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गुरुवार, 31 जनवरी 2008

आदमी (एक कविता )

ताउम्र यूं,
खुद ही,
अपने को ,
ढोता रहा आदमी।

जब भी दिए,
जख्म औरों को,
खुद ही,
रोता रहा आदमी॥

पैशाचिक दावानल में,
कई नस्लें हुई ख़ाक,
लकिन बेफिक्र,
सोता रहा आदमी॥

जानवर से इंसान,फिर ,
इंसान से हैवान,ना जाने,
क्या से क्या,
होता रहा आदमी॥

ज्यों,ज्यों, बहुत बड़ा, बहुत तेज़,
बहुत आधुनिक बना,
अपना ही आदमीपन,
खोता रह आदमी॥

हाँ आज सचमुच ही मुझे इस भीड़ में कोई आदमी नहीं मिलता.


ajay kumar jha
9871205767.

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया है मालिक. ये तो गहरी बात कह गए आप. बड़ा अच्छा लगा पढ़ कर अजय भाई. शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. meet jee,
    pehlee baat to ye ki pehlee baar kisi kavita par pratikriyaa mili wo bhee itnee utsaahit karne waalee achha lagaa. dhanyavaad.

    उत्तर देंहटाएं

मैंने तो जो कहना था कह दिया...और अब बारी आपकी है..जो भी लगे..बिलकुल स्पष्ट कहिये ..मैं आपको भी पढ़ना चाहता हूँ......और अपने लिखे को जानने के लिए आपकी प्रतिक्रियाओं से बेहतर और क्या हो सकता है भला

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