चित्र प्रभात झा जी के ब्लोग गप शप का कोना से साभार
ऐसा लगता है कि नियति को अब यही मंजूर है कि एक के बाद एक ऐसी कोई न कोई घटना होती रहे जो आम जन को उद्वेलित और आंदोलित करती रहे ।कहां तो कसाब के फ़ैसले पर पूरे देश की निगाहें टंगी हुई थीं और कहां निरूपमा की मौत ने सबके सामने बहुत सारे सवाल उठा दिए हैं और सब इस ह्र्दयविदारक घटना में छुपे निहितार्थ तलाश रहे हैं । हालांकि मुझे पूरा यकीन है कि आज ये हम सबके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ बहस का ये एक मुद्दा है । वास्तविक स्थिति से रूबरू होता हुआ निरूपमा का परिवार , उसका वो तथाकथित प्रेमी प्रियभांशु , के लिए इन बहसों का और उनसे निकल कर आई किसी भी अवधारणा का कोई अर्थ नहीं है । मगर समाज का ये फ़र्ज़ बनता है कि ऐसी घटनाओं को पूरी तरह जानते समझते हुए उस पर अपनी राय रखे ।
निरूपमा की बात सोचता हूं तो मोटे मोटे तौर पर कुछ ऐसा किस्सा सा निकल कर सामने आता है । एक परिवार में एक मेधावी लडकी होती है । लडकी अपने माता पिता की लाडली संतान होने के नाते उसके माता पिता ने अपने सारे सपने पूरे करने की छूट उसे दे दी । आखिर समाज बदल रहा था और ऐसे बदलते हुए समाज में ये कोई बडी बात तो नहीं थी कि कोई मां बाप अपनी बिटिया को दिल्ली मुंबई जैसे महानगर में पत्रकारिता , मौडलिंग, फ़ैशन जैसे क्षेत्रों में अपना कैरियर और नाम बनाने के लिए भेज दे । आज ये सर्वथा आसान बात है । यहां वो लडकी अपनी काबिलियत के दम पर देश की सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में से एक में दाखिला लेकर पढने लगती है । यहां तक तो सब ठीक रहता है , किंतु इसके बाद .....।
इसके बाद लडकी , महानगरीय परिवेश के बदलते व्यवहार के अनुरूप स्वच्छंद जीवन जीती है । स्वच्छंद से मतलब वो उन युगों पहले से चली आ रही सामाजिक बंदिंशों , उन सीमारेखाओं को सिरे से नकार के उन्हें लांघ जाती है । न सिर्फ़ अपने दैहिक स्वतंत्रता को जतलाती है बल्कि गर्भ धारण करने से बचने के सैकडों वैकल्पिक उपाय होते हुए भी गर्भ धारण करती है । इतना ही नहीं इसके बाद सीधा अपने मां बाप के पास पहुंच कर सारी बात बता देती है । और कुछ दिनों बाद उसकी हत्या कर दी जाती है जिसका सीधा सा शक उसके अपने परिवार पर जाता है जिसने अपनी मर्यादा बचाने के लिए उसकी हत्या कर दी ।
मगर कुछ सवाल मेरे मन को कुरेद रहे हैं :-
यदि निरूपमा का परिवार इतना ही दृढ था कि निरूपमा को महानगर में होते हुए भी कुछ ऐसा वैसा करने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए थी तो आखिर क्यों नहीं उसे वहीं अपने शहर में ही कोई टीचर , टेलर की नौकरी दिलवाने में दिलचस्पी दिखाई । यदि निरूपमा को दिल्ली भेजा भी तो उसे स्पष्ट क्यों नहीं बताया कि यदि कल को कोई भी , वो कदम जो आधुनिकता की ओर बढेगा वो उसके लिए आत्मघाती साबित होगा । फ़िर ये तो पत्रकारिता की पढाई थी , जरा उन फ़ैशन , मौडलिंग , अभिनय आदि के क्षेत्र में हाथ आजमाने वाली बेटियों के पिताओं से भी पूछ ही लिया जाना चाहिए कि , क्या वे कल को ऐसे किसी अप्रत्याशित कदम के लिए तैयार हैं , या कि अपनी बेटियों को फ़िर हत्या हो जाने के लिए चेता दिया है ॥
आखिर क्या वजह थी कि आज अनचाहे गर्भ से बचने के लिए विकल्प के रूप मे कितनी ही औषधियां, और कितनी ही पद्धतियां हैं तो फ़िर किस कारण से निरूपमा ने उनका उपयोग नहीं किया । क्या उसे ये विश्वास था कि जो मां बाप उसे महानगर में कैरियर बनाने के लिए भेज सकते हैं वो जरूर ही उसके इस फ़ैसले को भी अपना ही लेंगे । आखिर क्यों नहीं ऐसा माना जाए कि प्रियभांशु ने उसे जरूर ही ये विश्वास दिलवाया होगा कि अभी यही ठीक है , या इसकी क्या जरूरत है विवाह तो हो ही जाएगा ? तो फ़िर ऐसे में किसी भी कुंवारी लडकी , वो भी गर्भवती , को अकेले ही अपने माता पिता के घर ( जो कि बिहार ,बंगाल ,उडीसा , झारखंड जैसा कोई क्षेत्र था मुंबई दिल्ली का कोई बहुत ही पौश इलाका नहीं ) भेज दिया कि सारी फ़जीहत , सारा अपमान वो अकेले झेल कर अपने और उसके लिए भी कोई सकारात्मक फ़ैसला ले कर लौट आए । आखिर क्या वजह थी कि आज जो प्रियभांशु इतना कलप कलप दिखा रहा है वो उस समय उसके साथ नहीं था जब उसे सबसे ज्यादा उसकी जरूरत थी । आज तक ऐसी किसी भी घटना में नहीं देखा कि प्रेमी क्षुब्ध होकर अपनी प्रेमिका के हत्यारे परिवार को मार डालता या खुद ही कुछ कर बैठता । और समय ये भी देखेगा कि एक दिन ये प्रियभांशु किसी और का हमराही बन रहा होगा ॥
अभी कुछ दिनों पहले जब अदालत ने लिव इन रिलेशनशिप की बात को जायज़ ठहराया तो इसके पक्ष विपक्ष में बहुत सी प्रतिक्रियाएं आई थीं । बहुत व्यक्तियों का तो ये तक तर्क था कि ये फ़ैसला तो शायद विवाह जैसी सदियों पुरानी संस्था का अस्तित्व भी खतरे में डाल देगा । परिवर्तन कौन नहीं चाहता है , परिवर्तन शाश्वत नियम है जो होता ही है , मगर उस परिवर्तन के लिए क्या पूरा जनमानस तैयार है ये देखने वाली सबसे बडी बात होती है । यदि अदालत के उस नज़रिए से कि दो बालिग आपस में सहमति से दैहिक संबंध स्थापित कर सकते हैं , निरूपमा के माता पिता भी सहमत होते तो शायद ये औनर किलिंग की नौबत नहीं आती । एक सवाल जो बार बार उठ रहा है कि यदि ये सब मान मर्यादा बचाने के लिए किया गया , यानि औनर किलिंग , तो फ़िर क्या निरूपमा को कत्ल कर देने से मान मर्यादा बची रह गई । अब किसे नहीं पता है कि निरूपमा नाम की एक युवती को उसके माता पिता बंधु बांधवों ने सिर्फ़ इस वजह से कत्ल कर डाला कि क्योंकि वो उस महानगर के जीवन का हिस्सा बन रही थी जिसमें पांव पसारने के लिए खुद उन्होंने उसे भेजा था । यदि निरूपमा के परिवार को ये लगता है कि इस तरह से वे अपने उस तथाकथित समाज का साथ लेने में सफ़ल हो गए हैं और अब कह सकेंगे कि देखो हमने तो ये भी कर दिया मगर अपना मान नहीं जाने दिया ।
आज अचानक बीस साल बाद का कोई दिन कल्पना में दौड उठा है , जब हर महानगरीय घरों में बेटियां कह रही होंगी कि हमने अपनी पसंद का साथी चुन लिया है , न सिर्फ़ चुन लिया है बल्कि उसके साथ जीवन के सभी पल बिता लिए हैं , तो ऐसे में खडा उसका बाप उसकी मां क्या करेंगे , आखिर कितनी निरूपमाओं को कत्ल किया जाएगा ? लेकिन बीस साल से पहले तो निरूपमाओं को अपना जीवन बचाए रखना ही होगा न सिर्फ़ अपने बाप से , अपनी मां से बल्कि ऐसे सभी प्रियभांशुओं से भी जो उनकी मौत के बास प्रपंच प्रलाप ही कर सकते हैं ॥
ajay
only woman can become pregnant never forget that .
its time that the stae should be made responsible for the children like in other countries .
if you remember some times back there was a similar case in up where a minister and his wife were found involved in the murder or madhulika or madhumita { i forget the name }
do you recall shivani murder case
its not that the woman are trying to cross the barriers its just that sometimes we all react before the total picture is cleared
she could have been raped , she might be holding some secrets there can be so many reasons which might have led to all this
रचना ने कहा…
4 मई 2010 9:02 अपराह्न
बदलते समाज में सब लोग बदल रहें है फिर बदलाव परिणाम स्वीकार करने में लोग पीछे क्यों जा रहे है...सोचनीय है..बढ़िया आलेख धन्यवाद अजय भैया
विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
4 मई 2010 9:08 अपराह्न
अधिकतर वर्गों में बेटियों के साथ न्याय नहीं होता है यह तकलीफदेह विसंगति है हमारे देश में ! हम अपने खून को भी उसकी ख़ुशी देना नहीं चाहते फिर भी परिवार की शान और रुतबे के खिलाफ कुछ काम न हो जाये ! अशिक्षित होने का यह अभिशाप पता नहीं कितना और भोगना पड़ेगा
सतीश सक्सेना ने कहा…
4 मई 2010 9:09 अपराह्न
रचना जी ,
बहुत बहुत शुक्रिया आपका ।
यदि मैं ठीक ठीक समझा तो आपकी इस टिप्पणी में दो बहुत ही महत्वपूर्ण बात मिली मुझे ।
पहली ये कि ऐसी संतानों की देखभाल के लिए सरकार की जवाबदेही तय की जानी चाहिए , जिससे कम से कम बच्चों के भविष्य को लेकर डर की स्थिति में ये नौबत न आए ।
दूसरी ये कि निरूपमा पाठक के साथ ठीक ठीक क्या हुआ कैसे हुआ ये अभी पूरी तरह कहना ठीक नहीं है , शायद ।
आपकी दोनों ही बातों में दम है इसमें कोई शक नहीं । मैंने अभी के देखे सुने हालातों के अनुसार ही इस पोस्ट ,को लिखा था , आपकी टिप्पणी और विचार के लिए आभारी हूं ।
अजय कुमार झा ने कहा…
4 मई 2010 9:09 अपराह्न
1) "स्वच्छंद से मतलब वो उन युगों पहले से चली आ रही सामाजिक बंदिंशों , उन सीमारेखाओं को सिरे से नकार के उन्हें लांघ जाती है"
ये एक लोचे वाली बात है, अधिकतर परिवार इसके लिये तैयार नहीं होंगे… (कथित आधुनिक कहे जाने वाले लोग भी)
2) "महानगर में होते हुए भी कुछ ऐसा वैसा करने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए थी तो आखिर क्यों नहीं उसे वहीं अपने शहर में ही कोई टीचर , टेलर की नौकरी दिलवाने में दिलचस्पी दिखाई"…
क्या महानगर में जाते ही, नैतिक मूल्य बिखर जाने चाहिये?
3) "परिवर्तन शाश्वत नियम है जो होता ही है , मगर उस परिवर्तन के लिए क्या पूरा जनमानस तैयार है ये देखने वाली सबसे बडी बात होती है"
पूरी तरह सहमत… और ऐसा सामूहिक जनमानस कभी तैयार हो नहीं सकता, क्योंकि इंडिया और भारत के बीच सिर्फ़ आर्थिक खाई ही गहरी नहीं है, बल्कि और भी बड़ी खाईयाँ हैं।
4) "बल्कि ऐसे सभी प्रियभांशुओं से भी जो उनकी मौत के बास प्रपंच प्रलाप ही कर सकते हैं" सबसे बड़ा दोषी तो वही है, जो बेशर्मी से NDTV पर अपना चेहरा छिपाकर बयान दे रहा था। जिम्मेदारी से भगोड़ा, लड़की को फ़ँसाकर उसे मौत के मुँह में धकेलने वाला, समय रहते कोर्ट में शादी कर लेने की हिम्मत न रखने वाला…
आश्चर्य तो इस बात का है कि नारी संगठन और तमाम पत्रकारनुमा लोग, निरुपमा के माँ-बाप पर अपनी तोपें दागे हुए हैं… जबकि प्रियभांशु भी समान रूप से दोषी है… सबसे पहले तो उसी को रगड़ना चाहिये, गलती की शुरुआत उसी ने की। पहले तो निरुपमा से "अनैतिक" सम्बन्ध बनाये, उसे गर्भवती कर दिया, शादी जल्दी से नहीं की, फ़िर उसे मरने के लिये अकेला छोड़ दिया… उस पर भी "बेचारा" और "जाति प्रथा का सताया हुआ" भोला बलम बनकर बैठा है…
और ये कहना भी जल्दबाजी होगी की निरुपमा खुद भी पूरी तरह निर्दोष थी…। क्या उसका अपने माँ-बाप के प्रति कोई फ़र्ज नहीं बनता? क्या उसमें इतनी भी अक्ल नहीं थी कि वह गर्भवती न होती?
तात्पर्य यह है अजय जी, कि "सभी पात्र" सवालों के घेरे में हैं, लेकिन गाज निरुपमा के माँ-बाप पर ही गिरेगी, क्योंकि आखिर उनका दुष्कृत्य छिपाने के बावजूद सामने आ ही गया। उन्होंने जो घटिया और बर्बर काम किया उसकी सजा उन्हें मिलनी ही चाहिये, लेकिन "भोला बलम" भी छूटने न पाये…
Suresh Chiplunkar ने कहा…
4 मई 2010 9:42 अपराह्न
वाह सुरेश जी ,
क्या बात है , आपकी टिप्पणी ने तो पोस्ट की सार्थकता बढा दी है । आपकी पूरी टिप्पणी पढी । मगर एक सवाल जो आपने उठाया कि ..क्या महानगरों में जाते ही सभी नैतिक मूल्यों को ताक पर रख देना चाहिए ? इस संबंध में कुछ कहने का मन कर गया ।
बिल्कुल नहीं ऐसा शायद है भी नहीं । मगर जब देखता हूं कि जिस कैफ़े में मैं पोस्टे लिखने जाया करता उसमें शायद सातवीं आठवीं के छात्र और छात्राएं अपने और्कुटिया दोस्तों को देखने या कोई वैसी वाली साईट देखने आते थे तो सोचता था कि अदालत ने इन्हीं पट्ठों को देख कर कहा होगा कि लिव इन , शिव इन सब ठीक है ।
हम भी बदलते हुए जमाने को देख चुके हैं , जिन्हें लगनी होती है उन्हें हवा लग ही जाती है , वो शहर गांव कब देखती है । मगर अक्सर शहरों में कभी मकान की उंचाई, तो कभी गिरती हुई इंसानियत , फ़ितरत इन हवाओं का रुख मोड दिया करती हैं । बस यही फ़र्क हो जाता है ।
हां उस भोले बलम को जरूर ही सामने लाकर घसीटना चाहिए
अजय कुमार झा ने कहा…
4 मई 2010 10:20 अपराह्न
बहुत सार्थक लेख है....हर इंसान स्वछंदता चाहता है लेकिन ऐसी स्वछंदता किस काम की कि अपने नैतिक मूल्य ही खो दे...माना कि बहुत प्रगतिशील हो गए हैं विचार पर निरुप्माओं को खुद ही संभलना होगा....जब ऐसे रिश्ते बनाए जाते हैं तो उनके लाभ हानि का ख्याल भी खुद ही करना होगा...
लेकिन हत्या करना भी कोई इलाज नहीं है...समाज में अभी माता पिता कि कौन सी छवि सुधर गयी है...ऐसे कठिन वक्त में अपनो का साथ मिलना बहुत ज़रूरी है...
sangeeta swarup ने कहा…
4 मई 2010 10:39 अपराह्न
चिंतन तो सही है
पर नुचता है क्यों
नारी का ही तन ?
अविनाश वाचस्पति ने कहा…
4 मई 2010 10:51 अपराह्न
और समय ये भी देखेगा कि एक दिन ये प्रियभांशु किसी और का हमराही बन रहा होगा लगभग ऐसी ही बात मैं भी प्रभात गोपाल झा जी के ब्लॉग पर लिख कर आया हूँ.. :)
सुरेश जी से काफी हद तक सहमत हूँ.
मैं खुद कई बार आई आई एम् सी के कैम्पस में गया हूँ और वहाँ वो सब खुले आम होते दिखता है जिसके लिए दिल्ली के पार्क बदनाम हैं.. दोष तो इन्स्टीटयूट प्रशासन और समाज का भी है..
रचना किस एंगिल से सोचती है समझना मुश्किल है क्योंकि निरुपमा के पिता के ख़त से स्पष्ट होता दिखता है कि जो रचना सोच रही है उसकी सम्भावना लगभग ना के बराबर है..
दीपक 'मशाल' ने कहा…
4 मई 2010 11:02 अपराह्न
उस तथाकथित प्रेमी की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए -कमीनेपन का काम तो उसी का है !
क्या पता उसने झूठ मूठ शादी भी रचाई हो ! यह आनर किलिंग का केस नहीं लगता !
Arvind Mishra ने कहा…
4 मई 2010 11:19 अपराह्न
तथ्यों की तह तक जाने की कोशिस करती इस सार्थक रचना के लिए धन्यवाद /
honesty project democracy ने कहा…
4 मई 2010 11:21 अपराह्न
जब कसाब जैसे इंसान को जीने की मोहलत दी जा रही है तो क्या निरुपमा को जीने का हक नहीं था...क्या एक अजन्मे बच्चे को मार डालना हमारे धर्म के विरुद्ध नहीं.....विश्व का सबसे नामी धर्म ईसाईयत की नीव ही कुंवारी माँ पर टिकी है ..उसे कोई कुछ क्यों नहीं कहता है ??
संस्कार, संस्कृति, धर्म , जाति इत्यादि के नाम पर हत्या करना या उसे जायज़ ठहराना अपराध है...
सीधी सी बात है निरुपमा का अपना जीवन था, उसका अपना फैसला होना चाहिए, वो बालिग लड़की थी, वो जो भी करती उसमेंउसकी अपनी जिम्मेवारी होती, उसके माँ-बाप अगर साथ नहीं देना चाहते थे तो न देते लेकिन उसे मौत के घाट उतार देना किस धर्म के अनुसार है...कौन सी संस्कृति में आता है ये...और ये किस तरह का उदाहरण है....अपनी झूठी नाक बचाने के चक्कर में और सिर्फ अपने अहम् की तुष्टि के लिए दो-दो जानों को हमेशा के लिए धरती से मिटाने का अधिकार किसी को भी नहीं है...अगर ये गलती थी तो उन दोनों की गलती थी...
निरुपमा के प्रेमी को बीच चौराहे पर खड़ा करके गोली मारनी चाहिए....वो तो ऐसे ही नहीं रहने वाला ...जीवन से सारे सुख भोगेगा वो...शादी करेगा, बच्चे पैदा करेगा...लेकिन निरुपमा .....सिर्फ कुछ घटिया सोचों की शिकार हो गयी...लानत है जी....
'अदा' ने कहा…
4 मई 2010 11:33 अपराह्न
रचना से सहमत
AlbelaKhatri.com ने कहा…
4 मई 2010 11:59 अपराह्न
पोस्ट और टिप्पणीया दोनों ही विचारणीय हैं....सुरेश जी और रचना जी ने सही कहा है...
परमजीत सिँह बाली ने कहा…
5 मई 2010 1:18 पूर्वाह्न
ये भी हो सकता है कि प्रियभाँशू ने उसे कोई दवा ले कर दी हो जो उसने घर जा कर खाई हो वैसे मुझे पूरे मामले के बारे मे पता नही मगर लडका भी कहीं न कहीं कसूरवार् लगता है।
निर्मला कपिला ने कहा…
5 मई 2010 4:35 पूर्वाह्न
लगता है कि एक जैसे लोग समान लाइन पर सोच रहे हैं और हाय तौबा से परे खड़े हैं। आप अपनी राशि बताइए (सूर्य और चन्द्र दोनों विधियों से)। ज्योतिष को आजमाना चाहता हूँ।
गिरिजेश राव ने कहा…
5 मई 2010 5:53 पूर्वाह्न
इस मुद्दे पर कुछ ज्यादा ही चर्चा नहीं हो रही?
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…
5 मई 2010 5:51 अपराह्न
ajay ji bhut hi sartah likha hai mai aap se sat prtishat sahmat hun
प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…
5 मई 2010 6:25 अपराह्न
"बेचारा" और "जाति प्रथा का सताया हुआ" भोला बलम
Rajeev ने कहा…
5 मई 2010 8:09 अपराह्न
यह भी तो हो सकता है कि इस लडकी ने आत्मह्त्या ही कि हो? ओर बात को हमारे मीडिया जगत ने बढा चढा कर पेश किया हो...
राज भाटिय़ा ने कहा…
8 मई 2010 5:43 अपराह्न
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 09.05.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/
मनोज कुमार ने कहा…
8 मई 2010 9:53 अपराह्न
बेहद गंभीर विवेचना जो कहीं दिल को छूती है तो कहीं आंखें नम कर जाती है। और झकझोड़ती तो है ही। यह आलेख तथ्यों के साथ वास्तविक दर्शन देता है।
मनोज कुमार ने कहा…
8 मई 2010 9:54 अपराह्न
आपके इस सामयिक, सार्थक लेख से सहमत
रचना जी की टिप्पणी के बिन्दु भी बहुत कुछ कह रहे।
सुरेश जी की टिप्पणी ने सच में सार्थकता बढ़ा दी पोस्ट की
निश्चित तौर पर प्रियभांशु भी दोषी है बराबर का, तो सजा भी बराबर की होनी चाहिए
बी एस पाबला ने कहा…
9 मई 2010 11:43 पूर्वाह्न