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बुधवार, 29 जून 2011

बचपन कभी लौट के नहीं आता....कुछ यादें , कुछ बातें




बचपन , और उसकी यादें । सच कहूं तो बचपन खुद ही यादों का टोकरा होता है , कमाल की बात ये है कि बचपन न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि हमारे अपनों के लिए भी हमारा बचपन उनकी यादों का टोकरा ही होता है । एक ऐसा टोकरा , जो समय के साथ और भी भरता जाता है , नई यादें जुडती जाती हैं लेकिन फ़िर भी बचपन की यादों का तो जैसे एक अलग ही सैक्शन होता है । और बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं , तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।

मुझे अगर बचपन की सारी यादों में कुछ चुनिंदा यादें अलग करने को कहा जाए तो मैं यकीनन , ही गर्मियों की छुट्टियों के उन दिनों को याद करता हूं जो हम अक्सर नानी गांव में बिताया करते थे । पिताजी फ़ौजी थे और हम सेंट्रल स्कूल के बच्चे , हमारे दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां पापा के लिए दो महीने की एनुअल लीव में कंवर्ट हो जाती थी । उन दिनों रेल में सफ़र करने की जो यादें , वो पुराने स्टेशन , चारबाग लखनऊ का , तांगों से खचाखच भरा हुआ ,वहां से सफ़र शुरू होकर खत्म होता था बिहार के मधुबनी जंक्शन पर । आह क्या सफ़र होता था कमाल का , सुराही और छागल का जमाना था वो , स्टेशन पर गाडी रुकते ही पानी के लिए भागमभाग, सुराही में डाल कर उसके खिडकी के किनारे रख देना , सुना था कि जितनी हवा लगती है सुराही को पानी उतना ठंडा हो जाता है , और वाह क्या होता था ठंडा । उफ़्फ़ वो मिट्टी की सौंधी खुशबू , फ़िर पूरी जिंदगी मयस्सर नहीं हुआ वो अमृत । मधुबनी पहुंचते पहुंचते हालत ऐसी हो चुकी होती थी कि मानो दंगल लड के आ रहे हैं । 

स्टेशन पर पहला काम होता था , मां का , हमें प्लेटफ़ॉर्म पर लगे चापाकल पर जितना हो सके मांज के पहचाने जाने लायक करना , अगर पापा का मूड ठीक है और वे बक्से को दोबारा से खोल बंद करने में गुस्सा नहीं किए जाने जैसे दिख रहे हैं तो फ़िर आपको एक अदद जोडी हाफ़ पैंट और टीशर्ट भी प्रदान की जा सकती है । स्टेशन से आगे का सफ़र तय होता था कटही गाडी (हां ये बैलगाडी जैसा होता था लेकिन पीछे की बॉडी और यहां तक कि उसके पहिए भी सिर्फ़ लकडी का बना होता था ), समय लगता था तकरीबन चार या सवा चार घंटे । ओह क्या सफ़र होता था वो , नदिया के पार का कोन दिसा में ले के चला रे बटोहिया का गाना याद है आपको , बस वही सिनेमा चलता था समझिए , रेत वाले और मिट्टी वाले रास्तों में जब वो कटही गाडी फ़ंसती थी तो हमारे मौसेरे भाई जो उसके डरेवर हुआ करते थे , वे कूद के आगे से बैलों को आव आव आव आव आव आव करते थे और हम बच्चे , नीचे उतर के मस्ती करने लगते थे । रास्ते में लगे हुए आम के पेडों में वो लदे फ़दे आम । कई बार इतने लदे हुए कि नीचे से सोंगड (डाली को अबांस या लाठी का सहारा देना ) तक लगे रहते थे । हम ऐसे हुलस जाते थे कि कूद के तोड लिया जाए या कि मार जाए मिट्टी का ढेला और आम हाथ में । कई बार कर भी डालते थे , आम तो क्या खाक आना था , बगीचे वाले जरूर आ जाते थे फ़िर देखते तो कहते , अरे ई सहरूआ सब है , दे दो , आम दो , गोपी आम सब (गोपी आम वो जो उन दिनों सबसे पहले पेडों पर पकते थे ) , और बस रास्ते में ही पेट पूजा का जुगाड हो जाता था । रास्ते में पडने वाले जाने कितने ही कमल गाछी , बगीचे , ताल , तलैये , पोखरे , मंदिर , कुंएं , ढिहबाड स्थान , सब एक एक करके यादों का कोना पकड लेते थे , और जिन कोनों को हम शहर में जाकर हम टटोला करते थे ..........

हालांकि टटोलने को तो अब हम उन शहरों को भी टटोला करते हैं जो उन दिनों में शहर सरीखे लगते थे । शहर जिनमें कालोनियां हुआ करती थीं दूर दूर , मैदान हुआ करते थे , घर , घर जैसे लगते थे जिनके आगे पीछे इत्ती खुली जगह तो होती ही थी कि ठाट से घर की उगाई सब्जी आप खाने में इस्तेमाल कर सकते थे और जो जरा जोरदार मेहनती आदमी हुए तो पडोसियों की भी मौज थी , आखिर बेलों में थोक के भाव निकलने वाली तोरियों और खीरों पे उन्हें भी बराबर की राय्ल्टी मिलने वाली जो होती थी । बचपन का एक ऐसा ही शहर था लखनऊ ।
इमामबाडा 



ओह क्या बात थी उस शहर की वो भी उस समय जब लखनऊ की नफ़ासत पूरे शबाब पर थी , बडे और छोटे इमामबाडों के झूमरों की चमक दिन में बिना जले भी कयामत सरीखी हुआ करती थी , भुलभुलैय्या सच में खो जाने जैसा डरवना लगता था और वो बडे वाले रामलीला ग्राउंड में दशहरे का रावण दहन मेला , तोपखाना बाज़ार की रामलीला , दोस्त और सहपाठी संजय सुतार के पापा जी की लवली स्टुडियो , एक फ़ोटो या शायद ज्यादा भी अब तक मिलती हैं पुराने एलबमों में । लखनऊ बहुत से कारणों से याद रहा है हमेशा , तांगों का शहर , तांगे उन दिनों सडकों के राजे हुआ करते थे । पूरा लखनऊ , टकबक टकबक की गूंजों से ठहाके लगाया करता था । मीना बाज़ार की धूम से लेकर प्रकाश कुल्फ़ी , फ़ालूदे वाले के आलीशान रेस्तरां में एक फ़ुल प्लेट चौदह रुपए की , उम्माह क्या बात थी उन दिनों की भी । शोर फ़िल्म को देखकर , तोपखाना बाज़ार के पास भी आया था एक सायकल चलाने वाला बाजीगर ...। लखनऊ की दीवाली की चमक जब ईद की ठसक से मिलती थी तो यकीन मानिए कि समां ही कुछ और बंध जाता था । सच कहें तो देश की असल संसकृति वहीं देखी परखी थी । वो पतंगों की दुनिया और वो पेशेवर बदेबाज ।बदेबाज जानते हैं आप , अरे वही जो पतंगों पे नोट चिपका के उडाया करते थे , और टक्कर होती थी किसी और नोट चिपके पतंग से , उफ़्फ़ क्या कयामत की जंग हुआ करती थी डोरों की , मानों एक पतंग के उडने से लेकर उसके कटने तक एक पूरी जिंदगी जी जाया करती थी वो डोर और उसकी सखी मांझा । आसमान भरा होता था उन कागजी जंगी जहाज़ों से । 


गोमती उन दिनों उफ़नती खूब थी और बरसाती नाले भी । ऐसा लगता था मानो कैंट का पूरा वो हिस्सा , हरी चटक साफ़ धुली चादर ओढे बैठे हैं । लेकिन सिर्फ़ अच्छा अच्छा ही नहीं होता था , मुझे याद है कि दो बरसातों मे दो बच्चों के नाली में फ़िसल कर बह जाने के कारण मौत की घटना भी देखी सुनी थी । लेकिन फ़िर भी इन कडवी यादों को परे रखकर बरसात के वो दिन पुदीने के पकौडे , हरी खट्टी चटनी के साथ खाने के दिन हुआ करते थे और हां आज के बच्चे जो अपनी कविताओं में पढते हैं न कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी , उन दिनों हकीकत थी भाई लोगों , एक बडी ही प्यारी हकीकत । जब भी उस शहर की खिडकी में पर्दों को उठा कर झांकने की कोशिश करता हूं एक हूक सी उठ जाती है । लखनऊ की यादों में तुलसी सिनेमा हॉल का , कुकरैल वन यानि क्रोकोडाईल पार्क और बोटैनिकल गार्डन का ज़िक्र भी कैसे भूल सकता हूं । एक पार्क की याद नहीं आ रही है , उसके सामने अंग्रेजों की बनी हुई कोई कोठीनुमा हवेली सी थी , पता नहीं क्या नाम था उसका , वो छोटी वाली गोल ईंटों से निर्मित भवन स्कूल की तरफ़ से और माता पिता से मिली अनुमति के महान सहमति के बाद जाने मिला था वो मौका । स्कूल में लगे वो शहतूत के पेड , लंच में चीलों का स्कूल के मैदानों के ऊपर चक्कर काटना और हमारा रोटी के टुकडे उछालना । 

          लखनऊ की दास्तान तो शायद पहले भी आपसे कह चुका हूं ,लखनऊके सेंट्रल स्कूल में दूसरी कक्षा का वो पहला दिन ,आदत के अनुसार रोतेहुए ही स्कूल पहुंचा था ...और मैं उन बच्चों में से ही एक था .जो बहुत समयतक तुतलाते हैं। बस पहला दिन ही याद रह गया था बहुत दिनों तक ।रिसेस पीरीयड में तो ..अपना गर्दभ रुदन हमारी ,मैडम के इतना नाकाबिलेबर्दाश्त हुआ कि उन्होंने हमे चुप कराने की खातिर .अपना लंच बॉक्स उस दिनहमारे नाम कुर्बान कर दिया,.दीदी की सहेलियों ने बहुत समय तक हमारी तुतलाती बोली को ..अपने सब टीवी समझ कर उपयोग किया ..। 


सेन्ट्रल स्कूल , लखनऊ
खनऊ के दोस्तों में अनिल विनोद की जुडवां भाईयों की जोडी हम दोनों ,भाईयों की जोडी के साथ मिल कर बिल्कुल जहां चार यार मिल जाएं वाली गैंग सी बन गई थी और उस जमाने के खेल भी उफ़्फ़ ..क्या खेल थे वे भी स्कूल में , कागज के तरह तरह के खिलौने , कैमरा , नाव , डौगी...और जाने क्या क्या .सोचता हूं उस कागज के कैमरे को बना कर जो खुशीहमें मिलती थी वो आजकल के बच्चों को फ़ेसबुक पर कोई मैसेज भेज कर कहांआ पाता होगा ? 

वो कंचों की रंगबिरंगी और चंचल चटकीली दुनिया वो मिट्टी की गुच्चियों मेंकंचों को पिलाना .और फ़िर वो सर्फ़ के बडे वाले मजबूत गत्ते के गोल डब्बे में...सैकडों कंचे संभाल कर रखना .जब एक साथ देखो तो लगता था मानो हर कंचे में एक आकाश गंगा समाई होती थी फ़िर वो सर्फ़ का डिब्बासिर्फ़ कंचों के खजाने को ही तो नहीं समेटे रहता था .उसमें बाद में हमनेमाचिस की डिब्बियों के कवर भी हजारों की संख्या में भर के रख लिए थे.ओह और उसका वो ताश टाईप खेल । जाने कैसे कैसे खेल बनाएथे हमने .सायकल के पुराने टायर को डंडे से मार मार के .पूरी शाम दौडाते रहना .वो सडकों पर देखे दिखाए .सांप नेवले की लडाई..बंदर बंदरिया के खेल .और जादू भी। वो आकाश में उडती चील कीपरछाई के साथ साथ भागना .वो कोयल के साथ कू कू कू ..बोलतेजाने की आदत .और वो मैनों की संख्या को देख देख कर बोलना.वन फ़ॉर नथिंग , टू फ़ॉर गुड ..थ्री फ़ॉर ..लेटर और फ़ोर फ़ॉर ..गेस्ट ..और आगे भी ..।


लखनऊ में जिस एक बात ने हमेशा ही बांधे रखा .वो था ..जितनी धूम से होली मनती थी , उतनी ही रंगीन ईद हुआ करती थी , ..वो पीर बाबा की मजार और वहां के प्रसाद में मिलने वाले बताशे,...और उसी पीर बाबा की मजार के पासवो पापा का फ़ौजी थियेटर ...मुझे याद है कि फ़ौज में रहते हुए पापा की जहांजहां पोस्टिंग हुई वहां की और कुछ जिन बातों में समानता थी उनमें से एक थी ओपन थियेटर ..यानि फ़ौजी सिनेमा .क्या बात थी उस पिक्चर हॉल की...कई जगहों पर हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन सिनेमा दिखाया जाता था तो कई जगहों में हफ़्ता भर एक ही पिक्चर देखी जाती थी .हा हा हा ..पिक्चर के बीच में , वो झमाझम बारिश, का आना ....और सब के सब भीगते हुए पिक्चर देखते थे ......। 

ओह उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह औरपीछे बहुत ही बडा अहाता ..वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के ,गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहलापरिचय हुआ था .पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होतीथी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां ।सोचता हूं कि आज पिताजी की वो आदत , और वो अहातों और आंगनों वाला मकान हमें भी मिली होती तो टमाटर , आलू , गोभी के बढते दामों से हम खुदको तरकारी प्रूफ़ कर चुके होते ..। 

वहीं तो सायकल चलाना .सीखना शुरू किया था .वो कैंची स्टाईलकी सायकल चलाने की अदा ...वाह और क्या रोकते थे उसे.बिल्कुल दोनों पैर का घसीटा मार के .,और बहुत बार तो बहुत से लोगोंके दोनों टांगों के बीच जाकर भी रुकती थी धडाम से .। अजी तब ये टोबूकी सायकलें कहां  तब तो इंतज़ार होता था कि , कब पापा की आंख लगे और कब मौका मिले .सायकल पर हाथ आजमाने का न हेलमेट की टेंशन ना लायसेंस की कहीं ठोके ठुकाए तो भी घुटना और कोहनी का ही नुकसान का खतरा था बस ..और उसी कैंची स्टाईल से सायकल चलाने में भी रेस तो लगती ही थी । 

बरसात का मौसम ,वो सफ़ेद मोटी पन्नी की बरसाती ,आज तक दुकान में वैसी शक्ल तक का रेन कोट देखने को भी नहीं मिला जाने बापू ने ..कहां से उस मोटी पन्नी का जुगाड कर के ...दर्जी को पटा कर वो अनोखी सीबरसाती तैयार करवाई थी और उसकी वो टोपी .तो बस अपने लिएभी वो स्कूल बैग को बचाने के ही काम आती थी , बांकी का सारा कोर कसर तोहम पूरी तरह भीग कर पूरा कर लेते थे ..ओह वो बरसात ...और उससे उफ़नते नाले .नदियां ।इस कमब्खत दिल्ली की गलियों में जब नाली केबजबजाते हुए पानी को बारिश के अठखेलियां करते हुए पानी से मिलते देखता हूं, समझ ही नहीं आता कि नाली के पानी को खुशी ज्यादा होती होगी ,या बारिशके पानी को अपनी बदकिस्मती का गम ज्यादा होगा .॥ 

        और जाने ऐसे कितने ही शहर , और कितनी ही यादें , मन के एलबम में चुपचाप बैठी अपनी बारी का   इंतज़ार कर रही हैं ..अगली पोस्ट में आपको पूना लिए चलूंगा । 


  

शनिवार, 25 जून 2011

आखिर क्यों छपती हैं पोस्टें अखबार में ....झा जी कहिन





ब्लॉगिंग की ताकत दिनों दिन बढ रही है , जी हां हिंदी ब्लॉगिंग की ताकत बढ रही है , बावजूद इसके कि दो सबसे बडे एग्रीगेटर बंद हो चुके हैं , बावजूद इसके कि आए दिन गूगल और ब्लॉगर जैसे प्लेटफ़ार्मों पर तकनीकी दिक्कतें भी साथ ही बढ रही हैं , और हां बावजूद इसके , कि आज फ़ेसबुक और ट्विट्टर जैसी साईटों ब्लॉगरों को काफ़ी प्रभावित कर रहे हैं और ब्लॉगरों का एक बडा तबका जो हिंदी ब्लॉगिंग में अनियमित है , किंतु वो सोशल नेटवर्किंग साइट में काफ़ी सक्रिय है । इन तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद ब्लॉगिंग की ताकत बढती जा रही है । यदि ब्लॉगिंग पर कानून बना कर उसकी नकेल कसने  के सरकार के कदम को थोडी देर के लिए दरकिनार भी कर दें तो भी आए दिन जिस तरह से कभी मीडिया , तो कभी साहित्य ब्लॉगिंग पर निशाना साध रहा है उससे ही ये प्रमाणित हो जाता है कि प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से ब्लॉगिंग सबकी नज़र में इतनी अहमियत तो बना ही चुका है कि चाहे उसकी आलोचना की जाए या प्रशंसा , उसकी उपेक्षा कतई नहीं की जा सकती है । ब्लॉगिंग , ब्लॉग लेखन , पोस्टों की दिशा , ब्लॉगिंग में आ रही सामग्री हमेशा ही ब्लॉगरों के लिए खुद ही एक बहस का विषय रहा है और इस पर गाहे बेगाहे लिखा पढा भी जाता ही रहता है । इन दिनों देखा पढा कि , ब्लॉगिंग और अखबारों को आधार बना कर ब्लॉगर मित्रों ने कई सारी पोस्टें लिखीं । इन पोस्टों में बहुत सारे सवाल , बहुत से सुझाव , और बहुत सारी आपत्तियां भी इस बात को लेकर उठाई गईं कि , बेहिचक , बेझिझक अखबारों द्वारा न सिर्फ़ ब्लॉग पोस्टों को उठाया के अखबारों में प्रकाशित किया जा रहा है बल्कि कई अखबारों ने तो इसमें गाहे बेगाहे अपने हिसाब से उसका संपादन और एडिटिंग भी कर डाली है । 

सबसे पहले बात , ब्लॉग और अखबार के संबंध की । आज इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी ब्लॉगिंग में न सिर्फ़ अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने वालों में प्रिंट तो प्रिंट , इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी मीडियाकर्मी न सिर्फ़ हैं बल्कि वे नियमित रूप से ब्लॉग लिख व पढ रहे हैं । न सिर्फ़ ब्लॉग बल्कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी उनकी उपस्थिति बहुत प्रभावी महसूस की जा रही है । ताज़ा घटनाओं , मीडिया का नज़रिया , और उनकी खुद की भूमिका तक पर न सिर्फ़ क्रिया प्रतिक्रिया का सतत सिलसिला चल निकलता बल्कि कई बार तो रिश्ता इतना भावनात्मक हो जाता है कि सीधे सीधे लोग आमने सामने आ जाते हैं । उदाहरण के लिए मशहूर ब्लॉगर और मीडियाकर्मी श्री रवीश कुमार (कस्बा ब्लॉग वाले ) द्वारा एनडीटीवी पर पेश किए जाने वाले एक कार्यक्रम रवीश की रिपोर्ट को बंद किए जाने के विरोध में इसके लिए फ़ेसबुक पर बाकायदा एक मुहिम भी चलाई गई । यानि कि इसका सीधा सा अर्थ ये निकलता है कि आज ब्लॉगिंग और हिंदी अंतर्जाल खुद मीडिया के लिए भी एक आलोचक और पूरक की भूमिका निभा रहा है । अब चूंकि ये ज्यादा तीव्र, ज्यादा तल्ख और स्पष्ट है इसलिए शायद ज्यादा चुभ जाता है । जिस तरह से अखबारनवीस ब्लॉगिंग से जुडे हुए हैं उसी तरह से बहुत से ब्लॉग और बहुत सारे ब्लॉगर , हिंदी समाचार माध्यमों और विशेषकर अखबारी खबरों के सहारे ही बातों को उठा कर उन पर पोस्टें लिख रहे हैं । बेशक बहुत बार विभिन्न अखबार और पत्र पत्रिकाओं ने हिंदी ब्लॉगिंग के लिए बुरा या बहुत बुरा ही लिखा है लेकिन इसके बावजूद अभी तक किसी भी समाचार पत्र ने ये विरोध नहीं दिखाया जताया है कि उनकी फ़लानी ढिमकानी पोस्ट या किसी समाचार को हिंदी के किसी ब्लॉगर ने ब्लॉग पोस्ट बना लिया है । मुझे लगता है कि शायद उन्हें पता भी नहीं होता और वे इसकी कोशिश भी नहीं करते होंगे । 

अब बात ब्लॉगपोस्टों को उठाकर अपने समाचारपत्रों में स्थान देने की , जब आज साहित्य , मीडिया और खुद सरकार तक हिंदी अंतर्जाल की बढती हुई ताकत को स्पष्ट महसूस कर रहे हैं ,उनकी बेबाकी से निपटने के लिए कायदे कानून ला रही है , जबकि यही सरकार , टेलिविजन समाचार चैनलों द्वारा मुंबई हमलों की आतंकियों की मदद कर देने तक जैसी रिपोर्टिंग किए जाने पर आज तक कोई बंदिश नहीं लगा सकी , वो न नंगेपन को रोकपाती है न ही बाजारूपन को । तो इस स्थिति में ये बात आसानी से समझी जा सकती है कि हिंदी अंतर्जाल अपने ब्लॉग , अपनी साईटों और ट्विट्टर तथा फ़ेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण वो मुकाम तो अवश्य ही हासिल कर चुका है कि उसकी हटात ही उपेक्षा नहीं की जा सकती । यहां मैं ये भी बताता चलूं कि अखबारों के बडे से लेकर छोटे समूह और संस्करणों तक में खबर , फ़ीचर और सामग्री के रूप में अब ब्लॉग पोस्टों का छपना एक प्रवृत्ति तो बन ही चुकी है इसके अलावा कई समाचार पत्र जैसे सिरसा हरियाणा से प्रकाशित सच कहूं तो फ़ेसबुक के स्टेटस अपडेट तक को संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दे रहा है ।  ब्लॉगरों द्वारा बार बार और अलग अलग पोस्टों द्वारा ब्लॉग पोस्टों को बिना अनुमति , बिना सूचना के और सबसे अधिक उसे तोडमरोड कर प्रकाशित किए जाने के कारण इसका विरोध जताया जा रहा है । 

सबसे पहले, बात ये कि इन तमाम अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में ब्लॉग पोस्टों को छांट कर लगाने वाले सूत्र भी ब्लॉगजगत से जुडे होते हैं । अधिकांश में तो वे खुद ब्लॉगर ही होते हैं जो कि उन समाचार पत्रों के साथ जुडे हुए हैं और इसलिए ताजी ब्लॉगपोस्टों तक उनकी पहुंच बनी रहती है । इन तमाम अखबारों में अधिकांश का भी एक निश्चित पैटर्न है और उसी के हिसाब से वे अपने स्तंभ जिसे भी उन्होंने ब्लॉग से जोडा हुआ होता है , जैसे ब्लॉग श्लॉग , ब्लॉग राग , ब्लॉग कोना , और अन्य । इनका स्थान होता है संपादकीय पृष्ठ , यानि अखबार का सबसे महत्वपूर्ण स्थान । कुछ घटनाओं को छोड दें तो अक्सर इन स्तंभों में हूबहू उन ब्लॉग पोस्टों में कोई छेडछाड नहीं करते और कम से कम इस मंशा से तो कतई नहीं करते होंगे कि वो पोस्ट का निहितार्थ ही बदल जाए । जैसा कि देखने पर ही पता चल जाता है कि  अखबारों में इन ब्लॉग पोस्टों के चयन का भी एक आधार सा बना हुआ है , मसलन दैनिक हरिभूमि में अक्सर राजनीतिक विषयों पर लिखी गई पोस्टें , स्वाभिमान टाईम्स में सिर्फ़ कुछ चुनिंदा साईट्स और पोस्टें , राष्ट्रीय सहारा में नारी आधारित विषयों की ब्लॉग पोस्टें , और नवभारत टाईम्स तथा दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण में इनके अपने ब्लॉग प्लेटफ़ार्मों पर लिखे पढे जा रहे ब्लॉग पोस्टों के अंश ही प्रकाशित किए जाते हैं । 


ये तो तय बात है कि ब्लॉग जगत और हिंदी अंतर्जाल में अब जो कुछ पढा लिखा जा रहा है वो प्रिंट के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि विधा और शैली लगभग वही है जो प्रिंट माध्यमों में इस्तेमाल की जाती है । चूंकि अधिकांश मे ब्लॉग का , ब्लॉगर का और ब्लॉग यूआरएल का भी ज़िक्र होता है इसलिए ये आसानी से समझा जा सकता है कि इसे ब्लॉगजगत से लिया गया है । इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष लाभ न सिर्फ़ हिंदी ब्लॉगजगत को , ब्लॉगर को ये होता है कि प्रिंट के पाठकों से उसकी पहली मुलाकात एक ब्लॉगर के रूप में होती है । पाठक उन्हें पढ कर जिज्ञासावश उन यूआरएल को क्लिक करके उन ब्लॉगों तक पहुंचते हैं और उनमें से बहुत से उसी डोर को थाम कर खुद ही ब्लॉगिंग की दुनिया में उतर जाते हैं । किसी भी विधा में अपनी बात रखने कहने वाले का सबसे पहला मकसद होता है कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और इस लिहाज़ से ब्लॉग पोस्टों को अखबार में स्थान दिए जाने से जो आवाज हिंदी अंतर्जाल पर ही रहती है वो उससे आगे निकल कर जाने कितने हाथों में और कितनी नज़रों तक पहुंच जाती है । मुझे लगता है कि ये परंपरा उतनी अनुचित भी नहीं है जितना कि उसे करार दिया जा रहा है । अब बात उन विरोधों की । पहला विरोध ब्लॉग पोस्टें बिना अनुमति के उठा ली जाती हैं । ये सर्वथा ही गलत है और अनुचित भी कम से कम सूचना तो देनी ही चाहिए और हो सके तो पारिश्रमिक भी । अखबार में ब्लॉग पोस्टों का चयन और उसे प्रकाशित करने वाले लोगों की ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे कम से कम उस पोस्ट के लेखक को सूचित तो अवश्य ही करें । रही बात पारिश्रमिक की तो ये फ़िलहाल तो दूर की कौडी है । जब पिछले पांच वर्षों में ब्लॉगर जैसे प्लेटफ़ार्म से एक धेला भर नहीं निकलवा पाए तो फ़िर अखबारों पे ये शुल्क देने की अनिवार्यता लादना शायद जल्दबाज़ी होगी । लेकिन इसके बावजूद भी अगर ब्लॉगर को ये लगता है कि उनकी ब्लॉगपोस्ट को लेकर या उसे प्रकाशित करके उस अखबार ने मेल की है और भविष्य में वे ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं तो उन्हें फ़ौरन से पेश्तर ही ब्लॉग पर कॉपीराईट नोटिस लगा देना चाहिए और हो सके तो कॉपी की सारी गुंजाईश ही खत्म कर देनी चाहिए । आज तक शायद ही कोई ब्लॉग पोस्ट अखबार में इस कॉपीराईट का उल्लंघन करने के बावजूद लगाई गई हो । 

लेकिन समस्या ये भी शायद कि , एक तरफ़ तो ब्लॉग पोस्टों के छपने और कौन कौन सी छप रही हैं उसमें पर्याप्त जिज्ञासा होने जताने के बावजूद गाहे बेगाए विरोध के स्वर सिर्फ़ विरोध करने के उद्देश्य जैसे लगते हैं । ये नहीं भूलना चाहिए कि , किसी भी अखबार , किसी भी पत्रिका या अन्य किसी ऐसे साधन में ब्लॉग पोस्टों का स्थान ऐसा कतई नहीं है कि बिना उनके काम नहीं चलेगा । ऐसी ही आपत्तियों ने अब तक बहुत से  समाचारपत्रों से ब्लॉग कोनों को समाप्त भी करा दिया है उदाहरण के लिए अमर उजाला से ये अब समाप्त हो चुका है । एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि अक्सर देखने में ये आया है कि ब्लॉगर मित्रों को अपनी ब्लॉगपोस्ट के प्रकाशित होने का पता ब्लॉग्स इन मीडिया पर आने के बाद ही पता चल पाता है जिसके बाद वे विरोध प्रकट करते हैं , यानि कि शायद उस पोस्ट के वहां न आने की स्थिति में शायद उन्हें ये पता भी न चले कि अमुक पोस्ट अमुक समाचार पत्र में छपी है । जबकि खुद अंतर्जाल पर इस तरह की बहुत सारी चोरियां रोज़ हो रही हैं और की जा रही हैं जिनका पता ही जाने कितने समय बाद चल पाता है । और जिस तरह से इनका विरोध हो रहा है कभी कभी लगता है कि क्या ब्लॉगस इन मीडिया पर प्रकाशित पोस्टों की जानकारी देनी बंद कर देनी चाहिए ? मैं यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए ब्लॉग और प्रिंट मेरे दो एक साथ चलने वाले कार्यक्षेत्र हैं हालांकि मूल रूप से मै एक नौकरीपेशा व्यक्ति हूं और ये दोनों ही गौण क्षेत्र हैं ।इसलिए ऐसा कतई नहीं है कि मैं अखबारों द्वारा ब्लॉगपोस्टों को मनमाने तरीके से लेकर कहीं भी छाप लिए जाने की बढती प्रवृत्ति को सही या उचित ठहरा रहा हूं , किंतु सीधे सीधे विरोध से बेहतर है कि अखबारों के लिए विकल्प उपलब्ध कराया जाए । 

पहला और स्पष्ट तरीका । ब्लॉग के ऊपर सूचना , वो भी बिल्कुल साफ़ साफ़ कि बिना अनुमति के इस ब्लॉग की कोई भी सामग्री , कोई भी पोस्ट या पोस्ट अंश प्रकाशन के लिए नहीं ली जा सकती ,जो चाहें तो इसमें पारिश्रमिक वाली शर्त भी जोड सकते हैं । इससे अखबारों को ये ध्यान रहेगा कि यदि वे इन ब्लॉगों से कोई पोस्ट अंश ले रहे हैं तो फ़िर आगे की कार्यवाहियों के लिए तैयार रहें । इसके अलावा एक ऐसे तंत्र का विकास जो कि ब्लॉग और अखबारों के बीच एक सूत्र का काम करे और ये सुनिश्चित करे कि उसके द्वारा ही विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं के लिए ब्लॉग पोस्टों में से सामग्री भेजी जाएगी जिसके लिए उन्हें न सिर्फ़ उस तंत्र की तरफ़ से सूचना भेजी जाएगी बल्कि अखबारों द्वारा दिया गया पारिश्रमिक भी दिया जाएगा , जैसे कि समाचार एजेंसियां करती हैं । दूसरा तरीका ये कि ब्लॉग लेखक खुद ही पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में अपनी पोस्ट की सामग्री , पोस्ट के रूप में न सही , सामग्री के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं ताकि वो आलेख ,फ़ीचर आदि के रूप में प्रकाशित हो सके । इससे न सिर्फ़ प्रिंट में एक लेखक के रूप में पहचान स्थापित होगी बल्कि यथोचित मानदेय भी प्राप्त हो सकेगा । और ऐसा करते समय , पते के स्थान पर आप अपना ब्लॉग पता इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि लोगों को ब्लॉगिंग के प्रति उत्सुक बनाया जा सके । 

इनसे अलग उन ब्लॉगर मित्रों के लिए , जिन्हें अपनी ब्लॉग्पोस्टों को कहीं भी छापे जाने पर विरोध है वे सिर्फ़ कॉपीराईट नियमों का हवाला देकर सूचना लगा दें तो भविष्य के लिए निश्चिंत हो सकते हैं । लेकिन फ़िर भी ये तय कर लें कि प्रिंट के माध्यम से ज्यादा लोगों तक आपकी बात पहुंचने का मार्ग आप अवरुद्ध तो नहीं कर रहे हैं । यहां उन समाचार पत्रों से भी निवेदन है कि जो भी व्यक्ति ब्लॉग्पोस्टों से जुडे स्तंभ देख रहे हैं , वे चयन से पहले निश्चित रूप से पोस्ट को पढते तो होंगे ही तो क्या उनका ये फ़र्ज़ नहीं बनता कि वे पोस्ट लेखक को धन्यवाद न सही , पारिश्रमिक न सही , कम से कम उसकी सूचना देकर आभार व्यक्त करें । और यदि कहीं उन्हें ये लगता है कि ये तो सार्वजनिक अंतर्जाल पर मुफ़्त उपलब्ध है इसलिए इसकी कोई जरूरत नहीं है तो वे सर्वथा गलत हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल वे अपने वाणिज्यिक लाभ के लिए तो कर ही रहे हैं । और फ़िर ये कोई कठिन काम भी नहीं है । बार बार विरोध होने के बावजूद भी अखबारों की तरफ़ से ऐसी कोई पहल का न किया जाना अनुचित जान पडता है । मुझे लगता है कि स्थिति काफ़ी स्पष्ट हो गई होगी । और आज जबकि हिंदी ब्लॉगिंग अभी कई परिवर्तनों के दौर से गुजर रही है , कई कठिनाइयों का सामना कर रही है तो ऐसे में जो काम निश्चित और निर्बाध रूप से चलना चाहिए , वो है ..., निरंतर पठन ,और बेहतर लेखन ।




रविवार, 19 जून 2011

भ्रष्टाचार : अवाम का पैगाम , सत्ता के नाम .....ये मेरा संदेश है ..





         पिछली पोस्ट में मैंने ज़िक्र किया था कि सरकार b--feedback@nic.in मेल पते पर आम आदमी के विचार मांग रही है भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो संक्षेप में फ़िलहाल सरकार को ईशारा कर दिया है कि आम आदमी , मेरे जैसा आम आदमी क्या सोच रहा है । आप भी अपनी राय जरूर भेजिए सरकार को ,।
सरकार ने अब जब आम जनता की सलाह-सुझाव और शिकायत सुनने का विचार बनाया है और विभिन्न माध्यमों  से उन्हें आमंत्रित भी कर रही है तो ये परिस्थिति कुछ अजीब सी है । अभी ज्यादा समय भी नहीं बीता जब प्रशासन ने रात में सोते हुए लोगों पर लाठी चार्ज़ करके लोकतंत्र की मूल भावना को ही तार तार कर दिया । अब बेशक वो अपने तर्कों और दलीलों से अपनी बर्बर कार्यवाही को नकारे और फ़िर उसे न्यायोचित साबित करने का प्रयास करे । आज आम जनता और विशेषकर वो आम लोग भी जिन्हें सत्ता लाख चाहने पर भी किसी दल या विचारधारा से बांध नहीं सकती वो भी बेशक ऊपर से तटस्थ दिख रहे हों किंतु भीतर से आक्रोशित जरूर हैं ।

अन्ना हज़ारे जैसे वृद्ध समाज सेवी और राम्देव जैसे योगगुरू यदि देश में बंद रहे भ्रष्टाचार और उसमें खुद सरकार की बडी भूमिका को देखकर जब इसके खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं तो सरकार और उसके जिम्मेदार मंत्री जिस तरह की भाषा और जो रवैय्या न सिर्फ़ आम नागरिकों के समूह जिसे "सिविल सोसायटी " नाम भी शायद इसीलिए दे दिया ताकि उस पर निशाना साधा जा सके , पर बल्कि अपने साथी राजनीतिज्ञों और विपक्ष में बैठे सभी प्रतिनिधियों के खिलाफ़ अख्यतियार किए हुए हैं उससे सरकार खुद आम नागरिकों को क्या संदेश देना चाह रही है ये समझना मुश्किल है । सरकार और उसमें बैठे शीर्ष लोगों की चुप्पी और इससे भी ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों के विरूद्ध प्रतिशोधात्मक व्यवहार खुद न्यायपालिका द्वारा तय किए मापदंड कि " भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले का संरक्ष्ण राज्य का अनिवार्य नियम है " के बिल्कुल विपरीत है । 


जहा तक भ्रष्टाचार की बात है तो स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक सर्वेक्ष्ण के मुताबिक ६२ प्रतिशत देशवासी मानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार लाईलाज़ स्तर तक पहुंच गया है । खुद न्यायपालिका तक ये टिप्पणी करती है कि भ्रष्टाचारियों को सरेआम फ़ांसी पे टांग देना चाहिए जबकि एक पूर्व न्यायमूर्ति खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं । देश के केंद्रीय मंत्रीमंडल से आधा दर्जन मंत्री तिहाड जेल में हैं वो भी किसी देशभक्ति और जनसेवा करते हुए नहीं गए बल्कि जनता के पैसों के गबन के आरोप में , इसके अलावा देश भर के तमाम राजनीतिज्ञों , मंत्रियों के खिलाफ़ कहीं न कहीं कोई न कोई मामला लंबित है । प्रशासन में सर्वोच्च स्तर से लेकर एक चपरासी तक "बाहरी कमाई " के लिए बेहाल और मिलने को लेकर आश्वस्त हैं । भ्रष्टाचार , अपराध , राजनीति , मीडिया , प्रशासन , न्यायपालिका तक का एक ऐसा गठजोड बन गया है जो आम आदमी को चीन की दीवार सरीखा लगता है । जिसके साथ आम आदमी अपना सर टकरा के फ़ोड तो सकता है लेकिन उसे पार नहीं कर सकता । ऐसा नहीं है कि ये स्थिति रातोंरात बन गई है और ऐसा भी नहीं है कि ये फ़टाफ़ट बदल भी जाएगी । किंतु अब ये तय है कि आम लोग इससे बहुत अधिक त्रस्त और क्षुब्द हैं । 


अब जबकि आम लोग इस दुश्चक्र को नहीं तोड पा रहे हैं वो वे उन कानूनों की मांग उठा रहे हैं , और अब आने वाले समय में ऐसी ही कई मांगों और कानूनों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं जिनके उपयोग से स्थिति को रोक कर ठीक करने की दिशा में मोडा जा सके । यूं तो मौजूदा कानूनों में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जाने कितने ही कानून बने हुए हैं लेकिन उनमें से कोई भी कानून न तो भ्रष्टाचारियों को कानून का भय दिखा पाया है , न सजा दिलवा पाता है और सबसे अधिक जरूरी बात ये कि आम जनता की गाढी कमाई से राजकोष की मोटी परत को छील कर खा जाने वाले तमाम भ्रष्टाचारियों से धन की उगाही नहीं करवा पाता । आज जरूरत इस बात की है कि सरकार , उसके नुमाइंदे , प्रशासन सब खुद आगे बढ कर भ्रष्टाचार को खत्म किए जाने वाले हर कदम का साथ दें न कि येन केन प्रकारेण उन्हें कुचला जाए और उनका दमन किया जाए , जैसा कि सरकार कर रही है । सत्ता को ये नहीं भूलना चाहिए कि दमन का रास्ता एक बार पहले भी आजमाया जा चुका है और देश ने आपातकाल तक भुगता हुआ है , और आपातकाल के बाद का समय और परिणाम भी किसी से छुपे नहीं है । पडोस में हो रही हलचल और विश्व पर बढते आतंकी हमलों की आशंका के मद्देनज़र ये बहुत ही संवेदनशील समय है ।


इसलिए सरकार को अब जनता के मन को टटोल कर वही करना चाहिए जो आम अवाम चाहता है । सरकार को ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस जनादेश से सत्ता पाने का दंभ वो बार बार भर रही है वो जनता खुद अब अपना जनादेश सड्कों पर उतर कर देने को बाध्य हो रही है तो फ़िर इससे अधिक विकट स्थिति और क्या हो सकती है । आम जनता से मिले संदेशों का सरकार के लिए क्या मह्त्व होगा , उससे सरकार के नज़रिए में कितना फ़र्क आएगा और जनता द्वारा लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए मांगे जा रहे कानून कब बनेंगे ये तो भविष्य तय करेगा । किंतु फ़िलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि पहले ही बहुत देर हो चुकी है इसलिए अब समय आ गया है कि कुछ फ़ैसले ले लिए जाएं । आम जनता मानसून सत्र की तरफ़ देख रही है । यदि इस मानसून सत्र में कुछ भी सार्थक निकल कर नहीं आया तो फ़िर , आने वाले वो दिन देश और समाज के साथ साथ सरकार के लिए भी परिवर्तनकारी साबित होंगे ।

गुरुवार, 16 जून 2011

bm-feedback@nic.in...............ताकि सनद रहे ....



चित्र , गूगल से साभार



आज मेरे मोबाईल पर एक संदेश आया , भ्रष्टाचार पर अपने विचार सरकार को भेजें इस मेल पते पर bm-feedback@nic.in.पहले तो मैं चौका कि क्या ये सचमुच उसी सरकार की तरफ़ से आया है जिसने थोडे दिनों पहले ..लाठी मैसेज सेवा देकर लोगों को बता दिया था कि खुद उसका भ्रष्टाचार को लेकर रुख क्या है । लेकिन फ़िर समाचार पत्रों में इस बाबत पढा तो पाया कि ये वाकई सरकार की तरफ़ से आम लोगों तक पहुंचा संदेश है जिसमें सरकार लोगों से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनकी राय जानना चाहती है । तो इसलिए इस पोस्ट के माध्यम से मेरा आप सबसे ये आग्रह है कि इस मेल पते पर सरकार को इतनी मेल भेजी जाए कि उनको जरा सही सही अंदाज़ा तो हो कि वाकई जनता क्या सोच रही है इस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर और सरकार के लिए उसके पास क्या संदेश है । मैं अपना पत्र कल सार्वजनिक करूंगा यहीं पर जो मैं मेल करने जा रहा हूं । आप अगर मेल से नहीं भेजना चाहते अपना मत , तो चिट्ठी ,पत्री , फ़ोन , अखबार , जिस भी माध्यम से चाहें अपनी राय जरूर रखें सरकार के सामने । अंतर्जाल पर  लिखने पढने वाले तमाम मित्रों से ये आग्रह है कि दो शब्द लिखें या दो हज़ार , लेकिन आप लिखें जरूर और अगर उचित लगे और लगे कि वो औरों के सामने भी आनी चाहिए तो उसे उपयुक्त मंचो पर बांटिए भी ।


यहां पर सोशल नेटवर्किंग साईट्स से जुडे तमाम मित्र और सभी मीडिया मित्रों से एक सहायता और साथ ये चाहते है हम कि वे सब अपने अपने माध्यमों में अब इस जनलोकपाल बिल के मुद्दे को बहस और विमर्श के लिए खुला छोडें । आम लोगों से सीधा पूछा जाए कि वे क्या चाहते है । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगाता बहस चले और लोगों के विचार रखे जाएं । न सिर्फ़ आम लोगों बल्कि , नेता , अभिनेता , खिलाडी , फ़िल्मकार , साहित्यकार , सबको इस मुद्दे पर अपनी राय रखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए । इससे सरकार को तो अंदाज़ा हो ही जाएगा खुद लोगों को भी ये ठीक ठीक पता चलेगा कि क्या वाकई जनता परिवर्तन चाहती है , क्या वाकई जनता चाहती है कि कोई ऐसा पहरेदार आए अब देश को बचाने के लिए जिसके पास इतने अधिकार हों कि वो न शहंशाह के कानून की तरह , खुद ही मुजरिम ढूंढ के , खुद ही उसका मुकदमा सुने और सजा भी सुनाए ? लडाई शुरू तो बहुत पहले हो चुकी थी ,जरा मध्यांतर के लिए विश्राम मोड में आ गई थी अब पुन: अटेंशन मोड में आ जाइए ..कल मिलता हूं अपनी पाती के साथ

रविवार, 12 जून 2011

सुन रहे हो सत्तावालों , एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .......Right to recall

चित्र पर क्लिक करके आप Right to recall ..फ़ेसबुक समूह मंच पर पहुंच सकते हैं 




अभी देश जिस परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है वो न सिर्फ़ देश के राजनीतिक सामाजिक वर्तमान और भविष्य के लिए संवेदनशील और महत्वपूर्ण है बल्कि पूरे विश्व में फ़ैले  हुए भारतीय समाज के उन तमाम लोगो के लिए भी जिन्हें वहां दूर बैठे अब भी इस देश की चिंता खाए जाती है , जो समुंदर पार होते हुए भी हिंदी समाचार चैनल देख रहे होते हैं , सिर्फ़ अपनों की खबर के लिए , पिछले कुछ दिन और काल इस लिहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण रहे हैं । 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ इस सरकार ने घोटालों और घपलों का जयमाल अपने गले में वरण किया है बल्कि इससे पहले भी आम भारतीय को ऐसी ही नायाब सरकार और अनमोल मंत्रीगण मिलते रहे हैं । खुद इसी राजनीतिक पार्टी की एक सरकार जो मौनी बाबा नामक एक प्राणी चलाया करते थे , ने उस समय घपलों और घोटालों का एक नया राष्ट्रीय(अंतरराष्ट्रीय भी हो सकता है ) रिकॉर्ड अपने नाम किया था । किंतु अब परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं और बहुत तेजी से बदलती जा रही हैं । चाहे दो रोटी की तलाश में गाव से निकल कर शहरों आ पहुंचे लोगों को रोटी मिली न मिली ये तो पता नहीं किंतु अक्ल जरूर मिल गई , इतनी तो जरूर ही कि वो हजारों लाखों के न सही करोडों अरबों के घोटाले की  खबरों को समझ सके । रही सही कसर , टीवी , रेडियो और इंटरनेट ने पूरी कर दी है । अब तो कई बातें लोगों को सरकार से पहले ही पता चल जाती हैं , और अक्सर सरकार से ज्यादा पता लग जाती है । और यही बात सरकार को सबसे ज्यादा नागवार गुजरती है कि आम जनता को किसी भी सूरत में सरकार से ज्यादा पता नहीं लगना चाहिए । अब देखिए सरकार के अलावा पब्लिक को कॉमनवेल्थ खेलों के खेल के बारे में पता चल गया तो हो ही गई न गडबड । अब बेशक इस खेल को भारतीय खिलाडियों की सफ़लता के लिए याद किया जाए या न किया जाए , कलमाडी के कुकर्मों के लिए जरूर याद किया जाएगा । खैर , तो कहने का मतलब ये कि अब सरकार चतुर है तो पब्ल्कि भी चालाक न सही कम से कम होशियार तो हो ही चुकी है ।  


अब जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है कि सर्प सिर्फ़ अलग अलग रंगों की केंचुली धारण किए रहता है किंतु भीतर से तो वो सर्प ही रहता है और सांप के चरित्र के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इसलिए उन्हें काबू में लाने के लिए अब कुछ कुशल सपेरों ने बागडोर थाम ली है । न सिर्फ़ थाम ली है बल्कि अब उन्होंने अपने अपने फ़ंदों में सत्ता और सरकार को फ़ंसाना भी शुरू कर दिया है । जनता तो पहले से ही परिवर्तन की बाट जोह रही थी , उसे तो ये मौका मानो मुंह मांगी मुराद की तरह मिल गया है । आज आम आदमी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड रहा है कि वो जिनके पीछे चल कर सरकार के सामने सीना तानने जा रहा है , उसकी अपनी क्या व्याख्या है , वो तो बस उस जनाक्रोश का एक हिस्सा बन जाने को आतुर है ताकि कल को कोई ये न कहे कि जब क्रांति बुनी जा रही थी तो तुमने भी देखा तो था न यकीनन । सिविल सोसायटी , योग गुरू ,  स्वनिर्मित जनसगठनो  का चेहरा लिए हुए आम जनता ने सरकार और सत्ता के सामने उन प्रश्नों को न सिर्फ़ रखना शुरू किया जिनका उत्तर वे बरसों से चाह रही थीं । पहले सूचना के अधिकार के लिए कानून की लडाई में मिली जीत और उससे आए बदलाव ने इस लडाई में एक उत्प्रेरक का काम किया । इसके बाद जनलोकपाल बिल के लिए टीम अन्ना द्वारा छेडा गया आंदोलन जल्दी ही पूरे देश भर का समर बन गया । इसके साथ ही योग गुरू रामदेव ने भी एक मुद्दा विदेशों मे काले धन की वापसी के लिए कठोर कानून बनाए जाने की मांग को लेकर एक नया आंदोलन छेड दिया । 


सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियों ने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने । जनलोकपाल बिल और विदेशों में छिपे काले धन के बिल को लाए जाने के दबाव को बेशक सरकार कुछ दिनों के लिए टला हुआ मान रही हो , लेकिन ऐसा है नहीं वास्तव में । बल्कि अब तो ये साफ़ हो गया है कि सरकार को अपना वजूद और सत्ता को बचाए रखने के लिए दो में से एक रास्ता चुनना होगा । भ्रष्टाचार के पाले में खुद को रखें या फ़िर कि जनता द्वारा मांगे जा रहे कानूनी अधिकारों को बना कर उनके साथ रहें । सरकार को ये ध्यान में रखना चाहिए कि , जनलोकपाल बिल , विदेशों मे छिपे काले धन को वापस लाने के लिए कानून और राईट टू रिकॉल यानि प्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून , जैसे नियम और अधिकार जनता ने अपने किसी फ़ायदे के लिए नहीं मांगे हैं , ये उसी लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है जिसकी रक्षा करने का दावा , इनका पुरज़ोर विरोध करने वाले राजनेता दशकों से करते आए हैं । अब वक्त आ गया है कि जनता सरकार की आंखों में आंखें डाल के पूछे कि बताओ , ये कानून क्यों नहीं बन सकता , और कब कैसे बनेगा ? 


इस मुहिम को एक और अस्त्र देते हुए हमने एक नई लडाई की योजना बनाई है - Right to recall - यानि जनप्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून । सीधे सरल शब्दों में समझा जाए तो राजनेताओं सेीक बार चुनाव जीत कर ,उन कुर्सियों पर बैठे रहने का अधिकार छीन लेना जिन्हें पाते ही वे सत्ता के मद में न सिर्फ़ चूर हो जाते हैं बल्कि देश , समाज और कानून से भी बहुत दूर हो जाते हैं । आज राजनेताओं के लिए राजनीति समाज सेवा नहीं बल्कि विशुद्ध मुनाफ़े वाला कारोबार मात्र बन कर रह गया है । अब आकलन विश्लेषण किया जाता है कि यदि छोटे स्तर पर चुनाव जीतने में पैसा लगाया जाए तो कितना मुनाफ़ा होगा और बडे स्तर पर कितना , कारण एक सिर्फ़ एक , एक बार कुर्सी मिल जाए बस । तो क्यों न उनके सरों पर एक अनिश्चितता की ऐसी तलवार टांगी जाए कि जिसकी धार उसे अपने कर्तव्य को न भूलने के लिए विवश कर सके । इसी उद्देश्य के साथ फ़ेसबुक पर एक समूह का गठन किया गया है ...Right to recall  ।यहां ये जानना समीचीन होगा कि इस कानून को अमेरिका के अठारह राज्यों में मान्यता मिली हुई है अब तक दो राज्यों की सरकार इस अधिकार के उपयोग से जनता ने गिरा दी । भारत में भी कई स्तरों पर मध्यप्रदेश , और छत्तीसगढ जैसे राज्यों में इसे सफ़लतापूर्वक आजमाया जा चुका है ।


सभी मित्रों के स्नेह और साथ का ज़ज़्बा इतना शानदार रहा है कि बनने के मात्र चौबीस घंटों के भीतर ही इसकी सदस्य संख्या छ: सौ के पार जा पहुंची है । फ़िलहाल तो इसकी सारी रुपरेखा तय करनी बांकी है , लेकिन हम बहुत जल्दी ही सरकार को ये संदेश देने जा रहे हैं कि अभी उसकी मुसीबतें खत्म नहीं होने जा रही हैं । इस समूह मंच पर हम प्रति सप्ताह एक बहस का आयोजन करेंगे , जो बाद में ब्लॉग्पोस्ट के जरिए ब्लॉगिंग की दुनिया से रूबरू होगा और उसके बाद उसका सार , अन्य माध्यमों ,पत्र पत्रिकाओं के रास्ते आम आदमी तक । जल्दी ही समूह कानूनविदों की राह और सलाह से इसकी आगे की तैयारी के बारे में योजना बनाएगा । तो आप भी जुडिए न इस मुहिम में हमारे साथ कि आइए बता दें इस सरकार को , इस व्यवस्था को कि ,,,,,सुन रहे हो सत्तावालों , एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .

शुक्रवार, 3 जून 2011

हुकूमत हवा पर बंदिश नहीं लगा सकती फ़िर ब्लॉगिंग तो तूफ़ान है....एक ब्लॉगर का संदेश

इस सहित सारी तस्वीरें गूगल से साभार , और इनके वास्तविक स्वामी को धन्यवाद कहते हुए






एक बार फ़िर से अंतर्जालीय समाचार में एक खबर जोरों पर है कि सरकार ने भारतीय अंतर्जाल के कुछ खास और आम लोगों के बीच लोकप्रिय कोनों पर अपने पहरेदारों को नियुक्त करने की तैयारी कर ली है । खबर के मुताबिक सरकार ने , सोशल नेटवर्किंग साइट्स , जैसे फ़ेसबुक , ऑर्कुट , ट्विट्टर , ब्लॉगर , और इस तरह की तमाम अंतर्जालीय भीड जुटने की संभावना वाले बिंदुओं पर अब न सिर्फ़ नज़र रखने जा रही है बल्कि उन्हें बिना कोई सूचना दिए उन्हें पूरी तरह ब्लॉक या प्रतिबंधित करने के लिए कानून ले कर आ गई है । सूत्रों के मुताबिक इस तरह की कार्यवाहियों में कुछ काम तो किया भी जा चुका है । हालांकि , अभी जिन सोशल नेटवर्किंग कम्युनिटीज़ को प्रतिबंधित करने की नौबत आई है , उनमें , राष्ट्र विरोधी भावना , धार्मिक उन्माद तथा ऐसे ही वैमनस्य फ़ैलाने को आधार बनाया गया था और जो कि वे कुछ मायनों में कर भी यही रहे थे ।


ऐसा नहीं है कि ये स्थिति पहली बार आई है ।ये काम तो गुपचुप तरीके से होता ही रहा है ,किंतु अब इस कानून के बनने के बाद बकौल सरकार वो वैधानिक रूप से कानून के दायरे में रहते हुए या फ़िर कानून के सहारे अब इस काम को करेगी जिसके लिए वो जाने कब से तैयार है अंदर ही अंदर । इस बहस को आगे बढाने से पहले ये देखना होगा कि आखिर सरकार को इस कानून को लाने की ऐसी जल्दी क्यों पड गई या कि आखिर एक लोकतांत्रिक देश में जहां आए दिन बंद हडताल और अब तो अनशन तक ने सत्ता और सरकार की नींद हराम कर रखी है , और प्रशासन हर बार सिर्फ़ पंगु बनके देखता रह जाता है तो फ़िर आखिर इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स , साझा कम्युनिटीज़ और उसमें लिखने पढने वाले लोग सिर्फ़ लिख पढ के क्या उलट पुलट कर देंगे । लेकिन सरकार का अंदेशा बिल्कुल ठीक है । चलिए इस बात को ऐसे समझते हैं ।


यदि आप पिछले कुछ वर्षों में बने भारतीय कानूनों को देखेंगे तो आसानी से समझा जा सकता है कि उनमें से अधिकांशत: पश्चिमी देशों में लागू या प्रयोग किए जा रहे कानूनों से ही प्रभावित रहे हैं , चाहे वो कानून पर्यावरण संरक्षण से संबंधित हों, या फ़िर समाज में आ रही तब्दीलियों जैसे समलैंगिकता आदि से संबंधित सोच और कानून , इसके अलावा भी जितने कानून बनाए जा रहे हैं वे सब कहीं न कहीं पश्चिमी अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में जरूर हैं । अभी हाल ही में विश्व समुदाय के सामने कम से कम दो ऐसी घटनाएं जरूर हुई हैं जिसने सत्ता और समाज दोनों को अंतर्जाल की ताकत का एहसास अवश्य ही करवाया है । पहली घटना थी मिस्र का जनांदोलन जिसमें अंतर्जाल और खासकर इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने आग के लिए पेट्रोल  का काम किया और दूसरा इससे भी कहीं खतरनाक "विकीलीक्ज़ " के रूप में सामने आया जिसने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका तो तक को नग्नता जैसी स्थिति में ला खडा किया । देखा जाए तो इन दोनों घटनाओं ने बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया कि अवाम  अगर वास्तव में ही अपने विचारों और अपनी काबलियत का उपयोग करने लगे तो सत्ता उसके सामने कहीं भी न टिकेगी , और कमाल की बात है कि सत्ता और सरकार इस संदेशे को भलीभांति समझ भी चुकी है । ऐसे में जब सरकार को पता चलता है कि भारत में भी "आई हेट गांधी " आई हेट इंडिया , और धर्म , मज़हब , जाति के नाम पर जाने कितनी ही साइटें अपनी बुनियाद डाल चुकी हैं तो उसने दवाई से परहेज़ भली की तर्ज़ पर पहले ही तैयारी कर ली ।



अब बात पाबंदियों की ,जिसकी कि सरकार के अनुसार उसने तैयारी कर ली है , तो सबसे पहली बात तो ये कि सरकार जब गुर्जरों को लगभग आधा उत्तर भारत की परिवहन व्यवस्था ठप्प करने से रोक नहीं पाई , जब सरकार अपना सारा तेल जलाने के बावजूद भी एक हवाईजहाज तक न उडवा सकी तो यकीन रखिए कि सरकार अंतर्जाल के इस समुद्र को भी बांध नहीं सकेगी कभी भी , विशेषकर हिंदी अंतर्जाल तो अभी अन्य भाषाओं के अंतर्जाल  से बहुत सुरक्षित लगता है  ।इसकी एक बडी वजह ये है कि हिंदी भाषा में मौजूद सामग्री का नब्बे प्रतिशत सकारात्मक ही है जबकि अंग्रेजी और अन्य भाषाएं इस मामले में बदकिस्मत हैं । इसलिए जब भी दमनचक्र चलेगा तो यकीनन वो अंग्रेजी भाषा से ही शुरू होगा । उदाहरण के लिए अब तक ब्लॉगिंग से जुडी कानूनी विवादों में अधिकांश अंग्रेजी भाषा के ब्लॉग, कथ्य या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ही हैं , चाहे वो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश महोदय द्वारा लिखे गए ब्लॉग का मामला लें या फ़िर अमिताभ बच्चन के ब्लॉग पर उन्हें परेशान करने वाला मामला । अभी हिंदी अंतर्जाल इतना बडा या खतरनाक नहीं हुआ है कि वो सरकार के लिए कोई बडा खतरा बन सके । लेकिन हां सरकार के न सही , वे आज साहित्य और मीडिया के निशाने पर तो हैं ही , और सरकार से पहले तो हिंदी अंतर्जाल का आमना सामना इन्हीं दो महारथियों से होने वाला है , कहिए कि शुरू भी हो चुका है । लेकिन असली समस्या ये है कि अगर सरकार ने इन अंतर्जाल पर एक होने वाले सभी संभावित प्लेटफ़ार्मों को ही निशाना बनाया तो ...। घबराइए नहीं , बेशक यहां के मंत्रियों को लगता हो कि यहां कि इंजिनयरिंग संस्थान स्तरीय नहीं हैं लेकिन देश को अपने इन नौनिहालों पर इतना विश्वास तो आराम से है कि वे जरूरत पडने पर इससे बडे और तेज़ प्लेटफ़ार्म तैयार कर सकते हैं , बशर्ते कि संसाधन उपलब्ध कराया जाए उन्हें ।



इसके बावजूद भी , स्थिति ऐसी नहीं है कि निश्चिंत होकर बैठा जाए । गूगल खुद इन दिनों कई मुश्किलों से जूझ रहा है , आए दिन होने वाले चीनी हैकरों के आक्रमण से उसे अपनी सुरक्षा को बनाए रखने के लिए जीतोड मेहनत करनी पड रही है । हाल ही में चीनी हैकरों ने अमेरिकी अधिकारियों के जीमेल अकाऊंट हैक कर दिए हैं । फ़ेसबुक , और ट्विट्टर जैसी साइटें तो पहले से ही सुरक्षा एजेंसियों की ज़द में हैं । तो ऐसे में अब ये बहुत जरूरी हो जाता है कि हिंदी अंतर्जाल से जुडे हर व्यक्ति को कम से कम उतना सजग और सचेत तो हो ही जाना चाहिए कि वो खुद को इन नए कानूनों के फ़ंदे में आ सकने से बचा सके । और ऐसा कर पाना बहुत कठिन भी नहीं है । इसका सीधा और स्पष्ट नियम है , आप जैसे अपने समाज में रह रहे हैं , आचरण कर रहे हैं , बोल रहे हैं , बहस रहे हैं तो बिल्कुल ठीक वैसा ही यहां भी करते जाएं । आप वहां भी सुरक्षित हैं तो यहां भी रहेंगे । कुछ अनजानी तकनीकी परेशानियों में फ़ंस जाने से बेहतर है कि अनजान कोनों से बचा जाए , जाने कौन सा कोना आपके लिए अंधेरा बिछाने का सबब बन जाए ।  अपने को , अपने शब्दों को , अपने विचारों को , धार दीजीए , लेकिन इतना नहीं कि खुद धार देते हुए आपकी उंगलियां ही कट जाएं । उंगलियां सलामत रहना बहुत जरूरी है । और जब तक कि हिंदी अंतर्जाल एक तबका बनकर देश में उभर नहीं जाए सिर्फ़ तब तक बिलो द बेल्ट के दांव को बचा कर रखिए ।

इस हिसाब से आप सब अंतर्जाल पर उसी रफ़्तार से दौडते रहिए जैसे दौड रहे हैं , किसी भी बात की रत्ती भर परेशानी नहीं है । अब ये अंतर्जाल इतना भी छोटा नहीं रहा कि ऐसी किसी भी स्थिति में आपके अपने ही शहर में को ऐसा आभासीय मुझ जैसा विधिक  मित्र न मिल जाए जो आपकी लडाई को अपनी लडाई समझ के एक बार कायदे से ही लड ले । हिंदी अंतर्जाल के लिए ये नि:संदेह बहुत ही संवेदनशील समय है , आज अखबार से लेकर , साहित्यकार तक ब्लॉगिंग को या तो गाली दे रहे हैं या फ़िर उसे कमजोर साबित करने की मुहिम में लगे हैं , ऐसे में हिंदी अंतर्जाल की जिम्मेदारी और भी बढ जाती है ,

अगली पोस्ट में कुछ इन पहलुओं का ही ज़िक्र करूंगा ...आप पढ रहे हैं न 

साथ चलने वाले

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