मैं ये बातें तब करना चाहता था जब देश में हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाडा या की हिन्दी माह मनाने का दिखावा किया जाता है, क्योंकि हमेशा इसके पीछे सिर्फ़ एक ही तर्क दिया जाता है कि ये सब हिन्दी को उसकी खोई हुई गरिमा दिलाने , या फिर की उसका सही स्थान दिलाने , या यूं कहें की उसे राष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाने के लिए किया जाता है और ना जाने कब से किया जा रहा है। मगर जब से मैंने होश सम्भाला है तब से तो मैं यही देख रहा हूँ , और तभी से मुझे कभी भी और कैसे भी ये नहीं लगा कि हिन्दी कमजोर है । किससे कमजोर है ? अंग्रेज़ी से , या किसी क्षेतिर्य भाषा से , या फिर अपने आप से ही। यहाँ भी हमारे कई चिट्ठाकारों ने हिन्दी भाषा की दिशा और दशा पर बहुत कुछ लिखा है और कईयों ने तो यहाँ तक उम्मीद जताई है कि एक न एक दिन हम हिन्दी को उसकी इज्ज़त दिला कर रहेंगे। भाई कैसी इज्ज़त और कौन सा स्थान। सब बेकार की बातें हैं।
आज सबसे ज्यादा अखबार किस भाषा के हैं,मनोरंजन हो या समाचार , सबसे ज्यादा टी वी चैनेल्स किस भाषा के हैं,लोग अभी भी पिक्चर देखने के लिए परिवार के साथ कौन सी भाषा की पिक्चर देखने के लिए जाते हैं, मुझे नहीं पता कि ये साक्छात्कार और बड़े बड़े mआंच पर अंग्रेज़ी झाड़ने वाले सभी नेता और अभिनेता अपने नाई से , अपने माली से, अपने धोबी से यहाँ तक कि अपने माँ बाप और बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं। आप ख़ुद ही सोचिये कि हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो किसी से मिलते हैं तो बात अंग्रेज़ी में करते हैं , एक दूसरे का अभिवादन अंग्रेज़ी में करते हैं , झगडा होने पर कितने ऐसे लोग हैं जो गाली अंग्रेज़ी में देते हैं। सोच कर देखिये जवाब ख़ुद बा ख़ुद मिल जायेगा।
अन्तिम सच तो सिर्फ़ ये है कि आज भी हिन्दी उतनी ही समृद्ध उतनी ही समर्थ और उतनी ही सशक्त है जितनी पहले थी। हाँ यदि कोई ये सोच या समझ रहा है या कि समझाना चाह रहा है कि हिन्दी जल्दी ही अमेरिका वाले और इंग्लैंड वाले बोलेंगे तो ये कभी सम्भव नहीं है। एक और दूसरी जरूरी बात भाषा कोई ख़राब या अच्छे नहीं होती जरूर ये है कि आपका उसके प्रत्ति ज्ञान और नज़रिया क्या है। मैंने ख़ुद अंग्रेज़ी में प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की उपाधी ली है, और अंग्रेज़ी में भी ब्लोग्गिंग करता हूँ पर सच यही है किखुद को हिन्दी में जितना सहज पाता हूँ उतना अंग्रेज़ी में नहीं. मैं अंग्रेज़ी या और भी अन्य भाषाओं की इज्ज़त करता हूँ मगर हिन्दी से बेंथा मोहब्बत करता हूँ और ये किसी के समझाने या बताने से कम या ज्यादा नहीं हो सकती.
सोमवार, 3 मार्च 2008
कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं ?
मैं ये बातें तब करना चाहता था जब देश में हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाडा या की हिन्दी माह मनाने का दिखावा किया जाता है, क्योंकि हमेशा इसके पीछे सिर्फ़ एक ही तर्क दिया जाता है कि ये सब हिन्दी को उसकी खोई हुई गरिमा दिलाने , या फिर की उसका सही स्थान दिलाने , या यूं कहें की उसे राष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाने के लिए किया जाता है और ना जाने कब से किया जा रहा है। मगर जब से मैंने होश सम्भाला है तब से तो मैं यही देख रहा हूँ , और तभी से मुझे कभी भी और कैसे भी ये नहीं लगा कि हिन्दी कमजोर है । किससे कमजोर है ? अंग्रेज़ी से , या किसी क्षेतिर्य भाषा से , या फिर अपने आप से ही। यहाँ भी हमारे कई चिट्ठाकारों ने हिन्दी भाषा की दिशा और दशा पर बहुत कुछ लिखा है और कईयों ने तो यहाँ तक उम्मीद जताई है कि एक न एक दिन हम हिन्दी को उसकी इज्ज़त दिला कर रहेंगे। भाई कैसी इज्ज़त और कौन सा स्थान। सब बेकार की बातें हैं।
आज सबसे ज्यादा अखबार किस भाषा के हैं,मनोरंजन हो या समाचार , सबसे ज्यादा टी वी चैनेल्स किस भाषा के हैं,लोग अभी भी पिक्चर देखने के लिए परिवार के साथ कौन सी भाषा की पिक्चर देखने के लिए जाते हैं, मुझे नहीं पता कि ये साक्छात्कार और बड़े बड़े mआंच पर अंग्रेज़ी झाड़ने वाले सभी नेता और अभिनेता अपने नाई से , अपने माली से, अपने धोबी से यहाँ तक कि अपने माँ बाप और बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं। आप ख़ुद ही सोचिये कि हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो किसी से मिलते हैं तो बात अंग्रेज़ी में करते हैं , एक दूसरे का अभिवादन अंग्रेज़ी में करते हैं , झगडा होने पर कितने ऐसे लोग हैं जो गाली अंग्रेज़ी में देते हैं। सोच कर देखिये जवाब ख़ुद बा ख़ुद मिल जायेगा।
अन्तिम सच तो सिर्फ़ ये है कि आज भी हिन्दी उतनी ही समृद्ध उतनी ही समर्थ और उतनी ही सशक्त है जितनी पहले थी। हाँ यदि कोई ये सोच या समझ रहा है या कि समझाना चाह रहा है कि हिन्दी जल्दी ही अमेरिका वाले और इंग्लैंड वाले बोलेंगे तो ये कभी सम्भव नहीं है। एक और दूसरी जरूरी बात भाषा कोई ख़राब या अच्छे नहीं होती जरूर ये है कि आपका उसके प्रत्ति ज्ञान और नज़रिया क्या है। मैंने ख़ुद अंग्रेज़ी में प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की उपाधी ली है, और अंग्रेज़ी में भी ब्लोग्गिंग करता हूँ पर सच यही है किखुद को हिन्दी में जितना सहज पाता हूँ उतना अंग्रेज़ी में नहीं. मैं अंग्रेज़ी या और भी अन्य भाषाओं की इज्ज़त करता हूँ मगर हिन्दी से बेंथा मोहब्बत करता हूँ और ये किसी के समझाने या बताने से कम या ज्यादा नहीं हो सकती.
आज सबसे ज्यादा अखबार किस भाषा के हैं,मनोरंजन हो या समाचार , सबसे ज्यादा टी वी चैनेल्स किस भाषा के हैं,लोग अभी भी पिक्चर देखने के लिए परिवार के साथ कौन सी भाषा की पिक्चर देखने के लिए जाते हैं, मुझे नहीं पता कि ये साक्छात्कार और बड़े बड़े mआंच पर अंग्रेज़ी झाड़ने वाले सभी नेता और अभिनेता अपने नाई से , अपने माली से, अपने धोबी से यहाँ तक कि अपने माँ बाप और बच्चों से किस भाषा में बात करते हैं। आप ख़ुद ही सोचिये कि हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो किसी से मिलते हैं तो बात अंग्रेज़ी में करते हैं , एक दूसरे का अभिवादन अंग्रेज़ी में करते हैं , झगडा होने पर कितने ऐसे लोग हैं जो गाली अंग्रेज़ी में देते हैं। सोच कर देखिये जवाब ख़ुद बा ख़ुद मिल जायेगा।
अन्तिम सच तो सिर्फ़ ये है कि आज भी हिन्दी उतनी ही समृद्ध उतनी ही समर्थ और उतनी ही सशक्त है जितनी पहले थी। हाँ यदि कोई ये सोच या समझ रहा है या कि समझाना चाह रहा है कि हिन्दी जल्दी ही अमेरिका वाले और इंग्लैंड वाले बोलेंगे तो ये कभी सम्भव नहीं है। एक और दूसरी जरूरी बात भाषा कोई ख़राब या अच्छे नहीं होती जरूर ये है कि आपका उसके प्रत्ति ज्ञान और नज़रिया क्या है। मैंने ख़ुद अंग्रेज़ी में प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की उपाधी ली है, और अंग्रेज़ी में भी ब्लोग्गिंग करता हूँ पर सच यही है किखुद को हिन्दी में जितना सहज पाता हूँ उतना अंग्रेज़ी में नहीं. मैं अंग्रेज़ी या और भी अन्य भाषाओं की इज्ज़त करता हूँ मगर हिन्दी से बेंथा मोहब्बत करता हूँ और ये किसी के समझाने या बताने से कम या ज्यादा नहीं हो सकती.
रविवार, 2 मार्च 2008
रिश्तों को लादने से अच्छा..........
यूं तो आज कल के समय में यदि रिश्ते ,नाते , जज्बात, एहसास , की बातें की जाएँ तो बहुत से लोगों को लगता है कि ये बातें अब सिर्फ़ बातें ही हैं या कि बिल्कुल बेमानी हो चुकी हैं। विशेषकर शहरों में तो अब जो बचा हुआ है उसे लोग प्रकतिकल होने का नाम देते हैं । लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आता कि ये कौन सी व्यावहारिकता है जो इंसानियत से कोसों दूर ले जाती है। खैर, ये बातें बहुत कुछ तो लोगों के निजी अनुभव पर भी आधारित होती हैं। और ये हो सकता है कि मेरा अनुभव आप से बिल्कुल अलग हो ।
यहाँ मैं जिन रिश्तों की बात कर रहा हूँ वो इंसान के नैसर्गिक रिश्ते होते हैं। यानि खून के भी , परिवार के भी, पड़ोस के भी, जाने अनजाने रिश्ते भी , उनका आधार और स्वरूप कोई भी हो मगर किसी न किसी मोड़ पर कभी ना कभी हर रिश्ते में उतार चढाव आते जरूर हैं और वही वो समय हैं जब इनकी नाजुकता और दृढ़ता की परख हो पाती हैं । हालांकि मेरा अनुभव तो यही कहता है कि जब कभी ऐसा लगे कि रिश्ते थोड़े से तनाव में हैं तो उन्हें खींच कर पकड़ने से अच्छा है कि ढील दी जाए , उन्हें थोडा विराम दिया जाए, । क्योंकि ज्यादा खींचने से उनके टूटने की गुज्ज़ईश ज्यादा रहती है । और यदि थोड़ा विराम देने के बाद भी आपके या कि सामने वाले के मन का बोझ कम नहीं हुआ तो फ़िर रिश्ते लादने से अच्छा है कि उसे पीठ से उतार दिया जाए। फ़िर चाहे कल को आप पर कोई भी इल्जाम क्यों ना लगे, मगर इसमें आपको ये तसल्ली तो रहेगी कि आप अपनी जगह पर ठीक हैं।
मेरा अगला पन्ना :- सफ़ेद चेहरे (एक लघु कथा )
यहाँ मैं जिन रिश्तों की बात कर रहा हूँ वो इंसान के नैसर्गिक रिश्ते होते हैं। यानि खून के भी , परिवार के भी, पड़ोस के भी, जाने अनजाने रिश्ते भी , उनका आधार और स्वरूप कोई भी हो मगर किसी न किसी मोड़ पर कभी ना कभी हर रिश्ते में उतार चढाव आते जरूर हैं और वही वो समय हैं जब इनकी नाजुकता और दृढ़ता की परख हो पाती हैं । हालांकि मेरा अनुभव तो यही कहता है कि जब कभी ऐसा लगे कि रिश्ते थोड़े से तनाव में हैं तो उन्हें खींच कर पकड़ने से अच्छा है कि ढील दी जाए , उन्हें थोडा विराम दिया जाए, । क्योंकि ज्यादा खींचने से उनके टूटने की गुज्ज़ईश ज्यादा रहती है । और यदि थोड़ा विराम देने के बाद भी आपके या कि सामने वाले के मन का बोझ कम नहीं हुआ तो फ़िर रिश्ते लादने से अच्छा है कि उसे पीठ से उतार दिया जाए। फ़िर चाहे कल को आप पर कोई भी इल्जाम क्यों ना लगे, मगर इसमें आपको ये तसल्ली तो रहेगी कि आप अपनी जगह पर ठीक हैं।
मेरा अगला पन्ना :- सफ़ेद चेहरे (एक लघु कथा )
क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?
आप सोचेंगे कि ये क्या सवाल हुआ .फ़िर तो कोई कहेगा कि क्यों निकलता है सूरज और क्यों होती है रात, क्यों बदलते हैं दिन और महीने। हाँ , हाँ हो सकता है कि आप को ये इसी तरह का एक बेतुका सवाल लगे मगर मैं ये बात यहाँ इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से ना सिर्फ़ इस ब्लॉगजगत पर बल्कि विभिन्न माध्यमों में और बहुत से लोगों , विशेषकर महिलाओं द्वारा , ये सवाल खूब उठाया गया है, बहुत सारे तर्क-वितर्क , आकलन, विश्लेषण, आरोप खासकर पुरुषवादी मानसिकता और समाज पर हर बार उंगली उठाई जाती रही है। और कमोबेश ये कहीं ना कहीं सच तो हैं ही, मगर और भी कुछ बातें हैं जो शायद सामने नहीं आती , या कि उन्हें सामने लाया नहीं जाता।
कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-
--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसे बताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥
बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥
बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...
बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....
उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो । तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।
दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाचे, मामी और ये कन्या बरुन हत्या करने वाली दोक्टोर्स के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है। ये बहस चलती ही जा रही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....
सोचिये आप भी सोचिये ......
मेरा अगला पन्ना :- कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं .
कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-
--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसे बताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥
बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥
बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...
बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....
उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो । तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।
दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाचे, मामी और ये कन्या बरुन हत्या करने वाली दोक्टोर्स के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है। ये बहस चलती ही जा रही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....
सोचिये आप भी सोचिये ......
मेरा अगला पन्ना :- कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं .
क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?
आप सोचेंगे कि ये क्या सवाल हुआ .फ़िर तो कोई कहेगा कि क्यों निकलता है सूरज और क्यों होती है रात, क्यों बदलते हैं दिन और महीने। हाँ , हाँ हो सकता है कि आप को ये इसी तरह का एक बेतुका सवाल लगे मगर मैं ये बात यहाँ इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि पिछले कुछ समय से ना सिर्फ़ इस ब्लॉगजगत पर बल्कि विभिन्न माध्यमों में और बहुत से लोगों , विशेषकर महिलाओं द्वारा , ये सवाल खूब उठाया गया है, बहुत सारे तर्क-वितर्क , आकलन, विश्लेषण, आरोप खासकर पुरुषवादी मानसिकता और समाज पर हर बार उंगली उठाई जाती रही है। और कमोबेश ये कहीं ना कहीं सच तो हैं ही, मगर और भी कुछ बातें हैं जो शायद सामने नहीं आती , या कि उन्हें सामने लाया नहीं जाता।
कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-
--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसे बताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥
बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥
बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...
बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....
उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो । तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।
दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाचे, मामी और ये कन्या बरुन हत्या करने वाली दोक्टोर्स के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है। ये बहस चलती ही जा रही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....
सोचिये आप भी सोचिये ......
मेरा अगला पन्ना :- कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं .
कल यूं ही किसी ने किसी से पूछ लिया , यार ये बेटियाँ पैदा ही क्यों होती हैं, काफी देर के बहस के बाद कुछ उत्तर ऐसे मिले :-
--बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं, ताकि उसे पैदा करने वाली माँ को उसके पापबोध का एहसास कराया जा सके। उसे बताया जा सके कि ये उसके सभी गुनाहों की या कहें कि ख़ुद औरत के रूप में पैदा होने की सबसे बड़ी सजा है जिसकी कोई माफी नहीं है॥
बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं ताकि बेटों को एहसास दिलाया जा सके कि देखो इनकी तुलना में तुम्हारा महत्व हमेशा ज्यादा रहा है और रहेगा॥
बेटियाँ इसलिए भी पैदा होती हैं ताकि समाज को कोई मिल सके , कोसने के लिए, पीटने के लिए, नोचने के लिए, सहने के लिए...
बेटियाँ , और बेटियों के बाद फ़िर बेटियाँ इसलिए पैदा होती हैं कि , काश किसी बार बेटा पैदा हो जाए .....
उत्तर मिल ही रहे थे कि बीच में किसी ने टोक दिया , क्यों फालतू की मगजमारी कर रहे हो । तुम्हें नहीं पता अब बेटियाँ कहाँ पैदा हो रही हैं, उन्हें तो गर्भ में ही मारा जा रहा है।
दूसरे ने कहा , तुम हर बार ये बात उठाते हो और वही पुराना राग अलापते हो मगर किसी बार ये नहीं कहते कि बेटियोंके जन्म पर सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस कौन जताता है, माँ, सास , चाचे, मामी और ये कन्या बरुन हत्या करने वाली दोक्टोर्स के अन्दर क्या किसी पुरूष का दिल और दिमाग लगा रहता है। ये बहस चलती ही जा रही है और आगे भी चलती रहेगी। बेटियाँ पैदा होती रहे इसी में इस संसार का अस्तित्व बचा है अन्यथा कहीं कुछ भी नहीं बचेगा.....
सोचिये आप भी सोचिये ......
मेरा अगला पन्ना :- कमजोर हिन्दी नहीं हम हैं .
शनिवार, 1 मार्च 2008
ब्लॉगजगत का प्रथम विश्वयुद्ध
मुझे उम्मीद नहीं थे की इतनी जल्दी ब्लॉगजगत पर इतना बड़ा और घमासान युद्ध शुरू हो जायेगा। ये तो लग रहा था की किसी अन्य भाषा के ब्लोग्गेर्स एक दूसरे से इतने ज्यादा नहीं जुड़ते हैं या कहूँ की एक दूसरे के प्रति इतने ज्यादा भावुक नहीं होते जितने हिन्दी ब्लॉग जगत के , और इसलिए देर सवेर इस अन्दर तक घुसने की प्रवृत्ति का कुछ दुष्परिणाम तो निकलना ही था। खैर, मुझे ये भी मालूम है की आप कहेंगे की मरा मारी तो चलती ही रहती है। मगर हुज़ूर, इतनी हिंसा, इतनी उठा-पटक , आमने सामने का चैलेन्ज तो फ़िर आप ही बताइये की युद्ध कैसे नहीं हुआ ? नहीं भाई ये सा रे गा माँ पा संगीत की प्रथम विश्वयुद्ध टाईप का कोई तलेंट शोस नहीं है। ये तो हमारे बहुत से बुद्धिजीवी भाईयों का मानसिक द्वंद है। हाँ , ये अलग बात है की विचार इतना आक्रामक और आलोचनात्मक है की ब्लॉगजगत पर कारगिल वाली स्थिति हो गयी है। लोग इधर उधर भाग रहे हैं, चिचिया रहे हैं, बौखला रहे हैं,। एक दूसरे को धकिया रहे हैं, लतिया रहे हैं, । नोंच खसोट जारी है । कहने का मतलब लोग अपनी भडास निकाल रहे हैं और सीधे सीधे कहूं तो उबकाई कर रहे हैं।
अब तक मैं यही सोचता था की यार, बताओ , एक हम ही खानाबदोश की तरह अपने ठिकाने के लिए भटक रहे हैंह। ना कोई मोहल्ले में बुलाता है ना ही कसबे में घुसने देता है, ना कोई लिंक बानाता है ना ही कहीं हमारी चर्चा होती है। अजे लानत है हम पर । मगर आजकल ब्लॉगजगत पर जो आपातकाल वाली स्थिति है उससे तो लगता है की यार चलो अच्छा हुआ अपना कोई कस्बा या मोहल्ला नहीं है और हम अपने बंकर में bइल्कुल सुरक्षित बैठे हैं। भैया अच्छा है की अपनी तो नेपाल और श्रीलंका वाली स्थिति है तो बड़े बड़े इन अमेरिकी ब्लागरों के बीच क्यों पिसे।
तो भइया लोग आप लोग दूर दूर से इस विश्वयुद्ध का दर्शन किजीइए और इंतज़ार किजीये की कब इसकी समाप्ति की घोषणा होगी। अजी तभी तो कुछ नया पढने को मिलेगा।
मेरा अगला पन्ना - क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?
अब तक मैं यही सोचता था की यार, बताओ , एक हम ही खानाबदोश की तरह अपने ठिकाने के लिए भटक रहे हैंह। ना कोई मोहल्ले में बुलाता है ना ही कसबे में घुसने देता है, ना कोई लिंक बानाता है ना ही कहीं हमारी चर्चा होती है। अजे लानत है हम पर । मगर आजकल ब्लॉगजगत पर जो आपातकाल वाली स्थिति है उससे तो लगता है की यार चलो अच्छा हुआ अपना कोई कस्बा या मोहल्ला नहीं है और हम अपने बंकर में bइल्कुल सुरक्षित बैठे हैं। भैया अच्छा है की अपनी तो नेपाल और श्रीलंका वाली स्थिति है तो बड़े बड़े इन अमेरिकी ब्लागरों के बीच क्यों पिसे।
तो भइया लोग आप लोग दूर दूर से इस विश्वयुद्ध का दर्शन किजीइए और इंतज़ार किजीये की कब इसकी समाप्ति की घोषणा होगी। अजी तभी तो कुछ नया पढने को मिलेगा।
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ब्लॉगजगत का प्रथम विश्वयुद्ध
मुझे उम्मीद नहीं थे की इतनी जल्दी ब्लॉगजगत पर इतना बड़ा और घमासान युद्ध शुरू हो जायेगा। ये तो लग रहा था की किसी अन्य भाषा के ब्लोग्गेर्स एक दूसरे से इतने ज्यादा नहीं जुड़ते हैं या कहूँ की एक दूसरे के प्रति इतने ज्यादा भावुक नहीं होते जितने हिन्दी ब्लॉग जगत के , और इसलिए देर सवेर इस अन्दर तक घुसने की प्रवृत्ति का कुछ दुष्परिणाम तो निकलना ही था। खैर, मुझे ये भी मालूम है की आप कहेंगे की मरा मारी तो चलती ही रहती है। मगर हुज़ूर, इतनी हिंसा, इतनी उठा-पटक , आमने सामने का चैलेन्ज तो फ़िर आप ही बताइये की युद्ध कैसे नहीं हुआ ? नहीं भाई ये सा रे गा माँ पा संगीत की प्रथम विश्वयुद्ध टाईप का कोई तलेंट शोस नहीं है। ये तो हमारे बहुत से बुद्धिजीवी भाईयों का मानसिक द्वंद है। हाँ , ये अलग बात है की विचार इतना आक्रामक और आलोचनात्मक है की ब्लॉगजगत पर कारगिल वाली स्थिति हो गयी है। लोग इधर उधर भाग रहे हैं, चिचिया रहे हैं, बौखला रहे हैं,। एक दूसरे को धकिया रहे हैं, लतिया रहे हैं, । नोंच खसोट जारी है । कहने का मतलब लोग अपनी भडास निकाल रहे हैं और सीधे सीधे कहूं तो उबकाई कर रहे हैं।
अब तक मैं यही सोचता था की यार, बताओ , एक हम ही खानाबदोश की तरह अपने ठिकाने के लिए भटक रहे हैंह। ना कोई मोहल्ले में बुलाता है ना ही कसबे में घुसने देता है, ना कोई लिंक बानाता है ना ही कहीं हमारी चर्चा होती है। अजे लानत है हम पर । मगर आजकल ब्लॉगजगत पर जो आपातकाल वाली स्थिति है उससे तो लगता है की यार चलो अच्छा हुआ अपना कोई कस्बा या मोहल्ला नहीं है और हम अपने बंकर में bइल्कुल सुरक्षित बैठे हैं। भैया अच्छा है की अपनी तो नेपाल और श्रीलंका वाली स्थिति है तो बड़े बड़े इन अमेरिकी ब्लागरों के बीच क्यों पिसे।
तो भइया लोग आप लोग दूर दूर से इस विश्वयुद्ध का दर्शन किजीइए और इंतज़ार किजीये की कब इसकी समाप्ति की घोषणा होगी। अजी तभी तो कुछ नया पढने को मिलेगा।
मेरा अगला पन्ना - क्यों पैदा होती हैं बेटियाँ ?
अब तक मैं यही सोचता था की यार, बताओ , एक हम ही खानाबदोश की तरह अपने ठिकाने के लिए भटक रहे हैंह। ना कोई मोहल्ले में बुलाता है ना ही कसबे में घुसने देता है, ना कोई लिंक बानाता है ना ही कहीं हमारी चर्चा होती है। अजे लानत है हम पर । मगर आजकल ब्लॉगजगत पर जो आपातकाल वाली स्थिति है उससे तो लगता है की यार चलो अच्छा हुआ अपना कोई कस्बा या मोहल्ला नहीं है और हम अपने बंकर में bइल्कुल सुरक्षित बैठे हैं। भैया अच्छा है की अपनी तो नेपाल और श्रीलंका वाली स्थिति है तो बड़े बड़े इन अमेरिकी ब्लागरों के बीच क्यों पिसे।
तो भइया लोग आप लोग दूर दूर से इस विश्वयुद्ध का दर्शन किजीइए और इंतज़ार किजीये की कब इसकी समाप्ति की घोषणा होगी। अजी तभी तो कुछ नया पढने को मिलेगा।
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