रविवार, 20 मई 2012

ब्लॉगिंग में हुआ बवाल , ब्लॉगिंग को मिली उछाल










पिछले कितने समय , अब इसका लेखा जोखा भी क्या रखना , बस ये समझिए कि कम से कम एक बरस से तो जरूर ही , ब्लॉगिंग एकदम मुइतमईन सी हो गई थी । फ़ेसबुक , गूगल प्लस और ट्विट्टर ने मानो ब्लॉगिंग की रफ़्तार को पहले पकड फ़िर जकड के रख लिया । गोया जो यहां से जरा सा उधर की ओर गया मानो जैसे वहीं का हो कर रहा है । दूसरों की क्या कहें कमोबेश हम खुद भी उसी गाडी में सवार हो गए थे अलबत्ता कारण शायद थोडे बहुत अलग अलग हों । 


लाख कोशिश हुई , वैसे ऐसी कोई घनघोर कोशिश हुई हो इसकी जानकारी कम से कम अपने पास तो कतई नहीं है , लेकिन हुई होती तो घनघोर ही हुई होती न कि ब्लॉगिंग को दोबारा पटरी पर लाया जाए , बल्कि ब्लॉगिंग को क्यों कहें , कहा जाए कि ब्लॉगरों को दोबारा पटरी पर लाया जाए । हद है आखिर इत्ती घनघोर मनहूसियत , न कोई विरोध , न झंडे , न झंडाबरदार , पोस्टों पर टिप्पणियां तो छोडिए , पोस्टों के ही लाले पड गए । फ़िर पोस्टें लिखी भी जाती रही हों तो पाठक पढें कैसे । तेज़ और लोकप्रिय एग्रीगेटर्स तो कब के कोमा में चले गए और धत तेरे कि धाकड लिक्खाड से लेकर धुरंधर टिप्पाड तक , पोज़िटिव निगेटिव के चटके से लेकर चिट्ठाजगत सक्रिय निष्क्रिय , हवाले मतवाले आदि तमाम टाईप के एक्सक्लुसिव खोजी खबरी भी इनके साथ ही कोमा में चले गए । हा! रे ब्लॉगिंग का दुर्भाग्य ।


लेकिन ऐसा नहीं है जी बिल्कुल भी नहीं , बीच बीच में कभी ब्लॉगर मिलन /बैठक / संगोष्ठी के बहाने तो कभी ईश्वर , धर्म , मज़हब के बहाने दंड पेलने वालों ने रौनक बनाए रखी । भर भर के बाल्टियां , ऐसी कोसमकोस शुरू कि समझ ही नहीं सकता कोई कि यदि धर्म , मज़हब पर बातें करने वाले , विमर्श करने वाले इतने सहिष्णु और गंभीर  लोग हैं तो फ़िर तो इनकी समझ की और दूसरों को समझाने की इनकी कोशिशों की दाद ही नहीं दाद खाज और खुजली भी देनी चाहिए । मगर न जी , मामला कुछ जमा नहीं । इक्का दुक्का बार बीच बीच में चल रहे एक आध एग्रीगेटर में से हमारीवाणी को भी उसी तरह निशाने पर लिया गया जिस तरह से पहले ही ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत का शिकार हमारे तीस मार खां ब्लॉगर मित्र लोग कर चुके थे , लेकिन सब नाकाफ़ी रहा रफ़्तार बढी नहीं कुल मिला कर ।

देश और प्रदेश में बेशक हवाएं अब गर्म हुई हों और लू के साथ साथ धूप की तपिश ने सबको हलकान करना शुरू कर दिया हो लेकिन भला हो ब्लॉगजगत के लिक्खाडों का कि यहां मामला गर्मा गर्मी का पहले ही शुरू हो गया । अब ये न ही पूछिएगा कि हाऊ हू बिकम बोल्ड , एंड किसने किसको क्या किया फ़िर टोल्ड और आखिरकार मामला वो भी पड ही गया कोल्ड , हां इत्ता जरूर रहा कि इस विषय ने पिछले कुछ दिनों तक बनाए रखा होल्ड । लेकिन एक बार फ़िर से फ़ार्मूला हिट्टम हिट रहा कि नकारात्मकता उत्प्रेरक का काम करती है ।

इस बारे में जब सोचता हूं तो मुझे एक दिलचस्प किस्सा याद आता है जो शायद मैं आपसे पहले भी बांट चुका हूं । एक स्कूल में बच्चों ने एक चैरिटी कार्यक्रम रखा , योजना बनी कि इस कार्यक्रम के बारे में लोगों को बताया जाए और फ़िर जब लोग इस कार्यक्रम को देखने आएं तो टिकट खरीद कर उसे देखें , टिकट से जो पैसे आएं उससे स्कूल के बच्चों के लिए खेलने और संगीत के लिए कुछ सामान खरीदा जाए । सारी तैयारियां हो गईं , तय हुआ कि लोगों को जानकारी पैम्फ़लैट के माध्यम से दी जाए । अगले दिन कुछ स्कूली बच्चे स्कूल के सामने ही सडक पर हाथों में पैम्फ़्लैट लेकर खडे हो । जो भी वहां से गुजरता , उसके हाथ में पकडा देते , लोग , बाइक स्कूटर कारों में सवार , सब उसे पकडते और आदत के अनुसार एक निगाह डाल कर वहीं फ़ेंक कर चलते बनते । बच्चे बडे दुखी और मायूस हो गए । इतने में एक युवक जो ये सब थोडी देर से देख रहा था उसने उन बच्चों से कुछ कहा । बच्चों ने सामने से आ रहे एक बाइक सवार को रोका और पैम्फ़लेट देने लेगे , उसने जैसे ही आगे हाथ बढाया , बच्चों ने पैम्फ़्लेट को दोनों हाथों से मोड तरोड दिया । बाइक सवार ने हैरान परेशान होते हुए उस पैम्फ़लेट को पकड लिया , और फ़िर अचानक उसे खोल कर सीधा करके पढने लगा । बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आ गई । यानि फ़लसफ़ा ये कि मानव मन है ही ऐसा हमेशा उलटी बातें , उलटी चीज़ें ही ज्यादा आकर्षिंत करती हैं । फ़िर हम कौन से डायनासोर हैं , हम भी तो आखिर बाइक सवार ही हैं सो जैसे ही कागज़ मोड के पकडाया गया सब स्विच ऑन मोड में आ ही गए ।


वैसे ये फ़लसफ़ा एक लिहाज़ से ठीक भी है , जब कोई चर्चा न करे , जब कोई बात न करे तो खुद ही अपनी चर्चा करो , खुद ही अपनी बात करो । ब्लॉग जगत में आयोजन चाहे कैसा भी है , आयोजक चाहे कोई भी हो लेकिन जब तक उसका मीन मेख निकाल कर उसका पूरा पोस्टमार्टम न किया जाए तब तक आयोजन की पूर्णाहुति नहीं होती , पहले भी कभी नहीं हुई है । सो एक एक करके ऐसे वैसे सारे आयोजन के कर्ताधर्ताओं के कसबल ढीले पडते चले गए , जिनके बचे हुए हैं हमें पूरा यकीन है कि पोस्टों और टिप्पणियों की मिसाइलों से उनके मनोबल को भी नेस्तनाबूत कर ही दिया जाएगा । तो लब्बोलुआब ये कि रविंद्र प्रभात जी ने पिछले बार परिकल्पना सम्मान योजना और समारोह के खूबसूरत संचालन और उसके बाद हुए तमाम हंगामों के बावजूद हिम्मत न हारते हुए एक बार फ़िर से ब्लॉगरों को सम्मानित करने का मन बना लिया । जी हां सम्मानित को बोल्ड इसलिए किया है ताकि ठीक से बार बार ये ज़ेहन में आ सके कि सम्मानित ही करने की मंशा है । यहां एक साथ ही कई सारे प्रश्न उछले उछाले जा सकते हैं , उछल ही रहे हैं ।


सम्मानित ..क्यों भाई , हिंदी ब्लॉगरों को आखिर सम्मानित किया ही क्यों जा रहा है जब उन्हें अपमानित होने की आदत है तो ऐसी किरपा क्यों वो भी बिना दसबंद जमा किए कराए और फ़िर उससे भी जरूरी बात जब अपमानित करने कराने के लिए किसी को किसी की अनुमति सहमति की जरूरत नहीं होती तो फ़िर सम्मानित करने के लिए ही ये हिमाकत क्यों की जाए भला । वैसे भी देर सवेर कहा तो यही जाने वाला है ही कि हुंह्ह जिन्हें देने का मन था उन्हें दे ही दिया खामख्वाह इत्ता नाटक किया । लेकिन कमाल एक ये है कोई भी ये नहीं कहता कि फ़लां जी और चिल्लां जी को बिल्कुल भी कतई नहीं दिया जाना चाहिए ये सम्मान । अजी धेला भर नहीं जानते वे , कद्दू लिखते हैं और क्या खाक पता है उन्हें लेखन पठन के बारे में , मगर ना जी ये भला क्यों कहा जाए । इनको नहीं दिया जाए कहने से अच्छा है कि ये कहा जाए कि फ़िर इनको क्यों नहीं दिया गया , और जब इनको दिया गया तो उनको क्यों छोडा गया । किसी भी सूरत में आखिरकार सम्मान तो एक ब्लॉगर का ही होना है ।

परिकल्पना ही क्यों जी ..रविंद्र प्रभात ही क्यों ....लो ये कमाल है न । हां भई आखिरकार उन्हें ये हक दिया किसने कि वो यूं सरेआम सार्वजनिक रूप से सबको सम्मानित कर दें ..बताइए .तो ..सम्मानित । अजी जब ब्लॉगरों को घर दफ़्तर में कोई नहीं पूछता तो फ़िर ये इतने बडे हितैषी ..हैं कौन । ओहो ! जरूर परिकल्पना के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है जो ब्लॉगिंग की स्थापित परंपरा यानि " ब्लॉगिंग का ब्लॉगिंग में ब्लॉगरों द्वारा ही अपमान " के बिल्कुल ही विपरीत है इसलिए कतई मंज़ूर नहीं किया जाएगा । फ़िर ये क्या बात हुई भला , हमारी हरकतें , हमारी बतकुच्चियां टिप्पणियां देख के कौन कह सकता है कि ये हिंदी ब्लॉगिंग  बालक अपने जीवन के एक दशक को देख चुका है , गोया अभी तो बचपन चढा भी नहीं है ठीक से घुटने के बल ठेमहुनिया मार के चल रहा है ऐसे में इतना भारी सम्मान । न कदापि नहीं । चलिए जो भी हो , इतना तो है ही कि ब्लॉगिंग अब अगल कुछ समय तक अपने पूरे उछाल पर रहेगी । वो कहते हैं न शेयर मार्केट उछाल वाली , जी जी जी बिल्कुल वैसी ही ।


सौ बात की एक बात देखने के दो ही नज़रिए होते हैं एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक और ज़ाहिर है कि सबके अपना अपना नज़रिया ही होता है ।हिंदी ब्लॉगर के रूप में मैंने पिछले छ: वर्षों में मैंने हमेशा ही हिंदी को ,हिंदी ब्लॉगिंग को , हिंदी ब्लॉगस को  और हिंदी ब्लॉगर्स को आगे बढने , बढाने , प्रोत्साहित करने , सम्मानित करने वाले हर प्रयास , हर छोटी बडी कोशिश का साथ दिया है और आगे भी दूंगा । फ़िलहाल तो ब्लॉगपोस्टों की बढी रफ़्तार और उस पर आई प्रतिक्रियाओं के दौर ने एक बहाना तो तत्काल दे ही दिया है भाई रविंद्र प्रभात जी की इस कोशिश का धन्यवाद अदा करने के लिए । हैप्पी ब्लॉगिंग एंड कीप ब्लॉगिंग ।

गुरुवार, 3 मई 2012

कोल्ड-बोल्ड ब्लॉगिंग और फ़ास्ट फ़्युरियस फ़ेसबुक






 

हिंदी अंतर्जाल का चेहरा , अपने पैदा होने से अब तक लगातार इतना तेज़ी से बदलता रहा है कि , कभी तो उसको साहित्य अपने निशाने पर लेता है ,ये कह कर कि इस पर जो कुछ भी उपलब्ध कराया जाता है वो स्तरहीन है , जबकि उन्हें भलीभांति मालूम होता है कि अब तो अंतर्जाल पर पूरा साहित्य इतिहास समग्र उपलब्धता की ओर अग्रसर है । कभी मीडिया , इसे अपने आपको न्यू मीडिया कहने कहलाने पर आडे हाथों लेता है । और सबसे कमाल की बात ये है कि इसके बावजूद भी सबको सबकी खबर रहती है और गाहे बेगाहे एक दूसरे की लाइन क्रॉस भी करते रहते हैं । इस बार मामला कुछ ज्यादा अलग इसलिए है क्योंकि इस बार तो एक नज़र सरकार ने भी अपनी टिका दी है और टेढी नज़र टिकाई है । लो जी जुम्मा जुम्मा अभी तो दस बरस भी नहीं हुए । अपने इतने से घंटों दिनों के सफ़र में हिंदी अंतर्जाल ने न सिर्फ़ माध्यम और मंच बदले बल्कि , अपना नज़रिया शैली और दिशा भी बदली । . 


बीच बीच में सेवा प्रदाता कंपनियों के परिवर्तन या ऐसे ही किसी कारणों के लोचा में फ़ंसकर झटके खाते इन मंचों के लिए विपदा पे आफ़त भी कुछ इस तरह की आई कि ,एक एक करके अलग अलग कई कारणों से एग्रीगेटर सेवा साइटें बंद हो गई या रुक गईं । दुनिया देश , फ़टाफ़ट जिंदगी की आदत को अपना रहा था , क्रिकेट भी टेस्ट मैच से लेकर ट्वेंटी ट्वेंटी मोड में पहुंच चुकी थी ऐसे में लोगों को त्वरित से भी तेज़ संवाद और संप्रेषण का हर नया उपाय ज्यादा लुभा रहा था । जिस ब्लॉगर ने अपनी मुफ़्त और अदभुत सेवा यानि ब्लॉग के माध्यम से विश्व अंतर्जाल पर धूम मचा दी और कभी बीबीसी समाचार सेवा की प्रमुख समाचार सूत्र के रूप में विख्यात हुई , उस सेवा को , ट्विट्टर , फ़ेसबुक और यू ट्यूब के बडे विस्तारित जाल ने कडी टक्कर दी । .
इन सब कारणों ने हिंदी ब्लॉगिंग में कोल्ड ब्लॉगिंग का दौर चला दिया । 


 कोल्ड क्या इसे तो चिल्ड ब्लॉगिंग कहिए , वर्तमान में लोकप्रिय एक एग्रीगेटर " हमारीवाणी " के पहले पन्ने की पोस्टें शाम तक भी एक पन्ने तक ही सीमित सी हो कर रह गई हों जैसे । सबके पास नियमित ब्लॉग नहीं लिखने , नहीं लिख पाने और यहां तक कि , नहीं पढ पाने और नहीं टिप्पणी करने या कर पाने के बहाने या कारण थे । लेकिन ट्विट्टर , फ़ेसबुक , प्लस ,और इन जैसे वैकल्पिक मंचों पर गहमागहमी चलती रही । इन सबके बावजूद एक कमाल की बात ये रही कि हिंदी ब्लॉगिंग में मज़हबी कटटरपंथ से जुडी पोस्टों ने गजब रफ़्तार पकड ली । अन्य भाषाओं का तो पता नहीं किंतु मेरा पिछले पांच वर्ष का अनुभव यही बताता है कि किसी भी विवाद के होते ही हिदी ब्लॉगिंग सक्रियता के अपने चरम मोड पर होती है । पिछ्ले दिनों सुना कि ऐसी ही एक पोस्ट से हिंदी ब्लॉगिग ने कोल्ड ब्लॉगिंग से बोल्ड ब्लॉगिंग की इमेज बना ली या बनी हुई घोषित कर करवा दी गई । अब ये तो इत्तेफ़ाक रहा कि एक संयोग भर कौन जाने लेकिन , बोल्ड ब्लॉगिंग ने आपनी अगली पारी के लिए आज के भारत "इंडिया टुडे " के मुख पृष्ठ को ही मुद्दा बना दिया । लेकिन इन सबका प्रभाव ये रहा कि बहुत दिनों बाद बहुत सी पोस्टों पर बहस और विमर्श की एक ऐसी महफ़िल जम गई कि समां बंध गया । .




अब रही बात ब्लॉगर मित्रों दोस्तों की तो , सब कहीं न कहीं लगे तो रहे , कोई प्रकाशन , तो कोई प्रकाशक से उलझे रहे , कई अपनी जिम्मेदारियों और पारिवारिक दायित्वों को संपन्न करने में लगे रहे , तो कई फ़ेसबुक और ट्विट्टर को धुनने में लगे रहे ,कईयों ने तो हार, प्रहार , लुहार तक पर पीएचडी कर डाली इस बीच , हम भी इन्हीं में से एक रहे । कहते हैं कि हिंदी ब्लॉगजगत में हमेशा ही गुटबाजी और समीकरणों की बात होती है , और कमाल ये है कि ये बदलते रहते हैं , खूब बदलते हैं । नाम ले ले के पोस्टें लिखने , एक दूसरे की टांग खींचने और और सभी भाषाई मर्यादाओं को तोड कर दंड पेलने की कवायद तो पहले से भी होती रही है , अलबत्ता इसकी रफ़्तार कम ज्यादा होती रही है । आने वाले दिनों में अंतर्जाल के बहुत सी बंदिशों और पाबंदियों के दायरे में आने की पूरी संभावना है ऐसे में यदि हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले किसी भी वजह से उदासीन होते हैं या अपनी उपस्थिति अपने विचारों से प्रशासन को कोई मौका देते हैं तो ये आत्मघाती कदम साबित होगा । सबसे जरूरी ये समझना है कि यहां विचारों का आना और बिल्कुल सीधे सीधे आना एक ताकत भी है और कमज़ोरी भी ।



रविवार, 15 जनवरी 2012

दिल्ली टू मधुबनी ..वाया मोबाइल






जब से जेब में मोबाइल आया है , और कुछ हो न हो , फ़ोटो खींचने की शौक एक आदत सी बन गई है , और जो फ़ोटुएं निकल कर आती हैं तो हम भी खुश हो लेते हैं कि चलो ससुरा नेगेटिव तो नहीं निकल के आया । आप शायद यकीन न करें मैं अपने मोबाइल से लगभग छ हज़ार फ़ोटो खींच चुका हूं और ....कहा न आदत से बाज़ नहीं आता । बहुत बार मुसीबत में फ़ंसने के बावजूद , फ़ोटो खींच कर सहेजना मुझे पसंद आता है । चलिए आज आपको अपने पिछले ग्राम प्रवास के दौरान की कुछ तस्वीरें दिखाता हूं



















































 









उम्मीद है आपको पसंद आई होंगी

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

हिंदी अंतर्जाल पर चार वर्ष पूरे ..ब्लॉगियाते , फ़ेसबुकियाते और ट्विट्टराते अनुभव






मुलाकातों का सिलसिला चल निकला



फ़िर तो यादें ही यादें


इस बीच हिंदी अंतर्जाल पर कब चार साल का सफ़र पूरा हो गया इसका अहसास ही नहीं हुआ । यूं तो ये सफ़र इतना बडा लंबा और विस्तृत नहीं है कि इसके लिए अभी कुछ लिखा कहा जाए ,किंतु पिछले चार सालों में अंतर्जाल पर बीते बिताए लम्हों को , उसके बहाने बने नए पुराने रिश्तों को , दिनचर्या में आए बदलाव को , और शायद सोच में आए परिवर्तन को थोडी देर ठहर कर टटोलने का मन हो तो फ़िर इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था भला । वर्ष २०११ अपने अंतिम पडाव पर है , बेशक दिन रात में कोई बडा फ़र्क न आता हो , या शायद ठंड के तेवर में भी रत्ती भर का फ़र्क पडता हो इससे ,किंतु ये तो होता ही है कि वर्ष की आखिरी संख्या बदल जाती है ।
और ढेर सारी सुनहरी यादें

शुरूआत में हिंदी अंतर्जाल से परिचय सिर्फ़ ब्लॉगर तक ही हुआ था वो भी एक खूबसूरत संयोग से । शायद सितम्बर अक्तूबर महीने की बात है जब कादम्बिनी ने अपने एक अंक को ब्लॉग और ब्लॉगर्स पर आधारित करके आठ पेज के एक लबें आलेख के साथ साथ बहुत कुछ बताया समझाया था ब्लॉग के बारे में । उस अंक और अपने एक सहकर्मी जो उस समय कंप्यूटर में और अब भी मुझसे दक्ष थे , उनकी मदद से ब्लॉग भी बन गया और ब्लॉगिंग भी शुरू हुई । हम दोनों के लिए ही ये एक नया अनुभव था । हालांकि उस वक्त हिंदी अंतर्जाल से सायबर कैफ़े में बैठ कर सिर्फ़ एक डेढ घंटे की नियमित जानपहचान से ज्यादा तक बात नहीं पहुंची थी । अंतर्जाल पर बिताए उन एक घंटों के दौरान ध्यान सिर्फ़ ब्लॉग लिखने और पढने तक ही सीमित रहता था । हमारे लिए एक इस नए फ़लक पर विचरने के अलावा हिंदी अंतर्जाल से जुडने का एक दिलचस्प कारण ये भी रहा कि जब भी सहकर्मियों और उस समय के मीडिया मित्रों को जैसे ही किसी ब्लॉग का पता थमाया ,पृष्ठ खुलने पर हिंदी में सामग्री को देख कर उनके हर्षमिश्रित चेहरे को देखने का मचा ही और होता था , और यकीन मानिए कि ऐसा अब भी कई बार हो जाता है ।कल्पना करिए कि उन्हें जब ब्लॉगवाणी ,चिट्ठाजगत ,हिंदी ब्लॉग्स , नारद , सारथि , रफ़्तार जैसे एग्रीगेटर्स की झलक दिखाई जाती तो क्या होता होगा ।
विमर्श ,बहस , बैठक


गूगल , वर्डप्रेस ,या किसी भी अन्य प्लेटफ़ार्म ने अब तक , हिंदी अंतर्जाल पर लिखने पढने वाले ब्लॉगर्स के लिए कहीं से भी धेले भर आर्थिक लाभ नहीं देने के बावजूद हिंदी ब्लॉग्स की संख्या बढती रही ।और तो और कई जुझारू साथियों ने अपने अपने समाचार पोर्टल और सामूहिक ब्लॉग्स की ऐसी धूम मचाई कि कहीं इसे न्यू मीडिया का नाम दिया जाने लगा तो कहीं भविष्य का साहित्य संसार ।  इसके साथ ही बढती रही हिंदी अंतर्जाल द्वारा उत्पन्न की जा रही चुनौती । मीडिया , साहित्य और सरकार तथा प्रशासन तक के लिए ये उनकी आंख की किरकिरी बन कर उभर आया । सबसे कमाल की बात ये रही कि , तुम मुझे चाहो या मुझसे नफ़रत करो ,मगर मुझे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते जैसे आज हिंदी अंतर्जाल को दरकिनार करना बहुत कठिन हो गया है ।
कभी तिलयार

हिंदी अंतर्जाल के प्रारंभिक दो वर्ष अनियमितता और बेतरतीबी से ही बीते , और इसके कारण भी कई थे । घर पर कंप्यूटर आने के बाद हमारे जैसे लिखन पठन के व्यसनी के लिए इससे बेहतर साथी और कौन हो सकता था । और फ़िर ऐसा भी नहीं था कि यहां सबकुछ आभासी ही है ,बल्कि कभी कभी तो यहां उससे ज्यादा देखने और महसूसने को मिला जो वास्तविक जीवन में शायद उतना तल्ख नहीं रहा है अब तक । मसलन ,कुछ दिनों तक एग्रीगेटर्स और उस समय के दो बेहतरीन संकलकों पर लगातार बमबारी , सक्रियता क्रम और पसंद नापसंद वाले बटन को लेकर , एक से एक , जी बिल्कुल एक से बढकर एक तहलकी (यूं तो ये तहलका का वर्जन है लेकिन जिसका अर्थ तल से हलकी ) रिपोर्टें आईं । पोस्टों में ही संकलंकों का नाम लेकर उन्हीं की छाती पर रोज़ क्विंटल क्विंटल भारी चार्ज़शीट लादी गई ।

अब इसका और इसके साथ ही अन्य बहुत सी कारगुजारियां का  कुल परिणाम ये रहा कि एक एक करके दोनों ही संकलक , ब्लॉगरों को गड्डम गड्ड छोड के चलते बने । हालांकि , चूंकि दोनों अभी मौजूद हैं तकनीक की भाषा में कहें तो सर्वर पर हैं तो कभी न कभी यदि वे वापसी करें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए । लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि हिंदी ब्लॉग के पाठकों ने फ़िर पढने के लिए अपने अपने विकल्प तलाशे । इस प्रयास में कई बेहतरीन संकलक ,जैसे हमारीवाणी , इंडली , ब्लॉगप्रहरी , ब्लॉगमंडली ,बलॉगगर्व , के अलावा दर्ज़नों फ़ीड क्ल्सटर प्लेटफ़ार्म , तथा बहुत सारे ब्लॉगस्पॉट संकलक ब्लॉग्स पाठकों के सामने निकल कर आए ।

कभी सांपला

बहुत सारी उथल पुथल , सम्मान , आरोप , बैठकों , के बीच पिछले कुछ महीनों में ये बदलाव दोस्तों ने महसूस किया कि , हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति रुझान कम हुआ है ,पोस्टों पर पाठकों की संख्या और टिप्पणियों की संख्या में भी बहुत कमी आ गई है । इसके लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का बढता प्रभाव भी एक कारण माना गया । लेकिन इससे अलग एक बहुत बडा कारण खुद गूगल की सेवाओं , विशेषकर जीमेल और ब्लॉगर में बहुत सारी गडबडियों का होते रहना भी जरूर रहा । आज भी हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर गूगल और वर्डप्रेस जैसी सेवा प्रदाता कोई भी कंपनी के पास कुछ भी आम या खास नहीं है । यहां तक कि ये गारंटी भी नहीं कि कल को आपका जीमेल खाता या ब्लॉगर खाता ही नदारद मिले । शायद इसलिए मुझ सहित बहुत सारे मित्र , इस ठिकाने को पुख्ता करने के लिए अपने पक्के ठिकानों की ओर बढ चले ।
नए ठिकाने का थंबनेल


हिंदी ब्लॉगिंग से जुडे दोस्तों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है ,नाम लूंगा तो मुझे यकीन है कि चाहे लाख कोशिश कर लूं ,किसी न किसी का नाम तो छोड बैठूंगा ही । फ़िर इस ब्लॉगजगत से लेकर , फ़ेसबुक , ट्विटटर और अन्य तमाम मंचों पर इतना स्नेह व मान मिला , अच्छे बुरे वक्त में , जो साथ और अपनापन मिला , और अब भी मिल रहा है ,उसे सिर्फ़ महसूसा जा सकता है ,लिखा नहीं ।ये एक कमाल का संयोग रहा कि , अपने लगभग दो दर्ज़न ब्लॉग्स में से चार ब्लॉग्स पर साथी अनुसरकों की शतकीय संख्या को पाना , लगभग एक हज़ार पोस्टों , और इतनी ही तस्वीरों की यादों समेत ,मेरी मौजूदगी को बेपनाह स्नेह मिलता रहा ।



ये जरूर है कि आने वाले समय में हिंदी ब्लॉगिंग एक मंच के रूप में , एक माध्यम और एक विधा के रूप में ,एक तकनीक के रूप में , एक वर्ग के रूप में , एक विचारधारा के रूप में स्थापित हो इसी दिशा में , मैं अंतर्जाल की अपनी इस यात्रा को आगे बढाऊंगा । बेशक इस साल बहुत सी कडवी यादों और घटनाओं में से एक , गुरूवर और मित्र स्व. डॉ. अमर कुमार  तथा फ़िर हिमांशु भाई का अचानक चले जाना रहा और कहीं न कहीं ये जता बता गया कि , जब तक साथ है , अभिव्यक्त करो ...करते रहो , करते रहो । मंच चुनो ,माध्यम चुनो , तरीका और शैली भी जो पसंद हो चुनो लेकिन इंसान हो तो इंसान की भावनाओं को अभिव्यक्त करो , क्योंकि ये समाज के अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है । और कमाल देखिए कि हम खुद भी इस बीच बहुत बदलते रहे ,













इस उम्मीद के साथ कि आने वाले दिन , हमारी आपकी सोच के साथ ही बदलेंगे और ठीक वैसे बदलेंगे जैसा कि हमने आपने चाहा है , मैं इस सफ़र के अगले पडाव की ओर बढता हूं ,मुझे यकीन है कि हमेशा की तरह आप मेरे साथ हैं , आप सबको शुभकामनाएं .......साथ , स्नेह , विश्वास , बनाए रखिएगा ।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सांपला ......एक मुलाकात , हरियाणा के गांव की ,अंतर्जाल के बाशिंदों से







पिछले दिनों व्यस्तता के बीच ये भी ख्याल नहीं रहा कि नेट कनेक्शन भी जाने कबके अनशन पर जा चुके हैं , वर्ष २०११ के जाते जाते बहुत कुछ घट घटा रहा था कुछ हमारे बेहद पास भी । बहरहाल हमारे लिए तो कुछ ऐसा सा फ़ील हो रहा था मानो रोजिन्ना कोई खबर इंतज़ार में बैठी हो जैसे , फ़िर सोच रहे थे कि कह रहा है भाई लोग कि वर्ष २०१२ से ज्यादा का लाईफ़ टाईम वैलेडिटी का उम्मीद मत करिए । लेकिन एतना भेरी इंपोर्टेंट समय में भी हमारा ब्लॉगियाना तो दूर फ़ेसिबुकियाना भी दूभर हो गया था । जर्मनी से राज भाटिया जी के दिल्ली आगमन की सूचना और पिछले बरस की तिलियार झील परिसर ब्लॉग बैठकी की याद से अंदाज़ा लग गया था कि फ़िर इस बार ये हम ब्लॉग मित्रों के आमने सामने और कुछ पल साथ साथ बिताने का बहाना बनेगा ।


इस बीच अंतर सोहिल की आती पोस्टों और राज भाई के ब्लॉग एग्रीगेटर पर भी इसकी सूचना आ रही थी , स्थान का नाम पता चल चुका था ..सांपला , दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा में स्थित और अपने अंतर सोहिल जी का ग्राम । वहां पहुंचने पर पता चला कि सांपला सांस्कृतिक मंच द्वारा पिछले वर्ष से वर्षांत समारोह के रूप में काव्य सम्मेलन का आयोजन किया जाना शुरू हुआ था और ये दूसरा वर्ष था ।




दिन में सभी ब्लॉगर मित्रों के मिल बैठ बतियाने की योजना ने इसे और भी यादगार बना दिया । इस सिलसिले में मेरे पडोसी ब्लॉगर भाई शाहनवाज़ सिद्दकी जी से मेरी बातचीत हो रही थी और वहां चलने न चलने को लेकर आखिर तक असमंजस की स्थिति बनी हुई थी । बहरहाल चौबीस दिसंबर की सुबह आठ बजे ये तय हुआ कि सांपला पहुंचा जा सकता है । शाहनवाज़ भाई , राजीव तनेजा जी और खुशदीप सहगल जी , संवाद तीनों के बीच चल रहा था और सांपला पहुंचने की योजना भी । खैर शाहनवाज़ भाई और मैंने तय किया कि हम शास्त्री पार्क मेट्रो से आगे का सफ़र तय करेंगे , बस या रेल से ये राजीव भाई से पूछ कर तय किया जाएगा । राजीव भाई से बात हुई तो आदेश हुआ कि नांगलोई रेलवे स्टेशन ,मेट्रो स्टेशन पर उतरें वे वहीं प्रतीक्षा कर रहे हैं ।

मेट्रो में सफ़र करने वालों में नियमित न सही लेकिन कह सकते हैं कि बहुत बार तो किया ही है । शाहनवाज़ भाई और मैं , बातों में मशगूल थे और ज़ेहन में स्टेशन था नांगलोई मेट्रो स्टेशन , लेकिन मेट्रो रूट मानचित्र पर देखा तो पाया कि वो उस रूट पर नहीं है । ओह ! यानि पहली गडबड , अब तो वापस बस अड्डे वाले मेट्रो स्टेशन पर जाना होगा ,लेकिन नहीं , सीट पर बैठे कुछ युवा जो हमारी बातों से स्थिति समझ चुके थे उन्होंने बताया कि नहीं , इसके लिए मेट्रो इंदरलोक मेट्रो स्टेशन से बदलनी होगी , उफ़्फ़ बाल बाल बचे । उतरे और रूट बदला , हमारा गंतव्य नांगलोई मेट्रो स्टेशन , वहां भी चक्कर पे चक्कर एक नांगलोई मेट्रो स्टेशन और दूसरा नांगलोई रेलवे स्टेशन मेट्रो स्टेशन (एक बात और ये हुई कि हमने टिकट पीरागढी स्टेशन तक का लिया था और अब हम उतरने वाले थे उससे तीन स्टेशन आगे तो राजीव भाई द्वारा पता चला कि उतरने पर बांकी का किराया वहां चुकाया जा सकता है , चुकाने का तरीका भी बडा दिलचस्प किस्सा है फ़िर कभी ) , आगे का हाल ये था कि राजीव भाई ने कहा ..खंबा नंबर ४२० पर मिलिए । उफ़्फ़ यानि घनघोर इतिहास रचने की फ़ुल कुल तैयारी थी ।

खैर वहां ब्लॉगर मंडली को देखते ही एक एग्रीगेटर के फ़्रेश पेज खोलने का मज़ा मिल गया । वहां से काफ़िला दो वाहनों में सांपला की तरफ़ बढ निकला । राजीव तनेजा जी  पायलट की सीट संभाल चुके थे और हम उनके मोबाईल में पेसल वाला दिशा पता सूचक आन कर दिए थे , अब सारा टेंसन या तो ऊ सूचक यंत्र को था या राजीव भाई को हम मस्त उसको पकड के बैठे रहे । बीच बीच में फ़ोन ऑफ़ फ़्रैंड लाईफ़ लाईन का यूज करते हुए गंतव्य स्थल पर पहुंच गए । मौसम खुशगवार , चटक खिली हुई धूप । धर्मशाला के विशाल अहाते में गोलाकार बैठे सांपला के युवा और कुछ हमारे अंतर्जालीय साथी ।




बडा सकून सा महसूस रहे थे कि तभी आसपास मौजूद सुरक्षा दस्ते का आभास हुआ । पता चला कि ब्लॉगर मिलन का पूरा क्षेत्र इन विशेष वानर कमांडो की गहन सुरक्षा दायरे में है ।







सांपला पहुंची पहली खेप

पहली खेप,दूसरी खेप की खोज खबर लेते हुए



स्वागत को लपके अंतर सोहिल



धर्मशाला का मुख्य द्वार



लो जी दूसरी टोली भी आ पहुंची , श्रीमती राज भाटिया , अंजू चौधरी , संजू तनेजा जी , वंदना गुप्ता और राजीव तनेजा जी , जाकिट वाले महफ़ूज़ अली

हाय मैं ,महफ़ूज़ अली ..बोईंग सात सौ सात से उतर के हाथ डोलाते हुए

वंदना जी कार से बाहर ,महफ़ूज़ भाई पोज़ मारते हुए और शाहनवाज़ भाई कार के अंदर झांकते हुए

बस पोज़ बदल गया है





देखिए कैसे गोलमगोल हुए खडे हैं सब ,मुकेश सिन्हा ,केवल राम जी , संजय भास्कर , वंदना गुप्ता , अंजू चौधरी , संजू तनेजा और महफ़ूज़ अली

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श्रीमती राकेश , सर्जना शर्मा ,केवल राम जी , श्री एवं श्रीमती राज़ भाटिया ,पीछे संजय भास्कर , वंदना गुप्ता जी एवं संजू तनेजा जी

ब्लॉगर बैठक की सुरक्षा के लिए शार्प शूटर की भी व्यवस्था थी 

चाय पकौडे चालू आहे

वही वही चालू आहे


 सभी आपस में घुल मिल रहे थे ,लेकिन ये मिठास और मीठी हो रही थी जब ग्राम परिवेश में पहुंचे हम सब अंतरसोहिल के स्नेह से डूबे मीठे गन्ने चूसने में मग्न हो गए । आगे का किस्सा कुछ यूं रहा


कुछ धूम गर्म थी , कुछ ईख नर्म थी ,
थोडी सी तकल्लुफ़ , थोडी मीठी शर्म थी



मगर , चाय पकौडों की गर्मी और गन्नों के मीठे रस के दौर के बीच , बांकी साथियों के इंतज़ार का पल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला , । घडी दोपहर के दो बजा रही थी । हम अहाते में पडते धूप को सेंकने के लिए गोले को सरकाते जा रहे थे । दरवाज़े पर फ़िर हलचल हुई । लंबे चौडे पद्म सिंह के साथ ममता की प्रतिमूर्ति इंदु पुरी , हम सबकी इंदु मां , मानो भावनाओं का ऐसा सैलाब उठा लाईं थी कि सब कुछ बहता चला गया उन आंसूओं के साथ , सम्मान के साथ सब अंदर हॉल की तरफ़  बढ चले । योगेंद्र मौदगिल , अलबेला खत्री जी भी हमारे बीच पहुंच चुके थे । इस बीच अंतर सोहिल समय को बीतता देख आग्रह कर चुके थे कि औपचारिक अनौपचारिक मुलाकात सिलसिले को प्रारंभ किया जाए या नहीं तो पहले भोजन किया जाए । किंतु तय हुआ कि पहले परिचय और बातचीत का दौर चले । अंतर सोहिल ने जिम्मा हमें थमाया और हमने पूरी बहादुरी से पहला नंबर पदम भाई को थमाया । इसके बाद ब्लॉगर नाम , ब्लॉग नाम , अपना परिचय और अनुभव की बातें चल निकलीं । हमारे बीच सांपला सांस्कृतिक मंच से जुडे सांपला के नवयुवक , विद्वान लोग भी सम्मिलित हो चुके थे । परिचय दौर हमेशा ही दिलचस्प रहता है और सांपला के एक दिलचस्प डॉ साहब , भाई अलबेला खत्री और योगेंद्र मौदगिल जी की उपस्थिति ने और प्रभावी बना दिया ।




अब तो अगले पूरे बरस बस मीठी मीठी कविताएं चलेंगी

छील दना दन ,चूस दना दन


अलबेला खत्री जी ,वंदना गुप्ता ,पदम सिंह अंजू चौधरी , अंतर सोहिल ,महफ़ूज़ अली ,खुशदीप सहगल जी ,कनिष्क कश्यप जी ,मुकेश सिन्हा ,केवल राम और संजय भास्कर



खुशदीप सहगल , राजीव तनेजा , शाहनवाज़ और संजय अनेजा जी उर्फ़ मो सम कौन

हरदीप , मुकेश सिन्हा जी , संदीप पवार उर्फ़ जाट देवता और राकेश जी एवं श्रीमती राकेश जी


बातचीत तो चल रही है


पदम भाई राज भाई के गले लगते हुए और इंदु पुरी के स्नेह बंधन में संजू तनेजा

इंदु मां , तुस्सी ग्रेट हो





खुशदीप सहगल जी ने अपने अनुभव बांटते हुए बताया कि किस तरफ़ वे राकेश जी और सर्जना जी को ब्लगिंग में खींच लाए और आज दोनों अपना एक अहम मुकाम बना चुके हैं । योगेंद्र मौदगिल जी ने अंतर्जाल और ब्लगिंग  को अभिव्यक्ति का एक नया फ़लक की संज्ञा देते हुए इसके बढते महत्व को बताया । हास्य कवि अलबेला खत्री जी ने एक के बाद एक कई सारे ब्लॉग बनाते जाने का दिलचस्प किस्सा बयां किया । शाहनवाज़ भाई ने तकनीकी बातों पर और अपनी  भविष्य की योजनाओं का खुलासा किया । बातों बातों में टिप्प्णियों की घटती संख्या और नियमित पाठकों की सक्रियता में कमी, इसमें फ़ेसबुक और प्लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका आदि पर भी विमर्श चलता रहा । वंदना गुप्ता , इंदु पुरी और अंजू चौधरी ने ब्लॉगिंग के प्रति अपना असीम स्नेह प्रकट करते हुए इसे अपने बेहद निकट बताया । 
मैंने अपने विचार रखते हुए , ये कहा कि , मौजूदा समय संवाद का समय है । आज सूचना का इधर से उधर होना और इतनी तीव्र गति से होना बहुत बडी उपलब्धि है । विश्व समाज को किस तरह से एक आत्मदाह की मोबाइल क्लिपिंग ने परिवर्तन और जनांदोलन के जन्म का इतना मजबूत कारण दे दिया कि अब स्थिति भारत में भी ऐसी पहुंच चुकी है कि सरकार और प्रशासन अपनी भावाव्यक्ति जाहिर करने वालों पर नज़र रखने की फ़िराक में है । मैंने कहा कि आज , हम अंतर्जाल के मित्र इस ब्लॉगर बैठक के बहाने दिल्ली के समीप बसे इस कस्बे से न सिर्फ़ खुद मुलाकात करके जा रहे हैं बल्कि अब जब हम अपनी बातों में , अपनी यादों में सांपला की चर्चा करेंगे तो सांपला के लिए भी ये खुशी की बात होगी और भविष्य के लिए सहेजी जाने वाली अनमोल धरोहर साबित होंगी । मैंने वहां ब्लॉगर बनने की इच्छा दिखाने जताने वाले बहुत से नवयुवक साथियों को स्पष्ट किया कि कोई जरूरी नहीं कि आप ब्लॉगर बनना चाहते हैं तो आपको लिखना पढना जरूरी है । मोबाईल का उपयोग करिए ,मोबाइल से तस्वीरें खींच कर उन्हें दुनिया तक पहुंचाइए , कोई समस्या , कोई उपलब्धि या कोई भी विशेष साधारण , कुछ भी कल्पनीय अकल्पनीय , जो भी जैसे भी चाहें , लेकिन खुद को अभिव्यक्त करिए । वहां मौजूद सांपला के युवा साथियों ने जिस गर्मजोशी और स्नेह से हमारा स्वागत किया वो नि:संदेह दिल को छू गया । वर्षांत पर काव्य सम्मेलन के आयोजन की स्थापित हो रही परंपरा से भी वे खासे उत्साहित और आनंदित दिख रहे थे ।




 इसके पश्चात सभी भोजन में , और भोजन के साथ बातों में मशगूल हो गए । सर्दी की दुपहरिया , यी बीती वो बीती । वापसी की तैयारी हो ली । जिन मित्रों को रात के काव्य सम्मेलन के लिए रुकना था उनसे विदा लेकर दिल्ली की सवारियां निकल लीं । वापसी भी बिना गडबड के होती तो क्या होती । वापसी में हुआ ये कि जैसे ही हम मेट्रो पकडने प्लेटफ़ार्म पर पहुंचे फ़ोटोग्राफ़र की आत्मा चित्कार उठी और हम अपने मोबाइल से और शाहनवाज़ भाई बाकायदा कैमरे से लैस , जो तडातड फ़्लैश ,क्लिक क्लिक , तभी सामने से मेट्रो आती दिखी ,कैमरा चालू आहे । रुकते ही चालक कक्ष का दरवाज़ा खुला और शाहनवाज़ भाई को बुलाया गया ,पीछे जो था उसे भी आवाज़ दी गई । हमारी समझ में माज़रा ठीक ठीक तो समझ नहीं आया लेकिन इतना अहसास हो चुका था कि कुछ गडबड है । चालक ने बताया कि आपने मेट्रो रेल की सामने से तस्वीर क्यों खींची , सुरक्षा अधिकारी को बुलाकर हमें नीचे बने अधिकारी के कक्ष की ओर ले जाने को कहा गया । हमने पूरी गुजारिश और क्षमा मांगते हुए बताया कि ऐसा भूलवश हुआ है और कहीं भी फ़ोटोग्राफ़ी प्रतिबंधित है जैसी सूचना नहीं लगे होने के कारण ये हुआ । नीचे सुरक्षा अधिकारी ने बात को समझते हुए हमें भविष्य में ऐसा न करने की सलाह देते हुए जाने दिया ।

वापस लौटते हुए ठंड का प्रकोप बढ चुका था और हम सब इस साल के एक दिन को यादगार दिन , और कभी न भूलने वाली स्मृतियों को सहेज़ चुके थे । उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में इस तरह की मुलाकातें , हिंदी ब्लॉगिंग में सकारात्मक माहौल लेकर आएंगी ।











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