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रविवार, 12 जनवरी 2014

ब्लॉगिंग के सातवें साल में ....




वर्ष 2007 के आखिरी महीनों में जब लिखतन से अचानक इस खिटपिट की ओर मुडे थे तब कंप्यूटर से भी इतना ही परिचय था कि दफ़्तर में काम करते हुए , टाईपराईटर पर टाइपिंग सीखने के बाद अब हम कंप्यूटर के सोफ़्ट कीबोर्ड पर भी कुलांचे तो भरने ही लगे थे अलबत्ता तब ये बिल्कुल भी नहीं सोचा था कि बहुत जल्दी ही हिंदी अंतर्जाल के एक ऐसे सदस्य बन जाएंगे कि भागीदारी हिस्सेदारी सी महसूस होने लगेगी ।

ब्लॉगिंग की शुरूआत भी बहुत ही मज़ेदार ढंग से शुरू हुई थी । कादम्बिनी का वो अंक , जिसमें तफ़सील से पढकर हमने ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा । और उस समय हिंदी ब्लॉग्स और ब्लॉगर्स की संख्या भी लगभग एक हज़ार के भीतर ही थी । वो दौर भी कमाल का था और वो ही क्यों उसके बाद से लेकर अब तक का सफ़र और हिंदी ब्लॉगिंग में होते परिवर्तन , बढते दायरे और प्रभाव का अफ़साना भी कम दिलचस्प नहीं रहा । जिंदगी में आते उतार चढावों की तरह ही ब्लॉगिंग भी निरंतर चढती उतराती रही । एक समय ये भी आया कि हमने अपने सारे ब्लॉग्स पर लिखना स्थगित करके सीधे साइट की ओर रुख किया | मगर ब्लॉग्स बहुत ज्यादा दिनों तक सूने आंगन की तरह नहीं देख पाए ।


किंतु अब जब देखता हूं तो पाता हूं कि , पिछले कुछ वर्षों का आर्काइव , उनसे पिछले के कुछ वर्षों के मुकाबले पासंग भी नहीं है । ऐसा शायद बहुत सारी अन्य वज़हों के अलावा , शायद फ़ेसबुक और ट्विट्टर जैसी साइटों पर अधिक समय देना भी नि:संदेह रहा । इस बीच ब्लॉगिंग में जिन दो चीज़ों की कमी और खली , नए और तेज़ एग्रीगेटरों की कमी और पाठकों की टिप्पणी करने को लेकर निष्क्रियता ।हालांकि नए ब्लॉगरों के आगमन और पोस्ट लिखने की उनकी रफ़्तार ने ब्लॉगिंग के धार में कमी नहीं आने दी । इस बीच बडे स्तर पर भी ब्लॉग संगोष्ठी / सम्मेलनों की धमक और चमक ने भी खबरों में स्थान बनाए रखा । चाहे वो नेपाल की राजधानी काठमांडू हो या गांधी का क्षेत्र वर्धा ।

बदलते हुए परिवेश में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का महत्व और प्रभाव जितनी तेज़ी से बढता जा रहा है उतनी ही ज्यादा बडी जिम्मेदारी इन पर उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले लोगों के कंधों पर भी आ रही है । अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में इन साइटों के दुरूपयोग का नमूना भी देखने को मिला था , किंतु अच्छी बात ये है कि ब्लॉगिंग फ़ेसबुक और ट्विट्टर के उत्तेजनामयी तीव्र व्यवहार से कहीं अलग ठहरा हुआ और ठोस सा दीख पडता है । 

ब्लॉगिंग का ये सफ़र अब चलते चलते मुझे सातवें वर्ष में लेकर आ गया है । आने वाले समय में लेखन पठन और टिप्पणियों को लेकर भी ज्यादा संज़ीदा और गंभीर हो सकूं यही कोशिश रहेगी । एक बात और ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों में हमने ब्लॉग बैठकियों का एक गजब का दौर भी देखा था । मुझे पूरी उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही दिल्ली में हम फ़िर से बहुत सारे ब्लॉगर मित्र बैठ कर कुछ औपचारिक अनौपचारिक सी बातें करने वाले हैं । ब्लॉगिंग का ये सफ़र बदस्तूर चलता रहे ,और बहुत सारे वे साथी जो अलग अलग कारणों से थोडी बहुत दूरी बनाए हुए हैं वे भी यदा कदा ही सही उपस्थिति दर्ज़ कराते रहें तो और भी अच्छा लगेगा ।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

हिंदी अंतर्जाल पर चार वर्ष पूरे ..ब्लॉगियाते , फ़ेसबुकियाते और ट्विट्टराते अनुभव






मुलाकातों का सिलसिला चल निकला



फ़िर तो यादें ही यादें


इस बीच हिंदी अंतर्जाल पर कब चार साल का सफ़र पूरा हो गया इसका अहसास ही नहीं हुआ । यूं तो ये सफ़र इतना बडा लंबा और विस्तृत नहीं है कि इसके लिए अभी कुछ लिखा कहा जाए ,किंतु पिछले चार सालों में अंतर्जाल पर बीते बिताए लम्हों को , उसके बहाने बने नए पुराने रिश्तों को , दिनचर्या में आए बदलाव को , और शायद सोच में आए परिवर्तन को थोडी देर ठहर कर टटोलने का मन हो तो फ़िर इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था भला । वर्ष २०११ अपने अंतिम पडाव पर है , बेशक दिन रात में कोई बडा फ़र्क न आता हो , या शायद ठंड के तेवर में भी रत्ती भर का फ़र्क पडता हो इससे ,किंतु ये तो होता ही है कि वर्ष की आखिरी संख्या बदल जाती है ।
और ढेर सारी सुनहरी यादें

शुरूआत में हिंदी अंतर्जाल से परिचय सिर्फ़ ब्लॉगर तक ही हुआ था वो भी एक खूबसूरत संयोग से । शायद सितम्बर अक्तूबर महीने की बात है जब कादम्बिनी ने अपने एक अंक को ब्लॉग और ब्लॉगर्स पर आधारित करके आठ पेज के एक लबें आलेख के साथ साथ बहुत कुछ बताया समझाया था ब्लॉग के बारे में । उस अंक और अपने एक सहकर्मी जो उस समय कंप्यूटर में और अब भी मुझसे दक्ष थे , उनकी मदद से ब्लॉग भी बन गया और ब्लॉगिंग भी शुरू हुई । हम दोनों के लिए ही ये एक नया अनुभव था । हालांकि उस वक्त हिंदी अंतर्जाल से सायबर कैफ़े में बैठ कर सिर्फ़ एक डेढ घंटे की नियमित जानपहचान से ज्यादा तक बात नहीं पहुंची थी । अंतर्जाल पर बिताए उन एक घंटों के दौरान ध्यान सिर्फ़ ब्लॉग लिखने और पढने तक ही सीमित रहता था । हमारे लिए एक इस नए फ़लक पर विचरने के अलावा हिंदी अंतर्जाल से जुडने का एक दिलचस्प कारण ये भी रहा कि जब भी सहकर्मियों और उस समय के मीडिया मित्रों को जैसे ही किसी ब्लॉग का पता थमाया ,पृष्ठ खुलने पर हिंदी में सामग्री को देख कर उनके हर्षमिश्रित चेहरे को देखने का मचा ही और होता था , और यकीन मानिए कि ऐसा अब भी कई बार हो जाता है ।कल्पना करिए कि उन्हें जब ब्लॉगवाणी ,चिट्ठाजगत ,हिंदी ब्लॉग्स , नारद , सारथि , रफ़्तार जैसे एग्रीगेटर्स की झलक दिखाई जाती तो क्या होता होगा ।
विमर्श ,बहस , बैठक


गूगल , वर्डप्रेस ,या किसी भी अन्य प्लेटफ़ार्म ने अब तक , हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले ब्लॉगर्स के लिए कहीं से भी धेले भर आर्थिक लाभ नहीं देने के बावजूद हिंदी ब्लॉग्स की संख्या बढती रही ।और तो और कई जुझारू साथियों ने अपने अपने समाचार पोर्टल और सामूहिक ब्लॉग्स की ऐसी धूम मचाई कि कहीं इसे न्यू मीडिया का नाम दिया जाने लगा तो कहीं भविष्य का साहित्य संसार ।  इसके साथ ही बढती रही हिंदी अंतर्जाल द्वारा उत्पन्न की जा रही चुनौती । मीडिया , साहित्य और सरकार तथा प्रशासन तक के लिए ये उनकी आंख की किरकिरी बन कर उभर आया । सबसे कमाल की बात ये रही कि , तुम मुझे चाहो या मुझसे नफ़रत करो ,मगर मुझे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते जैसे आज हिंदी अंतर्जाल को दरकिनार करना बहुत कठिन हो गया है ।
कभी तिलयार

हिंदी अंतर्जाल के प्रारंभिक दो वर्ष अनियमितता और बेतरतीबी से ही बीते , और इसके कारण भी कई थे । घर पर कंप्यूटर आने के बाद हमारे जैसे लिखन पठन के व्यसनी के लिए इससे बेहतर साथी और कौन हो सकता था । और फ़िर ऐसा भी नहीं था कि यहां सबकुछ आभासी ही है ,बल्कि कभी कभी तो यहां उससे ज्यादा देखने और महसूसने को मिला जो वास्तविक जीवन में शायद उतना तल्ख नहीं रहा है अब तक । मसलन ,कुछ दिनों तक एग्रीगेटर्स और उस समय के दो बेहतरीन संकलकों पर लगातार बमबारी , सक्रियता क्रम और पसंद नापसंद वाले बटन को लेकर , एक से एक , जी बिल्कुल एक से बढकर एक तहलकी (यूं तो ये तहलका का वर्जन है लेकिन जिसका अर्थ तल से हलकी ) रिपोर्टें आईं । पोस्टों में ही संकलंकों का नाम लेकर उन्हीं की छाती पर रोज़ क्विंटल क्विंटल भारी चार्ज़शीट लादी गई ।

अब इसका और इसके साथ ही अन्य बहुत सी कारगुजारियां का  कुल परिणाम ये रहा कि एक एक करके दोनों ही संकलक , ब्लॉगरों को गड्डम गड्ड छोड के चलते बने । हालांकि , चूंकि दोनों अभी मौजूद हैं तकनीक की भाषा में कहें तो सर्वर पर हैं तो कभी न कभी यदि वे वापसी करें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए । लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि हिंदी ब्लॉग के पाठकों ने फ़िर पढने के लिए अपने अपने विकल्प तलाशे । इस प्रयास में कई बेहतरीन संकलक ,जैसे हमारीवाणी , इंडली , ब्लॉगप्रहरी , ब्लॉगमंडली ,बलॉगगर्व , के अलावा दर्ज़नों फ़ीड क्ल्सटर प्लेटफ़ार्म , तथा बहुत सारे ब्लॉगस्पॉट संकलक ब्लॉग्स पाठकों के सामने निकल कर आए ।

कभी सांपला

बहुत सारी उथल पुथल , सम्मान , आरोप , बैठकों , के बीच पिछले कुछ महीनों में ये बदलाव दोस्तों ने महसूस किया कि , हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति रुझान कम हुआ है ,पोस्टों पर पाठकों की संख्या और टिप्पणियों की संख्या में भी बहुत कमी आ गई है । इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बढता प्रभाव भी एक कारण माना गया । लेकिन इससे अलग एक बहुत बडा कारण खुद गूगल की सेवाओं , विशेषकर जीमेल और ब्लॉगर में बहुत सारी गडबडियों का होते रहना भी जरूर रहा । आज भी हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर गूगल और वर्डप्रेस जैसी सेवा प्रदाता कोई भी कंपनी के पास कुछ भी आम या खास नहीं है । यहां तक कि ये गारंटी भी नहीं कि कल को आपका जीमेल खाता या ब्लॉगर खाता ही नदारद मिले । शायद इसलिए मुझ सहित बहुत सारे मित्र , इस ठिकाने को पुख्ता करने के लिए अपने पक्के ठिकानों की ओर बढ चले ।
नए ठिकाने का थंबनेल


हिंदी ब्लॉगिंग से जुडे दोस्तों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है ,नाम लूंगा तो मुझे यकीन है कि चाहे लाख कोशिश कर लूं ,किसी न किसी का नाम तो छोड बैठूंगा ही । फ़िर इस ब्लॉगजगत से लेकर , फ़ेसबुक , ट्विटटर और अन्य तमाम मंचों पर इतना स्नेह व मान मिला , अच्छे बुरे वक्त में , जो साथ और अपनापन मिला , और अब भी मिल रहा है ,उसे सिर्फ़ महसूसा जा सकता है ,लिखा नहीं ।ये एक कमाल का संयोग रहा कि , अपने लगभग दो दर्ज़न ब्लॉग्स में से चार ब्लॉग्स पर साथी अनुसरकों की शतकीय संख्या को पाना , लगभग एक हज़ार पोस्टों , और इतनी ही तस्वीरों की यादों समेत ,मेरी मौजूदगी को बेपनाह स्नेह मिलता रहा ।



ये जरूर है कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग एक मंच के रूप में , एक माध्यम और एक विधा के रूप में ,एक तकनीक के रूप में , एक वर्ग के रूप में , एक विचारधारा के रूप में स्थापित हो इसी दिशा में , मैं अंतर्जाल की अपनी इस यात्रा को आगे बढाऊंगा । बेशक इस साल बहुत सी कडवी यादों और घटनाओं में से एक , गुरूवर और मित्र स्व. डॉ. अमर कुमार  तथा फ़िर हिमांशु भाई का अचानक चले जाना रहा और कहीं न कहीं ये जता बता गया कि , जब तक साथ है , अभिव्यक्त करो ...करते रहो , करते रहो । मंच चुनो ,माध्यम चुनो , तरीका और शैली भी जो पसंद हो चुनो लेकिन इंसान हो तो इंसान की भावनाओं को अभिव्यक्त करो , क्योंकि ये समाज के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है । और कमाल देखिए कि हम खुद भी इस बीच बहुत बदलते रहे ,













इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिन , हमारी आपकी सोच के साथ ही बदलेंगे और ठीक वैसे बदलेंगे जैसा कि हमने आपने चाहा है , मैं इस सफ़र के अगले पडाव की ओर बढता हूं ,मुझे यकीन है कि हमेशा की तरह आप मेरे साथ हैं , आप सबको शुभकामनाएं .......साथ , स्नेह , विश्वास , बनाए रखिएगा ।
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