सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सांपला ......एक मुलाकात , हरियाणा के गांव की ,अंतर्जाल के बाशिंदों से







पिछले दिनों व्यस्तता के बीच ये भी ख्याल नहीं रहा कि नेट कनेक्शन भी जाने कबके अनशन पर जा चुके हैं , वर्ष २०११ के जाते जाते बहुत कुछ घट घटा रहा था कुछ हमारे बेहद पास भी । बहरहाल हमारे लिए तो कुछ ऐसा सा फ़ील हो रहा था मानो रोजिन्ना कोई खबर इंतज़ार में बैठी हो जैसे , फ़िर सोच रहे थे कि कह रहा है भाई लोग कि वर्ष २०१२ से ज्यादा का लाईफ़ टाईम वैलेडिटी का उम्मीद मत करिए । लेकिन एतना भेरी इंपोर्टेंट समय में भी हमारा ब्लॉगियाना तो दूर फ़ेसिबुकियाना भी दूभर हो गया था । जर्मनी से राज भाटिया जी के दिल्ली आगमन की सूचना और पिछले बरस की तिलियार झील परिसर ब्लॉग बैठकी की याद से अंदाज़ा लग गया था कि फ़िर इस बार ये हम ब्लॉग मित्रों के आमने सामने और कुछ पल साथ साथ बिताने का बहाना बनेगा ।


इस बीच अंतर सोहिल की आती पोस्टों और राज भाई के ब्लॉग एग्रीगेटर पर भी इसकी सूचना आ रही थी , स्थान का नाम पता चल चुका था ..सांपला , दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा में स्थित और अपने अंतर सोहिल जी का ग्राम । वहां पहुंचने पर पता चला कि सांपला सांस्कृतिक मंच द्वारा पिछले वर्ष से वर्षांत समारोह के रूप में काव्य सम्मेलन का आयोजन किया जाना शुरू हुआ था और ये दूसरा वर्ष था ।




दिन में सभी ब्लॉगर मित्रों के मिल बैठ बतियाने की योजना ने इसे और भी यादगार बना दिया । इस सिलसिले में मेरे पडोसी ब्लॉगर भाई शाहनवाज़ सिद्दकी जी से मेरी बातचीत हो रही थी और वहां चलने न चलने को लेकर आखिर तक असमंजस की स्थिति बनी हुई थी । बहरहाल चौबीस दिसंबर की सुबह आठ बजे ये तय हुआ कि सांपला पहुंचा जा सकता है । शाहनवाज़ भाई , राजीव तनेजा जी और खुशदीप सहगल जी , संवाद तीनों के बीच चल रहा था और सांपला पहुंचने की योजना भी । खैर शाहनवाज़ भाई और मैंने तय किया कि हम शास्त्री पार्क मेट्रो से आगे का सफ़र तय करेंगे , बस या रेल से ये राजीव भाई से पूछ कर तय किया जाएगा । राजीव भाई से बात हुई तो आदेश हुआ कि नांगलोई रेलवे स्टेशन ,मेट्रो स्टेशन पर उतरें वे वहीं प्रतीक्षा कर रहे हैं ।

मेट्रो में सफ़र करने वालों में नियमित न सही लेकिन कह सकते हैं कि बहुत बार तो किया ही है । शाहनवाज़ भाई और मैं , बातों में मशगूल थे और ज़ेहन में स्टेशन था नांगलोई मेट्रो स्टेशन , लेकिन मेट्रो रूट मानचित्र पर देखा तो पाया कि वो उस रूट पर नहीं है । ओह ! यानि पहली गडबड , अब तो वापस बस अड्डे वाले मेट्रो स्टेशन पर जाना होगा ,लेकिन नहीं , सीट पर बैठे कुछ युवा जो हमारी बातों से स्थिति समझ चुके थे उन्होंने बताया कि नहीं , इसके लिए मेट्रो इंदरलोक मेट्रो स्टेशन से बदलनी होगी , उफ़्फ़ बाल बाल बचे । उतरे और रूट बदला , हमारा गंतव्य नांगलोई मेट्रो स्टेशन , वहां भी चक्कर पे चक्कर एक नांगलोई मेट्रो स्टेशन और दूसरा नांगलोई रेलवे स्टेशन मेट्रो स्टेशन (एक बात और ये हुई कि हमने टिकट पीरागढी स्टेशन तक का लिया था और अब हम उतरने वाले थे उससे तीन स्टेशन आगे तो राजीव भाई द्वारा पता चला कि उतरने पर बांकी का किराया वहां चुकाया जा सकता है , चुकाने का तरीका भी बडा दिलचस्प किस्सा है फ़िर कभी ) , आगे का हाल ये था कि राजीव भाई ने कहा ..खंबा नंबर ४२० पर मिलिए । उफ़्फ़ यानि घनघोर इतिहास रचने की फ़ुल कुल तैयारी थी ।

खैर वहां ब्लॉगर मंडली को देखते ही एक एग्रीगेटर के फ़्रेश पेज खोलने का मज़ा मिल गया । वहां से काफ़िला दो वाहनों में सांपला की तरफ़ बढ निकला । राजीव तनेजा जी  पायलट की सीट संभाल चुके थे और हम उनके मोबाईल में पेसल वाला दिशा पता सूचक आन कर दिए थे , अब सारा टेंसन या तो ऊ सूचक यंत्र को था या राजीव भाई को हम मस्त उसको पकड के बैठे रहे । बीच बीच में फ़ोन ऑफ़ फ़्रैंड लाईफ़ लाईन का यूज करते हुए गंतव्य स्थल पर पहुंच गए । मौसम खुशगवार , चटक खिली हुई धूप । धर्मशाला के विशाल अहाते में गोलाकार बैठे सांपला के युवा और कुछ हमारे अंतर्जालीय साथी ।




बडा सकून सा महसूस रहे थे कि तभी आसपास मौजूद सुरक्षा दस्ते का आभास हुआ । पता चला कि ब्लॉगर मिलन का पूरा क्षेत्र इन विशेष वानर कमांडो की गहन सुरक्षा दायरे में है ।







सांपला पहुंची पहली खेप

पहली खेप,दूसरी खेप की खोज खबर लेते हुए



स्वागत को लपके अंतर सोहिल



धर्मशाला का मुख्य द्वार



लो जी दूसरी टोली भी आ पहुंची , श्रीमती राज भाटिया , अंजू चौधरी , संजू तनेजा जी , वंदना गुप्ता और राजीव तनेजा जी , जाकिट वाले महफ़ूज़ अली

हाय मैं ,महफ़ूज़ अली ..बोईंग सात सौ सात से उतर के हाथ डोलाते हुए

वंदना जी कार से बाहर ,महफ़ूज़ भाई पोज़ मारते हुए और शाहनवाज़ भाई कार के अंदर झांकते हुए

बस पोज़ बदल गया है





देखिए कैसे गोलमगोल हुए खडे हैं सब ,मुकेश सिन्हा ,केवल राम जी , संजय भास्कर , वंदना गुप्ता , अंजू चौधरी , संजू तनेजा और महफ़ूज़ अली

कैप्शन जोड़ें






श्रीमती राकेश , सर्जना शर्मा ,केवल राम जी , श्री एवं श्रीमती राज़ भाटिया ,पीछे संजय भास्कर , वंदना गुप्ता जी एवं संजू तनेजा जी

ब्लॉगर बैठक की सुरक्षा के लिए शार्प शूटर की भी व्यवस्था थी 

चाय पकौडे चालू आहे

वही वही चालू आहे


 सभी आपस में घुल मिल रहे थे ,लेकिन ये मिठास और मीठी हो रही थी जब ग्राम परिवेश में पहुंचे हम सब अंतरसोहिल के स्नेह से डूबे मीठे गन्ने चूसने में मग्न हो गए । आगे का किस्सा कुछ यूं रहा


कुछ धूम गर्म थी , कुछ ईख नर्म थी ,
थोडी सी तकल्लुफ़ , थोडी मीठी शर्म थी



मगर , चाय पकौडों की गर्मी और गन्नों के मीठे रस के दौर के बीच , बांकी साथियों के इंतज़ार का पल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला , । घडी दोपहर के दो बजा रही थी । हम अहाते में पडते धूप को सेंकने के लिए गोले को सरकाते जा रहे थे । दरवाज़े पर फ़िर हलचल हुई । लंबे चौडे पद्म सिंह के साथ ममता की प्रतिमूर्ति इंदु पुरी , हम सबकी इंदु मां , मानो भावनाओं का ऐसा सैलाब उठा लाईं थी कि सब कुछ बहता चला गया उन आंसूओं के साथ , सम्मान के साथ सब अंदर हॉल की तरफ़  बढ चले । योगेंद्र मौदगिल , अलबेला खत्री जी भी हमारे बीच पहुंच चुके थे । इस बीच अंतर सोहिल समय को बीतता देख आग्रह कर चुके थे कि औपचारिक अनौपचारिक मुलाकात सिलसिले को प्रारंभ किया जाए या नहीं तो पहले भोजन किया जाए । किंतु तय हुआ कि पहले परिचय और बातचीत का दौर चले । अंतर सोहिल ने जिम्मा हमें थमाया और हमने पूरी बहादुरी से पहला नंबर पदम भाई को थमाया । इसके बाद ब्लॉगर नाम , ब्लॉग नाम , अपना परिचय और अनुभव की बातें चल निकलीं । हमारे बीच सांपला सांस्कृतिक मंच से जुडे सांपला के नवयुवक , विद्वान लोग भी सम्मिलित हो चुके थे । परिचय दौर हमेशा ही दिलचस्प रहता है और सांपला के एक दिलचस्प डॉ साहब , भाई अलबेला खत्री और योगेंद्र मौदगिल जी की उपस्थिति ने और प्रभावी बना दिया ।




अब तो अगले पूरे बरस बस मीठी मीठी कविताएं चलेंगी

छील दना दन ,चूस दना दन


अलबेला खत्री जी ,वंदना गुप्ता ,पदम सिंह अंजू चौधरी , अंतर सोहिल ,महफ़ूज़ अली ,खुशदीप सहगल जी ,कनिष्क कश्यप जी ,मुकेश सिन्हा ,केवल राम और संजय भास्कर



खुशदीप सहगल , राजीव तनेजा , शाहनवाज़ और संजय अनेजा जी उर्फ़ मो सम कौन

हरदीप , मुकेश सिन्हा जी , संदीप पवार उर्फ़ जाट देवता और राकेश जी एवं श्रीमती राकेश जी


बातचीत तो चल रही है


पदम भाई राज भाई के गले लगते हुए और इंदु पुरी के स्नेह बंधन में संजू तनेजा

इंदु मां , तुस्सी ग्रेट हो





खुशदीप सहगल जी ने अपने अनुभव बांटते हुए बताया कि किस तरफ़ वे राकेश जी और सर्जना जी को ब्लगिंग में खींच लाए और आज दोनों अपना एक अहम मुकाम बना चुके हैं । योगेंद्र मौदगिल जी ने अंतर्जाल और ब्लगिंग  को अभिव्यक्ति का एक नया फ़लक की संज्ञा देते हुए इसके बढते महत्व को बताया । हास्य कवि अलबेला खत्री जी ने एक के बाद एक कई सारे ब्लॉग बनाते जाने का दिलचस्प किस्सा बयां किया । शाहनवाज़ भाई ने तकनीकी बातों पर और अपनी  भविष्य की योजनाओं का खुलासा किया । बातों बातों में टिप्प्णियों की घटती संख्या और नियमित पाठकों की सक्रियता में कमी, इसमें फ़ेसबुक और प्लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका आदि पर भी विमर्श चलता रहा । वंदना गुप्ता , इंदु पुरी और अंजू चौधरी ने ब्लॉगिंग के प्रति अपना असीम स्नेह प्रकट करते हुए इसे अपने बेहद निकट बताया । 
मैंने अपने विचार रखते हुए , ये कहा कि , मौजूदा समय संवाद का समय है । आज सूचना का इधर से उधर होना और इतनी तीव्र गति से होना बहुत बडी उपलब्धि है । विश्व समाज को किस तरह से एक आत्मदाह की मोबाइल क्लिपिंग ने परिवर्तन और जनांदोलन के जन्म का इतना मजबूत कारण दे दिया कि अब स्थिति भारत में भी ऐसी पहुंच चुकी है कि सरकार और प्रशासन अपनी भावाव्यक्ति जाहिर करने वालों पर नज़र रखने की फ़िराक में है । मैंने कहा कि आज , हम अंतर्जाल के मित्र इस ब्लॉगर बैठक के बहाने दिल्ली के समीप बसे इस कस्बे से न सिर्फ़ खुद मुलाकात करके जा रहे हैं बल्कि अब जब हम अपनी बातों में , अपनी यादों में सांपला की चर्चा करेंगे तो सांपला के लिए भी ये खुशी की बात होगी और भविष्य के लिए सहेजी जाने वाली अनमोल धरोहर साबित होंगी । मैंने वहां ब्लॉगर बनने की इच्छा दिखाने जताने वाले बहुत से नवयुवक साथियों को स्पष्ट किया कि कोई जरूरी नहीं कि आप ब्लॉगर बनना चाहते हैं तो आपको लिखना पढना जरूरी है । मोबाईल का उपयोग करिए ,मोबाइल से तस्वीरें खींच कर उन्हें दुनिया तक पहुंचाइए , कोई समस्या , कोई उपलब्धि या कोई भी विशेष साधारण , कुछ भी कल्पनीय अकल्पनीय , जो भी जैसे भी चाहें , लेकिन खुद को अभिव्यक्त करिए । वहां मौजूद सांपला के युवा साथियों ने जिस गर्मजोशी और स्नेह से हमारा स्वागत किया वो नि:संदेह दिल को छू गया । वर्षांत पर काव्य सम्मेलन के आयोजन की स्थापित हो रही परंपरा से भी वे खासे उत्साहित और आनंदित दिख रहे थे ।




 इसके पश्चात सभी भोजन में , और भोजन के साथ बातों में मशगूल हो गए । सर्दी की दुपहरिया , यी बीती वो बीती । वापसी की तैयारी हो ली । जिन मित्रों को रात के काव्य सम्मेलन के लिए रुकना था उनसे विदा लेकर दिल्ली की सवारियां निकल लीं । वापसी भी बिना गडबड के होती तो क्या होती । वापसी में हुआ ये कि जैसे ही हम मेट्रो पकडने प्लेटफ़ार्म पर पहुंचे फ़ोटोग्राफ़र की आत्मा चित्कार उठी और हम अपने मोबाइल से और शाहनवाज़ भाई बाकायदा कैमरे से लैस , जो तडातड फ़्लैश ,क्लिक क्लिक , तभी सामने से मेट्रो आती दिखी ,कैमरा चालू आहे । रुकते ही चालक कक्ष का दरवाज़ा खुला और शाहनवाज़ भाई को बुलाया गया ,पीछे जो था उसे भी आवाज़ दी गई । हमारी समझ में माज़रा ठीक ठीक तो समझ नहीं आया लेकिन इतना अहसास हो चुका था कि कुछ गडबड है । चालक ने बताया कि आपने मेट्रो रेल की सामने से तस्वीर क्यों खींची , सुरक्षा अधिकारी को बुलाकर हमें नीचे बने अधिकारी के कक्ष की ओर ले जाने को कहा गया । हमने पूरी गुजारिश और क्षमा मांगते हुए बताया कि ऐसा भूलवश हुआ है और कहीं भी फ़ोटोग्राफ़ी प्रतिबंधित है जैसी सूचना नहीं लगे होने के कारण ये हुआ । नीचे सुरक्षा अधिकारी ने बात को समझते हुए हमें भविष्य में ऐसा न करने की सलाह देते हुए जाने दिया ।

वापस लौटते हुए ठंड का प्रकोप बढ चुका था और हम सब इस साल के एक दिन को यादगार दिन , और कभी न भूलने वाली स्मृतियों को सहेज़ चुके थे । उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में इस तरह की मुलाकातें , हिंदी ब्लॉगिंग में सकारात्मक माहौल लेकर आएंगी ।











शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

जो तुम रिपब्लिक तो हम पब्लिक हैं बाबू









आजादी की लडाई के बाद १९७७ और उसके बाद शायद अब वो समय आया हुआ है जब सच में ही एक आदमी हर राजनीतिक दांव पेंच को न सिर्फ़ समझ रहा है बल्कि उसमें अपनी सक्रियता और प्रभाव बना रहा है । बेशक ये स्थिति , महंगाई , भ्रष्टाचार , अन्याय , नक्सलवाद और इन जैसे जाने कितने ही मुद्दों के लिए अलग अलग लडी जा रही लडाई के कारण बन गई हो और जो जनांदोलन या कहा जाए कि जनाक्रोश पिछले दिनों देश ने देखा और दिखाया वो सिर्फ़ जनलोकपाल बिल बनाने या ना बनाने के कारण न भी हो तो भी कुछ बातें तो नि: संदेह ही ऐसी हुईं जो अब से पहले या इससे बेहतर पहले कभी नहीं हुई या हो पाई थीं । 

सबसे पहली गौर करने वाली बात । देश के संविधान निर्माताओं ने इसे आज  से आधी शदाब्दी पहले बनाते समय , इतनी कुशाग्रता और चतुराई अपनाई कि वो कहीं कहीं तो अति को छू गई । विश्व के सारे संविधानों के उपबंधों , अनुच्छेदों , व्यवस्थाथों को भारत के संविधान में जगह दी गई , बिना इसकी परवाह किए कि वो विश्व का सबसे बडा लिखित संविधान बन गया । चलिए मान लिया जाए कि उस समय ये निहायत ही जरूरी और एकमात्र विकल्प था तो भी क्या ऐसे उपबंध अनुच्छेद ऐसी व्यवस्थाएं जरूरी थीं बनाना जो आधी शताब्दी बीत जाने के बाद भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पहले से भी कहीं अधिक क्लिष्ट और विषम परिस्थितियों में फ़ंस गई हों चाहे वो फ़िर आरक्षण व्यवस्था हो चुनाव की व्यवस्था । सारे औपबंधिक व तात्कालिक उपायों को भी स्थाई बना के रख दिया गया । और तिस पर , हद तो ये है कि संविधान में लगातार ही संशोधन की प्रक्रिया चली आ रही है । चुनाव सुधार ,भ्रष्टाचार , अपराध , आतंकवाद आदि सबसे निपटने के लिए कानून पर कानून बनते और उसी रफ़्तार से बिसराते चले जा रहे हैं । अधिकारों की लडाई रोज़ लडी जा रही है किंतु जब बात कर्तव्यों की आती है तो अभी देश के समाज के अंदर , राष्ट्रीय गीत , राष्ट्रीय ध्वज आदि को सम्मान देने वाला राष्ट्रीय धर्म भी अभी कर्तव्य में नहीं जुड सका है । संविधान संशोधन की फ़ेहरिस्त लंबी से लंबी होती ही चली जा रही है । इसके बावजूद कानून ऐसे बन रहे हैं जिनके लिए कहा जाता है कि ,इन कानूनों में रह गई कमियों के कारण ही दोषी हर बार बच निकलते हैं , या फ़िर कि शायद ये छिद्र छोडे ही जानबूझ कर जाते रहे हैं । 


पिछले दिनों अन्ना के जनांदोलन को देखने आए एक विदेशी राजनीतिक सर्वेक्षक ने इस बात पर सुखद हैरानी जताई थी कि भारत में लोग किसी कानून के बनने और न बनने या फ़िर अच्छे कानून को बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालने के लिए सडक पर उतर आए । देश के तमाम राजनीतिक विशेलेषक भी ये बात भली भांति जानते हैं कि , अबसे पहले शायद ही कभी आम आदमी ने किसी कानून के बनने से पहले उसके बारे में न सिर्फ़ जाना बल्कि खुल कर अपनी राय उस पर रखी । नागरिक समाज के कुछ लोगों ने आगे आकर सरकार के सामने दोहरी चुनौती रख दी । पहली ये कि लोकतंत्र में जनता के, जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से अलग जाकर आम लोगों ने अपने बीच के कुछ लोगों पर ज्यादा भरोसा जताया । दूसरी ये कि , सिर्फ़ सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधि ही बेहतर कानून बना सकते हैं इस मिथक को तोडते हुए नागरिक समाज ने उसी कानून का बेहतर मसौदा सरकार के सामने रख दिया । यही वो सबसे बडी वजह आज राजनीतिक वर्ग को खाए जा रही है कि , यदि ये काम भी उनसे छीन कर जनता ही अपने हाथों में ले लेगी तो फ़िर पिछले साठ सालों से चला आ रहा राजनीतिक वर्चस्व तथा , देश , समाज , कानून तक पर पडता दबदबा खत्म हो जाएगा । 


जो सरकार पहले , नागरिक समाज और उसके किसी प्रतिनिधि के अस्तित्व और हैसियत तक को मानने को तैयार नहीं थी , उसने जब देश को इस मुद्दे पर आंदोलित होते हुए देखा और अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भी अन्ना बाबूराव हज़ारे के प्रभाव में आकर लोगों को सडक पर उतरने से रोकने के लिए कुछ भी करने में खुद को असमर्थ मानने समझने लगी तो थकहार कर इस मसौदे को संसद के पटल पर रखा गया । किंतु इस बीच जिस तरह से एक ऐसे कानून जिसे जनता समझ रही है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में प्रभावी सहायता और शक्ति मिलेगी , उस कानून को लेकर सभी राजनीतिक दलों के रवैये को देखकर जनता जिस तरह से चुनाव के समय देख लेने जैसी चेतावनी पर उतर आई तो सभी राजनीतिक दल भी इस बात को भलीभांति समझ और भांप गए कि दशकों से चला आ रहा ये सब छीना जा सकता है । सरकार के लिए दुविधा और मुश्किल और भी ज्यादा इसलिए बढ गई क्योंकि ,पिछले ही दिनों , देश के अन्य बडे मुद्दों जैसे काले धन को वापस लाने का मुद्दा , राईट टू रिकॉल और राईट टू रिजेक्ट का मुद्दा भी साथ साथ उठने लगा और दूसरी तरफ़ वर्तमान सरकार के बहुत सारे मंत्री तक बडे आर्थिक घोटालों के आरोपी बनके जेल जाने लगे । 


इस स्थिति में आने के बाद राजनीतिक दल मौन होकर ये सब देखते रहेंगे ऐसी अपेक्षा करना ही बेमानी होता । पिछले दिनों नागरिक समाज के उन प्रतिनिधियों जो कि सीधे सीधे इस लडाई के अगुआ रहे , उन्हें हर तरह से निशाने पर लिया गया । बाबा रामदेव के साथ तो पुलिस ने रात के अंधेरे में जो कुछ किया वो न्यायपालिका तक को नागवार गुजरा और उसने स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार को तलब कर दिया । सिविल सोसायटी के सदस्य ,अन्ना बाबू राव हज़ारे ,किरन बेदी , अरविंद केजरीवाल और अब डॉ कुमार विश्वास तक को किसी न किसी मामले में नोटिस पकडा दिया गया ।


 इससे भी आगे बढकर , एक सदस्य प्रशांत भूषण से काशमीर विवाद से जुडा एक सवाल और उस पर दी गई प्रतिक्रिया के कारण उनके साथ मारपीट तक की गई । अगले दिन एक आम सभा में जाते समय अरविंद केजरीवाल पर चप्पल तक फ़ेंकी गई और अभी आगे जाने क्या क्या होना है । क्या इस देश की जनता को इतनी सी समझ नहीं है कि आयकर जैसे मलाईदार विभाग में एक राजपत्रित अधिकारी और दिल्ली पुलिस की वरिष्ठ अधिकारी जैसे प्रभावी पदों को लात मार कर नौकरी से बाहर हो जाने वाले सिविल सेवा के ये अधिकारी अपने नौकरी में भरपूर मलाई और भ्रष्टाचार कर सकने के मौके को छोड कर हवाई यात्रा करके पैसे बनाने जैसा महान घोटाला करेंगे । किसी को अपमानित करना , उसके साथ अचानक ही मार पीट कर अपनी बहादुरी दिखाना उतना ही आसान है जितना कि अपनी छत पर खडे होकर गली में किसी के ऊपर कंकड मार के छिप जाना । अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधने वाले क्या ये हिम्मत कर सकते हैं कि पहले देश की सबसे बडी प्रतियोगिता परीक्षा को पास करके , सरकारी सेवा में आएं , या फ़िर ये कि उनके सामने आकर मुद्दे पर आमने सामने बात करें । 


क्या देश के पास दूसरी किरन बेदी है , वो किरन बेदी जिसने न सिर्फ़ देश भर में , बल्कि विश्व भर में ख्याति अर्ज़ित की । प्रशांत भूषण से जनलोकपाल मुद्दे पर उनकी राय जानना तो प्रासंगिक लगता है किंतु उनसे जम्मू काशमीर विवाद पर प्रतिक्रिया लेकर मारपिटाई करना तर्कसंगत नहीं लगता खासकर जब वहीं से खुले आम कोई यह कह कर कि वो पाकिस्तानी एजेंट है , सरकार जो चाहे कर ले , सरकार की छाती पर मूंग दलता है और उसका बाल तक बांका नहीं होता और तो और कोई प्रतिक्रिया तक नहीं देता , जाने तब ऐसी सेनाएं कहां होती हैं । 


हरियाणा में अन्ना टीम द्वारा कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट न देने की अपील को चुनाव परिणाम आने से पहले तक इस रूप में दिखाया गया मानो अन्ना हज़ारे और कांग्रेस के बीच चुनाव हो रहा हो । इस तरह की बातें सामने आईं कि अगर कांग्रेस हरियाणा में नहीं हारती तो वो टीम अन्ना के आम आदमी के समर्थन के दावे की हार होगी ,लेकिन परिणाम निकलने के बाद फ़ौरन ये कहा जाने लगा कि शीतकालीन सत्र तक टीम अन्ना को प्रतीक्षा करनी चाहिए । भविष्य में सरकार का रूख जनलोकपाल को लेकर चाहे जो भी हो ,आम आदमी ने ईशारा कर दिया है कि अब वो सिर्फ़ तमाशाई बनकर नहीं बैठेगा ,भले इस बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सोच रहे एक एक व्यक्ति को नोटिस भेज दिया जाए या चप्पल जूते  मारे जाएं । 


मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

इरोम की लडाई ..एक दशक का अनशन









रविवार ,2 अक्तूबर , को जंतर मंतर दिल्ली पर शांति मार्च का आयोजन करते , इरोम की लडाई में साथ आए दोस्त , जिनमें एक मैं भी था , और हमारे मित्र मयंक सक्सेना जी भी , जिनके एक संदेश से मैं यहां पहुंच सका














पिछले दिनों जनलोकपाल बिल को लेकर , जिस तरह से पूरे देश के अवाम के बीच एक उथल पुथल , व्यवस्था और सरकार के विरूद्ध  आक्रोश के साथ साथ पहली बार ऐसा हुआ कि किसी प्रस्तावित कानून के मसौदे और उसके प्रावधानों को लेकर जनता के बीच जम कर बहस चली । और इस बहस की न सिर्फ़ आवाज़ संसद तक पहुंची बल्कि थकहार कर उन्हें भी जनता की भावना को पटल पर रखना पडा । ये पिछले साठ सालों में पहली बार हुआ कि जनता ने खुल कर कहा कि यदि कानून समाज के लिए ही बनाए जाते हैं , आम लोगों के लिए बनाए जाते हैं तो फ़िर उन्हें बनाने का हक भी समाज को ही मिलना चाहिए , कम से कम उतना तो जरूर ही कि पिछले सभी बने हुए कानूनों में जानबूझ कर छोडे गए छिद्रों की गुंजाईश को कम किया जा सके । एक साल में दो दो बार आम जनता को सडक पर उतरने के लिए उद्वेलित करने वाले अन्ना हज़ारे ने जब अनशन का रास्ता अपनाया , और न सिर्फ़ अपनाया बल्कि अनशन की ताकत भी दिखा दी तो स्वाभाविक रूप से देश में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ हुई एक बहस को फ़िर से हवा दे दी । ये मुद्दा है , मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन से जुडा हुआ मुद्दा । यानि  The Armed Forces (Special Powers) Act,1958, (As Amended in 1972),को मणिपुर , पूर्वोत्तर राज्यों , आदि से समाप्त करना क्योंकि ये जीवन के नैसर्गिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है ।


यूं तो , इस समस्या से जुड कर अब कई पहलुओं पर लोग बहस कर रहे हैं , मसलन क्या पूर्वोत्तर का अलगाववाद , देश, सरकार , समाज   द्वारा उन क्षेत्रों की , की गई घोर उपेक्षा से ही पनपा है । लेकिन इरोम की लडाई का मुद्दा है भारत सरकार का ये कानून । वर्ष २००० में इसी निरंकुश कानून का सहारा लेकर सुरक्षा जवानों ने एक युवती के सामने दस लोगों को मार डाला ।इरोम शर्मिला ही वो युवती थीं जिन्होंने इस घटना को देखा था और उस दिन से लेकर आज तक इरोम ने इस निरंकुश कानून को मणिपुर पर जबरन थोपे जाने का विरोध करते हुए अनशन के रास्ते को अपना लिया । सशस्त्र सेना (विशेष अधिकार ) कानून १९५८ ,संशोधित १९७२ , एक ऐसा कानून जिसमें साधारण अधिकार से ज्यादा ताकत दी गई सुरक्षा बलों को । असम , मणिपुर, मेघालय , नागालैंड , त्रिपुरा और अरूणाचल प्रदेश व मिज़ोरम यानि पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून को लागू किए इस कानून के अनुसार , किसी भी अशांत क्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए , सुरक्षा बल के अधिकारी व सैनिक सिर्फ़ शक के आधार पर किसी को गोली तक मार सकते हैं । किसी के भी घर में घुस कर तलाशी ली जा सकती है और किसी को भी बिना वारंट के गिरफ़्तार किया जा सकता है । अशांत क्षेत्र का निर्धारण भी सुरक्षा बल ही स्थिति को देखते हुए कर सकते हैं । आज़ादी के इतने बरसों बाद भी देश की जो सरकार एक तरफ़ खुलेआम सबका कत्ल करने वाले आतंकियों को न्याय के नाम पर सालों सालों जीवित रखती है वहीं दूसरी तरफ़ पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों के साथ इतना गहरा भेदभाव जैसा कानून थोपे बैठी है कि , आज इन राज्यों में ये मानसिकता पनप चुकी है कि वो उस दिन को प्रदेश का काला दिन मानते हैं जिस दिन इन राज्यों का विलय पूरे देश के साथ कर दिया गया था ।







इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें जो विशेष तौर पर निकल कर सामने आई हैं वो ये कि क्या इतने सालों बाद भी पूर्वोत्तर राज्यों को , उनके निवासियों को , वहां के समाज , वहां की समस्याओं को मुख्य धारा में लाकर देखा समझा जा सका है । अपनी अलग शारिरिक छवि , रंग रूप की बहुलता के कारण , उत्तर पूर्व से बाहर उनकी पहचान , एक उपहासात्मक मानसिकता से जोड दी गई है । आज सिक्किम की बाढ हो या मणिपुर का कोई हादसा न वो राष्ट्रीय मुद्दा है और न ही वो मुद्दा ही रह पाता है । आज जिन कानूनों के लागू होने के कारण वहां के मूल लोगों की जिंदगी के अधिकार को ही छीन लिया गया है , उस अधिकार को हटाने तो दूर आज सरकार उस कानून पर बहस तक करने को तैयार नहीं है । इस अराजक और निरंकुश कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला से कोई सिर्फ़ और सिर्फ़ तभी मिल सकता है जब उसके पास मणिपुर के मुख्यमंत्री का आदेश हो । इतनी सख्ती , इतना डर , इतना अलगाव , क्यों , आखिर क्यों । उस देश में क्यों , जो अपने देश के , समाज के और देश के सम्मान के हत्यारे को भी बरसों तक जाने अनजाने देश का मेहमान बनाए रखती है । अपने देश के नागरिकों , से निपटने के लिए विशेष अधिकार वो भी इतना निरंकुश कि सिर्फ़ शांति स्थापना की प्रक्रिया में शक शुबहे पर भी किसी की भी जान ली जा सकती है , और सबसे बडी अमानवीय बात ये है कि ये कानून है , एक विधिक अधिकार ।


इरोम की लडाई को आज एक दशक बीत चुके हैं , और उसकी ये लडाई तब शुरू हुई थी जब मीडिया , आज के जैसा मीडिया नहीं था ,मीडिया ने बाज़ार का रूप नहीं लिया था , इतनी व्यावसायिकता नहीं आई थी । अब समय बदल गया है , पिछले कुछ सालों में पूरे विश्व में हो रहे परिवर्तनों में जिस तरह से आम जनांदोलनों ने भूमिका निभाई है और जन विचार , या एक दिशा देने में मीडिया ने जो भूमिका निभाई है उसे देखते हुए अब ये अपेक्षा की जा रही है कि यदि देश को भविष्य में अपना अस्तित्व और देशवासियों को खुद को बचाए रखना है तो फ़िर अब आम आदमी की हर मांग , उसकी हर बात को मुख्य धारा  में लाकर पूरे देश के सामने रखना  ही होगा ।ये लडाई शुरू हो चुकी है , और अब लोगों ने इरोम की लडाई को दिल्ली की सडकों पर उतारना शुरू कर दिया है । यदि इसी तरह आम आदमी की हर लडाई में देश का आम आदमी जुड जाए तो यकीनन देश का कल , कुछ अलग होगा ॥







अब ये तय कर लिया है कि , इस मुहिम और आम आदमी की हर मुहिम के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधे मिला कर चलेंगे ..अब घिसटना मंजूर नहीं है मुझे ...........

सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनलोकपाल , जनांदोलन और जागता समाज ....१






पिछली बार जब अन्ना हज़ारे जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे थे और जिस तरह से उसने सिर्फ़ पांच दिनों में अपना दायरा और प्रभाव बना दिया था उससे ये तो तय हो गया था कि अब इस देश की जनता के लहू का तापमान उतना गर्म तो जरूर हो चुका है कि , जरा सी आंच पे उबाल आ जाएगा और कांग्रेसी प्रभाव वाले शासनकाल को गौर से देखने पढने वाला व्यक्ति बडी आसानी से ये भांप सकता था कि हर समस्या को ये सरकार फ़ुंसी से फ़ोडा बनाए बगैर इसका हल नहीं तलाशेगी । यदि पिछले कुछ दिनों की गतिविधियों को गौर से देखा जाए तो बहुत सी बातें स्पष्ट दिख जाती हैं कि किस तरह से आज की स्थिति और शायद इससे ज्यादा बदतर की भी अपेक्षा सरकार पहले ही कर रही होगी । ठीक ऐन उस वक्त जबकि पता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी हो जाने के बावजूद जो पार्टी आज तक न गांधी को छोड सकी और न ही गांधी के आदर्शों को मान सकी , और बिना गांधी के उसका थिंक टैंक बिल्कुल ही बंद सा पड जाता है , ऐसे में भी सरकार के घटक दलों की नेता , यानि कांग्रेस के साथ , कुर्सी के लिए चिपके तमाम दलों की अगुआ खराब स्वास्थ्य के कारण अमेरिकी स्ट्रेचर पर लेट जाती हैं , जबकि सुना गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिकियों को ईलाज़ के चक्कर में भारत न जाने के लिए घुडका था ।


इंडिया अगेंस्ट करप्शन के मुहिम को एक उद्देश्य देते हुए जनलोकपाल बिल के रूप में परिवर्तन की चाह रखने वाले कुछ लोगों ने एक विचारधारा में खुद को पाते हुए इसे एक बडी लडाई की तरह लडने का निर्णय लिया । पिछले वर्षों में सूचना का अधिकार के लिए , ऐसी ही जद्दोज़हद और उसके प्रयोग से होने वाले बडे बडे सरकारी घपलों घोटालों के खुलासे से उत्साहित नागरिक समाज का ये गुट अब नए प्रयोगों और चुनौतियों के लिए तैयार हो रहा था । ये सिरा पकड कर वो लोग खुदबखुद इसके साथ जुडते चले गए जिनके मन में अब बदले जाने की , व्यवस्था के खिलाफ़ खडे होने की हिम्मत दिखाने की सोच पनप रही थी । युवा ब्रिगेड ने प्रशासनिक अधिकारियों की काबलियत , विधि विशेषज्ञों का मार्गदर्शन , मीडिया एवं आज के तमाम जनसंचार साधनों  सर्वश्रेष्ठ तालमेल , और एक सुनियोजित शैली को एक स्थान पर एक करके , देश में आजादी के बाद आम लोगों में राष्ट्रप्रेम जगाने का , कुछ गलत को रोकने के लिए झिंझोडने का और सबसे बढकर , आम जनों को अपने अधिकारों के प्रति सजग करने और दिखने का अभूतपूर्व मौका दे दिया । इस आंदोलन के अगुआ अन्ना हज़ारे को बनाए जाने के पीछे जिसका भी विचार था वो कितना काबिल और पुख्ता था  ,इस बात का अंदाज़ा इसी से हो जाता है कि ,तमाम कोशिशों और चालों के बावजूद भी सत्ता श्री बाबूराव किसन हज़ारे के खिलाफ़ कुछ भी नहीं निकाल पाई । जो कुछ निकाला भी गया उसकी गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि सरकार के  इन आरोपों पर जनप्रतिक्रिया के रूप में सरकार का उपहास उडाते सैकडों चुटकुले सुने सुनाए गए उन दिनों ।



देश के पिछले कुछ वर्ष , हालांकि वैश्विक राजनीतिक हलचलों के बीच भी काफ़ी कुछ खुद को बचाए होने के बावजूद इतना ज्यादा उथल पुथल मचा गया कि लोगों का जो गुस्सा पिछले साठ सालों से लोगों द्वारा बहाने से मुल्तवी किया जा रहा था , वो अचानक ही फ़ट पडा । इस गुस्से का सही उपयोग और इस गुस्से को एक सही दिशा देकर इसे जनांदोलन के रूप में खडा करने का काम किया इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने । देश में भ्रष्टाचार आज इस कदर बढ गया था कि कहीं न कहीं , लगभग अस्सी नब्बे प्रतिशत के स्तर को छूने के कारण एक ऐसी मानसिकता बन गई कि भ्रष्टाचार अब इस देश से नहीं हटाया जा सकता । न्यायपालिका जो अब तक बडे ही धाकड रूप से आम जनता को अपने कानूनी पक्षों से संरक्षित किए हुए थी वो भी पिछले दिनों कुछ डगमगाती सी दिखी । देश में संचारतंत्र और वैश्विक आवागमन ने भारत के शहरी वर्ग को अपने काम में मशगूल होने के बावजूद , अधिकारों के प्रति सजग होने का मौका दिया । ऐसा नहीं था किस ऐसा सिर्फ़ समाज की मुख्यधारा में लगे हुए लोग सोच रहे थे , बाबा रामदेव ने अपने धर्मक्षेत्र को किनारे करते हुए देश के बडे आर्थिक भ्रष्टाचार यानि कालेधन की समस्या को उठा कर एक अलग आवाज़ बुलंद की । ये अलग बात रही कि , ऐसे मुद्दों पर सरकार और प्रशासन से लडने वाला अनुभव और सुयोजना की कमी ने सरकार के कूटनीतिज्ञों को ये मौका दे दिया कि उन्होंने बाबा रामदेव और मुद्दे को भी कुछ दिनों के लिए टाल दिया ।


मुद्दे के रूप में लोकपाल बिल जो कि संसद में महिला आरक्षण समेत कुछ ऐसे ही अभागे बिलों में से एक था जो सत्रों या बरसों से नहीं दशकों से लटका हुआ चला आ रहा था । सरकारी लोकपाल बिल का मसौदा पहले सी ही रुग्ण था रही सही कसर वर्तमान सरकार के मंत्रियों की घोटालों के प्रति निष्ठा , केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति का विवाद , और चरम पर पहुंचती महंगाई के लिए जिम्मेदार भ्रष्टाचार ने ये तय कर दिया कि अब जनता बर्दाश्त नहीं करना चाहती है । जनलोकपाल का प्रारूप तैयार करने का जिम्मा उठाया उस टीम ने जिसे आज सिविल सोसायटी कहा जा रहा है , इस बिल की इबारत लिखने वालों में दो तेज़ तर्रार और अपने अपने क्षेत्र के बेहतरीन प्रशासक , और दो विधि विशेषज्ञ पिता पुत्र ने अपनी काबलियत का पूरा प्रमाण देते हुए एक ऐसा बिल प्रारूप तैयार किया जिसमें से बचने के रास्ते तलाशाना बेहद कठिन साबित होता । ज्ञात हो कि,कानून बनने बनाने में जनता की इच्छा तो दूर बरसों तक आम नागरिकों को बने हुए कानूनों का पता ही नहीं होता और शायद इसलिए भी इसे वो लोग आसानी से तोड पाते हैं , इस लिहाज़ से भी ये पहली वो पहल रही जिसमें पूरे देश ने एक कानून के मसौदे को लेकर जम कर बहस की , खूब लिखा पढा गया , अगर इसे समर्थन मिला तो तीव्र प्रतिक्रिया और आरोप भी झेलने पडे । इस आंदोलन को प्रचार की धार देने के लिए  , मीडिया गुरू और प्रचार प्रसार का जिम्मा संभाले टीम अन्ना के एक सहयोगी तथा , आज की हर तकनीक से लैस युवा ब्रिगेड का तालमेल कुछ ऐसा मिला कि आंदोलन की तैयारी मीडिया ने भी वार लेवल पर की और चौबीस घंटे की पल पल की खबर सबके सामने रखी । ये मीडिया के कैमरों का भी सौभाग्य रहा कि पिछले तेरह दिनों में देश के करोडों चेहरों को बडी करीबी से पढा , चौबीस घंटे लगातार आम आदमी के साथ आंख से आंख मिलाए , और दूसरी तरफ़ सत्ता के गलियारों में चल रही एक एक गतिविधि भी ।


जंतर मंतर पर , कुछ माह पहले 


इस लडाई की शुरूआत अब से कुछ महीनों पहले इस बात को लेकर हुई कि लोकपाल बिल की प्रारूप समिति में से आधे सदस्य सीधे जनता में से ही होने चाहिएं जिसे सरकार ने सिर से ही नकार दिया । और पहले से ही तय हुआ अनशन शुरू किया , धरनों और प्रदर्शन के लिए अब तक एक स्थापित हो चुका बिंदु जंतर मंतर । इस मुहिम की शुरूआत बहुत धमाकेदार नहीं होकर भी इतनी तो थी ही कि पहले दिन से ही इसे व्यापक मीडिया कवरेज मिला । पांचवें दिन जाते जाते सरकार लंबलेट हो चुकी थी तथा सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों के साथ वार्ता की सहमति पर आंदोलन को स्थगित किया गया लेकिन उसी वक्त अन्ना ने ये कह दिया था कि अगर इन तमाम बैठकों के बावजूद सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक मजबूत कानून के रूप मे ,ज्नलोकपाल बिल को गंभीरता से नहीं लिया तो सोलह अगस्त से इस आंदोलन को पुन: खडा कर दिया जाएगा । इस बीच जो कुछ हुआ और होता चला गया उसने न सिर्फ़ सरकार की मंशा को ज़ाहिर किया बल्कि एक एक करके खुले घोटालों की पर्तों ने आम जनता का क्रोध और क्षुब्धता को भी चरम पर पहुंचा दिया ।





कल इससे आगे बात करेंगे .....

रविवार, 24 जुलाई 2011

हिंदी ब्लॉगिंग की इज्जत करिए , क्योंकि आप हिंदी के ब्लॉगर हैं










जाने क्यों थोडे थोडे समय बाद इस तरह की बातें , देखने सुनने और पढने को मिल जाती हैं , जिसमें कोई हिंदी ब्लॉगर हिंदी ब्लॉगिंग का माखौल उडाता , या फ़िर उसका अपमान सा करता दिखता है । किसी को गुटबाजी दिखाई देती है तो किसी को लेखन में कचरा ही दिखाई देता है , किसी को यहां सिर्फ़ टिप्पणी का लेन देन दिखाई देता है तो किसी को एग्रीगेटर का ही सारा दोष दिखाई देता है , यानि कुल मिला कर लब्बो लुआब ये कि ये दिखाने बताने और जताने की कोशिश की जाती है कि हिंदी ब्लॉगिंग , स्तरहीन , दिशाहीन और बिल्कुल ही बेकार है । ये बहुत गौर करने लायक बात है कि ऐसे लोगो ने हिंदी ब्लॉगिंग को गरियाने के मौका और समय बिल्कुल उपयुक्त चुना है । दो सबसे लोकप्रिय एग्रीगेटर , अचानक ही वाद , बेविवाद बंद हो गए । हालांकि उस कमी को पूरा करने के लिए बहुत सारे नायाब प्रयासों को जैसे पर लग गए और कई खूबसूरत संकलक , इंडली , हमारीवाणी , ब्लॉगगर्व , ब्लॉगमंडली , ब्लॉगप्रहरी , हिंदीब्लॉगजगत , ब्लॉगसंसार , और तमाम बहुत सारे संकलक हिंदी ब्लॉगर्स का साथ निभाने को मैदान में उतर आए । आज सभी ने हिंदी ब्लॉगरों के मन में एक विशिष्ट स्थान बना लिया है । इसके अलावा , दैनिक जागरण और नवभारत टाईम्स ने अपने मंच को आम पाठकों की ब्लॉग भागीदारी हेतु भी आमंत्रित किया । किंतु इसके बावजूद भी कुछ स्थितियां तो प्रतिकूल ही रही हैं । ब्लॉगरों का सबसे लोकप्रिय प्लेटफ़ार्म ब्लॉगर समय असमय झटके देता रहता है हिंदी ब्लॉगरों को । लेकिन इन तमाम तरह की मुश्किलों के बावजूद आज हिंदी  ब्लॉगरों की चमक और धमक बढती ही जा रही है । और आगे भी ये एक बहुत बडा और प्रभावी समूह बनके उभरेगा इस संभावना से सब भलीभांति परिचित हैं ।


हिंदी ब्लॉगिंग से न जुडे हुए और लेखन पठन से जुडे हुए लोग यदि कभी हिंदी ब्लॉगिंग की चर्चा या विश्लेषण करते हैं तो अक्सर आक्रामक हो उठते हैं उसकी सिर्फ़ एक ही वजह है ब्लॉगिंग का बिल्कुल कच्चा और तीखा स्वरूप और बिना किसी के वर्चस्व के बढता एक संसार । जब कोई बहुत दूर से हिंदी ब्लॉगिंग को बिना जाने बूझे उसकी आलोचना करता है तो इसलिए उस पर कोई प्रतिक्रिया देना उचित नहीं लगता क्योंकि फ़िर तो अंदाज़े से इससे बेहतर विश्लेषण की अपेक्षा करना ही व्यर्थ हैं । किंतु पिछले कुछ दिनों में ये प्रवृत्ति थोडे से चलन में है कि , किसी न किसी बहाने से हिंदी ब्लॉगिंग और हिंदी ब्लॉगर को निशाने पर रखा जाए करने वाले भी खुद हिंदी ब्लॉगर्स ही हैं । आलोचना अच्छी बात है और यदि आलोचना सुधार की भावना से की जाए तो फ़िर तो बहुत ही अनिवार्य भी । किंतु सिर्फ़ आलोचना करने के उद्देश्य से की जा रही आलोचना , या फ़िर आलोचना की सीमा को लांघ कर अपमान के स्तर तक जाकर , बिल्कुल कोसने के अंदाज़ में पूरे हिंदी ब्लॉगजगत को कटघरे में रखने वाले ब्लॉगर्स को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे स्व्यं उसी हिंदी ब्लॉगिंग का हिस्सा हैं जिसे अपमानित करने का प्रयास वे करते हैं । उनकी पहचान हिंदीं ब्लॉगर के रूप में ही जानी जाएगी , चाहे धारे जी हों या पधारे जी ।


पिछले दिनों लगातार पोस्टें आईं , जिनमें ब्लॉगिंग से जुडी प्रतियोगिताओं , पहेलियों वाली पोस्टों और ब्लॉगों का माखौल उडाया गया , यहां तक कि उन्हें सम्मानित करने के प्रयासों को भी येन केन प्रकारेण विवादग्रस्त बनाने की खूब कोशिशें की गईं । छोटे बडे संकलकों के साथ उनसे जुडी टीम को भी उन्हीं संकलकों के साथ न सिर्फ़ निशाने पर रखा गया बल्कि कई बार निजि तक हुआ गया ,और ये सब कुछ खुद उन्हीं संकलकों की छाती पर बैठ कर किया गया । आपसी खुन्नस के हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि नकली प्रोफ़ाइलधारी असली ब्लॉगरों ने कुछ चुनिंदा पोस्टों पर ऐसे अहम सुरीले वाक्यों और शब्दों का प्रयोग किया खुद गूगल को भी ये तय करने में परेशानी आ रही होगी कि उनकी किस पोस्ट को सर्च इंजन में सबसे पहले दिखाए । इन बुरे दौरों से गुजरने के अलावा साथ साथ ब्लॉगर बाबा  भी अपनी सारी कारस्तानी इन्हीं दिनों के लिए बचाए हुए बैठे थे जैसे । कभी परिकल्पना महोत्सव गायब तो कभी ज़ाकिर भाई का ब्लॉग ,पाबला जी जैसे कंप्यूटिक्स लड भिड के निकालने में लगे रहे इन दिनों , लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग को बढना था सो बढ रही है और मजे में बढ रही है , अब तो और तेज़ बढने वाली है । लेकिन दिक्कत वहां लगती है जब सिर्फ़ कुछ खास लोग जाने किसी खास मकसद यी किसी भी मकसद के बिना भी कभी हिंदी के बहाने , कभी ब्लॉगिंग के बहाने , कभी हिंदी ब्लॉगिंग के बहाने ,यहां या तो सबको कोसने का काम करते रहे या फ़िर उन्हें किसी न किसी बहाने अपमानित करने का । यहां सिर्फ़ दो बातें बिल्कुल स्पष्ट कह देना ठीक होगा । बहुत बार बहुत घटिया , बेहूदा और अपमानजनक प्रयासों के बाद भी , हिंदी ब्लॉगिंग में अभी इतने लोग अपना सकारात्मक योगदान दे रहे हैं कि उनकी कोशिश बेकार ही जाएगी , दूसरी ये कि उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि यदि लोग उपेक्षा कर रहे हैं तो सिर्फ़ इसलिए वे आगे की ओर अग्रसर रहना चाहते हैं , लेकिन सिर्फ़ कुछ ने ही खूंटा गाड लेने का मन बना लिया तो फ़िर .....।


आप हिंदी में ब्लॉगिंग करते हैं तो ये जरूर ध्यान रखिए कि इसके साथ सिर्फ़ आपकी ब्लॉगिंग नहीं जुडी है बल्कि हिंदी का नाम जुडा हुआ और उस हिंदी से ही आप जुडे हुए हैं । शुक्र है कि हिंदी ब्लॉगिंग के बारे में बेशक खबरें चाहे जैसी भी और जहां भी आ रही हों , आज देश के हर समाचार पत्र में हिंदी ब्लॉग पोस्टों के अंश का स्तर बहुत ही उत्कृष्ट ही होता है । ये कहना थोडा इसलिए आवश्यक लगा क्योंकि ये हिंदी ब्लॉगिंग के काफ़िले के निर्माण का समय है , अन्य तकनीकी झंझावातों के साथ साथ यदि हिंदी के ब्लॉगर भी उस काफ़िले में हमले करेंगे तो वो आत्मघाती ही साबित होगा ....और हमेशा होता रहेगा ।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

अब या तो निपटाइए , या निपट ही जाइए ..झा जी कहिन






कल के मुंबई बम धमाकों के बाद सिर्फ़ दो बातें दिमाग में घूम रही हैं , पहली ये कि , तो क्या अब दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले हमारे जैसों को ऐसे ही किसी आतंकी हमले में मरने या किसी अपने के मर जाने की खबर सुनने की आदत डाल लेनी चाहिए ..और दूसरा ये कि ....सरकार की सारी बकवास , आतंकवादी घटनाओं से परे जाकर बस इतना कहने का मन है ...या तो निपटाइए ....या अब खुद ही निपट जाइए ..बस अब बहुत हुआ।


मैंने अभी अपनी इस पोस्ट में ये संभावना जताई थी कि अभी जिस तरह के हालात हैं और आसपास यानि पाकिस्तान , बांग्लादेश , और चीन जैसे देशों की जो मंशा भारत के प्रति है उसमें ये बहुत कुछ अपेक्षित सा ही था कि देर सवेर भारत को ये दंश झेलना ही था , बल्कि कहा जाए कि ये तो एक शुरूआत भर है तो शायद ये गलत नहीं होगा । ये भी अब देश के महानगरों की एक नियति सी बनती जा रही है कि उन्हें , देश के सबसे विकसित शहरों में रहने का खामियाजा ऐसे भुगतने के लिए अभिशप्त होना पड रहा है । इन बम धमाकों से पहले और इसके बाद कुछ भी ऐसा अलग या अनोखा नहीं होगा जो कि अब तक न हुआ हो । सरकार द्वारा इसकी भर्तस्ना , अपने तमाम आका टाईप के दोस्त देशों के आगे जा जाकर बताना कि , देखो हमें तो फ़िर मारा । कुछ अलग करना हो तो सामने ही अमेरिका का उदाहरण है , जिसने बिना किसी कानून , बिना किसी सीमा की परवाह करते हुए आतंकी ओसामा बिन लादेन को उसीके बिल में जा कर मारा । न सिर्फ़ उसे मारा बल्कि अब ऐसे समाचार आ रहे हैं कि पाकिस्तान की आर्थिक सहायता में भी भारी कटौती की गई है ।


पडोसी देश पाकिस्तान , आज विश्व में आतंकियों , स्मगलरों , अंतरराष्ट्रीय अपराधों का गढ माना जाता है । और बार बार इसके पुख्ता प्रमाण मिलते रहने के कारण इसमें कोई संदेह भी नहीं है । तो ऐसे में जब भारत एक ऐसे देश का पडोसी है , न सिर्फ़ पडोसी बल्कि उसका दुश्मन नंबर एक है ( लाख क्रिकेट की कूटनीति हो या संगीत, सिनेमा के जुडे हुए तार , और चाहे भारत माने न माने लेकिन ये हकीकत है कि आज भी पाकिस्तान भारत को इसी रूप में देखता है) ,तो क्या ये स्वाभाविक नहीं है कि आने वाले समय में इन आतंकी घटनाओं के और भी बढने के आसार हैं । देश की तमाम सुरक्षा संस्थाएं , एजेसियां और पुलिस को अब अगले बहुत समय तक अपने उच्चतम सुरक्षा मोड में रहना चाहिए , लेकिन अफ़सोस कि आज देश के राजनीतिज्ञों को घपलों घोटालों में पैसा बटोरने से ही फ़ुर्सत नहीं है । जिस तरह से कसाब , अफ़ज़ल जैसे आतंकियों को पाल पोस कर न्याय दिलवाने के नाम पर रखा जा रहा है और पिछले तमाम आतंकी घटनाओं में एक भी नेता और और उनके नाते रिश्तेदारों के बाल भी बांका नहीं होने के कारण मन में संदेह होता है कि कहीं ये आपसी सांठगांठ तो नहीं कि , तुम हमें बचा के रखो, हम तुम्हें बचाए रखेंगे ।


इन घटनाओं पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने कहा कि , बहुत बडी गलती हुई थी उस दिन संसद पर हमले को नाकाम करने में हमारे सैनिकों ने अपनी जान देकर इन राजनीतिज्ञों को बचाया जो ऐसे आतंकी हमलों पर ओछे बयान की राजनीति करते हैं । काश कि उस दिन एक आध भी निपट लिया होता तो जरूर ये नौबत शायद उतनी जल्दी जल्दी नहीं आती जितनी कि आ रही है । आने वाला समय इस लिहाज़ से बहुत ही ज्यादा संवेदनशील और नाज़ुक होगा , क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता जहां बढने के आसार हैं वहीं आने वाले कुछ महीने भारत में त्यौहारों और पर्व का मौसम होता है , ज़ाहिर है कि आतंकियों के लिए ये एक और मौका होगा । सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर कब तक ? 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जनांदोलन और आम आदमी....झा जी कहिन



ये आम आदमी की तस्वीर है , बस जरा पास पास खडा है एक दूसरे से



देश अभी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनशीलता के दौर से गुजर रहा है  । ऐसा नहीं है कि कहीं को अस्थिरता या असंतोष प्रकटत: दिखाई नहीं दे रहा है बल्कि अब जिस तरह से चौबीस घंटों में हुई बहुत सी घटनाओं , दुर्घटनाओं , अदालती कार्यवाहियों , समाचार संकलनों और तो और राजनीतिक बयानों तक पर आम आदमी अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है वो बहुत कुछ प्रमाणित करने के लिए काफ़ी है । पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार और उसमें सरकार की दुखद भागीदारी ने महंगाई का एक ऐसा आसमान खडा कर दिया है कि जिसमें से थोडे थोडे अंतराल पर आम आदमी पर बिजली टूट टूट के गिरती रहती है । अब तो वो जमाना आ गया है कि लोगों को खाना पीना पहनना और रहना जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी भारी पडने लगी हैं ।

आज सरकार , पुलिस , प्रशासन , अधिकारी , कर्मचारी , मीडिया , अदालत और तमाम छोटे बडे कारक अपने अपने हिस्से के काम बखूबी कर रहे हैं । बखूबी कहने का तात्पर्य ये नहीं कि दुरूस्त कर रहे हैं , बस ये है कि जैसा वे कर सकते हैं , और जैसी करने की उनकी मानसिकता और नियति है वे कर रहे हैं । हालात पिछले कुछ समय से लगातार बिगडते चले जा रहे हैं और बात अब उस स्तर तक पहुंच गई है जहां पर कई विद्वान लोग भ्रष्टाचार , घूसखोरी के वैधानिकीकरण यानि उसे बिल्कुल कानूनी और ज़ायस बनाने की बातें तक करने लगे हैं । एक बहुत बडी जमात उन लोगों की भी है , जिन्हें न तो सरकार की अकर्मठता , उसके धूर्त चरित्र और उसके द्वारा की जा रही बेइमानी से कोई सरोकार न है न ही इसके खिलाफ़ या फ़िर सरकार के ही समर्थन या विरोध में खडे लोगों में कोई दिलचस्पी । वे मस्त हैं ये मान कर कि अब कुछ नहीं हो सकता और इस देश को और इन हालातों को कोई भी कभी भी नहीं बदल सकता । मेरा मानना ये है कि आम आदमी जब अपनी सोच और अपने नज़रिए से सरकार और सत्ता को अपना गुस्सा दिखाने लगता है तो सरकारें भी भीतर से कांप रही होती हैं ,तो इसलिए बेशक जो खुल कर इस लडाई में आगे नहीं आ सकते , वे चुप ही रहें इससे बेहतर कि वे रूदालियों की तरह यही कहते फ़िरें कि ऐसा अब नहीं हो सकता वैसा अब संभव नहीं है । और सरकार को भी भलीभांति ये समझना चाहिए कि आज ये सवाल नहीं है कि मुद्दों को उठाने वाले कौन हैं , असली बात ये है कि जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं , उनके बारे में सरकार का क्या सोचना है । आज अगर आम लोग अलग अलग रूप और जनसंगठनों के सहारे सरकार के सामने सीना तान के खडे हो गए हैं और सिर्फ़ चंद सवालों के जवाब , लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए कुछ अधिकार और जनांदोलनों का रास्ता अख्तियार करके उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दृढबद्ध हो गए हैं तो इसमें अनैतिक , गैरकानूनी और असंवैधानिक क्या है , ये सरकार को जरूर बताना चाहिए ।

बेशक कुछ व्यक्तियों ने कुछ बहुत से वाजिब सवालों को उठाकर और बनने वाले कुछ प्रस्तावित कानूनों में कुछ बुनियादी बदलाव की मांग करके न सिर्फ़ सरकार के थिंक टैंक की चूलें हिला दीं बल्कि आम आदमी के विचारों को , उसके गुस्से को , उसकी लाचारी को एक हवा सी दे दी है । आज जो इस स्थिति से जरा भी रूबरू है वो जानता है कि आने वाले समय में उसे दो में से एक रास्ता ही चुनना होगा । या तो आप बदलाव के साथ हैं या बदलाव के साथ नहीं है । और समाजशास्त्री ये बात बखूबी समझते हैं कि जब समाज में फ़ासला इतना बडा हो कि नब्बे प्रतिशत की किस्मत दस प्रतिशत की मुट्ठी में जबरन कैद हो तो फ़िर संभावना इसी बात की ज्यादा रहती है कि नब्बे प्रतिशत उस दस प्रतिशत को उखाड फ़ेंकने की योजना में ही शामिल होता है । और ऐसा भी नहीं है कि आज आम आदमी तटस्थ है , चुपचाप सब होता ,देख रहा है । नहीं कतई नहीं है , बल्कि असल में तो आज हर दफ़्तर , हर महकमें , हर संस्थान में उन मुट्ठीभर ईमानदार लोगों के चेहरे की चमक और आत्मविश्वास दोगुना सा दिख रहा है । लोग अब आरटीआई और कंज्यूमर कोर्ट की भभकी से बडे बडों की हवा टाईट करने में लगे हैं । सीएम पीएम भी अदालतों के चक्कर यूं काटते दिख रहे हैं मानो चोर गिरहकट और जेबकतरे हों ,लेकिन  इसके बावजूद सिर्फ़ दो बातों की अकड , पहली ये कि जनता के चुने हुए नुमाइंदे हैं , वो भी उस अंदाज़ में कि अब तो आ गए चुन कर , अब पांच सालों तक कुछ भी न बिगाड सकोगे किसी भी सूरत में , दूसरी ये कि आज भी भारतीय जनता ने लोकतंत्र पर विश्वास करना नहीं छोडा है और वो अब भी आमतौर पर उतनी हिंसक नहीं होती जितने कि आज विश्व के अन्य देशों की आम जनता हो जाया करती है , नहीं तो किसी की भी समझ में ये बात आ सकती है कि कसाब जैसे मुलजिम भारत जैसे देशों में ही इतने दिनों तक जीवित रह सकते हैं ।



ऐसे में भी अगर आम लोग अभी ये तय कर लें कि उन्हें आज नहीं , बल्कि अपना कल कैसा चाहिए तो ये माना जा सकता है कि , आने वाले कुछ दिनों में उबलता हुआ जनस्मूह कोई बहुत कारगर उपाय न भी तलाश पाए तो ऐसा एक माहौल जरूर बना दे लगे कि हां वाकई सब कुछ बदलने के दौर में है । तय तो खुद लोगों को करना है , समाज को करना है क्योंकि कोई भी पेशा हो या कोई भी पद हो , आता और बनता तो हमारे बीच से ही है न आखिर । लेकिन उस बदलाव की शुरूआत के लिए यही उपयुक्त समय है और यही उपयुक्त माहौल भी । सबसे जरूरी बात तो ये कि सबको अपनी अपनी स्थिति जरूर मजबूत रखनी चाहिए , यानि कि आप जहां है , वहां से खुद की बेहतरी के लिए सोचते रहें , जरूर सोचें , क्योंकि आप बढेंगे तो देश बढेगा , लेकिन हां रास्ते वही चुनिए , जिस पर आप चाहते हैं कि आपकी अगली पीढी को किसी इससे भी बदतर स्थिति से गुजरना न पडे । इसलिए ये बहुत जरूरी है कि आज एक कदम तो जरूर ही उठाया जाए । इसलिए आज के युवाओं को अपनी ताकत का अपनी धमक का और अपनी सोच ,जिम्मेदारी के एहसास को भलीभांति इस सरकार को सुनाना चाहिए । आसपास के हर दफ़्तर , हर संस्था में गलत बातों का विरोध , खुदबखुद कतारबद्ध होकर काम करने करवाने की प्रवृत्ति , ट्रैफ़िक  और नागरिक नियमों का सम्मान और उनका पालन , आसपास के समाज के साथ पारस्परिक सहभागिता निभाते हुए एक दूसरे की सहायता की भावना का विकास , लालच और विकास की अंधी दौड में भागते रहने से बेहतर है कि बेहतर इंसान बनने के मायने सीखें और सिखाएं जाएं , लेकिन इसके लिए एक बेहतर राजनीतिक नेतृत्व और जनसंगठन की जरूरत होगी । पिछले दिनों से तयशुदा मानकों को तोडना होगा और जंग फ़ंफ़ूद लगे अनुच्छेदों को कांट छांट के इस समय के अनुकूल करना होगा ।



इसलिए आज देश के न सिर्फ़ युवाओं , बल्कि महिलाओं , मजदूरों , छात्रों , खिलाडियों , सबको देश के लिए , लोकतंत्र के लिए , और नागरिकों की मानसिक शारीरिक आजादी की रक्षा के लिए अपने अपने हिस्से की लडाई लडनी ही होगी । हो सकता है कि कहीं कहीं पर अगुआ और लडाई का तरीका थोडा बहुत अलग हो लेकिन उद्देश्य वही होना चाहिए । छोटे छोटे जनसंगठनों का निर्माण , आम लोगों में सभी नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता और गरीब वंचित तबके के लिए यथा संभव सहायता के बहुत सारे छोटे छोटे ऐसे काम हैं जिनके लिए किसी तहरीर चौक और किसी आंदोलन की जद में आए इसे किया जा सकता है । लेकिन हां इसके साथ ही ये बहुत जरूरी हो जाता है कि ऐसा हर वर्ग , हर तबका , हर समूह , हर संगठन , हर जनतांत्रिक मुहिम में अपनी सक्रियता का परिचय जरूर कराए , पक्ष या विपक्ष में ये दीगर बात है । धार्मिक विद्वेष , सामाजिक कुरीतियों और पश्चिमी विकृतियों से निपटने के लिए और उनमें बदलाव लाने के लिए किसी कानून से ज्यादा मानसिकता बदलने की जरूरत है और ये मुहिम अभी से शुरू कर दी जाए तो बेहतर होगा और शायद एक दिन जाकर वो स्थिति भी आए जब आज के ये दिन और स्थिति एक दु: स्वप्न की तरह याद किया जाए ।

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