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शनिवार, 4 अगस्त 2012

लडाई खत्म नहीं , लडाई अब शुरू हुई है






अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों , जिन्हें सिविल सोसायटी के सदस्य के रूप में देश ने पहचाना था , ने कल अचानक ही घोषणा कर दी और एक प्रश्न पूरे देश के सामने उछाल दिया कि क्या अन्ना और उनके सहयोगियों को अब एक राजनीतिक विकल्प देने के लिए खुद राजनीति में उतरना होगा और साथ ही अनशन की समाप्ति की घोषणा भी कर दी । बेशक राजनीतिक सामाजिक गलियारों में इस तरह के और इससे जुडी कई संभावनाओं के कयास लगाए जाते रहे हों किंतु जंतर मंतर पर खडे और इस सारे जनांदोलन पर अपने मन मस्तिषक का एक कोना लगाए आम आदमी के लिए ये सब अचानक सा हुआ ही रहा । इस निर्णय की जो प्रतिक्रिया देखने पढने सुनने को मिली उसने कहीं से भी आश्चर्यचकित नहीं किया । राजनीतिक दल अपने अपने चरित्र के हिसाब से उपहास उडा रहे हैं , लांछन लगा रहे हैं , और खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं । कुछ मौका उन्हें भी मिल गया है जो शुरू से ही इसे किसी न किसी करवट बिठाने पर आमादा थे ।

एक आम आदमी की नज़र से इस जनांदोलन का आकलन विश्लेषण किया जाना जरूरी है और इसके लिए सबसे पहले एक आम आदमी होना जरूरी है । आम आदमी जो पिछले साठ बरसों से जाने कितने ही जननायकों , कितने ही जनांदोलनों और कितने ही राजनीतिक दलों के तमाम वादों ,नारों के बहकावे भुलावे में आकर हर बार किसी न किसी को अपनी किस्मत का फ़ैसला करने का हक देता रहा ,और हर बार पिछली बार से ज्यादा और अधिक ठगा जाता रहा , उसे जब कोई गैर राजनीतिक व्यक्ति , कोई गैर राजनीतिक समूह ऐसा मिला जिसने उसे रातों रात गरीबी से ,भुखमरी से , कुपोषण से और इन जैसे तमाम कोढ खाजों से छुटकारा दिलाने का वादा  न करते हुए मुद्दों की लडाई के लिए प्रेरित किया तो वे उनके पीछे हो लिए । आम आदमी को आज भी किसी टीम टाम और किसी देव परदेव से अधिक उन मुद्दों की फ़िक्र रही है जिनका उठाया जाना और जिनके लिए लडा जाना जरूरी है । ये एक सुखद संयोग रहा कि , वो चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हज़ारे से जुडे हुए सिविल सोसायटी के दल के लोग कम से कम किसी भी तुलना में वे उन जन प्रतिनिधियों से , जो कि हर बार आम लागों को किसी न किसी बहाने से खुद को सत्ता सौपे जाने और फ़िर पूरे देश को दीमक की तरह चाटे जाने के लिए मजबूर कर देते रहे , उनसे पहली ही नज़र में बेहतर तो लगे ही , ऐसे में यदि जनता ने उन्हें अपने लिए आवाज़ उठाने वाला , सियासत से आंखें मिला कर डंके की चोट पर उन्हें भ्रष्ट , अमर्यादित , चरित्रहीन कहने का साहस/दु:साहस करने वाला माना तो कुछ भी अनुचित नहीं था ।

विश्व में आर्थिक मंदी ने आम लोगों की लगभग एक सी स्थिति कर दी थी और अरब देशों सहित जाने कितने ही मुल्कों में आम और मध्यम वर्गीय लोगों ने सियासत और सत्ता के साथ पूंजीपतियों के गठजोड का पुरजोर विरोध किया । निरंकुश सरकारों के प्रति न सिर्फ़ अपना गुस्सा दिखाया बल्कि आम अवाम की ताकत को महसूस कराते हुए  कई स्थानों पर उसे पूरी तरह उखाड फ़ेंका । भारत में भी संचार एवं सूचना तंत्र के प्रसार ने एक क्रांति ला दी वो थी विचारों के प्रवाह और प्रसार की क्रांति । मोबाइल , कंप्यूटर , इंटरनेट तक लोगों की पहुंच ने उनका आपस में न सिर्फ़ संपर्क सूत्र जोड दिया बल्कि लोगों को किसी मुद्दे और समस्या पर बहस करने विमर्श करने और तर्क वितर्क करने का मौका दे दिया । इतना ही नहीं इन सभी मत अभिमतों का सारी सूचना प्रसार तंत्र और मीडिया के माध्यम से न सिर्फ़ सरकार बल्कि समाज तक भी पहुंचने लगी जिसने इसे और विस्तार दे दिया । वैश्विक समाज से लोगों के जुडाव होने का एक लाभ ये हुआ कि पश्चिमी और विकसित देशों में चल रहे प्रशासनिक कायदे कानूनों की जानकारी , व्यवस्था को सुचारू करने चलाने के लिए अपनाए जाए रहे उपायों और अधिकारों की समझ भारत में भी लोगों को होने लगी । ऐसे ही समय में देश का बुद्धिजीवी वर्ग सक्रिय होकर , सीधे सीधे उन कानूनों की मांग उठा बैठा । पहली और बडी सफ़लता उसे सूचना के अधिकार की लडाई जीत कर मिल भी गई ।



पिछले कुछ ही समय में सूचना के अधिकार का उपयोग करके लोगों ने सरकार और सियासत के हलक में हाथ डाल कर उससे वो वो सूचनाएं और जानकारियां हासिल कर लीं जो सरकार और सत्ता में बैठे हुए लोग कभी भी अन्य किसी भी तरह से कम से कम आम लोगों तो कतई नहीं पहुंचने देते । आज ये स्थिति हो गई है कि सरकार को सूचना का अधिकार , उस भस्मासुरी वरदान की तरह महसूस हो रहा है जो अब खुद सरकार के गले की फ़ांस बन गया है । हालात का अंदाज़ा सिर्फ़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ समय में ही सूचना के अधिकार के कारण जाने कितने ही लोगों की हत्या हो चुकी है और सरकार अब तक नौ बार इसमें संशोधन और बदलाव की कोशिश कर चुकी है । अब भी रोज़ाना हज़ारों अर्ज़ियां रोज़ नए खुलासे कर रही हैं ,और यदि सरकार को लेश मात्र भी इसकी ताकत का अंदाज़ा पहले हो जाता तो नि:संदेह सरकार इस कानून को कम से कम इस शक्ल में तो कतई पास होने नहीं देती । इस सफ़लता ने प्रशासन और व्यवस्था से जुडे भिडे और उसके भीतर पैठ कर सब कुछ देख परख चुके कुछ संवेदनशील लोगों को ये मौका दिया कि वे एक जगह संगठित होकर उन मुद्दों और समस्याओं के पीछे जनता को कर सकें जिसके लिए आज तक भारतीय अवाम ने कभी भी आवाज़ नहीं उठाई थी ।

सिविल सोसायटी के नाम पर संगठित उस समूह ने पूरे सुनियोजित तरीके से और सारी लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप पहले सरकार द्वारा प्रस्तावित एक भ्रष्टाचार विरोधी कानून के मसौदे को न सिर्फ़ पढा बल्कि पूरे तर्कों और कारणों से उसमें व्याप्त कमियों को बताते हुए उससे बेहतर कानून का मसौदा सरकार के सामने रख दिया । इतना ही नहीं उस संगठन ने ये सारी प्रक्रिया खुलेआम जनता के सामने रख बांट दी और सरकार के मंशे की कलई खोल कर रख दी । जनता जो पहले ही सरकारी नीतियों और राजनैतिक भ्रष्टाचार के कारण बढी महंगाई की वजह से भुखमरी के कगार पर पहुंची हुई थी उसने फ़ौरन बात को समझा और बिना किसी शक शुबहे , बिना कोई कारण परिणाम जाने और उसकी परवाह किए इस संगठन का साथ देने लगी । इस संगठन के अगुआओं में बहुत सारे व्यक्तियों में से कुछ चेहरे ऐसे थे जिन्हें अवाम उनकी ईमानदार छवि के कारण सम्मान देती आई थी और इस बात ने इस संगठन की लडाई को हवा दी । रही सही कसर इस संगठन के लडाई के उस तरीके ने पूरी कर दी जिसका नाम ले लेकर देश की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी अब तक अपनी दुकान चलाती आई थी यानि गांधीवादी आमरण अनशन का रास्ता । मौजूदा समय में जहां किसान और मजदूर आंदोलन तक हिंसक रूख अपनाए हुए थे इस संगठन ने आमरण अनशन का गांधीवादी हथियार आजमाया । तरकीब काम कर गई और बरसों बाद ऐसा लगा मानो आम जनता सडक पर उतर कर सत्ता और सरकार को अपनी बात कहने को उद्धत हुई । मीडिया का दखल और इस आंदोलन की मिनट दर मिनट कवरेज ने इसे पूरे देश में फ़ैलाने में कोई कसर नहीं बाकी रखी ।


सबसे पहले जब मुट्ठी भर लोग जंतर मंतर पर जनलोकपाल बिल को संसद पटल पर रखे जाने की मांग को लेकर बैठे तब किसी को ये अंदाज़ा भी नहीं था कि ये अवाम द्वारा अपनाई और लडी जानी वाली कुछ बडी लडाइयों में से एक बन जाएगी , लेकिन ऐसा हुआ । इस बीच बाबा रामदेव ने विदेशों में भारतीयों द्वारा जमा किए कराए गए काले धन को देश में वापस लाए जाने की मांग को लेकर अपनी मुहिम छेड दी , जिसे भी लोगों ने हाथों हाथ लिया । एक आंदोलन से दूसरा आंदोलन अलग होकर भी जुड गया । सरकार जो पहले से ही इस तरह आम आदमी द्वारा सडक पर किसी कानून के बनने बनाए जाने के मुद्दे की लडाई को अपने दशकों से स्वप्रदत्त अधिकार में हनन मान कर उबाल खाए बैठी थी उसने पूरी राजनीतिक बिसात बिछा दी । पहले ना नुकुर करते हुए उन्हें वार्ता के लिए बुलाया गया और इस बहाने टूटा पहला अनशन और सडकों पर उतरा हुज़ूम घर लौटा कि चलो लडाई शुरू तो हुई ,इस आस और धोखे में कि शायद सरकार को जनमानस की भावना का ख्याल आ गया और उनकी ताकत और आक्रोश का अंदाज़ा हो गया है ।


लडाई की अगली किस्त तब शुरू हुई जब संसद सत्र के दौरान सिविल सोसायटी की टीम ने जनलोकपाल बिल के मसौदे को संसद पटल पर रखने की पुरज़ोर मांग की । न सिर्फ़ इस संगठन को बल्कि अवाम को भी ये स्पष्ट होना बहुत जरूरी था कि असल में सत्ता के पक्ष विपक्ष में बैठे और राजनीति कर रहे तमाम धुरों में कौन कौन इस कानून के साथ खडे हैं और कौन विरोध में खडे हैं । ये बात स्पष्ट भी हुई जब संसद सत्र के दौरान इस प्रस्तावित विधेयक पर बोलते हुए लगभग हर दल और हर नेता ने अपने मन की बात कही जो शासक द्वारा गुलाम से उसे उसकी हद में रहने की हिदायत और चेतावनी देने जैसा कुछ था । यहां चूक ये हुई कि जिस सरकार और राजनीति की मंशा पहले ही स्पष्ट हो चुकी थी उसको दूसरा मौका दिया जाना गलत था कम से कम तब तो जरूर ही जब अवाम की प्रतिक्रिया समग्र और मुखर थी । आखिर क्यों नहीं सत्र को आगे बढाया जा सकता था , क्यों नहीं उस बहस को चलने दिया जा सकता था । दबाव को और बढने देना चाहिए था इतना कि आर पार का निर्णय हो सकता । लेकिन बहुत सारी बातें स्पष्ट होते हुए भी बहुत कुछ अस्पष्ट ही रहा ।


अब बात हालिया जनांदोलन और अनशन की , इस अनशन और आंदोलन का उद्देश्य था दागी केंद्रीय मंत्रियों पर जांच की मांग , जिसके लिए कतई भी इतने दिनों तक भूखे रहकर अपनी बात कहने रखने की जरूरत नहीं थी । मौजूदा हालातों में ये सर्वविदित है कि सिर्फ़ जांच के दायरे में लाए जाने और उन पर मुकदमा चलाए जाने से सरकार , व्यवस्था और राजनीति के चरित्र पर लेशमात्र भी फ़र्क नहीं पडने वाला था । इन चौदह के बाद अगले अट्ठाईस भी उसी रास्ते पर चलने वाले मिलने वाले थे और हैं देश को । सरकार और सत्ता जो दो बार सडक पर उतरे जनसमूह को बरगलाने और घर वापस भेजने में सफ़ल हो चुकी थी उसे बहुत अच्छी तरह पता था कि दो वक्त की रोजी रोटी के लिए लडता आम आदमी बार बार इस लडाई में अपना सर्वस्व दांव पर लगाने नहीं आ सकेगा । तिस पर भूल ये हुई कि टाइमिंग की गलती ने सारी स्थिति को उलट कर रख दिया । यदि राजनैतिक विकल्प का रास्ता चुना जाना ही तय था तो फ़िर ये अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव से पहले ही क्यों नहीं चुना गया या फ़िर कि सिर्फ़ एक पत्र के आने भर ने कैसे इस निर्णय तक पहुंचा दिया अचानक । सबसे बडी कमी ये रही कि जिस तरह का नियोजन और प्रतिबद्धता और उससे अधिक पारदर्शिता अब तक लोगों को दिख रही थी , उन्हें महसूस हो रही थी सब कुछ झटके से होने के कारण उन्हें हटात ये समझ ही नहीं आया ।


अब बात जहां तक राजनैतिक विकल्प देने की है तो अन्ना के सहयोगी पहले ही इस बारे में बहुत कुछ स्पष्ट कह कर चुके हैं लेकिन फ़िर भी अब ये लडाई न तो जनलोकपाल बिल तक सीमित रही है न ही सरकार बदलने तक । अब एक नई दिशा देने की बात की जा रही है तो ये लडाई नि:संदेह बहुत लंबी और निर्णायक होगी । देखना ये है कि क्या सच में ही साठ सालों तक उपेक्षा का शिकार आम आदमी दिए जाने वाले राजनैतिक विकल्प में और जो देने जा रहे हैं उनमें अपना विश्वास जत पाएगा । रही सरकार और सियासत की बात तो उसके लिए ये किसी भी नज़रिए से लाभदायक नहीं होगा । अवाम ने अपना विकल्प चुना तो भी सत्ताच्युत होकर शक्तिहीन होने के लिए उन्हें तैयार रहना होगा और यदि ऐसा नहीं हो पाया तो फ़िर ये असंतोष किस करवट ले जाएगा देश को ये भी देखना होगा । दोनों ही सूरतों में आम आदमी के लिए निराश होने , थक कर बैठ जाने और चुप हो जाने का कोई अवसर नहीं है । उसे नए मुद्दे , नई लडाई , नई सोसायटी खडी करनी होंगी और तब तक इस लडाई को जारी रखना होगा जब तक स्थिति वास्तव में सुधार की ओर न बढे और इसके लिए पहले उसे खुद को भी दुरूस्त , ईमानदार करना होगा ।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

जो तुम रिपब्लिक तो हम पब्लिक हैं बाबू









आजादी की लडाई के बाद १९७७ और उसके बाद शायद अब वो समय आया हुआ है जब सच में ही एक आदमी हर राजनीतिक दांव पेंच को न सिर्फ़ समझ रहा है बल्कि उसमें अपनी सक्रियता और प्रभाव बना रहा है । बेशक ये स्थिति , महंगाई , भ्रष्टाचार , अन्याय , नक्सलवाद और इन जैसे जाने कितने ही मुद्दों के लिए अलग अलग लडी जा रही लडाई के कारण बन गई हो और जो जनांदोलन या कहा जाए कि जनाक्रोश पिछले दिनों देश ने देखा और दिखाया वो सिर्फ़ जनलोकपाल बिल बनाने या ना बनाने के कारण न भी हो तो भी कुछ बातें तो नि: संदेह ही ऐसी हुईं जो अब से पहले या इससे बेहतर पहले कभी नहीं हुई या हो पाई थीं । 

सबसे पहली गौर करने वाली बात । देश के संविधान निर्माताओं ने इसे आज  से आधी शदाब्दी पहले बनाते समय , इतनी कुशाग्रता और चतुराई अपनाई कि वो कहीं कहीं तो अति को छू गई । विश्व के सारे संविधानों के उपबंधों , अनुच्छेदों , व्यवस्थाथों को भारत के संविधान में जगह दी गई , बिना इसकी परवाह किए कि वो विश्व का सबसे बडा लिखित संविधान बन गया । चलिए मान लिया जाए कि उस समय ये निहायत ही जरूरी और एकमात्र विकल्प था तो भी क्या ऐसे उपबंध अनुच्छेद ऐसी व्यवस्थाएं जरूरी थीं बनाना जो आधी शताब्दी बीत जाने के बाद भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पहले से भी कहीं अधिक क्लिष्ट और विषम परिस्थितियों में फ़ंस गई हों चाहे वो फ़िर आरक्षण व्यवस्था हो चुनाव की व्यवस्था । सारे औपबंधिक व तात्कालिक उपायों को भी स्थाई बना के रख दिया गया । और तिस पर , हद तो ये है कि संविधान में लगातार ही संशोधन की प्रक्रिया चली आ रही है । चुनाव सुधार ,भ्रष्टाचार , अपराध , आतंकवाद आदि सबसे निपटने के लिए कानून पर कानून बनते और उसी रफ़्तार से बिसराते चले जा रहे हैं । अधिकारों की लडाई रोज़ लडी जा रही है किंतु जब बात कर्तव्यों की आती है तो अभी देश के समाज के अंदर , राष्ट्रीय गीत , राष्ट्रीय ध्वज आदि को सम्मान देने वाला राष्ट्रीय धर्म भी अभी कर्तव्य में नहीं जुड सका है । संविधान संशोधन की फ़ेहरिस्त लंबी से लंबी होती ही चली जा रही है । इसके बावजूद कानून ऐसे बन रहे हैं जिनके लिए कहा जाता है कि ,इन कानूनों में रह गई कमियों के कारण ही दोषी हर बार बच निकलते हैं , या फ़िर कि शायद ये छिद्र छोडे ही जानबूझ कर जाते रहे हैं । 


पिछले दिनों अन्ना के जनांदोलन को देखने आए एक विदेशी राजनीतिक सर्वेक्षक ने इस बात पर सुखद हैरानी जताई थी कि भारत में लोग किसी कानून के बनने और न बनने या फ़िर अच्छे कानून को बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालने के लिए सडक पर उतर आए । देश के तमाम राजनीतिक विशेलेषक भी ये बात भली भांति जानते हैं कि , अबसे पहले शायद ही कभी आम आदमी ने किसी कानून के बनने से पहले उसके बारे में न सिर्फ़ जाना बल्कि खुल कर अपनी राय उस पर रखी । नागरिक समाज के कुछ लोगों ने आगे आकर सरकार के सामने दोहरी चुनौती रख दी । पहली ये कि लोकतंत्र में जनता के, जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से अलग जाकर आम लोगों ने अपने बीच के कुछ लोगों पर ज्यादा भरोसा जताया । दूसरी ये कि , सिर्फ़ सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधि ही बेहतर कानून बना सकते हैं इस मिथक को तोडते हुए नागरिक समाज ने उसी कानून का बेहतर मसौदा सरकार के सामने रख दिया । यही वो सबसे बडी वजह आज राजनीतिक वर्ग को खाए जा रही है कि , यदि ये काम भी उनसे छीन कर जनता ही अपने हाथों में ले लेगी तो फ़िर पिछले साठ सालों से चला आ रहा राजनीतिक वर्चस्व तथा , देश , समाज , कानून तक पर पडता दबदबा खत्म हो जाएगा । 


जो सरकार पहले , नागरिक समाज और उसके किसी प्रतिनिधि के अस्तित्व और हैसियत तक को मानने को तैयार नहीं थी , उसने जब देश को इस मुद्दे पर आंदोलित होते हुए देखा और अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भी अन्ना बाबूराव हज़ारे के प्रभाव में आकर लोगों को सडक पर उतरने से रोकने के लिए कुछ भी करने में खुद को असमर्थ मानने समझने लगी तो थकहार कर इस मसौदे को संसद के पटल पर रखा गया । किंतु इस बीच जिस तरह से एक ऐसे कानून जिसे जनता समझ रही है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में प्रभावी सहायता और शक्ति मिलेगी , उस कानून को लेकर सभी राजनीतिक दलों के रवैये को देखकर जनता जिस तरह से चुनाव के समय देख लेने जैसी चेतावनी पर उतर आई तो सभी राजनीतिक दल भी इस बात को भलीभांति समझ और भांप गए कि दशकों से चला आ रहा ये सब छीना जा सकता है । सरकार के लिए दुविधा और मुश्किल और भी ज्यादा इसलिए बढ गई क्योंकि ,पिछले ही दिनों , देश के अन्य बडे मुद्दों जैसे काले धन को वापस लाने का मुद्दा , राईट टू रिकॉल और राईट टू रिजेक्ट का मुद्दा भी साथ साथ उठने लगा और दूसरी तरफ़ वर्तमान सरकार के बहुत सारे मंत्री तक बडे आर्थिक घोटालों के आरोपी बनके जेल जाने लगे । 


इस स्थिति में आने के बाद राजनीतिक दल मौन होकर ये सब देखते रहेंगे ऐसी अपेक्षा करना ही बेमानी होता । पिछले दिनों नागरिक समाज के उन प्रतिनिधियों जो कि सीधे सीधे इस लडाई के अगुआ रहे , उन्हें हर तरह से निशाने पर लिया गया । बाबा रामदेव के साथ तो पुलिस ने रात के अंधेरे में जो कुछ किया वो न्यायपालिका तक को नागवार गुजरा और उसने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार को तलब कर दिया । सिविल सोसायटी के सदस्य ,अन्ना बाबू राव हज़ारे ,किरन बेदी , अरविंद केजरीवाल और अब डॉ कुमार विश्वास तक को किसी न किसी मामले में नोटिस पकडा दिया गया ।


 इससे भी आगे बढकर , एक सदस्य प्रशांत भूषण से काशमीर विवाद से जुडा एक सवाल और उस पर दी गई प्रतिक्रिया के कारण उनके साथ मारपीट तक की गई । अगले दिन एक आम सभा में जाते समय अरविंद केजरीवाल पर चप्पल तक फ़ेंकी गई और अभी आगे जाने क्या क्या होना है । क्या इस देश की जनता को इतनी सी समझ नहीं है कि आयकर जैसे मलाईदार विभाग में एक राजपत्रित अधिकारी और दिल्ली पुलिस की वरिष्ठ अधिकारी जैसे प्रभावी पदों को लात मार कर नौकरी से बाहर हो जाने वाले सिविल सेवा के ये अधिकारी अपने नौकरी में भरपूर मलाई और भ्रष्टाचार कर सकने के मौके को छोड कर हवाई यात्रा करके पैसे बनाने जैसा महान घोटाला करेंगे । किसी को अपमानित करना , उसके साथ अचानक ही मार पीट कर अपनी बहादुरी दिखाना उतना ही आसान है जितना कि अपनी छत पर खडे होकर गली में किसी के ऊपर कंकड मार के छिप जाना । अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधने वाले क्या ये हिम्मत कर सकते हैं कि पहले देश की सबसे बडी प्रतियोगिता परीक्षा को पास करके , सरकारी सेवा में आएं , या फ़िर ये कि उनके सामने आकर मुद्दे पर आमने सामने बात करें । 


क्या देश के पास दूसरी किरन बेदी है , वो किरन बेदी जिसने न सिर्फ़ देश भर में , बल्कि विश्व भर में ख्याति अर्ज़ित की । प्रशांत भूषण से जनलोकपाल मुद्दे पर उनकी राय जानना तो प्रासंगिक लगता है किंतु उनसे जम्मू काशमीर विवाद पर प्रतिक्रिया लेकर मारपिटाई करना तर्कसंगत नहीं लगता खासकर जब वहीं से खुले आम कोई यह कह कर कि वो पाकिस्तानी एजेंट है , सरकार जो चाहे कर ले , सरकार की छाती पर मूंग दलता है और उसका बाल तक बांका नहीं होता और तो और कोई प्रतिक्रिया तक नहीं देता , जाने तब ऐसी सेनाएं कहां होती हैं । 


हरियाणा में अन्ना टीम द्वारा कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट न देने की अपील को चुनाव परिणाम आने से पहले तक इस रूप में दिखाया गया मानो अन्ना हज़ारे और कांग्रेस के बीच चुनाव हो रहा हो । इस तरह की बातें सामने आईं कि अगर कांग्रेस हरियाणा में नहीं हारती तो वो टीम अन्ना के आम आदमी के समर्थन के दावे की हार होगी ,लेकिन परिणाम निकलने के बाद फ़ौरन ये कहा जाने लगा कि शीतकालीन सत्र तक टीम अन्ना को प्रतीक्षा करनी चाहिए । भविष्य में सरकार का रूख जनलोकपाल को लेकर चाहे जो भी हो ,आम आदमी ने ईशारा कर दिया है कि अब वो सिर्फ़ तमाशाई बनकर नहीं बैठेगा ,भले इस बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सोच रहे एक एक व्यक्ति को नोटिस भेज दिया जाए या चप्पल जूते  मारे जाएं । 


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

इरोम की लडाई ..एक दशक का अनशन









रविवार ,2 अक्तूबर , को जंतर मंतर दिल्ली पर शांति मार्च का आयोजन करते , इरोम की लडाई में साथ आए दोस्त , जिनमें एक मैं भी था , और हमारे मित्र मयंक सक्सेना जी भी , जिनके एक संदेश से मैं यहां पहुंच सका














पिछले दिनों जनलोकपाल बिल को लेकर , जिस तरह से पूरे देश के अवाम के बीच एक उथल पुथल , व्यवस्था और सरकार के विरूद्ध  आक्रोश के साथ साथ पहली बार ऐसा हुआ कि किसी प्रस्तावित कानून के मसौदे और उसके प्रावधानों को लेकर जनता के बीच जम कर बहस चली । और इस बहस की न सिर्फ़ आवाज़ संसद तक पहुंची बल्कि थकहार कर उन्हें भी जनता की भावना को पटल पर रखना पडा । ये पिछले साठ सालों में पहली बार हुआ कि जनता ने खुल कर कहा कि यदि कानून समाज के लिए ही बनाए जाते हैं , आम लोगों के लिए बनाए जाते हैं तो फ़िर उन्हें बनाने का हक भी समाज को ही मिलना चाहिए , कम से कम उतना तो जरूर ही कि पिछले सभी बने हुए कानूनों में जानबूझ कर छोडे गए छिद्रों की गुंजाईश को कम किया जा सके । एक साल में दो दो बार आम जनता को सडक पर उतरने के लिए उद्वेलित करने वाले अन्ना हज़ारे ने जब अनशन का रास्ता अपनाया , और न सिर्फ़ अपनाया बल्कि अनशन की ताकत भी दिखा दी तो स्वाभाविक रूप से देश में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ हुई एक बहस को फ़िर से हवा दे दी । ये मुद्दा है , मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन से जुडा हुआ मुद्दा । यानि  The Armed Forces (Special Powers) Act,1958, (As Amended in 1972),को मणिपुर , पूर्वोत्तर राज्यों , आदि से समाप्त करना क्योंकि ये जीवन के नैसर्गिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है ।


यूं तो , इस समस्या से जुड कर अब कई पहलुओं पर लोग बहस कर रहे हैं , मसलन क्या पूर्वोत्तर का अलगाववाद , देश, सरकार , समाज   द्वारा उन क्षेत्रों की , की गई घोर उपेक्षा से ही पनपा है । लेकिन इरोम की लडाई का मुद्दा है भारत सरकार का ये कानून । वर्ष २००० में इसी निरंकुश कानून का सहारा लेकर सुरक्षा जवानों ने एक युवती के सामने दस लोगों को मार डाला ।इरोम शर्मिला ही वो युवती थीं जिन्होंने इस घटना को देखा था और उस दिन से लेकर आज तक इरोम ने इस निरंकुश कानून को मणिपुर पर जबरन थोपे जाने का विरोध करते हुए अनशन के रास्ते को अपना लिया । सशस्त्र सेना (विशेष अधिकार ) कानून १९५८ ,संशोधित १९७२ , एक ऐसा कानून जिसमें साधारण अधिकार से ज्यादा ताकत दी गई सुरक्षा बलों को । असम , मणिपुर, मेघालय , नागालैंड , त्रिपुरा और अरूणाचल प्रदेश व मिज़ोरम यानि पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून को लागू किए इस कानून के अनुसार , किसी भी अशांत क्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए , सुरक्षा बल के अधिकारी व सैनिक सिर्फ़ शक के आधार पर किसी को गोली तक मार सकते हैं । किसी के भी घर में घुस कर तलाशी ली जा सकती है और किसी को भी बिना वारंट के गिरफ़्तार किया जा सकता है । अशांत क्षेत्र का निर्धारण भी सुरक्षा बल ही स्थिति को देखते हुए कर सकते हैं । आज़ादी के इतने बरसों बाद भी देश की जो सरकार एक तरफ़ खुलेआम सबका कत्ल करने वाले आतंकियों को न्याय के नाम पर सालों सालों जीवित रखती है वहीं दूसरी तरफ़ पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों के साथ इतना गहरा भेदभाव जैसा कानून थोपे बैठी है कि , आज इन राज्यों में ये मानसिकता पनप चुकी है कि वो उस दिन को प्रदेश का काला दिन मानते हैं जिस दिन इन राज्यों का विलय पूरे देश के साथ कर दिया गया था ।







इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें जो विशेष तौर पर निकल कर सामने आई हैं वो ये कि क्या इतने सालों बाद भी पूर्वोत्तर राज्यों को , उनके निवासियों को , वहां के समाज , वहां की समस्याओं को मुख्य धारा में लाकर देखा समझा जा सका है । अपनी अलग शारिरिक छवि , रंग रूप की बहुलता के कारण , उत्तर पूर्व से बाहर उनकी पहचान , एक उपहासात्मक मानसिकता से जोड दी गई है । आज सिक्किम की बाढ हो या मणिपुर का कोई हादसा न वो राष्ट्रीय मुद्दा है और न ही वो मुद्दा ही रह पाता है । आज जिन कानूनों के लागू होने के कारण वहां के मूल लोगों की जिंदगी के अधिकार को ही छीन लिया गया है , उस अधिकार को हटाने तो दूर आज सरकार उस कानून पर बहस तक करने को तैयार नहीं है । इस अराजक और निरंकुश कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला से कोई सिर्फ़ और सिर्फ़ तभी मिल सकता है जब उसके पास मणिपुर के मुख्यमंत्री का आदेश हो । इतनी सख्ती , इतना डर , इतना अलगाव , क्यों , आखिर क्यों । उस देश में क्यों , जो अपने देश के , समाज के और देश के सम्मान के हत्यारे को भी बरसों तक जाने अनजाने देश का मेहमान बनाए रखती है । अपने देश के नागरिकों , से निपटने के लिए विशेष अधिकार वो भी इतना निरंकुश कि सिर्फ़ शांति स्थापना की प्रक्रिया में शक शुबहे पर भी किसी की भी जान ली जा सकती है , और सबसे बडी अमानवीय बात ये है कि ये कानून है , एक विधिक अधिकार ।


इरोम की लडाई को आज एक दशक बीत चुके हैं , और उसकी ये लडाई तब शुरू हुई थी जब मीडिया , आज के जैसा मीडिया नहीं था ,मीडिया ने बाज़ार का रूप नहीं लिया था , इतनी व्यावसायिकता नहीं आई थी । अब समय बदल गया है , पिछले कुछ सालों में पूरे विश्व में हो रहे परिवर्तनों में जिस तरह से आम जनांदोलनों ने भूमिका निभाई है और जन विचार , या एक दिशा देने में मीडिया ने जो भूमिका निभाई है उसे देखते हुए अब ये अपेक्षा की जा रही है कि यदि देश को भविष्य में अपना अस्तित्व और देशवासियों को खुद को बचाए रखना है तो फ़िर अब आम आदमी की हर मांग , उसकी हर बात को मुख्य धारा  में लाकर पूरे देश के सामने रखना  ही होगा ।ये लडाई शुरू हो चुकी है , और अब लोगों ने इरोम की लडाई को दिल्ली की सडकों पर उतारना शुरू कर दिया है । यदि इसी तरह आम आदमी की हर लडाई में देश का आम आदमी जुड जाए तो यकीनन देश का कल , कुछ अलग होगा ॥







अब ये तय कर लिया है कि , इस मुहिम और आम आदमी की हर मुहिम के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधे मिला कर चलेंगे ..अब घिसटना मंजूर नहीं है मुझे ...........

सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनलोकपाल , जनांदोलन और जागता समाज ....१






पिछली बार जब अन्ना हज़ारे जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे थे और जिस तरह से उसने सिर्फ़ पांच दिनों में अपना दायरा और प्रभाव बना दिया था उससे ये तो तय हो गया था कि अब इस देश की जनता के लहू का तापमान उतना गर्म तो जरूर हो चुका है कि , जरा सी आंच पे उबाल आ जाएगा और कांग्रेसी प्रभाव वाले शासनकाल को गौर से देखने पढने वाला व्यक्ति बडी आसानी से ये भांप सकता था कि हर समस्या को ये सरकार फ़ुंसी से फ़ोडा बनाए बगैर इसका हल नहीं तलाशेगी । यदि पिछले कुछ दिनों की गतिविधियों को गौर से देखा जाए तो बहुत सी बातें स्पष्ट दिख जाती हैं कि किस तरह से आज की स्थिति और शायद इससे ज्यादा बदतर की भी अपेक्षा सरकार पहले ही कर रही होगी । ठीक ऐन उस वक्त जबकि पता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी हो जाने के बावजूद जो पार्टी आज तक न गांधी को छोड सकी और न ही गांधी के आदर्शों को मान सकी , और बिना गांधी के उसका थिंक टैंक बिल्कुल ही बंद सा पड जाता है , ऐसे में भी सरकार के घटक दलों की नेता , यानि कांग्रेस के साथ , कुर्सी के लिए चिपके तमाम दलों की अगुआ खराब स्वास्थ्य के कारण अमेरिकी स्ट्रेचर पर लेट जाती हैं , जबकि सुना गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिकियों को ईलाज़ के चक्कर में भारत न जाने के लिए घुडका था ।


इंडिया अगेंस्ट करप्शन के मुहिम को एक उद्देश्य देते हुए जनलोकपाल बिल के रूप में परिवर्तन की चाह रखने वाले कुछ लोगों ने एक विचारधारा में खुद को पाते हुए इसे एक बडी लडाई की तरह लडने का निर्णय लिया । पिछले वर्षों में सूचना का अधिकार के लिए , ऐसी ही जद्दोज़हद और उसके प्रयोग से होने वाले बडे बडे सरकारी घपलों घोटालों के खुलासे से उत्साहित नागरिक समाज का ये गुट अब नए प्रयोगों और चुनौतियों के लिए तैयार हो रहा था । ये सिरा पकड कर वो लोग खुदबखुद इसके साथ जुडते चले गए जिनके मन में अब बदले जाने की , व्यवस्था के खिलाफ़ खडे होने की हिम्मत दिखाने की सोच पनप रही थी । युवा ब्रिगेड ने प्रशासनिक अधिकारियों की काबलियत , विधि विशेषज्ञों का मार्गदर्शन , मीडिया एवं आज के तमाम जनसंचार साधनों  सर्वश्रेष्ठ तालमेल , और एक सुनियोजित शैली को एक स्थान पर एक करके , देश में आजादी के बाद आम लोगों में राष्ट्रप्रेम जगाने का , कुछ गलत को रोकने के लिए झिंझोडने का और सबसे बढकर , आम जनों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करने और दिखने का अभूतपूर्व मौका दे दिया । इस आंदोलन के अगुआ अन्ना हज़ारे को बनाए जाने के पीछे जिसका भी विचार था वो कितना काबिल और पुख्ता था  ,इस बात का अंदाज़ा इसी से हो जाता है कि ,तमाम कोशिशों और चालों के बावजूद भी सत्ता श्री बाबूराव किसन हज़ारे के खिलाफ़ कुछ भी नहीं निकाल पाई । जो कुछ निकाला भी गया उसकी गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि सरकार के  इन आरोपों पर जनप्रतिक्रिया के रूप में सरकार का उपहास उडाते सैकडों चुटकुले सुने सुनाए गए उन दिनों ।



देश के पिछले कुछ वर्ष , हालांकि वैश्विक राजनीतिक हलचलों के बीच भी काफ़ी कुछ खुद को बचाए होने के बावजूद इतना ज्यादा उथल पुथल मचा गया कि लोगों का जो गुस्सा पिछले साठ सालों से लोगों द्वारा बहाने से मुल्तवी किया जा रहा था , वो अचानक ही फ़ट पडा । इस गुस्से का सही उपयोग और इस गुस्से को एक सही दिशा देकर इसे जनांदोलन के रूप में खडा करने का काम किया इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने । देश में भ्रष्टाचार आज इस कदर बढ गया था कि कहीं न कहीं , लगभग अस्सी नब्बे प्रतिशत के स्तर को छूने के कारण एक ऐसी मानसिकता बन गई कि भ्रष्टाचार अब इस देश से नहीं हटाया जा सकता । न्यायपालिका जो अब तक बडे ही धाकड रूप से आम जनता को अपने कानूनी पक्षों से संरक्षित किए हुए थी वो भी पिछले दिनों कुछ डगमगाती सी दिखी । देश में संचारतंत्र और वैश्विक आवागमन ने भारत के शहरी वर्ग को अपने काम में मशगूल होने के बावजूद , अधिकारों के प्रति सजग होने का मौका दिया । ऐसा नहीं था किस ऐसा सिर्फ़ समाज की मुख्यधारा में लगे हुए लोग सोच रहे थे , बाबा रामदेव ने अपने धर्मक्षेत्र को किनारे करते हुए देश के बडे आर्थिक भ्रष्टाचार यानि कालेधन की समस्या को उठा कर एक अलग आवाज़ बुलंद की । ये अलग बात रही कि , ऐसे मुद्दों पर सरकार और प्रशासन से लडने वाला अनुभव और सुयोजना की कमी ने सरकार के कूटनीतिज्ञों को ये मौका दे दिया कि उन्होंने बाबा रामदेव और मुद्दे को भी कुछ दिनों के लिए टाल दिया ।


मुद्दे के रूप में लोकपाल बिल जो कि संसद में महिला आरक्षण समेत कुछ ऐसे ही अभागे बिलों में से एक था जो सत्रों या बरसों से नहीं दशकों से लटका हुआ चला आ रहा था । सरकारी लोकपाल बिल का मसौदा पहले सी ही रुग्ण था रही सही कसर वर्तमान सरकार के मंत्रियों की घोटालों के प्रति निष्ठा , केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति का विवाद , और चरम पर पहुंचती महंगाई के लिए जिम्मेदार भ्रष्टाचार ने ये तय कर दिया कि अब जनता बर्दाश्त नहीं करना चाहती है । जनलोकपाल का प्रारूप तैयार करने का जिम्मा उठाया उस टीम ने जिसे आज सिविल सोसायटी कहा जा रहा है , इस बिल की इबारत लिखने वालों में दो तेज़ तर्रार और अपने अपने क्षेत्र के बेहतरीन प्रशासक , और दो विधि विशेषज्ञ पिता पुत्र ने अपनी काबलियत का पूरा प्रमाण देते हुए एक ऐसा बिल प्रारूप तैयार किया जिसमें से बचने के रास्ते तलाशाना बेहद कठिन साबित होता । ज्ञात हो कि,कानून बनने बनाने में जनता की इच्छा तो दूर बरसों तक आम नागरिकों को बने हुए कानूनों का पता ही नहीं होता और शायद इसलिए भी इसे वो लोग आसानी से तोड पाते हैं , इस लिहाज़ से भी ये पहली वो पहल रही जिसमें पूरे देश ने एक कानून के मसौदे को लेकर जम कर बहस की , खूब लिखा पढा गया , अगर इसे समर्थन मिला तो तीव्र प्रतिक्रिया और आरोप भी झेलने पडे । इस आंदोलन को प्रचार की धार देने के लिए  , मीडिया गुरू और प्रचार प्रसार का जिम्मा संभाले टीम अन्ना के एक सहयोगी तथा , आज की हर तकनीक से लैस युवा ब्रिगेड का तालमेल कुछ ऐसा मिला कि आंदोलन की तैयारी मीडिया ने भी वार लेवल पर की और चौबीस घंटे की पल पल की खबर सबके सामने रखी । ये मीडिया के कैमरों का भी सौभाग्य रहा कि पिछले तेरह दिनों में देश के करोडों चेहरों को बडी करीबी से पढा , चौबीस घंटे लगातार आम आदमी के साथ आंख से आंख मिलाए , और दूसरी तरफ़ सत्ता के गलियारों में चल रही एक एक गतिविधि भी ।


जंतर मंतर पर , कुछ माह पहले 


इस लडाई की शुरूआत अब से कुछ महीनों पहले इस बात को लेकर हुई कि लोकपाल बिल की प्रारूप समिति में से आधे सदस्य सीधे जनता में से ही होने चाहिएं जिसे सरकार ने सिर से ही नकार दिया । और पहले से ही तय हुआ अनशन शुरू किया , धरनों और प्रदर्शन के लिए अब तक एक स्थापित हो चुका बिंदु जंतर मंतर । इस मुहिम की शुरूआत बहुत धमाकेदार नहीं होकर भी इतनी तो थी ही कि पहले दिन से ही इसे व्यापक मीडिया कवरेज मिला । पांचवें दिन जाते जाते सरकार लंबलेट हो चुकी थी तथा सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों के साथ वार्ता की सहमति पर आंदोलन को स्थगित किया गया लेकिन उसी वक्त अन्ना ने ये कह दिया था कि अगर इन तमाम बैठकों के बावजूद सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक मजबूत कानून के रूप मे ,ज्नलोकपाल बिल को गंभीरता से नहीं लिया तो सोलह अगस्त से इस आंदोलन को पुन: खडा कर दिया जाएगा । इस बीच जो कुछ हुआ और होता चला गया उसने न सिर्फ़ सरकार की मंशा को ज़ाहिर किया बल्कि एक एक करके खुले घोटालों की पर्तों ने आम जनता का क्रोध और क्षुब्धता को भी चरम पर पहुंचा दिया ।





कल इससे आगे बात करेंगे .....

रविवार, 12 जून 2011

सुन रहे हो सत्तावालों , एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .......Right to recall

चित्र पर क्लिक करके आप Right to recall ..फ़ेसबुक समूह मंच पर पहुंच सकते हैं 




अभी देश जिस परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है वो न सिर्फ़ देश के राजनीतिक सामाजिक वर्तमान और भविष्य के लिए संवेदनशील और महत्वपूर्ण है बल्कि पूरे विश्व में फ़ैले  हुए भारतीय समाज के उन तमाम लोगो के लिए भी जिन्हें वहां दूर बैठे अब भी इस देश की चिंता खाए जाती है , जो समुंदर पार होते हुए भी हिंदी समाचार चैनल देख रहे होते हैं , सिर्फ़ अपनों की खबर के लिए , पिछले कुछ दिन और काल इस लिहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण रहे हैं । 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ इस सरकार ने घोटालों और घपलों का जयमाल अपने गले में वरण किया है बल्कि इससे पहले भी आम भारतीय को ऐसी ही नायाब सरकार और अनमोल मंत्रीगण मिलते रहे हैं । खुद इसी राजनीतिक पार्टी की एक सरकार जो मौनी बाबा नामक एक प्राणी चलाया करते थे , ने उस समय घपलों और घोटालों का एक नया राष्ट्रीय(अंतरराष्ट्रीय भी हो सकता है ) रिकॉर्ड अपने नाम किया था । किंतु अब परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं और बहुत तेजी से बदलती जा रही हैं । चाहे दो रोटी की तलाश में गाव से निकल कर शहरों आ पहुंचे लोगों को रोटी मिली न मिली ये तो पता नहीं किंतु अक्ल जरूर मिल गई , इतनी तो जरूर ही कि वो हजारों लाखों के न सही करोडों अरबों के घोटाले की  खबरों को समझ सके । रही सही कसर , टीवी , रेडियो और इंटरनेट ने पूरी कर दी है । अब तो कई बातें लोगों को सरकार से पहले ही पता चल जाती हैं , और अक्सर सरकार से ज्यादा पता लग जाती है । और यही बात सरकार को सबसे ज्यादा नागवार गुजरती है कि आम जनता को किसी भी सूरत में सरकार से ज्यादा पता नहीं लगना चाहिए । अब देखिए सरकार के अलावा पब्लिक को कॉमनवेल्थ खेलों के खेल के बारे में पता चल गया तो हो ही गई न गडबड । अब बेशक इस खेल को भारतीय खिलाडियों की सफ़लता के लिए याद किया जाए या न किया जाए , कलमाडी के कुकर्मों के लिए जरूर याद किया जाएगा । खैर , तो कहने का मतलब ये कि अब सरकार चतुर है तो पब्ल्कि भी चालाक न सही कम से कम होशियार तो हो ही चुकी है ।  


अब जनता ये बात बहुत ही अच्छी तरह से समझ चुकी है कि सर्प सिर्फ़ अलग अलग रंगों की केंचुली धारण किए रहता है किंतु भीतर से तो वो सर्प ही रहता है और सांप के चरित्र के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इसलिए उन्हें काबू में लाने के लिए अब कुछ कुशल सपेरों ने बागडोर थाम ली है । न सिर्फ़ थाम ली है बल्कि अब उन्होंने अपने अपने फ़ंदों में सत्ता और सरकार को फ़ंसाना भी शुरू कर दिया है । जनता तो पहले से ही परिवर्तन की बाट जोह रही थी , उसे तो ये मौका मानो मुंह मांगी मुराद की तरह मिल गया है । आज आम आदमी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड रहा है कि वो जिनके पीछे चल कर सरकार के सामने सीना तानने जा रहा है , उसकी अपनी क्या व्याख्या है , वो तो बस उस जनाक्रोश का एक हिस्सा बन जाने को आतुर है ताकि कल को कोई ये न कहे कि जब क्रांति बुनी जा रही थी तो तुमने भी देखा तो था न यकीनन । सिविल सोसायटी , योग गुरू ,  स्वनिर्मित जनसगठनो  का चेहरा लिए हुए आम जनता ने सरकार और सत्ता के सामने उन प्रश्नों को न सिर्फ़ रखना शुरू किया जिनका उत्तर वे बरसों से चाह रही थीं । पहले सूचना के अधिकार के लिए कानून की लडाई में मिली जीत और उससे आए बदलाव ने इस लडाई में एक उत्प्रेरक का काम किया । इसके बाद जनलोकपाल बिल के लिए टीम अन्ना द्वारा छेडा गया आंदोलन जल्दी ही पूरे देश भर का समर बन गया । इसके साथ ही योग गुरू रामदेव ने भी एक मुद्दा विदेशों मे काले धन की वापसी के लिए कठोर कानून बनाए जाने की मांग को लेकर एक नया आंदोलन छेड दिया । 


सबसे अहम बात जो सामने निकल कर आई वो ये कि इन और इन जैसे तमाम प्रयासों के साथ जिस तरह का सलूक सरकार और उसके मंत्रियों ने किया या अब भी कर रहे हैं और उससे भी बडी बात कि जिस तरह का घोर उपेक्षित रवैय्या , प्रधानमंत्री , यूपीए अध्यक्षा , और तेज़ तर्रार महासचिव और युवा लोगों में खासे लोकप्रिय माने जाने वाले युवा नेता ने अपना रखा है उससे तो स्थिति और स्पष्ट हो गई है आम जनता के सामने । जनलोकपाल बिल और विदेशों में छिपे काले धन के बिल को लाए जाने के दबाव को बेशक सरकार कुछ दिनों के लिए टला हुआ मान रही हो , लेकिन ऐसा है नहीं वास्तव में । बल्कि अब तो ये साफ़ हो गया है कि सरकार को अपना वजूद और सत्ता को बचाए रखने के लिए दो में से एक रास्ता चुनना होगा । भ्रष्टाचार के पाले में खुद को रखें या फ़िर कि जनता द्वारा मांगे जा रहे कानूनी अधिकारों को बना कर उनके साथ रहें । सरकार को ये ध्यान में रखना चाहिए कि , जनलोकपाल बिल , विदेशों मे छिपे काले धन को वापस लाने के लिए कानून और राईट टू रिकॉल यानि प्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून , जैसे नियम और अधिकार जनता ने अपने किसी फ़ायदे के लिए नहीं मांगे हैं , ये उसी लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है जिसकी रक्षा करने का दावा , इनका पुरज़ोर विरोध करने वाले राजनेता दशकों से करते आए हैं । अब वक्त आ गया है कि जनता सरकार की आंखों में आंखें डाल के पूछे कि बताओ , ये कानून क्यों नहीं बन सकता , और कब कैसे बनेगा ? 


इस मुहिम को एक और अस्त्र देते हुए हमने एक नई लडाई की योजना बनाई है - Right to recall - यानि जनप्रतिनिधि वापस बुलाओ कानून । सीधे सरल शब्दों में समझा जाए तो राजनेताओं सेीक बार चुनाव जीत कर ,उन कुर्सियों पर बैठे रहने का अधिकार छीन लेना जिन्हें पाते ही वे सत्ता के मद में न सिर्फ़ चूर हो जाते हैं बल्कि देश , समाज और कानून से भी बहुत दूर हो जाते हैं । आज राजनेताओं के लिए राजनीति समाज सेवा नहीं बल्कि विशुद्ध मुनाफ़े वाला कारोबार मात्र बन कर रह गया है । अब आकलन विश्लेषण किया जाता है कि यदि छोटे स्तर पर चुनाव जीतने में पैसा लगाया जाए तो कितना मुनाफ़ा होगा और बडे स्तर पर कितना , कारण एक सिर्फ़ एक , एक बार कुर्सी मिल जाए बस । तो क्यों न उनके सरों पर एक अनिश्चितता की ऐसी तलवार टांगी जाए कि जिसकी धार उसे अपने कर्तव्य को न भूलने के लिए विवश कर सके । इसी उद्देश्य के साथ फ़ेसबुक पर एक समूह का गठन किया गया है ...Right to recall  ।यहां ये जानना समीचीन होगा कि इस कानून को अमेरिका के अठारह राज्यों में मान्यता मिली हुई है अब तक दो राज्यों की सरकार इस अधिकार के उपयोग से जनता ने गिरा दी । भारत में भी कई स्तरों पर मध्यप्रदेश , और छत्तीसगढ जैसे राज्यों में इसे सफ़लतापूर्वक आजमाया जा चुका है ।


सभी मित्रों के स्नेह और साथ का ज़ज़्बा इतना शानदार रहा है कि बनने के मात्र चौबीस घंटों के भीतर ही इसकी सदस्य संख्या छ: सौ के पार जा पहुंची है । फ़िलहाल तो इसकी सारी रुपरेखा तय करनी बांकी है , लेकिन हम बहुत जल्दी ही सरकार को ये संदेश देने जा रहे हैं कि अभी उसकी मुसीबतें खत्म नहीं होने जा रही हैं । इस समूह मंच पर हम प्रति सप्ताह एक बहस का आयोजन करेंगे , जो बाद में ब्लॉग्पोस्ट के जरिए ब्लॉगिंग की दुनिया से रूबरू होगा और उसके बाद उसका सार , अन्य माध्यमों ,पत्र पत्रिकाओं के रास्ते आम आदमी तक । जल्दी ही समूह कानूनविदों की राह और सलाह से इसकी आगे की तैयारी के बारे में योजना बनाएगा । तो आप भी जुडिए न इस मुहिम में हमारे साथ कि आइए बता दें इस सरकार को , इस व्यवस्था को कि ,,,,,सुन रहे हो सत्तावालों , एक और जनांदोलन जन्म लेने को है .

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