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शनिवार, 9 मई 2020

ये उन दिनों की बात थी



स्कूल के दिन थे वो और मैं शायद आठवीं कक्षा में , दानापुर पटना के केन्द्रीय विद्यालय में पड़ता था | उन दिनों स्कूल की प्रार्थना के बाद बच्चों को सुन्दर वचन , समाचार शीर्षक , कविता ,बोधकथा कहने सुनाने का अवसर मिलता था | अवसर क्या था बहुत के लिए तो ये सज़ा की तरह होता था क्यूंकि चार लोगों के सामने खड़े होकर कुछ सार्थक बोलना यही सोच कर बहुत के पसीने छूट जाया करते थे |

किन्तु उन्हीं दिनों कमज़ोर और अंतर्मुखी बच्चों को प्रोत्साहित करने की नई योजना पर काम करते हुए अध्यापकों ने नए नए बच्चों को ये जिम्मेदारी सौंपनी शुरू की | मुझे याद है की ऐसे ही एक सहपाठी का जब बोलने सुनने का अवसर आया तो सब कुछ अचानक भूल जाने के बाद उसने खुद ही ये कहने के बाद कि कोई बात नहीं आप यही सुन लें कह आकर कोई संस्कृत का श्लोक सुना दिया | बाद में कक्षा में उसे संस्कृत के अध्यापक महोदय से डांट और स्नेह दोनों मिला | स्नेह इसलिए कि उसने संस्कृत का श्लोक सुनाया और डांट इसलिए कि सुनाने से पहले ये क्यूँ कहा कि कोई बात नहीं और कुछ न सही तो यही सुनिए |

मुझे अन्दाजा था कि देर सवेर मेरा नंबर भी आने वाला है | एक दिन तुकबंदी करते करते मैंने एक छोटी सी कविता लिख डाली जिसका शीर्षक था " बिल्लू का सपना " | इसे मैं बार बार पढ़ कर खुश होता और कुछ ही दिनों में मुझे ये याद हो गई | थोड़े दिनों बाद ही मेरी बारी आ गयी | पूरे स्कूल के सामने स्टेज पर खड़े होने की वो झिझक वो डर इस कदर हावी थी कि उसे शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल था | जैसे ही मैंने कहा मैं अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ आपको सुनाना चाहता हूँ अब पूरे विद्यालय सहित चौंकने की बारी मेरे शिक्षकों की थी |

खैर काँपती हुई टाँगे और बुरी तरह लडखडाते हुए स्वर से जब मैंने वो कविता समाप्त की पूरा स्कूल और अध्यापकों सहित तालियों की तड़तडाहट से गूंज रहा था | उसके बाद मेरा डर छू मंतर हो चुका था अगले चार सालों तक मैं स्कूल की किसी भी कविता , रचनात्मक प्रस्तुति प्रतियोगिता का निर्विवाद विजेता और लोकप्रिय विद्यार्थी हो चुका था |

बहुत से साथी मज़ाक में मुझे कवि जी कवि जी कह कर चुहल करते थे | ऐसी ही एक प्रतियोगिता में एक बार मैंने अति उत्साह में बिना हाथ में कविता अंश लिए ही उसका पाठ करने पहुँच गया और बिलकुल शून्य हो गया | मेरे से ज्यादा सब निराश हुए और प्रतियोगिता से बाहर होने के बावजूद भी सबने दोबारा मुझे स्टेज पर बुला कर मुझसे वो कविता सुनी | वो भी मेरे लिए एक बड़ा सबक था |

कविता पाठ का ये सिलसिला फिर शुरू हुआ मेरे सेवा में आने के बाद जहाँ अनेक कार्यक्रमों का संचालन करते हुए अधिकारियों को ये भान हो गया था कि मैं कविता ,शेर , ग़ज़लें आदि कह पढ़ लेता हूँ | आवाज़ भारी होने के कारण (बकौल उनके ) सुनने में भी अच्छी लगती है |

इसके बाद होने वाले तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में न सिर्फ मेरी उपस्थिति अपेक्षित और अनिवार्य सी हो गई बल्कि अक्सर शुरुआत ही मेरी बैटिंग से होती है , और बहुत सी राजनीतिक सभाओं , शाखा के बौद्धिक में , रेडियो टीवी में , सैकड़ों हज़ारों की भीड़ को भी मैं बहुत ही सहजता के साथ संबोधित और सम्मोहित कर पाता हूँ |

कविता पाठ ,भाषण कला के अतिरिक्त नाटक में अभिनय का अवसर भी मुझे जब जहां मिला मैंने उसे भरपूर जिया | स्कूल कालेज के दिनों में बहुत कम शिरकत करने के बावजूद गाँव में काली पूजा के दौरान खेले गए एक नाटक के इकलौते नारी किरदार "वनजा" को मैंने इस तरह निभाया था कि मुझे स्नेह स्वरूप गाँव के बहुत से सम्मानित व्यक्तियों से नकद राशि दी |

विधि की पढाई के दौरान लगने वाले विधिक साक्षरता शिविरों में खेले गए नुक्कड़ नाटकों की तो धुरी ही मैं होता था और इनमे ऐसा डूब जाता था कि साथी सहपाठी भी उफ्फ्फ उफ्फ्फ कर उठते थे | सेवा में आने के बहुत दिनों बाद एक भोजपुरी धारावाहिक में अभिनय के लिए आए प्रस्ताव को भी मुस्कुरा कर ठुकराना पडा था मुझे |

लेकिन आज भी वो स्टेज पर पहली बार कविता पाठ के दौरान अपनी टांगों का कांपना और आवाज़ की थरथराहट मैं बिलकुल नहीं भूला हूँ |

तो  उन दिनों की बात थी

शनिवार, 11 नवंबर 2017

ये उन दिनों की बात थी ..







आजकल जो दीवानापन युवाओं का मोटरसाईकिल और युवतियों का स्कूटियों के प्रति और बच्चों की ललक भी स्कूटी दौडाने की और दिखाई देती है , ठीक वैसी ही और वैसी ही क्यूँ , बल्कि उससे कहीं ज्यादा (ये भी मैं बताउंगा कि उससे ज्यादा कैसे और क्यूँ ) उन दिनों में हमें और हमारी उम्र के बच्चों में सायकल के प्रति हुआ करती थी | अरे नहीं , उन दिनों बच्चों की सायकल के नाम पर सिर्फ बहुत छोटे बच्चों वाली ट्राय सायकल का ही चलन था सो , घर में पिताजी की सायकल, जिसकी सीट से बस थोड़ा सा ऊपर हमारी मुंडी पहुंचा करती थी , उसके प्रति हमारा दीवानापन था | और फुर्सत के समय जब कभी वो सायकल बिना ताले के मिल जाती थी समझिये कि वो पल , वो समय यादगार बन जाता था |

उन दिनों सायकल भी अन्य सबकी तरह चुनिन्दा ब्रांड में ही उपलब्ध हुआ करता था , तो वो हुआ करता था एवन , एटलस और हरक्यूलस | और सायकल ही क्यूँ उसके बेकार हो चुके टायर को भी नहीं छोड़ा जाता था , वो हमारा सबसे पसंदीदा दोस्त हुआ करता था , हाथ में छडी लेकर या फिर सीधा हाथ से ही , उस टायर को सडकों गलियों में उसकी पीठ पर शाबासी के अंदाज़ में थपकाते हुए दूर दूर तक दौड़ना और ये इक्का दुक्का नहीं बल्कि पूरी टोली निकला करती थी अपने अपने इकलौते टायर को लेकर | और इस नायाब खेल से हमारा परिचय भी लखनऊ के कैंट एरिया (तोपखाना के आसपास ) वाले फ़ौजी कालोनी में ही हुआ था | पिताजी की पोस्टिंग उन दिनों लखनऊ सेन्ट्रल कमांड के रिक्रूटमेंट सेंटर में हुआ करती थी | मौक़ा मिला और हम सायकल को स्टैंड (बड़ा ही कठिन हुआ करता था उसे स्टैंड से उतारना खासकर वो बीच वाले स्टैंड से ) से उतार कर फुर्र ...|

ऊँचाई और वजन के हिसाब से , वो भी अपनी औकात से बाहर था सो सीट के ऊपर दाहिना कंधे को टिका कर , बीच में पैर घुसा कर विशेष आसन में (जिन्हें उन दिनों हम कैंची स्टाईल कहा करते थे ) उसे पैडल मार कर चलाने की भरपूर कोशिश करते थे और जब सायकल पूरी स्पीड से चल देती थी तो बस कयामत आ जाती थी क्यूँकी ब्रेक मार कर रोकने जैसी उत्तम ड्राईविंग कतई नहीं आती थी सो आजकल जैसे हमारी महिला ब्रिगेड दोनों तरफ अपने पैर फैला कर स्कूटी रोकती हैं , उससे भी कहीं अधिक छितरा के अपनी दोनों टाँगे खोल के सड़क पर घिसटा कर सायकल को रोकने की कोशिश होती थी | और इस बीच यदि सामने से कोई आ गया तो फिर उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर इस रोमांचक सायकल ट्रेनिंग का अस्थाई अंत हो जाता था | वापसी में छिले हुए घुटने और कुहनियाँ इस बात का पूरा सबूत होती थीं कि कितनी शिद्दत से मेहनत की जा रही है |

थोड़े और बड़े हुए तो सायकल के कैरियर पर गेंहू की बोरी बाँध कर उसे पिसवाने के लिए आटे चक्की तक ले जाने का कार्यक्रम भी किसी स्टंट से कम नहीं होता था ,जहां से पच्चीस पैसे की वो गुड में मूंगफली के दाने चिपके वाली पट्टी खाते हुई घर वापसी होती थी |थोड़े और वीर हुए तो गैस का सिलेंडर भी पुराने सायकल की ट्यूब से बाँध कर रिफिल कराने का फीयर फैक्टर वाला स्टंट भी बखूबी अंजाम दिया गया | मुझे पूरी तरह सायकल चलाने के लिए दसवीं पास करने के बाद ही मिली थी | और उसके बाद ग्राम जीवन में खेतों की मेड पगडंडी कच्ची सड़कों पर चलाते हुए हम उसके चैम्पियन होते गए |


घर से मधुबनी कुल 14 किलोमीटर आना व् जाना , वो भी पूरे कालेज की पढ़ाई के दौरान , ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सुकून भरे सफ़र जैसे रहे | गाँव की स्वच्छ हवा में हम खुद कब उस सायकल पर हवा से बातें करने लगते थे हमें पता नहीं चलता था | मुझे याद है कि एक मित्र के कहने पर हम सिर्फ 35 मिनट में ये दूरी नाप कर मधुबनी के मिथिला टाकीज में फिल्म "लैला मजनू " देखने जा पहुंचे थे | उन दिनों सायकल का टैक्स भी लगता था जो दो रुपये हुआ करता था और एक लोहे का पत्तडनुमा टुकड़ा सायकल के टायरों में फंसा कर टैक्स भुगतान प्रमाण चिन्ह लगा दिया जाता था ...|


सायकल से मेरी मुहब्बत के साक्षी न सिर्फ मेरे परिवारवाले बल्कि गाँव के संगी साथी भी रहे और मैं अब भी शायद ही कभी ग्राम प्रवास के दौरान सायकल से गाँव से मधुबनी आने जाने का लोभ छोड़ पाता हूँ और सबके लाख मना करने के बावजूद कम से कम एक बार तो सायकल से पूरे शहर का चक्कर लगा आता हूँ ....
ये उन दिनों की बात थी .....हाँ ये उन्हीं दिनों की बात थी ..

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

मकर संक्रांति वाया लाय चुडलाय एंड खिचडी

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सभी मित्रों को मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं








Photo: आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !


 मकर संक्रांति के दिन से जुडी बचपन की जो बहुत सारी यादें हैं उनमें से सबसे पहली है जनवरी की सर्द कोहरे भी सुबह में ठंडे ठंडे पानी से नहाना । और नहाना इसलिए भी कंपल्सरी था या कहें कि बिना किसी दबाव के इस कंपल्सरी रूल को मान लिया जाता था क्योंकि नहाने के तुरंत बाद ही तो लाय चुडलाय तिलबा ( मुढही , चिवडे और तिल को भून कर गुड की चाशनी में लपेट कर बनाए गए छोटे बडे लड्डू ) मिलना होता था ।


इस सुबह का इंतज़ार असल में तो साल के शुरू से ही रहता था लेकिन जब एक दिन पहले मां को चूडा , मुढही तिल गुड आदि सामग्री लाते और फ़िर उन्हें भूनते देखते थे और उसकी महक रसोई से निकल कर घर के सारे कमरों में चली जाती थी तो होमवर्क करते करते भी मन और जीभ दोनों ही रोमांचित हो जाती थी । ठंडे पानी से नहाने में कोई खास उर्ज़ नहीं होता था क्योंकि वैसे भी उन दिनों कौन सा गीज़र हीटर का जमाना था मगर हम थे तो आखिर बच्चे ही ।

मुझे याद है कि नहाने के बाद सबसे पहला काम होता था मां द्वारा एक रस्म का निभाया जाना जिसे हमारे मिथिला समाज में आज भी बदस्तूर निभाया जाता है । मां एक कटोरे में भीगे और फ़ूले हुए चावल , सफ़ेद तिल और गुड को मिला कर तैयार की हुई सामग्री हम सब बच्चों को बारी बारी से अपने हाथों से मुंह में खिलाते हुए पूछती थीं " तिल चाउड बहबैं " हम कहते थे "हं" । पूछने पर मां बताती थी कि मैंने ये खिलाते हुए पूछा है कि इसका मतलब वृद्धावस्था में तुम सब संतान हमारा बोझ वहन करोगे न , और हम कहा करते थे हां । जाने वो हम कितना कर पाए या नहीं , और सच कहूं तो मेरे मां बाबूजी ने तो हमें मौका ही नहीं दिया ।

इसके बाद बारी आती थी दिन के खाने की । पूरे बिहार में इस दिवस को खिचडी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है , कारण यही कि उस दिन लगभग हर घर में दिन का खाना यही होता था , खिचडी और उसके चार दोस्त , अरे नहीं समझे , मां के शब्दों में

"खिचडी के चार यार
घी, पापड , दही अचार "



उस दिन के खिचडी का स्वाद ही अनोखा जान पडता था । मुझे तो याद है कि न सिर्फ़ अपने घर के खाने में बल्कि यदि कहीं न्यौता दावत भी खाने जाते थे तो भी खाने में यही खिचडी और उसके चार यार ही होते थे । गांव बदल गए , समाज बदल गया और बहुत कुछ हम भी बदल गए नहीं बदला तो ये मकर संक्रांति और नहीं बदला तो खिचडी खाने का रिवाज़ । कहते हैं कि इस पर्व के बाद शीत ऋतु का प्रकोप कम होना शुरू हो जाता है । अब बदलते पर्यावरण के प्रभाव में ये अब कितना सच झूठ हो पाता है ये तो ईश्वर ही जाने मगर मगर संक्रांति का पर्व अब भी बहुत ही उल्लास और हर्ष के साथ पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है । चलते चलते आप सबको पुन: बधाई और शुभकामनाएं ।


बुधवार, 29 जून 2011

बचपन कभी लौट के नहीं आता....कुछ यादें , कुछ बातें




बचपन , और उसकी यादें । सच कहूं तो बचपन खुद ही यादों का टोकरा होता है , कमाल की बात ये है कि बचपन न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि हमारे अपनों के लिए भी हमारा बचपन उनकी यादों का टोकरा ही होता है । एक ऐसा टोकरा , जो समय के साथ और भी भरता जाता है , नई यादें जुडती जाती हैं लेकिन फ़िर भी बचपन की यादों का तो जैसे एक अलग ही सैक्शन होता है । और बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं , तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं ।

मुझे अगर बचपन की सारी यादों में कुछ चुनिंदा यादें अलग करने को कहा जाए तो मैं यकीनन , ही गर्मियों की छुट्टियों के उन दिनों को याद करता हूं जो हम अक्सर नानी गांव में बिताया करते थे । पिताजी फ़ौजी थे और हम सेंट्रल स्कूल के बच्चे , हमारे दो महीने की गर्मियों की छुट्टियां पापा के लिए दो महीने की एनुअल लीव में कंवर्ट हो जाती थी । उन दिनों रेल में सफ़र करने की जो यादें , वो पुराने स्टेशन , चारबाग लखनऊ का , तांगों से खचाखच भरा हुआ ,वहां से सफ़र शुरू होकर खत्म होता था बिहार के मधुबनी जंक्शन पर । आह क्या सफ़र होता था कमाल का , सुराही और छागल का जमाना था वो , स्टेशन पर गाडी रुकते ही पानी के लिए भागमभाग, सुराही में डाल कर उसके खिडकी के किनारे रख देना , सुना था कि जितनी हवा लगती है सुराही को पानी उतना ठंडा हो जाता है , और वाह क्या होता था ठंडा । उफ़्फ़ वो मिट्टी की सौंधी खुशबू , फ़िर पूरी जिंदगी मयस्सर नहीं हुआ वो अमृत । मधुबनी पहुंचते पहुंचते हालत ऐसी हो चुकी होती थी कि मानो दंगल लड के आ रहे हैं । 

स्टेशन पर पहला काम होता था , मां का , हमें प्लेटफ़ॉर्म पर लगे चापाकल पर जितना हो सके मांज के पहचाने जाने लायक करना , अगर पापा का मूड ठीक है और वे बक्से को दोबारा से खोल बंद करने में गुस्सा नहीं किए जाने जैसे दिख रहे हैं तो फ़िर आपको एक अदद जोडी हाफ़ पैंट और टीशर्ट भी प्रदान की जा सकती है । स्टेशन से आगे का सफ़र तय होता था कटही गाडी (हां ये बैलगाडी जैसा होता था लेकिन पीछे की बॉडी और यहां तक कि उसके पहिए भी सिर्फ़ लकडी का बना होता था ), समय लगता था तकरीबन चार या सवा चार घंटे । ओह क्या सफ़र होता था वो , नदिया के पार का कोन दिसा में ले के चला रे बटोहिया का गाना याद है आपको , बस वही सिनेमा चलता था समझिए , रेत वाले और मिट्टी वाले रास्तों में जब वो कटही गाडी फ़ंसती थी तो हमारे मौसेरे भाई जो उसके डरेवर हुआ करते थे , वे कूद के आगे से बैलों को आव आव आव आव आव आव करते थे और हम बच्चे , नीचे उतर के मस्ती करने लगते थे । रास्ते में लगे हुए आम के पेडों में वो लदे फ़दे आम । कई बार इतने लदे हुए कि नीचे से सोंगड (डाली को अबांस या लाठी का सहारा देना ) तक लगे रहते थे । हम ऐसे हुलस जाते थे कि कूद के तोड लिया जाए या कि मार जाए मिट्टी का ढेला और आम हाथ में । कई बार कर भी डालते थे , आम तो क्या खाक आना था , बगीचे वाले जरूर आ जाते थे फ़िर देखते तो कहते , अरे ई सहरूआ सब है , दे दो , आम दो , गोपी आम सब (गोपी आम वो जो उन दिनों सबसे पहले पेडों पर पकते थे ) , और बस रास्ते में ही पेट पूजा का जुगाड हो जाता था । रास्ते में पडने वाले जाने कितने ही कमल गाछी , बगीचे , ताल , तलैये , पोखरे , मंदिर , कुंएं , ढिहबाड स्थान , सब एक एक करके यादों का कोना पकड लेते थे , और जिन कोनों को हम शहर में जाकर हम टटोला करते थे ..........

हालांकि टटोलने को तो अब हम उन शहरों को भी टटोला करते हैं जो उन दिनों में शहर सरीखे लगते थे । शहर जिनमें कालोनियां हुआ करती थीं दूर दूर , मैदान हुआ करते थे , घर , घर जैसे लगते थे जिनके आगे पीछे इत्ती खुली जगह तो होती ही थी कि ठाट से घर की उगाई सब्जी आप खाने में इस्तेमाल कर सकते थे और जो जरा जोरदार मेहनती आदमी हुए तो पडोसियों की भी मौज थी , आखिर बेलों में थोक के भाव निकलने वाली तोरियों और खीरों पे उन्हें भी बराबर की राय्ल्टी मिलने वाली जो होती थी । बचपन का एक ऐसा ही शहर था लखनऊ ।
इमामबाडा 



ओह क्या बात थी उस शहर की वो भी उस समय जब लखनऊ की नफ़ासत पूरे शबाब पर थी , बडे और छोटे इमामबाडों के झूमरों की चमक दिन में बिना जले भी कयामत सरीखी हुआ करती थी , भुलभुलैय्या सच में खो जाने जैसा डरवना लगता था और वो बडे वाले रामलीला ग्राउंड में दशहरे का रावण दहन मेला , तोपखाना बाज़ार की रामलीला , दोस्त और सहपाठी संजय सुतार के पापा जी की लवली स्टुडियो , एक फ़ोटो या शायद ज्यादा भी अब तक मिलती हैं पुराने एलबमों में । लखनऊ बहुत से कारणों से याद रहा है हमेशा , तांगों का शहर , तांगे उन दिनों सडकों के राजे हुआ करते थे । पूरा लखनऊ , टकबक टकबक की गूंजों से ठहाके लगाया करता था । मीना बाज़ार की धूम से लेकर प्रकाश कुल्फ़ी , फ़ालूदे वाले के आलीशान रेस्तरां में एक फ़ुल प्लेट चौदह रुपए की , उम्माह क्या बात थी उन दिनों की भी । शोर फ़िल्म को देखकर , तोपखाना बाज़ार के पास भी आया था एक सायकल चलाने वाला बाजीगर ...। लखनऊ की दीवाली की चमक जब ईद की ठसक से मिलती थी तो यकीन मानिए कि समां ही कुछ और बंध जाता था । सच कहें तो देश की असल संसकृति वहीं देखी परखी थी । वो पतंगों की दुनिया और वो पेशेवर बदेबाज ।बदेबाज जानते हैं आप , अरे वही जो पतंगों पे नोट चिपका के उडाया करते थे , और टक्कर होती थी किसी और नोट चिपके पतंग से , उफ़्फ़ क्या कयामत की जंग हुआ करती थी डोरों की , मानों एक पतंग के उडने से लेकर उसके कटने तक एक पूरी जिंदगी जी जाया करती थी वो डोर और उसकी सखी मांझा । आसमान भरा होता था उन कागजी जंगी जहाज़ों से । 


गोमती उन दिनों उफ़नती खूब थी और बरसाती नाले भी । ऐसा लगता था मानो कैंट का पूरा वो हिस्सा , हरी चटक साफ़ धुली चादर ओढे बैठे हैं । लेकिन सिर्फ़ अच्छा अच्छा ही नहीं होता था , मुझे याद है कि दो बरसातों मे दो बच्चों के नाली में फ़िसल कर बह जाने के कारण मौत की घटना भी देखी सुनी थी । लेकिन फ़िर भी इन कडवी यादों को परे रखकर बरसात के वो दिन पुदीने के पकौडे , हरी खट्टी चटनी के साथ खाने के दिन हुआ करते थे और हां आज के बच्चे जो अपनी कविताओं में पढते हैं न कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी , उन दिनों हकीकत थी भाई लोगों , एक बडी ही प्यारी हकीकत । जब भी उस शहर की खिडकी में पर्दों को उठा कर झांकने की कोशिश करता हूं एक हूक सी उठ जाती है । लखनऊ की यादों में तुलसी सिनेमा हॉल का , कुकरैल वन यानि क्रोकोडाईल पार्क और बोटैनिकल गार्डन का ज़िक्र भी कैसे भूल सकता हूं । एक पार्क की याद नहीं आ रही है , उसके सामने अंग्रेजों की बनी हुई कोई कोठीनुमा हवेली सी थी , पता नहीं क्या नाम था उसका , वो छोटी वाली गोल ईंटों से निर्मित भवन स्कूल की तरफ़ से और माता पिता से मिली अनुमति के महान सहमति के बाद जाने मिला था वो मौका । स्कूल में लगे वो शहतूत के पेड , लंच में चीलों का स्कूल के मैदानों के ऊपर चक्कर काटना और हमारा रोटी के टुकडे उछालना । 

          लखनऊ की दास्तान तो शायद पहले भी आपसे कह चुका हूं ,लखनऊके सेंट्रल स्कूल में दूसरी कक्षा का वो पहला दिन ,आदत के अनुसार रोतेहुए ही स्कूल पहुंचा था ...और मैं उन बच्चों में से ही एक था .जो बहुत समयतक तुतलाते हैं। बस पहला दिन ही याद रह गया था बहुत दिनों तक ।रिसेस पीरीयड में तो ..अपना गर्दभ रुदन हमारी ,मैडम के इतना नाकाबिलेबर्दाश्त हुआ कि उन्होंने हमे चुप कराने की खातिर .अपना लंच बॉक्स उस दिनहमारे नाम कुर्बान कर दिया,.दीदी की सहेलियों ने बहुत समय तक हमारी तुतलाती बोली को ..अपने सब टीवी समझ कर उपयोग किया ..। 


सेन्ट्रल स्कूल , लखनऊ
खनऊ के दोस्तों में अनिल विनोद की जुडवां भाईयों की जोडी हम दोनों ,भाईयों की जोडी के साथ मिल कर बिल्कुल जहां चार यार मिल जाएं वाली गैंग सी बन गई थी और उस जमाने के खेल भी उफ़्फ़ ..क्या खेल थे वे भी स्कूल में , कागज के तरह तरह के खिलौने , कैमरा , नाव , डौगी...और जाने क्या क्या .सोचता हूं उस कागज के कैमरे को बना कर जो खुशीहमें मिलती थी वो आजकल के बच्चों को फ़ेसबुक पर कोई मैसेज भेज कर कहांआ पाता होगा ? 

वो कंचों की रंगबिरंगी और चंचल चटकीली दुनिया वो मिट्टी की गुच्चियों मेंकंचों को पिलाना .और फ़िर वो सर्फ़ के बडे वाले मजबूत गत्ते के गोल डब्बे में...सैकडों कंचे संभाल कर रखना .जब एक साथ देखो तो लगता था मानो हर कंचे में एक आकाश गंगा समाई होती थी फ़िर वो सर्फ़ का डिब्बासिर्फ़ कंचों के खजाने को ही तो नहीं समेटे रहता था .उसमें बाद में हमनेमाचिस की डिब्बियों के कवर भी हजारों की संख्या में भर के रख लिए थे.ओह और उसका वो ताश टाईप खेल । जाने कैसे कैसे खेल बनाएथे हमने .सायकल के पुराने टायर को डंडे से मार मार के .पूरी शाम दौडाते रहना .वो सडकों पर देखे दिखाए .सांप नेवले की लडाई..बंदर बंदरिया के खेल .और जादू भी। वो आकाश में उडती चील कीपरछाई के साथ साथ भागना .वो कोयल के साथ कू कू कू ..बोलतेजाने की आदत .और वो मैनों की संख्या को देख देख कर बोलना.वन फ़ॉर नथिंग , टू फ़ॉर गुड ..थ्री फ़ॉर ..लेटर और फ़ोर फ़ॉर ..गेस्ट ..और आगे भी ..।


लखनऊ में जिस एक बात ने हमेशा ही बांधे रखा .वो था ..जितनी धूम से होली मनती थी , उतनी ही रंगीन ईद हुआ करती थी , ..वो पीर बाबा की मजार और वहां के प्रसाद में मिलने वाले बताशे,...और उसी पीर बाबा की मजार के पासवो पापा का फ़ौजी थियेटर ...मुझे याद है कि फ़ौज में रहते हुए पापा की जहांजहां पोस्टिंग हुई वहां की और कुछ जिन बातों में समानता थी उनमें से एक थी ओपन थियेटर ..यानि फ़ौजी सिनेमा .क्या बात थी उस पिक्चर हॉल की...कई जगहों पर हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन सिनेमा दिखाया जाता था तो कई जगहों में हफ़्ता भर एक ही पिक्चर देखी जाती थी .हा हा हा ..पिक्चर के बीच में , वो झमाझम बारिश, का आना ....और सब के सब भीगते हुए पिक्चर देखते थे ......। 

ओह उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह औरपीछे बहुत ही बडा अहाता ..वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के ,गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहलापरिचय हुआ था .पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होतीथी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां ।सोचता हूं कि आज पिताजी की वो आदत , और वो अहातों और आंगनों वाला मकान हमें भी मिली होती तो टमाटर , आलू , गोभी के बढते दामों से हम खुदको तरकारी प्रूफ़ कर चुके होते ..। 

वहीं तो सायकल चलाना .सीखना शुरू किया था .वो कैंची स्टाईलकी सायकल चलाने की अदा ...वाह और क्या रोकते थे उसे.बिल्कुल दोनों पैर का घसीटा मार के .,और बहुत बार तो बहुत से लोगोंके दोनों टांगों के बीच जाकर भी रुकती थी धडाम से .। अजी तब ये टोबूकी सायकलें कहां  तब तो इंतज़ार होता था कि , कब पापा की आंख लगे और कब मौका मिले .सायकल पर हाथ आजमाने का न हेलमेट की टेंशन ना लायसेंस की कहीं ठोके ठुकाए तो भी घुटना और कोहनी का ही नुकसान का खतरा था बस ..और उसी कैंची स्टाईल से सायकल चलाने में भी रेस तो लगती ही थी । 

बरसात का मौसम ,वो सफ़ेद मोटी पन्नी की बरसाती ,आज तक दुकान में वैसी शक्ल तक का रेन कोट देखने को भी नहीं मिला जाने बापू ने ..कहां से उस मोटी पन्नी का जुगाड कर के ...दर्जी को पटा कर वो अनोखी सीबरसाती तैयार करवाई थी और उसकी वो टोपी .तो बस अपने लिएभी वो स्कूल बैग को बचाने के ही काम आती थी , बांकी का सारा कोर कसर तोहम पूरी तरह भीग कर पूरा कर लेते थे ..ओह वो बरसात ...और उससे उफ़नते नाले .नदियां ।इस कमब्खत दिल्ली की गलियों में जब नाली केबजबजाते हुए पानी को बारिश के अठखेलियां करते हुए पानी से मिलते देखता हूं, समझ ही नहीं आता कि नाली के पानी को खुशी ज्यादा होती होगी ,या बारिशके पानी को अपनी बदकिस्मती का गम ज्यादा होगा .॥ 

        और जाने ऐसे कितने ही शहर , और कितनी ही यादें , मन के एलबम में चुपचाप बैठी अपनी बारी का   इंतज़ार कर रही हैं ..अगली पोस्ट में आपको पूना लिए चलूंगा । 


  
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