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रविवार, 17 जनवरी 2010

अंत में फ़ुनसुक बांगडू बनना जरूरी है !!!!



आमिर खान की पिक्चरें , पहले की भी और अब की तो निश्चित रूप से मुझे प्रभावित करती रही हैं । बेशक उनसे जुडे विवादों और उन पर आमिर के घोर व्यावसायिक रुख के बावजूद , सिनेमा के साथ उनके द्वारा, उनकी टीम द्वारा किए जा रहे प्रयोग बहुत कुछ देखने वाले को दे जाते हैं । ऐसा ही कुछ कुछ ये हालिया पिक्चर थ्री इडियट्स के साथ हुआ । इस पिक्चर को अब तक पूरे नौ बार देख चुका हूं और हर बार अलग अलग बातें मिल रही हैं । एक सिनेमा में ही इतनी कुछ है और इसलिए मुझे हर बार कुछ नया ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं होती । इस बार देखा तो ये समझा कि यदि आखिर में बाबा रणछोडदास श्यामलदास चांचड .................फ़ुनसुक बांगडू नहीं निकलता तो । हां ...सोच के देखिए न किस जिस चतुर रामलिंगम ने पांच साल पहले शर्त लगाई थी कि वो अपने तरीकों से ज्यादा सफ़ल होगा यदि अंत में सिर्फ़ एक संवाद में ही आमिर खान ये नहीं बताता कि वो खुद से भी सफ़ल जिस व्यक्ति को ढूंढ रहा है पागलों की तरह वो असल में उसीका सहपाठी ..फ़ुनसुक वांगडू है तो ........तो भी क्या हम इस कहानी को उसी तरह से देख पाते ???? वो सारी तरकीबें , वो सारे नए फ़लसफ़े , वो सारे तर्क जो पूरी पिक्चर के दौरान रखे गए क्या उनसे उसी तरह सहमत हुआ जा सकता था ?????? शायद नहीं न ।

मतलब ये कि सफ़लता ही आखिरी मंजिल है और इसके आगे सब गौण है । जब हम कुल लगभग १६ साथी ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली पहुंचे थे तो सभी की आखों में एक ही सपना था ...अपने प्रयासों से सफ़लता हासिल करना और उस समय हमने ,हम सबने ही खूब जी तोड मेहनत की थी । हमारे एक सीनीयर हुआ करते थे जिन्होंने मुझे कुछ बातें बताई , जाने पिक्चर देखते हुए और उसके बाद भी याद आईं सोचा बताता चलूं

वो कहते थे कि जितना ये जानना जरूरी है कि क्या करना चाहिए या कि क्या पढना चाहिए उससे ज्यादा जरूरी ये जानना है कि क्या नहीं करना या क्या नहीं पढना है

यदि ज्ञान पाने के लिए पढना है तो उसकी तैयारी अलग तरह करनी होती है , यदि सफ़ल होने के लिए तो उसकी तैयारी अलग तरह से करनी होती है ये खुद तय करो कि क्या और कैसे करना है ??

यदि ज्ञान पाने के लिए पढोगे तो जब वो मिल जाएगा तो देर सवेर तुम्हें सफ़लता भी मिलेगी ही , मगर यदि सिर्फ़ सफ़लता के लिए पढोगे तो फ़िर निश्चित रूप से उसमें जो सीमीतता होगी वो तुम्हारे ज्ञान को भी एक हद तक समेट कर रखेगी

और अंतिम बात ये कि , सफ़लता ही अंतिम मंजिल है दुनिया चाहे जो भी कहे मगर यथार्थ की दुनिया में तो सच यही है कि जो सफ़ल है वही सफ़ल है ज्ञान तो तुम्हारा भी तभी दिखेगा जब सफ़ल होगे


पता नहीं कि कौन सी बात कितनी ठीक थी कितनी गलत ????मगर जेहन में अब तक गूंजती है । सोचता हूं कि ये तो सच है ही कि सफ़लता के बिना सब बेमानी है । देखिए न अब हो सकता है कि आमिर खान ने मशीन की परिभाषा को चतुर रामलिंगम से ज्यादा बेहतर बताया मगर यकीनन ही परीक्षाओं में तो उसे भी उसी परिभाषा को शायद किसी बेहतर तरीके से मगर उसी भाषा में लिखना पडा होगा । और ये भी कि यदि आज मैं भी सफ़ल नहीं होता कम से कम इतना कि अपने पैरों पर खडा सरकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत तो ......क्या फ़िर भी यूं मजे से ब्लोग्गिंग कर रहा होता ?????सोच रहा हूं !!!!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ, जी आमिर की फिल्में व्यावसायिक होते हुए भी उन में बहुत कुछ होता है। ज्ञानार्जन के लिए पढ़ना और परीक्षा में सफलता के लिए पढ़ना दोनों में जो अंतर है उसे ज्ञानार्जन के लिए पढ़ने वाला एक दो बार परीक्षा में असफल हो कर सीख जाता है।

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  2. आपने बिल्कुल सही सारांश प्रस्तुत की..यही सत्य है यदि आदमी इसे मान ले और अपनी मनोभाव और प्रकृति की अनुरूप कार्य करे तो काबिल बन जाएगा..बढ़िया प्रसंग..धन्यवाद भैया..

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  3. बहुत सुंदर बात कही आप के सीनियर ने बाकी अभी हम ने यह फ़िल्म देखी नही, लेकिन अब जरुर देखेगे

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  4. आपने सही कहा ...आमिर की फिल्में काफी सीख दी जाती हैं

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  5. भाई अजय, मेरी पूरी जिन्दगी इस सफ़लता की बाह्बाही के प्रतिरोध मे निकल गई. दुनिया बडी जालिम है, पर हम तो नही हो जालिम. सत्य और सच्चे का साथ दो बाकी दुनिया की ऐसी की तैसी.
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/
    dr rangeya raghav ka aaj janm din tha ek post likee thee aaj

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  6. अजय भाई,
    अपनी काबलियत से हासिल की गई सफलता हमारा हक़ है...
    लेकिन दूसरे का हक़ मार कर हासिल की गई सफलता गुनाह है...

    राजकपूर की फिल्म जागते रहो के गाने की कुछ पंक्तियां...

    सच्चे फांसी चढ़दे वेखे,
    झूठे मौज उड़ादें...
    लोकि कहदें रब दी माया,
    मैं कहदां अन्याय...

    मैं कोई झूठ बोल्या,
    कोई न भई कोई न,
    मैं कोई कुफ्र तोल्या,
    कोई न भई कोई न,
    मैं कोई ज़हर घोल्या,
    कोई न भई कोई न,
    ओए हट के,
    पराजी बच के,
    ओ आऊं आऊं, ओ आऊं आऊं...

    जय हिंद...

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  7. आमिर की फिल्मों के संदेश बहुत दूर तक जाते हैं. अच्छा लगा आपकी सोच जानना!!

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  8. आपके विचारों से अवगत हुये, शुभकामनाए.

    रामराम.

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  9. आपकी मेमोरी बहुत अच्छी है

    हर व्यक्ति में छुपा है एक बाँगड़ू

    आइन्सटाइन ने नाम बहुत कमाया, कहते हैं इंसान अच्छा नहीं था

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  10. झा जी-फ़िलिम तो मैने बहुत कम देखी है परदे पर्।
    जो कुछ टीवी पे आ गया देख लिए। आमिर खान किसी फ़िल्म को बनाने से पहले उस पर होमवर्क बहुत ही ज्यादा करते हैं जिससे फ़ि्ल्म मे से कोई न कोई संदेश बाहर निकल कर आता है।

    सफ़लता और असफ़लता दोनो नायक और सहनायक हैं क्योंकि दोनो साथ चलते हैं। प्रयास करके सफ़लता का वरण कि्या जाता है और प्रयास सफ़ल नही हुये तो असफ़लता आपका वरण करती है।
    "रसरी आवत जात हि"। सफ़लता अवश्य मिलती है। आभार

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  11. भाई सीखने को कुछ मिले , ये तो अच्छी बात है।
    सबसे बड़ी बात है, हमने तो कामेडी को खूब एन्जॉय किया।
    वो भी बच्चों के साथ। मैं तो इसे इस फिल्म की उपलब्धि ही कहूँगा। वर्ना कितनी फिल्मे ऐसी हैं, जो आप बच्चों के साथ एन्जॉय कर सकें।

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  12. aap ke lekh padti rahti hu .aaj three ideats par aapka najariya padkar laga ki kitna sahi he .safalta hi sab kuch tay karti he jindgi me aapko kya or kese chahiye yah hame hi tay karna hoga.

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  13. यह बात तो सही है... आखिर में फ़ुनसुक बांगडू ही बनना पड़ता है....

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  14. फुंसुक बाँगड़ू ने यह पढ-आ कि नही ?

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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