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रविवार, 12 जनवरी 2014

ब्लॉगिंग के सातवें साल में ....




वर्ष 2007 के आखिरी महीनों में जब लिखतन से अचानक इस खिटपिट की ओर मुडे थे तब कंप्यूटर से भी इतना ही परिचय था कि दफ़्तर में काम करते हुए , टाईपराईटर पर टाइपिंग सीखने के बाद अब हम कंप्यूटर के सोफ़्ट कीबोर्ड पर भी कुलांचे तो भरने ही लगे थे अलबत्ता तब ये बिल्कुल भी नहीं सोचा था कि बहुत जल्दी ही हिंदी अंतर्जाल के एक ऐसे सदस्य बन जाएंगे कि भागीदारी हिस्सेदारी सी महसूस होने लगेगी ।

ब्लॉगिंग की शुरूआत भी बहुत ही मज़ेदार ढंग से शुरू हुई थी । कादम्बिनी का वो अंक , जिसमें तफ़सील से पढकर हमने ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा । और उस समय हिंदी ब्लॉग्स और ब्लॉगर्स की संख्या भी लगभग एक हज़ार के भीतर ही थी । वो दौर भी कमाल का था और वो ही क्यों उसके बाद से लेकर अब तक का सफ़र और हिंदी ब्लॉगिंग में होते परिवर्तन , बढते दायरे और प्रभाव का अफ़साना भी कम दिलचस्प नहीं रहा । जिंदगी में आते उतार चढावों की तरह ही ब्लॉगिंग भी निरंतर चढती उतराती रही । एक समय ये भी आया कि हमने अपने सारे ब्लॉग्स पर लिखना स्थगित करके सीधे साइट की ओर रुख किया | मगर ब्लॉग्स बहुत ज्यादा दिनों तक सूने आंगन की तरह नहीं देख पाए ।


किंतु अब जब देखता हूं तो पाता हूं कि , पिछले कुछ वर्षों का आर्काइव , उनसे पिछले के कुछ वर्षों के मुकाबले पासंग भी नहीं है । ऐसा शायद बहुत सारी अन्य वज़हों के अलावा , शायद फ़ेसबुक और ट्विट्टर जैसी साइटों पर अधिक समय देना भी नि:संदेह रहा । इस बीच ब्लॉगिंग में जिन दो चीज़ों की कमी और खली , नए और तेज़ एग्रीगेटरों की कमी और पाठकों की टिप्पणी करने को लेकर निष्क्रियता ।हालांकि नए ब्लॉगरों के आगमन और पोस्ट लिखने की उनकी रफ़्तार ने ब्लॉगिंग के धार में कमी नहीं आने दी । इस बीच बडे स्तर पर भी ब्लॉग संगोष्ठी / सम्मेलनों की धमक और चमक ने भी खबरों में स्थान बनाए रखा । चाहे वो नेपाल की राजधानी काठमांडू हो या गांधी का क्षेत्र वर्धा ।

बदलते हुए परिवेश में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का महत्व और प्रभाव जितनी तेज़ी से बढता जा रहा है उतनी ही ज्यादा बडी जिम्मेदारी इन पर उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले लोगों के कंधों पर भी आ रही है । अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में इन साइटों के दुरूपयोग का नमूना भी देखने को मिला था , किंतु अच्छी बात ये है कि ब्लॉगिंग फ़ेसबुक और ट्विट्टर के उत्तेजनामयी तीव्र व्यवहार से कहीं अलग ठहरा हुआ और ठोस सा दीख पडता है । 

ब्लॉगिंग का ये सफ़र अब चलते चलते मुझे सातवें वर्ष में लेकर आ गया है । आने वाले समय में लेखन पठन और टिप्पणियों को लेकर भी ज्यादा संज़ीदा और गंभीर हो सकूं यही कोशिश रहेगी । एक बात और ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों में हमने ब्लॉग बैठकियों का एक गजब का दौर भी देखा था । मुझे पूरी उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही दिल्ली में हम फ़िर से बहुत सारे ब्लॉगर मित्र बैठ कर कुछ औपचारिक अनौपचारिक सी बातें करने वाले हैं । ब्लॉगिंग का ये सफ़र बदस्तूर चलता रहे ,और बहुत सारे वे साथी जो अलग अलग कारणों से थोडी बहुत दूरी बनाए हुए हैं वे भी यदा कदा ही सही उपस्थिति दर्ज़ कराते रहें तो और भी अच्छा लगेगा ।

गुरुवार, 3 मई 2012

कोल्ड-बोल्ड ब्लॉगिंग और फ़ास्ट फ़्युरियस फ़ेसबुक






 

हिंदी अंतर्जाल का चेहरा , अपने पैदा होने से अब तक लगातार इतना तेज़ी से बदलता रहा है कि , कभी तो उसको साहित्य अपने निशाने पर लेता है ,ये कह कर कि इस पर जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है वो स्तरहीन है , जबकि उन्हें भलीभांति मालूम होता है कि अब तो अंतर्जाल पर पूरा साहित्य इतिहास समग्र उपलब्धता की ओर अग्रसर है । कभी मीडिया , इसे अपने आपको न्यू मीडिया कहने कहलाने पर आडे हाथों लेता है । और सबसे कमाल की बात ये है कि इसके बावजूद भी सबको सबकी खबर रहती है और गाहे बेगाहे एक दूसरे की लाइन क्रॉस भी करते रहते हैं । इस बार मामला कुछ ज्यादा अलग इसलिए है क्योंकि इस बार तो एक नज़र सरकार ने भी अपनी टिका दी है और टेढी नज़र टिकाई है । लो जी जुम्मा जुम्मा अभी तो दस बरस भी नहीं हुए । अपने इतने से घंटों दिनों के सफ़र में हिंदी अंतर्जाल ने न सिर्फ़ माध्यम और मंच बदले बल्कि , अपना नज़रिया शैली और दिशा भी बदली । . 


बीच बीच में सेवा प्रदाता कंपनियों के परिवर्तन या ऐसे ही किसी कारणों के लोचा में फ़ंसकर झटके खाते इन मंचों के लिए विपदा पे आफ़त भी कुछ इस तरह की आई कि ,एक एक करके अलग अलग कई कारणों से एग्रीगेटर सेवा साइटें बंद हो गई या रुक गईं । दुनिया देश , फ़टाफ़ट जिंदगी की आदत को अपना रहा था , क्रिकेट भी टेस्ट मैच से लेकर ट्वेंटी ट्वेंटी मोड में पहुंच चुकी थी ऐसे में लोगों को त्वरित से भी तेज़ संवाद और संप्रेषण का हर नया उपाय ज्यादा लुभा रहा था । जिस ब्लॉगर ने अपनी मुफ़्त और अदभुत सेवा यानि ब्लॉग के माध्यम से विश्व अंतर्जाल पर धूम मचा दी और कभी बीबीसी समाचार सेवा की प्रमुख समाचार सूत्र के रूप में विख्यात हुई , उस सेवा को , ट्विट्टर , फ़ेसबुक और यू ट्यूब के बडे विस्तारित जाल ने कडी टक्कर दी । .
इन सब कारणों ने हिंदी ब्लॉगिंग में कोल्ड ब्लॉगिंग का दौर चला दिया । 


 कोल्ड क्या इसे तो चिल्ड ब्लॉगिंग कहिए , वर्तमान में लोकप्रिय एक एग्रीगेटर " हमारीवाणी " के पहले पन्ने की पोस्टें शाम तक भी एक पन्ने तक ही सीमित सी हो कर रह गई हों जैसे । सबके पास नियमित ब्लॉग नहीं लिखने , नहीं लिख पाने और यहां तक कि , नहीं पढ पाने और नहीं टिप्पणी करने या कर पाने के बहाने या कारण थे । लेकिन ट्विट्टर , फ़ेसबुक , प्लस ,और इन जैसे वैकल्पिक मंचों पर गहमागहमी चलती रही । इन सबके बावजूद एक कमाल की बात ये रही कि हिंदी ब्लॉगिंग में मज़हबी कटटरपंथ से जुडी पोस्टों ने गजब रफ़्तार पकड ली । अन्य भाषाओं का तो पता नहीं किंतु मेरा पिछले पांच वर्ष का अनुभव यही बताता है कि किसी भी विवाद के होते ही हिदी ब्लॉगिंग सक्रियता के अपने चरम मोड पर होती है । पिछ्ले दिनों सुना कि ऐसी ही एक पोस्ट से हिंदी ब्लॉगिग ने कोल्ड ब्लॉगिंग से बोल्ड ब्लॉगिंग की इमेज बना ली या बनी हुई घोषित कर करवा दी गई । अब ये तो इत्तेफ़ाक रहा कि एक संयोग भर कौन जाने लेकिन , बोल्ड ब्लॉगिंग ने आपनी अगली पारी के लिए आज के भारत "इंडिया टुडे " के मुख पृष्ठ को ही मुद्दा बना दिया । लेकिन इन सबका प्रभाव ये रहा कि बहुत दिनों बाद बहुत सी पोस्टों पर बहस और विमर्श की एक ऐसी महफ़िल जम गई कि समां बंध गया । .




अब रही बात ब्लॉगर मित्रों दोस्तों की तो , सब कहीं न कहीं लगे तो रहे , कोई प्रकाशन , तो कोई प्रकाशक से उलझे रहे , कई अपनी जिम्मेदारियों और पारिवारिक दायित्वों को संपन्न करने में लगे रहे , तो कई फ़ेसबुक और ट्विट्टर को धुनने में लगे रहे ,कईयों ने तो हार, प्रहार , लुहार तक पर पीएचडी कर डाली इस बीच , हम भी इन्हीं में से एक रहे । कहते हैं कि हिंदी ब्लॉगजगत में हमेशा ही गुटबाजी और समीकरणों की बात होती है , और कमाल ये है कि ये बदलते रहते हैं , खूब बदलते हैं । नाम ले ले के पोस्टें लिखने , एक दूसरे की टांग खींचने और और सभी भाषाई मर्यादाओं को तोड कर दंड पेलने की कवायद तो पहले से भी होती रही है , अलबत्ता इसकी रफ़्तार कम ज्यादा होती रही है । आने वाले दिनों में अंतर्जाल के बहुत सी बंदिशों और पाबंदियों के दायरे में आने की पूरी संभावना है ऐसे में यदि हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले किसी भी वजह से उदासीन होते हैं या अपनी उपस्थिति अपने विचारों से प्रशासन को कोई मौका देते हैं तो ये आत्मघाती कदम साबित होगा । सबसे जरूरी ये समझना है कि यहां विचारों का आना और बिल्कुल सीधे सीधे आना एक ताकत भी है और कमज़ोरी भी ।



शनिवार, 31 दिसंबर 2011

हिंदी अंतर्जाल पर चार वर्ष पूरे ..ब्लॉगियाते , फ़ेसबुकियाते और ट्विट्टराते अनुभव






मुलाकातों का सिलसिला चल निकला



फ़िर तो यादें ही यादें


इस बीच हिंदी अंतर्जाल पर कब चार साल का सफ़र पूरा हो गया इसका अहसास ही नहीं हुआ । यूं तो ये सफ़र इतना बडा लंबा और विस्तृत नहीं है कि इसके लिए अभी कुछ लिखा कहा जाए ,किंतु पिछले चार सालों में अंतर्जाल पर बीते बिताए लम्हों को , उसके बहाने बने नए पुराने रिश्तों को , दिनचर्या में आए बदलाव को , और शायद सोच में आए परिवर्तन को थोडी देर ठहर कर टटोलने का मन हो तो फ़िर इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था भला । वर्ष २०११ अपने अंतिम पडाव पर है , बेशक दिन रात में कोई बडा फ़र्क न आता हो , या शायद ठंड के तेवर में भी रत्ती भर का फ़र्क पडता हो इससे ,किंतु ये तो होता ही है कि वर्ष की आखिरी संख्या बदल जाती है ।
और ढेर सारी सुनहरी यादें

शुरूआत में हिंदी अंतर्जाल से परिचय सिर्फ़ ब्लॉगर तक ही हुआ था वो भी एक खूबसूरत संयोग से । शायद सितम्बर अक्तूबर महीने की बात है जब कादम्बिनी ने अपने एक अंक को ब्लॉग और ब्लॉगर्स पर आधारित करके आठ पेज के एक लबें आलेख के साथ साथ बहुत कुछ बताया समझाया था ब्लॉग के बारे में । उस अंक और अपने एक सहकर्मी जो उस समय कंप्यूटर में और अब भी मुझसे दक्ष थे , उनकी मदद से ब्लॉग भी बन गया और ब्लॉगिंग भी शुरू हुई । हम दोनों के लिए ही ये एक नया अनुभव था । हालांकि उस वक्त हिंदी अंतर्जाल से सायबर कैफ़े में बैठ कर सिर्फ़ एक डेढ घंटे की नियमित जानपहचान से ज्यादा तक बात नहीं पहुंची थी । अंतर्जाल पर बिताए उन एक घंटों के दौरान ध्यान सिर्फ़ ब्लॉग लिखने और पढने तक ही सीमित रहता था । हमारे लिए एक इस नए फ़लक पर विचरने के अलावा हिंदी अंतर्जाल से जुडने का एक दिलचस्प कारण ये भी रहा कि जब भी सहकर्मियों और उस समय के मीडिया मित्रों को जैसे ही किसी ब्लॉग का पता थमाया ,पृष्ठ खुलने पर हिंदी में सामग्री को देख कर उनके हर्षमिश्रित चेहरे को देखने का मचा ही और होता था , और यकीन मानिए कि ऐसा अब भी कई बार हो जाता है ।कल्पना करिए कि उन्हें जब ब्लॉगवाणी ,चिट्ठाजगत ,हिंदी ब्लॉग्स , नारद , सारथि , रफ़्तार जैसे एग्रीगेटर्स की झलक दिखाई जाती तो क्या होता होगा ।
विमर्श ,बहस , बैठक


गूगल , वर्डप्रेस ,या किसी भी अन्य प्लेटफ़ार्म ने अब तक , हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले ब्लॉगर्स के लिए कहीं से भी धेले भर आर्थिक लाभ नहीं देने के बावजूद हिंदी ब्लॉग्स की संख्या बढती रही ।और तो और कई जुझारू साथियों ने अपने अपने समाचार पोर्टल और सामूहिक ब्लॉग्स की ऐसी धूम मचाई कि कहीं इसे न्यू मीडिया का नाम दिया जाने लगा तो कहीं भविष्य का साहित्य संसार ।  इसके साथ ही बढती रही हिंदी अंतर्जाल द्वारा उत्पन्न की जा रही चुनौती । मीडिया , साहित्य और सरकार तथा प्रशासन तक के लिए ये उनकी आंख की किरकिरी बन कर उभर आया । सबसे कमाल की बात ये रही कि , तुम मुझे चाहो या मुझसे नफ़रत करो ,मगर मुझे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते जैसे आज हिंदी अंतर्जाल को दरकिनार करना बहुत कठिन हो गया है ।
कभी तिलयार

हिंदी अंतर्जाल के प्रारंभिक दो वर्ष अनियमितता और बेतरतीबी से ही बीते , और इसके कारण भी कई थे । घर पर कंप्यूटर आने के बाद हमारे जैसे लिखन पठन के व्यसनी के लिए इससे बेहतर साथी और कौन हो सकता था । और फ़िर ऐसा भी नहीं था कि यहां सबकुछ आभासी ही है ,बल्कि कभी कभी तो यहां उससे ज्यादा देखने और महसूसने को मिला जो वास्तविक जीवन में शायद उतना तल्ख नहीं रहा है अब तक । मसलन ,कुछ दिनों तक एग्रीगेटर्स और उस समय के दो बेहतरीन संकलकों पर लगातार बमबारी , सक्रियता क्रम और पसंद नापसंद वाले बटन को लेकर , एक से एक , जी बिल्कुल एक से बढकर एक तहलकी (यूं तो ये तहलका का वर्जन है लेकिन जिसका अर्थ तल से हलकी ) रिपोर्टें आईं । पोस्टों में ही संकलंकों का नाम लेकर उन्हीं की छाती पर रोज़ क्विंटल क्विंटल भारी चार्ज़शीट लादी गई ।

अब इसका और इसके साथ ही अन्य बहुत सी कारगुजारियां का  कुल परिणाम ये रहा कि एक एक करके दोनों ही संकलक , ब्लॉगरों को गड्डम गड्ड छोड के चलते बने । हालांकि , चूंकि दोनों अभी मौजूद हैं तकनीक की भाषा में कहें तो सर्वर पर हैं तो कभी न कभी यदि वे वापसी करें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए । लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि हिंदी ब्लॉग के पाठकों ने फ़िर पढने के लिए अपने अपने विकल्प तलाशे । इस प्रयास में कई बेहतरीन संकलक ,जैसे हमारीवाणी , इंडली , ब्लॉगप्रहरी , ब्लॉगमंडली ,बलॉगगर्व , के अलावा दर्ज़नों फ़ीड क्ल्सटर प्लेटफ़ार्म , तथा बहुत सारे ब्लॉगस्पॉट संकलक ब्लॉग्स पाठकों के सामने निकल कर आए ।

कभी सांपला

बहुत सारी उथल पुथल , सम्मान , आरोप , बैठकों , के बीच पिछले कुछ महीनों में ये बदलाव दोस्तों ने महसूस किया कि , हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति रुझान कम हुआ है ,पोस्टों पर पाठकों की संख्या और टिप्पणियों की संख्या में भी बहुत कमी आ गई है । इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बढता प्रभाव भी एक कारण माना गया । लेकिन इससे अलग एक बहुत बडा कारण खुद गूगल की सेवाओं , विशेषकर जीमेल और ब्लॉगर में बहुत सारी गडबडियों का होते रहना भी जरूर रहा । आज भी हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर गूगल और वर्डप्रेस जैसी सेवा प्रदाता कोई भी कंपनी के पास कुछ भी आम या खास नहीं है । यहां तक कि ये गारंटी भी नहीं कि कल को आपका जीमेल खाता या ब्लॉगर खाता ही नदारद मिले । शायद इसलिए मुझ सहित बहुत सारे मित्र , इस ठिकाने को पुख्ता करने के लिए अपने पक्के ठिकानों की ओर बढ चले ।
नए ठिकाने का थंबनेल


हिंदी ब्लॉगिंग से जुडे दोस्तों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है ,नाम लूंगा तो मुझे यकीन है कि चाहे लाख कोशिश कर लूं ,किसी न किसी का नाम तो छोड बैठूंगा ही । फ़िर इस ब्लॉगजगत से लेकर , फ़ेसबुक , ट्विटटर और अन्य तमाम मंचों पर इतना स्नेह व मान मिला , अच्छे बुरे वक्त में , जो साथ और अपनापन मिला , और अब भी मिल रहा है ,उसे सिर्फ़ महसूसा जा सकता है ,लिखा नहीं ।ये एक कमाल का संयोग रहा कि , अपने लगभग दो दर्ज़न ब्लॉग्स में से चार ब्लॉग्स पर साथी अनुसरकों की शतकीय संख्या को पाना , लगभग एक हज़ार पोस्टों , और इतनी ही तस्वीरों की यादों समेत ,मेरी मौजूदगी को बेपनाह स्नेह मिलता रहा ।



ये जरूर है कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग एक मंच के रूप में , एक माध्यम और एक विधा के रूप में ,एक तकनीक के रूप में , एक वर्ग के रूप में , एक विचारधारा के रूप में स्थापित हो इसी दिशा में , मैं अंतर्जाल की अपनी इस यात्रा को आगे बढाऊंगा । बेशक इस साल बहुत सी कडवी यादों और घटनाओं में से एक , गुरूवर और मित्र स्व. डॉ. अमर कुमार  तथा फ़िर हिमांशु भाई का अचानक चले जाना रहा और कहीं न कहीं ये जता बता गया कि , जब तक साथ है , अभिव्यक्त करो ...करते रहो , करते रहो । मंच चुनो ,माध्यम चुनो , तरीका और शैली भी जो पसंद हो चुनो लेकिन इंसान हो तो इंसान की भावनाओं को अभिव्यक्त करो , क्योंकि ये समाज के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है । और कमाल देखिए कि हम खुद भी इस बीच बहुत बदलते रहे ,













इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिन , हमारी आपकी सोच के साथ ही बदलेंगे और ठीक वैसे बदलेंगे जैसा कि हमने आपने चाहा है , मैं इस सफ़र के अगले पडाव की ओर बढता हूं ,मुझे यकीन है कि हमेशा की तरह आप मेरे साथ हैं , आप सबको शुभकामनाएं .......साथ , स्नेह , विश्वास , बनाए रखिएगा ।

शनिवार, 25 जून 2011

आखिर क्यों छपती हैं पोस्टें अखबार में ....झा जी कहिन





ब्लॉगिंग की ताकत दिनों दिन बढ रही है , जी हां हिंदी ब्लॉगिंग की ताकत बढ रही है , बावजूद इसके कि दो सबसे बडे एग्रीगेटर बंद हो चुके हैं , बावजूद इसके कि आए दिन गूगल और ब्लॉगर जैसे प्लेटफ़ार्मों पर तकनीकी दिक्कतें भी साथ ही बढ रही हैं , और हां बावजूद इसके , कि आज फ़ेसबुक और ट्विट्टर जैसी साईटों ब्लॉगरों को काफ़ी प्रभावित कर रहे हैं और ब्लॉगरों का एक बडा तबका जो हिंदी ब्लॉगिंग में अनियमित है , किंतु वो सोशल नेटवर्किंग साइट में काफ़ी सक्रिय है । इन तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद ब्लॉगिंग की ताकत बढती जा रही है । यदि ब्लॉगिंग पर कानून बना कर उसकी नकेल कसने  के सरकार के कदम को थोडी देर के लिए दरकिनार भी कर दें तो भी आए दिन जिस तरह से कभी मीडिया , तो कभी साहित्य ब्लॉगिंग पर निशाना साध रहा है उससे ही ये प्रमाणित हो जाता है कि प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से ब्लॉगिंग सबकी नज़र में इतनी अहमियत तो बना ही चुका है कि चाहे उसकी आलोचना की जाए या प्रशंसा , उसकी उपेक्षा कतई नहीं की जा सकती है । ब्लॉगिंग , ब्लॉग लेखन , पोस्टों की दिशा , ब्लॉगिंग में आ रही सामग्री हमेशा ही ब्लॉगरों के लिए खुद ही एक बहस का विषय रहा है और इस पर गाहे बेगाहे लिखा पढा भी जाता ही रहता है । इन दिनों देखा पढा कि , ब्लॉगिंग और अखबारों को आधार बना कर ब्लॉगर मित्रों ने कई सारी पोस्टें लिखीं । इन पोस्टों में बहुत सारे सवाल , बहुत से सुझाव , और बहुत सारी आपत्तियां भी इस बात को लेकर उठाई गईं कि , बेहिचक , बेझिझक अखबारों द्वारा न सिर्फ़ ब्लॉग पोस्टों को उठाया के अखबारों में प्रकाशित किया जा रहा है बल्कि कई अखबारों ने तो इसमें गाहे बेगाहे अपने हिसाब से उसका संपादन और एडिटिंग भी कर डाली है । 

सबसे पहले बात , ब्लॉग और अखबार के संबंध की । आज इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी ब्लॉगिंग में न सिर्फ़ अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने वालों में प्रिंट तो प्रिंट , इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी मीडियाकर्मी न सिर्फ़ हैं बल्कि वे नियमित रूप से ब्लॉग लिख व पढ रहे हैं । न सिर्फ़ ब्लॉग बल्कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी उनकी उपस्थिति बहुत प्रभावी महसूस की जा रही है । ताज़ा घटनाओं , मीडिया का नज़रिया , और उनकी खुद की भूमिका तक पर न सिर्फ़ क्रिया प्रतिक्रिया का सतत सिलसिला चल निकलता बल्कि कई बार तो रिश्ता इतना भावनात्मक हो जाता है कि सीधे सीधे लोग आमने सामने आ जाते हैं । उदाहरण के लिए मशहूर ब्लॉगर और मीडियाकर्मी श्री रवीश कुमार (कस्बा ब्लॉग वाले ) द्वारा एनडीटीवी पर पेश किए जाने वाले एक कार्यक्रम रवीश की रिपोर्ट को बंद किए जाने के विरोध में इसके लिए फ़ेसबुक पर बाकायदा एक मुहिम भी चलाई गई । यानि कि इसका सीधा सा अर्थ ये निकलता है कि आज ब्लॉगिंग और हिंदी अंतर्जाल खुद मीडिया के लिए भी एक आलोचक और पूरक की भूमिका निभा रहा है । अब चूंकि ये ज्यादा तीव्र, ज्यादा तल्ख और स्पष्ट है इसलिए शायद ज्यादा चुभ जाता है । जिस तरह से अखबारनवीस ब्लॉगिंग से जुडे हुए हैं उसी तरह से बहुत से ब्लॉग और बहुत सारे ब्लॉगर , हिंदी समाचार माध्यमों और विशेषकर अखबारी खबरों के सहारे ही बातों को उठा कर उन पर पोस्टें लिख रहे हैं । बेशक बहुत बार विभिन्न अखबार और पत्र पत्रिकाओं ने हिंदी ब्लॉगिंग के लिए बुरा या बहुत बुरा ही लिखा है लेकिन इसके बावजूद अभी तक किसी भी समाचार पत्र ने ये विरोध नहीं दिखाया जताया है कि उनकी फ़लानी ढिमकानी पोस्ट या किसी समाचार को हिंदी के किसी ब्लॉगर ने ब्लॉग पोस्ट बना लिया है । मुझे लगता है कि शायद उन्हें पता भी नहीं होता और वे इसकी कोशिश भी नहीं करते होंगे । 

अब बात ब्लॉगपोस्टों को उठाकर अपने समाचारपत्रों में स्थान देने की , जब आज साहित्य , मीडिया और खुद सरकार तक हिंदी अंतर्जाल की बढती हुई ताकत को स्पष्ट महसूस कर रहे हैं ,उनकी बेबाकी से निपटने के लिए कायदे कानून ला रही है , जबकि यही सरकार , टेलिविजन समाचार चैनलों द्वारा मुंबई हमलों की आतंकियों की मदद कर देने तक जैसी रिपोर्टिंग किए जाने पर आज तक कोई बंदिश नहीं लगा सकी , वो न नंगेपन को रोकपाती है न ही बाजारूपन को । तो इस स्थिति में ये बात आसानी से समझी जा सकती है कि हिंदी अंतर्जाल अपने ब्लॉग , अपनी साईटों और ट्विट्टर तथा फ़ेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण वो मुकाम तो अवश्य ही हासिल कर चुका है कि उसकी हटात ही उपेक्षा नहीं की जा सकती । यहां मैं ये भी बताता चलूं कि अखबारों के बडे से लेकर छोटे समूह और संस्करणों तक में खबर , फ़ीचर और सामग्री के रूप में अब ब्लॉग पोस्टों का छपना एक प्रवृत्ति तो बन ही चुकी है इसके अलावा कई समाचार पत्र जैसे सिरसा हरियाणा से प्रकाशित सच कहूं तो फ़ेसबुक के स्टेटस अपडेट तक को संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दे रहा है ।  ब्लॉगरों द्वारा बार बार और अलग अलग पोस्टों द्वारा ब्लॉग पोस्टों को बिना अनुमति , बिना सूचना के और सबसे अधिक उसे तोडमरोड कर प्रकाशित किए जाने के कारण इसका विरोध जताया जा रहा है । 

सबसे पहले, बात ये कि इन तमाम अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में ब्लॉग पोस्टों को छांट कर लगाने वाले सूत्र भी ब्लॉगजगत से जुडे होते हैं । अधिकांश में तो वे खुद ब्लॉगर ही होते हैं जो कि उन समाचार पत्रों के साथ जुडे हुए हैं और इसलिए ताजी ब्लॉगपोस्टों तक उनकी पहुंच बनी रहती है । इन तमाम अखबारों में अधिकांश का भी एक निश्चित पैटर्न है और उसी के हिसाब से वे अपने स्तंभ जिसे भी उन्होंने ब्लॉग से जोडा हुआ होता है , जैसे ब्लॉग श्लॉग , ब्लॉग राग , ब्लॉग कोना , और अन्य । इनका स्थान होता है संपादकीय पृष्ठ , यानि अखबार का सबसे महत्वपूर्ण स्थान । कुछ घटनाओं को छोड दें तो अक्सर इन स्तंभों में हूबहू उन ब्लॉग पोस्टों में कोई छेडछाड नहीं करते और कम से कम इस मंशा से तो कतई नहीं करते होंगे कि वो पोस्ट का निहितार्थ ही बदल जाए । जैसा कि देखने पर ही पता चल जाता है कि  अखबारों में इन ब्लॉग पोस्टों के चयन का भी एक आधार सा बना हुआ है , मसलन दैनिक हरिभूमि में अक्सर राजनीतिक विषयों पर लिखी गई पोस्टें , स्वाभिमान टाईम्स में सिर्फ़ कुछ चुनिंदा साईट्स और पोस्टें , राष्ट्रीय सहारा में नारी आधारित विषयों की ब्लॉग पोस्टें , और नवभारत टाईम्स तथा दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण में इनके अपने ब्लॉग प्लेटफ़ार्मों पर लिखे पढे जा रहे ब्लॉग पोस्टों के अंश ही प्रकाशित किए जाते हैं । 


ये तो तय बात है कि ब्लॉग जगत और हिंदी अंतर्जाल में अब जो कुछ पढा लिखा जा रहा है वो प्रिंट के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि विधा और शैली लगभग वही है जो प्रिंट माध्यमों में इस्तेमाल की जाती है । चूंकि अधिकांश मे ब्लॉग का , ब्लॉगर का और ब्लॉग यूआरएल का भी ज़िक्र होता है इसलिए ये आसानी से समझा जा सकता है कि इसे ब्लॉगजगत से लिया गया है । इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष लाभ न सिर्फ़ हिंदी ब्लॉगजगत को , ब्लॉगर को ये होता है कि प्रिंट के पाठकों से उसकी पहली मुलाकात एक ब्लॉगर के रूप में होती है । पाठक उन्हें पढ कर जिज्ञासावश उन यूआरएल को क्लिक करके उन ब्लॉगों तक पहुंचते हैं और उनमें से बहुत से उसी डोर को थाम कर खुद ही ब्लॉगिंग की दुनिया में उतर जाते हैं । किसी भी विधा में अपनी बात रखने कहने वाले का सबसे पहला मकसद होता है कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और इस लिहाज़ से ब्लॉग पोस्टों को अखबार में स्थान दिए जाने से जो आवाज हिंदी अंतर्जाल पर ही रहती है वो उससे आगे निकल कर जाने कितने हाथों में और कितनी नज़रों तक पहुंच जाती है । मुझे लगता है कि ये परंपरा उतनी अनुचित भी नहीं है जितना कि उसे करार दिया जा रहा है । अब बात उन विरोधों की । पहला विरोध ब्लॉग पोस्टें बिना अनुमति के उठा ली जाती हैं । ये सर्वथा ही गलत है और अनुचित भी कम से कम सूचना तो देनी ही चाहिए और हो सके तो पारिश्रमिक भी । अखबार में ब्लॉग पोस्टों का चयन और उसे प्रकाशित करने वाले लोगों की ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे कम से कम उस पोस्ट के लेखक को सूचित तो अवश्य ही करें । रही बात पारिश्रमिक की तो ये फ़िलहाल तो दूर की कौडी है । जब पिछले पांच वर्षों में ब्लॉगर जैसे प्लेटफ़ार्म से एक धेला भर नहीं निकलवा पाए तो फ़िर अखबारों पे ये शुल्क देने की अनिवार्यता लादना शायद जल्दबाज़ी होगी । लेकिन इसके बावजूद भी अगर ब्लॉगर को ये लगता है कि उनकी ब्लॉगपोस्ट को लेकर या उसे प्रकाशित करके उस अखबार ने मेल की है और भविष्य में वे ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं तो उन्हें फ़ौरन से पेश्तर ही ब्लॉग पर कॉपीराईट नोटिस लगा देना चाहिए और हो सके तो कॉपी की सारी गुंजाईश ही खत्म कर देनी चाहिए । आज तक शायद ही कोई ब्लॉग पोस्ट अखबार में इस कॉपीराईट का उल्लंघन करने के बावजूद लगाई गई हो । 

लेकिन समस्या ये भी शायद कि , एक तरफ़ तो ब्लॉग पोस्टों के छपने और कौन कौन सी छप रही हैं उसमें पर्याप्त जिज्ञासा होने जताने के बावजूद गाहे बेगाए विरोध के स्वर सिर्फ़ विरोध करने के उद्देश्य जैसे लगते हैं । ये नहीं भूलना चाहिए कि , किसी भी अखबार , किसी भी पत्रिका या अन्य किसी ऐसे साधन में ब्लॉग पोस्टों का स्थान ऐसा कतई नहीं है कि बिना उनके काम नहीं चलेगा । ऐसी ही आपत्तियों ने अब तक बहुत से  समाचारपत्रों से ब्लॉग कोनों को समाप्त भी करा दिया है उदाहरण के लिए अमर उजाला से ये अब समाप्त हो चुका है । एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि अक्सर देखने में ये आया है कि ब्लॉगर मित्रों को अपनी ब्लॉगपोस्ट के प्रकाशित होने का पता ब्लॉग्स इन मीडिया पर आने के बाद ही पता चल पाता है जिसके बाद वे विरोध प्रकट करते हैं , यानि कि शायद उस पोस्ट के वहां न आने की स्थिति में शायद उन्हें ये पता भी न चले कि अमुक पोस्ट अमुक समाचार पत्र में छपी है । जबकि खुद अंतर्जाल पर इस तरह की बहुत सारी चोरियां रोज़ हो रही हैं और की जा रही हैं जिनका पता ही जाने कितने समय बाद चल पाता है । और जिस तरह से इनका विरोध हो रहा है कभी कभी लगता है कि क्या ब्लॉगस इन मीडिया पर प्रकाशित पोस्टों की जानकारी देनी बंद कर देनी चाहिए ? मैं यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए ब्लॉग और प्रिंट मेरे दो एक साथ चलने वाले कार्यक्षेत्र हैं हालांकि मूल रूप से मै एक नौकरीपेशा व्यक्ति हूं और ये दोनों ही गौण क्षेत्र हैं ।इसलिए ऐसा कतई नहीं है कि मैं अखबारों द्वारा ब्लॉगपोस्टों को मनमाने तरीके से लेकर कहीं भी छाप लिए जाने की बढती प्रवृत्ति को सही या उचित ठहरा रहा हूं , किंतु सीधे सीधे विरोध से बेहतर है कि अखबारों के लिए विकल्प उपलब्ध कराया जाए । 

पहला और स्पष्ट तरीका । ब्लॉग के ऊपर सूचना , वो भी बिल्कुल साफ़ साफ़ कि बिना अनुमति के इस ब्लॉग की कोई भी सामग्री , कोई भी पोस्ट या पोस्ट अंश प्रकाशन के लिए नहीं ली जा सकती ,जो चाहें तो इसमें पारिश्रमिक वाली शर्त भी जोड सकते हैं । इससे अखबारों को ये ध्यान रहेगा कि यदि वे इन ब्लॉगों से कोई पोस्ट अंश ले रहे हैं तो फ़िर आगे की कार्यवाहियों के लिए तैयार रहें । इसके अलावा एक ऐसे तंत्र का विकास जो कि ब्लॉग और अखबारों के बीच एक सूत्र का काम करे और ये सुनिश्चित करे कि उसके द्वारा ही विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं के लिए ब्लॉग पोस्टों में से सामग्री भेजी जाएगी जिसके लिए उन्हें न सिर्फ़ उस तंत्र की तरफ़ से सूचना भेजी जाएगी बल्कि अखबारों द्वारा दिया गया पारिश्रमिक भी दिया जाएगा , जैसे कि समाचार एजेंसियां करती हैं । दूसरा तरीका ये कि ब्लॉग लेखक खुद ही पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में अपनी पोस्ट की सामग्री , पोस्ट के रूप में न सही , सामग्री के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं ताकि वो आलेख ,फ़ीचर आदि के रूप में प्रकाशित हो सके । इससे न सिर्फ़ प्रिंट में एक लेखक के रूप में पहचान स्थापित होगी बल्कि यथोचित मानदेय भी प्राप्त हो सकेगा । और ऐसा करते समय , पते के स्थान पर आप अपना ब्लॉग पता इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि लोगों को ब्लॉगिंग के प्रति उत्सुक बनाया जा सके । 

इनसे अलग उन ब्लॉगर मित्रों के लिए , जिन्हें अपनी ब्लॉग्पोस्टों को कहीं भी छापे जाने पर विरोध है वे सिर्फ़ कॉपीराईट नियमों का हवाला देकर सूचना लगा दें तो भविष्य के लिए निश्चिंत हो सकते हैं । लेकिन फ़िर भी ये तय कर लें कि प्रिंट के माध्यम से ज्यादा लोगों तक आपकी बात पहुंचने का मार्ग आप अवरुद्ध तो नहीं कर रहे हैं । यहां उन समाचार पत्रों से भी निवेदन है कि जो भी व्यक्ति ब्लॉग्पोस्टों से जुडे स्तंभ देख रहे हैं , वे चयन से पहले निश्चित रूप से पोस्ट को पढते तो होंगे ही तो क्या उनका ये फ़र्ज़ नहीं बनता कि वे पोस्ट लेखक को धन्यवाद न सही , पारिश्रमिक न सही , कम से कम उसकी सूचना देकर आभार व्यक्त करें । और यदि कहीं उन्हें ये लगता है कि ये तो सार्वजनिक अंतर्जाल पर मुफ़्त उपलब्ध है इसलिए इसकी कोई जरूरत नहीं है तो वे सर्वथा गलत हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल वे अपने वाणिज्यिक लाभ के लिए तो कर ही रहे हैं । और फ़िर ये कोई कठिन काम भी नहीं है । बार बार विरोध होने के बावजूद भी अखबारों की तरफ़ से ऐसी कोई पहल का न किया जाना अनुचित जान पडता है । मुझे लगता है कि स्थिति काफ़ी स्पष्ट हो गई होगी । और आज जबकि हिंदी ब्लॉगिंग अभी कई परिवर्तनों के दौर से गुजर रही है , कई कठिनाइयों का सामना कर रही है तो ऐसे में जो काम निश्चित और निर्बाध रूप से चलना चाहिए , वो है ..., निरंतर पठन ,और बेहतर लेखन ।




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