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सोमवार, 11 जनवरी 2010

फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग बनाम गंभीर लेखकिंग



पिछले साल का अंत हिंदी ब्लोग्गिंग में जितना उठापटक वाला रहा था ,उससे ये तो अंदाजा था कि नये साल मेंबहुत कुछ और बहुत सारा होने वाला है, मगर ये गुमान कतई नहीं था कि समुद्र मंथन की तरह ब्लोग्गिंग मंथन भीशुरू हो ही जाएगा और आजकल तो खूब मजा रहा है, जब ब्लोग्गिंग में ब्लोग्गिंग की बात हो तो उससेमजेदार कुछ भी नहीं लगता , फ़िर बात जब मजे से ज्यादा गंभीरता/विश्लेषण/तर्क चिंता तक पहुंच जाए तो समझजाना चाहिए कि अब वास्तव में परिवर्तन की चाहत दिख रही है सबसे ज्यादा खुशी मुझे इस बात की हुई कि , इस बहस में, हालांकि ये कोई आयोजित/ प्रायोजित बहस नहीं थी , नये पुराने, बडे छोटे, नवोदित , नियमित/अनियमित ...कहने का मतलब कि सभी ब्लोग्गर्स ने अपने अपने विचार एक दम ठां करके रख दिए और यही तो खासियत है इस ब्लोग्गिंग की इसी संदर्भ में कहीं पढा कि फ़ूंफ़ां ब्लोग्गिंग से ब्लोग्गिंग का स्तर गिर रहा है और अच्छा होगा, बल्कि कहें कि कहा तो ये गया कि ब्लोग्गिंग की बेहतरी इसी में है कि सिर्फ़ गंभीर लेखकिंग की जाए देखिए अब ये मत कहिएगा कि ये क्या लेखकिंग ..अजी गंभीरता आएगी तो शोध तो होंगे ही नवशब्दावेषण नहीं हुए तो काहे कि गंभीरता जी

तो फ़िर वही चिर प्रश्न सामने आके खडा हो गया , यक्ष प्रश्न की तरह , कि आखिर तय कौन करेगा अब तो स्थापित और मान्य स्तंभ भी अपनी जडें बचाने में लगे हैं जाने किन निरे तूफ़ानों ने उनकी जडों को हिला कररख दिया या शायद इसलिए भी कि बरगद सरीखे उन वृक्षों को नई पौध की लंबाई से भय का एहसास होने लगा था जबकि उन्हें तो अपने ऊपर ये भरोसा रखना चाहिए था कि वे वट वृक्ष हैं खैर ये तो वैसे भी क्षरण का दौर है , प्रकृति के लिए भी और शायद साहित्य के लिए भी मगर इस क्षरण के लिए हिंदी ब्लोग्गिंग को ही जिम्मेदार ठहराने का कोई वाजिब कारण अभी तो मुझे नहीं मिला है इसलिए यदि आज ब्लोग्गिंग में सक्रिय और असक्रिय हजारों ब्लोग्स में से किसी एक को भी फ़ूंफ़ां ब्लोगर नहीं कहा जा सकता तब भी नहीं जब खुद प्रेमचंद आकार ब्लोग लिखने लगें हालांकि मुझे लगता है कि यदि प्रेमचंद ब्लोग लिखते तो वे भी बहुत सफ़ल नहीं होते ...उतनेतो कतई नहीं जितने कि सफ़ल वे साहित्य में हुए और ये भी हो सकता था कि कोई फ़ूंफ़ां ब्लोग्गर उन्हें कई मायनों में पीछे छोड जाता मगर इसके बावजूद प्रेमचंद तो वे रहते ही क्योंकि असली प्रेमचंदत्व तो उनमें इसलिए नहीं निकल जाता कि वे ब्लोग्गिंग कर रहे हैं

वैसे भी ब्लोग्गिंग का एक सबसे शक्तिशाली पहलू जिसे अक्सर इस बहस में दरकिनार कर दिया जाता है वो है ब्लोग्गिंग का निरंकुश होना हां निरंकुश ही तो है ब्लोग्गिंग , तभी तो कभी कोई मनोज वाजपेयी , या रवीशकुमार को कंमेंटियाते वक्त ये नहीं सोचता कि वो सीधा उनसे रूबरू है जिनसे यथार्थत: अपने जीवन में शायद ही वोसब कह पाए इस निरंकुशता की कोई हद भी नहीं है , हालांकि अभी गनीमत ये तो है ही कि हमारे संकलक उनबहुत से बेकार /अश्लील /अधकचरे ब्लोग्स ( जो कि बदकिस्मती से हिंदी में भी हैं ) को हम तक पहुंचने देकरएक छन्नी का काम तो कर ही रहा है मगर इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि इस निरंकुशता की ताकत को पाकरकई बंधु ब्लोग्गर ठीक उसी तरह उन्मादित हो जाते हैं जिस तरह से कोई रिपोर्टर उस समय हो जाता है जब उसेकिसी एक्सक्लुसिव खबर लाने को कहा जाता है जिस पर शायद उसका स्थाईकरण या इंसेंटिव टिका होता है औरफ़िर सिलसिला शुरू होता है खबर लाने के बदले खबर बनाने का ठीक इसी तरह कभी किसी का नाम लेकर / तोकभी किसी की टिप्पणी को मुद्दा बना कर/ कभी किसी की पोस्ट को ही मुद्दा बना कर धूम धडाम लिखने कीकोशिश की जाने लगती है मुझे लगता है कि निरंकुशता में भी ये गलत परंपरा तो है ही

मुझे लगता है कि एक ही ब्लोग्गर में फ़ूंफ़ां और गंभीर टाईप के लेखन दोनों के स्वाभाविक जीवाणु होते हैं और जबजो हावी होता है , उसका प्रतिफ़ल पोस्ट के रूप में हमारे सामने आता है हां मेरे जैसे लिखने पढने और सच कहूंतो इसे गीजने की हद तक घुसने वाले के लिए जब एक साथ कई मूडों और एक साथ ही कई बातों को अलग अलगअंदाज, और अलग अलग सवरूप में कहना हो तो फ़िर वो ढेरों ब्लोग बना के उन्हें उडेलता रह सकता है मुझे तोकभी कभी लगता है कि आखिर कर क्या रहा हूं मैं , जाने कितने ब्लोग बनाता जा रहा हूं , अलग अलग विषय औरअलग अलग फ़्लेवर के लिए , मगर हर लिहाज से वो हैं तो ब्लोग्गिंग के दायरे में ही और फ़िर मैं क्यों बांटूं उन्हेंफ़ूंफ़ां कैटेगरी या कि गंभीरनेस वाले चोले में ????, फ़िर रिटायरमेंट के बाद जब असली ब्लोग्गिंग शुरू होगी वो फ़ुल टाईम जौब वाली तब तो इतने भी कम पडेंगे ।


कभी कभी ....कुछ यूं भी कहने लिखने का मन करता है सो कह दिया ......ठीक किया न ???

24 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे लगता है कि एक ही ब्लोग्गर में फ़ूंफ़ां और गंभीर टाईप के लेखन दोनों केस्वाभाविक जीवाणु होते हैं और जबजो हावी होता है , उसका प्रतिफ़ल पोस्ट केरूप में हमारे सामने आता है । बिलकुल सही बात कही आपने..... सहमत....

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  2. aapne apni post me vishya ke saath nyaay kiya hai

    yahi kala hai aur yahi kaarigari hai ek kalamkaar ki.......

    badhaai !

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  3. मुझे लगता है कि बहुत अधिक ब्लाग बनाने की नीति बहुत अच्छी नहीं। एक ही ब्लाग पर दिन में अनेक पोस्टें की जा सकती हैं।

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  4. बिल्कुल ठीक किया...इसमें इतना क्या सोचना. रिटायरमेन्ट कौन बरस में है भईये??

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  5. निरँकुश ब्लॉगिंग और उन्मुक्त अभिव्यक्ति की सीमा रेखा सभी-लोग स्वयँ ही निश्चित कर सकते हैं, बशर्ते वह ऎसी इच्छाशक्ति को टिप्पणी मोह में, और तथाकथित टी.आर.पी. के चलते दबा न दें । इसका दुर्भाग्य समय ही बतायेगा !

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  6. बढ़िया सोच के साथ लिखा गया गंभीर लेख

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  7. ब्लांग एक ही हो तो अच्छा है मेने शोक मै चार बना लिये, अब...... उन्हे बन्द भी नही करता, प्यार जो होगया, ओर उन की खुराक भी नही दे पाता उन्हे, इस लिये एक या दो ब्लांग सुखी ब्लांगर
    आप के लेख से सहमत हुं

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  8. हम एक ब्लॉग की खुराक नहीं दे पाते ..जाने आप कैसे इतने सम्हाल पाते हैं...
    ब्लागिंग करके भी पछताए और नहीं करेंगे तो ज्यादा पछतायेंगे.....
    इसीलिए....हर दिन सूली पर चढ़ जाते हैं...

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  9. सही कह गयी अदा ...इहाँ एक ठो ब्लॉग को संभाला नहीं जा रहा है ...इतना विचार कहाँ से उड़कर आ जाता है आपके भेजे में ...तनिक सप्लाई कीजियेगा ..!!

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  10. कितने ब्लॉग बनाना है यह तो ब्लॉग बनाने वाले के उद्देश्य पर निर्भर करता है। अंग्रेजी में तो एक एक ब्लोगर के सौ सौ से भी अधिक ब्लोग हैं क्योंकि उनका उद्देश्य ब्लोग के द्वारा व्यवसाय करना है। अलबेला खत्री जी ने अपनी एक टिप्पणी में स्वीकार किया है कि उनके ब्लोगिंग का उद्देश्य स्वयं का प्रचार प्रसार करना है अतः उनके द्वारा अधिक से अधिक ब्लॉग बनाया जाना उचित ही है। मैंने अपना "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" ब्लॉग इसलिये बनाया कि रामायण की कथा को मैं अपने "धान के देश में" के पोस्टों के साथ गड्ड मड्ड नहीं करना चाहता था। मेरे भी और ब्लॉग्स हैं जो कि संकलकों में नहीं है।

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  11. बिल्कुल ठीक . हर चीज के कमसे कम दो पहलू तो होते ही हैं .

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  12. अभी देखा तो पाया कि खुद के द्वारा नियंत्रित हिन्दी, पंजाबी, अंगरेजी के 30 ब्लॉग हैं और करीब 4 अंग्रेजी की वेबसाईट्स। सभी विषय आधारित। किसी में कथित फूं-फां नहीं। साधारण सा लेखन ऐसा कि किसी को जानकारी जैसा कुछ प्राप्त हो। कोई मौज़ नहीं, कोई मस्ती नहीं। हाँ नियमित नहीं है लेखन्। इतनी फुरसत ही कहाँ है भई!

    वैसे आपकी पोस्ट सारगर्भित है

    बी एस पाबला

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  13. एक अच्छा शब्द मिला फ़ूंफ़ा और गंभीर.:) अभी सोचके बताते हैं कि हम कौन सी श्रेणी मे हैं.

    रामराम

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  14. फूंफां करते रहिये
    ब्‍लॉग जगत का
    हो रहा है भला
    इसे पलटें तो
    लाभ
    शुभ ब्‍लॉग।

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  15. विवाद पटकिंग + लेग पुलिंग + टीआरपी लिफ्टिंग+ टिप्पणी जुगाड़िंग = पॉपुलेरिटी रॉकेटिंग...

    जय हिंद...

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  16. हमने भी तीन ब्लाग बना रखे हैं...एक तो वो जो कि पूर्णत: ज्योतिष विषय पर आधारित है, दूसरा धर्म ओर दर्शन पर ओर तीसरा जो है...वो कभी कभार फूँ फाँ करने के लिए :)

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  17. यूँ ही ब्लॉगियाते रहिए... फूँ फाँ वाले भी इस समाज को एक अलग रंग देते हैं... ब्लॉगरी को भी।

    मस्त पोस्ट है जी।

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  18. अजय भईया एक आप ही हैं जो ऐसे गंभीर मुद्दे को सामने लाने के लिए सहायक बनते हैं । आपसे बिल्कुल सहम हूँ

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  19. यह फ़ूँफ़ाँ विशेषण अच्छा लगा ।

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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