इस ब्लॉगजगत पर लिखते पढ़ते अब लगभग एक साल हो गया है, और खुशी की बात ये है की सिर्फ़ पिछले एक साल में ही संख्या के हिसाब से तो ये तीन गुना अधिक हो गया है। और चर्चा के हिसाब से उससे भी कहीं आगे । किसी भी परिवार, संस्था, समाज के आचारण के अनुरूप अब जबकि यहाँ भी हम बहुत से अलग , काबिलियत, दिमाग, और मिजाज़ वाले लोग एक साथ आ गए हैं तो जाहिर तौर पर वो सारी अच्छी बुरी बातें भी इसके साथ जुड़ और घट रही हैं। जिस प्रकार से पिछले कुछ दिनों में ब्लॉगजगत में लिखने को लेकर बहुत सारे विषयों , और मुद्दों पर चर्चा हो रही है, मुझे लगता है की देर सवेर कहीं यहाँ भी अपने मीडिया, विशेषकर एलोक्त्र्निक मीडिया, की तरह का भटकाव ना आ जाए।
ब्लॉगजगत में किसी भी मुद्दे पर अलग अलग विचारों का आना, उनके तर्क वितर्क से आगे बढ़ कर एक दूसरे की टांग खिंचाई करने के बाद स्थिति तो गाली गलौज तक पहुँची, न सिर्फ़ पहुँची, बल्कि कुछ दिनों तक तो किसी किसी सामूहिक ब्लॉग पर सिर्फ़ यही होता रहा, इसका परिणाम ये हुआ की उन दिनों पूरा ब्लॉगजगत इस से प्रव्हावित हुआ। शुक्र है की वो समाप्त हो गया। आजकल कुछ बातें जो उठ कर सामने आ रही हैं, वे हैं की क्या एक ही पोस्ट को कई अलग अलग सामूहिक ब्लोगों पर प्रकाशित करना ठीक परम्परा है, और उसका उद्देश्य क्या है, दूसरी ये की क्या एक ही व्यक्ति द्वारा बहुत सारे ब्लॉग लिखना ठीक बात है, इनसे अलग ये भी की कई लोग सिर्फ़ दूसरों की रचनाएँ लिख रहे हैं उनके लिए क्या। मेरे ख्याल से तो ये जितनी भी बातें या मुद्दे उठ रहे हैं, इन सबमें निश्चित ही ब्लॉगर का कहीं भी ये उद्देश्य नहीं रहता है की उसके ऐसा करेने से किसी कोई कोई नुक्सान पहुँच सकता है, या की वो सिर्फ़ अपनी बात ही कहना और सुनना चाहता है।
किसी भी पोस्ट का एक से अधिक बार, अलग अलग ब्लोगों और सामोहिक ब्लोग्स पर आना बहुत बुरी बात नहीं कही जा सकती। ये ठीक उस तरह है जैसे की एक लेखक का आलेख या कोई भी रचना , एक ही दिन अलग अलग समाचार पत्रों में छपती है। एक व्यक्ति द्वारा सिर्फ़ एक ब्लॉग पर लिखने की पाबंदी लगाना तो निश्चय ही ज्यादती हो जायेगी। उदाहरण देकर समझाता हूँ, यदि कोई सिर्फ़ एक ही विधा में लिखता है तो उसके लिए तो एक ही ब्लॉग पर लिखने से काम चल जायेगा, किंतु कोई यदि अलग अलग विषयों , अलग अलग विधाओं में लिखना चाहता है और लिख सकता है , साथ ही चाहता है की उसे सब अलग अलग ही पढ़ें तो उसके लिए तो ये करना जरूरी भी है और औचित्यपूर्ण भी। रही बात दूसरों की रचा लिखने छपने की तो यदि उद्देश्य ये है की उन फलाना जी की लेखनी का परिचय पूरे ब्लॉग समाज से कराया जाए तो निश्चित रूप से ये उचित है, मगर किसी भी परिस्थिति में शेर्य , यानि उनका नाम जरूर उल्लिखित किया जाना चाहिए।
इन सबके बावजूद कुछ बातें तो जरूर हैं जिन पर देर सवेर कुछ न कुछ काम तो ब्लॉगजगत के खैर मख्दम करने वालों को सोचना ही पडेगा। जैसे की कुछ लोग अपने आपको परदे के पीची रख कर कुछ भी लिखे और कहे जा रहे हैं, विशेष कर किसी की पोस्ट को पढ़ कर उस पर प्रतिक्रया देने के मामले में तो ये नाकाब पोश कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं, और जाहिर सी बात है की प्रतिक्रया भी अपने चरित्र की अनुरूप ही। जैसे की एक अनाम महाशय हैं, हाल ही में उन्होनें मेरी एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी की , आप बकवास बहुत अछा करते हैं, मगर अपने दिमाग का इलाज़ करायें । यूँ तो इनकी टिप्पणी से पहली बार मेरा वास्ता नहीं पडा है , और फ़िर इन्होनें तो शायद किसी को भी नहीं बक्शा आदरणीय घुघूती जी लिए लिखा की आप तो बस हिनहिनाने के लिए ब्लॉग जगत पर आयी हैं। मुझे नहीं लगता की छुप कर आप किसी की आलोचना या विरोध कर रहे हैं तो वो सही है।
हालांकि ब्लॉगजगत एक खुला आसमान है , मगर लगता है की कभी न कभी इस आमान पर काले बादल छाने की नौबत आने लगती है इसलिए उससे बचने के लिए भी तैयार रहना पडेगा.
रविवार, 12 अक्टूबर 2008
शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
मुंबई तेरे बाप की, और खंडाला तेरी माँ का
मुंबई तेरे बाप की और खंडाला तेरी माँ का :-
उस दिन जब उद्धव ठाकरे , अजी अपने बाबा साहब के चश्मों चिराग ने जयघोष किए की मुंबई उनके बाप की है, उच्च तरंगों से युक्त मेरे मष्तिष्क ने फ़ौरन कई सारे निष्कर्ष निकाले। पहला ये कि, यदि मुंबई उनके बाप की है तो निश्चित तौर पर खंडाला उनकी माँ का ही होगा। मैंने फ़ौरन लप्तु चचा को फोन कर कहा कि चाचा झुग्गी में जो आलीशान प्लाट आप लिए हैं ऊ का पक्का रजिस्ट्री बाबा साहब से ही कराईयेगा। फ़िर पराबैंगनी किरणों से युक्त दूरदृष्टि ने और भी कई बातें भांप ली। इस हिसाब से तो बिहार लालू जी का, गुजरात मोदी भैया का, बंगाल चटर्जी -बनर्जी का, तमिलनाडु अपनी ललिता पवार, अजी जय ललिता जी का , उत्तम प्रदेश बहन जी का, और बांकी सब प्रदेश भी नेता लोगों या उनके बाप का है। भैया जिनका या जिनके भी बाप का ई दिल्ली हो जल्दी से जल्दी घोषणा करें हमको भी तो एगो घर खरीदना है यहाँ पर तो उसके लिए तो मालिक से ही न बात करनी पड़ेगी।
ठीक है, हो सकता है ई बात ठीक हो मुदा सबको एक बात बताना ठीक रहेगा कि पूरा हिंदुस्तान हम लोगों का- यानि एक आम भारतीय जी - है, हमारे बाप का है , हमारा है। और पता नहीं क्यों मन कहता है कि पूरे हिन्दुस्तान का बाप किसी भी लोकल बाप से बड़ा ही होगा, समझ गए न बाबा साहेब और बेटा साहेब।
मालामाल ,फिर भी बेहाल :-
इन दिनों हमारे दफ्तर में कुछ अजीब आलम है। दरअसल जब तक पे कमीसन नहीं आया था, सब कर्मचारी पे पे पिपिया रहे थे, मगर अब जब उसके लागू होने की बारी आयी है तो स्थिति और भी कमाल हो गयी है। अब जबकि सबकी बाकया राशि का बिल बनाया जा रहा है तो दफ्तर की तरफ़ से सबसे दो स्कीमों में से एक चुनने को कहा गया है , जिसके अनुसार बकाया राशि का बिल बनाया जायेगा। इसमें से एक ही स्कीम कर्मचारियों को ज्यादा फायदा पहुंचाने वाली है, मगर सबसे दिलचस्प बात ये है कि किसी को भी नहीं पता कि उसे किस स्कीम को अपनाने से ज्यादा फायदा होगा। नतीजा ऐसा कि पूरी भागमभाग मची है। दिमाग में पठाखे फ़ुट रहे हैं, बेचारे सब के सब मालामाल होने वाले हैं फ़िर भी बेहाल हैं। आज के नवभारत टाईम्स , दिल्ली संस्करण में तो पूरी कहानी ही छपी है । देखें क्या होता है.....
उस दिन जब उद्धव ठाकरे , अजी अपने बाबा साहब के चश्मों चिराग ने जयघोष किए की मुंबई उनके बाप की है, उच्च तरंगों से युक्त मेरे मष्तिष्क ने फ़ौरन कई सारे निष्कर्ष निकाले। पहला ये कि, यदि मुंबई उनके बाप की है तो निश्चित तौर पर खंडाला उनकी माँ का ही होगा। मैंने फ़ौरन लप्तु चचा को फोन कर कहा कि चाचा झुग्गी में जो आलीशान प्लाट आप लिए हैं ऊ का पक्का रजिस्ट्री बाबा साहब से ही कराईयेगा। फ़िर पराबैंगनी किरणों से युक्त दूरदृष्टि ने और भी कई बातें भांप ली। इस हिसाब से तो बिहार लालू जी का, गुजरात मोदी भैया का, बंगाल चटर्जी -बनर्जी का, तमिलनाडु अपनी ललिता पवार, अजी जय ललिता जी का , उत्तम प्रदेश बहन जी का, और बांकी सब प्रदेश भी नेता लोगों या उनके बाप का है। भैया जिनका या जिनके भी बाप का ई दिल्ली हो जल्दी से जल्दी घोषणा करें हमको भी तो एगो घर खरीदना है यहाँ पर तो उसके लिए तो मालिक से ही न बात करनी पड़ेगी।
ठीक है, हो सकता है ई बात ठीक हो मुदा सबको एक बात बताना ठीक रहेगा कि पूरा हिंदुस्तान हम लोगों का- यानि एक आम भारतीय जी - है, हमारे बाप का है , हमारा है। और पता नहीं क्यों मन कहता है कि पूरे हिन्दुस्तान का बाप किसी भी लोकल बाप से बड़ा ही होगा, समझ गए न बाबा साहेब और बेटा साहेब।
मालामाल ,फिर भी बेहाल :-
इन दिनों हमारे दफ्तर में कुछ अजीब आलम है। दरअसल जब तक पे कमीसन नहीं आया था, सब कर्मचारी पे पे पिपिया रहे थे, मगर अब जब उसके लागू होने की बारी आयी है तो स्थिति और भी कमाल हो गयी है। अब जबकि सबकी बाकया राशि का बिल बनाया जा रहा है तो दफ्तर की तरफ़ से सबसे दो स्कीमों में से एक चुनने को कहा गया है , जिसके अनुसार बकाया राशि का बिल बनाया जायेगा। इसमें से एक ही स्कीम कर्मचारियों को ज्यादा फायदा पहुंचाने वाली है, मगर सबसे दिलचस्प बात ये है कि किसी को भी नहीं पता कि उसे किस स्कीम को अपनाने से ज्यादा फायदा होगा। नतीजा ऐसा कि पूरी भागमभाग मची है। दिमाग में पठाखे फ़ुट रहे हैं, बेचारे सब के सब मालामाल होने वाले हैं फ़िर भी बेहाल हैं। आज के नवभारत टाईम्स , दिल्ली संस्करण में तो पूरी कहानी ही छपी है । देखें क्या होता है.....
सपनो को फ्रिज में रख छोड़ा है
मैंने सपने देखना,
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
सपनो को फ्रिज में रख छोड़ा है
मैंने सपने देखना,
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
नहीं छोडा है,
न ही,
उन्हें पूरा करने की,
जद्दोजहद।
मगर फिलहाल,
जो हाल,
और हालात हैं,
उन सपनो को ।
फोंइल पेपर में,
लपेट कर,
फ्रिज में रख छोडा है,
मौसम जब बदलेगा,
और पिघलेगी बर्फ,
सपने फ़िर बाहर आयेंगे,
बिल्कुल ताजे और रंगीन.
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008
बेचारे रावण को भी डेंगू हो गया.
हर साल की तरह इस बार भी रामलीला की समाप्ति पर हम सब कलाकार और कालोनी के सभी मेम्बरान लोग इकठ्ठा हो कर ये विचार विमर्श करने लगे की कल रावण दहन को कैसे सफल किया जाए। यूँ तो रावण दहन को सफल या असफल करने का कोई औचित्य मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि जब से मैं पैदा हुआ हूँ छब्बीस जनवरी की परेड और रावन दहन हमेशा एक जैसी ही लगती है और भरपूर सफल रहती है। रामलीला में अपने महत्त्वपूर्ण रोल को सफलतापूर्वक अंजाम देने के बाद ( यहाँ मैं आपको बताता चलूँ की राम लीला से मेरे प्रेम बहुत पुराना है और मेरे विश्व स्तरीय अभिनय की बुनियाद यही है , और अब तो भविष्य भी यही है, जब में रोल पाने पहुंचा तो उन्होंने मुझे शूर्पनखा का रोल ऑफर किया , कहा की यूँ भी आप मोहल्ले की नाक कई बार कटवा चुके हो तो शूर्पनखा के लिए बिल्कुल नाचुरल रहोगे, मैंने कहा मेरी राजकुमारों वाली पर्सनालिटी है, तो उन्होंने कहा की ठीक है तो फ़िर शत्रुघ्न बन जाओ , पूरे रामलीला में एक भी डियलोग रटने की जरूरत नहीं रहेगी। मैंने कहा की लानत है यार, इसमें क्या टैलेंट निकल कर बहार दिखेगा, चलो राम जी की सेना का कोई वीर सेनापति बना देना। तो फईनाली उन्होंने मुझे जटायु का रोल दे दिया क्योंकि उसके कोस्तुम को पहन बांकी सबको खुजली हो जाती थे ) , मैं भी कहाँ आप लोगों को अपनी कहानी सुनाने लगा, मीटिंग की तैयारी में लग गया गया।
हम लोगों ने बातचीत शुरू ही की थी की अचानक देखा तो एक बड़ा सा रावण का पुतला, अपने साथ मेघनाद और कुम्भकर्ण को लिए हुए चला आ रहा है । हम हैरान थे , वह ये क्या टेक्नोलोजी है भाई , अब रावण ख़ुद ही चल चल कर जलने के लिए पहुँच जायेंगे। परन्तु मेरी खुशी थोड़ी देर ही रही। रावण ने पास पहुँचते ही कहना शुरू किया, वो भी मरियल सी आवाज में, " देखिये आप लोग ज्यादा हैरान परेशान न हों , मैं तो सिर्फ़ ये बताने के लिए आज रात को ही आ गया हूँ की कल मैं जलने के लिए नहीं आ पाउँगा, क्योंकि पिछले बीस दिनों से पार्क में पड़ा था और मच्छरों के काटने के कारण मुझे डेंगू मलेरिया बुखार हो गया है, इस बार रावण दहन को आप लोग अगले साल तक के लिए एक्सटेंड कर दो। वैसे जब मैं मीटिंग में पहुँच ही गया हूँ तो और भी कुछ बातें हैं जो मैं कहना चाहता हूँ। ये आप लोग इतने सालों से मेरे पिछवाडे और मेरी बगलों में पठाखे घुसेड घुसेड के मुझे क्यों तपा तपा कर फूंक डालते हो। भाई मारना ही है तोऔर भी कई सारे तरीके हैं, पता है इस तरह मेरे मुंह , पेट और पता नहीं कहाँ कहाँ आग लगाने और लगातार लगाते रहने के कारण मुझे गैस की प्रॉब्लम हो गए है। एक और बात यार तुम लोग अपने फैसन वैसन में तो खूब बदलाव ला रहे हो, जितने भी टी वी चैनल पर रामायाण धारावाहिक आ रहे हैं सब में तुम लोगों ने सुग्रीव , जामवंत और जटायु तक को ग्लेमर में ढाल दिया एक मेरा ही गेट अप, बरसों से वैसा ही चला आ रहा है। इस पार आप लोग कुछ गौर फ़रमाएँ। और हाँ कभी कभी एक्सक्लूसिव प्रयोग के तौर पर कोई जिंदा रावण जलाओ, अब तो इसके लिए आपको म्हणत करने की भी जरूरत नहीं है, कई तो इसी मीटिंग में बैठे हैं। यदि आप लोगों ने इन बातों को सीरियसली नहीं लिया तो याद रखना की हम सब भी आन्दोलन कर सकते हैं।
रावण की धमकी से डर कर हम सब चुप चाप घर आ गए, अब सोच रहे हैं की रावण दहन को स्किप करके सीधा राम की अयोध्या वापसी पर पहुँच जाएँ।
आप सबको दशेहरा की बधाई...
हम लोगों ने बातचीत शुरू ही की थी की अचानक देखा तो एक बड़ा सा रावण का पुतला, अपने साथ मेघनाद और कुम्भकर्ण को लिए हुए चला आ रहा है । हम हैरान थे , वह ये क्या टेक्नोलोजी है भाई , अब रावण ख़ुद ही चल चल कर जलने के लिए पहुँच जायेंगे। परन्तु मेरी खुशी थोड़ी देर ही रही। रावण ने पास पहुँचते ही कहना शुरू किया, वो भी मरियल सी आवाज में, " देखिये आप लोग ज्यादा हैरान परेशान न हों , मैं तो सिर्फ़ ये बताने के लिए आज रात को ही आ गया हूँ की कल मैं जलने के लिए नहीं आ पाउँगा, क्योंकि पिछले बीस दिनों से पार्क में पड़ा था और मच्छरों के काटने के कारण मुझे डेंगू मलेरिया बुखार हो गया है, इस बार रावण दहन को आप लोग अगले साल तक के लिए एक्सटेंड कर दो। वैसे जब मैं मीटिंग में पहुँच ही गया हूँ तो और भी कुछ बातें हैं जो मैं कहना चाहता हूँ। ये आप लोग इतने सालों से मेरे पिछवाडे और मेरी बगलों में पठाखे घुसेड घुसेड के मुझे क्यों तपा तपा कर फूंक डालते हो। भाई मारना ही है तोऔर भी कई सारे तरीके हैं, पता है इस तरह मेरे मुंह , पेट और पता नहीं कहाँ कहाँ आग लगाने और लगातार लगाते रहने के कारण मुझे गैस की प्रॉब्लम हो गए है। एक और बात यार तुम लोग अपने फैसन वैसन में तो खूब बदलाव ला रहे हो, जितने भी टी वी चैनल पर रामायाण धारावाहिक आ रहे हैं सब में तुम लोगों ने सुग्रीव , जामवंत और जटायु तक को ग्लेमर में ढाल दिया एक मेरा ही गेट अप, बरसों से वैसा ही चला आ रहा है। इस पार आप लोग कुछ गौर फ़रमाएँ। और हाँ कभी कभी एक्सक्लूसिव प्रयोग के तौर पर कोई जिंदा रावण जलाओ, अब तो इसके लिए आपको म्हणत करने की भी जरूरत नहीं है, कई तो इसी मीटिंग में बैठे हैं। यदि आप लोगों ने इन बातों को सीरियसली नहीं लिया तो याद रखना की हम सब भी आन्दोलन कर सकते हैं।
रावण की धमकी से डर कर हम सब चुप चाप घर आ गए, अब सोच रहे हैं की रावण दहन को स्किप करके सीधा राम की अयोध्या वापसी पर पहुँच जाएँ।
आप सबको दशेहरा की बधाई...
रविवार, 14 सितंबर 2008
पिछले रोज़ घटी कुछ बातें , घटनाएं और दुर्घटनाएं.....
शुक्र है कि बाढ़ तो आयी :-
जी हाँ, मुझे अच्छी तरह मालूम है कि एपी सोच रहे होंगे कि आज कल जब चारों तरफ़ बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए सहायता और दान आदि कि बातें चल रही हैं तो ऐसे में मैं ये कैसी उल्टी बात कर रहा हूँ, लेकिन यकीन मानिये मैं ये बात नहीं कह रहा , ये तो कह रहे हैं हमारे घोटालेबाज। आखिरकार भगवान् ने उनके सुन ली। न जाने कब से बेचारों ने मनौती मांग रखे थे कि अब तो कोई भी कैसे भी प्राकृतिक आपदा आ ही जाए। भगवान् ने छप्पड़ फाड़ के दे दिया। आपदा भी आयी तो इतनी बड़ी- बाढ़, उसपर सोने पे सुहागा ये कि बिहार में आयी। सरकार ने एक हज़ार करोड़ के राहत पैकेज के घोषणा की, बस समझ गए कि निविदाएं आमंत्रित हो गयी हैं। सभे घोटालेबाजों के चेहरे पर वो चमक है जो चमक पे कमीसन आने के बाद से बड़े सरकारी अधिकार के चेहरे पर भी न आ पाई। सभी क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञ घोटालेबाज अपना होमवर्क कर रहे हैं। सबको ताकीद कर दी गए है कि पहले से किसी पचडे में फंसे रिश्तेदारों के नाम पर दोबारा कुछ न करें। इस बार नए मित्रों-सम्बन्धियों को मौका दें। राहत राशिः का वितरण, भोजन, कपड़े आदि का वितरण, चिकित्सा, पुनर्निर्माण अदि , अलग अलग हेड्स के तहत पूरे राहत राशिः की टिक्का- बोटी एक की जायेगी।
तो देश के हे मेधावी घोटालेबाजों, समय आ गया है , आपको आमंत्रण है। हाय मेरा तो कोई परिचित है ही नहीं ऐसा गुनी........
बम धमाके और हम :-
चलिए तो कुछ जेहादियों ने , अपने सीरीयल का अगला एपिसोड राजधाने दिल्ली में शूट किया। अजी क्यों न हो दिल्ली की तो बात ही कुछ और है। और सच कहें तो पिछले कुछ समय में तो इन बम धमकों पर इतनी बातें हो चुकी हो चुकी हैं कि अब तो लगता ही नहीं कि कुछ नया या अलग है , कहने और बताने को।
मगर मैं दो बातें मुझे जरूर कहनी हैं , वे जो ये कहते हैं कि लोग बड़े ही धैर्य वाले हैं और ये कि इन घटनाओं से दिल्ली या मुंबई या कोई और शहर का जज्बा कम नहीं होता। सब कुछ भूल कर सब पूरी जीवटता का परिचय देते हुए आगे बढ़ते हैं। बकवास है सब, जिसके ऊपर गुजरती है कभी उनकी आंखों में झांक कर देखो वे कुछ नहीं भूलते।
मैं जानता हूँ कि पुलिस सब जगह नहीं मौजूद रह सकती, सरकार भे इन पर पूरी तरह काबू नहीं पा सकते, मगर सरकार इतना तो जरूर कर सकती हैं कि जो लोग इसके लिए जिम्मेदार होते हैं उन्हें पकड में आने के बाद फांसी पर लटका दे। अफ़सोस सरकार ये नहीं कर पाती.......
ek gadhe kee kahanee :-
एक बार एक गधा एक बड़े से गड्ढे में गिर जाता है। धोबी देखता है कि गड्ढा काफी गहरा है और उमें से गधे को निकलना मुश्किल है फ़िर चूँकि वो बूढा भी हो चुका है इसलिए अच्छा है कि इस गड्ढे के ऊपर मिटटी दाल कर उसे बंद कर दिया जाए ताकि बूढा गधा शान्ति से मर सके। वो गड्ढे में मिटटी डालने लगता है। पहले तो गधे के समझ में कुछ नहीं आता। मगर जब उसे समझ में आता है तो वो चकित हो जाता है। फ़िर अचानक ही गधे को कुछ सूझता है , जैसे हे उसके ऊपर मिटटी डाली जाती है वो अपने आप को हिला कर उस मिटटी को झाड़ लेता और उस मिटटी पर चढ़ जाता। इस प्रकार धीरे धेरे गधा ऊपर आने लगा। उस धोबे के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहता जब वो देखता है कि गधा धीरे धीरे ऊपर आकार बाहर निकल जाता है। कहने का मतलब ये कि
जीवन में इस तरह सबके ऊपर बहुत सारी मुश्किलें मिटटी के तरह पड़ते हैं जिन्हें झाड़ते हुए और उनके ऊपर कदम रखते हुए जो आगे और ऊपर चढ़ता जाता है वो हर मुश्किल से बहार निकला जाता है। गधे तुझे सलाम.
रविवार, 10 अगस्त 2008
सभी ब्लोग्गेर्स से मुझे अपनी जान का ख़तरा है
सभी ब्लोग्गेर्स से मुझे अपनी जान का ख़तरा है .
बिल्कुल ठीक , मित्र ढूंढा मल भी ऐसे ही चौंक पड़े जैसे आप चौंक रहे हैं, मगर भाई इसमें चौकने वाली कोई बात नहीं है, ये तो यार बेहद संवेदनशील और गंभी बात है, मैंने उन्हें बताया। और सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स ही क्यों मुझे तो अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रितिक रोशन आदि से भी अपनी जान का ख़तरा है। मैंने उन्हें असलीयत बताई।
उन्होने कहा की क्या बकवास कर रहे हो यार, कौन सा ब्लॉगर ऐसा है जिससे तुम्हें अपनी जान का ख़तरा है। लोग अभी ठीक ठीक तो तुम्हें पढ़ते नहीं हैं, हमेशा ही उलटा उलटा सोचते और लिखते हो, कमेन्ट भी कभी कभार कोई दया कर के लिख देता है और आज तक एक बन्दर छाप दंतमंजन तक का विज्ञापन तो दिखाई नहीं दिया तुम्हारे ब्लॉग पर तो फ़िर कोई किस कारण से तुम्हारा दुश्मन बन सकता है । और रही बात फिलिमी सितारों की तो भाई ये बात मेरी समझ में नहीं आयी की वो क्यों तुम्हारी जान के पीछे पड़ेंगे जबकि उनसे तुम्हारा दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है और एक्टिंग से भी नहीं।
मैं भड़क गया, ये तो तो कोई बात नहीं हुई, जब मायावती को भी अपनी जान का ख़तरा हो सकता है, उन्हें भी कोई जान से मारने की धमकी दे सकता है, और सबसे बड़ी बात की उनकी इस बात पर सबको विश्वास हो रहा है, कोई भलामानस इस पर संदेह नहीं कर रहा तो आप क्यों खामख्वाह मुझे पर शक कर रहे हैं।
यार सच तो ये है की मैं एक आम आदमी हूँ और आपको पता नहीं यहाँ तो एक आम आदमी को सड़क पर चलते बस और ट्रक से भी अपनी जान का ख़तरा होता है ...................
ब्लॉगजगत का एकमात्र टी वी चैनल , ममता टी वी
जब शुरू शुरू में मैं यहाँ ब्लॉगजगत पर आया तो सरे अनुभव बिल्कुल नए हो रहे थे और जाहिर सी बात है की बिल्कुल रोमांचकारी और अनोखे से। उसी दौरान मुझे एक नया ब्लॉग दिख्याई दिया, ममता टी वी। मैंने सोचा की अच्छा तो टी वी वालों ने यहाँ भी एक नए नाम के साथ अपनी टांग घुसेड राखी है, और फ़िर तेलेवीजन पर क्या कम ममता लुटाई जा रही है जो यहाँ भी जरूरत पड़ गयी। मगर फ़िर पता चला की नहीं जी ये तो अपनी एक चिट्ठाकारा ममता जी। इनका भी क्या कहना, कभी झारखंड, कभी गोअया, तो कभी कोई और कोना, कोई नया अनुभव , कोई नया विषय , नयी सोच पर कभी छोटी छोटी तो कभी बड़ी बड़ी पोस्टें लिखनें में माहिर। सबसे बड़ी खासियत की बेहद ही नियमित लेखक और टिप्प्न्नी करने वाली भी। सोचता हूँ की इस ब्लॉगजगत पर इनकी ममता की बौछार की हमेशा ही जरूरत बनी रहेगी ..................
बचत
लीना और टीना शोपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी। पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा , टीना , यार ये तो खुलाम्खुला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दूकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से।
टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया , क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी।
मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,
बड़े चौक का कितना लोगे भाई,
जी में साहब दस रुपैये लगेंगे।
अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।
जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धुप है।
चलो चलो आठ में चलना है तो बताओ।
ठीक है बीबीजी, चलिए।
"देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बच्चा लिए न दो रुपैये, लीना से तीन ने कहा.
बिल्कुल ठीक , मित्र ढूंढा मल भी ऐसे ही चौंक पड़े जैसे आप चौंक रहे हैं, मगर भाई इसमें चौकने वाली कोई बात नहीं है, ये तो यार बेहद संवेदनशील और गंभी बात है, मैंने उन्हें बताया। और सिर्फ़ ब्लोग्गेर्स ही क्यों मुझे तो अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रितिक रोशन आदि से भी अपनी जान का ख़तरा है। मैंने उन्हें असलीयत बताई।
उन्होने कहा की क्या बकवास कर रहे हो यार, कौन सा ब्लॉगर ऐसा है जिससे तुम्हें अपनी जान का ख़तरा है। लोग अभी ठीक ठीक तो तुम्हें पढ़ते नहीं हैं, हमेशा ही उलटा उलटा सोचते और लिखते हो, कमेन्ट भी कभी कभार कोई दया कर के लिख देता है और आज तक एक बन्दर छाप दंतमंजन तक का विज्ञापन तो दिखाई नहीं दिया तुम्हारे ब्लॉग पर तो फ़िर कोई किस कारण से तुम्हारा दुश्मन बन सकता है । और रही बात फिलिमी सितारों की तो भाई ये बात मेरी समझ में नहीं आयी की वो क्यों तुम्हारी जान के पीछे पड़ेंगे जबकि उनसे तुम्हारा दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है और एक्टिंग से भी नहीं।
मैं भड़क गया, ये तो तो कोई बात नहीं हुई, जब मायावती को भी अपनी जान का ख़तरा हो सकता है, उन्हें भी कोई जान से मारने की धमकी दे सकता है, और सबसे बड़ी बात की उनकी इस बात पर सबको विश्वास हो रहा है, कोई भलामानस इस पर संदेह नहीं कर रहा तो आप क्यों खामख्वाह मुझे पर शक कर रहे हैं।
यार सच तो ये है की मैं एक आम आदमी हूँ और आपको पता नहीं यहाँ तो एक आम आदमी को सड़क पर चलते बस और ट्रक से भी अपनी जान का ख़तरा होता है ...................
ब्लॉगजगत का एकमात्र टी वी चैनल , ममता टी वी
जब शुरू शुरू में मैं यहाँ ब्लॉगजगत पर आया तो सरे अनुभव बिल्कुल नए हो रहे थे और जाहिर सी बात है की बिल्कुल रोमांचकारी और अनोखे से। उसी दौरान मुझे एक नया ब्लॉग दिख्याई दिया, ममता टी वी। मैंने सोचा की अच्छा तो टी वी वालों ने यहाँ भी एक नए नाम के साथ अपनी टांग घुसेड राखी है, और फ़िर तेलेवीजन पर क्या कम ममता लुटाई जा रही है जो यहाँ भी जरूरत पड़ गयी। मगर फ़िर पता चला की नहीं जी ये तो अपनी एक चिट्ठाकारा ममता जी। इनका भी क्या कहना, कभी झारखंड, कभी गोअया, तो कभी कोई और कोना, कोई नया अनुभव , कोई नया विषय , नयी सोच पर कभी छोटी छोटी तो कभी बड़ी बड़ी पोस्टें लिखनें में माहिर। सबसे बड़ी खासियत की बेहद ही नियमित लेखक और टिप्प्न्नी करने वाली भी। सोचता हूँ की इस ब्लॉगजगत पर इनकी ममता की बौछार की हमेशा ही जरूरत बनी रहेगी ..................
बचत
लीना और टीना शोपिंग मॉल में खरीददारी कर रही थी। पर्स का दाम सुनकर लीना ने टीना से कान में चुपके से कहा , टीना , यार ये तो खुलाम्खुला लूट रहे हैं इस पर्स का बाहर किसी भी दूकान में इससे आधा ही होगा, रहने दे चल निकल यहाँ से।
टीना ने उसे फुसफुसा कर समझाया , क्या बोल रही है तू, पागल अब जो है ले ले , ऐसी जगह पर कोई मोल भाव करता है क्या कितनी शर्म आयेगी।
मॉल से बाहर निकलते ही दोनों सहेलियां एक रिक्शा करने लगी,
बड़े चौक का कितना लोगे भाई,
जी में साहब दस रुपैये लगेंगे।
अरे जाओ जाओ वहां के तो आठ ही लगते हैं, हम तो रोज़ जाते हैं।
जी बीबीजी, मगर ये भी तो देखिये की कितनी तेज धुप है।
चलो चलो आठ में चलना है तो बताओ।
ठीक है बीबीजी, चलिए।
"देखा ये रिक्शे वाले बदमाश होते हैं, बच्चा लिए न दो रुपैये, लीना से तीन ने कहा.
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