , अभिव्यक्त करो ...करते रहो , करते रहो । मंच चुनो ,माध्यम चुनो , तरीका और शैली भी जो पसंद हो चुनो लेकिन इंसान हो तो इंसान की भावनाओं को अभिव्यक्त करो , क्योंकि ये समाज के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है । और कमाल देखिए कि हम खुद भी इस बीच बहुत बदलते रहे ,













इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिन , हमारी आपकी सोच के साथ ही बदलेंगे और ठीक वैसे बदलेंगे जैसा कि हमने आपने चाहा है , मैं इस सफ़र के अगले पडाव की ओर बढता हूं ,मुझे यकीन है कि हमेशा की तरह आप मेरे साथ हैं , आप सबको शुभकामनाएं .......साथ , स्नेह , विश्वास , बनाए रखिएगा ।
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