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शनिवार, 17 सितंबर 2016

रस्साकशी की सरकार




... डर था वही हुआ जैसे ही लोगों ने चिल्लाना शुरु किया और उनकी चिल्लाहट से प्रेरित होकर मीडिया ने उससे ज्यादा आवाज में चीत्कार राग में रिरियाना शुरू किया कि राजधानी दिल्ली के वह तथाकथित कर्ता धर्ता ऐसे विकट समय में जाने प्रदेश से बाहर क्या कर रहे हैं चीख पुकार मचाई गए एलजी साहब सीएम् साहब मंत्री जी अधिकारी जी हर कोइ , किसी ने किसी वजह से राज्य से बाहर है |

भाई बहुत अच्छे है ,यह समझना आम आदमी के बूते के बाहर की बात है कि ऐसे समय में जबकि एक तरफ तो देशभर में स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ राज्य व केंद्र सरकार के आपसी रिश्तों में कड़वाहट का खामियाजा हम लोगों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है , तो फिर ऐसे में बाहर जाकर अवलोकन विलोकन प्रशिक्षण का कार्यक्रम आगे के लिए क्यों नहीं टाला जा सकता था और वहीं दूसरी तरफ खुद छुट्टियां बिता कर लौटे गवर्नर साहब मानो आते ही रातों रात सुर्खियाँ बटोरने के लिए रात को फैक्स कर बैठे मानो दिल्ली पे हरियाणा ने चढ़ाई कर दी हो ...अच्छा है , देश में सत्तर सालों से राजीनति सेवा से दूकान और फिर दूकान से धंधा बन कर रह गयी है उसकी वजह यही सब है |

  यह तो होना ही था गवर्नर साहब को जबरन दिल्ली बुलाया गया तो ,साहब ने आते ही फोन फैक्स चिट्ठी मनीष सिसोदिया जो कि इन दिनों शिक्षा में सुधार को लेकर के अपने संजीदा प्रयासों को और अधिक समझने व सीखने के लिए फिलहाल विदेश यात्रा पर हैं उन्हें फैक्स भेजकर तुरंत  दिल्ली में उपस्थित होने के लिए कुछ इस तरह के अंदाज में नोटिस भेजा जैसे क्लास का क्लास टीचर मॉनिटर को क्लास से बाहर गया जानकार  भेजता है ,क्योंकि यह दौर फेसबुक ट्विटर प्लस आदि का है इसलिए वहां की पुकार ज्यादा मच जाती है स्वाभाविक भी है ||


अफसोस होता है उस रस्साकशी को देख कर और ऐसा नहीं है कि इसके लिए आप सिर्फ किसी एक निकाय किसी एक संस्था किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं हां यह विडंबना है की एक तरफ पिछले 2 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान को एक मिशन के रूप में देखने मानने व समझने का यत्न  किया और बहुत सारे प्रयास किए  जाते रहे हैं लेकिन उन सब का क्या फायदा यदि राजधानी दिल्ली जैसे महानगरों में भी मलेरिया चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रुप लेकर प्रशासन व् आम लोगों को पूरी तरह से पस्त कर देती है ||



 शीत ऋतु के प्रारंभ तक यहां यह कहा जाए कि ठंड शुरू होने तक इस तरह कि बरसाती बीमारियों का प्रकोप और अधिक रहने की संभावना सिर्फ इस वर्ष बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार बहती चली आई है सरकार इन मौसम से पहले बड़े-बड़े दावे कर ले अपनी तैयारियों का खुलासा करें मगर जमीनी हकीकत तो यही है कि जब जब ऐसी कोई स्थिति विकराल रूप होकर के आपदा का रूप बन जाती है सरकार के पास संसाधन व्यक्ति वह योजनाओं का इस कदर अभाव रहता है कि वह या तो एक दूसरे पर दोषारोपण का कार्य शुरु कर देते हैं सारी स्थिति जाने के बाद जांच वह मुआवजा देकर अपने कार्य की इति श्री कर देते हैं देखना यह है कि राज्य सरकार व केंद्र सरकार या कहा जाए कि नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच की रस्साकशी पर दिल्ली की आम जनता कब तक कर्तव्य करती रहेगी....


बुधवार, 29 जनवरी 2014

"असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला





दिल्ली में रहते हुए अब ये सोचता हूं कि आखिर वो क्या वजह है कि "खबरों के संसार" के अधिकांश "देश" दिल्ली के गलियारों जैसे लगने लगते हैं ।और फ़िर इन दिनों तो यहां झाडू फ़िराई का कार्य प्रगति पर है । पॉलिटिकल स्ट्रैटजीज़ राजनीतिक मान्यताएं बगावत पर उतारू हैं , कहीं न कहीं लोग बाग खुद ही अब अपनी पूछों में आग लगाने को आतुर हो उठे हैं , उकताहट तो यकीनन ही हो गई है इस व्यवस्था से ।

दिलचस्प बात ये है कि आगामी लोकसभा चुनावों की अहमियत के दबाव के चलते कुल मिला कर कोई चीख चीख कर कुछ न कुछ कहना चाह रहा है । झुंझलाहट इतनी तीव्र है कि मुकाबले में दंगों के दर्द को उतारा जा रहा है जाने दीजीए साहेब वक्त से जुदा खुद अपनी नस्ल द्वारा सुनाई जाने वाली सबसे भयानक और पाश्विक सज़ा है जिस पर बीती हो वही जानता है ।

सबसे जुदा बात ये है कि इस शहर की राजनीतिक आबो हवा क्या बदली है मानिए जैसे सियासी ज़लज़ला सा चल रहा है देश में । जिस दिन से नई सोच नए विकल्प ने राजनीति में दखल दिया जाने कितने ही चक्रव्यूह लगातार रचे जा रहे हैं । हर कोई अपने मोर्चे खोल के बैठा है  ।

वे बडे पुख्ताई तरीके से बताते हैं कि कुछ नहीं जी सब हमारा चांस ससपिशियस करने केल इए मिल कर किया जा रहा है अगले दूसरे ही पल नई कैग जांच बिठा देने की घोषणा कर डालते हैं , फ़ंडा सिर्फ़ एक है "जो भी अपनी कमाई से ज्यादा की औकात में दिखे मिले , उसकी जांच तो बनती ही है बॉस। और बात इनती ज्यादा तीखी है कि पुलिस, प्रशासन , आयोग तक इन्हें बगावती अराजक आरोपी और दोषी साबित किए दे रहे हैं ,सभी ने जैसे "असहयोग द्वारा समर्थन" देने का गजब फ़ार्मूला ईज़ाद किया है ।


कोई करोडों बकाए का नोटिस थमा रहा है तो कोई तीस दिन के सरकार से पांच दस साल का रिपोर्ट कार्ड दिखा कर उसे मुर्गा बनाने पर उद्धत है । महामहिम का दफ़्तर चंद फ़ाइलें निपटान में इतनी देर किए रहा कि उसका फ़ायदा सीधे सीधे फ़ांसी पाए दुर्दांत अपराधियों को हुआ मगर महामहिम ने "अराजकता की चपत" आम आदमी के गाल पे जड दी ,वो भी मुस्कुराते हुए :) :) और इस रस्साकशी के बीच अच्छी बात ये है कि लोग अब अपने राजनीतिक विकल्प के प्रति ज्यादा संज़ीदा दिखाई दे रहे हैं । भारतीय राजनीति करवट ले रही है उम्मीद की जानी चाहिए कि उस करवट हसीन सपने सिर्फ़ पैदा नहीं होंगे वे , बढेंगे और बनेंगे भी ..................

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

मनाइए छब्बीस जनवरी और करिए जलसा परेड .........






आज सुबह सुबह जब फ़ेसबुक पर मैंने अपने राजनीतिक विचार और खासकर अपने मंतव्य को स्पष्ट किया तो शाम तक उस पर मित्रों की सूची में से ही कुछ मित्रों ने अपनी भडास निकालने के साथ साथ , जयचंद , राष्ट्रद्रोही के तमगों से नवाज़ने के बाद , और उखड कर हमें लात मार कर अपनी फ़्रैंड लिस्ट से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया । अब हमें धेले भर का बुरा नहीं लगता , ज्यादा से ज्यादा और क्या , इससे पहले तो एक भाई साहब ने सिर्फ़ नमो नमो ही लिखने के लिए मुझे नरेंद्र मोदी से पेमेंट पाने वाला कहते हुए दिल्ली में उनके अनुसार सबसे अच्छा विकल्प आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन नहीं देने के लिए खूब गरियाया था , उसी दिन गरिया के निकल गए आज होते तो हरिया गए होते । खैर , उस पोस्ट की प्रतिक्रिया स्वरूप इतना सारा लिख गया कि सोचा इसे भी ब्लॉग पर सहेज़ता चलूं , आगे जब बच्चे पढेंगे तो वे खुद अच्छा बुरा तय करेंगे , हमारे बारे में , इस समय के बारे में ............यही लिखा था



अब जरा खरी खरी
मुद्दा - पहले पुलिस कर्मियों का सस्पेंशन और बाद में तबादला । ओह इतनी बडी मांग । ऐसा तो आज तक इतिहास में कभी नहीं हुआ , सबने सुना ही पहली बार है कि कोई मुख्यमंत्री इस मांग के लिए पहले गृहमंत्री से मिले और फ़िर धरने पर बैठ जाए । उस पुलिस का तबादला जिसे विश्व की भ्रष्टतम पुलिस व्यवस्था में से एक के लिए गिना जाता है ।और किसके कहने पर , कांग्रेस का एक निगम पार्षद भी होता अजी वो छोडिए नेताओं के चमचों बेलचों तक के फ़ोन भर से क्या क्या होता है , हमें पता है और खूब पता है ।

कारण - पुलिस के अनुसार मंत्री ने बदतमीज़ी की और मंतरी के अनुसार पुलिस ने अपना काम नहीं किया । विदेशी महिला नागरिकों के साथ गलत व्यवहार हुआ अब तो मेडिकल रिपोर्ट भी यही कहती है और इस देश में ऐसी मेडिकल रिपोर्टों में आजतक कभी हेरफ़ेर नहीं हुई । फ़िर विदेशी महिलाओं के साथ हुए व्यवहार की जहां तक बात है तो आजतक कभी दिल्ली में खुलेआम "बिहारी" कह कर अपमानित करने वाला समाज , मुंबई में भैया कहकर पीट पीट कर भगाने वाला समाज आज इतना चिंतित , वाह समाज तो सचमुच बदल रहा है। और हां जिन्हें मादक पदार्थों की तस्करी और तस्करों का रिकार्ड देखना हो दिल्ली पुलिस से आरटीआई लगा कर जानने की कोशिश तो करें कि पिछले पांच वर्षों में दिल्ली में दर्ज़ इन अपराधों के आरोपियों में किन किन लोगों का नाम मिलता है ।

सही गलत - सडक पर नहीं बैठना चाहिए , दफ़्तर में बैठ कर सारी शासन व्यवस्था को संभालना बदलना चाहिए । बिल्कुल यही होना चाहिए क्योंकि साठ सालों से यही तो होता आया है और देखिए न शासन व्यवस्था कितनी चुस्त दुरूस्त है आखिर कोई मंत्री । सारा झमेला ही कमरों के बाहर निकल कर सडकों पर नीतियों और नियमों का बनना , उन्हें परखना और लागू करवाने के तरीके का है । संसद में बन रहे कानून , और वातानुकूलित कक्षों में बैठे इन्हें बनाने वाले कितने लोगों को खुद आज वे कानून याद हैं और उनमें से कितने ऐसे बचे हैं जो इन कानूनों के साथ खेले और उन्हें तोडा नहीं , वो खुद सोचिए समझिए ।

मीडिया - मीडिया हा हा हा हा , अभी एक समाचार चैनल दिखा रहा है कि एक थाली में बैठे चार लोग खिचडी खा रहे हैं और कुछ लोग चाय पी रहे हैं और इस कारण ये धरने पर बैठे मुख्यमंत्री का बहुत बडा झूठ अरे अपराध करार दिया जाना चाहिए । मीडिया जिसे शहादत और अय्याशी की खबर में फ़र्क करने की समझ नहीं बची है , जिसे मातम और जलसे को उसी सनसनी के साथ परोसने का शऊर है फ़िर उसकी खबरों पर बिलबिलाना ही क्यूं फ़िर मीडिया भी कहां स्थाई विरोध या पक्ष में खडा रहता है , कभी रहा ही नहीं

और चलते चलते ये भी .......बात सिर्फ़ इतनी सी है कि अदने पदने लोगों ने सनक कर चुनाव लड लिया , कुछ अपने जैसे सताए , दबाए , लोगों को सच बताने समझाने के लिए युवाओं की एक जमात को उतार दिया , मामला ऐसा पलटा दिया सबने मिलकर कि मरगिल्ली समझ कर खिल्ली उडाती पार्टी , ठीक बराबर में आकर खडी हो गई । उफ़्फ़ इतनी हिमाकत .........कुछ भी करना मंगता था "जयकांत शिकरों" का ईगो हर्ट नहीं करना मंगता था .........लेकिन क्या करें वो तो  हर्ट हो चुकी थी । तो क्या हुआ , बैठने दो पदों में नीचे अभी इतने सालों की सैटिंग आखिर कब काम आएगी , लपेट देंगे कहीं न कहीं और ऐसा करके छोड देंगे कि फ़िर ये तो क्या दूसरे भी बगावत , सगावत वाले सुर न पकडें । मैच सिर्फ़ दो टीमों में ही देखना चाहते हैं लोग , हमेशा से देखते रहे हैं , तीसरे की औकात ही क्या ??? बात सिर्फ़ औकात दिखाने की है , देखो दिखा रहे हैं न , बैठो धरने पे , मर जाओ लाठी खाखा के , अब तो पब्लिक भी तुम्हारे खिलाफ़ है और साथी भी , हमें तो ऐसा मौका चाहिए ही था ........................लेकिन , लेकिन , लेकिन , उफ़्फ़ उन लोगों का क्या करें जिन्होंने दिल्ली के इतने जगहों पर अपनी बागडोर इन झाडुओं के हवाले कर दी ...सब के सब पागल हैं , निरे बेवकूफ़ , भावुक कहीं के , नायक फ़िल्म की  ऑडिएंस .........और इन सबके अलावा जो भी लोग देश में बचे हैं सिर्फ़ वे , और सिर्फ़ वे ही देश को चलाने लायक हैं , वे ही सक्षम हैं , वे ही ठीक हैं ..जो भी हैं बस वे ही हैं ।

विकल्प - दिल्ली सरकार को फ़ौरन बर्खास्त करके छब्बीस जनवरी के भव्य जश्न की तैयारी शुरू की जाए , अब तो दिल्ली पुलिस की न बन पाने वाली कमिश्नर मैम ने भी हरी झंडी दे दी है।

छब्बीस जनवरी को दिल्ली पुलिस की एक विशेष शौर्य झांकी निकाली जाए और इन तमाम पुलिस वालों को मंत्रियों को सबक सिखा देने जैसे कारनामें के लिए वीरता पदक से सम्मानित किया जाए ।

दिल्ली सरकार के सभी मंत्रियों और विधायकों पर मुकदमा ठोंक के उन्हें अंदर कर दिया जाए , देश की व्यवस्था को बदलने का सपना दिखाने और फ़िर उसे पूरा करने के लिए खुद कूद पडने के लिए , मुख्यमंत्री को जनवरी की ठंडी कडकडाती रात में फ़ुटपाथ पर सोकर  ये तथाकथित "अराजकता" फ़ैलाने के लिए ।देश मज़े में है , और मज़े में ही रहेगा , उसे आने वाले महीनों में लोकतंत्र का "ट्वेंटी-ट्वेंटी" खेलना है वो भी सिर्फ़ दो टीमों में बंटकर , ठीक है न ।

पोस्ट लिखते लिखते तक समाचार चैनल बता रहे हैं कि मुख्यमंत्री धरना समाप्त कर सकते हैं क्योंकि दो आरोपी पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजा जा रहा है , लो चित्त पट्ट सब बराबर :) अब मनाइए छब्बीस जनवरी , करिए जलसा परेड , देखिए आम आदमी को गरियाने का अगला मौका आपको कब मिलने वाला है ............

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

दिख तो रहा है , मगर दिखाई नहीं देता




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राजधानी दिल्ली में सिर्फ़ एक साल पुरानी राजनीतिक पार्टी “आम आदमी पार्टी” यानि “आप” की सरकार बने महज़ एक माह ही हुआ है और देश भर के राजनीतिक हलकों से लेकर समाज , मीडिया और लगभग पूरे देश में रोज़ाना चाहे सवाल उठा कर , चाहे आलोचना करके या फ़िर किसी और बहाने से निशाने पर लेकर किंतु निरंतर ही “आप” चर्चा में बनी हुई है । इस पार्टी के गठन की पृष्ठभूमि , इसका अंदाज़ , इसकी शैली के कारण इसके संगठन का तानाबाना बुनने वाले सभी छोटे बडे भी न सिर्फ़ सबकी नज़रों में हैं बल्कि आवश्यक अनावश्यक रूप से अपने उद्देश्यों और संकल्पों को पूरा करने का बोझ भी ढो रहे हैं ।
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हालांकि वो नियम कि जिसे जितना दबाओ वो उतना ही ऊपर उठ जाता है , इस नई नवेली पार्टी पर भी लागू हो रहा है । इस पोस्ट के लिखे जाने तक नई बनी सरकार ने लगभग एक माह का काम काज तो देख ही लिया है और साथ ही अपने पूर्व के साथियों सहित वर्तमान के बहुत से सहयोगियों के बदलते हुए रंग और तेवर भी । इस पार्टी का भविष्य , इस सरकार का भविष्य क्या और कैसा होगा ये तो अभी देखना बांकी है किंतु जिस तेज़ी से दिल्ली के बाद पूरे देश भर में इससे जुडने वाले लोगों की संख्या बढी है , इसके बारे में लोगों के बीच कौतूहल और बहस बढी है उसने सत्तासीन केंद्रीय पार्टी समेत इस बार सत्ता में आने की प्रबल दावेदार बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी को भी कहीं कहीं चिंतित तो कर ही दिया है ।
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कहते हैं न कि अंधों के देश में यदि कोई आंख वाला पहुंच जाए तो उसे वहां बीमार करार दे दिया जाता है । ऐसा ही कुछ परिदृश्य वर्तमान की दिल्ली सरकार के साथ हो रहा है । जिस प्रदेश में पिछले पंद्रह वर्षों से लगातार कांग्रेस की सरकार चली आ रही थी और उसके हिस्से में बिजली पानी की महंगाई , बेतहाशा भ्रष्टाचार के साथ साथ राष्ट्रमंडल खेल घोटाला जैसे जाने कितने ही कारनामे आए , जिस प्रदेश में निगम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी प्रबल जीत के साथ काबिज होने के बावजूद भी इन मुद्दों के खिलाफ़ खडा होना तो दूर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार अनियमितता और तमाम गडबडियों की तरफ़ रत्ती भर भी ध्यान न दे सकी और कमाल की बात ये कि चुनाव के बाद जब अप्रत्याशित रूप से एक नई पार्टी जिसके प्रत्याशियों और समर्थकों तक को हिकारत की नज़र से देखा जाता था , खिल्ली उडाई जाती थी वो उस संख्या तक पहुंच गई कि सांप छछूंदर वाली स्थिति हो गई तो एक नई रस्सा कशी का खेल शुरू हो गया , पहले मैं , पहले मैं की स्थिति बदल कर पहले “आप” पहले “आप” पर आकर टिक गई । सीधे सीधे इस नई पार्टी को ही घेरा गया कि अब चुनाव लडा है तो सरकार बनाओ और चला कर दिखाओ । तिस पर तुर्रा ये कि जो काम साठ सालों से बिगडा हुआ था , उलझा हुआ था उसका हल ढूंढने और तलाशने के लिए सबने डेडलाइन भी तय करनी शुरू कर दी ।
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रोज़ाना वादों को पूरा और झट से पूरा कर देने का दबाव और अगले ही पल उसे पूरा न करने का आरोप जडने का एक अंतहीन सिलसिला ही शुरू हो गया । आम जनता जो बरसों से त्रस्त और पस्त थी उसने तो खैर जिस तरह का व्यवहार किया वो समझ में आता है और उसकी एक बानगी इस इश्तेहारनुमा खबर से भी समझी जा सकती है , जिसमें एक सज्जन से सीधे सीधे ही सरकार से कहा है कि वो उनकी मांग मान ले अन्यथा आंदोलन के लिए तैयार रहे
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अब कुछ मुख्य बातें जो दिख तो रही हैं मगर दिखाई नहीं दे रही हैं
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१. दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री को दिल्ली के एक थाने के प्रभारी को निलंबित करने के लिए आग्रह करना पड रहा है , जबकि पडोसी राज्य के मुख्यमंत्री महज़ चंद मिनटों में एक प्रशासनिक अधिकारी को रातों रात निलंबित करने में भी नहीं हिचकते हैं
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२.दिल्ली सरकार के वर्तमान मंत्रियों की सरलता और साधारण व्यक्तिव के कारण न सिर्फ़ अदने से पुलिस अधिकारी , कर्मचारी तक उन्हें आंखे दिखा रहे हैं जबकि इससे पहले के तमाम सरकारों के निगम पार्षद और उनके चमचे तक आला अधिकारियों को हडकाते नहीं डरते थे ।
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३. इस नई पार्टी पर कांग्रेस की बी टीम होने जैसा आरोप लगाया जाता है और जब दल के मुखिया ये बयान देते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मैदान में है ही नहीं तो इस पार्टी की तथाकथित ए टीम यानि कांग्रेस के नेतागण कहते हैं कि आम आदमी पार्टी में बदबूदार और घटिया लोग भरे पडे हैं ।
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४.इस पार्टी के मुखिया , अगुआ से लेकर तमाम नेताओं के लिए मीडिया से लेकर समकक्ष और विपक्ष के तमाम नेता , क्या करेगा , जूते खाएगा , झूठ बोल रहा है , यानि तू तडाक की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं जो ये बता समझा रहा है कि बेशक आम आदमी सत्ता पर बैठ गया हो मगर सियासती लोगों की नज़र में उसकी औकात अभी वही है ।
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अब कुछ वो बातों जिनसे फ़िलहाल इस नई पार्टी को परहेज़ ही करना चाहिए था :-
फ़िलहाल दिल्ली में पैठ बना कर सत्ता में आकर लोगों का बहुत सारा अधूरा काम करने को प्राथमिकता देनी चाहिए थी बनिस्पत इसके कि तुरंत फ़ुरत में आगामी लोकसभा चुनावों के लिए अपनी दावेदारी ठोंकने की जल्दबाज़ी । इस नई पार्टी के पास  करने के लिए काम और कार्यक्षेत्र पहले ही इतना ज्यादा है कि अनावश्यक रूप से फ़ैलाव करने की जगह केंद्रित होकर मुद्दों पर अपनी सारी उर्ज़ा और श्रम लगाना चाहिए था ।
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ये जरूरी नहीं कि पल पल , मिनट दर मिनट , किया अनकिया , कहा अनकहा , सब कुछ का मीडियाकरण होता रहे । आप काम करते जाइए , चुपचाप करते जाइए , ढिंढोरा पीटने की कोई जरूरत नहीं है । काम का परिणाम सारी कहानी और फ़साना लोगों के सामने अपने आप रख देंगे ।
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आप सामाजिक सेवा के उद्देश्य से राजनीति में आए हैं , व्यवहार , तेवर , शैली , भाषा नम्र और उदार रखें एक सेवक और समाज के सेवक की तरह , बेशक रखें इसमें किसी को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए , होगी भी नहीं किंतु ये इतना भी नम्र और सरल साधारण न हो कि नीचे बैठा मातहत भी आपको अपना सेवक ही समझे । ये भारत है मेरी जान , यहां डंडे का काम डंडे के बल पर ही हो सकता है , कम से कम डंडे को उतना ऊंचा तो रखना ही होगा कि उसका डर और खौफ़ बना रहे ।
अब एक आखिरी बात , लोगों ने आपको आपकी नीयत देख कर एक विकल्प के रूप में चुना है तो सबसे पहला और आखिरी प्रयास यही और सिर्फ़ यही होना चाहिए कि अपनी नीयत स्पष्ट और साफ़ रखिएगा । आप करते जाइए , आप बढते जाइए ….

रविवार, 19 जून 2011

भ्रष्टाचार : अवाम का पैगाम , सत्ता के नाम .....ये मेरा संदेश है ..





         पिछली पोस्ट में मैंने ज़िक्र किया था कि सरकार b--feedback@nic.in मेल पते पर आम आदमी के विचार मांग रही है भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो संक्षेप में फ़िलहाल सरकार को ईशारा कर दिया है कि आम आदमी , मेरे जैसा आम आदमी क्या सोच रहा है । आप भी अपनी राय जरूर भेजिए सरकार को ,।
सरकार ने अब जब आम जनता की सलाह-सुझाव और शिकायत सुनने का विचार बनाया है और विभिन्न माध्यमों  से उन्हें आमंत्रित भी कर रही है तो ये परिस्थिति कुछ अजीब सी है । अभी ज्यादा समय भी नहीं बीता जब प्रशासन ने रात में सोते हुए लोगों पर लाठी चार्ज़ करके लोकतंत्र की मूल भावना को ही तार तार कर दिया । अब बेशक वो अपने तर्कों और दलीलों से अपनी बर्बर कार्यवाही को नकारे और फ़िर उसे न्यायोचित साबित करने का प्रयास करे । आज आम जनता और विशेषकर वो आम लोग भी जिन्हें सत्ता लाख चाहने पर भी किसी दल या विचारधारा से बांध नहीं सकती वो भी बेशक ऊपर से तटस्थ दिख रहे हों किंतु भीतर से आक्रोशित जरूर हैं ।

अन्ना हज़ारे जैसे वृद्ध समाज सेवी और राम्देव जैसे योगगुरू यदि देश में बंद रहे भ्रष्टाचार और उसमें खुद सरकार की बडी भूमिका को देखकर जब इसके खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं तो सरकार और उसके जिम्मेदार मंत्री जिस तरह की भाषा और जो रवैय्या न सिर्फ़ आम नागरिकों के समूह जिसे "सिविल सोसायटी " नाम भी शायद इसीलिए दे दिया ताकि उस पर निशाना साधा जा सके , पर बल्कि अपने साथी राजनीतिज्ञों और विपक्ष में बैठे सभी प्रतिनिधियों के खिलाफ़ अख्यतियार किए हुए हैं उससे सरकार खुद आम नागरिकों को क्या संदेश देना चाह रही है ये समझना मुश्किल है । सरकार और उसमें बैठे शीर्ष लोगों की चुप्पी और इससे भी ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों के विरूद्ध प्रतिशोधात्मक व्यवहार खुद न्यायपालिका द्वारा तय किए मापदंड कि " भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले का संरक्ष्ण राज्य का अनिवार्य नियम है " के बिल्कुल विपरीत है । 


जहा तक भ्रष्टाचार की बात है तो स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक सर्वेक्ष्ण के मुताबिक ६२ प्रतिशत देशवासी मानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार लाईलाज़ स्तर तक पहुंच गया है । खुद न्यायपालिका तक ये टिप्पणी करती है कि भ्रष्टाचारियों को सरेआम फ़ांसी पे टांग देना चाहिए जबकि एक पूर्व न्यायमूर्ति खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं । देश के केंद्रीय मंत्रीमंडल से आधा दर्जन मंत्री तिहाड जेल में हैं वो भी किसी देशभक्ति और जनसेवा करते हुए नहीं गए बल्कि जनता के पैसों के गबन के आरोप में , इसके अलावा देश भर के तमाम राजनीतिज्ञों , मंत्रियों के खिलाफ़ कहीं न कहीं कोई न कोई मामला लंबित है । प्रशासन में सर्वोच्च स्तर से लेकर एक चपरासी तक "बाहरी कमाई " के लिए बेहाल और मिलने को लेकर आश्वस्त हैं । भ्रष्टाचार , अपराध , राजनीति , मीडिया , प्रशासन , न्यायपालिका तक का एक ऐसा गठजोड बन गया है जो आम आदमी को चीन की दीवार सरीखा लगता है । जिसके साथ आम आदमी अपना सर टकरा के फ़ोड तो सकता है लेकिन उसे पार नहीं कर सकता । ऐसा नहीं है कि ये स्थिति रातोंरात बन गई है और ऐसा भी नहीं है कि ये फ़टाफ़ट बदल भी जाएगी । किंतु अब ये तय है कि आम लोग इससे बहुत अधिक त्रस्त और क्षुब्द हैं । 


अब जबकि आम लोग इस दुश्चक्र को नहीं तोड पा रहे हैं वो वे उन कानूनों की मांग उठा रहे हैं , और अब आने वाले समय में ऐसी ही कई मांगों और कानूनों के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं जिनके उपयोग से स्थिति को रोक कर ठीक करने की दिशा में मोडा जा सके । यूं तो मौजूदा कानूनों में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जाने कितने ही कानून बने हुए हैं लेकिन उनमें से कोई भी कानून न तो भ्रष्टाचारियों को कानून का भय दिखा पाया है , न सजा दिलवा पाता है और सबसे अधिक जरूरी बात ये कि आम जनता की गाढी कमाई से राजकोष की मोटी परत को छील कर खा जाने वाले तमाम भ्रष्टाचारियों से धन की उगाही नहीं करवा पाता । आज जरूरत इस बात की है कि सरकार , उसके नुमाइंदे , प्रशासन सब खुद आगे बढ कर भ्रष्टाचार को खत्म किए जाने वाले हर कदम का साथ दें न कि येन केन प्रकारेण उन्हें कुचला जाए और उनका दमन किया जाए , जैसा कि सरकार कर रही है । सत्ता को ये नहीं भूलना चाहिए कि दमन का रास्ता एक बार पहले भी आजमाया जा चुका है और देश ने आपातकाल तक भुगता हुआ है , और आपातकाल के बाद का समय और परिणाम भी किसी से छुपे नहीं है । पडोस में हो रही हलचल और विश्व पर बढते आतंकी हमलों की आशंका के मद्देनज़र ये बहुत ही संवेदनशील समय है ।


इसलिए सरकार को अब जनता के मन को टटोल कर वही करना चाहिए जो आम अवाम चाहता है । सरकार को ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस जनादेश से सत्ता पाने का दंभ वो बार बार भर रही है वो जनता खुद अब अपना जनादेश सड्कों पर उतर कर देने को बाध्य हो रही है तो फ़िर इससे अधिक विकट स्थिति और क्या हो सकती है । आम जनता से मिले संदेशों का सरकार के लिए क्या मह्त्व होगा , उससे सरकार के नज़रिए में कितना फ़र्क आएगा और जनता द्वारा लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए मांगे जा रहे कानून कब बनेंगे ये तो भविष्य तय करेगा । किंतु फ़िलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि पहले ही बहुत देर हो चुकी है इसलिए अब समय आ गया है कि कुछ फ़ैसले ले लिए जाएं । आम जनता मानसून सत्र की तरफ़ देख रही है । यदि इस मानसून सत्र में कुछ भी सार्थक निकल कर नहीं आया तो फ़िर , आने वाले वो दिन देश और समाज के साथ साथ सरकार के लिए भी परिवर्तनकारी साबित होंगे ।

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