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रोज़ नए दर्द, संभालता हूँ मैं

हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥

जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥

मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥

परवरिश हुई है,
कुछ इस तरह से कि,
कभी जख्म मुझे, कभी,
जख्मों को पालता हूँ मैं॥

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥

वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥


क्या करूं , ऐसा ही हूँ मैं....

11 टिप्पणियाँ:

वाह,आज तो कविता का मूड बन आया अजय भाई ।

झा जी, आप जैसे भी हैं, अच्छे हैं।
ये बात दावे से कहता सकता हूँ मैं।

29 जनवरी 2010 8:18 अपराह्न  

दर्द ही दर्द

29 जनवरी 2010 9:03 अपराह्न  

हर पल,
इक नया ,
वक़्त ,
तलाशता हूँ मैं॥

जो मुझ संग,
हँसे रोये,
वो बुत,
तराश्ता हूँ मैं॥

मेरी फितरत ,
ही ऐसी है कि,
रोज़ नए दर्द,
संभालता हूँ मैं॥
Ek tarashi huee rachana!

29 जनवरी 2010 9:21 अपराह्न  

एक अदम्य जिजीविषा का भाव कविता में इस भाव की अभिव्यक्ति हुई है।

29 जनवरी 2010 9:24 अपराह्न  

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥

जीवन एक चक्र है बिल्कुल सही बात कही आपने हमें अपनी खुशियों में इस कदर नही मशगूल हो जाना चाहिए की आने वाली किसी अनहोनी का समाना न कर पाएँ....सुंदर भाव...धन्यवाद अजय भैया ..

29 जनवरी 2010 9:57 अपराह्न  

अरे भाई लगता है की मुझसे भी आप कविता करवा के ही छोड़ेंगे ...सुंदर रचना

29 जनवरी 2010 10:30 अपराह्न  

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥
वाह वाह बहुत सुंदर लेकिन दर्द भरी रचना.
धन्यवाद

30 जनवरी 2010 12:24 पूर्वाह्न  

बहुत गहरे...शानदार!

30 जनवरी 2010 1:00 पूर्वाह्न  

बहुत गहन भाव लिये है ये रचना.

रामराम.

30 जनवरी 2010 7:01 पूर्वाह्न  

सुना है कि, हर ख़ुशी के बाद,
एक गम आता है, तो,
जब भी देती है, ख़ुशी दस्तक,
आगे को टालता हूँ मैं॥

वो कहते हैं कि,
धधकती हैं मेरी आखें,
क्या करूं कि सीने में,
इक आग उबालता हूँ मैं॥

वाह, क्या कहूँ ? बहुत ख़ूबसूरत !!

30 जनवरी 2010 9:51 पूर्वाह्न  

आग उबालने का बिम्ब अद्भुत है

30 जनवरी 2010 8:25 अपराह्न  

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