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सोमवार, 3 नवंबर 2008

प्रतिशोध (मराठी- बिहारी प्रकरण पर एक कहानी या शायद हकीकत )

रघु हर साल की तरह इस बार भी दिवाली और छठ पर रमेश भैया के आने की ख़बर पक्की जाना कर बेहद खुश था। सच कहें तो उसे इन त्योहारों के आने की उतनी खुशी नहीं होती थी, जितनी रमेश भैया के आने की होती थी, और होती भी क्यों नहीं, आख़िर साल में एक बार रमेश भैया घर आते थे, और फ़िर रघु के लिए न सिर्फ़ कपड़े, और बहुत सारा समान लाते थे बल्कि उसके लिए तो हर बार एक ऐसा तोहफा जरूर होता था जो उसे चौंका देता था, पिछले दिवाली पर मिला मोबाईल अब तक नया का नया लगता है । सो इस बार भी वह कोई बहुत बढिया चीज़ मिलने की कल्पना से रोमांचित हुआ जा रहा था, आज सुबह ही रमेश भैया ने फोन करके बताया था की इस बार छुट्टी की थोड़ी दिक्कत है, इसलिए सिर्फ़ दो चार दिनों के लिए ही आ पायेंगे।

दिवाली से एक दिन पहले शाम को चौक पर पहुचने पर पता चला कि, उसके कुछ दोस्त जो रेलवे की परीक्षा देने मुंबई गए थे, उनमें से बहुतों को वहां पर मारा पीता गया, हालाँकि उसने भी ये खबर देखी सुनी थी, मगर उसे अंदाजा नहीं था कि उसमें से कुछ उसके दोस्त भी होंगे जिन्हें ये सब भुगतना पड़ा। सारे दोस्त वहां इक्कठा होकर क्षेत्रवाद, को लेकर की जा रही राजनीती और सरकार की निष्क्रियता को लेकर खासे नाराज़ थे, तभी अचानक फैसला किया गया कि इसका विरोध जताने के लिए कुछ ऐसा किया जाए कि सबका ध्यान उस और जाए, किसी ने सलाह दी कि क्यों न ढेर सारे पत्र प्रधान मंत्री , और मीडिया को भेजें जाएँ, ताकि उन्हें कुछ तो करने की हिम्मत मिले। मगर अधिकाँश लोगों ने इसे बेकार सा गांधी गिरी वाला रास्ता बता कर एक नया उपाय बताया।
अगले दिन सुबह से लेकर शाम तक सभी क्षात्रों ने वहां के स्थानीय रेलवे स्टेशन पर, आर नजदीकी सरकारी दफ्तरों पर जैसी तोड़ फोड़ मचाई उसकी गूँज तो मीडिया के माध्यम से संतरी से लेकर मंत्री तक के कान तक पहुँची। सभी क्षात्र बेहद खुश थे, कि चलो कहीं तो गुबार निकला, उन्होंने मीडिया और कैमरों के सामने जम कर नेताओं को कोसा और खूब फोड़ फाड़ की । रघु भी इन सबमें आगे बढ़ कर हिस्सा ले रहा था, शाम तक वो भी थक कर चूर चूर हो गया था। शम्म को इस विरोध प्रदर्शन के बाद अचानक उसे याद आया कि अरे, अब तक तो रमेश भैया घर पर पहुँच गए होंगे , वह तेज़ी से घर की तरफ़ बढ़ गया।

घर पहुंचा तो बाहर ही बाबूजी और माँ खड़ी थी, छोटे चाचा भी वही खड़े थे,इससे पहले कि वो कुछ पूछता बाबूजी ख़ुद ही कहने लगे,
" अरे रघु , कहाँ था रे दिन भर, रमेश अबकी बार घर नहीं आ पायेगा, क्षात्रों द्वारा ट्रेन , और पटरियों को तोडे फोडे जाने के कारण उसकी रेल को कानपुर से वापस लौटा दिया गया है, अभी अभी, फुकन चाचा के यहाँ फोन आया था, कह रहा थे कि रघु को कहियेगा, यदि कोई गाओं जाना वाला मिला तो उसका तोहफा भिजवा दूँगा। बेचारा दुखी लग रहा थे, बताओ भला, मुंबई का गुस्सा यहाँ पर निकालने का क्या मतलब और वो भी बेचारे ट्रेन , बस पर, पता नहीं का सोचते हैं ई बचवा सब।

रघु को दिवाली अचानक ही फीकी लगने लगी थी, वो सोच रहा थे कि ये कैसा प्रतिशोध लिया कि उसमें भी ख़ुद का ही नुक्सान रहा।

हाँ, यही सच है कि इन घटनाओं में न जाने कितने रमेश और रघु दुखी हुए........

4 टिप्‍पणियां:

  1. Hi Ajayji, aapne Mumbai mein ho rahi ghatnaon ko bahut hi sahi tarike se prastut kiya hai. Ye bachche sochna nahi chahte ki wo kya kar rahe hein. Aur apne hi cheezon ke sath tod fod kar desh ki garima bhang kar rahe hein.


    Mere blog per aane ke liye dhanyawad!

    rgds

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  2. kuchh bhee kabhee bhee kahan, sab kuchh abhee hee. Achchha lagaa. Aapke blog par pahlee bar aaya hoon. Ab aataa rahoonga.

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  3. aap teeno kaa bahu bahut dhanyavaad,aaj likhne ka ye faiyada to hua ki do naye mitra aur jud gaye. dhanyavaad.

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मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

साथ चलने वाले

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