बचपन से देखता सुनता आ रहा था २६ जनवरी की परेड के बारे में मगर कभी गणतंत्र पर विचार विश्लेषण नहीं किया, सो सोचा की इस बार इस सुअवसर का लाभ उठाया जाए। एक गुनी आत्मा मिल गए मार्गदर्शक की तरह और मैंने उनसे ही कहा - हे प्रभो, मुझ सहित आज की सारी पीढी इस गणतंत्र नामक अजीब तरह की प्रणाली, प्रथा, शब्द , त्यौहार, दुर्घटना जो भी हैं के विषय में जानना चाहती है, कृपया इसकी महिमा का बखान करें।
देखो भैया , ज्यादा तो मैं भी नहीं जानता। पहले गण को ही ले लो । यदि पूछा जाए की गण का मतलब क्या तो मैं तो पढ़ा है की शिव शंकर प्रभु के चेले चपाटों क गण कहा जाता था। मगर आजकल तो शिव जी की बाकायदा एक सेना है जो फुल टाईम जॉब में एक ख़ास भाषा नहीं बोलने वालों के साथ मार कुटाई करती है और पार्ट टाईम जॉब में वैलेंताईं दे , फ्रैंडशिप दे, आदि पर आर्चीज़ , हालमार्क की दुकानें जलाते हैं।
वैसे एक और जगह पर गण लिखा देखा है मैंने। जन और मन के बीच में, अरे वही जन-गण-मन । शायद इसलिए जन और मन के बीच ही गण गुम हो जाता है समझे बच्चू।
अब बात करते हैं तंत्र की । सुनने में तो प्रजातंत्र, स्वतंत्र, लोकतंत्र, और खुफिया तंत्र आदि न जाने कितने तंत्र आते हैं मगर सब के सब सुपर फ्लॉप हैं। और तो और खुफिया तंत्र भी इतना ज्यादा खुफिया है की पता ही नहीं चलता की है भी या नहीं। हाँ तंत्र के नाम पर यदि कुछ चलती में है तो वो है तंत्र-मंत्र की लांखों दुकानें। अजी क्या खूब बिजनेस है इनका, गली गली में इनके आउटलेट्स खुले हैं, वशीकरण तंत्र, मारक तंत्र, यौवन प्राप्ति तंत्र, पुत्र प्राप्ति तंत्र, अदि अदि , । किसी भी मंदी वंदी का असर भी नहीं पड़ता है इस पर।
वैसे अब तो सरकार भी गण तंत्र का मतलब गन तंत्र समझ रही है , तभी तो इस बार संस्कृति मंत्रालय की वाद्ययंत्रों वाली झांकी को रद्द करके आयुध -शाश्त्रों की झांकी को रखा गया है परेड में.समझे।
चलो अब बस, - हैपी गणतंत्र दे .
रविवार, 25 जनवरी 2009
शनिवार, 24 जनवरी 2009
अमा ये तो बताओ, पुरूस्कार मिल किसे रहा है - झुग्गी को, कुत्ते को, या करोड़पति को
सबसे पहले तो आप लोगों से इस बात के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ की एक बार फ़िर अनियमित हो गया, इस बार ना चाहते हुए भी। मेरी माता जी का असामयिक निधन हो गया, इस कारण यहाँ उपस्थित नहीं हो सका। आशा है की आप समझ सकेंगे।
पुरस्कार मिल किसे रहा है- झुग्गी को, कुत्ते को, या करोड़पति को ?
कुछ दिन पहले भारत में भी और देशों की तरह ओबामा की ही चर्चा हो रही थी, इतनी की जितनी तो लोगों ने अपने मामा या नाना तक की नहीं की होगी। मगर मारो गोली ओबामा, मामा को अब तो चारों तरफ़ , एक ही चर्चा है स्लम दोग मिल्लिओनैरे की, नहीं समझे। अजी शीर्षक देख कर किसके बाप में इतनी हिम्मत और अक्ल थी की समझ जाता, और फ़िर वो तो भला हो पहले गोल्डन ग्लोब और अब ऑस्कर वालों का की इतने उटपटांग नाम वाली पिक्चर को देखने लोग जा भी रहे हैं। खैर, यहाँ तो मुसीबत पे मुसीबत है जब कोई पिक्चर ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजी जाती है तो विवाद उठता है, जब वहां पहुँच कर पुरस्कार पाने से वंचित रह जाती है तो विवाद उठता है, और अब जबकि ये कहा जा रहा है कि एक न एक या बहुत सारे ऑस्कर अपने होने जा रहे हैं , कमाल है की इस पर भी विवाद है। यार तभी तो ये ऑस्कर वाले हमें कोई पुरस्कार वैगेरह देने के झंझट में नहीं पड़ते ।
मगर एक आम हिन्दुस्तानी होने के नाते कुछ कीडे तो मेरे दिमाग में भी कुलबुला रहे हैं। सबसे पहला तो ये की ये नाम क्या हुआ, कुत्ता, झुग्गी और करोड़पति। अम कुत्ते और झुग्गी का तो रिश्ता समझ में आता है मगर इस करोड़पति का इसके साथ क्या लेना देना। यहाँ कुत्ते को लेकर एक दिलचस्प बात और आपको बता दूँ, पिछले दिनों मुंबई की नगरपालिका ने सरकार से मुंबई में सत्तर हज़ार आवारा कुत्तों को मारने की अनुमति माँगी थी जिसे अदालत ने आज ही ठुकरा दिया है, और कमाल है की इसे रोकने के लिए होलीवूद की अदाकारा पैरिस हिल्टन ने भी पत्र लिखा था, तो क्या मुंबई नगरपालिका को नहीं पता था की इस कुत्ते के कारण भारत को ऑस्कर मिलने जा रहा है , बताओ आदमी को मिला नहीं कुत्ते को मिलने जा रहा है, मगर यार कुत्ता तो है नहीं इस पिक्चर में। मुझे तो लगता है की इस हिल्टन के कुत्ते प्रेम के कारण ही ऑस्कर मिल रहा है। अब बात झुग्गी की, यदि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गवासी वी पी सिंह , जिन्होंने आजन्म झुग्गी को ना टूटने के लिए न जाने क्या क्या किया, के ज़माने में झुग्गे को कोई पुरस्कार नहीं मिला तो अब कैसे ऐसे हो गया ।
करोड़पति, हाँ इस नाम को देख कर लगता है की इसे पुरस्कार, कार , सब कुछ मिल सकता है। अजी अपने शंशाह जब धूल फांकने लगे थे तो सिर्फ़ इस नाम के कार्यक्रम ने उन्हें ऐसा मौका दिलाया की आज भी अन्य सितारे उस दिन को कोसते हैं जब अमिताभ बच्चन को ये कार्यक्रम मिला और उन्होंने बोल्लीवूद के पता नहीं कितने हीरो की बैंड बजा दी।
वैसे मेरा तो मानना है की चाहे कुत्ते को, बिल्ली को, चूहे को, झुग्गी को, नाली को, या झोंपडे को किसी को भी पुरूस्कार मिल रहा है तो मिलना चाहिए। लेकिन जानकार लोग मानते हैं की ये भारत की गरीबी , उसकी तंगहाली, बदहाली, भुखमरी, को पुरूस्कार मिल रहा है, और कौन सा आज मिल रहा है इस से पहले भी सत्यजित रे, ये काम कर चुके हैं बस तब कुत्ते और झुग्गी मुंबई के नहीं कोलकाता के थे।
खैर सबको ऑस्कर मुबारक हो भैया.
पुरस्कार मिल किसे रहा है- झुग्गी को, कुत्ते को, या करोड़पति को ?
कुछ दिन पहले भारत में भी और देशों की तरह ओबामा की ही चर्चा हो रही थी, इतनी की जितनी तो लोगों ने अपने मामा या नाना तक की नहीं की होगी। मगर मारो गोली ओबामा, मामा को अब तो चारों तरफ़ , एक ही चर्चा है स्लम दोग मिल्लिओनैरे की, नहीं समझे। अजी शीर्षक देख कर किसके बाप में इतनी हिम्मत और अक्ल थी की समझ जाता, और फ़िर वो तो भला हो पहले गोल्डन ग्लोब और अब ऑस्कर वालों का की इतने उटपटांग नाम वाली पिक्चर को देखने लोग जा भी रहे हैं। खैर, यहाँ तो मुसीबत पे मुसीबत है जब कोई पिक्चर ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजी जाती है तो विवाद उठता है, जब वहां पहुँच कर पुरस्कार पाने से वंचित रह जाती है तो विवाद उठता है, और अब जबकि ये कहा जा रहा है कि एक न एक या बहुत सारे ऑस्कर अपने होने जा रहे हैं , कमाल है की इस पर भी विवाद है। यार तभी तो ये ऑस्कर वाले हमें कोई पुरस्कार वैगेरह देने के झंझट में नहीं पड़ते ।
मगर एक आम हिन्दुस्तानी होने के नाते कुछ कीडे तो मेरे दिमाग में भी कुलबुला रहे हैं। सबसे पहला तो ये की ये नाम क्या हुआ, कुत्ता, झुग्गी और करोड़पति। अम कुत्ते और झुग्गी का तो रिश्ता समझ में आता है मगर इस करोड़पति का इसके साथ क्या लेना देना। यहाँ कुत्ते को लेकर एक दिलचस्प बात और आपको बता दूँ, पिछले दिनों मुंबई की नगरपालिका ने सरकार से मुंबई में सत्तर हज़ार आवारा कुत्तों को मारने की अनुमति माँगी थी जिसे अदालत ने आज ही ठुकरा दिया है, और कमाल है की इसे रोकने के लिए होलीवूद की अदाकारा पैरिस हिल्टन ने भी पत्र लिखा था, तो क्या मुंबई नगरपालिका को नहीं पता था की इस कुत्ते के कारण भारत को ऑस्कर मिलने जा रहा है , बताओ आदमी को मिला नहीं कुत्ते को मिलने जा रहा है, मगर यार कुत्ता तो है नहीं इस पिक्चर में। मुझे तो लगता है की इस हिल्टन के कुत्ते प्रेम के कारण ही ऑस्कर मिल रहा है। अब बात झुग्गी की, यदि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गवासी वी पी सिंह , जिन्होंने आजन्म झुग्गी को ना टूटने के लिए न जाने क्या क्या किया, के ज़माने में झुग्गे को कोई पुरस्कार नहीं मिला तो अब कैसे ऐसे हो गया ।
करोड़पति, हाँ इस नाम को देख कर लगता है की इसे पुरस्कार, कार , सब कुछ मिल सकता है। अजी अपने शंशाह जब धूल फांकने लगे थे तो सिर्फ़ इस नाम के कार्यक्रम ने उन्हें ऐसा मौका दिलाया की आज भी अन्य सितारे उस दिन को कोसते हैं जब अमिताभ बच्चन को ये कार्यक्रम मिला और उन्होंने बोल्लीवूद के पता नहीं कितने हीरो की बैंड बजा दी।
वैसे मेरा तो मानना है की चाहे कुत्ते को, बिल्ली को, चूहे को, झुग्गी को, नाली को, या झोंपडे को किसी को भी पुरूस्कार मिल रहा है तो मिलना चाहिए। लेकिन जानकार लोग मानते हैं की ये भारत की गरीबी , उसकी तंगहाली, बदहाली, भुखमरी, को पुरूस्कार मिल रहा है, और कौन सा आज मिल रहा है इस से पहले भी सत्यजित रे, ये काम कर चुके हैं बस तब कुत्ते और झुग्गी मुंबई के नहीं कोलकाता के थे।
खैर सबको ऑस्कर मुबारक हो भैया.
मंगलवार, 30 दिसंबर 2008
आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो ख़ास हैं, और इस खासियत को समझें
जी हाँ, मैं पूरे संजीदगी से ये बात कह रहा हूँ। आप शायद ये कहेंगे की ये क्या बात हुई भला और ये बात अभी यहाँ क्यों कह रहा हूँ। कारण तो है , वाजिब या गैरवाजिब ये तो नहीं जानता। दरअसल जितना थोडा सा अनुभव रहा है मेरा, उसमें मैंने यही अनुभव किया है की सब कुछ ठीक चलते रहने के बावजूद हिन्दी ब्लॉगजगत में अक्सर कुछ लोगों द्वारा चाहे अनचाहे किसी अनावश्यक मुद्दे पर एक बहस शुरू करने की परम्परा सी बंटी जा रही है। हलाँकि ऐसा हर बार नहीं होता और ऐसा भी जरूरी नहीं है की जो मुद्दा मुझे गैरजरूरी लग रहा है हो सकता है दूसरों की नजर में वो बेहद महत्वपूर्ण हो। मगर मेरा इशारा यहाँ इस बात की और है , की कभी एक दूसरे को नीचा, ओछा दिखने की होड़ में तो कभी किसी टिप्प्न्नी को लेकर, कभी किसी के विषय को लेकर कोई बात उछलती है या कहूँ की उछाली जाती है बस फ़िर तो जैसे सब के सब पड़ जाते हैं उसके पीछे , शोध , प्रतिशोध, चर्चा, बहस सबकुछ चलने लगता है और दुखद बात ये की इसमें ख़ुद को पड़ने से हम भी ख़ुद को नहीं बच्चा पाते, और फ़िर ये भी की क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते है ?
मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।
तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.
मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।
तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.
आप हिन्दी में ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं तो ख़ास हैं, और इस खासियत को समझें
जी हाँ, मैं पूरे संजीदगी से ये बात कह रहा हूँ। आप शायद ये कहेंगे की ये क्या बात हुई भला और ये बात अभी यहाँ क्यों कह रहा हूँ। कारण तो है , वाजिब या गैरवाजिब ये तो नहीं जानता। दरअसल जितना थोडा सा अनुभव रहा है मेरा, उसमें मैंने यही अनुभव किया है की सब कुछ ठीक चलते रहने के बावजूद हिन्दी ब्लॉगजगत में अक्सर कुछ लोगों द्वारा चाहे अनचाहे किसी अनावश्यक मुद्दे पर एक बहस शुरू करने की परम्परा सी बंटी जा रही है। हलाँकि ऐसा हर बार नहीं होता और ऐसा भी जरूरी नहीं है की जो मुद्दा मुझे गैरजरूरी लग रहा है हो सकता है दूसरों की नजर में वो बेहद महत्वपूर्ण हो। मगर मेरा इशारा यहाँ इस बात की और है , की कभी एक दूसरे को नीचा, ओछा दिखने की होड़ में तो कभी किसी टिप्प्न्नी को लेकर, कभी किसी के विषय को लेकर कोई बात उछलती है या कहूँ की उछाली जाती है बस फ़िर तो जैसे सब के सब पड़ जाते हैं उसके पीछे , शोध , प्रतिशोध, चर्चा, बहस सबकुछ चलने लगता है और दुखद बात ये की इसमें ख़ुद को पड़ने से हम भी ख़ुद को नहीं बच्चा पाते, और फ़िर ये भी की क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाते है ?
मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।
तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.
मुझे पता है यहाँ पर जो लोग इस दृष्टिकोण से देखते हैं की यदि ब्लॉग्गिंग में यही सब देखना और सोचना है तो फ़िर ब्लॉग्गिंग क्यों और भी तो माध्यम हैं न। मैं उन सब लोगों को बता दूँ और अच्छी तरह बता दूँ की आप सब जितने भी लोग हिन्दी और देवनागिरी लिपि का प्रयोग कर के लिख रहे हैं वे बहुत ख़ास हैं विशिष्ट हैं, सिर्फ़ इतने से ही जानिए न की करोड़ों हिन्दी भाषियों में से आप चंद उन लोगों में से हैं जो हिन्दी में लिख पा रहे हैं, और हाँ गए वो दिन जब आप अपने लिए लिखते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ आज कम से कम हरेक हिन्दी का अखबार हमारी लेखनी को पढ़ रहा है, उस पर नजर रखे हुए है, उसे छाप भी रहा है और हमारे आपके विचार समाचार पत्रों के माध्यमों से न जाने कितने लोगों तक पहुँच रहा है।
तो आपको और हमें ही ये सोचना है की हम अपनी लेखनी और शब्दों को इस बात के लिए जाया करें की
गाली का मनोविज्ञान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक पहुंचा या कुछ सार्थक सोचे और लिखें .............
यदि कुछ ज्यादा कह गया तो परिवार का सदस्य समझ कर क्षमा करें.
हसीना हसीन हुई , और बेगम हुई गमजदा
पड़ोसी देश बांग्लादेश में आम चुनाव सात साल के बाद हुए। इस बीच वहां क्या-क्या हुआ और होता रहा , कहने bataane kee जरूरत नहीं। इस बार भी चुनाव से ठीक पहले और बाद में भी दोनों प्रमुख दल अवामी लीग और बांग्लादेश नेस्नालिस्ट पार्टी, यही अंदेशा व्यक्त कर रहे थे की चुनाव परिणाम मनोनुकूल न रहे तो pooree चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह खडा कर देंगे। लेकिन लगता है की आम मतदाता ये नहीं चाहता था।
चुनाव परिणाम आए और ऐसे आए की शेख हसीना और भी हसीन होकर उभरी । दूसरी तरफ़ बेगम खालिदा जिया का जिया तोड़ते हुए आम लोगों ने उन्हें इस कदर हाशिये पर दाल दिया की वे बेगम न रह कर गमजदा बन कर रह गयी। अब जबकिशेख हसीना पूरे दमख़म और भारी जनमत से सरकार बनाएंगी तो उनसे यही अपेक्षा रहेगी की वे अपने वीजन २०२० (जिसमें युवाओं से २०२० तक देश में संचार क्रान्ति लाने का वादा किया गया था ) को पूरा करने के अलावा अपने पिता को पुनः बांग्लादेश का राष्ट्रपिता घोषित करना, गरीबी, बेरोजगारी आदि से निपटने के कारगर उपाय करेंगी। इन सब कामों के अलावा भारत के साथ पिछले दिनों आयी कड़वाहट भी घटेगी , हम तो यही उम्मीद करेंगे ।
हाँ, अंत में बेगम जिया के लिए भी एक सलाह है। आपका असली वोट बैंक तो हमारे यहाँ घुसपैठिया बन कर आ गया है। यहाँ पड़े पड़े ऐसे ऐसे कारनामों में लिप्त है कि क्या कहें. देखिये अब भी वक्त है आप इन्हें वापस ले जाएँ, वरना हमारी आदत आप नहीं जानती । हमारे किसी पारखी नेता ने इन्हें अपना वोट बैंक मान लिया तो बस कल से ही आन्दोलन शुरू। इन्हें आरक्षण दो, नौकरी दो, घर दो, अल्पसंख्यक दर्जा दो, दोहरी नागरिकता दो, उफ़ हे भगवान्, नहीं नहीं आप तो अपना ये अनमोल खजाना वापस ही ले जाओ.
चुनाव परिणाम आए और ऐसे आए की शेख हसीना और भी हसीन होकर उभरी । दूसरी तरफ़ बेगम खालिदा जिया का जिया तोड़ते हुए आम लोगों ने उन्हें इस कदर हाशिये पर दाल दिया की वे बेगम न रह कर गमजदा बन कर रह गयी। अब जबकिशेख हसीना पूरे दमख़म और भारी जनमत से सरकार बनाएंगी तो उनसे यही अपेक्षा रहेगी की वे अपने वीजन २०२० (जिसमें युवाओं से २०२० तक देश में संचार क्रान्ति लाने का वादा किया गया था ) को पूरा करने के अलावा अपने पिता को पुनः बांग्लादेश का राष्ट्रपिता घोषित करना, गरीबी, बेरोजगारी आदि से निपटने के कारगर उपाय करेंगी। इन सब कामों के अलावा भारत के साथ पिछले दिनों आयी कड़वाहट भी घटेगी , हम तो यही उम्मीद करेंगे ।
हाँ, अंत में बेगम जिया के लिए भी एक सलाह है। आपका असली वोट बैंक तो हमारे यहाँ घुसपैठिया बन कर आ गया है। यहाँ पड़े पड़े ऐसे ऐसे कारनामों में लिप्त है कि क्या कहें. देखिये अब भी वक्त है आप इन्हें वापस ले जाएँ, वरना हमारी आदत आप नहीं जानती । हमारे किसी पारखी नेता ने इन्हें अपना वोट बैंक मान लिया तो बस कल से ही आन्दोलन शुरू। इन्हें आरक्षण दो, नौकरी दो, घर दो, अल्पसंख्यक दर्जा दो, दोहरी नागरिकता दो, उफ़ हे भगवान्, नहीं नहीं आप तो अपना ये अनमोल खजाना वापस ही ले जाओ.
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
डायरी का एक पन्ना
अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।
बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥
वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥
कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।
मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........
बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥
वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥
कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।
मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........
डायरी का एक पन्ना
अभी वर्षांत पर जबकि मन और मष्तिष्क दोनों ही बोझिल से हैं, और सच कहूँ तो बस इस साल के बीतने के इन्तजार में हैं, तो ऐसे में तो यही अच्छा लगा की जिस डायरी को मैं yun ही उलट रहा था उसके एक पन्ने पर उकेरे कुछ पंक्तियों को आपके सामने रख दूँ।
बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥
वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥
कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।
मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........
बसर हो यूँ की हर इक दर्द हादसा न लगे,
गुजर भी जाए कोई गम तो वाकया न लगे।
कभी न फूल से चेहरे पे गुर्दे यास जामे,
खुदा करे उसे इश्क की हवा न लगे॥
वो मेहरबान सा लगे इसकी कुछ करो तदबीर,
खफा भी हों आप तो खफा ना लगें॥
वो सर बुलंद रहा और खुद्पसंद रहा,
मैं सर झुकाए रहा और खुशामदों में रहा।
मेरे अजीजों, यही दस्तूर है मकानों का,
बनाने वाला हमेशा बरामदों में रहा॥
मैं इन्तजार करूँगा आपका हर पल यारों,
आप आयेंगे, तभी मेरे रूह का दफ़न होगा,
हो सके हाथ में फूल के दस्ते नहीं , न सही,
खुदा के नाम पे , काँटों का तो कफ़न होगा॥
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था,
वो रकीब न था तो वो नया नाम किसका था।
वो कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं,
ये किसने किया, ये काम किसका था॥
कुछ इस तरह से सताया जिंदगी ने हमें,
हंस-हंस के रुलाया जिंदगी ने हमें,
मौत आवाज देती रही बार- बार,
न इक बार बुलाया जिंदगी ने हमें।
मैं नहीं जानता इन्हें किन लोगों ने लिखा, मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ की वे बड़े काबिल लोग होंगे..........
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