शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

तोपखाना , तेलीबाग ,ओपन थियेटर,बाबा की मजार ..हॉकी, कंचे ,पतंग ,सायकल.....और एक शहर ...नाम था.....लखनऊ ...






जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में मैंने कह भी दिया था , कि अपने शुरूआती दिनों के कुछ सबसे बेहतरीन पलों को मैंने ,लखनऊ की गलियों में ही बीतते हुए महसूस किया था .............और कहूं कि अब तक महसूस करता रहा हूं ।लखनऊ के सेंट्रल स्कूल में दूसरी कक्षा का वो पहला दिन ...........आदत के अनुसार रोते हुए ही स्कूल पहुंचा था ...और मैं उन बच्चों में से ही एक था ...जो बहुत समय तक तुतलाते हैं ......... बस पहला दिन ही याद रह गया था बहुत दिनों तक .... रिसेस पीरीयड में तो ..अपना गर्दभ रुदन हमारी ,मैडम के इतना नाकाबिले बर्दाश्त हुआ कि उन्होंने हमे चुप कराने की खातिर ....अपना लंच बॉक्स उस दिन हमारे नाम कुर्बान कर दिया.........दीदी की सहेलियों ने बहुत समय तक हमारी तुतलाती बोली को ..अपने सब टीवी समझ कर उपयोग किया ...............


लखनऊ
के दोस्तों में अनिल विनोद की जुडवां भाईयों की जोडी हम दोनों , भाईयों की जोडी के साथ मिल कर बिल्कुल जहां चार यार मिल जाएं वाली गैंग सी बन गई थी .......और उस जमाने के खेल भी उफ़्फ़ ....क्या खेल थे वे भी .............स्कूल में , कागज के तरह तरह के खिलौने , कैमरा , नाव , डौगी .....और जाने क्या क्या .....सोचता हूं उस कागज के कैमरे को बना कर जो खुशी हमें मिलती थी वो आजकल के बच्चों को फ़ेसबुक पर कोई मैसेज भेज कर कहां पाता होगा ?

वो
कंचों की रंगबिरंगी और चंचल चटकीली दुनिया ......वो मिट्टी की गुच्चियों में कंचों को पिलाना ......और फ़िर वो सर्फ़ के बडे वाले मजबूत गत्ते के गोल डब्बे में ...सैकडों कंचे संभाल कर रखना ......जब एक साथ देखो तो लगता था मानो हर कंचे में एक आकाशगंगा समाई होती थी .................फ़िर वो सर्फ़ का डिब्बा सिर्फ़ कंचों के खजाने को ही तो नहीं समेटे रहता था ........उसमें बाद में हमने माचिस की डिब्बियों के कवर भी हजारों की संख्या में भर के रख लिए थे ........ओह और उसका वो ताश टाईप खेल ............ जाने कैसे कैसे खेल बनाए थे हमने ........सायकल के पुराने टायर को डंडे से मार मार के ....पूरी शाम दौडाते रहना ....................वो सडकों पर देखे दिखाए ........सांप नेवले की लडाई ............बंदर बबंदरिया के खेल ......और जादू भी। वो आकाश में उडती चील की परछाई के साथ साथ भागना ............वो कोयल के साथ कू कू कू .......बोलते जाने की आदत ..........और वो मैनों की संख्या को देख देख कर बोलना..........वन फ़ॉर नथिंग , टू फ़ॉर गेस्ट .......थ्री फ़ॉर ..पता नहीं और फ़ोर फ़ॉर ..गेस्ट .....और आगे भी ..


लखनऊ में जिस एक बात ने हमेशा ही बांधे रखा ............वो था ..जितनी धूम से होली मनती थी , उतनी ही रंगीन ईद हुआ करती थी , ..वो पीर बाबा की मजार और वहां के प्रसाद में मिलने वाले बताशे,...और उसी पीर बाबा की मजार के पास वो पापा का फ़ौजी थियेटर .........मुझे याद है कि फ़ौज में रहते हुए पापा की जहां जहां पोस्टिंग हुई वहां की और कुछ जिन बातों में समानता थी उनमें से एक थी ओपन थियेटर ..यानि फ़ौजी सिनेमा ............क्या बात थी उस पिक्चर हॉल की ...कई जगहों पर हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन सिनेमा दिखाया जाता था तो कई जगहों में हफ़्ता भर एक ही पिक्चर देखी जाती थी .............हा हा हा ........पिक्चर के बीच में , वो झमाझम बारिश, का आना ....और सब के सब भीगते हुए पिक्चर देखते थे ......

ओह
उस प्यारे से घर को कैसे भूल सकता हूं , कॉलोनी के शुरूआत में ही , पहला घर , खुल्ला खुल्ला दो बडे बडे कमरे , आगे मैदान के बराबर खुली जगह और पीछे बहुत ही बडा अहाता .........वहां पहली बार ही तो ..धनिया के , मूली के , गाजर के , भिंडी के , नींबू के , मिर्च के और जाने किन किन पौधों से पहला परिचय हुआ था ........पिताजी ने लगाए थे ..और उनकी देखभाल भी ऐसी होती थी जैसे , वे भी घर के ही बच्चे हों .........क्या खूब जंचती थी वो क्यारियां सोचता हूं कि आज पिताजी की वो आदत , और वो अहातों और आंगनों वाला मकान हमें भी मिली होती तो ...टमाटर , आलू , गोभी के बढते दामों से हम खुद को तरकारी प्रूफ़ कर चुके होते ............

वहीं
तो सायकल चलाना ....सीखना शुरू किया था ........हा हा हा वो कैंची स्टाईल की सायकल चलाने की अदा .............वाह और क्या रोकते थे उसे ...........बिल्कुल दोनों पैर का घसीटा मार के ...और बहुत बार तो बहुत से लोगों के दोनों टांगों के बीच जाकर भी रुकती थी ..धडाम से ........... अजी तब ये टोबू की सायकलें कहां .......तब तो इंतज़ार होता था कि , कब पापा की आंख लगे ....और कब मौका मिले ...सायकल पर हाथ आजमाने का ........ हेलमेट की टेंशन ......ना लायसेंस की ....कहीं ठोके ठुकाए तो भी घुटना और कोहनी का ही नुकसान का खतरा था बस .........और उसी कैंची स्टाईल से सायकल चलाने में भी रेस तो लगती ही थी .....

बरसात
का मौसम ..........वो सफ़ेद मोटी पन्नी की बरसाती ........आज तक दुकान में वैसी शक्ल तक का रेन कोट देखने को भी नहीं मिला .......जाने बापू जी ने ..कहां से उस मोटी पन्नी का जुगाड कर के ...दर्जी को पटा कर वो अनोखी सी बरसाती तैयार करवाई थी ..........और उसकी वो टोपी ......तो बस अपने लिए भी वो स्कूल बैग को बचाने के ही काम आती थी , बांकी का सारा कोर कसर तो हम पूरी तरह भीग कर पूरा कर लेते थे ..........ओह वो बरसात ...और उससे उफ़नते नाले .....नदियां ....।इस कमब्खत दिल्ली की गलियों में जब नाली के बजबजाते हुए पानी को बारिश के अठखेलियां करते हुए पानी से मिलते देखता हूं , समझ ही नहीं आता कि नाली के पानी को खुशी ज्यादा होती होगी ,या बारिश के पानी को अपनी बदकिस्मती का गम ज्यादा होगा .......


ओह
..........लखनऊ ..........तुझसे जुडी यादें ...और जिंदगी का एक हसीन टुकडा...........जाने कब फ़िर किस मोड पर तेरे आगोश में ....अपना वो खोया ...सब कुछ तलाशूंगा ..........मुझे यकीन है कि ......बेशक ..तूने अपना चेहरा मोहरा बदल लिया होगा ..........मगर तेरी गोद अब भी मुझे जरूर पहचान लेगी ...........पहचान लेगी .............

रविवार, 11 जुलाई 2010

मेरी यादों का एक शहर , लखनऊ .........अजय कुमार झा





पिताजी की घुमक्कडी नौकरी ने हमें जाने कितने ही शहरों से रूबरू कराती गई ........न सिर्फ़ रूबरू बल्कि कहूं कि ..उन शहरों में हमारी यादों की निशानियां छपती रहीं ....और सोचता हूं कि इन शहरों से ..उनमें बिताए लमहों से ...उन सुख दुख के दिनों से ....उन दिनों की पांच पैसे , दस बीस पैसे , चवन्नी अठन्नी वाली जेबखर्ची के दिनों से ....वो कंचे , पतंग , और क्या था वो ....हा हा हा टायर को डंडे से चलाते हुए गोल घुमाते हुए ..घंटो दौडाना ......मानो देखने वाले को यही पता नहीं चलता था कि ..टायर हमें दौडाए हुए है या कि हम ही उसे ठोंक रहे हैं ...........और भी जाने किन यादों से ..नाता ..वाया वो शहर ही हमसे जुडी हुई है । जबलपुर ,सिलिगुडी,फ़िरोज़पुर, लखनऊ, दानापुर,पटियाला,.................ओह फ़ेहरिस्त लंबी है ...कभी कभी तो लगता है कि जीवन से भी लंबी ये फ़ेहरिस्त ही है ........और हो भी क्यों न आखिर एक फ़ौजी के परिवार की यही तो परंपरा रही है ..........।

आज दिल जाने क्यों लखनऊ की गलियों की ओर झांकने बैठ गया .............लखनऊ ...ओह वो शहर जहां शायद पिताजी फ़ौजी पोस्टिंग का कुछ सबसे ज्यादा समय बीता था .....कहने को तो मैंने इस शहर में अपनी दूसरी कक्षा से कक्षा सात तक की पढाई पूरी की थी .....हां इतनी ही तो उम्र थी तब ....मगर आज तक जिंदगी ....उस उम्र में बिताए एक छोटे से पल को भी दोबारा जीने को तरसती है ........और बस तरसती ही रहती है ।लखनऊ से हमारा परिचय बिल्कुल वैसे ही हुआ था जैसे पापा के साथ जाने वाले अन्य सभी शहरों से होता था ।पूरी युनिट का एक साथ मूवमेंट और्डर ..........सबके परिवार ..लगभग एक ही ट्रेन ..जो शायद उन दिनों विशेष तौर पर चलाई जाती थी में सवार होकर ....एक स्टेशन से दूसरे तक पहुंचते थे .......वहां स्टेशन मौजूदा फ़ौजी ट्रक ......वही वन टन , टू टन और थ्री टन से लद कर फ़ौजी कैंट क्षेत्र में स्थित फ़ौजी क्वार्टर्स तक छोडते थे ..।समय का कोई खास उल्लेख जरूरी नहीं ...क्योंकि फ़ौजी जीवन में मैंने अपने पिताजी के लिए दिन रात का कोई भी खास फ़र्क नहीं देखा ....और ऐसा ही हर फ़ौजी के साथ होता है .....।


तो लखनऊ की गलियों में याद आते हैं पहले ..अपने वो दोनों फ़ौजी क्वार्टर्स ..पहला वाला सेंट्रल स्कूल के ठीक बगल में ..जगह का नाम भी अब तो याद नहीं ....और दूसरा वो वहां जहां कभी तेलीबाग ...हां शायद ..इसी नाम की कोई जगह या मंडी हुआ करती थी ...। मुझे या शायद हमें ..पूरे परिवार को वो दूसरे वाला ही ज्यादा पसंद था । कैंटोनमेंट एरिया में , तोपखाने के पास.....एक बडा सा मकान .....खूब खुले खुले कमरे ....आगे पीछे खुले मैदान जितनी जगह , और ऐसा ही पूरा बसा हुआ । और क्या शानदार बस्ती बसी हुई थी वो ..हरेक फ़ौजी कॉलोनी की तरह ......एक बिहारी परिवार , तो अगला बंगाली , एक सरदार जी , तो अगले मराठा परिवार , कोई तमिल है , तो अगला ठेठ मगही परिवार , ..........ओह क्या कहूं ....क्या नज़ारा हुआ करता था ..........कौन सा त्यौहार, कौन सा पर्व ऐसा छूटता था जो उन कॉलोनियों में न मनाया जाता हो,
...............सकूल भी वहां से इतना ही दूर था कि हम मजे से से धूल उडाते हुए ...और बारिश के दिनों में बस्ते को पन्नियों से ढंकने के बाद मजे में फ़चफ़चाते हुए आने जाने का भरपूर आनंद लिया करते थे .सोचता हूं कि उस मुकाबले जो आजे के बच्चे उन डिब्बोंनुमा मारूति वैन में ठुंस कर जाते हैं तो उन्हें तभी लग जाता होगा कि ...कलियुग आ ही गया है ..वहां उस समय दो सेंट्रल स्कूल हुआ करता था .....एक प्राइमरी स्कूल और उससे थोडा सा दूर जाकर ..छठी कक्षा से आगे .............

लखनऊ का जो भी जैसा कुछ मुझे अब तक याद है , वो सब बिल्कुल ऐसा है जैसा कि किसी की तिजोरी में सबसे सुरक्षित जगह छुपा कर रखा हआ सबसे अनमोल वस्तु ....कहां से शुरू करूं ......बॉटैनिकल गार्डन , कुकडैल वन , बडा ईमामबाडा , छोटा इमामबाडा , भूल भुल्लैया, वो बडा सा रामलीला ग्राऊंड , वो सदर बजारा , वो हज़रतगंज , वो क्या था नाम ही भूल रहा हूं उस लेडिज़ मार्केट का ......वो प्रकाश कुल्फ़ी की नई नई धूम ,या वो लिबर्टी पिक्चर हॉल में .देखने गए थे धर्मेंद्र जितेंद्र की सम्राट और देख कर राजेश खन्ना और हेमामालिनी की मेहबूबा .....फ़िर बाद में उसी में या शायद तुलसी में ..स्कूल की तरफ़ से देखने गए पिक्चर गांधी ...वो चारबाग का लाल लाल स्टेशन और उसके बाहर खडे सैकडों तांगे ..।कभी पतंग का उत्सव तो कभी कोई और ही मेला .....। मुझे ये भी याद है कि उन दिनों पच्चीस पैसे का एक गर्म गर्म समोसा मिलता था ..जिसमें भुने हुए मूंगफ़ली के दाने भी हुआ करते थे ..और साथ में इमली की वो खट्टी मिट्ठी चटनी ..आज की तरह नहीं कि बस ..साला एक ही गंध स्वाद सॉस .....। वो ग्यारह दिनों तक लगातार एक ही घेरे में सायकल चलाने वाले करतब ( मुझे ये नहीं पता कि वो करतब शोर पिक्चर देखने के बाद शुरू हुई थीं या कि उन करतबों से प्रेरित मनोज कुमार ने उसमें ये दृश्य देखा था )............वो सांप नेवले की लडाई...........वो बंदर का रूठना ..बंदरिया का मनाना ..डमरू बजाता मदारी............पैसा फ़ेंको तमाशा देखो वाला बायस्कोप ..एक आंख से डब्बे में पूरी दुनिया की सैर ......चाचा के साथ उनकी उंगली पकडे कभी हाफ़ तो कभी फ़ुल स्वेटर पहने हुए रामलीला देखने जाना ..........सब कुछ जिया मैं वहां , जाने कितने पल ..कितनी हसीन यादें........................

आज तक सोच ही रहा हूं कि एक बार फ़िर से जाकर देखूं कि , वहां क्या कितना बदल गया है , क्या मिलता है कोई निशान अब भी मुझे ,या कि समय के गर्त में सब छुप गया है .................जाने जिंदगी कब इतनी मोहलत देती है कि ....................मैं एक बार फ़िर खुद से ही गले मिल सकूं...........


ज़ारी........................................................

बुधवार, 30 जून 2010

एक पोस्ट .......आम भी , और खास भी !.....अजय कुमार झा











"अहि बेर गाम में आम खूब फ़रल अईछ , भोला भईया "(इस बार गांव में आम खूब फ़ले हुए हैं , भोला भईया ), जैसे ही फ़ोन पर चचेरे भाई ने ये कहा मैं हुलस पडा , ये जानते हुए भी कि उन आमों के स्वाद तो स्वाद इस बार तो उनकी सूरत भी देखने को नसीब न हो । और इस बार ही क्यों अब तो जमाना हो गया जब आम के मौसम में गांव जाना हुआ हो । और फ़िर अब आम ही कौन सा पहले जैसे रहे , वे भी हर दूसरे साल आने की बेवफ़ाई वाली रस्म ही निभाने में लगे हुए हैं , उसकी भी कोई गारंटी नहीं है । मगर जब चचेरे अनुज ने ये कह कर छेड दिया, तो फ़िर अगले दस मिनट तक तो फ़ोन पर आमों का ही ज़ायज़ा लिया गया । किस किस बाग में कौन कौन से आम फ़ले हैं , पिछले दिनों जो अंधड तूफ़ान आया था उसमें कितना नुकसान हुआ । फ़ोन करके जब बैठा तो अनायास ही वो आमों की दुनिया और उसके बीच पहुंचा हुआ मैं , बस यही रह गए कुछ देर के लिए ।

शहरी जीवन में रहते हुए जो सबसे बडा नुकसान होता है वो होता है कि आप प्रकृति को सिर्फ़ चित्रों और चलचित्रों , टीवी , इंटरनेट पर ही देख सकते हैं , । आज के बच्चों से यदि पूछा जाए कि आम के लीची के , केले के , संतरे के , नींबू के मिर्च के टमाटर के , और इन तरह के तमाम पेड पौधों को असल में कभी देखा है तो उनका उत्तर स्वाभाविक रूप से न में ही होता था । हम पहले के बच्चों की एक खुशकिस्मती तो जरूर ये रही कि हमें , हम जैसे मां बाप नहीं मिले जो ग्राम प्रवास को भी किसी ट्रैवेल ट्रिप की तरह आरामदायक और सुकूनदेह की तरह का निश्चिंतता नहीं पाकर वहां जाने का कार्यक्रम टाल जाते थे । वे तो साल भर किसी न किसी बहाने खुद भी और हमें भी गांव ले जाने की जुगत में लगे रहते थे । और हम बच्चे भी तब शायद मिट्टी , पानी , पेड , बारिश, से ज्यादा प्यार किया करते थे।

आम का एलबम मेरे जीवन में शायद बहुत बचपन में ही खुल गया था । ये तो यकीनी तौर पर कहना जरा कठिन है कि उन दिनों आम के पेड , नानी के गांव में ज्यादा थे या दादी के गांव ( आज जरूर कह सकता हूं कि दोनों ही गांव में अब आधे भी नहीं रहे , नहीं बचे ) मगर शहरी बच्चों को ये छूट थी कि बिना ये सोचे , ये परवाह किए कि वो आम के बगीचे किसके हैं , (उनके भी जिनसे पिछले दिनों हमारे घरवालों की नोक झोंक हुई हो और बातचीत तक बंद हो तो भी , कोई फ़र्क नहीं पडता था , न उनके लिए न हमारे लिए ) , हमें जो जहां जैसा दिखता था हम घुस पडते थे । और रही बात आम के प्रकार की । तो मोटे तौर पर हमें आम की नस्ल के बारें में दो बातें बताई गई थीं । एक आम के पेड कलमी हुआ करते थे और दूसरे जिन्हें शायद "सरही "कहा जाता था । कलमी बडे , मीठे , और सलीकेदार आम हुआ करते थे , उन्हें बाकायदा कलम के द्वारा तैयार किया जाता था और फ़िर बहुत तगडी देखभाल के साथ पाला पोसा जाता था । जबकि इसके ठीक उलट सरही आम वो होते थे जो इन कलमी आमों की गुठली को मिट्टी में रोप दिए जाने से निकलते थे । और उन आमों में ऐसे ऐसे प्रयोग होते थे कि बस पूछिए मत ।

इन प्रयोगों का परिणाम ये होता था कि सरही आमों की कम से कम पच्चीस हज़ार प्रजातियां , उनका गंध , स्वाद भी बिल्कुल अलग अलग , उनकी शक्ल सूरत भी बिल्कुल अनोखी किसी का मुंह लाल है तो किसी का पिछवाडा , कोई आम ऐसा जो मुट्ठीमें समा जाए , तो कोई ऐसा जो लौकी के आकार और साईज़ का , एक में रेशे ही रेशे , तो एक में सिर्फ़ रस ही रस , एक में छिलका इतना पतला कि ....अब क्या क्या कहा जाए किस किस के बारे में । वो आमों का मौसम भी कमाल हुआ करता था । मेरे ख्याल से आमों की चौकीदारी का समय तब से शुरू हो जाता था जब उनमें गुठलियों का आना शुरू हो जाता था । आमों के बगीचे में सबके अपने अपने बाग होते थे इसलिए सभी वहीं पर अपनी अपनी खटिया लेकर वहां पूरे साजो सामान के साथ डट जाते थे ।इतना ही नहीं बाकायदा , दो तीन महीनों के लिए एक कुटिया बनाई जाती थी जो इतनी मजबूत और सुरक्षित होती थी कि धूप बरसात आदि से मजे से बचाव होता था उनमें । दिन में सब के सब बैठ के गप्पें हांक रहे हैं , गीत गा रहे हैं , और झूले भी खूब डलते थे । मानो पूरा परिवार ही वहीं जम जाया करता था , खासकर बच्चे ।

गर्मी की रातों में अचानक धूल भरी आंधियां और फ़िर बारिश । ये एक अघोषित सा नियम था कि इस अंधड तूफ़ान में टपकने वाले आमों पर , जो लूट सके उसका , वाला फ़ार्मूला लागू होता था । बस वो स्पर्धा तो देखने वाली होती थी । सुबह जब मौसम साफ़ होता था तो अपना अपना स्कोर कार्ड सब दिखाते समय जितने गर्व भरे होते थे उतने तो सहवाग और तेंदुलकर भी नहीं होते सैंचुरी पार्टनरशिप करने पर भी । आमों का उपयोग भी कमाल ही था । अलग अलग साईज़ ,अलग अलग स्वाद के हिसाब से , अचार , चटनी , मुरब्बे , खटमिट्ठी , आम पापड जिसे हम लोग आम तौर पर अम्मट कहते थे , के अलावा कच्चे आम नमक के साथ और पके हुए आम तो थे ही । आमों को जबरदस्ती पकाने की प्रणाली भी कमाल की हुआ करती थी । मिट्टी में एक गहरा गड्ढा खोदा जाता था ,उसके तल में पत्ते बिछा कर आमों के लिए नर्म बिस्तर तैयर करके उन आमों को बडे प्यार से , मजे से रख दिया जाता था , फ़िर उस गड्ढे को पुआल और फ़ूस से अच्छी तरह ढक दिया जाता , बस एक मुहाना छोड दिया जाता था ।उस मुहाने पर एक मिट्ठी का बर्तन उलटा करके , जिसकें पेंदी में एक छेद होता था उसे रख दिया जाता था । अब शुरू होती थी उसे पकाने की प्रक्रिया । उस छेद में हल्दी , और एक पावडर शायद कार्बाईड होता था या कोई और पता नहीं , भूसे में आग लगा कर उसे धीरे धीरे फ़ूंकते थे और गड्ढे को बंद कर देते थे । आश्चर्यजनक रूप से इस प्रक्रिया से अडतालीस घंटे में ही कच्चे आम और केले भी पक जाते थे । ऐसा अक्सर नवयुवक तब जरूर करते थे जब चुरा कर ढेर सारे आम तोड लाते थे और फ़िर छुपा कर उन्हें पका कर काफ़ी दिनों का राशन जमा हो जाता था ।

इधर कुछ वर्षों में आमों की पैदावार में भी काफ़ी परिवर्तन देखने को मिले । इनमें से एक खास तो ये कि अब ये आम के वृक्ष हरेक दूसरे साल ही फ़ल देने को तैयार होते थे । अब तो सुना है कि इसके लिए भी बाकायदा उन्हें इंजेक्शन वैगेरह देना पडता है , ओह दुखद है ये । इन आम के बगीचों से सिर्फ़ इतना ही भर रिश्ता नहीं होता है गांवों में , ये प्रतीक होते हैं सामूहिकता का जहां सब परिवारों के पुरखों की समाधि स्थल बनी होती है । अक्सर दाह संस्कार वैगेरह भी इन्हीं आम के बाग बगीचों के में हुआ करते थे । उपनयन , मुंडन , जूडशीतल , जैसे बहुत से संस्कार और त्यौहार इन आम के बगीचों के बिना पूर्ण नहीं हो सकते थे ।


"भोला भईया , अहि बेर गाम में आम खूब फ़रल अईछ " कानों में अब तक गूंज रहा था ये । पिछले ग्राम प्रवास के दौरान मेरे द्वारा लगाए गए आम के पेडों की खींची गई तस्वीर , सुना है कि अबकि ये भी लदे हुए हैं ...










सोमवार, 28 जून 2010

सर , आप तो बडे ही क्यूट हैं ......अजय कुमार झा








"अरे आप तो बिल्कुल वैसे ही दिखते हैं जैसी फ़ोटो आपने अपनी प्रोफ़ाईल में लगाई हुई है "ये बात जब मैंने अपनी पहली ब्लोग्गर मीट एक साथी ब्लोग्गर के मुंह से सुनी थी तो बरबस ही मुस्कुरा उठा था । और पलट कर यही कहा था कि , ऐसा तो सबके साथ ही होता है । सब वैसे ही दिखते हैं जैसी उनकी फ़ोटो होती है , या यूं कहें कि फ़ोटो वैसी ही दिखती है जैसे हम खुद होते हैं । मगर बहुत बार ऐसा नहीं होता है । जैसे कि कई मित्र अपनी प्रोफ़ाईल फ़ोटो से बहुत ही अलग दिखे । खैर ये तो बात आई गई हो गई । मगर यकीनन तौर पर अपने बारें में मैं इतन अतो कह ही सकता हूं कि किसी भी तरह से मैं फ़ोटोजेनिक तो कतई नहीं रहा कभी भी । विवाह ,समारोह, आयोजनों , और भी तमाम उन स्थानों पर जहां सामूहिक फ़ोटो की गुंजाईश होती थी वहां मैं मजे में आपको आंखें मूंदे हुए दिख जाऊंगा । पता नहीं क्यों मगर मेरे साथ ऐसा अक्सर ही होता है ।

प्रोफ़ाईल पर भी जो फ़ोटो मिली , वो मैंने जैसे तैसे चेप दी । क्योंकि पता था मुझे कौन सा शाहरूख खान या सलमान खान के खूबसूरत चेहरे की चाहत देखने वाले मुझे पढने के लिए आने वाले हैं वो तो अजय कुमार झा को ही पढने आएंगे । खैर इसी बीच पाबला जी का दिल्ली आना हुआ और उस ब्लोग्गर मीट के दौरान उन्होंने कब ये फ़ोटो खींच ली और किस कोण से खींची मुझे पता ही नहीं चला ,लेकिन जब घर में ही उस फ़ोटो की तारीफ़ हुई तो लगा कि ये वक्त सही है और इस फ़ोटो को प्रोफ़ाईल पर चेप दिया जाए । असली बात तो इसके बाद शुरू हुई ।

चैट पर अक्सर कोई न कोई अजनबी मित्र आ ही जाता है , और अपनी आदत के अनुसार मैं भी तब तक उनकी बातों का जवाब देता रहता हूं जब तक कि सिलसिला उधर से बना रहता है । मगर अभी कुछ दिनों पहले तो एक ऐसा वाकया हुआ कि समझ ही नहीं आया कि उसे दिलचस्प कहूं या शौकिंग ।एक अजनबी ने खटकाया , अभिवादन होता इससे पहले ही उधर से कहा गया कि ,



आप तो बडे क्यूट हैं

जी शुक्रिया

आपकी फ़ोटो की लुक तो गजब की है ,

अब मैं चुहल के मूड में आ चुका था ,

जी कभी कभी कैमरा भी गलती कर बैठता है

अरे नहीं नहीं सर सच में आपकी फ़ोटोलुक तो कमाल की है ,

जी शुक्रिया , क्या आप भी लिखते हैं ( ये मेरा स्वाभाविक प्रश्न होता है ..उसी तरह से जैसे सावन के हरेक अंधे को हरा ही हरा दिखता है ..उसी तरह मुझे भी हरेक नेटिया मित्र ब्लोग्गर ही दिखता है )

जी नहीं नहीं मैंने तो बस आपको और्कुट में देखा है , आप शादीशुदा हैं क्या ?

अब माथा ठनका , लगा कि कोई युवती/महिला मित्र तो नहीं है , जी मैं शादीशुदा ही नहीं हूं बल्कि दो बच्चों का बाप हूं ।

सर फ़ोटो से तो नहीं लगता , आप तो बहुत जवान दिखते हैं ?

बात फ़िर वहीं की वहीं " क्या मैं आपको जानता हूं "? अब मैं कुछ भी कहने से पहले सशंकित हो चुका था इसलिए पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता था ,कि कहीं कोई मेरी बैंड बजाने पर नहीं तुला हुआ है ?

" अरे सर जान पहचान में कितनी देर लगती है , आईये कभी साथ साथ पिक्चर देखने चलते हैं , आपके शौक क्या क्या हैं , चलिए न कहीं इंज्वाय करते हैं । आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहे हैं । कोई जरूरी थोडी है कि रोज घर में ही इंज्वाय किया जाए ? मैं यहीं दिल्ली में फ़लानी जगह पर काम करता हूं । देखिए न दुनिया कितनी फ़ास्ट हो गई है , और हम कितने पिछडे हुए हैं , सर आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहा हूं , अपना फ़ोन नंबर दीजीए , किसी दिन प्रोग्राम बनाते हैं ...चैट पर वाक्य आते जा रहे थे ..

और मेरे दिमाग में एक ही गान गूंज रहा था .....ओतेरेकि ........गेगेगेगे ..गे रे सायबा ......मैं चुपचाप वहां से निकल आया लौगआऊट हुआ और उसके बाद उन्हें ब्लौक कर दिया ।

आप बहुत क्यूट हैं .......हा हा हा मेरे कानों में अब तक यही गूंज रहा था .....पाबला जी ..हाय कैसी फ़ोटो खींची आपने ..?????
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