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| इस सहित सारी तस्वीरें गूगल से साभार , और इनके वास्तविक स्वामी को धन्यवाद कहते हुए |
एक बार फ़िर से अंतर्जालीय समाचार में एक खबर जोरों पर है कि सरकार ने भारतीय अंतर्जाल के कुछ खास और आम लोगों के बीच लोकप्रिय कोनों पर अपने पहरेदारों को नियुक्त करने की तैयारी कर ली है । खबर के मुताबिक सरकार ने , सोशल नेटवर्किंग साइट्स , जैसे फ़ेसबुक , ऑर्कुट , ट्विट्टर , ब्लॉगर , और इस तरह की तमाम अंतर्जालीय भीड जुटने की संभावना वाले बिंदुओं पर अब न सिर्फ़ नज़र रखने जा रही है बल्कि उन्हें बिना कोई सूचना दिए उन्हें पूरी तरह ब्लॉक या प्रतिबंधित करने के लिए कानून ले कर आ गई है । सूत्रों के मुताबिक इस तरह की कार्यवाहियों में कुछ काम तो किया भी जा चुका है । हालांकि , अभी जिन सोशल नेटवर्किंग कम्युनिटीज़ को प्रतिबंधित करने की नौबत आई है , उनमें , राष्ट्र विरोधी भावना , धार्मिक उन्माद तथा ऐसे ही वैमनस्य फ़ैलाने को आधार बनाया गया था और जो कि वे कुछ मायनों में कर भी यही रहे थे ।

ऐसा नहीं है कि ये स्थिति पहली बार आई है ।ये काम तो गुपचुप तरीके से होता ही रहा है ,किंतु अब इस कानून के बनने के बाद बकौल सरकार वो वैधानिक रूप से कानून के दायरे में रहते हुए या फ़िर कानून के सहारे अब इस काम को करेगी जिसके लिए वो जाने कब से तैयार है अंदर ही अंदर । इस बहस को आगे बढाने से पहले ये देखना होगा कि आखिर सरकार को इस कानून को लाने की ऐसी जल्दी क्यों पड गई या कि आखिर एक लोकतांत्रिक देश में जहां आए दिन बंद हडताल और अब तो अनशन तक ने सत्ता और सरकार की नींद हराम कर रखी है , और प्रशासन हर बार सिर्फ़ पंगु बनके देखता रह जाता है तो फ़िर आखिर इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स , साझा कम्युनिटीज़ और उसमें लिखने पढने वाले लोग सिर्फ़ लिख पढ के क्या उलट पुलट कर देंगे । लेकिन सरकार का अंदेशा बिल्कुल ठीक है । चलिए इस बात को ऐसे समझते हैं ।

यदि आप पिछले कुछ वर्षों में बने भारतीय कानूनों को देखेंगे तो आसानी से समझा जा सकता है कि उनमें से अधिकांशत: पश्चिमी देशों में लागू या प्रयोग किए जा रहे कानूनों से ही प्रभावित रहे हैं , चाहे वो कानून पर्यावरण संरक्षण से संबंधित हों, या फ़िर समाज में आ रही तब्दीलियों जैसे समलैंगिकता आदि से संबंधित सोच और कानून , इसके अलावा भी जितने कानून बनाए जा रहे हैं वे सब कहीं न कहीं पश्चिमी अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में जरूर हैं । अभी हाल ही में विश्व समुदाय के सामने कम से कम दो ऐसी घटनाएं जरूर हुई हैं जिसने सत्ता और समाज दोनों को अंतर्जाल की ताकत का एहसास अवश्य ही करवाया है । पहली घटना थी मिस्र का जनांदोलन जिसमें अंतर्जाल और खासकर इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने आग के लिए पेट्रोल का काम किया और दूसरा इससे भी कहीं खतरनाक "विकीलीक्ज़ " के रूप में सामने आया जिसने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका तो तक को नग्नता जैसी स्थिति में ला खडा किया । देखा जाए तो इन दोनों घटनाओं ने बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया कि अवाम अगर वास्तव में ही अपने विचारों और अपनी काबलियत का उपयोग करने लगे तो सत्ता उसके सामने कहीं भी न टिकेगी , और कमाल की बात है कि सत्ता और सरकार इस संदेशे को भलीभांति समझ भी चुकी है । ऐसे में जब सरकार को पता चलता है कि भारत में भी "आई हेट गांधी " आई हेट इंडिया , और धर्म , मज़हब , जाति के नाम पर जाने कितनी ही साइटें अपनी बुनियाद डाल चुकी हैं तो उसने दवाई से परहेज़ भली की तर्ज़ पर पहले ही तैयारी कर ली ।

अब बात पाबंदियों की ,जिसकी कि सरकार के अनुसार उसने तैयारी कर ली है , तो सबसे पहली बात तो ये कि सरकार जब गुर्जरों को लगभग आधा उत्तर भारत की परिवहन व्यवस्था ठप्प करने से रोक नहीं पाई , जब सरकार अपना सारा तेल जलाने के बावजूद भी एक हवाईजहाज तक न उडवा सकी तो यकीन रखिए कि सरकार अंतर्जाल के इस समुद्र को भी बांध नहीं सकेगी कभी भी , विशेषकर हिंदी अंतर्जाल तो अभी अन्य भाषाओं के अंतर्जाल से बहुत सुरक्षित लगता है ।इसकी एक बडी वजह ये है कि हिंदी भाषा में मौजूद सामग्री का नब्बे प्रतिशत सकारात्मक ही है जबकि अंग्रेजी और अन्य भाषाएं इस मामले में बदकिस्मत हैं । इसलिए जब भी दमनचक्र चलेगा तो यकीनन वो अंग्रेजी भाषा से ही शुरू होगा । उदाहरण के लिए अब तक ब्लॉगिंग से जुडी कानूनी विवादों में अधिकांश अंग्रेजी भाषा के ब्लॉग, कथ्य या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ही हैं , चाहे वो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश महोदय द्वारा लिखे गए ब्लॉग का मामला लें या फ़िर अमिताभ बच्चन के ब्लॉग पर उन्हें परेशान करने वाला मामला । अभी हिंदी अंतर्जाल इतना बडा या खतरनाक नहीं हुआ है कि वो सरकार के लिए कोई बडा खतरा बन सके । लेकिन हां सरकार के न सही , वे आज साहित्य और मीडिया के निशाने पर तो हैं ही , और सरकार से पहले तो हिंदी अंतर्जाल का आमना सामना इन्हीं दो महारथियों से होने वाला है , कहिए कि शुरू भी हो चुका है । लेकिन असली समस्या ये है कि अगर सरकार ने इन अंतर्जाल पर एक होने वाले सभी संभावित प्लेटफ़ार्मों को ही निशाना बनाया तो ...। घबराइए नहीं , बेशक यहां के मंत्रियों को लगता हो कि यहां कि इंजिनयरिंग संस्थान स्तरीय नहीं हैं लेकिन देश को अपने इन नौनिहालों पर इतना विश्वास तो आराम से है कि वे जरूरत पडने पर इससे बडे और तेज़ प्लेटफ़ार्म तैयार कर सकते हैं , बशर्ते कि संसाधन उपलब्ध कराया जाए उन्हें ।
इसके बावजूद भी , स्थिति ऐसी नहीं है कि निश्चिंत होकर बैठा जाए । गूगल खुद इन दिनों कई मुश्किलों से जूझ रहा है , आए दिन होने वाले चीनी हैकरों के आक्रमण से उसे अपनी सुरक्षा को बनाए रखने के लिए जीतोड मेहनत करनी पड रही है । हाल ही में चीनी हैकरों ने अमेरिकी अधिकारियों के जीमेल अकाऊंट हैक कर दिए हैं । फ़ेसबुक , और ट्विट्टर जैसी साइटें तो पहले से ही सुरक्षा एजेंसियों की ज़द में हैं । तो ऐसे में अब ये बहुत जरूरी हो जाता है कि हिंदी अंतर्जाल से जुडे हर व्यक्ति को कम से कम उतना सजग और सचेत तो हो ही जाना चाहिए कि वो खुद को इन नए कानूनों के फ़ंदे में आ सकने से बचा सके । और ऐसा कर पाना बहुत कठिन भी नहीं है । इसका सीधा और स्पष्ट नियम है , आप जैसे अपने समाज में रह रहे हैं , आचरण कर रहे हैं , बोल रहे हैं , बहस रहे हैं तो बिल्कुल ठीक वैसा ही यहां भी करते जाएं । आप वहां भी सुरक्षित हैं तो यहां भी रहेंगे । कुछ अनजानी तकनीकी परेशानियों में फ़ंस जाने से बेहतर है कि अनजान कोनों से बचा जाए , जाने कौन सा कोना आपके लिए अंधेरा बिछाने का सबब बन जाए । अपने को , अपने शब्दों को , अपने विचारों को , धार दीजीए , लेकिन इतना नहीं कि खुद धार देते हुए आपकी उंगलियां ही कट जाएं । उंगलियां सलामत रहना बहुत जरूरी है । और जब तक कि हिंदी अंतर्जाल एक तबका बनकर देश में उभर नहीं जाए सिर्फ़ तब तक बिलो द बेल्ट के दांव को बचा कर रखिए ।

इस हिसाब से आप सब अंतर्जाल पर उसी रफ़्तार से दौडते रहिए जैसे दौड रहे हैं , किसी भी बात की रत्ती भर परेशानी नहीं है । अब ये अंतर्जाल इतना भी छोटा नहीं रहा कि ऐसी किसी भी स्थिति में आपके अपने ही शहर में को ऐसा आभासीय मुझ जैसा विधिक मित्र न मिल जाए जो आपकी लडाई को अपनी लडाई समझ के एक बार कायदे से ही लड ले । हिंदी अंतर्जाल के लिए ये नि:संदेह बहुत ही संवेदनशील समय है , आज अखबार से लेकर , साहित्यकार तक ब्लॉगिंग को या तो गाली दे रहे हैं या फ़िर उसे कमजोर साबित करने की मुहिम में लगे हैं , ऐसे में हिंदी अंतर्जाल की जिम्मेदारी और भी बढ जाती है ,
अगली पोस्ट में कुछ इन पहलुओं का ही ज़िक्र करूंगा ...आप पढ रहे हैं न
bahut suder aalekh................
http://drsatyajitsahu.blogspot.com
Dr Satyajit Sahu ने कहा…
3 जून 2011 7:41 pm
दिमाग ख़राब हो गया है इन लोगो का ... वैसे आप लिखते रहिये ... हम पढ़ रहे है ... और हाँ क़ानूनी सलाह की जरुरत हुयी तो फोन करूंगा ... उठा जरुर लीजियेगा ... नहीं तो पता चला कि आप के फोन ना उठाने के चक्कर में हम ही उठ गए !!!!
शिवम् मिश्रा ने कहा…
3 जून 2011 7:48 pm
मिडिया की तरह ब्लोगर्स को तो सरकार खरीद नहीं सकती सो बेन लगाने जैसे हथकंडे ही अपनाएगी |
Ratan Singh Shekhawat ने कहा…
3 जून 2011 9:24 pm
अरे भाई शुभ-शुभ बोलो.
जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…
3 जून 2011 9:34 pm
आपने आगे आनेवाली परेशानियों से सचेत और सावधान रहने की जो नसीहत दी वह काबिले तारीफ़ है. ब्लोगर्स सावधानी के साथ साथ यदि ईमानदारी भी बरतें और देश और समाज के हित में कार्य करें तो सरकारी कानून से क्या डर.
अजय भाई, मुझे आपका मेरे ब्लॉग पर आने का इंतजार है.
Rakesh Kumar ने कहा…
3 जून 2011 9:41 pm
कउनो दिक्कत नय है.आप की चिंता दुरुस्त है.सरकार भ्रष्टाचार कर रही है तो उसे क्यों रोकेंगी,फाँसी पाए अपराधियों,आतंकवादियों को जेलों में पकवान खिला रही है,एक महात्मा को अनशन 'झिला' रही है,'हाई-फाई'बाबा को दंडवत कर रही है तो ऐसी सरकार इसी तरह की नपुंसक कारवाई कर सकती है और हम सब इसे झेलने के लिए तैयार हैं !
बहुत प्रभावशाली आलेख !सरदार भगत सिंह ने जो असेम्बली में बम फेंका था,उससे कम असर नय करेगा !
संतोष त्रिवेदी ने कहा…
3 जून 2011 9:47 pm
अपना तो वो हाल है --जो हुक्म सरकार ।
अब जो होगा देखा जायेगा ।
डॉ टी एस दराल ने कहा…
3 जून 2011 10:04 pm
दोनों ओर से ही संयम बना रहे।
प्रवीण पाण्डेय ने कहा…
3 जून 2011 10:17 pm
" अजयभाई सब से पहले तो मै आपको इस जानकारी भरे उम्दा आलेख के लिए बधाई देता हु और आप से सहेमत भी हु की आपने जो भी कहा है वो सब सही है ...सरकार आखिर चाहती क्या है ? क्या सरकार हमारी आज़ादी पर भी पाबन्दी लगाने की कोशिश कर रही है ..ये सब सही है और सब से सही है आपने जो कहा की यहाँ धर्म की ज्यादा तर बात हो रही है ...अगर ऐसा ही रहा तो वाकई में ये बात गंभीर हो सकती है "
" मग़र फिर भी मै शिवम् सर से १००००००० % सहेमत हु ..आप लिखते रहिये ..हम पढ़ते रहेंगे :)))
SACCHAI ने कहा…
3 जून 2011 10:23 pm
हम पढ़ रहे है .. अगली कडी का इंतजार भी है !!
संगीता पुरी ने कहा…
3 जून 2011 11:24 pm
सूचना तकनीक को रोका नहीं जा सकता। यह और विस्तार पाएगी। इसे सत्ता की जंजीरें नहीं बांध पाएंगी।इसे नए दौर की क्रांति का वाहक बनने से कोई नहीं रोक सकेगा।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
3 जून 2011 11:43 pm
राज्य अपना काम करेगा...
और हमें अपना काम करना है...
हमें जिम्मेदारियां तो लेनी ही होंगी...और फल भी भुगतने होंगे...
बेहतर आलेख...
ravikumarswarnkar ने कहा…
3 जून 2011 11:46 pm
आज़ादी का दुरूपयोग भी होता है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे नज़र हर देश कि सरकार रखा करती है. और ऐसा करना भी चाहिए. इस से ब्लॉगर कि आज़ादी कैसे छीनी जा सकती है? और यदि ब्लॉगर कि आज़ादी छीनी जा सकती है तो चिंता का विषय है. राष्ट्र विरोधी भावना , धार्मिक उन्माद फैलाने वाले ब्लोग्स पे तो पाबन्दी लगनी ही चाहिए.
एस.एम.मासूम ने कहा…
4 जून 2011 12:57 am
जिस ने लिखना हे वो नही रुक सकता, जनून किसी के बस मे नही होता, हां कुछ बरेक लग सकता हे, लेकिन कब तक, सरकार को ही सुधर जाना चाहिये १ अरब को सुधारने से अच्छा... क्योकि एक अरब को सुधार पाना इस सरकार के लिये कठिन होगा
राज भाटिय़ा ने कहा…
4 जून 2011 12:57 am
चिन्तन का विषय जरुर है किन्तु मनन और संयम का भी....
Udan Tashtari ने कहा…
4 जून 2011 1:40 am
निश्चय ही आने वाले समय में ब्लोगिंग उस तूफान का नाम होगा जो भ्रष्ट राज्य,व केंद्र सरकार को भी उराकर समंदर में डुबाकर सुनामी में मारेगा...बस हमसबको मिलकर कुछ सार्थक ईमानदारी भरा प्रयास अपने आत्म मुग्धता और निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर करना होगा...
honesty project democracy ने कहा…
4 जून 2011 7:57 am
बहुत बढ़िया चिंतन ! शुभकामना अजय भाई !
सतीश सक्सेना ने कहा…
4 जून 2011 9:15 am
बात में दम है।
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कौमार्य के प्रमाण पत्र की ज़रूरत?
ब्लॉग समीक्षा का 17वाँ एपीसोड।
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…
4 जून 2011 10:13 am
"परेशानियों में फ़ंस जाने से बेहतर है कि अनजान कोनों से बचा जाए"
अजय भाई आप बार-बार किन्हीं कोनो का उल्लेख कर रहे हैं। कहीं आपका इशारा मेरे ब्लाग "अजित गुप्ता का कोना" से तो नहीं है। हा हा हा हा।
आपकी बात से सहमत हूँ जो समाज में सभ्यता के साथ रहते हैं वे ब्लाग पर भी रहते हैं। जो नहीं रहते उन्हें सोचना चाहिए।
ajit gupta ने कहा…
4 जून 2011 10:42 am
अजय भाई संघर्ष करो... हम तुम्हारे साथ हैं... वैसे मैं कई मुद्दों पर बंदिश के मामले पर सरकार के साथ भी हूँ...
क्योंकि मेरा मानना है कि अगर हमें कोई छूट मिली है तो उसका बेजा फायदा नहीं उठाना चाहिए... लेकिन अक्सर लोग इस मंच का बेजा फायदा उठाते हैं... और उनके कारण बाकी के लोगों को नुक्सान उठाना पड़ता है...
Shah Nawaz ने कहा…
4 जून 2011 11:25 am
... आमरण अनशन अब इसके ख़िलाफ़ ही होगा
Kajal Kumar ने कहा…
4 जून 2011 6:30 pm
कानूनी जानकारी की जरुरत तो है ...
पढ़ रहे हैं हम भी !
वाणी गीत ने कहा…
5 जून 2011 6:50 am
सरकार अपने खिलाफ बोलने वालों का मुह बंद करना चाहती है। देखते हैं क्या कानून लाती है सरकार।
सभी ब्लॉगर्स से निवेदन है कि अपनी भाषा पर पकड़ रखें तथा ऐसे लिखे कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
DHEERAJ ने कहा…
5 जून 2011 12:39 pm
अपने ही साथी जब हिन्दी ब्लौगिंग को शैशवास्था में मानते हैं तो फिर कोई टेंशन नहीं
जवान हो चुकी अंग्रेजी ब्लॉगिंग पर नज़रें हैं सरकार की
लगे रहो भाई :-)
बी एस पाबला ने कहा…
5 जून 2011 5:44 pm