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रविवार, 9 फ़रवरी 2014

जनलोकपाल : अस्तित्व में आने को संघर्ष करता कानून






अब से लगभग तीन वर्षों पहले भारतीय लोकतंत्र की पूरी तरह बर्बाद हो चुकी परिपाटी से त्रस्त लोगों को यदि कोई बात अपने घरों से बाहर निकल आने के लिए कारण बनी थी तो वो थी सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटने के लिए लोकपाल के रूप में ऐसी संस्था/व्यक्ति को लाने की तैयारी के लिए प्रस्ताविक कानून में फ़िर से मौजूद झोलझाल । सरकार को यूं तो इस नए कानून को लाने से पहले ऐसे पूर्व कानूनों/प्रयासों संस्थाओं की असफ़लता पर न सिर्फ़ गौर करना चाहिए था बल्कि लोगों को बताना भी चाहिए था । 
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ऐसी ही एक संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग रहा , जिसके खुद के प्रमुख तक की नियुक्ति का ही मामला कोर्ट द्वारा बेदखली के फ़रमान तक पहुंच गया । जबकि ठीक इसके उलट पूर्व के महालेख नियंत्रक श्री विनोद राय के तेवर और कार्यों ने लोगों की इस संस्था के प्रति आस्था और बढा दी । यह संस्था इतनी मुस्तैद और प्रखर रही कि विश्व के बेहतरीन अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले अर्थशास्त्री के हाथों में देश की बागडोर होने के बावजूद भी कैग ने लगभग हर गबन पर अपनी नज़र बनाए रखी। 
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बीते दिनों एक एक करके जिस तरह से प्रशासनिक अधिकारी राजनीति और राजनैतिक दबावों के खिलाफ़ मुखर हो रहे हैं वो कहीं न कहीं ये ईशारा तो कर ही रहा है कि सबसे ज्यादा यदि किसी की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं तो वो विधायिका ही है । आखिर क्या वज़ह है कि आज़ादी के बाद से देश की विधायिका को लगातार कानून बनाने की जरूरत पड रही है और नए कानूनों को लाने का दबाव इतना ज्यादा है कि पिछले कानूनों के अनुपालन की सुनिश्चितता तय करने की फ़ुर्सत ही नहीं है । आरक्षण की वैकल्पिक व्यवस्था को पिछले साठ सालों से लगातार विस्तारित किए जाने के बावजूद हर बार नई गुंजाईश बनी रहती है एक भी विषय स्थाई तौर पर कहां हल किया जा सका है अब तक । 
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तथाकथित सिविल सोसायटी के धरने, अनशन और प्रदर्शन ने इस कानून को बहस में ला दिया , इतना कि सरकार उस पर गंभीर दिखने के प्रयास को लेकर उद्धत हुई । इस बीच सिविल सोसायटी का एक धडा खुद राजनीति में आ कूदा और राजधानी प्रदेश की बागडोर थाम ली । नौकरशाहों को खूब पता होता है कि सरकार द्वारा बनाए गए नियम कायदों को लागू होने करने में कितने ढके छिपे विकल्प मौजूद रखे जाते हैं । 
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नई सरकार ने सारे छिद्रों पर ढक्कन लगाने की तैयारी करके ऐसा कानून छाती पर ला पटका कि न सिर्फ़ खुद के गले को भी जांच के लिए आगे कर दिया बल्कि "न राधा के पास नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी" वाले फ़ार्मूले पर कानून रखा कि जो भी अपने श्रम और आय से ज्यादा का टीम टाम किए हुए , जांच की जाए और गडबड पाए जाने पर सीधा जब्ती कुर्की सब कुछ । मलाईदारों के रिश्तेदारों तक की निगेहबानी तक की गुंजाईश रखी जा रही है । अब इतने तेज़ाबी कानून को लाने की हिमाकत का परिणाम ये निकला है कि आम लोग बाग से लेकर खुद पुलिस और प्रशासन तक इसे दुश्मन मान बैठे हैं । 
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ताज़ा हालातों के मुताबिक कहा जा रहा है कि वर्ष 2002 में लाए गए एक आदेश के अनुसार बिना केंद्र सरकार की अनुमति के दिल्ली की प्रदेश सरकार द्वारा कोई विधेयक सदन पटल पर प्रस्तावित नहीं किया जा सकता अन्यथा इसे असंवैधानिक माना जाएगा । यकायक ही असंवैधानिक न होने के प्रति इतने संज़ीदा हो उठे हैं कि लगने लगा है मानो अब लोकतंत्र ठीक हो उठेगा । मगर ठीक ऐसे में सूचना ये मिलती है कि पूर्व सरकारें 11 बार ऐसा कर चुकी हैं । 
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अब ये स्पष्ट होता जा रहा है कि हम सब कहीं न कहीं अपने आपसे लडने को तैयार हो रहे हैं । जनलोकपाल हो या लोकपाल , देखना सिर्फ़ ये है कि इन ताकतों का इस्तेमाल करने वाले समाज और व्यवस्था को मुकम्मल करने की हिमायत करने वाले लोग हैं या इन संस्थाओं को शक्तिहीनता की ओर अग्रसर करने वाले । 

शनिवार, 25 जनवरी 2014

समर्थन या घमरथन


http://economictimes.indiatimes.com/thumb/msid-29301195,width-310,resizemode-4/eye-on-2014-elections-how-stock-market-views-congress-bjp-and-aap.jpg


आजकल शाम को टीवी पर आने वाली बहसों में सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति दिल्ली कांग्रेस की दिखती है जो चीख चित्कार मचा सिर्फ़ तीस चालीस दिन की बालिग सरकार को भ्रष्टाचारी साबित करने का प्रमाण दे रहे होते हैं और ये पूछने पर कि फ़िर समर्थन काहे टिकाए हुए हैं पलट काहे नहीं देते गोरमिंट को , कि बस चिचियाहट रिरियाहट में बदलने लगती है ............

वैसे समर्थन से याद आया कि केंद्र सरकार ने इसे और जोरदार समर्थन भाव से उस व्यक्ति का तबादला कर दिया जिसे मुख्यमंत्री जी ने उस जांच की कमान देने के लिए उपयुक्त समझा जिसके पहले ही निशाने पर राष्ट्रमंडल खेल घोटाला केस होता ...उसका तबादला कर दिया गया ............सुना है कि पांडिचेरी अब इत्ती दूर से जित्ती जांच करनी हो कर डालें .....और शाम को ही फ़िर बडी बहस में घेर लिया जाएगा टोपी वालों को कि काम नहीं करते हो जबकि काम तो काम तो काम साला "जुकाम" तक की रिपोर्टिंग का आम चल रहा है ..............

समर्थन की बात पर ये भी याद आया कि जिस तरह से सरकार की मैय्यत निकालने के लिए दोनों बड्डे अपने अपने दांव चल रहे हैं एक बांस काट रहा है तो दूसरी डोरी तैयार करने को तत्पर है ,हर कोई मटका उलटा करके फ़ोडने को उद्धत मगर ये आदमी मुआं इत्ता खपा मरा लुटा हुआ है कि उअके जी को कोई रोग लगता दिख नहीं रहा है । लोगबाग भीतर ही भीतर ये सोच कर हैरान हो रहे हैं कि हर बार विलेन की तरह पेश एक खिदमत दिल्ली पुलिस अचानक ही इतनी चहेती बन गई कि मानो बताया जताया जा रहा हो कि हमारे पीठ पर अक्सर पडती आपकी लाठियां हमें तहे दिल से स्वीकार हैं दारोगा जी .................

मुझे लगता है पिछले कुछ वर्षों में नशे के कारोबार को पूरी योजना के साथ स्थापित किया गया है कि अवाम जितना अधिक होश खोकर जिएगी उतना ही अधिक जोश सरकार के अफ़सरी तेवरों में आएगा । तेवर बहुत बडी जिम्मेदार कडी है इस व्यवस्था के दोहरेपन की । सरकार अपने मुलाज़िमों के साथ काम करती हुई खुद भी मुलाज़िम की तरह पेश आनी चाहिए और बपौती तो कतई नहीं बननी चाहिए ......................फ़िलहाल तो सबको इस समर्थननुमा घमरथन में ने उलझा सा रखा है .......................

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

मनाइए छब्बीस जनवरी और करिए जलसा परेड .........






आज सुबह सुबह जब फ़ेसबुक पर मैंने अपने राजनीतिक विचार और खासकर अपने मंतव्य को स्पष्ट किया तो शाम तक उस पर मित्रों की सूची में से ही कुछ मित्रों ने अपनी भडास निकालने के साथ साथ , जयचंद , राष्ट्रद्रोही के तमगों से नवाज़ने के बाद , और उखड कर हमें लात मार कर अपनी फ़्रैंड लिस्ट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया । अब हमें धेले भर का बुरा नहीं लगता , ज्यादा से ज्यादा और क्या , इससे पहले तो एक भाई साहब ने सिर्फ़ नमो नमो ही लिखने के लिए मुझे नरेंद्र मोदी से पेमेंट पाने वाला कहते हुए दिल्ली में उनके अनुसार सबसे अच्छा विकल्प आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन नहीं देने के लिए खूब गरियाया था , उसी दिन गरिया के निकल गए आज होते तो हरिया गए होते । खैर , उस पोस्ट की प्रतिक्रिया स्वरूप इतना सारा लिख गया कि सोचा इसे भी ब्लॉग पर सहेज़ता चलूं , आगे जब बच्चे पढेंगे तो वे खुद अच्छा बुरा तय करेंगे , हमारे बारे में , इस समय के बारे में ............यही लिखा था



अब जरा खरी खरी
मुद्दा - पहले पुलिस कर्मियों का सस्पेंशन और बाद में तबादला । ओह इतनी बडी मांग । ऐसा तो आज तक इतिहास में कभी नहीं हुआ , सबने सुना ही पहली बार है कि कोई मुख्यमंत्री इस मांग के लिए पहले गृहमंत्री से मिले और फ़िर धरने पर बैठ जाए । उस पुलिस का तबादला जिसे विश्व की भ्रष्टतम पुलिस व्यवस्था में से एक के लिए गिना जाता है ।और किसके कहने पर , कांग्रेस का एक निगम पार्षद भी होता अजी वो छोडिए नेताओं के चमचों बेलचों तक के फ़ोन भर से क्या क्या होता है , हमें पता है और खूब पता है ।

कारण - पुलिस के अनुसार मंत्री ने बदतमीज़ी की और मंतरी के अनुसार पुलिस ने अपना काम नहीं किया । विदेशी महिला नागरिकों के साथ गलत व्यवहार हुआ अब तो मेडिकल रिपोर्ट भी यही कहती है और इस देश में ऐसी मेडिकल रिपोर्टों में आजतक कभी हेरफ़ेर नहीं हुई । फ़िर विदेशी महिलाओं के साथ हुए व्यवहार की जहां तक बात है तो आजतक कभी दिल्ली में खुलेआम "बिहारी" कह कर अपमानित करने वाला समाज , मुंबई में भैया कहकर पीट पीट कर भगाने वाला समाज आज इतना चिंतित , वाह समाज तो सचमुच बदल रहा है। और हां जिन्हें मादक पदार्थों की तस्करी और तस्करों का रिकार्ड देखना हो दिल्ली पुलिस से आरटीआई लगा कर जानने की कोशिश तो करें कि पिछले पांच वर्षों में दिल्ली में दर्ज़ इन अपराधों के आरोपियों में किन किन लोगों का नाम मिलता है ।

सही गलत - सडक पर नहीं बैठना चाहिए , दफ़्तर में बैठ कर सारी शासन व्यवस्था को संभालना बदलना चाहिए । बिल्कुल यही होना चाहिए क्योंकि साठ सालों से यही तो होता आया है और देखिए न शासन व्यवस्था कितनी चुस्त दुरूस्त है आखिर कोई मंत्री । सारा झमेला ही कमरों के बाहर निकल कर सडकों पर नीतियों और नियमों का बनना , उन्हें परखना और लागू करवाने के तरीके का है । संसद में बन रहे कानून , और वातानुकूलित कक्षों में बैठे इन्हें बनाने वाले कितने लोगों को खुद आज वे कानून याद हैं और उनमें से कितने ऐसे बचे हैं जो इन कानूनों के साथ खेले और उन्हें तोडा नहीं , वो खुद सोचिए समझिए ।

मीडिया - मीडिया हा हा हा हा , अभी एक समाचार चैनल दिखा रहा है कि एक थाली में बैठे चार लोग खिचडी खा रहे हैं और कुछ लोग चाय पी रहे हैं और इस कारण ये धरने पर बैठे मुख्यमंत्री का बहुत बडा झूठ अरे अपराध करार दिया जाना चाहिए । मीडिया जिसे शहादत और अय्याशी की खबर में फ़र्क करने की समझ नहीं बची है , जिसे मातम और जलसे को उसी सनसनी के साथ परोसने का शऊर है फ़िर उसकी खबरों पर बिलबिलाना ही क्यूं फ़िर मीडिया भी कहां स्थाई विरोध या पक्ष में खडा रहता है , कभी रहा ही नहीं

और चलते चलते ये भी .......बात सिर्फ़ इतनी सी है कि अदने पदने लोगों ने सनक कर चुनाव लड लिया , कुछ अपने जैसे सताए , दबाए , लोगों को सच बताने समझाने के लिए युवाओं की एक जमात को उतार दिया , मामला ऐसा पलटा दिया सबने मिलकर कि मरगिल्ली समझ कर खिल्ली उडाती पार्टी , ठीक बराबर में आकर खडी हो गई । उफ़्फ़ इतनी हिमाकत .........कुछ भी करना मंगता था "जयकांत शिकरों" का ईगो हर्ट नहीं करना मंगता था .........लेकिन क्या करें वो तो  हर्ट हो चुकी थी । तो क्या हुआ , बैठने दो पदों में नीचे अभी इतने सालों की सैटिंग आखिर कब काम आएगी , लपेट देंगे कहीं न कहीं और ऐसा करके छोड देंगे कि फ़िर ये तो क्या दूसरे भी बगावत , सगावत वाले सुर न पकडें । मैच सिर्फ़ दो टीमों में ही देखना चाहते हैं लोग , हमेशा से देखते रहे हैं , तीसरे की औकात ही क्या ??? बात सिर्फ़ औकात दिखाने की है , देखो दिखा रहे हैं न , बैठो धरने पे , मर जाओ लाठी खाखा के , अब तो पब्लिक भी तुम्हारे खिलाफ़ है और साथी भी , हमें तो ऐसा मौका चाहिए ही था ........................लेकिन , लेकिन , लेकिन , उफ़्फ़ उन लोगों का क्या करें जिन्होंने दिल्ली के इतने जगहों पर अपनी बागडोर इन झाडुओं के हवाले कर दी ...सब के सब पागल हैं , निरे बेवकूफ़ , भावुक कहीं के , नायक फ़िल्म की  ऑडिएंस .........और इन सबके अलावा जो भी लोग देश में बचे हैं सिर्फ़ वे , और सिर्फ़ वे ही देश को चलाने लायक हैं , वे ही सक्षम हैं , वे ही ठीक हैं ..जो भी हैं बस वे ही हैं ।

विकल्प - दिल्ली सरकार को फ़ौरन बर्खास्त करके छब्बीस जनवरी के भव्य जश्न की तैयारी शुरू की जाए , अब तो दिल्ली पुलिस की न बन पाने वाली कमिश्नर मैम ने भी हरी झंडी दे दी है।

छब्बीस जनवरी को दिल्ली पुलिस की एक विशेष शौर्य झांकी निकाली जाए और इन तमाम पुलिस वालों को मंत्रियों को सबक सिखा देने जैसे कारनामें के लिए वीरता पदक से सम्मानित किया जाए ।

दिल्ली सरकार के सभी मंत्रियों और विधायकों पर मुकदमा ठोंक के उन्हें अंदर कर दिया जाए , देश की व्यवस्था को बदलने का सपना दिखाने और फ़िर उसे पूरा करने के लिए खुद कूद पडने के लिए , मुख्यमंत्री को जनवरी की ठंडी कडकडाती रात में फ़ुटपाथ पर सोकर  ये तथाकथित "अराजकता" फ़ैलाने के लिए ।देश मज़े में है , और मज़े में ही रहेगा , उसे आने वाले महीनों में लोकतंत्र का "ट्वेंटी-ट्वेंटी" खेलना है वो भी सिर्फ़ दो टीमों में बंटकर , ठीक है न ।

पोस्ट लिखते लिखते तक समाचार चैनल बता रहे हैं कि मुख्यमंत्री धरना समाप्त कर सकते हैं क्योंकि दो आरोपी पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजा जा रहा है , लो चित्त पट्ट सब बराबर :) अब मनाइए छब्बीस जनवरी , करिए जलसा परेड , देखिए आम आदमी को गरियाने का अगला मौका आपको कब मिलने वाला है ............
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